Bansi Nirdosh / बंसी निर्दोष

बंसी निर्दोष (१ मई १९३० - २१ अगस्त २००१) का जन्म श्रीनगर (कश्मीर) के बढ़ियार मुहल्ले में हुआ था। १९५१ तक वह उर्दू में लिखते रहे, तत्पश्चात कश्मीरी की ओर प्रवृत्त हुए। कश्मीरी में इनके तीन कहानी-संग्रह तथा दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। बहुचर्चित उपन्यास 'अख दोर' का हिन्दी अनुवाद 'एक दौर' शीर्षक से हिन्दी विकासपीठ, मेरठ से प्रकाशित हुआ। रेडियो के लिए लिखे गए नाटकों की संख्या सौ से अधिक है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'अख दोर', 'मुकजार' (तलाक), 'गिरदाब' (भंवर), 'बाल मरोयो' (मैं बाला मर जाऊँ), 'आदम छुयिथय बदनाम' (आदमी यों ही बदनाम है) (कहानी संग्रह), 'सुबह सादिक', 'अमर कहानी' (जीवनियाँ), 'गुरु गोविन्दसिंह', 'कोमुक शायर' (कौम का शायर) आदि शामिल हैं। ‘एक कहानी’ सीरियल के अन्तर्गत दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण कार्यक्रम में 'मौत' कहानी का प्रसारण हुआ। 'दान थेरे' (अनार की डाली), 'रिश्ते', 'गिरदाब', 'तफतीश' आदि कहानियों पर टेली-फिल्में निर्मित हुईं। जम्मू व कश्मीर राज्य कल्चरल अकादमी द्वारा दो बार पुरस्कृत और बख्शी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा सम्मानित किए गए। कश्मीर से विस्थापित होकर उन्होंने जम्मू में स्वतंत्र लेखन में अपना जीवन बिताया।

कश्मीरी कहानी-लेखन का जीवन-इतिहास लगभग ६० वर्ष पुराना है। अपनी विकास-यात्रा के दौरान कश्मीरी कहानी ने कई मंज़िलें तय कीं। जिन शलाका पुरुषों के हाथों कश्मीरी की यह लोकप्रिय विधा समुन्नत हुई, उनमें स्वर्गीय निर्दोष का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। निर्दोष की कथा-रचनाएँ कश्मीरी जीवन और संस्कृति का दस्तावेज़ हैं। इनमें मध्यवर्गीय समाज की हसरतों और लाचारियों का परिवेश की प्रमाणिकता को केन्द्र में रखकर जो सजीव वर्णन मिलता है, वह अन्यतम है। कश्मीरी परिवेश को ताज़गी और जीवंतता के साथ रूपायित करने में निर्दोष की क्षमताएँ स्पृहणीय हैं। इसी से इन्हें 'कश्मीरियत का कुशल चितेरा' भी कहा जाता है।

Bansi Nirdosh / बंसी निर्दोष

बंसी निर्दोष - कहानियाँ हिन्दी में

Bansi Nirdosh - Stories in Hindi