दयालु काकी और लालची व्यापारी (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'

आओ बच्चो, आज मैं आपको सुमती काकी से मिलवाती हूँ। बहुत समय पहले की बात है एक छोटे से गाँव में जहाँ मिट्टी के घर और खेतों की हरियाली थी, वहाँ सुमती काकी रहती थीं। काकी की उम्र भले ही ज़्यादा थी लेकिन उनका तन चुस्त और मन किसी निर्मल जलधारा जैसा शाँत और साफ़ था। काकी के पास पाँच बकरियाँ थीं...बग्गो, पिस्ती, चीना, डब्बो और धौली। ये बकरियाँ ही उनका पूरा संसार थीं। काकी अपनी बकरियों को जानवर नहीं बल्कि अपने बच्चों की तरह मानती थीं। वह उन्हें सबसे कोमल घास और हरे-भरे पात खिलातीं और उन्हें प्यार से सहलाती रहती थीं। इसीलिए उनकी बकरियाँ भी हमेशा स्वस्थ, मोटी और दूध से भरी रहती थीं।

उसी गाँव में गोपाल नाम का एक आदमी रहता था जिसके जीवन का एकमात्र धर्म था लालच। वह एक भरा-पूरा व्यापारी था लेकिन उसका मन धन पाने की भूख में हमेशा खाली रहता था। गोपाल के पास सब कुछ था फिर भी उसे शाँति नहीं थी। वह रोज़ देखता कि काकी की बकरियाँ कितनी हृष्ट-पुष्ट हैं और उनके पास दूध की कितनी समृद्धि है। गोपाल को यह देखकर बहुत जलन होती थी। वह मन ही मन कुढ़ता, "इस बूढ़ी काकी के पास स्वस्थ बकरियों का इतना धन क्यों है?" इसी जलन और ईर्ष्या में उसने तय कर लिया कि वह धोखाधड़ी से काकी की सारी बकरियों को हथिया लेगा।

वह रात-दिन उन बकरियों को पाने की उधेड़बुन में ही लगा रहता। नींद में भी उसे बकरियाँ ही दिखाई देतीं। इसी कशमकश में कई दिन बीत गए लेकिन अभी तक उसका कोई जुगाड़ काम नहीं आया और बकरियाँ उसके हाथ नहीं लगीं। …और एक दिन गोपाल ने अपनी योजना को अंजाम देने का फैसला कर ही लिया। उसने देखा कि काकी बाज़ार में अकेली है तो उसे अपनी चाल चलने का सही मौका मिल गया। वह ज़हर भरी मुस्कान लिए काकी के पास गया और अत्यंत मिठास भरी आवाज़ में बोला, "काकी, आप बहुत दयालु हैं। मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। मेरे पास एक जादुई कड़ा है जिसे पहनने से आपकी बकरियों का दूध तुरंत दोगुना हो जाएगा। आप और भी सुखी हो जाएँगी।" काकी अपनी सादगी के कारण उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गईं और हैरानी से पूछा, "लेकिन इसके बदले में तुम क्या लोगे, बेटा? कोई भी इतनी कीमती चीज़ मुफ़्त में क्यों देगा?"

गोपाल का लालची मन मुस्कुरा उठा। उसने बनावटी उदारता दिखाते हुए कहा, "कुछ नहीं काकी, मुझे आपकी सेवा कर के जो खुशी मिलेगी वही मेरा इनाम है। हाँ, लेकिन सबसे ज्यादा ज़रूरी बात ये है कि इस कड़े को जादुई शक्ति से सक्रिय करने के लिए मुझे कुछ दिनों के लिए आपकी बकरियाँ लेनी होंगी। मैं उन्हें अपने हरे-भरे खेत में चराऊँगा ताकि कड़े का जादू उन पर पूरी तरह से काम कर सके।"

काकी अपनी भोली सरलता के कारण धूर्त गोपाल के धोखे को समझ नहीं पाईं। उन्हें लगा कि गोपाल सचमुच एक दयालु युवक है। उन्होंने बिना किसी संदेह के अपनी पाँचों प्यारी बकरियाँ बग्गो, पिस्ती, चीना, डब्बो और धौली गोपाल के हवाले कर दीं। गोपाल धूर्तता से मुस्कुराता हुआ बकरियों को लेकर अपने रास्ते चला गया और काकी जादुई कड़े के सपने देखने लगीं।

कुछ दिन बीत गए। काकी का घर अब खाली-खाली था। बकरियों की मधुर आवाज़ और उनके पैरों की आहट के बिना काकी को हर पल बेचैनी महसूस होती थी। उन्हें लगने लगा कि अब गोपाल को बकरियाँ वापस कर देनी चाहिएँ। काकी परेशान होकर एक दिन गोपाल के घर गईं। उन्होंने विनम्रता से कहा, "गोपाल, बेटा! तुम्हें तो पता ही है कि बकरियों के अलावा मेरा कोई और सहारा नहीं। मेरी बकरियाँ मुझे वापस दे दो। मुझे अब उनकी याद सता रही है। मैं अब और उनके बिना नहीं रह सकती।"

गोपाल जो अब पूरी तरह से लालच में अंधा हो चुका था, अपने दिखावटी रूप से बाहर आया। उसके चेहरे पर अब मुस्कान नहीं बल्कि क्रूरता थी। उसने काकी को पहचानने तक का नाटक किया और कठोर आवाज़ में जवाब दिया, "कौन हो तुम और कौन सी बकरियाँ? मैं तुम्हें जानता भी नहीं, बूढ़ी औरत! मेरे पास कोई बकरियाँ नहीं हैं। लगता है तुम्हें भ्रम हो गया है। अब जाओ यहाँ से और दफ़ा हो जाओ!"

गोपाल के इस विश्वासघात से काकी का दिल टूट गया। वह आँखों में आँसू लिए निराशा और गुस्से से भर अपने घर लौट आईं। उन्हें समझ आ गया था कि गोपाल ने उन्हें धोखा दिया है और अब उनका अपनी बकरियों को वापस पाना मुश्किल है। लेकिन वह यह भी जानती थीं कि अगर वह चुप रहीं तो गोपाल का लालच और बढ़ जाएगा। काकी अपनी पूरी हिम्मत बटोरकर सीधे गाँव के मुखिया के पास पहुँचीं। उनकी आँखों में आँसू और आक्रोश दोनों थे। काकी ने मुखिया को पूरी बात विस्तार से बताई कि कैसे गोपाल ने जादुई कड़े का बहाना बनाया और उसकी पाँचों बकरियाँ धोखे से हथिया लीं।

मुखिया एक बुद्धिमान और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उन्होंने काकी की बात ध्यान से सुनी और तुरंत अपने सेवक को भेजकर गोपाल को पंचायत में बुलवाया। जब गोपाल घमंड से इतराता हुआ आया तो मुखिया ने शाँति से पूछा, "गोपाल, क्या तुमने सुमती काकी की बकरियाँ ली हैं...?"

गोपाल ने बिना पलक झपकाए सफ़ेद झूठ बोलते हुए कहा, "नहीं-नहीं, मैंने तो नहीं लीं। काकी बूढ़ी हो गई हैं। शरीर के साथ-साथ उनकी यादाश्त भी कमज़ोर हो गई है। हो सकता है उनकी नज़र भी कमज़ोर हो गई हो इसलिए मेरी बकरियों को अपना समझ बैठी हों। मुखिया जी, मुझे तो लगता है कि उन्हें भ्रम हो गया है। मेरे पास उनकी बकरियाँ नहीं हैं। जो बकरियाँ हैं, वो मेरी हैं।" धूर्त गोपाल कह तो बड़े विश्वास के साथ रहा था लेकिन उसकी आँखों में छल-कपट साफ़-साफ़ झलक रहा था परंतु दुख की बात यह भी थी कि इस बात का कोई सबूत नहीं था।

मुखिया यह तो जान गए थे कि लालची गोपाल झूठ बोल रहा है लेकिन सबूत के बिना न्याय करना संभव नहीं था। वह समझ गए कि इस मामले को सुलझाने के लिए अब सीधे सवाल काम नहीं करेंगे। उन्होंने एक क्षण सोचा और फिर उनके दिमाग में एक चतुर तरकीब आई। उन्होंने अपने सेवक के कान में कुछ कहा और फिर सबके सामने एक मिट्टी की मटकी लाने का आदेश दिया। मटकी को उन्होंने पंचायत के बीचों-बीच एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे रखवा दिया।

मुखिया ने अपनी गंभीर आवाज़ में दोनों से कहा, "यह कोई साधारण मटकी नहीं है। यह सत्य की मटकी है। जो भी इस मटकी को उठाएगा, झूठ का बोझ उस पर इतना भारी पड़ेगा कि सच्चाई तुरंत सबके सामने आ जाएगी!"

गोपाल का रंग मुखिया की बात सुनकर फीका पड़ गया। उसका डर अब उसकी आँखों में साफ़ झलकने लगा था। उसे लगा कि मुखिया सच कह रहे हैं और मटकी में कोई जादुई ताकत है। उसे अपनी चोरी पकड़े जाने और सबके सामने शर्मिंदा होने का डर था। इसलिए उसने तुरंत मटकी उठाने से साफ़ मना कर दिया लेकिन सुमती काकी, जिनका मन साफ़ था और हृदय निर्दोष, वह बिना किसी डर के आगे आईं। उन्होंने हिम्मत की और मटकी को आसानी से उठा लिया।

जैसे ही काकी ने मटकी उठाई वहाँ कोई जादू नहीं हुआ लेकिन मुखिया ने पहले से तैयार किया गया चमत्कार कर दिखाया! मुखिया के सेवक ने छिपाकर रखी एक रोशनी जो दर्पण से परावर्तित तेज धूप जैसी थी को गोपाल के चेहरे पर केंद्रित कर दिया। चोर की दाढ़ी में तिनका तो था ही इसलिए चमत्कारिक रोशनी का यह आभास देखकर गोपाल को लगा कि मटकी का जादू सच में काम कर गया है! और सत्य के जादू ने उसकी चोरी पकड़ ली।

गोपाल का चेहरा शर्म, डर और पश्चाताप से लाल हो गया। उसका झूठ अब उसके बस में नहीं था। वह हकलाने लगा और मुखिया के सामने घुटनों पर बैठ गया। रोते हुए उसने अपनी पूरी चोरी स्वीकार कर ली। उसने बताया कि कैसे उसने काकी के भोले-भाले स्वभाव का फायदा उठाया और दूध के लालच में धोखे से सारी बकरियाँ हथिया लीं। मुखिया ने न्याय करते हुए गोपाल को आदेश दिया कि वह काकी की पाँचों बकरियाँ तुरंत वापस करे, पंचायत द्वारा जो भी हर्जाना तय है वो भरे और उनसे सच्चे दिल से माफ़ी माँगे। गोपाल ने बिना देरी किए ऐसा ही किया।

बग्गो, पिस्ती, चीना, डब्बो और धौली मेंअअ-मेंअअ करती हुईं काकी से लिपट गईं। काकी अपनी प्यारी बकरियों को वापस पाकर बहुत खुश हुईं और उन्हें खूब प्यार किया। उन्हें लगा जैसे उन्हें अपना खोया हुआ संसार मिल गया हो। उनकी आँखों में अब आँसू नहीं बल्कि संतोष था।

काकी ने खुले मन से मुखिया जी का धन्यवाद किया। अपनी दयालुता के कारण काकी ने गोपाल को माफ तो कर दिया लेकिन एक सबक भी सिखाया कि लालच हमेशा हारता है और सच्चा सुख ईमानदारी और दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करने में है ना कि छल-कपट करने में। गाँव वालों ने काकी की महानता के साथ-साथ मुखिया की बुद्धिमत्ता और विवेक की भी खूब प्रशंसा की।