गोलू और गिनतियों का पहाड़ (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'
सुबह का समय था। सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की से झाँक रही थीं। ना जाने किसको ढूँढ रही थीं। रसोई में गोलू की माँ लता नाश्ता बनाने में व्यस्त थी। मेज़ पर दूध का गिलास और फलों का टोकरा उन्होंने पहले ही रख दिया था। पास ही ज़मीन पर बिछे ख़ूबसूरत कालीन पर पाँच साल का गोलू सिर झुकाए बैठा था। उसके बिल्कुल सामने एक खुली हुई किताब रखी थी और पीछे से माँ की आवाज़ लगातार गूँज रही थी, "चलो गोलू, आज हम फिर से गिनती सीखते हैं। एक... दो... तीन...एक... दो... तीन..." परंतु गोलू की नज़रें किताब पर नहीं बल्कि खिड़की के बाहर उड़ती चिड़िया पर थीं। सूरज की सुनहरी किरणें उसे रह-रह कर बुला रही थीं। उसका छोटा सा मन अभी गिनतियों के अमूर्त संसार में भटकना नहीं चाहता था। वह सिर्फ रंगों, आवाज़ों और उड़ते पंखों में खोया था।
"गोलू! ध्यान दो!" माँ की आवाज़ थोड़ी तेज हुई। "एक... दो... बोलो!"
गोलू ने उदास चेहरा बनाया, "मम्मा, मुझे नहीं समझ आती।"
"क्यों नहीं आती? कितनी बार सिखाया है। यह देखो, एक! उंगली रखो इस पर।" माँ ने गोलू की छोटी सी उंगली पकड़कर किताब पर झटके से रखी। गोलू ने उंगली हटाई और खीझकर बोला, "नहीं!"
लता को गुस्सा आने लगा। उसका सब्र जवाब दे रहा था। "देखो गोलू, अगर तुम नहीं सीखोगे तो स्कूल में पीछे रह जाओगे! सारे बच्चे सीख रहे हैं, तुम क्यों नहीं सीख पा रहे? बस बहुत हो गया। तुम्हारा रोज़ का यही रोना है। पढ़ाई के नाम पर रोने लग जाना। यह गिनती है कोई पहाड़ नहीं जिसे तुम चढ़ नहीं सकते..." उसकी आवाज़ में खीझ और झुंझलाहट थी। गोलू ने होंठ भींच लिए और उसकी आँखों में आँसू भरने लगे। उसे लगा मैं खराब बच्चा हूँ।
दोपहर हो चुकी थी लेकिन गिनती अभी तक नहीं हुई थी। गोलू अपने खिलौनों के बीच उदास बैठा था। उसने अपनी पसंदीदा गाड़ी भी नहीं उठाई। आज उसका खेलने का बिल्कुल मन नहीं हुआ। पड़ोस में रहने वाला उसका दोस्त स्वनि उससे मिलने आया तो भी वह मुँह फुलाकर बैठा रहा। खाना भी उसने अनमने मन से खाया और बिना हाथ धोए ही अपने पलंग पर जाकर सो गया।
शाम को गोलू के पापा ऑफिस से घर आए तो लता ने उनके लिए चाय बनाई। चाय का पहला घूँट भरते ही गोलू के पापा ने गुस्से से कहा, "यह कैसी चाय बनाई है तुमने...? क्या अभी तक तुम्हें चाय बनानी नहीं आई...? कितनी बार कहा है कि चाय में चीनी कम डाला करो..." गोलू के पापा बोलते जा रहे थे और लता का चेहरा रुआँसा होता जा रहा था।
"जी मैं दोबारा बना देती हूँ। उसने उदास सी आवाज़ में कहा।" इस बार लता ने ध्यान से चाय बनाई तो गोलू के पापा खुश हो गए और बोले, "बुरा मत मानना लता, थका हुआ था तो गुस्से में कह दिया।"
"जी कोई बात नहीं आप ऑफिस से थके हुए आए हैं, गलती मेरी थी। मैं आइंदा ध्यान रखूंगी।" कहकर वह गोलू के कमरे की ओर चली गई।
गोलू अभी भी सो रहा था। लता को एहसास हुआ कि उसकी डाँट ने गोलू को दुखी कर दिया है वरना इतनी देर तक वह कभी नहीं सोता जबकि उसको मालूम है यह पापा के आने का वक्त है। वह चुपचाप गोलू के पास गई, उसके माथे को प्यार से सहलाया और बेहद प्यार से बोली, "गोलू बेटा, क्या हुआ? मम्मा ने डाँटा, इसलिए बुरा लगा...है ना...?"
गोलू ने धीरे से सिर हिलाया। "मम्मा, मुझे गिनती समझ नहीं आती। मैं अच्छा बच्चा नहीं हूँ।"
लता का दिल भर आया। उसने समझा कि बच्चे के मन पर उसकी डाँट का बुरा असर हुआ है। "नहीं बेटा! तुम सबसे अच्छे बच्चे हो। बस तुम्हें गिनती सिखाने का मेरा तरीका गलत था।"
"हर बच्चा अलग होता है और हर बच्चे को सीखने का अपना समय और अपना तरीका चाहिए होता है।" लता ने सोचा और शाम को ही उसने एक नई तरकीब सोची। गोलू को खेलना बहुत पसंद था। लता ने फ्रिज से कुछ सेब निकाले और गोलू से बोली, "गोलू, आज हम सेबों से गिनती सीखेंगे। यह देखो, कितने सेब हैं?"
गोलू ने उत्सुकता से देखा। "एक... दो... तीन..." वह गिनने लगा।
लता मुस्कुराई, "वाह! तुम तो सीख रहे हो!" फिर लता ने मेज की दराज से कुछ कंचे निकाले और बड़ी कोमलता से बोली, "चलो, अब इन कंचों को गिनो।" गोलू ने मज़े से कंचे गिने। "एक... दो... तीन... चार... पाँच!"
"चलो अब ऊपर के कमरे में चलते हैं।" लता ने कहा तो दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। गोलू फटाफट सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा था और साथ-साथ बोलता भी जा रहा था, "छः...सात...आठ...नौ...दस..." "शाबाश बेटा तुम तो बहुत होशियार हो।" लता ने कहा तो गोलू की आँखों में चमक आ गई। उसे अब सब समझ आ रहा था। लता ने देखा कि जब गिनती किताब से निकलकर उसके सामने की वस्तुओं में आई तो गोलू के लिए वह जीवंत हो उठी।
लता का यह तरीका कामयाब हो चुका था। अगले कुछ दिनों तक लता ने इसी तरह से गोलू को गिनती सिखाई। कभी वे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए गिनते, "एक सीढ़ी, दो सीढ़ी..." कभी वे खिलौनों को गिनते, कभी खाने की चीज़ों को। लता ने गोलू के लिए छोटी-छोटी गिनती की कविता भी बनाई...
एक है सूरज आसमान में,
दो आँखें चेहरे की शान में।
तीन तितलियाँ हैं फूलों पर,
चार स्कूटर दौड़े घर-घर।
रंग-बिरंगे पाँच गुब्बारे
छ: खिलौने प्यारे-प्यारे।
सात सितारे चम-चम करते,
आठ कबूतर मिलकर उड़ते।
नौ पेड़ों पर पत्ते आए,
दस चिड़ियों ने गीत सुनाए।
एक, दो, तीन, चार
गिनती सीखो बार-बार।
गोलू ने बड़े उत्साह से कविता को गाया। पहली पंक्ति लता बोलती और दूसरी गोलू। साथ-साथ गाने से कविता गोलू को रट गई और साथ ही गिनती भी।
एक शाम जब सब डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे तो लता ने पूछा, "गोलू, तुम्हें पता है तुम्हारे पापा कितनी रोटी खाते हैं...?" गोलू ने अपने पापा की प्लेट देखी और हँसते हुए बोला, "तीन...!"
पापा ने ताली बजाई तो गोलू खुश हो गया। "गोलू आँख बंद करो, देखो पापा तुम्हारे लिए क्या लाए हैं...!" कहते हुए गोलू के पापा ने उसके हाथ पर कुछ टॉफियाँ रख दीं।
"अब आँखें खोलो!"
गोलू ने आँखें खोलीं तो टॉफियाँ देखकर चहक उठा। "एक... दो... तीन...दस" वाह हमारे गोलू को तो दस तक गिनती आ गई। हमारा गोलू तो बहुत होशियार है। मम्मी-पापा ने ताली बजाई तो गोलू खुश होकर उनके गले लग गया।
धीरे-धीरे, गोलू को गिनती आसान लगने लगी। अब वह चिड़ियों को भी गिन सकता था। अपनी उंगलियों पर भी गिनती गिन सकता था। एक दिन जब स्कूल में उसकी अध्यापिका ने कहा, "गोलू, बीस तक गिनती सुनाओ" तो गोलू ने बिना किसी हिचकिचाहट के बीस तक पूरी गिनती सुना दी। अध्यापिका तो हैरान रह गई। अध्यापिका ने गोलू की बहुत तारीफ़ की। कक्षा में भी सब बच्चों ने ताली बजाई। स्कूल की छुट्टी के बाद गोलू घर आया तो उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था। "मम्मा! टीचर ने मुझे 'गुड' दिया! मुझे गिनती आती है!"
लता ने गोलू को गले से लगा लिया। उसे समझ आ गया था कि बच्चे को डाँटने से नहीं बल्कि उसके मन को समझकर पढ़ाना चाहिए। गोलू ने तो गिनती सीखी ही परंतु लता ने भी धैर्य, समझ और प्यार का एक महत्वपूर्ण पाठ सीखा।