बूढ़ी अम्मा और रंगीन पतंगें (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'

एक छोटे से गाँव में जहाँ सुबह की हवा फूलों की मादक महक से लबालब भरी होती थी, एक बूढ़ी अम्मा रहती थीं जिन्हें गाँववाले प्यार से "नानी माँ" कहते थे। उनकी झोंपड़ी पुरानी और टूटी-फूटी लकड़ी की थी, दीवारों पर काई की हरी चादर चढ़ी हुई थी और बाहर का बगीचा रंगों का समंदर था‌। लाल, गुलाबी, काले गुलाब, पीले गेंदे, नीली जूही और सफेद फूल हमेशा नाचते रहते थे। नानी माँ की आँखें गहरी झुर्रियों में डूबी हुई थीं लेकिन चमक उनमें बिजली-सी झलकती थी जैसे जंगल का कोई खूंखार रहस्य छिपा हो। उनकी झोंपड़ी के आसपास हवा भयानक सनसनाहट करती थी। ऐसा लगता था जैसे किसी डरावने साये की फुसफुसाहट हो, जैसे ठंडी साँसें गालों को सहला रही हों! गाँव के बच्चे उनसे थर-थर काँपते थे लेकिन एक नन्हा और निडर लड़का छोटू, जिसके काले घुंघराले बाल हवा में उड़ते रहते थे और चमकदार आँखें साहस से लबरेज़ रहती थीं, नानी माँ से बिल्कुल नहीं डरता था।

एक धूप भरी दोपहर को बच्चों के लिए गाँव में "पतंग उत्सव" का शोर मच गया। मैदान पर हँसी-ठहाके गूँज रहे थे, रंग-बिरंगी पतंगें चमक रही थीं। लाल, नीली, पीली, हरी, सफेद, काली, भूरी पतंगें धागों की जंजीरों से बंधकर भी आसमान छू रही थीं। सभी बच्चे उछल-कूद मचा रहे थे लेकिन छोटू की चमचमाती पतंग अचानक फट गई ऐसे जैसे किसी अदृश्य काले पंजे ने उसे चीर डाला हो! कागज़ के टुकड़े हवा में बिखरे तो छोटू का चेहरा उदास होकर बादल सा लटक गया। काँपते कदमों से वह नानी माँ की झोपड़ी के पास बैठ गया। आँसू की बूँदें उसके गालों पर बह रही थीं। नानी माँ ने दरवाजे पर खड़ी होकर उसे देखा और उनकी कर्कश आवाज़ गरजी, "क्या हुआ, छोटू...? तेरी आँखों में डर की आग क्यों सुलग रही है?"

छोटू ने काँपते होंठों से सारी बात बता दी। नानी माँ के होंठों पर अजब मुस्कान फैल गई और उनके पीले दाँत ऐसे चमक उठे जैसे बादलों में बिजली। "हाँ तो मुँह क्यों लटका रखा है...! किस बात का डर है तुझे, नन्हें सिपाही...?" रौबदार आवाज़ में कहते हुए वे छोटू के पास आकर बैठ गईं। "ध्यान से सुन..." अपने झुर्रीदार हाथों को हवा में नचाते हुए वे रहस्यमय आवाज़ में फुसफुसाईं, "मेरे पास एक खास पतंग है लेकिन अरे बाप रे! यह कोई खिलौना नहीं है, बच्चू! यह 'निगलम पतंग' है! हर डर को चबा-चबाकर निगल जाती है और कभी-कभी पेट फूलने पर मन के डर के खूँखार राक्षस भी उगल देती है! साहस है तो आ बच्चे...! लेकिन याद रख, एक कदम भी पीछे हटा तो तेरी हड्डियाँ चटक जाएँगी!"

छोटू का दिल धड़कन की तरह धक-धक करने लगा। माथे पर ठंडा पसीना टपकने लगा फिर भी उसने साहस की आग भड़का ही ली। नानी माँ ने उसका हाथ पकड़ा और झोंपड़ी के नीचे गुप्त गुफा में धकेल दिया जहाँ सीढ़ियाँ फिसलन भरी थीं, दीवारें चिपचिपी और हवा में सड़ाँध भरी थी। मशालें भभक-भभककर लाल-पीली लपटें बिखेर रही थीं और जिनकी परछाइयाँ दीवारों पर ता-ता थैय्या करते हुए अनोखा नृत्य कर रही थीं। इसी गुफा के बीच में जंजीरों से बंधी लोहे की पेटी रखी हुई थी जो चरमराते हुई काँप रही थी। नानी माँ ने जंग लगी चाबी घुमाई...खट्ट! पेटी का ढक्कन खुला तो छोटू ने देखा कि अंदर एक भयानक रूप से दिखने वाली पतंग पड़ी थी! पतंग के पास पड़ा काला कपड़ा लाल रंग से सना हुआ था लेकिन ऐसा प्रतीत होता था जैसे उस पर लाल खून के धब्बे हों। बीच में आँखों जैसे दिखने वाले काले-काले मोती भी डरावनी चमक मार रहे थे। दूसरे कोने में था खूब सारी सादी और सफेद पतंगों का ढेर... ऐसे जैसे कोई बर्फ का पहाड़ हो!

"उठा बच्चे, डरता क्या है...?"

छोटू ने जैसे ही एक सफेद पतंग को छुआ, पतंग गर्र्र्ररर कर गरजी। हवा का तूफान सा उठ गया, पंख बाज की तरह फैल गए और रंग चमकते हुए उभर आए... लाल, काले, हरे, नीले, भूरे, पीले और सुनहरे। गुफा खड़खड़ कर हिल गई जैसे कोई डर उसे धकेल रहा हो!

"एक साधु के कहने पर यह काली पतंग मैंने अपने डर के राक्षस से बनाई थी, जब मैं बहुत छोटी थी। उसकी साँसें कैद हैं इसमें! और मेरे सारे डर भी क्योंकि बचपन में डर का एक राक्षस मेरे भीतर भी रहता था, बच्चे! लेकिन बहुत पहले ही मैंने उसे मारकर इस काली पतंग में कैद कर लिया। और ये सारी सफेद पतंगें मैंने अपने मनोविज्ञान के जादू से बनाई हैं...! जब भी किसी को अपना डर भगाना होता है ना तो मुझसे एक पतंग माँग कर ले जाता है। ये सभी पतंगें अभी कोरी हैं। तुम अपना डर इनको दे सकते हो...!" छोटू आँखें फाड़कर आश्चर्य से पतंगों को देखता रहा।

छोटू को ध्यान मग्न देखकर नानी माँ रहस्यमई आवाज़ में बोलीं, "अगर इसे उड़ा पाया तो ये सारे डर निगल लेगी! लेकिन अगर ये हार गई तो मन का राक्षस तेरी हड्डियाँ चबा डालेगा! और...."

नानी माँ अभी छोटू को समझा ही रही थीं कि छोटू को ढूँढते-ढूँढते बाकी बच्चे भी उसके पीछे-पीछे गुफा में आ गए थे और चुपचाप पर्दे के पीछे छुपकर खड़े थे। नानी माँ ने बच्चों को छुपकर बातें सुनते देखा तो कुटिलता से मुस्कुराईं, आओ तुम भी अंदर आओ, बच्चो! एक-एक करके आओ और अपनी-अपनी सफेद पतंग उठाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो, "जिस भी पतंग को बच्चे अपना-अपना डर बताएँगे, पतंग उसे अपने भीतर सोख लेगी और तुम्हारा डर छू-मंतर हो जाएगा! लेकिन ध्यान रहे डर खत्म होते ही पतंग की डोरी हर हाल में हाथ से छोड़ देनी होगी ताकि डर कभी लौटकर न आए।"

"कहाँ आ फँसे...!" सारे बच्चे मन ही मन सोचने लगे। नानी माँ की रहस्य से भरी बातें सुनकर उनका डर कुछ और बढ़ गया था।

इधर छोटू के हाथ-पैर बर्फ जैसे हो गए, उधर उत्सव का शोर उसके कानों को फाड़ रहा था। एक संघर्ष उसके दिमाग में हथौड़े चला रहा था। और फिर आखिरी हथौड़ा पड़ते ही संघर्ष और छोटू दोनों ही दौड़ पड़े, वहाँ जहाँ दूसरे सारे बच्चे बाहर उत्सव में मशगूल थे। छोटू के पीछे-पीछे उसके सभी दोस्त भी हाथ में पतंगें उठाए उत्सव में शामिल हो गए।

बाहर हवा और भी तूफानी थी, बिजलियाँ आकाश चीर रही थीं और धूल उड़ रही थी। मैदान पर बच्चे चिल्ला रहे थे। छोटू ने डोर कसकर पकड़ी और चीखा, "उड़!....बूमममममम!" पतंग आसमान फाड़ती हुई उड़ गई। आकाश काला कुहासा बन गया और बादल गरजने लगे! अब डरों का ताँडव शुरू हो गया! पतंग घूम-घूमकर उत्सव में आए हुए बच्चों के डर निगल रही थी। हर बार निगलने में धमाका हो रहा था और रंग बरस रहे थे!

ओह...! सबसे पहले नीला रंग फैल गया...उदासी का डर। जो बच्चे उदास थे वो चीख उठे। आँखों से आँसू बहने लगे। उनके मन में काँटेदार तारें उभर आईं जो सोचते थे "हमारा कोई दोस्त नहीं, हम हमेशा अकेले ही रहेंगे!" उन सबका हृदय विचलित होने लगा। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा जैसे उनका मन सर्द रात सा ठंडा हो रहा हो।

नानी माँ चीखीं, "यह उदासी की छाया है! इसे अपनी मुस्कान से उड़ाओ! हँसने के बाद अपनी आँखें खोलो और खुशियाँ देखो! चलो, सब बच्चे अपना-अपना हाथ बढ़ाओ, गले मिलो! जब दोस्त साथ हों तो अकेलापन कैसा? एक-दूसरे को हँसाओ! जल्दी करो! इस नीले बादल को दोस्ती की गर्मी से पिघलाओ...शाबाश!"

इधर दोस्ती के हाथ बढ़े और उधर पतंग ने झपट्टा मारकर नीला रंग ऐसे चूस लिया जैसे भँवर वस्तुओं को अपनी ओर खींच लेता है! उदासी दूर हुई तो बच्चे हँस पड़े...खिलखिलाकर... मोती जैसे दाँतों की सफेद हँसी। देखकर सफेद पतंग भी हैरान हो गई और उदासी के डर को लेकर दूर उड़ गई। उत्सव में दूर-दूर तक हँसी के फव्वारे तैरने लगे। बच्चों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया, उनकी आँखें चमक उठीं। एक ने जब चिल्लाकर कहा, "अरे! मैं तो डर गया था कि अकेला रह जाऊँगा!" तो उत्सव में हँसी की लहर दौड़ गई।

बच्चों को हँसता देखकर लाल रंग भड़क उठा...गुस्से का डर। मोटू गरजा और आक्रोश की वजह से उसकी आँखें लाल-लाल होने लगीं। मुट्ठियाँ जोर से भींचने की वजह से सख़्त हो गईं और नसें फूलने लगीं। लाल-लाल आँखों से बोला, "मुझे मास्टर जी के गुस्से से बहुत डर लगता है। उनकी डाँट सुनते ही पैर काँप जाते हैं। स्लेट पर चुटकी मारते हैं तो आँसू आ जाते हैं। लेकिन आज मुझे भी बहुत गुस्सा आ रहा है। मैं सबकी पतंग काट दूँगा! सबसे तेज पतंग मेरी ही होगी!"

नानी माँ ने दहाड़कर कहा, "गुस्सा! यह आग है, मोटू! गुस्से को आग से नहीं, पानी से बुझाओ! शाँति से जीतो। मुट्ठी खोलो, हवा में ठंडी साँस भरो और बोलो, 'गुस्सा भाग! दोस्ती जाग!' अपने मन को शाँत करो, बेटा! मास्टर जी का गुस्सा नहीं, तुम्हारा डर और ज़िद हारनी चाहिए!"

नानी माँ दोबारा जोर से चिल्लाईं, "अपना डर पतंग को दो मोटू... जल्दी करो...!"

"ले ले पतंग, मेरा गुस्सा ले ले‌! गुस्सा भाग! दोस्ती जाग!" कहते हुए उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। पर यह क्या...! पतंग घूमी और लाल रंग को गटक गई। मोटू ज़मीन पर लुढ़क गया, उसकी साँसें धीमी पड़ गईं और चेहरे पर मुस्कान खिल गई। हाथ से पतंग की डोर क्या छूटी कि गुस्से के डर की पतंग दूर आसमान में उड़ गई।

"गुस्सा आता तो आग लग जाती...अब मन में शीतल हवा बह रही है!" मोटू ने कहा और आँसू बहाने लगा। बच्चे उसे रोता देखकर मोटू-मोटू चिल्लाने लगे लेकिन मोटू को फिर भी गुस्सा नहीं आया।

अभी बाकी डरों का धुआँ छँटा भी न था कि हरा रंग उमड़ आया... पढ़ाई की बीमारी का डर लिए। गुड़िया चीखी, "मुझे होमवर्क से डर लगता है। नोटबुक देखते ही थकान हो जाती है। पूरा न होने पर डाँट पड़ती है।" उसका चेहरा पीला पड़ गया जैसे किसी ने सारा खून चूस लिया हो। पसीना टपकने लगा... टप-टप-टप। काले चमकदार साँप लहराने लगे...हिस्स्स! हिस्स्स! हिस्स्स! जैसे आलस की छाया मन को जकड़ रही हो। लंबे-लंबे, चमकदार दाँत धमकाते हुए डराने लगे, "सुनो लड़की...! बीमार हो जाओगी! तुम्हारी हड्डियाँ पिघल जाएँगी!" सुनकर जैसे ही गुड़िया के पैर लड़खड़ाए, नानी माँ चिल्लाईं, "हरा रोग! यह तो आलस का ज़हर है! आलस को मार! गुड़िया...उठ और नाच! किताबों को दोस्त बना! होमवर्क कोई काम नहीं बल्कि सीखने का खेल है! अपना विश्वास लौटा! हिम्मत दिखा! जल्दी से अपना डर बता गुड़िया...!"

"ले जा पतंग, मेरा होमवर्क का डर ले जा! मेरा आलस का डर ले जा!" जैसे ही गुड़िया चिल्लाई पतंग ने साँपों को पंजों में पकड़ लिया और हरा रंग सोख लिया। गुड़िया के हाथ से पतंग की डोर छूटकर दूर उड़ गई। उसे लगा जैसे वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई हो। हल्की होकर आसमान में उड़ रही हो। वो उछल पड़ी, नाचने लगी और गाने लगी। बच्चे उसे हैरानी से देखने लगे तो बोली, "मुझे डर था कि मैं कभी आलस के बिस्तर से न उठूँगी...पर अब मैं उड़ूँगी... आसमान तक! होमवर्क करने से क्या डरना...!"

हवा अभी गरमाई भी न थी कि भूरा रंग धुएँ की तरह फैल गया। भूरा रंग यानि भूतों का डर। भोलू काँपने लगा, उसकी रीढ़ की हड्डी झनझना उठी। उसकी आँखों के सामने सफेद साड़ी वाली चुड़ैल हँसने लगी...हा हा हा! उसके बाल उड़ रहे थे, आँखें खाली थीं, काली परछाइयाँ लपक रही थीं, "झोपड़ी में आओ, मैं तुम्हें खींच लूँगी!" डर के मारे भोलू भागने लगा तो नानी माँ दहाड़ीं, "भूत अँधेरे का झूठ है...डर की परछाई भर और कुछ नहीं! भूतों का भ्रम होता है बस! भोलू, मुड़ और परछाईं को रौंद डाल! आँखें बंद कर, और बोल, 'तू अँधेरा है, मैं उजाला हूँ! भूतों को डरने दे, तू मत डर।"

"तू अँधेरा है, मैं उजाला हूँ! ले ले पतंग, मेरा भूतों का डर!...ले ले पतंग, मेरा भूतों का डर! वह सिर्फ कहानी थी जिसने मुझे रात में डराया था।" जैसे ही भोलू बोला पतंग ने भूरे धुएँ को अपने मुँह में ठूँस लिया और डर के सारे भूत गायब हो गए! भोलू उछल पड़ा, "आह...! कितना सुंदर मौसम है। मैंने डर को पछाड़ दिया। अब रातें स्वर्ग बन जाएंगी। नींद आएगी, बिना किसी थरथराहट के!"

भूतों की चीखें पतंग के मजबूत जबड़ों में अभी गूँज ही रही थीं कि पीला रंग चमक उठा...जानवरों का डर, कुत्ते, बिल्लियों का डर, स्कूल जाने का डर। रानी चिल्लाई। उसके पैर ज़मीन पर जड़ हो गए। कानों में शेर दहाड़ा, "...र्र्राओ! र्र्राओ!" उसके पंजे खुरदरे थे, दाँत चमक रहे थे‌। दूसरी ओर भेड़िए ऐसे गुर्रा रहे थे जैसे डर की परछाइयाँ जंगल में नाच रही हों, "जंगल में अकेली मत जाना वरना...!" डर के मारे रानी का दिल बैठ गया।

नानी माँ चिल्लाई, "डरो मत, बोलो रानी, अपना डर बताओ...! कुत्ते दुश्मन नहीं, दोस्त होते हैं! स्कूल डरने की जगह नहीं, जीवन की जंग जीतने का अखाड़ा है! अपनी आवाज़ उठा! और बोल, डर मुझसे डर गया, मैं जीत गई!"

"मुझे स्कूल जाने से भी डर लगता है। रास्ते में कुत्ते भौंकते हैं, दोस्त लोग चिढ़ाते हैं। सुबह उठना ही मुश्किल लगता है। ऐ पतंग! मेरे सारे डर ले जा... मैं डर से जीत गई!" पतंग ने जब रानी को बहादुरी से बोलते हुए सुना तो उड़ती हुई आई और एक झपट्टे में ही उसने कुत्तों, शेरों और भेड़ियों को निगल लिया। और धाड़ धाड़ धाड़ धाड़ पीला रंग सोख लिया। रानी हँस पड़ी, "अब जंगल मेरा दोस्त है, स्कूल मेरा दोस्त है। हम सब कल ही जंगल जाएंगे फूलों और तितलियों से मिलने। मैं रोज स्कूल जाया करूँगी, बिना डर के।"

लेकिन तभी सबसे बड़ी तबाही आ गई! सबसे बड़ी पतंग का पेट फूल गया और आकाश फट गया। एक विशाल काला कोहरा उभरा, जैसे डरों का साया! यह कोई राक्षस नहीं था, बल्कि एक घना, ठंडा कोहरा, जो बच्चों के दिलों में छिपे सबसे बड़े डरों को लिए हुए था। उसकी काली परछाइयाँ लहरा रही थीं। वह फुसफुसाया, "सारे डर मुझे लौटाओ, वरना मैं तुम्हें अपने ठंडे आलिंगन में जकड़ लूँगा!" बिजलियाँ गिरीं, हवा सनसनाई और बच्चे डर से काँपते हुए एक-दूसरे से लिपट गए।

डर के राक्षस ने सब बच्चों के सबसे बड़े डर को उगल दिया। और सब डरों से विकराल था छोटू का पढ़ाई का डर! किताबें उछलकर दूर जा गिरीं। दाँत चबाती स्लेटें क्रंच-क्रंच कर रही थीं। तीखी नोंक वाली कलमें खरोंच-खरोंच और परीक्षाएँ चीख रही थीं, "पढ़ो! याद करो! याद करो! वरना फेल हो जाओगे! हमेशा आखिरी नंबर पर आओगे, कभी न जीत पाओगे!" कॉपी-किताबों के कागज़ काले साँप बनकर लिपट गए। कलम तलवार बन गई और छोटू लुढ़क गया। उसकी साँस रुक गई।

कोहरे रूपी राक्षस हँसा, "यह डर सबसे गहरा है, इसे मैं पहले निगलूँगा! हाहाहाहाहा...!"

"डरो मत, मेरे बच्चो!" नानी माँ ने पूरी ताकत लगाकर कहा। "यह कोहरा तुम्हारे डरों का साया मात्र है। तुम सब मिलकर इसे पिघला सकते हो! एक-एक करके अपने डर को पतंग को सौंपो, अपनी हँसी, दोस्ती, और साहस से इस कोहरे को जड़ से उड़ा दो!"

"नानी माँ! मुझे गणित से डर लगता है। जोड़-घटाव देखते ही सिर दर्द होने लगता है। फॉर्मूले याद ही नहीं रहते, हमेशा गलती हो जाती है। मुझे टेस्ट देने से डर लगता है। कागज़ देखते ही हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं। सवाल पढ़ते ही दिमाग सुन्न पड़ जाता है।" छोटू की चीख निकली। रानी को छोड़कर नानी माँ छोटू की ओर लपकीं और अपनी झुर्रियों से लाल आग की लपटें फेंकीं। फुफकार की आवाज़ हुई!

"पढ़ाई का डर दे दे—पतंग को सौंप दे, मेरे बच्चे! अगर राक्षस ने उस डर को खा लिया तो तुम हमेशा पढ़ाई से डरते रहोगे। जल्दी करो, बहादुर बनो...!" उन्होंने गरजकर कहा। लेकिन छोटू तो आँखें बंद कर लेटा हुआ था। उसके मन में तूफान मचा हुआ था। फेल होने की काली छाया, बोझिल किताबें... सब उसे डरा रहे थे। लेकिन जैसे ही उसने नानी माँ की आवाज़ सुनी वो साहस से चिल्लाया, "ले ले! पढ़ाई का डर तेरा है, मेरा नहीं! ले ले पतंग, मेरा गणित का डर!... अब कभी मेरे पास मत आना।" धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम! और विस्फोट हो गया! पढ़ाई के डर का सुनहरा रंग उड़ गया। किताबें नाचने लगीं, कलम गाने लगी! स्याही खुशी से फैल गई। पतंग ने पूरे के पूरे राक्षस को चूस लिया। चीखें गूँजने लगीं, राक्षस सिकुड़ गया और गायब हो गया! पतंग की डोर छोटू के हाथ से छूटकर दूर आकाश में उड़ गई और साथ ही उड़ गया उसके भीतर का डर।

चमत्कार हो गया! हर पतंग ने अपने बच्चे के डर को रंग बनाकर आसमान में बिखेर दिया। सबके डर 'निगलम पतंग' ने निगल लिए थे। सभी बच्चे एक साथ चिल्लाए, "डर हमसे बड़ा नहीं है!" उनकी पतंगें—लाल, हरी, भूरी, पीली, सुनहरी—आसमान में नाचने लगीं। हर पतंग ने डर के कोहरे का एक हिस्सा निगला, और धीरे-धीरे काला कोहरा पिघलने लगा। धड़ाम! एक आखिरी विस्फोट हुआ, और कोहरा रंगीन बारिश में बदल गया! प्रेम और उत्साह की बूँदें उड़ने लगीं, हवा कविताएँ गाने लगी। बच्चों के डर की पतंगों की डोरें आखिरी बार छूट गईं, और उनके डर आसमान में रंग बनकर बिखर गए। हँसी, गाने, और कहानियाँ चारों तरफ फैल गईं। बच्चे उछल पड़े, "जीत गए! हम जीत गए! डर हार गया!" मोटू ने छोटू को गले लगा लिया। नानी माँ हाथ हिलाते हुए हँसी, "डर को निगल लो, पतंग बनाकर हवा में उड़ा दो! निडर होकर जीवन जीओ मेरे बच्चो...!

जैसे ही काले कोहरे का राक्षस सिकुड़ा, छोटू की पतंग आसमान में एक दिव्य सुनहरी रोशनी के साथ लहराई। छोटू ने देखा कि उसकी पतंग पर उकेरे गए गणित के कठिन सूत्र, संख्याएँ और घटाव-जोड़ के चिह्न अब डरावने साँपों की तरह नहीं, बल्कि नीली-पीली तितलियों की तरह नाच रहे थे। छोटू की आँखों में अब डर का एक कतरा भी नहीं था। उसने अपनी डोर को ढील दी और एक गहरी साँस लेते हुए ज़ोर से मुस्कुराया। गणित और पढ़ाई का वह विशालकाय राक्षस पूरी तरह पिघलकर सुनहरी स्याही की बारिश में बदल गया। छोटू ने अपनी बांहें फैला दीं और उस सुनहरी बारिश की बूँदों को अपने चेहरे पर महसूस किया। उसे पहली बार अहसास हुआ कि गणित कोई कठिन पहेली या डर का खेल नहीं, बल्कि संख्याओं की एक बहुत ही सुंदर और मज़ेदार कला है।

जीत का उत्सव रात भर चला। ढोल-मजीरे बजते रहे।

अगले दिन शाम होते ही नानी माँ का बगीचा जीवंत फूलों से भर गया क्योंकि स्कूल से लौटने के बाद सभी बच्चे नानी माँ का धन्यवाद करने उनके घर जो पहुँचे थे। हर फूल अपने डर की कहानी सुना रहा था! कहानियाँ सुनाते-सुनाते सारे फूल नानी माँ से लिपट गए। और सबसे छोटा फूल यानि कि छोटू, गाँव का सबसे बड़ा साहसी हीरो बन गया। और पढ़ाई? वह तो अब सब बच्चों का सबसे प्यारा और रंगीन खेल बन गई थी! और डर? "डर किस बला का नाम है।" बच्चे एक-दूसरे से ठिठोली करते हुए कह रहे थे। छोटू ने नानी के गले में बाँहें डालते हुए पूछा, "नानी माँ आपने सबके मन से डर को कैसे भगाया...?

"डर को साझा करो, साहस से भरो, और पतंग की तरह उड़ो! बस ऐसे... कुछ समझे मेरे राजकुमार...!"

बच्चे नानी माँ को घेर कर बैठे हुए थे कि अचानक तेज हवा चलने लगी और घर के ओसारे में रखा दीपक बुझ गया। चारों तरफ अंधेरा छा गया। वातावरण कुछ डरावना सा हो गया। सायँ-सायँ करती हवा ऐसे लग रही थी जैसे कोई डरावना गीत गा रहा हो।

"यह क्या है... राक्षस की आवाज...?" एक बच्ची डर से काँपकर बोली।

छोटू हँस पड़ा, "यह तो हवा का खेल है, पगली! हम इसे भी हराएँगे!" सारे बच्चे एक साथ चिल्लाए, "हम नहीं डरते! हम डर से बड़े हैं!"

"मैं भी तो डरने का नाटक कर रही थी...पागल हाहाहाहाहा" रानी हँसते हुए बोली।

और फिर नानी माँ की झोंपड़ी में देर तक बच्चों की सुरीली हँसी गूँजती रही।