तितलियों का गाँव (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'
आसमान में सूरज एक बड़ा-सा संतरा बनकर चमक रहा था। उसकी सुनहरी किरणें खिड़की से सीधे चिंटू के कमरे में ऐसे आ रही थीं मानो उसे जादू की दुनिया में झाँकने का निमंत्रण दे रही हों। चिंटू, जिसकी उम्र अभी मात्र दस बरस थी, अपने नन्हें से मन में तूफानों का घरौंदा पाले हुए था। वह एक शरारती बच्चा था जो अपनी किताबों में छपी कहानियों से ज़्यादा नई-नई जगहों की खोज और अज्ञात के रहस्य सुलझाने में लगा रहता था। उसकी हर सुबह किसी नए अभियान की योजना से शुरू होती थी।
चिंटू की जुड़वाँ बहन गुल्लू स्वभाव में बहुत शाँत और समझदार थी। वह अक्सर किताबों में खोई रहती परंतु उसका कोमल हृदय हमेशा अपने भाई के लिए प्यार और चिंता से भरा रहता था। चिंटू के खतरनाक विचारों पर वह भले ही पहले माथा सिकोड़ती थी लेकिन जब बात एडवेंचर की आती तो गुल्लू की आँखों में भी एक चंचल चमक आ जाती। वह जानती थी कि चिंटू की मस्ती में ही जीवन की असली उमंग छिपी है। दोनों का साथ ऐसा था जैसे तेज़ हवा और सागर का शाँत किनारा लेकिन दोनों एक दूसरे के पूरक थे।
चिंटू को अब सब्र नहीं था। एक दिन उसने उत्साह से गुल्लू को टटोला, "गुल्लू, क्या तुमने कभी तितलियों का गाँव देखा है? जहाँ हवा में शक्कर घुली रहती है और फूल खुद ही गाना गाते हैं?"
गुल्लू ने अपनी गुड़िया, जिसका नाम उसने 'परी' रखा था, को प्यार से गोद में रखा और अपने भाई की दिलचस्प बातों में खो गई। सपने देखने वाली उसकी आँखों में एक जादुई जिज्ञासा थी। इसी जिज्ञासा से भरकर उसने कहा "नहीं, चिंटू। मैंने तो सिर्फ दादी की कहानियों में ही सुना है कि वह एक जादुई जगह है जहाँ धरती पर इंद्रधनुष उतर आया हो और हर तरफ़ सिर्फ और सिर्फ रंग-बिरंगी तितलियाँ रहती हों।"
"बस!" चिंटू की आँखों में उस पल एक अनोखी चमक आ गई। उसने तुरंत गुल्लू का हाथ पकड़कर कहा, "चलो, फिर! आज हम कहानियों को सच करेंगे। हम उस गाँव को ढूँढते हैं। मैंने सुना है हमारे घर के ठीक पीछे से उस गाँव का रास्ता जाता है..."
तभी माँ की आवाज़ गूँजी, "उठो चिंटू और गुल्लू ! कब तक सोते रहोगे...? स्कूल नहीं जाना क्या...? देर हो रही है!"
चिंटू ने चादर में कुनमुनाते हुए, आँखें बंद किए हुए ही कहा, "नहीं मम्मी! आज तो स्कूल की छुट्टी है। आज हम स्कूल की तरफ़ से तितलियों का गाँव देखने जाएँगे!"
माँ हँस पड़ीं। "तितलियों का गाँव? यह कौन सा नया स्कूल ट्रिप है, चिंटू?"
आँखें मलते-मलते चिंटू तुरंत उठ बैठा। उसकी आँखों में अभी भी नींद और रोमांच का मिश्रण भरा हुआ था। उसने उत्साहित होकर कहा, "हाँ! गुल्लू और मैंने कल रात ही योजना बनाई थी। स्कूल की तरफ़ से जाने का मतलब है कि हम बहादुरी से अकेले जाएँगे, बिल्कुल बड़ों की तरह! और माँ, यह एक सीक्रेट एडवेंचर है!" चिंटू की बातें सुनकर माँ के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई।
उसकी बहन, गुल्लू, जो पहले से ही जाग चुकी थी लेकिन चुपचाप बिस्तर में लेटी हुई थी शाँत और समझदार दिखाई दे रही थी। उसने तुरंत बात सँभालते हुए कहा, "मम्मी, यह होमवर्क का हिस्सा है…खोज यात्रा। हमें तितलियों के गाँव के बारे में पता लगाकर आना है।"
माँ, दोनों की शरारत भरी आँखों को समझ तो गईं पर उन्होंने ज्यादा सवाल नहीं किए। नहा-धोकर दोनों ने फटाफट नाश्ता किया और अपने छोटे से बैग में बिस्कुट, पानी की बोतल और एक टॉर्च रखी। आज वे किसी साधारण पिकनिक पर नहीं जा रहे थे। वे एक जादुई खोज पर निकल रहे थे जिसका लक्ष्य था "तितलियों का गाँव"!
वे घर से निकलकर आगे बढ़े। सबसे पहले उन्हें एक छोटी, पथरीली पहाड़ी मिली। पत्थरों पर काई जमी हुई थी और रास्ता फिसलन भरा था। उन्हें डर लग रहा था कि वे गिर न जाएँ और उनका अभियान कहीं यहीं न थम जाए। चिंटू आगे-आगे बढ़ा, हाथों से मिट्टी पकड़कर खुद को खींचता। गुल्लू भी डर को मुट्ठी में बंद कर के चिंटू के पीछे-पीछे सँभलकर चढ़ती गई। साँसें फूल गईं परंतु दोनों ने हार नहीं मानी।
पहाड़ी पार करते ही, सामने घना जंगल आ गया। जंगल इतना घना था कि सूरज की एक भी किरण नीचे नहीं आ पाती थी। ऊँचे-ऊँचे पेड़ ऐसे खड़े थे जैसे सदियों पुराने रखवाले। सब कुछ अँधेरा-अँधेरा और शाँत लग रहा था। अजीब-सी खामोशी थी, जिसमें उनकी धड़कनों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी। चिंटू और गुल्लू डर से काँप उठे। चिंटू ने गुल्लू का हाथ और भी कसकर पकड़ा। उन्होंने टॉर्च जलाई, जिसकी छोटी-सी रोशनी अँधेरे के विशाल सागर में किसी छोटी नाव जैसी लग रही थी। डर के बावजूद, एक-दूसरे की हिम्मत बनकर, वे आगे बढ़ते रहे।
उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते-चलते वे थक गए थे। तभी उन्हें एक बूढ़ा चरवाहा मिला जो वहाँ अपनी बकरियों चरा रहा था। चरवाहे का नाम क्या था यह तो पता नहीं लेकिन उन्हें वह एक बुजुर्ग दादाजी जैसा लगा। बूढ़े चरवाहे ने उनसे पूछा, “बच्चो, तुम इतनी दूर क्यों जा रहे हो? क्या तुम रास्ता भटक गए हो?”
चिंटू ने बताया, “नहीं, हम तितलियों का गाँव ढूँढ रहे हैं।”
बूढ़े चरवाहे ने धीरे-धीरे सिर हिलाया और मुस्कुराकर कहा, “ओह, तो तुम उस जादुई जगह पर जा रहे हो। लगता है तुम्हारी टीचर ने ही तुम्हें भेजा है। पहले भी बहुत से बच्चे उस गाँव की खोज में यहाँ आ चुके हैं। उस गाँव तक पहुँचने का रास्ता मैं जानता हूँ। लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए तुम्हें तीन मुश्किल पहेलियाँ सुलझानी होंगी।”
"ठीक है दादाजी!" चिंटू और गुल्लू तैयार हो गए।
बूढ़ा चरवाहा अब दादाजी बन गए थे। उन्होंने अपनी टोपी सीधी की और आकाश की ओर देखते हुए बोले, "यह रही पहली पहेली...!"
“मैं दिन में छिप जाता हूँ
रात में चमचमाता हूँ
सूरज साथ दोस्ती निभाता हूँ"
गुल्लू ने तुरंत जवाब दिया, “आप चाँद की बात कर रहे हैं!”
दादाजी खुश हुए और बोले, “शाबाश! तुम सही हो। अब अगली पहेली सुनो।”
"मैं रंग-बिरंगी हूँ
फूलों की साथी हूँ
उड़कर राह दिखाती हूँ।"
गुल्लू ने थोड़ा सोचा और फिर खुशी से बोली, “यह तो तितली है!”
दादाजी ने उसे शाबाशी दी और कहा, “बहुत अच्छे! अब आखिरी और तीसरी पहेली...”
"मैं हूँ काला
बटन दबाओ
करूँ उजाला।"
चिंटू और गुल्लू दोनों ने मिलकर सोचा। यह पहेली थोड़ी मुश्किल थी। तभी चिंटू और गुल्लू का ध्यान अपने हाथ पर गया। उन्होंने एक साथ जोर से कहा, "टॉर्च...!”
दादाजी बहुत खुश हुए। उन्होंने बहुत प्यार से कहा, “तुमने सभी पहेलियाँ सुलझा ली हैं, बच्चो! अब बस इस रास्ते पर सीधे चलते जाओ, तुम उस जादुई गाँव में पहुँच जाओगे।”
चिंटू और गुल्लू ने दादाजी का धन्यवाद किया और उनकी बताई हुई दिशा में चल पड़े। चिंटू और गुल्लू को कुछ ही देर में दूर से एक चमकदार रोशनी दिखाई दी। अद्भुत नज़ारा था मानो धरती पर हज़ारों जुगनू एक साथ नाच रहे हों। जैसे-जैसे वे उसके पास पहुँचे उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। यह सचमुच तितलियों का गाँव था जो उनकी कल्पना से भी हज़ार गुना अधिक सुंदर था।
वहाँ हर तरफ़ हवा में तैरते हुए रंग थे! कोई तितली नीले मखमली रंग जैसी थी, कोई पीले सोने जैसी, कोई गुलाबी शर्बत जैसी तो कोई ऐसी थी जिसके पंख इंद्रधनुष के सातों रंगों से बने थे। वे हवा में लयबद्ध तरीके से नाच रही थीं, फूलों पर बैठकर धीरे-धीरे मीठा रस चूस रही थीं और उनके पंखों से निकलती हल्की-हल्की आवाज़ हवा के साथ मिलकर एक मीठा-सा गीत गाती लग रही थी। हवा में चमेली और गुलाब की मीठी खुशबू फैली थी जो साँस लेने पर अंतर्मन में जादू भर रही थी।
गाँव के एक खेत के बिल्कुल बीचों-बीच एक और अद्भुत दृश्य था—एक बहुत बड़ा फूल, जिसकी पंखुड़ियाँ मोती जैसी सफेद थीं और केंद्र से सुनहरी आभा निकल रही थी। गाँव के बहुत से बच्चे वहाँ खेल रहे थे। एक बच्चे ने बताया कि सब उसे प्यार से “महारानी फूल” कहते हैं। इसी विशाल फूल की सबसे ऊँची पँखुड़ी पर गाँव की सबसे सुंदर और सबसे बड़ी तितली बैठी थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसके पंखों पर हीरे जड़े हुए हों और जो पूरे गाँव पर प्यार से नज़र रखे हुए हो। चिंटू और गोलू हैरानी से यह सब देख रहे थे। अपने हमउम्र बच्चों से बातें करना दोनों को बहुत अच्छा लग रहा था इसलिए जल्दी ही सब दोस्त बन गए।
चिंटू और गुल्लू को देखकर कई छोटी-बड़ी तितलियाँ उनके चारों ओर ऐसे मंडराने लगीं जैसे वे उन दोनों का स्वागत कर रही हों। तभी एक बूढी दादी वहाँ से गुज़रीं। उन्होंने बच्चों को ज़मीन पर बैठने का इशारा किया और उन्हें गुलाब के मीठे फूलों का रस पीने को दिया। चिंटू और गुल्लू ने चरण स्पर्श कर के दादी का धन्यवाद किया और उनसे गाँव और तितलियों के बारे में ढेर सारी जानकारी हासिल की। उन्होंने अपना पूरा दिन तितलियों के साथ दौड़कर, हँसकर और खेल-कूद कर बिताया।
चिंटू और गुल्लू ने देखा कि एक छोटा सा बच्चा भी अपने नन्हें-नन्हें पैरों से तितलियों के पीछे-पीछे मस्ती में भाग रहा है, उन्हें पकड़ने के लिए। लेकिन तितलियाँ उससे आगे-आगे भाग रही थीं। बड़ा ही सुंदर दृश्य था। गुल्लू ने मोहित होकर बड़े प्यार से पूछा, "बच्चे, तुम्हारा नाम क्या है...?" बच्चा मुस्कुराया और अपनी बोली में गुनगुनाता हुआ फिर तितलियों के पीछे दौड़ गया। बच्चा इतना छोटा था कि उसे अभी बोलना भी नहीं आता था। बूढी दादी ने ही बताया कि उसका नाम अयाँश है और वह उसका पोता है। उसे भी तितलियों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता है। चिंटू और गुल्लू ने रंग-बिरंगी तितलियों के ढेर सारे खूबसूरत चित्र बनाए। गुल्लू ने विशेष रूप से अपनी नोटबुक में एक ऐसा चित्र भी बनाया जिसमें एक छोटा सा बच्चा तितलियों के पीछे दौड़ रहा था।
चिंटू और गुल्लू आज बहुत खुश थे। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा नज़ारा पहली बार देखा था। उनका मन कर रहा था कि बस तितलियों को देखते रहें। शाम को जब सूरज धीरे-धीरे पहाड़ के पीछे छिपने लगा और आसमानी रंग नारंगी होने लगा तभी चिंटू और गुल्लू को याद आया कि उन्हें घर भी वापस जाना है। उन्होंने सभी तितलियों को मन ही मन धन्यवाद कहा और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, अपने अविस्मरणीय अनुभव को दिल में संजोए दोनों घर की ओर चल पड़े।
घर पहुँचकर चिंटू और गुल्लू ने देखा कि माँ चिंता में दरवाजे पर खड़ी उनकी ही राह देख रही हैं। दोनों सीधे अपनी माँ के पास गए। माँ ने चिंतित होकर पूछा, "कहाँ थे तुम दोनों इतनी देर? तितलियों का गाँव ढूँढने के चक्कर में घर को ही भूल गए! मेरा तो डर के मारे बुरा हाल था!"
चिंटू ने उत्साहित होकर कहा, "मम्मी! हमने सचमुच तितलियों का गाँव ढूँढ लिया! वह होमवर्क सही में सच हो गया!" चिंटू और गुल्लू ने अपनी छोटी-छोटी नोटबुक निकालीं जिसमें उन्होंने रास्ते में दादाजी की पहेलियाँ, जंगल के पेड़ों के नाम और गाँव की रंग-बिरंगी तितलियों के ढेर सारे खूबसूरत चित्र बना रखे थे।
" अरे रे रे रे... पहले घर के अंदर तो चलो फिर देखते हैं...." माँ उनकी बहादुरी और समझदारी देखकर गर्व से भर उठीं। उन्होंने बच्चों को गले लगाया। वह जानती थीं कि उन्होंने सिर्फ एक जगह की खोज नहीं की बल्कि हिम्मत, दोस्ती और मुश्किलों को सुलझाने का एक अमूल्य सबक भी सीखा है। फिर तो पूरा ही घर चिंटू और गुल्लू की तितलियों की कहानियों से रंगीन होता रहा।
अगले दिन दोनों स्कूल गए। स्कूल में सभी बच्चे अपनी-अपनी यात्रा के बारे में टीचर को बता रहे थे। कोई रंग-बिरंगे फूलों के बाग में गया था, कोई चहचहाते पक्षियों से मिलकर आया था तो किसी ने हरे-भरे खेतों की यात्रा की थी। सबने अपनी अपनी यात्रा के बारे में डायरी में लिखा था लेकिन किसी ने भी उन यात्राओं का कोई चित्र नहीं बनाया था। फिर भी सब बच्चों की होमवर्क यात्राएँ अपने-अपने अंदाज में बहुत अनोखी थीं।
उन दोनों ने भी अपनी होमवर्क खोज यात्रा "तितलियों का गाँव" के बारे में बताया। टीचर ने उनकी मेहनत, पहेलियों को सुलझाने की बुद्धिमत्ता, गाँव के लोगों से मेल-मिलाप और यात्रा का सुंदर वर्णन सुनकर उनकी बहुत तारीफ़ की। नोटबुक में उन्होंने जो रंग-बिरंगी तितलियों के खूबसूरत चित्र बनाए थे वो भी ऐसे लगते थे कि जैसे तितलियाँ अभी नोटबुक से बाहर आकर उड़ने लगेंगी। तितलियों की कहानियाँ सुनकर कक्षा के सभी बच्चे रोमांचित हो उठे। उन्होंने टीचर से कहा कि हम भी तितलियों का गाँव देखने जाएंगे।
चिंटू और गुल्लू ने न केवल कक्षा में पुरस्कार जीता बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सच्ची शिक्षा केवल किताबों में नहीं बल्कि साहस, मेल-मिलाप और अनुभवों में छिपी होती है।