तहसीलदार के पिता (तहशीलदारुटे अच्छन) (मलयालम कहानी) : तकषी शिवशंकर पिल्लै
Tehsildar Ke Pita (Malayalam Story in Hindi) : Thakazhi Sivasankara Pillai
"थै थै थों थै थै थों..."
सिंचाई का वह गीत रात के सन्नाटे में ऊँची आवाज में सुनाई दे रहा था। कुट्टनाड के खेतों से कातिक-अगहन में यह गीत गूंजा करता है।
बालक की नींद टूट गयी, वह रो उठा। माँ कोसती हुई उठी और फिर से लोरी गाने लगी। मगर बालक और जोर से रोने लगा। लोरी और रोने की आवाज उस बूढ़े के गाने में डूब गयी।
"थै थै थों थै थै थों..."
“जरा कहिए न कि गाना बन्द कर दें।"
भानुमती अम्मा ने पतिदेव से कहा। उसने गुस्से में बच्चे को एक चपत भी दे मारी।
बूढ़े को इन बातों का कुछ भी पता नहीं।
“जरा चुप रहिए न! रात को लेटे-लेटे क्यों चिल्ला रहे हैं...” तहसीलदार पद्मनाभन् नायर ने कहा। टूटी नींद, पत्नी का हठ, बच्चे की रुलाई-सबने मिलकर उन्हें बहुत तंग कर दिया।
“ऐं, क्या है बेटा?" वृद्ध ने पूछा।
“आप क्या बच्चे की चिल्लाहट नहीं सुन रहे हैं?" पद्मनाभन् नायर ने कहा।
"बेटा, मैं खुशी के कारण अनजाने गा उठा था।"
केशवजी सत्तर बरस पार कर चुके। सारे बदन की चमड़ी सूख गयी है, झुर्रियाँ पड़ आयी हैं। रहँट चलाते हैं!
सने पानी में खड़े-खड़े खेत की मेंड चुनते हैं!
निर्जीव-सी आँखों में कीचड़ जमी हुई है।
वह जीवन-गाथा संक्षिप्त है। शुरू में ग्वाले का छोकरा, फिर जुताई का मजदूर, पाँच बीघा खेत में खेती करता किसान, सौ बीघे की खेती और आखिर तहसीलदार के पिता।
उस बड़े बँगले के पिछवाड़े का छोटा सायबान ही केशवजी का कमरा है। वृद्ध के आगमन से पहले वह कमरा नौकरों को दे रक्खा था। उसमें एक चारपाई पर गद्दा बिछा है। उससे जहाँ-तहाँ रुई बाहर झाँक रही है। पास एक खरल है, पान की पोटली भी।
क्या उसका यह जीवन सफल रहा? क्या उसे साठ सालों के शारीरिक कष्टों का फल हासिल हुआ? क्या वह अपढ़ बुढ़वा शिक्षा की कीमत पहचानता है?
उस गद्दे के सिरहाने सोने की मोहरों से भरी थैली नहीं है। उनके नाम पर खेत या बगीचे का पट्टा नहीं। मगर वे खुश हैं कि उन्होंने अपना फर्ज अदा कर दिया। इसलिए वे स्वयं को भी भूलकर गा रहे हैं-
"थै थै थों थै थै थों...”
बचपन में सीखा हुआ यह गीत अगहन आने पर, अपनी खास परिस्थिति पर ध्यान दिये बिना ही गा उठे थे। साठ सालों से वह यह गीत गाते आ रहे थे।
उस बड़े बँगले में केशवजी का बेटा रहता है। बड़े-बड़े अधिकारी-अमीन व पटवारी सभी पप्पन (केशवजी पुत्र को इसी दुलारे नाम से पुकारते थे) के सामने बड़े विनय से पेश आते हैं। पप्पन शानदार पोशाक में दफ्तर जाया करता है। इन सब दृश्यों को देखकर बूढ़े की आँखें खुशी से भीग जातीं। वे अपने आपसे कहते, 'काश! यह सब परखने के लिए पप्पन की माँ जिन्दा रहतीं।'
पद्मनाभन् नायर की छोटी मुन्नी आँगन पर डगमगाते कदमों से चल रही थी। केशवजी उसे पकड़ने दौड़ पड़ते हैं।
आखिर वह पकड़ में आ गयी। बूढ़े ने उसे गोद में उठा लिया। “अरी शैतान!" बूढ़ा उसे बोसे-पर-बोसा देने लगा। बच्ची खिलखिला उठी।
"मुन्नी! 'दादा' पुकारो।"
बच्ची बोली, “दादा!"
बूढ़ा खुशी से नाच उठा। बच्ची उसकी मूंछों से खेलने लगी।
“शैतान!"
भानुमती अम्मा ने यह सुन लिया। उसने बूढ़े को बच्ची को चूमते भी देख लिया।
"लाओ, मुन्नी को यहाँ दो।" वह बच्ची को लेकर भीतर चली गयी। केशवजी की मूंछों में लगी पान की थूक की दो लाल बूंदें बच्ची की फ्राक पर टपक पड़ी थीं। भीतर से आयी बातचीत बुजुर्ग के कानों में पड़ी।
“अरे नाणु, मुन्नी को नहला दे! इसके कपड़े से बदबू आ रही है।" इसके बाद बच्ची की रुलाई सुनाई दी।
“आगे कभी रोएगी?" कहते हुए माँ बच्ची को सजा दे रही थी।
केशवजी ने पूछा, “क्या यही कहना चाह रही थी कि आगे भी मेरे पास आएगी?"
“उसकी पूरी फ्राक पर थूक लग गया है।"
“क्या मेरे गोद में उठा लेने भर से मुन्नी गन्धा गयी? वह...वह मेरी पोती है री!”
“इन बच्चों को गाली क्यों दे रहे थे?"
“हुँ”–बूढ़े ने सिर्फ ‘हुँ' भर किया।
दूसरे दिन। उस दिन भी तहसीलदार घर पर नहीं थे। केशवजी तहसीलदार के सोने के कमरे में खड़े थे। मखमली तोशक बिछा था। उसकी चमक-दमक देखकर बूढ़े ने उसे छूकर देखा। बहूरानी दरवाजे पर आयीं। उसने पूछा, “क्या कर रहे हैं?"
केशवजी ने मुड़कर उसकी तरफ एक दृष्टि डाली।
“मैं? लो, देख लो!” कहते हुए वे उस पलँग पर लेट गये।
उस दिन शाम को तहसीलदार लौटे तो देखा, श्रीमती गाल फुलाये बैठी हैं।
“हुँ? यह कुढ़न?" पत्नी की ठुड्डी हाथ में लिये हँसते हुए पति ने प्रश्न किया।
वह कुछ नहीं बोली।
“लो, मैं भी नाराज हूँ"-वे भीतर चले गये और कपड़े बदलने लगे। नाण ही कॉफी लाया।
“भानू!" उन्होंने आवाज दी।
भानुमती आयी।
“हुँ...क्या?"
“ये बच्चे यहाँ रहेंगे तो बिगड़ जाएँगे! ये आपस में गाली देना सीख गये हैं।"
“मतलब?"
उस दिन पत्नी ने पति को बहुत कुछ बताया।
“मैंने वे सारे सम्बोधन सुने हैं, भान्!” पद्मनाभन् नायर ने कहा, “उस गन्धाते मुँह से मुझे हजार चुम्बन मिले हैं। यह थूक भी लगा है।"
"मैं बच्चों के साथ अलग रह लूँगी।"
पद्मनाभन् नायर पिता के पास गये। उनसे पूछा, “इन बच्चों को गाली के शब्दों से क्यों पुकारते हैं? इनके अपने नाम हैं न?"
बूढ़ा बोला, “मुझे वे नाम ठीक से पुकारना नहीं आता, लल्लू!"
“आप उनकी बातों में क्यों दखल देते हैं? स्नान-ध्यान और पूजा-पाठ क्यों नहीं करने लगते?"
केशवजी का चेहरा सूख गया। “हाय, बेटा! बच्चों को देखने पर उन्हें पुकारे बिना, उन्हें गोदी में बिठाये बिना कैसे रहूँ?"
पद्मनाभन् नायर क्षण भर स्तब्ध रहे। उन थकी आँखों में आँसू भर आये। वह चेहरा एकदम बुझ गया। तहसीलदार के मन में क्षण भर के लिए कुछ स्मृतियाँ उभर आयीं। आधी रात को जगाकर, पास बिठाकर खुद चावल के कौर खिलाना, रोते वक्त अगोर लेकर चूमना, जरूरत पर पैसे माँगते ही कॉलेज में पहुँचा देना...
पद्मनाभन् नायर सिर झुकाये चले गये। वृद्ध पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रह गया।
केशवजी कभी-कभी कमर पर सिर्फ कच्छा पहनकर और सिर पर लुंगी की पगड़ी बाँधे बाहर घूमा करते थे। घूमते हुए जब कभी कचहरी पहुँच जाते थे, यहाँ वे गुमाश्तों से पूछते, “पप्पन यहाँ है?"
शुरू-शुरू में बात उनकी समझ में नहीं आती थी।
“कौन-सा पप्पन, दादाजी?"
“तासीलदार। हमारा बेटवा। तासीलदार हमारा बेटा है।"
भानुमती अम्मा जिला कमिश्नर की बेटी है-इस पर भी वे गर्व करते।
एक दिन स्थानीय मैजिस्ट्रेट की पत्नी, सहायक कमिश्नर की पत्नी आदि कुछ स्त्रियाँ उस घर पर आयीं। वे बड़ी मस्त होकर बातें कर रही थीं कि केशवजी कमरे में आ गये और पूछने लगे, “अरी बहू! पप्पन कब तक आएगा री?"
बहूरानी की इससे अधिक और क्या बेइज्जती हो सकती थी! जब सभी मेहमान विदा हुए तब बहूरानी केशवजी से खुले महाभारत के लिए तैयार हो गयी। "हाँ, कहे देती हूँ-मुझे अरी-वरी मत पुकारा करें। किसी ने मुझे ऐसे नहीं पुकारा है।” उसने गम्भीरता से कहा।
वृद्ध को क्रोध आ गया।
"तो मैं ‘सरकार...' धत् ! जा री जा!"
“यह दाल यहाँ नहीं गलने की। मझे फटकारने की इच्छा हो तो मुँह धो रखिए।”
“तो फिर पुकारने फटकारने का हक किसे है री? मेरा खाना खाते हुए...अपने लल्लू का खयाल करके चुप रहता हूँ। तेरी जीभ खींच लूँगा। तू केशव को नहीं पहचानती...”
बूढ़े की आवाज जोर पकड़ती ऊँची हो आयी थी। तभी शोरगुल सुनकर नाणु आ गया।
उस दिन रातभर भानुमती अपने पतिदेव को, न जाने क्या, बताती रोती रही। पद्मनाभन् नायर कह रहे थे-“वे हमारे देवता हैं, भानू! हमारे बच्चों की बात सोचो।"
“तो क्या मैंने उन्हें गालियाँ दी हैं जो...? ठीक है, पिता को कोई कभी क्यों छोड़ेंगे? मगर हम दोनों में नहीं पटेगी, इसलिए मैं ही चली जाऊँगी।"
एक दिन बड़े सवेरे रसोईघर में कोई आहट सुनकर बहूरानी जग गयी और नाणु को आवाज दी-रसोईघर में कोई है। वह स्वयं दीया लेकर रसोईघर में पहुँची। तब तक नाणु भी वहाँ आ गया।
“कौन है?"
कोई जवाब नहीं। अन्दर केशवजी बैठे थे। एक कटोरी से कुछ पी रहे थे। बहूरानी सन्न रह गयी। नाणु हँस पड़ा।
"भूख के मारे रहा नहीं गया। क्या तुमने मुझे रात को भोजन दिया था? कुछ पी लेने को मन हो आया", कटोरी नीचे रखते हुए केशवजी बोले।
भानुमती शरम व गुस्से से पागल-सी हो गयी, “अरे नाणु! वे सारे बर्तन बाहर फेंक दे।”
केशव ने हँसते हुए पूछा, “किस पर झल्ला रही हो? तुम रात को खाना दे देतीं तो तब भी क्या मैं खुद उठाकर नहीं खा सकता था?"
बहूरानी चली गयी। यह झगड़ा आगे बढ़ाने लायक नहीं है। पत्नी ने पति से कहा, “यह मेरे लिए शरम की बात है। आप उन्हें जरा समझाइए।"
“तुम शायद उन्हें ढंग से कुछ नहीं देती हो।”
“अपराध हमेशा मेरा ही होता है। आप बाप-बेटे ठहरे। बढ़िया सब्जी के साथ भरपेट खा लिया था।"
"माफ कर दो, भानू!"
“यह बेइज्जती और गालियाँ बरदाश्त करते हुए मैं यहाँ नहीं रह सकती।"
पद्मनाभन् नायर चुपचाप बड़ी देर तक लेटे रहे। बहूरानी अविराम सुनाती रही। कुछ समय बाद वे उठे और लालटेन उठाकर सायबान की तरफ चल दिये।
केशवजी खरल में पान-सुपारी कूट रहे थे। उन्होंने सिर उठाकर देखा, “कौन है ?"
“मैं हूँ।” पद्मनाभन् नायर की आवाज कठोर थी।
वृद्ध ने कहा, “मेरे बेटे, अंतड़ियाँ जल-सी उठी थीं। बुढ़ापा है न! मैंने रसोईघर जाकर थोड़ा-सा ठण्डा बनाकर पी लिया। ओह! लग रहा था कि अन्तिम समय आ गया।"
"तो नाणु को बुला लेते?"
"ओह, पप्पा! उसे क्यों कष्ट दूँ? जब से परोसने वाली चली गयी तब से मैं हमेशा खुद ही परोस लेता, खा लेता हूँ। क्या तुम भी भूल गये?"
डाँटने के लिए पद्मनाभन् नायर कुछ कह न सके। बचपन की याद आने से उनका गला रुंध गया। उन सूखे हाथों ने कितनी बार उन्हें खाना खिलाया है! उन्हें स्मरण है, केशवजी एक बूढ़ी स्त्री से कह रहे थे, ‘अगर घर बसाने के लिए दूसरी औरत को ले आऊँ तो वह मेरे बच्चे को ढंग से कुछ नहीं खिलाएगी। मैं अपने बच्चे का खाना खुद पकाऊँगा, खिलाऊँगा।'
पद्मनाभन् नायर चुपचाप लौट आये। उनकी आँखें भर आयी थीं। कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद मुड़कर देखा। बूढ़ा सिकुड़कर गठरी-सा बैठा हुआ था।
केशवजी ने तब भी बेटे को नहीं बताया कि बहू ने रात को खाना नहीं दिया था। भानुमती छिपकर खड़ी-खड़ी यह सब देख-सुन रही थी। उसने पूछा, “साहब को देखकर कवायद भूल गये?"
पद्मनाभन् नायर ने कुछ नहीं कहा।
“भानु, उस साहब को देखकर बहुत-सी बातें याद आ जाती हैं। याद करने के लिए भी बहुत कुछ है। मेरी माँ..."
पद्मनाभन् जब पाँच के ही रहे होंगे, माँ चल बसी थी...उस स्नेहमयी नारी की धुंधली मुखाकृति दीख पड़ी-मानो सपने में देख रहे हों।
परन्तु इस घटना ने एक जटिल समस्या का रूप धारण कर लिया। किसी पर अभियोग नहीं लगाया जा सकता था। दोनों के पास दलीलें थीं। पद्मनाभन नायर संकट से बचने का उपाय देर तक सोचते रहे।
वृद्ध को कुछ शराब चढ़ाने की आदत है। साँझ होते ही वे ताड़ीखाने की तरफ चल देते हैं। यह खबर गाँव-भर में फैल चुकी थी। गमछा पहनकर उजड्ड देहाती की तरह चल पड़ते हैं। और फिर वापस आकर घर पर हंगामा मचाते हैं।
एक दिन पद्मनाभन् नायर ने केशवजी से कहा, “ये सब मेरे लिए अपमान की बातें हैं।”
“आगे चलकर हालत इससे भी खराब होने वाली है, बेटा!” केशवजी की आँखें गीली हो रही थीं। आगे बोले, “मेरे लल्लू, तुम्हारा बाप किसी का गुलाम नहीं रहा है। अपनी इच्छानुसार मैं इतने साल जी चुका। लाल, तुम अपने इस बाप से कुछ मत पूछो...तुम न कुछ सुनना, न खयाल करना...तुम्हारे मन को तकलीफ नहीं होगी।"
“जो भी हो, यह बहुत अपमान की बात है।"
“मेरे...मेरे लल्लू को क्या ऐसा लगता है?"
तहसीलदार को सन्देह हुआ कि उस बूढ़े दिल में बड़ा दर्द हो रहा है। थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा, “गाँव में बुआ रहती है न?"
"हाँ"। बूढ़े ने सिर हिलाया।
“क्या वहाँ जाकर नहीं रह सकते?"
“नहीं बेटा, नहीं।"
"जरूरत के अनुसार पैसे मैं पहँचा दिया करूँगा।"
“पैसे? मुझे? मैं चावल व पैसा बहुत देख चुका हूँ। मुझे पैसे की जरूरत नहीं है। लाल, न मैं पैसा चाहता हूँ, न वहाँ जाकर रहूँगा।"
वृद्ध चला गया।
जीवन में इतने सारे कष्ट इसके लिए नहीं उठाये थे। उस बूढ़े को न धन की चाह थी न टीमटाम की। पद्मनाभन् नायर को याद है। वे जवानी में कहा करते थे, “जब मेरा बेटा नौकरी पाकर खुशहाल रहने लगेगा तब उसके साथ चार दिन रहना है।"
टेढ़ा सवाल है जिसका कोई जवाब नहीं। उन दोनों में कभी नहीं पटती। जीवन का ध्येय! छोटी उम्र से ही बड़े अरमान थे। उसके चारों ओर परिश्रमी जीवन तूफान की तरह मँडराता था। होश आने के बाद की सारी बातें एक-एक कर तहसीलदार को याद आने लगीं। उन चार दिनों के लिए सत्तर वर्ष बिताना। आखिर उन चार दिनों से वंचित रह जाना-कितनी भीषण बात है! काश, उस वृद्ध की स्मरण-शक्ति नष्ट हो जाती। ऐसा होता तो चार दिनों की बात न उठती। यह भी गनीमत थी। निराशा न होती। मगर साथ रखें तो कैसे?...वृद्ध की जिद्दी प्रकृति हद से बाहर हो गयी है।
तहसीलदार दौरे पर थे। एक दिन भानुमती नहाने नदी पर गयी। साबुन लगाते हुए उँगली से अंगूठी फिसली और पानी में खो गयी। बड़ी कोशिश करने पर भी नहीं मिली। नहाकर लौटी। केशवजी को पोते से इसकी खबर मिल गयी थी। उनसे रहा न गया। बुजुर्ग उस नुकसान के सामने अपने को भी भूल गया। भानुमती कपड़े बदल रही थी कि वे कमरे में घुस आये।
“अरी, तुम्हारे हाथ की अंगूठी कहाँ है?"
भानुमती ने उस सवाल को अनसुना कर दिया।
“कहाँ है वह अंगूठी?” केशवजी गरजे।
"क्यों?" भानुमती ने हिकारत से पूछा।
“क्यों क्या? मेरे बेटे को कंगाल बना देने का व्रत लिया है? तुम्हारी खर्चीली आदतें देखता ही रहता हूँ।"
“इन बातों का जवाब उन्हें दूंगी जिन्हें पूछने का हक है।"
यह तो वृद्ध के लिए बहुत हो गया। उसका खून खौल उठा, आँखें लाल हो आयीं। वे मुट्ठी कसकर आगे बढ़े, “हट जाओ, शराफत कहीं छूट जाए..."
दोनों अपनी-अपनी हैसियत भूलकर जोर-जोर से बोल रहे थे। पड़ोसी जमा हो गये। वृद्ध ने कहा, “मुझे तुम्हारे रंग-ढंग का पूरा पता है। मेरे बेटे को...कुलच्छनी! वह बदमाश नाणु किधर है?"
दूसरे दिन पद्मनाभन् नायर लौटे। भानुमती न बिस्तर से उठी, न खाया, न पीया। पद्मनाभन् नायर ने सारी बातें सुनीं। नाणु ने मिर्च-मसाला लगाकर सारी बात बतायी। वे तैश में आ गये। वृद्ध उनके सामने सिकुड़े हुए पहुंचे।
“सठिया जाने पर भी...सूझ-बूझ तो...."
पद्मनाभन् नायर दाँत पीस रहे थे। वृद्ध ने एक भी शब्द नहीं कहा। उन आँखों से आँसू बूँद-बूँद कर टपकने लग गये।
पद्मनाभन् का कथन जारी था-"जैसे शराब के नशे में धुत् होकर मेरी माँ को समाप्त कर दिया...”
केशवजी कुछ कहने आगे रुके नहीं। सिर्फ इतना ही कहा, “बेटा..."
उस बूढ़े के पास कहने के लिए तो बहुत कुछ था। उसके उदास दिल ने कई भेद छिपा रखे थे। ठीक खाना न मिलना, नाणु द्वारा उपहास आदि अनेक बातें आज सब कुछ दिल खोलकर सुनाने के इरादे से बेटे के सामने आया था। मगर मुँह नहीं खुला।
उस जीभ में मिठास नहीं थी। दूसरे के दिल को अपने वश में करने की ताकत उसमें नहीं है। दलील पेश करने की हिम्मत नहीं है। जीवन के अन्तिम दिनों के अनुभवों ने जो घाव बना दिये थे उन्हें किसी ने नहीं देखा था।
तहसीलदार के सोने के कमरे में उस दिन रात भर बातचीत होती रही।
“उस शैतान ने कहा कि मैं चोरी-छिपे दूसरे से इश्क करती हूँ।" भानुमती के ये शब्द सुनकर पद्मनाभन् नायर आग-बबूला हो गये।
“यों कहा?...तब तो मैं उसे इसी क्षण रवाना किये देता हूँ। बेशरम बुढ़ऊ..."
“शान्त रहिए” भानुमती ने कहा, “चार दिन बाद देखा जाएगा..."
केशवजी पुत्र को अपनी कोई इच्छा नहीं बताते थे। दबंग प्रवृत्ति का वह किसान वेटे के सामने कठपुतली-सा हो जाता था। उस दिन रात को केशवजी ने नाणु से कहा, “अपने पप्पन के सामने मैं दुम हिलाता कुत्ता हो जाता हूँ। अपने भूखे रहने की बात बेटे को इस डर से नहीं बताता कि उसके मन में कष्ट होगा। मेरा बेटा अपने बाप को इतना प्यार करता है। मैंने प्रभु से यही प्रार्थना की थी। चार दिन इसके साथ बिताना...ओह! ऐसा ही रहना काफी है।"
पुत्र पर वृद्ध का दबाव तो था मगर वह गजवर अपनी शक्ति को नहीं पहचानता था।
दो-तीन दिन बीत गये। केशवजी सायबान से बाहर नहीं निकलते। उसमें सिकुड़े बैठे थे। देखने पर पागल-से लगते थे।
नाणु ने पूछा, “बाबा, यहाँ से जाने पर क्या आप वापस नहीं आएगे?"
बुजुर्ग ने कुछ नहीं कहा।
“मालिक ने मुझे कहा है कि मैं परसों आपको गाँव पहुँचा आऊँ।"
वृद्ध मानो कुछ चौंक-सा उठा। उसने पिछले सत्तर वर्षों की तरफ घूरकर देखा। आगे के दिन...उनमें वे चार दिन...
चाँदनी में नहायी रात। पद्मनाभन् नायर को नींद नहीं आ रही थी। बीच-बीच में वे जाग पड़ते। आधी नींद में किसी को कहते सुना-“बेटा, एक बार 'पिताजी' पुकारो।” फिर झपकी खुली तो 'बेटा' पुकार सुनी। वह तीन बार दोहरायी गयी। उन्हें कुछ शंका हुई।
दूसरे दिन वे पिता की कुछ मीठी बातों को याद करते हुए जाग पड़े। बी. ए. पास करने के बाद उन्होंने आज तक उस वृद्ध को 'पिताजी' नहीं पुकारा था। वह जिन्दगी कुर्बानियों की थी। बुढ़ापा चढ़ने के पहले उस चेहरे पर हमेशा मुसकराहट रहा करती थी। लेकिन अब?...क्या यह मायूसी बुढ़ापे की खासियत होती है? तब तो बड़ी भीषण बात होगी!
तहसीलदार ने नाणु को बुलाया और कहा, “उन्हें...पि....उन्हें बुला लाओ।"
नाणु सायबान की तरफ यों चल पड़ा मानो न्यायाधीश के आदेश पर अपराधी को पकड़ने जा रहा हो। वहाँ वृद्ध नहीं मिला। वृद्ध के कपड़े और पान की पोटली भी गायब। भानुमती ने कहा कि कहीं बाहर गये होंगे। उस दिन दोपहर भी वे नहीं मिले, न दूसरे दिन ही। पद्मनाभन् नायर घबराये। गाँव को आदमी भेजा। वहाँ भी नहीं पहुंचे थे।
भानुमती ने कहा, “चुप रहिए। सिर्फ इतना कहिए कि गाँव गये हैं।"
“ओह! चाण्डालिन!" पद्मनाभन् नायर कुरसी पर धड़ाम से गिर पड़े।
"अरी राच्छसिन! मेरे पिताजी कहाँ...?"