सयाना कौआ और घमंडी हंस (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'

बात ज्यादा पुरानी नहीं है लेकिन एक समय की बात है कि प्रकृति के हृदय में एक घना और शाँत जंगल फलता-फूलता था। इस जंगल के ठीक बीचों-बीच, सूरज की किरणें जहाँ सबसे पहले पहुँचती थीं वहाँ एक मीठे और शीतल जल से भरी एक विशाल झील थी। इस झील का पानी इतना साफ़ था कि आसमान का नीला रंग उसमें बिल्कुल वैसा ही प्रतिबिंबित होता प्रतीत होता था। ऐसा लगता था मानो पानी का रंग ही नीला हो। इसी झील पर शुभ्र नाम का एक हंस राज करता था।

शुभ्र का नाम उसकी शुद्ध सुंदरता को सार्थक करता था। उसके पंख बर्फ़ से भी ज़्यादा सफ़ेद और चमकदार थे। जब वह पानी में तैरता तो लगता जैसे चाँदी की कोई नौका शाँत जल पर बहती चली जा रही हो। उसके इस सुंदर रूप को देखकर हर किसी का मन प्रसन्न हो जाता था लेकिन अपनी इसी अद्वितीय सुंदरता पर शुभ्र को बहुत घमंड था। वह ख़ुद को जंगल का सबसे श्रेष्ठ और अभिजात पक्षी समझता था। उसका स्वभाव इतना अभिमानी था कि वह अपनी प्रशंसा में घंटों बिताता और हर किसी को नीचा दिखाने की कोशिश करता जिसकी वजह से अन्य पक्षी अब उसके पास आने से कतराने लगे थे।

नील नाम का एक साधारण कौआ अक्सर उसी झील पर अपनी प्यास बुझाने आया करता था। नील के पंख साँझ के आसमान जैसे काले थे और उसका रूप-रंग शुभ्र के मुकाबले बहुत ही विनम्र था। जब भी नील झील पर पानी पीने आता शुभ्र अपनी सुन्दरता पर इतराते हुए हर बार नील को देखते ही मज़ाक उड़ाना शुरू कर देता, "अरे, देखो-देखो कौन आया! ऐ काले कौए, जरा मेरे सफेद पंखों की चमक तो देखो! तुम तो केवल रात के अँधेरे जैसे हो और मैं पूर्णिमा का चाँद हूँ! तुम्हारे साधारण, भद्दे पंख मेरे सामने कुछ भी नहीं हैं।"

नील इन सब बातों पर कभी क्रोधित नहीं होता था। वह शाँत मन से पानी पीता और शुभ्र की बातों को हवा में उड़ते सूखे पत्तों जैसा मानता। शुभ्र की जली-कटी बातें सुनकर भी नील बस मुस्कुरा देता। वह जानता था कि असली सौंदर्य आँखों में नहीं वरन् मन की सरलता, बुद्धि की तीक्ष्णता और दयालुता में होता है जो दिखावे से कहीं ज़्यादा टिकाऊ है।

एक दिन जंगल पर प्रकृति की ओर से अचानक एक आपदा आ गई। आसमान से बरसने वाली बारिश कम हो गई और भीषण गर्मी अपना प्रकोप दिखाने लगी। जिस मीठे पानी की झील पर सभी जीव निर्भर थे, उसका पानी अचानक सूखने लगा। पहले-पहल तो यह सब कुछ मामूली लगा लेकिन दिन-प्रतिदिन पानी का स्तर इतनी तेजी से गिरने लगा कि शाँत और गहरी झील एक कीचड़ भरे गड्ढे में बदलने लगी।

थोड़े ही समय में झील का तल दिखने लगा। हर जगह सूखी थी। धरती जैसे फटने लगी थी। उन दरारों पर मिट्टी थी जिन पर कभी पानी की लहरें नाचती थीं। बस कहीं-कहीं किसी कोने में ही पानी की झलक दिखाई देती थी। जंगल के सभी पक्षी भयभीत हो गए। उनके पंखों की उड़ान अब जीवन की चिंता में बदल गई थी। वे यही सोचते रहते कि कभी अगर दो बूँद पानी भी नसीब नहीं हुआ तो क्या होगा।

शुभ्र, जो हमेशा अपनी सफेदी और सुंदरता के नशे में चूर रहता था अब अपनी प्यास की वजह से तड़पने लगा। उसके चमकदार पंख अब फीके पड़ गए थे और सुंदर गर्दन पानी की तलाश में चारों ओर घूमती रहती थी। उसे अपनी शोभा की जरा भी परवाह नहीं रही थी। अब उसकी एकमात्र चिंता थी कि पानी कहाँ मिलेगा? शुभ्र का सारा घमंड इस प्राकृतिक संकट के सामने कमज़ोर पड़ गया था। उसे याद आया कि कैसे नील हमेशा शाँत रहता था और जंगल के कोने-कोने को जानता था। अपने घमंड को कुचलते हुए शुभ्र ने उस साधारण कौए को पुकारना शुरू कर दिया जिसे वह हमेशा नीचा दिखाता था। उसे लगता था कि कौआ बहुत शाँत प्रवृत्ति का है इसलिए मेरी मदद ज़रूर करेगा और यही हुआ भी।

शुभ्र ने नील से कहा, "हे प्रिय कौए, क्या तुम्हें पता है कि पीने के लिए ठंडा और मीठा पानी और कहाँ मिलेगा? मुझे बहुत प्यास लगी है।"

जब शुभ्र ने अपनी प्यास की चिंता में नील से पूछा तो नील ने जरा भी देरी या संकोच नहीं किया। उसे अपने अपमान की भी कोई बात याद नहीं रही। उसने शाँत भाव से कहा, "हाँ, मुझे पता है। इस जंगल के दूसरी तरफ़ एक बहुत बड़ा और मीठे पानी का झरना है। वहाँ खूब पानी है।"

शुभ्र ने पूछा, "लेकिन मैं वहाँ कैसे पहुँचूँगा? मुझे तो रास्ता भी नहीं पता।"

नील ने उसकी ओर नम्रता से देखा। उसकी आँखों में कोई घमंड नहीं था। बदले की कोई भावना भी नहीं थी। विपरीत इसके शुभ्र की प्यास ने उसे परेशान कर दिया था। नील ने विनम्रतापूर्वक कहा, "तुम मेरे साथ-साथ चलना। मैं तुम्हें वहाँ ले जाऊँगा। तुम उड़ने में भले ही मुझसे अच्छे हो और तुम्हारी रफ़्तार भी तेज है लेकिन तुम्हें जंगल के अंदरूनी रास्ते नहीं पता। मेरी काली आँखें दूर-दूर तक रास्ता देखती हैं।"

शुभ्र को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। उसने देखा कि जिस कौए को वह हमेशा काले रंग के लिए नीचा दिखाता था वही आज उसकी जीवनरेखा बन गया है। बाकी कोई दूसरा पक्षी उसकी सहायता के लिए नहीं आया। बिना किसी देरी के घुटनों के बल झुके हुए शुभ्र ने नील से सच्चे दिल से माफ़ी माँगी। उसकी आवाज़ में बैठा घमंड का आईना अब टूटकर बिखर गया था।

नील ने तुरंत उसे माफ कर दिया और बिना एक पल गँवाए वह धीरे-धीरे आगे उड़ चला। शुभ्र, जो उड़ने में माहिर था, अब नील के पीछे-पीछे चल रहा था। और उनके साथ-साथ उड़ रही थी जीवन की आशा और सद्भावना की लौ। नील धीरे-धीरे उड़ता, पेड़ों की हरियाली और जंगल के घुमावदार रास्तों से होता हुआ शुभ्र को झरने के पास ले गया।

झरने पर पहुँचकर शुभ्र की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने जी भर कर झरने का ठंडा और मीठा पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई। पानी ने सिर्फ उसके शरीर को ही नहीं बल्कि हृदय के अभिमान को भी धो डाला था। उसने नील को गहरे सम्मान के साथ धन्यवाद दिया और सच्चे मन से कहा, "नील, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। मैंने तुम्हारी बुद्धिमत्ता और दयालुता को कभी नहीं समझा। मैंने हमेशा बाहरी सुंदरता को देखा और तुम्हारी आंतरिक अच्छाई की उपेक्षा की। आज तुमने मुझे बचाया, मुझे जीवन दान दिया जबकि मैं हमेशा तुम्हारा मज़ाक उड़ाया करता था। मुझे माफ कर दो, दोस्त मैं समझ गया हूँ कि बाहरी दिखावा नहीं बल्कि सच्ची बुद्धिमत्ता, विनम्रता और दयालुता ही असली सौंदर्य है।