परी और उसका जादुई बस्ता(बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'

एक छोटे और प्यारे से गाँव में परी नाम की एक बच्ची रहती थी। बच्ची आठ बरस की थी और उसका स्वभाव भी अपने नाम की तरह ही कोमल और शाँत था। जहाँ उसके हमउम्र बच्चे शोर-शराबे के साथ गलियों में भाग-दौड़ मचाते, शरारतों में उलझे रहते, वहीं परी को एकाँत प्यारा था। वह अक्सर घर के भीतर अपनी किताबों के पन्नों में किसी अज्ञात दुनिया की सैर कर रही होती या फिर अपने छोटे से बगीचे में झुककर, अकेले में पौधों से फुसफुसाकर बातें करती। परी की दुनिया किताबों और पेड़-पौधों की हरी-भरी खामोशी तक ही सिमटी हुई थी जहाँ वह सबसे अधिक खुश रहती थी।

परी के माता-पिता, उसे लेकर अक्सर चिंतित रहते थे और खासकर उसकी माँ । वे उसे इतना शाँत और गुमसुम देखते तो उनका मातृ-हृदय तड़प उठता। उन्हें लगता था कि परी शायद खुश नहीं रहती है या किसी अज्ञात डर के कारण दूसरे बच्चों के साथ घुलती-मिलती नहीं है। उन्हें यह बात ही असहनीय लगती थी कि उनकी प्यारी-सी परी, जीवन के खेल और मस्ती से वंचित रह जाए। वे चाहते थे कि परी भी खुले आसमान के नीचे दौड़े, हँसे, गाए और भोली शरारतें करे जैसा कि उसके हमउम्र बच्चे करते हैं।

उन्होंने परी को बदलने की बहुत कोशिशें कीं। कई बार उसे जबरदस्ती पार्क में ले गए जहाँ बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं। कई बार पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने को कहा परंतु परी हमेशा कोई न कोई नया बहाना बना देती। कभी कहती "आज पौधों को पानी देना है" तो कभी कहती "किताब में जादुई परियाँ उड़ने वाली हैं" और चुपचाप एकांत में लौट जाती। माता-पिता को समझ ही नहीं आता था कि उस छोटी सी शाँत दुनिया से उसे बाहर कैसे निकालें क्योंकि वे जानते थे कि जोर-जबर्दस्ती से तो कोमल मन और भी अंतर्मुखी हो सकता है।

कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। माता-पिता भरसक कोशिश करते रहे लेकिन कोई सही परिणाम नहीं निकला।

एक दिन गाँव में उत्साह की एक नई लहर आई। गाँव के स्कूल में किसी समाजसेवी संस्था की तरफ से कुछ समय के लिए राहुल सर नाम के एक नए खेल शिक्षक आए थे। राहुल सर, जिनके चेहरे पर हमेशा एक शरारती मुस्कान रहती थी, बच्चों के साथ घुलने-मिलने का एक अनूठा और प्यारा तरीका जानते थे। उन्होंने महसूस किया कि बच्चे अक्सर अपनी निजी दुनिया में सिमटे रहते हैं और मन की बातें साझा करने से हिचकिचाते हैं।

उन्होंने स्कूल के मैदान में आकर एक बड़ी-सी घोषणा की, "बच्चो! क्या तुम जादू में विश्वास करते हो? बोलो बच्चो, करते हो...?"

"हाँ मास्टर जी करते हैं..."

"ठीक है, फिर मैं तुम्हें एक-एक 'जादुई बस्ता' दूँगा!"

यह सुनकर बच्चों की आँखें हैरानी से चौड़ी हो गईं।

"इन बस्तों में तुम्हारी मनपसंद चीज़ें होंगी...तुम्हारे सपने, तुम्हारे प्यारे खिलौने, तुम्हारी रहस्यमयी किताबें और बहुत कुछ!" लेकिन उन्होंने तुरंत एक शर्त भी जोड़ दी जिसने सबकी उत्सुकता और बढ़ा दी। उन्होंने बताया कि इस बस्ते का जादू तभी काम करेगा जब बच्चे उनका एक नियम मानेंगे। नियम यह था कि बच्चे एक बार में केवल एक चीज़ ही बाहर निकाल सकते हैं। और उसे बाहर निकालने के बाद उनको उसे दूसरों के साथ साझा भी करना होगा। यदि वे साझा नहीं करेंगे तो बस्ता अपना जादू खो देगा। इसीलिए नियम का पालन करना अति आवश्यक है। उसके बाद वे बच्चों की कौतूहल से भरी आँखों को ढेर सारी और बातें बताते रहे जिन्हें सुन-सुनकर बच्चों की आँखें और फैलती रहीं।

राहुल सर की जादूभरी बातें सुनकर बच्चे खुशी और उत्सुकता से उछल पड़े। सब सोचने लगे कि उनके जादुई बस्ते में क्या-क्या होगा...! इस घोषणा ने न केवल बच्चों में रोमाँच भर दिया था बल्कि शाँत बैठी परी के मन में भी हलचल मचा दी थी। एक सामाजिक गतिविधि के प्रति पहली बार किसी ने छोटी-सी जिज्ञासा परी के मन में जगाई थी।

राहुल सर ने सभी बच्चों को बस्ते दिए जिन में तरह-तरह का सामान भरा हुआ था। परी को भी एक मखमली कपड़े का बना जादुई बस्ता मिला। उसने उस बस्ते को छूकर देखा। उसके एकाकी हृदय में पहली बार किसी चीज़ को लेकर एक रोमांच जागा। उसने धीरे से बस्ते का ज़िप खोला और अंदर झाँका। उसमें वे सारी चीज़ें थीं जो उसकी एकांत दुनिया का हिस्सा थीं। एक तरफ़ रंग-बिरंगी पुरानी कहानियों की किताबें थीं और दूसरी तरफ़ एक छोटा-सा पीतल का दूरबीन जिसे लेकर वह अक्सर छत पर जाकर दूर के पहाड़ों को निहारा करती थी। मानो वह दुनिया को एक सुरक्षित दूरी से देख रही हो।

परी सोचने लगी कि वह क्या निकाले। उसका मन तो सबसे पहले अपनी प्रिय किताबों को छूना चाहता था परन्तु उसे तुरंत यह एहसास हुआ कि भाग-दौड़ मचाने वाले बच्चों को शायद किताबों में उतना मज़ा न आए। वे उबाऊ महसूस कर सकते हैं। "ओह! उसने ऐसा सोचा...!" उसे इस बात पर भी हैरानी हुई। तभी उसकी नज़र दूरबीन पर पड़ी। उसने सोचा, दूरबीन सबको कुछ नया दिखाएगी। यह विचार उसके मस्तिष्क में सामाजिक बुद्धिमत्ता का पहला बीज था। परी ने हिम्मत करके दूरबीन निकालने का फैसला कर ही लिया।

स्कूल का मैदान गहमागहमी से भरा था। सभी बच्चे अपने-अपने जादुई बस्तों में से खिलौने, गेंदें, किताबें और कुछ अनोखी चीज़ें निकालकर खुशी-खुशी खेल रहे थे। परी अपनी पीतल की दूरबीन लिए हमेशा की तरह एक अलग कोने में खड़ी थी। वह दूरबीन को हाथ में कसकर पकड़े हुए थी पर उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि साझा करने की शुरुआत कैसे की जाए। उसका शाँत स्वभाव उसे बच्चों के झुंड के पास जाने से रोक रहा था।

राहुल सर, जिनकी आँखें बच्चों के व्यवहार को पढ़ने में माहिर थीं ने देखा कि परी अकेली खड़ी है। वह धीरे से, बिना कोई अनावश्यक शोर किए, परी के पास आए। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह गर्मजोशी भरी हुई थी।

"परी," राहुल सर ने ज़मीन पर बैठते हुए उसके बराबर आने की कोशिश करते हुए प्यार से पूछा, "क्या तुम मुझे दिखाओगी कि तुम अपनी दूरबीन से क्या देखना चाहती हो? क्या तुम्हारी दूरबीन सचमुच जादू करती भी है या नहीं...?"

राहुल सर की प्यार भरी आँखों में देखकर परी ने झिझकते हुए अपनी दूरबीन उनके हाथ में थमा दी। यह पहली बार था जब उसने अपनी एकांत भरी दुनिया की कोई चीज़ किसी बाहरी व्यक्ति को सौंपी थी।

राहुल सर ने दूरबीन अपनी आँखों से लगाई। उनका चेहरा तुरंत हर्ष से खिल उठा। "अरे वाह!" उन्होंने आश्चर्य से कहा। "यहाँ से तो सामने पेड़ पर बैठी छोटी सी चिड़िया इतनी पास दिख रही है कि मानो उसे छू सकते हैं! देखो, वह दाना खा रही है। परी का बस्ता तो सचमुच जादुई है! क्या तुम भी देखना चाहोगे, बच्चो?"

यह सुनते ही, जो बच्चे मैदान में खेल रहे थे दौड़कर राहुल सर के पास आ गए। राहुल सर ने धैर्य से हर बच्चे को दूरबीन से वह दृश्य दिखाया। एक-एक कर बच्चों ने आँखें गड़ाकर चिड़िया को देखा, कभी आसमान के बादलों को तो कभी दूर के पहाड़ों को। कुछ ही देर में, परी जो अभी तक अकेली थी, के आसपास बच्चों का झुंड लग गया। वे खुशी से चिल्ला रहे थे और अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।

परी ने यह सब हैरानी से देखा। यह शोर उसे अब अप्रिय नहीं बल्कि अपनेपन जैसा लग रहा था। जब एक बच्चे ने दूरबीन लौटाते हुए धन्यवाद कहा तो परी को अपने अंदर एक अनोखी गरमाहट महसूस हुई। उसे पहली बार बच्चों के साथ किसी चीज़ को साझा करते हुए इतना मज़ा आया था। उसे लगा जैसे उसका अकेलापन जो एक काले बादल जैसा था कहीं बरसकर छूमंतर हो गया है।

राहुल सर ने बच्चों को एक शाँत घेरे में बिठाया। उन्होंने दूरबीन को बीच में रखते हुए कहा, "देखो, परी ने अपनी दूरबीन साझा की और हम सबने एक नया नज़ारा देखा। यदि परी इसे अकेले रखती तो क्या हम सब इतना मज़ा ले पाते? नहीं न! जब हम अपनी चीज़ें दूसरों के साथ साझा करते हैं तो खुशी दुगुनी हो जाती है। साझा करना ही सच्ची दोस्ती का जादू है!

उस दिन के बाद से परी में आया बदलाव एक सुनहरी किरण जैसा था जिसकी रोशनी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। धीरे-धीरे, परी आत्मविश्वास से भरकर हर रोज़ अपने जादुई बस्ते से एक नई चीज़ निकालने लगी। कभी वह बच्चों के बीच बैठकर अपनी जादुई कहानियों की किताबें खोलती तो कभी वह अपने बनाए रंग-बिरंगे चित्र दिखाती जिनमें तितलियों का गाँव और फूलों की बातें होतीं। कभी वह अपनी शाँत और मीठी आवाज़ में उन्हें ऐसी-ऐसी कहानियाँ सुनाती कि सभी बच्चे मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते, मानो वे खुद किसी परी लोक में पहुँच गए हों। बच्चों ने भी उसे अपने भाग-दौड़ वाले खेल और अपनी छोटी-छोटी शरारतों में सहर्ष शामिल कर लिया था। परी ने महसूस किया कि साझा करना केवल चीज़ों का नहीं बल्कि खुशी, विचारों और दोस्ती का भी सबसे प्यारा आदान-प्रदान है।

अब अक्सर ऐसा ही होता कि सब बच्चे मिल-जुल कर रहते। राहुल सर को यह सब बहुत अच्छा लगता था। राहुल सर की बातें सुनकर बच्चों का उत्साह आसमान छूने लगता था। एक दिन उन्होंने बच्चों को पार्टी देने की सोची। बच्चों को जोड़ने का इससे अच्छा तरीका उनकी नज़र में और कोई नहीं था। "चलो आज हम सब कैंटीन में चलते हैं।" राहुल सर ने कहा तो बच्चे खुशी से झूम उठे।

कैंटीन का नज़ारा किसी त्योहार से कम नहीं था। एक लंबी मेज पर खाने-पीने की ढेर सारी चीज़ें रखी हुई थीं जिन्हें देखकर बच्चों के मुँह में पानी आ गया। मेज़ पर एक तरफ़ नारंगी और पीले रंग के समोसे थे जो गरमाहट में लिपटे हुए थे। उनके साथ हरी चटनी का एक कटोरा भी रखा हुआ था। दूसरी तरफ़, रंग-बिरंगी, छोटी-छोटी पेस्ट्रीज़ सजी थीं जिन पर मीठी चेरी के टुकड़े किसी हीरे की तरह चमक रहे थे। चॉकलेट, कुकीज़ और रंग-बिरंगी खट्टी-मीठी टॉफियों का भी एक बड़ा डिब्बा था जिसकी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी। बच्चों के पीने के लिए संतरे का ताजा निकला जूस भी था।

सबसे ज़्यादा आकर्षण का केंद्र था गोल, चमकदार गुलाब जामुनों का ढेर जो प्यार की चाशनी में डूबे हुए थे। इनके साथ, कुरकुरे, आलू चिप्स के पैकेट और लाल-पीली इमली की गोलियों से भरा एक बड़ा जार भी था। हर बच्चे की आँख अपनी पसंदीदा चीज़ पर टिकी थी। यह कैंटीन नहीं बल्कि स्वाद का जादुई खजाना लग रहा था जहाँ राहुल सर के 'जादुई बस्ते' का जादू अब पेट की खुशी में बदल चुका था।

मेज पर रखी स्वादिष्ट चीज़ों को देखते ही बच्चों में एक क्षण के लिए तो होड़ ही मच गई लेकिन तभी उन्हें राहुल सर की शर्त याद आई...चीज़ों को साझा करना पहली शर्त है।

सबसे पहले चिंटू ने एक गरमा-गरम समोसा उठाया। उसने उसे खुद खाने की बजाय अपने बगल में खड़ी छोटी रिया की तरफ बढ़ाया। "रिया, क्या तुम थोड़ा समोसा खाओगी? मेरी मम्मी जैसा बनाती है यह बिल्कुल वैसा ही लगता है!" रिया ने शरमाते हुए थोड़ा सा टुकड़ा ले लिया। रिया ने फिर अपनी चॉकलेट कुकी चिंटू को दी। यह देखकर दूसरे बच्चे भी तुरंत साझा करने लगे। किसी ने अपनी लाल टॉफी तोड़कर दोस्त को दी तो किसी ने अपनी पेस्ट्री का आधा हिस्सा बगल वाले को खिलाया। वहाँ 'यह मेरा है' की कोई आवाज़ नहीं थी बल्कि हर तरफ़ 'क्या तुम खाओगे?' की गूँज थी।

राहुल सर सभी बच्चों के पास जाकर उनका उत्साह बढ़ा रहे थे। तभी उन्होंने परी की तरफ देखा और मुस्कुराये।

परी, हमेशा की तरह, एक कोने में खड़ी होकर यह खुशी का दृश्य देख रही थी। उसके हाथ में एक छोटा-सा गुलाब जामुन था। आज वह फिर से देख रही थी कि कैसे चीज़ें साझा करने से खुशी बढ़ रही है। बच्चों की हँसी और मिलकर खाने का मज़ा उसके अकेलेपन को धीरे-धीरे तोड़ रहा था। परी ने गहरी साँस ली। उसने हिम्मत की और अपने गुलाब जामुन को आधा तोड़कर, पास खड़े एक लड़के, जिसका नाम राजू था, की तरफ बढ़ाया। "राजू... क्या तुम... क्या तुम खाओगे?" परी ने हल्की, दबी हुई आवाज़ में पूछा।

राजू, जो शरारती बच्चों में से था, परी के इस निमंत्रण से हैरान तो हुआ पर फिर खुश हो गया। उसने कहा, "ज़रूर परी! और तुम मेरी यह वाली कुकी खाओगी?"

जब परी ने गुलाब जामुन साझा किया और बदले में कुकी खाई तो उसे लगा जैसे स्वाद दुगुना हो गया है और खुशी चौगुनी। राहुल सर ने यह देखा और गर्व से मुस्कुरा दिए। परी ने उस दिन केवल खाना ही साझा नहीं किया बल्कि बच्चों के साथ अपनी दोस्ती का पहला कदम भी साझा कर लिया था।

अब उसे यह गहराई से समझ आ गया था कि दूसरों के साथ जुड़ने और अपनी दुनिया को साझा करने में कितना असीम आनंद छिपा है। उसका अकेलापन पूरी तरह पिघल चुका था।

परी के माता-पिता जो परी को घर ले जाने के लिए स्कूल आए थे, परी में आए इस अद्भुत बदलाव को देखकर आँखों में गर्व के आँसू लिए भौंचक्के से खड़े थे। उन्हें अपनी पुरानी चिंताएँ अब छोटी लगने लगी थीं। उन्हें यह अमूल्य सबक समझ आ गया था कि हर बच्चा एक अलग बीज होता है जिसे किसी निर्धारित साँचे में ढालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि उसे अपने तरीके से खुलने का समय, सम्मान और प्रोत्साहन देना चाहिए। परी ने भी उन्हें सिखाया कि बच्चों के कोमल मन को समझने के लिए बाहर से देखने की बजाय उनके अंदर झाँकना भी ज़रूरी है।

अब, परी की दुनिया केवल बगीचे के पौधों तक सीमित नहीं थी बल्कि वह अपने पौधों के साथ-साथ, अपने दोस्तों के साथ भी खुलकर हँसती और खेलती थी। परी को दोस्तों का और दोस्तों को परी का साथ अब बहुत अच्छा लगता था।