जादुई पत्थर का आकाश (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'

सूर्य से तपते रेगिस्तान में एक छोटा सा गाँव था... मरु जो अपनी पानी की कमी के लिए जाना जाता था। चारों तरफ दूर-दूर तक फैला रेतीला समंदर और रेत के ऊँचे-ऊँचे उबड़-खाबड़ टीले थे जो तेज हवाओं के साथ रातों-रात अपनी जगह बदल लेते थे। दोपहर के समय जब सूरज ठीक सिर पर होता तो ऐसा लगता था मानो आसमान से आग बरस रही हो। हवा इतनी गर्म होती कि साँस लेना भी दूभर हो जाता।

गाँव के घर मिट्टी और फूस के बने हुए थे जिनकी दीवारें मोटी थीं ताकि बाहर की झुलसा देने वाली गर्मी घर के अंदर अपनी बाँहें न पसार सके। दिन के समय पूरा गाँव थम सा जाता था क्योंकि जहाँ एक ओर लोग अपने-अपने घरों की छाँव में दुबके रहते वहीं ऊँट और बकरियाँ खेजड़ी के सूखे पेड़ों के नीचे हाँफते हुए वक्त बिताते थे। ...लेकिन जैसे ही शाम ढलती और रेत अपनी गर्मी छोड़ती, गाँव में नया जीवन लौट आता। चौपाल पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट के साथ बुजुर्ग बैठते और आसमान में चमकते तारों के नीचे पानी के आने वाले अच्छे दिनों की कहानियाँ सुनी और सुनाई जातीं।

मरु गाँव में पानी केवल एक ज़रूरत नहीं बल्कि ज़िंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष था। गाँव की औरतें सूरज उगने से पहले ही अपने सिर पर मिट्टी के तीन-तीन घड़े रखकर निकल पड़ती थीं। मीलों दूर रेत के तपते रास्तों पर चलने के बाद उन्हें एक सूखा सा कुआँ मिलता था जिसके तल में रिसते हुए मटमैले पानी की एक-एक बूँद को वे घंटों इंतज़ार करके इकट्ठा करती थीं। यहाँ पानी भले ही कम था लेकिन लोगों की आँखों का पानी और दिलों का अपनापन कम नहीं हुआ था क्योंकि इस गाँव में मेहमान का स्वागत खाने से नहीं बल्कि पानी के एक छोटे से प्याले से किया जाता था जो वहाँ के लोगों की सबसे बड़ी उदारता थी।

मरु गाँव के लोगों का हौसला इस बंजर ज़मीन से भी ज्यादा मजबूत था। हर साल जब मानसून के बादल इस बदनसीब गाँव को छूकर बिना बरसे आगे निकल जाते तो लोग निराश होने के बजाय अगले साल की उम्मीद में नए "टाँके" खोदने में जुट जाते। उन्हें विश्वास था कि एक दिन इस तपती रेत की छाती चीरकर पानी की कोई ऐसी धार जरूर फूटेगी जो मरु के भाग्य को हमेशा के लिए बदल देगी।

इसी गाँव में आकाश नाम का नौजवान रहता था। आकाश बहुत ही ईमानदार और दयालु था। उसके पास एक छोटा सा खेत था जिसे वह बड़ी मुश्किल से सींच पाता था। आकाश सिर्फ अपने खेत की ही फिक्र नहीं करता था बल्कि अपनी पीठ पर पानी का मटका लादकर जब वह लौटता तो अगर रास्ते में उसे कोई थका-हारा बुजुर्ग या प्यासा जानवर दिख जाता तो वह बेझिझक अपना आधा पानी उन्हें पिला देता था। लोग अक्सर उसे टोकते, "आकाश, इस रेगिस्तान में इतना सीधा मत बन, पानी लुटाएगा तो खुद क्या पिएगा?" परंतु आकाश हँसकर बस एक ही बात कहता, "काका, इंसान का दिल अगर सूख गया तो यह पूरी धरती ही रेगिस्तान बन जाएगी। पानी आज नहीं तो कल बरस ही जाएगा।"

एक दिन जब आकाश अपने सूखे, तपते खेत में कड़ी मेहनत कर रहा था तो उसकी कुदाल एक ऐसी चीज़ से टकरा गई जो मिट्टी में दबी हुई थी। उसने उत्सुकता से मिट्टी हटाई और वहाँ से एक चमकीला लाल पत्थर बाहर निकाला। वह पत्थर इतना आकर्षक था कि सूरज की रोशनी में हीरे की भाँति ऐसे जगमगा रहा था जैसे उसके अंदर कोई छोटी-सी आग जल रही हो। आकाश ने उसे एक साधारण परंतु सुंदर चीज़ मानकर अपनी पुरानी अनाज की कोठरी के कोने में रख दिया और काम पर लौट गया।

शाम को थका-हारा जब वह घर लौटा तो उसकी नज़र पिछले कमरे की कोठरी पर पड़ी। वह ठिठक गया। सुबह उसने खाने लायक़ बस मुट्ठी भर अनाज ही रखा था और अब कोठरी छलकाव के कगार पर थी! कोठरी की टूटी-फूटी दीवारों को धकेलता अनाज का ढेर कई गुना बढ़ गया था।

ढेर सारे अनाज को देखकर आकाश को पहले तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। उसने पास जाकर अनाज को हाथ से छुआ। आह! यह वही ताजा अनाज था जिसके सपने वह हमेशा देखा करता था। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। "यह कैसे हो सकता है?" वह बड़बड़ाया। "मेरे पास तो बहुत कम अनाज था! क्या कोई पड़ोसी रख गया...? नहीं, मेरे घर में कोई आया ही नहीं।" वह संदेह करे भी तो किस पर? वह घंटों तक अपनी लकड़ी की पुरानी कोठरी के पास बैठा रहा। उसका साधारण जीवन अचानक एक बड़े रहस्य से भर गया था। अनाज की इस वृद्धि के पीछे कोई तर्क, कोई कारण उसे समझ नहीं आ रहा था। यही सोचते-सोचते रात तो बीत गई लेकिन बात नहीं बीती। यह अद्भुत बात उसके दिमाग से निकल ही नहीं रही थी। उसकी नींद उड़ गई। खुशी तो थी लेकिन मन का चैन छिन गया था। हर समय दिमाग में एक उधेड़बुन होती रहती। उसने फैसला किया कि अगली सुबह वह इस रहस्य का पता लगाकर ही रहेगा।

रात भर आँखें मूँदकर भी आकाश सो नहीं पाया था। सुबह होते ही, अनाज के रहस्य को सुलझाने की बेचैनी उसके मन में करवटें ले रही थी। एक गहरा विचार उसके दिमाग में आया कि अगर इस पत्थर ने सूखी चीज़ यानि अनाज को बढ़ाया तो क्या वह गीली चीज़ जैसे पानी के साथ भी ऐसा कर सकता है? कुछ सोचते हुए उसने सावधानी से उस चमकदार लाल पत्थर को उठाया और उसे घर के एक बड़े खाली पड़े मिट्टी के घड़े में रख दिया। उसने घड़े में बस थोड़ा सा पानी भरा... इतना कि पत्थर उसमें अच्छी तरह से डूब जाए। आज उसने अपने खेत का काम छोड़ दिया क्योंकि वह इस अजीब रहस्य को अपनी आँखों से देखना चाहता था।

सारा दिन, आकाश अपने रोज़मर्रा के काम निपटाता रहा लेकिन उसका ध्यान बार-बार घड़े की तरफ ही जा रहा था। उसने गायों को चारा दिया, बड़े जतन से दूध दूहा, कपड़े धोए, चूल्हा जलाने के लिए सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कीं और घर का कच्चा आँगन गोबर से लीपा। हर काम के बाद वह घड़े के पास जाता, झुककर देखता परंतु पानी का स्तर हर बार बिल्कुल वैसा ही मिलता। शाम होते-होते वह थककर चूर हो चुका था। उसने हार मानते हुए अपना खाना बनाया और यह सोचकर सो गया कि शायद वह पत्थर बस अनाज के लिए ही जादुई था।

मगर अगली सुबह, एक ठंडी लहर महसूस करते हुए जब वह उठा तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। घड़ा अब पूरी तरह लबालब भरा हुआ था! रात भर में पानी इतना बढ़ गया था कि वह ऊपर से छलककर ज़मीन पर बह रहा था जिससे पास की सारी ज़मीन गीली हो गई थी।

पानी को यूँ बहते देख आकाश के चेहरे पर एक चमकीली मुस्कान आ गई। अब कोई संदेह नहीं बचा था। यह पत्थर सचमुच कोई साधारण पत्थर नहीं बल्कि एक जादुई पत्थर था जिसके पास चीज़ों को कई गुना बढ़ाने की अद्भुत शक्ति थी। उसकी गरीबी के दिन अब शायद खत्म हो गए थे। लेकिन उस जादुई पत्थर से उसने अभी तक अपने लिए कुछ माँगा नहीं था। खुद गरीब होते हुए भी सबसे पहले उसके दिमाग में यही विचार आया कि वह इस शक्ति का उपयोग अपने गाँव के लिए कैसे कर सकता है! उसने सोचा कि यह शक्ति सिर्फ मेरी नहीं है। बरसों से मेरा गाँव सूखे की मार से जूझ रहा है। यह पत्थर हमारे लिए वरदान बन सकता है! यह सब सोचते ही उसकी आँखों में एक नई चमक आ गई। यह दौलत की नहीं बल्कि सेवा की भावना की चमक थी।

बिना एक पल गँवाए वह पत्थर को एक साफ़ कपड़े में लपेटकर सीधे गाँव के मुखिया के घर की ओर भागा। मुखिया, जो खुद गाँव की पानी की समस्या से बहुत चिंतित रहते थे, आकाश की घबराहट और उत्साह को देखकर चौंक गए। आकाश ने मुखिया को सारा किस्सा सुनाया। खेत में पत्थर मिलने से लेकर अनाज और पानी बढ़ने तक का चमत्कार। मुखिया ने पहले तो अविश्वास भरी नज़रों से पत्थर को देखा लेकिन आकाश की ईमानदारी और आँखों में दिख रहे सच्चे भाव ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया।

मुखिया को हैरानी तो बहुत हो रही थी लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत करके आकाश पर भरोसा कर लिया। फिर क्या था, उन्होंने तुरंत गाँव के लगभग सूख चुके एक कुएँ पर भीड़ जमा करवाई। आकाश के मार्गदर्शन में उन्होंने जादुई लाल पत्थर को एक बड़े बर्तन में रखा और उसमें कुएँ का थोड़ा सा पानी भरा। चमत्कार देखने के लिए सभी गाँव वाले अपनी साँसें थामे खड़े थे। और फिर, ठीक वैसा ही हुआ जैसा आकाश ने बताया था! कुछ ही घंटों में, कुएँ से निकाला गया वह थोड़ा सा पानी बर्तन से छलकने लगा और तब तक छलकता रहा जब तक कि कुआँ पूरी तरह भर नहीं गया।

एक-एक करके, गाँव के सभी सूखे कुएँ फिर से ठंडे-मीठे पानी से भर गए। वह रेगिस्तानी गाँव मरु, जो हमेशा प्यासा रहता था, अब खुशहाली से लहरा उठा था। किसान खुश थे, बच्चे पानी में खेल रहे थे और आकाश के लिए हर तरफ धन्यवाद के स्वर गूँज रहे थे। आकाश की निस्वार्थ दयालुता ने सचमुच उनके गाँव की किस्मत बदल दी थी। मुखिया जी ने वह पत्थर आकाश को सँभाल कर रखने के लिए दे दिया।

गाँव में चारों ओर खुशहाली फैल चुकी थी। आकाश की ईमानदारी के चर्चे हर ज़ुबान पर थे। लेकिन हर अच्छी चीज़ पर किसी न किसी की बुरी नज़र पड़ ही जाती है। गाँव के पास के शहर में एक लालची व्यापारी रहता था जिसका नाम धनराज था। धनराज ने जैसे ही जादुई पत्थर की कहानी सुनी कि कैसे वह थोड़ी सी चीज़ को कई गुना बढ़ा देता है तो उसके मुँह में पानी आ गया। अब वह लोभी व्यापारी किसी भी तरह उस पत्थर को चुराना चाहता था ताकि वह अकेले ही उसका लाभ उठा सके।

धनराज ने सोचा कि अनाज और पानी क्या? अगर यह पत्थर मेरे सोने और चाँदी के साथ हो तो मैं तो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाऊँगा! इस भोले-भाले किसान आकाश को पत्थर की असली क़ीमत नहीं पता। उसकी लालच की आग इतनी तेज थी कि उसने तुरंत वह पत्थर चुराने का फ़ैसला कर लिया ताकि वह अकेले उसका लाभ उठा सके।

एक रात, जब गाँव गहरी नींद में था और चाँद बादलों में छिप रहा था, धनराज चुपके से एक चोर की तरह आकाश के घर में घुसा। आकाश ज़मीन पर बिछी एक साधारण चटाई पर गहरी नींद में सो रहा था। व्यापारी ने दबे पाँव घर के अंदर घुसकर संदूक से लाल पत्थर उठा लिया। वह पत्थर पाकर इतना खुश हुआ कि उसकी साँसें तेज हो गईं। उसने तुरंत पत्थर को अपनी थैली में डाला और यह सोचते हुए वहाँ से भागा कि अब उसकी किस्मत बदल गई है।

अगले दिन, धनराज ने पूजा पाठ करने के उपरांत तुरंत अपनी तिजोरी खोली। वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने के सपने देख रहा था। उसने अपनी तिजोरी में रखे सारे सोने और चाँदी के सिक्के निकाले और गर्व से उस जादुई लाल पत्थर को उनके बीच में रख दिया। फिर उसने ईश्वर का नाम लेकर बहुत ध्यान से तिजोरी बंद की और करोड़ों-अरबों की दौलत देखने का इंतज़ार करने लगा।

अगली सुबह धनराज बड़ी बेसब्री से उठा। उसके दिल में एक करोड़पति बनने की उम्मीद और खुशी भरी थी। उसने जल्दी से अपनी बड़ी, लोहे की तिजोरी खोली। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र अंदर पड़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया और आँखें डर से फैल गईं। तिजोरी में रखे हुए सारे सोने और चाँदी के सिक्के जो कल रात चमक रहे थे, अब पत्थर बन चुके थे! सोने की चमक गायब थी और चाँदी की सफेदी खत्म। हर सिक्का, हर मोहर, यहाँ तक कि छोटे से छोटे जेवर भी, कंकड़-पत्थर में बदल गए थे!

धनराज को विश्वास ही नहीं हुआ। उसने काँपते हाथों से एक पत्थर का टुकड़ा उठाया। यह उसके दिल की तरह ही भारी था, ठंडा था और किसी काम का नहीं था। पत्थर ने चीज़ों को बढ़ाया तो था लेकिन लोभ को नहीं। जादुई पत्थर ने शायद यह पहचान लिया था कि वह गलत हाथों में है और उसका उपयोग केवल स्वार्थ के लिए किया जा रहा है इसलिए उसने जादू को उल्टा कर दिया था।

व्यापारी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह समझ गया कि जादुई पत्थर का आकाश क्या है। वह यह भी समझ गया कि यह पत्थर केवल निस्वार्थता और दयालुता के साथ ही काम करता है। इसके अलावा उसे यह भी डर था कि इससे उसका कोई और नुकसान न हो जाए। इसलिए उसने तुरंत उस पत्थर को वापस लौटाने का फैसला कर लिया।

वह शर्मिंदा और उदास होकर उस जादुई पत्थर को लेकर वापस गाँव भागा। उसने सीधे आकाश के पास जाकर पत्थर उसे लौटा दिया और अपने लालच भरे काम के लिए माफ़ी माँगी। आकाश ने उसकी तरफ़ शाँत और दयालुता भरी नज़रों से देखा। एक सच्चा और नेक इंसान होने के कारण, आकाश ने उसे माफ कर दिया और कहा कि लालच एक ऐसी आग है जो इंसान को अंदर से जला देती है।

लोभी धनराज को माफ करने के बाद आकाश ने यह बात गहराई से महसूस की कि एक साधारण व्यक्ति के लिए इस जादुई पत्थर को अपने पास रखना सही नहीं है। यह शक्ति इतनी बड़ी थी कि किसी के भी मन में लालच पैदा कर सकती थी, जैसा कि व्यापारी के साथ हुआ। आकाश ने ठान लिया कि इस पत्थर का उपयोग किसी एक व्यक्ति के स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि पूरे गाँव की भलाई के लिए होना चाहिए।

उसने गाँव के मुखिया और सभी बुजुर्गों के साथ बैठक की। सबके सामने, आकाश ने वह चमकीला लाल पत्थर गाँव के बीच बने मंदिर में रखने का प्रस्ताव दिया। गाँव वाले समझदार थे इसलिए उन्होंने आकाश का यह प्रस्ताव सम्मान के साथ सहर्ष मान लिया कि जब भी गाँव में कोई बड़ी ज़रूरत होगी या कोई आपदा आएगी तभी वे सब मिलकर उस पत्थर का उपयोग करेंगे। जादुई पत्थर मिल जाने की वजह से काम से जी नहीं चुराएंगे और अपनी दिनचर्या जारी रखेंगे। उस दिन से, वह जादुई पत्थर मंदिर में स्थापित कर दिया गया।

इस तरह, वह जादुई पत्थर गाँव के लिए आशा, निस्वार्थ सेवा और ईमानदारी का एक अमर प्रतीक बन गया। यह पत्थर अब सिर्फ जादू का ज़रिया नहीं था बल्कि यह उन्हें हर दिन आकाश की ईमानदारी और दयालुता की भी याद दिलाता था। गाँव वाले उस पत्थर को ईश्वर का दिया हुआ वरदान मानकर उसकी पूजा करने लगे, अपनी मन माँगी मुरादें पाने लगे पर साथ ही यह भी अच्छी तरह समझ गए थे कि लालच का फल हमेशा बुरा होता है।