तकषी शिवशंकर पिल्लै
(Thakazhi Sivasankara Pillai)

तकषी शिवशंकर पिल्लै (१९१७ ई. - १९९९ ई.) की गिनती मलयालम के अग्रणी श्रेणी के लेखकों में की जाती है। तकषी शिवशंकर ने अपने लेखन के माध्यम से ग़रीब लोगों की समस्याओं को प्रमुख रूप से समाज के समक्ष रखा था। अपने कहानी संग्रहों में उन्होंने व्यक्ति को अपने समय की विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए प्रस्तुत किया है। इनके द्वारा रचित उपन्यास 'चेम्मीन' के लिये इन्हें सन् १९५७ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। १९८४ में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

तकषि शिवशंकर पिल्लै का वास्तविक नाम के. के. शिवशंकर पिल्लै था। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही हुई, इसके बाद सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई गांव से १२ किलोमीटर दूर समुद्री तट पर स्थित अंपलप्पुषा स्कूल में हुई। यहां पर अरय समुदाय से तकषि का परिचय हुआ; अरयों का जीवन यापन मत्स्यपालन से चलता था। १९५० में उनकी मां और उससे भी पहले पिताजी की मृत्यु हो गई थी।

उन्होंने अपने २६ उपन्यासों तथा २० कहानी-संग्रहों में आज के मनुष्य को अपने समय की परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए दिखाया है। उनके उपन्यासों के किसान-चरित्र भाग्य में भरोसा करने वाले नहीं हैं, वे अपने विरुद्ध किए जाने वाले दुर्व्यवहार का मुकाबला करते हैं। उनका कथा-साहित्य भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी में भी अनूदित हो चुका है। उनके उपन्यासों में ‘झरा हुआ कमल’, ‘दलित का बेटा’, ‘दो सेर धान’, ‘चेम्मीन’, ‘ओसेप के बच्चे’ उल्लेखनीय हैं। उनके उपन्यास पर १९९६ में एक फ़िल्म भी बनाई गई।

तकषी शिवशंकर पिल्लै की तस्वीर

मलयालम कहानियाँ हिन्दी में - तकषी शिवशंकर पिल्लै

Thakazhi Sivasankara Pillai Stories in Hindi

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