Devendra Satyarthi / देवेन्द्र सत्यार्थी
देवेन्द्र सत्यार्थी (28 मई 1908 - 12 फरवरी 2003) हिंदी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के विद्वान तथा साहित्यकार थे। उनका मूल नाम देवेन्द्र बत्ता था। श्री सत्यार्थी लोकगीत अध्ययन के प्रणेताओं में से रहे हैं। उन्होंने देश के कोने-कोने की यात्रा कर वहाँ के लोकजीवन, गीतों और परंपराओं को आत्मसात किया और उन्हें पुस्तकों और वार्ताओं में संग्रहीत कर दिया जिसके लिये वे 'लोकयात्री' के रूप में जाने जाते हैं। देवेन्द्र सत्यार्थी ने लोकगीतों का संग्रह करने हेतु देश के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएँ की थीं तथा इन स्थानों के संस्मरणों को भावात्मक शैली में उन्होंने लिखा है। "क्या गोरी क्या साँवली" तथा "रेखाएँ बोल उठीं" सत्यार्थी के संस्मरणों के अपने ढंग के संग्रह हैं। श्री सत्यार्थी का जन्म पटियाला के कई सौ साल पुराने भदौड़ ग्राम (जिला संगरूर) में हुआ था। 1977 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उनकी कृतियाँ हैं; हिन्दी में लोकयान: 'धरती गाती है' (1948), 'बेला फूले आधी रात' (1949), 'बाजत आवे ढोल' (1950), 'चित्रों में लोटियां' (1951); हिन्दी संग्रह: 'चट्टान से पूछ लो' (1949), 'चाय का रंग' (1949), 'नए धान से पहले' (1950), 'सड़क नहीं बंदूक' (1950); उपन्यास: 'रथ के पहिए' (1950), 'कठपुतली' (1951), 'दूध गाछ' (1954), 'ब्रह्मपुत्र' (1955), 'कथा कहो, उर्वशी' (1956) और 'तेरी कसम सतलुज' (1989); आत्मकथात्मक लेखन हिन्दी में: 'चांद-सूरज के वीरन' (1954), 'नीलयक्षिणी' (1986) और 'सफरनामा पाकिस्तान' (1989); निबंध व रेखाचित्र: 'हिन्दीः एक युग, एक प्रतीक' (1949), 'रेखाएं बोल उठीं' (1949), 'क्या गोरी क्या सांवरी' (1950), 'कला के हस्ताक्षर' (1955)। उन्होंने विविध महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन भी किया है।