जादुई खजाना (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'
आज मैं आपको एक अनोखी कहानी सुनाने जा रही हूँ... एक ऐसे युग की कहानी जब पृथ्वी अपनी सबसे शुद्ध अवस्था में थी। तो सुनिए, हरियाली की गोद में एक छोटा-सा गाँव मीठापुर छिपा हुआ था। यह गाँव साधारण गाँव नहीं था बल्कि प्रकृति का संगीत था। गाँव का नाम, 'मीठापुर', केवल एक संज्ञा नहीं थी बल्कि एक विशेषण था, एक अनुभव था। यहाँ की हवा में हमेशा एक अदृश्य मिठास का वरण रहता था जो आस-पास उगने वाली जंगली चमेली और रात की रानी के फूलों की सुगंध से आता था। साँझ ढलते ही यह खुशबू जंगल के गीले पत्तों और ठंडी मिट्टी के साथ मिलकर एक ऐसा इत्र बनाती थी कि आत्मा तक तृप्त हो जाती थी।
मीठापुर चारों ओर से कुछ ऐसी कोमल और मखमली हरी वादियों से घिरा हुआ था कि सूर्य की किरणें भी पत्तों की जाली से छनकर ज़मीन पर सोने के टुकड़े सी बिखराती लगती थीं। गाँव की मिट्टी इतनी उपजाऊ थी कि वहाँ बोया गया हर बीज प्रेम और समृद्धि का फल देता था। यहाँ के लोग भी उसी मिट्टी की तरह सरल, संतोषी और शहद से मीठे थे। उनके चेहरे पर छल-कपट की कोई छाया नहीं थी। वे अपनी छोटी-सी दुनिया में सच्चाई और स्नेह के धागों से बुने हुए रिश्ते लगते थे। मीठापुर बाहरी दुनिया के शोर और लालच से दूर, ईमानदारी और सादगी का एक जादुई कोना था।
इसी मीठापुर गाँव के एक शाँत कोने में सरला देवी का छोटा-सा घर था जिसकी पहचान उसकी गरीबी से नहीं बल्कि चारों ओर फैली खुशबू से होती थी। सरला देवी अपने नाम के अनुरूप ही सरल थी। उम्र की ढलान पर होते हुए भी किसी तपस्या में लीन साध्वी सी दिखती थी। उसके हाथ कठोर थे जो जीवन भर की मेहनत की कहानी अवश्य कहते थे परंतु उन हाथों से किए गए काम में हमेशा एक कोमलता झलकती थी।
सरला देवी अकेली थी, गरीब थी, यह सत्य था पर गाँव वाले जानते थे कि उसका दिल सोने जैसा है। उसकी आँखों में एक शाँत और स्थिर चमक रहती थी जो हर आने-जाने वाले को एक अजीब-सी साँत्वना देती थी। वह किसी से कुछ माँगती नहीं थी बल्कि अपने छोटे से बगीचे में लगे फल और फूल ज़रूर लोगों में बाँटती रहती थी। दरअसल सरला देवी फल और फूल नहीं बाँटती थी, वह तो अपना स्नेह बाँटती थी।
यह बगीचा सरला के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं था, यह उसकी आत्मा का विस्तार था। सुबह की पहली किरण जब उसके फूलों पर पड़ती तो सरला उनसे ऐसे बात करती, जैसे वे उसकी अपनी संतान हों। उसने हर पौधे को ममता से सींचा था। उसके यहाँ ऐसे रंग-बिरंगे फूल खिलते थे जिनकी पंखुड़ियों पर सुबह की ओस मोतियों सी जम जाती थी। इन फूलों को पास के बाज़ार में बेचकर जो थोड़े पैसे मिलते थे उससे वह बड़ी संतुष्टि के साथ अपना जीवन चलाती थी। वह ईमानदारी से उतना ही कमाना चाहती थी जिससे किसी का हक न मारा जाए और उसका अपना स्वाभिमान भी बना रहे। सरला का जीवन सादगी की एक ऐसी मधुर कविता था जो अपनी मेहनत और नेक नीयती से लिखी जाती है।
मीठापुर गाँव में, जहाँ हर कोई श्रम और सादगी को महत्व देता था, वहीं रंजन नामक युवा एक अजीब विरोधाभास था। वह जवान था, उसका शरीर हट्टा-कट्टा था और उसमें पहाड़ तोड़ने की ताकत थी लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी उसका आलस। रंजन के लिए मेहनत करना किसी बीमारी से कम नहीं था। वह सुबह देर से उठता, दिनभर पेड़ की छाँव में लेटा रहता और सिर्फ सपने देखता रहता था...बड़े, भव्य और बिना किसी प्रयास के पूरे होने वाले सपने। रंजन का दिमाग हमेशा इस बात की जुगाड़ में लगा रहता था कि कैसे कम से कम काम करके अधिकतम लाभ कमाया जाए। वह गाँव के मेहनती लोगों को देखकर मन ही मन उनका मज़ाक भी उड़ाता था। उसके सबसे बड़े उपहास का पात्र थी सरला देवी। रंजन अक्सर उसे तपती धूप में, अपनी कमर झुकाए, खरपतवार हटाते या कुएँ से पानी लाते देखता जो रहता था।
एक बार रंजन फिर किसी पेड़ की छाँव में पसरा हुआ था जबकि सरला दूर अपने बगीचे में काम कर रही थी। उसे देखकर रंजन के मन में अक्सर एक ही कड़वा विचार कौंधता था..."यह बूढ़ी औरत... इसे आराम क्यों नहीं आता? यह इतनी उम्र में भी इतना कष्ट क्यों उठाती है? इन छोटे-मोटे फूलों से क्या मिलता होगा? ज़िंदगी का मज़ा तो आराम में है, ऐशो-आराम में! मुझे तो बस कोई जादुई, आसान रास्ता मिल जाए ताकि मैं बिना हाथ हिलाए ढेर सारा धन पा सकूँ और आराम से जीवन जी सकूँ।"
एक दिन गाँव में एक बौना साधु आया। साधु के हाथ में कुछ चमत्कारिक रूप से चमकदार बीज थे। गाँव के चौक पर खड़े होकर उसने ऊँची आवाज़ में घोषणा की, "हे गाँव वालो! जो कोई भी इन बीजों को लेकर जाएगा और एक साल के भीतर इन्हें ऐसे पेड़ में बदल देगा जो सबसे सुंदर और स्वादिष्ट फल दें तो मैं उन्हें एक “जादुई खजाना” दूँगा।"
घोषणा सुनकर पूरे गाँव में उत्साह की लहर दौड़ गई। हर कोई चमत्कारिक जादुई बीज लेने के लिए दौड़ पड़ा।
रंजन के कानों में जब 'जादुई खजाना' शब्द पड़ा तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसने तुरंत सोचा, "यह तो बहुत आसान है! बस बीज बोना है और एक साल बाद खजाना मेरा! मुझे जरा भी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।" उसने साधु से तुरंत एक बीज लिया और उसे अपने खेत के एक कोने में, बिना मन के बो दिया और फिर उसको भूल गया।
सरला ने भी साधु से एक बीज लिया। वह जानती थी कि केवल बीज बोने से कोई जादुई फल नहीं उगता। वह उस बीज को लेकर अपने बगीचे में आई। उसने सबसे अच्छी जगह चुनी और पूरी निष्ठा के साथ बीज बो दिया। इसके बाद उसने दिन-रात उस बीज की बच्चों की तरह देखभाल की। वह रोज़ समय पर उसे पानी देती, उसके आसपास की मिट्टी को नरम रखती और ध्यान से खरपतवार हटाती रहती। सरला का उद्देश्य खजाना नहीं था बल्कि अपने कर्म के प्रति उसकी पूरी ईमानदारी थी। वह बताना चाहती थी कि मेहनत से एक छोटा सा बीज भी एक बड़े वृक्ष में बदल सकता है।
एक साल पलक झपकते ही बीत गया। साधु अपनी घोषणा के अनुसार फिर से गाँव में आया। सभी गाँव वाले अपने-अपने गमलों और पौधों को लेकर उत्सुकता से उसके सामने कतार में खड़े हो गए। जिन्होंने खेतों में बीज बोया था वो अपने खेत दिखाने के लिए उत्सुक थे। क़िस्मत की बात देखिए रंजन ने कोई मेहनत नहीं की थी फिर भी उस के पेड़ पर भी एक चमकदार फल लगा था। रंजन फल को देखकर फूला नहीं समाया। सबसे पहले रंजन अपनी बारी के लिए आया। वह अपने बड़े, चमकदार और बेहद सुंदर दिखने वाले फल को साथ लेकर आया था। वह आत्मविश्वास से फूला हुआ था क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि उसका फल ही सबसे सुंदर है और वही विजेता बनेगा।
जब साधु ने रंजन के उस भव्य फल को चखा तो उसके माथे पर शिकन आ गई। उसने अफसोस के साथ अपना सिर हिलाया और कहा, "यह फल बाहर से भले ही सुंदर है लेकिन यह अंदर से एकदम कड़वा और बेस्वाद है। पुत्र, तुमने इसे केवल लालच और अधूरे मन से उगाया है।" उसके बाद गाँव वालों ने भी अपने-अपने पेड़-पौधे दिखाए जिसमें उनकी मेहनत के अनुसार फल लगे हुए थे। साधु ने उन सब को चखा और उन सबके बारे में अपनी राय ज़ाहिर की।
सरला देवी क्योंकि उम्र में सबसे बड़ी थी इसलिए वह सबसे बाद में अपनी बारी के लिए आई। उसका फल रंजन के फल से बहुत छोटा था लेकिन उसकी मादक खुशबू मीठापुर गाँव के हर कोने में फैल रही थी। साधु ने गहरी आँखों से सरला देवी के फल को देखा फिर फल को चखा। उसकी आँखों में संतोष और ख़ुशी के आँसू आ गए। वह भावुक होकर बोला, "वाह! यह फल अत्यंत स्वादिष्ट और मीठा है क्योंकि इसे तुमने अपनी ईमानदारी और सच्ची मेहनत से सींचा है।"
कुछ देर उपरांत साधु ने रंजन के कड़वे फल से एक टुकड़ा लिया और उसे अपने हाथ में घुमाया। अचानक वह फल एक काले, बेजान पत्थर में बदल गया जो रंजन के आलस्य और लालच का प्रतीक था। पत्थर ज़मीन पर गिरकर एक धीमी, नीरस आवाज़ के साथ रुक गया।
फिर साधु ने सरला देवी के छोटे और मीठे फल से एक टुकड़ा लिया और उसे भी अपने हाथ में घुमाया। वह टुकड़ा तुरंत एक चमत्कारिक, बेशकीमती हीरे में बदल गया जिसकी अद्भुत रोशनी से मीठापुर का पूरा चौक जगमगा उठा। उस हीरे में इंद्रधनुष के रंग समाए हुए थे, जैसे सरला की मेहनत का हर पल उसमें कैद हो गया हो।
सभी गाँव वाले सन्न रह गए। रंजन, जो अब तक अपने आत्मविश्वास में फूला हुआ था, शर्म और पश्चात्ताप से धरती में गड़ गया। उसकी आँखें झुक गईं।
साधु ने हीरा सरला के काँपते हाथों में रखते हुए कहा, "हे देवी! यह जादुई खजाना नहीं बल्कि तुम्हारी ईमानदारी और सच्ची मेहनत का फल है। तुम आज से मीठापुर की सबसे धनी और सबसे सम्मानित व्यक्ति हो। तुम्हारी मेहनत ने इस बीज को केवल फल नहीं बल्कि जीवन का सबसे शुद्ध सोना दिया है।"
सरला ने हीरा लेकर तुरंत उसे साधु के चरणों में रख दिया और बोली, "साधु महाराज! मेरे लिए यही सबसे बड़ा खजाना है कि मेरी मेहनत सफल हुई। यह हीरा मेरा नहीं, मीठापुर की ईमानदारी का प्रतीक है।"
यह देखकर गाँव वाले भावुक हो उठे। रंजन भागकर सरला के चरणों में गिर गया और फूट-फूटकर रोते हुए बोला, "माँ! मुझे क्षमा कर दो। मैंने हमेशा तुम्हारी मेहनत का मज़ाक उड़ाया। आज मुझे पता चला कि आराम नहीं, कर्म ही सच्चा धर्म है।"
तो बच्चो, आओ देखते हैं कि इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है। वह जादुई खजाना कौन सा था। बौने साधु ने यह दृश्य देखकर क्या कहा होगा।
साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, "मीठापुर के लोग! यह घटना याद रखना। जीवन में हर बीज चाहे वह किसी कर्म का हो, रिश्ते का हो या विचार का, ईमानदारी और मेहनत के पानी से ही मीठा फल देता है। और यही है वह जादुई खजाना!"