सरगम का मूनू (बाल कहानी) : अमृत कौर बडरुक्खां
Sargam Ka Moonu (Hindi Baal Kahani) : Amrit Kaur
एक बार रात को करीब आठ बजे आसमान में चाँद चमक रहा था। उस समय सरगम लगभग दो साल की प्यारी बच्ची थी। उसे बहलाने के लिए परिवार के किसी सदस्य ने चाँद दिखाया। किसी ने उसे “चंदा मामा” कहा, किसी ने “चाँद” और किसी ने “मून”। सरगम को “चाँद” या “चंदा” की बजाय “मून” कहना आसान लगा।
जब भी आसमान में चाँद दिखाई देता, वह तुरंत उत्साहित होकर एक ही आवाज़ लगाती – “मून… मून… मून।” जब तक सबको दिखा न दे, उसे चैन नहीं मिलता। वह बहुत खुश होती, आसमान की ओर देखकर घूमती-फिरती रहती।
धीरे-धीरे उसने “मून” की जगह प्यार से “मूना” कहना शुरू कर दिया और आखिर में उसे “मूनू” कहना अच्छा लगने लगा। कई बार सूरज ढलने से पहले ही आसमान की ओर देखते हुए वह अपना “मूनू” ढूँढ़ लेती और जोर से पुकारने लगती – “मूनू… मूनू…”। उस समय उसकी आवाज़ खनक उठती, गला जैसे संगीत से भर जाता। उसकी वह खनकती हुई आवाज़ सुनने वालों के दिल को छू लेती।
उसे देखकर सबके भीतर भी एक अजीब-सी उमंग पैदा हो जाती। वह कूदती-फाँदती इधर-उधर भागती रहती। सचमुच लगता मानो बच्चों में खुद भगवान बसते हैं। जब वह चाँद देखकर खुश होती तो भगवान कृष्ण की बाल-लीलाएँ याद आ जातीं, जब उन्होंने माँ यशोदा से चाँद माँग लिया था। तब यशोदा ने थाली में पानी भरकर चाँद की परछाई दिखाई और बाल गोपाल खुश हो गए थे।
एक शाम सरगम बहुत जोर-जोर से रो रही थी। उसे चुप कराने के कई उपाय किए गए। लेकिन उस दिन आसमान में चाँद दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि अमावस्या के दिन नज़दीक थे। तभी जेम्स थर्बर की कहानी याद आई जिसमें राजकुमारी ने चाँद की माँग की थी और उसे सोने का चाँद देकर खुश कर दिया गया था।
तब उसकी बुआ ने सरगम को गोद में उठाकर कहा – “सरगम! यह देख, तेरा मूनू।” और लाल रंग का स्केच पेन उठाकर उसके नन्हें हाथ पर आधा चाँद बना दिया। कमाल यह हुआ कि सरगम ने रोना बंद कर दिया। उसने दूसरा हाथ भी आगे कर दिया। उस पर भी चाँद बनाए गए – कभी आधे, कभी पूरे, अलग-अलग रंगों में।
अब उसका रोना थम चुका था, बस हल्की सिसकियाँ रह गई थीं। थोड़ा पानी पिलाने से वह भी पूरी तरह शांत हो गईं। इसके बाद वह रोज़ अपने हाथों पर चाँद-तारे बनवाने लगी। मानो पूरा आसमान उसकी मुट्ठी में आ गया हो। कभी-कभी तो वह खुद स्केच पेन पकड़कर दूसरों के हाथों पर भी चाँद-तारे बनाने लगती।
अब तो उसे हर जगह अपना “मूनू” दिखाई देने लगा – चादरों पर, तकियों पर, कपड़ों पर, पेड़ों और पत्तों में। घर की दीवारें, अख़बार, कॉपी-किताबें – कोई जगह ऐसी नहीं थी जहाँ सरगम का “मूनू” न हो। जहाँ न होता, वह खुद बना देती।
उसकी नन्हीं हथेलियों पर चाँद-तारे ऐसे झिलमिलाते मानो आसमान ही उतर आया हो। जितनी बार वह अपनी हथेलियों पर उन्हें सजाती, उतनी ही बार चारों ओर खुशियाँ बिखेर देती।