बरगद की ठंडी छाँव (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'
गाँव के एकदम छोर पर जहाँ कच्ची धूल भरी पगडंडी खेतों की लहलहाती हरियाली में खो जाती थी, एक छोटा-सा, मिट्टी का लिपा-पुता घर था। घर की छत पर खपरैल बिछे थे और आँगन में तुलसी का हरा-भरा पौधा था जो सुबह की धूप में पूजा-अर्चना के बाद कुछ और चमक जाता था। इसी शाँत और साधारण घर में रामू रहता था, साथ में उसकी मेहनती पत्नी सीता और उनका इकलौता बेटा, रवि।
रामू अपनी दुबली-पतली काया के बावजूद किसी विशाल बरगद के पेड़ जैसा था...मज़बूत, अडिग और अपने परिवार को हमेशा छाया देने वाला। उसका कद भले ही साधारण था पर इरादे पहाड़ जैसे मज़बूत थे। वह अडिग, अथक और ऐसा इंसान था जिसने कभी हार मानना नहीं सीखा था। वह अपने परिवार के लिए केवल एक व्यक्ति नहीं था बल्कि अटूट भरोसे की एक घनी छाँव था...एक ऐसा आश्रय जहाँ रवि और सीता हमेशा खुद को सुरक्षित और निश्चिंत महसूस करते थे।
रवि के मन में आज भी वे पुरानी यादें किसी मीठी धूप की तरह बसी हुई हैं। उसे याद है, कैसे उसके पिता रामू हर सुबह भोर के तारे के पूरी तरह छिपने से पहले ही उठ जाते थे। रामू केवल किसान नहीं थे बल्कि उनका जीवन ही प्रकृति के कैलेंडर के हिसाब से चलता था। उनकी हथेलियों में हल चलाने की निशानियाँ, गहरी दरारें और कठोर छालें थीं जो दिन-रात के अथक श्रम की अनगिनत कहानियाँ कहती थीं। फिर भी उनकी आँखें मेहनत के संतोष और एक बेहतर कल की उम्मीद से भरी रहती थीं।
रवि तब बहुत छोटा था। उसे अपने पिता के साथ खेत पर जाना किसी उत्सव जैसा लगता था। गाँव में खेती का काम केवल हल चलाना नहीं होता था वरन् जीवन को सींचना भी होता था। पिता रामू रवि को अपने मजबूत कंधों पर बिठाकर ले जाते और रवि को लगता जैसे वह दुनिया का सबसे ऊँचा इंसान हो। इतना ऊँचा जो बादलों से भी बात कर सकता है।
रामू उसे हर काम प्यार से सिखाते थे। वे सिखाते थे कि सुबह-सुबह गाय का दूध कैसे दूहा जाता है, खेतों की मेढ़ें कैसे बाँधी जाती हैं ताकि पानी व्यर्थ न जाए। वे उसे बताते कि दलदल से मिट्टी खींचना और हल के पीछे सीधा चलना क्यों ज़रूरी है। रामू बीजों को बोने का तरीका सिखाते और कहते, "बेटा, बीज केवल मिट्टी में डाला ही नहीं जाता, उसे उम्मीद की नमी भी दी जाती है।" वह सिखाते कि कैसे एक छोटा-सा बीज भी सही देखभाल और अटूट भरोसे से एक विशाल, छायादार वृक्ष बन सकता है। इन सारे कामों के बीच, रामू रवि को मिट्टी की सोंधी खुशबू से दोस्ती करना सिखाते थे। वो खुशबू जो परिश्रम के पसीने से आती है।
एक बार गाँव के फलते-फूलते जीवन में एक भीषण त्रासदी ने दस्तक दी...गाँव में अकाल पड़ गया। आसमान ने रूठकर अपनी मेहरबानी रोक ली थी। कुएँ ऐसे सूख गए थे जैसे धरती ने साँस लेना ही छोड़ दिया हो। खेतों की हरियाली सिमटकर बंजर, रूखी मिट्टी में बदल गई। चारों ओर निराशा का ऐसा गहरा अँधेरा छा गया था कि लोगों की उम्मीदें भी सूखने लगी थीं।
सीता, अपने माथे पर चिंता की लकीरें लिए, रसोई में बैठी थी। उसने खाली बर्तनों को देखा तो उसकी आवाज़ में एक अनजाना डर भर गया ,"अब क्या होगा, रामू?" उसने दुख से पूछा, "जब फसल ही नहीं होगी तो रवि को क्या खिलाएँगे? यह विपदा तो हमें तोड़ देगी।"
रामू ने सीता की ओर देख गहरी, लंबी साँस ली जो उसके शाँत हृदय में व्याप्त अडिगता को दर्शाती थी। उसकी धूप में तपी आँखों की वह पुरानी चमक जो बेहतर कल की उम्मीद लिए थी, अभी फीकी नहीं पड़ी थी। उसने अपनी पत्नी को ढाँढस बँधाते हुए कहा, "चिंता मत करो, सीता। बरगद की जड़ें आसानी से नहीं हिलतीं। बेशक मुसीबतें बड़ी हैं पर मेरा भरोसा उनसे भी बड़ा है। मैंने अभी हार नहीं मानी है।" उसकी आवाज़ में डर नहीं बल्कि संकल्प की गूँज थी। मानो वह अकाल से जूझने का खुद को एक नया पाठ सिखा रहा हो।
बहुत सोच-विचार कर रामू ने घर छोड़ने का फैसला किया। रामू का यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं था। शहर जाने से पहले उसने कुछ दिन तक चुपचाप गाँव के बाज़ार में अतिरिक्त मेहनत की। उसने अपने बरसों से जोड़े हुए थोड़े-बहुत पैसे निकाले और गाँव के बनिए से कुछ अनाज, दालें और तेल-नमक का इंतज़ाम किया।
यह सूखा राशन उसने सीता को सौंपते हुए कहा, "सीता, ये कुछ दिनों के लिए काफी होगा। इसे धीरे-धीरे इस्तेमाल करना। मैं जल्द ही वापस आऊँगा पर जब तक मैं न आऊँ, रवि को भूखा मत रहने देना।" रामू जानता था कि वह परिवार के लिए जीवन-रेखा है और उसकी अनुपस्थिति में पत्नी और इकलौते बच्चे का पेट भरना सबसे ज़रूरी। अपने परिवार के लिए सुरक्षा का एक छोटा-सा किला बनाकर उसने भारी मन से अपनी पुरानी, खड़खड़ाती साइकिल निकाली और उसे लेकर एक अनजान शहर की ओर अनिश्चित दिनों के लिए चल पड़ा। यह पहली बार था जब रामू अपनी मिट्टी, अपने घर और खेतों से इतना दूर जा रहा था वह भी एक अज्ञात यात्रा पर।
दिन, हफ्ते और कुछ महीने बीत गए पर रामू वापस घर नहीं लौटा। सीता को डर था कि कहीं शहर की भीड़ और कठिनाइयाँ रवि के बरगद जैसे पिता को तोड़ न दें। पति के विछोह की टीस मन में गहरी थी फिर भी सीता बहुत कुशलता से घर-परिवार को देख रही थी। वह घर में टोकरियाँ बनाती और बाज़ार जाकर बेचती जिससे घर खर्चे में कुछ आसानी हो जाती। गाँव के मुखिया जी के घर में उसने खाना बनाने का काम पकड़ लिया था। वहाँ से भी कुछ रुपए उसे मिलते और पका पकाया भोजन भी। विकट परिस्थितियों में सीता ने भी यूँ तो हिम्मत नहीं हारी थी परंतु सीता का कोमल हृदय पति के इंतज़ार में रोज़ शाम को दरवाज़े पर आँखें गड़ाए रहता था। छोटा रवि पिता को याद कर बेचैन होकर पगडंडी पर धूल के गुबार को निहारता रहता। जब रवि पिता के बारे में पूछता तो सीता तरह-तरह की मीठी कहानियाँ सुनाकर रवि को समझाती कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। सब दिन एक जैसे नहीं रहते।
फिर एक उदासी भरी शाम, जब सूरज डूब चुका था, दूर से एक धुंधली-सी आकृति दिखाई दी। वह आकृति धीरे-धीरे पास आ रही थी। सीता और रवि की साँसें थम गईं। हाँ! वह रामू ही था साइकिल पर एक भारी-सी बोरी लटकाए नज़दीक आता हुआ। उसका चेहरा धूल और थकान से ढका हुआ था, कपड़े फटे थे और काया और भी दुबली हो गई थी। पर जैसे ही उसने अपने परिवार को देखा उसकी थकी आँखों में वही पुरानी, अडिग चमक लौट आई।
रामू ने बोरी ज़मीन पर उतारी। सीता ने डरते-डरते उसे खोला। उसमें कुछ अनाज के दाने थे जो परिवार की उम्मीद को ज़िंदा रखने के लिए काफी थे। साथ ही कुछ सस्ते और मोटे कपड़े। रवि के लिए एक खिलौना भी था...उड़ने वाला प्लास्टिक का जहाज़। रामू ने बताया कि उसने शहर की कठोर सड़कों पर दिहाड़ी मजदूरी की थी। उसने रात-रात भर जागकर मालगाड़ियों से भारी बोरे उतारे थे, पत्थरों को तोड़ा था और एक पल भी आराम नहीं किया था। रात को वह रेलवे स्टेशन पर सो जाता था। उसका पसीना, हर श्रम परिवार के नाम था ताकि उसके परिवार को भूखा न रहना पड़े।
रवि ने उस दौरान देखा कि सच्चा संघर्ष क्या होता है। पिता का यह प्रेम किसी बरगद की तरह था जिसने खुद धूप सही पर अपने परिवार को हमेशा सुरक्षित छाँव दी।
आज रवि एक बड़ा आदमी है। शहर में उसका अपना कारोबार है, धन-दौलत है, सुंदर परिवार है। उसने शहर में एक सुंदर-सा घर भी बनवाया है जिसमें सब मिल-जुलकर रहते हैं। इस घर पर उसके माता-पिता के नाम की तख्ती लगी है क्योंकि वह जानता है कि यह सब किस की बदौलत है।
रवि पुरानी यादों से बाहर आया तो देखा कि माता-पिता वहीं उसके सामने बैठे हैं। उनके परिवार के लिए किए गए समर्पण, परिश्रम और त्याग को देखकर उसका मन भर आया। वह कुर्सी से उठकर माता-पिता के कदमों में जाकर बैठ गया। उसने देखा कि उसके पिता अब बूढ़े हो गए हैं। उनके बाल सफ़ेद हो गए हैं और भोजन करते हुए हाथ भी काँपते हैं। परन्तु जब वह स्वयं उनके पास बैठता है तो उसे आज भी पिता की हथेलियों में वही पुरानी मज़बूती महसूस होती है। पिता के होने में वही बरगद जैसी अडिग चमक और छाँव दिखाई देती है। और माँ में वही ममता और धैर्य जिसने उसे इस लायक बनाया।
इसी बरगद जैसी छाँव तले फलते-फूलते परिवार के सबसे छोटे सदस्य रवि के पाँच वर्षीय बेटे बबलू ने आकर अपने पिता से पूछा, "पापा बरगद का पेड़ कैसा होता है..?"
रवि ने अपने पिता की ओर इशारा करते हुए गर्व से कहा, "तुम्हारे दादाजी जैसा होता है..."
"और बरगद की छाँव कैसी होती है...?"
"बहुत ठंडी... बिल्कुल दादी जैसी।" रवि ने पिताजी के पास ही बैठी अपनी माँ को गले लगाते हुए कृतज्ञता से कहा।