प्रेम की आवाज़ (बाल कहानी) : मनजीत शर्मा 'मीरा'
बहुत समय पहले की बात है। उस जंगल को लोग उसकी हरी-भरी हरियाली और घनी छाया के लिए जानते थे। ऊँचे-ऊँचे पेड़ सूर्य की रोशनी को ज़मीन तक मुश्किल से पहुँचने देते थे। जंगल में हमेशा एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था लेकिन यह सन्नाटा डरावना नहीं बल्कि बड़ा शाँत और सुहावना लगता था। यहाँ जब हवा चलती तो पत्तों से "सरर-सरर" की ऐसी मीठी आवाज़ आती मानो जंगल कोई लोरी गा रहा हो। कभी-कभी किसी दूर बैठे पक्षी की "कूहु-कूहु" या सूखी लकड़ियों पर किसी छोटे जानवर के दौड़ने की "चिर-चिर" आवाज़ इस सन्नाटे को और खूबसूरत बना देती थी।
इस ठंडी छाँव और शाँति के कारण जंगल में रहने वाले सभी पशु-पक्षी बड़े प्यार से रहते थे। बाहर चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो परंतु इस जंगल के भीतर आते ही ठंडी-ठंडी हवाएँ तन और मन को खुश कर देती थीं। ऐसा लगता था मानो यह जंगल कोई आम जंगल नहीं बल्कि परियों की कहानियों जैसा कोई जादुई संसार हो, जहाँ वक्त ठहर सा गया था।
इसी हरे-भरे और सुंदर जंगल पर शेर सिंह का राज था। शेर सिंह अपनी गगनभेदी दहाड़ और असाधारण शारीरिक ताकत के लिए प्रसिद्ध था। जंगल के जानवर उसे देखते ही डर के मारे काँपने लगते और दुबक जाते थे। शेर सिंह को अपनी ताकत पर इतना घमंड था कि वह हर दिन अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता रहता। कभी पेड़ों को ज़ोर से हिलाकर तो कभी निर्दोष जानवरों को डराकर। उसका मानना था कि इस जंगल में वही सबसे महान और शक्तिशाली है और उसकी ताकत ही इस जंगल की सच्ची पहचान है।
जंगल के सबसे ऊँचे, सबसे घने पेड़ की एक छोटी सी डाल पर पाखी नाम का एक पक्षी भी रहता था। पाखी न तो बड़ा था न ही उसकी आवाज़ किसी को डराने वाली थी बल्कि वह अपने शाँत, मधुर स्वभाव और कर्णप्रिय गीतों के लिए जाना जाता था, इसीलिए वह खास था। पाखी का जीवन दूसरों की मदद करने में बीतता था। जब गिलहरी का घर टूट जाता तो पाखी तिनके लाने में मदद करता। जब कोई हिरण रास्ता भटक जाता तो वह अपनी मीठी आवाज़ से उसे दिशा बताता। जब कोई दुखी होता तो वह अपनी मधुर आवाज़ में प्यारे-प्यारे गीत सुनाकर उसका दुख हर लेता। वह मानता था कि प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है जो किसी भी ताकत से कहीं ज़्यादा कीमती होती है।
अपने इसी दयालु स्वभाव की वजह से पाखी अपने दोस्तों के लिए हर शाम अपनी सुरीली आवाज़ में गीत सुनाया करता था। पक्षियों को यह सब बहुत अच्छा लगता था और अक्सर कुछ जानवर भी पाखी का गाना सुनने आ जाया करते थे। इन सबमें बहुत गहरी दोस्ती थी और इस गहरी दोस्ती का कारण थी पाखी की मधुर आवाज़ और उसका परोपकारी स्वभाव।
एक दोपहर, जब शेर सिंह जंगल में अपनी दैनिक सैर पर निकला तो अचानक उसे अपनी दहाड़ के बीच एक अनोखी, मीठी धुन सुनाई दी। वह धुन इतनी शाँत और मनमोहक थी कि शेर सिंह एक पल के लिए रुक गया। उसने ऊपर देखा। एक ऊँची टहनी पर पाखी बैठा था जो अपनी धुन में मग्न होकर गा रहा था।
शेर सिंह ने गरजने के बजाय, थोड़ी रुकी हुई आवाज़ में पाखी को अपने पास बुलाया और रौब से पूछा, "ऐ छोटे पक्षी! तुम सचमुच बहुत खूबसूरत गाते हो। तुम्हारी आवाज़ में अनोखा जादू है।" और दूसरे ही पल शेर सिंह ने अपनी प्रशंसा को तुरंत घमंड में बदलते हुए कहा, "...लेकिन इस मधुरता का क्या फायदा? तुम्हारी आवाज़ में कोई ताकत नहीं है! कोई रौब नहीं है! क्या तुम कभी मेरी तरह शक्तिशाली बनना नहीं चाहते? दुनिया को अपनी मर्ज़ी के हिसाब से झुकाना नहीं चाहते?"
पाखी ने ज़मीन पर खड़े विशाल शेर की ओर देखा। वह बिल्कुल भी डरा नहीं बल्कि उसके चेहरे पर एक शाँत मुस्कान थी। पाखी ने कोमलता से उत्तर दिया, "शक्ति केवल दहाड़ने और दूसरों को डराने से नहीं आती, शेर महाराज। सच्ची शक्ति तो बीज में छिपे विशाल पेड़ की तरह होती है जो कभी बाहर से नहीं दिखती। सच्ची शक्ति तो दया, सहयोग और मदद करने में है। जो जीव सबसे छोटे की सहायता करता है वही वास्तव में सबसे शक्तिशाली होता है।"
पाखी की लंबी-चौड़ी बात सुनकर शेर सिंह पहले तो हैरान हुआ, फिर उसने ज़ोर-ज़ोर से हँसना शुरू कर दिया। उसकी हँसी पूरे जंगल में गूँज उठी। उसने अपनी मूँछें मरोड़ीं और घमंड से अपनी छाती फुलाकर बोला, "तुम क्या जानोगे ताकत के मायने, छोटे पक्षी ! यह जंगल मेरे पंजों की ताकत से चलता है, तुम्हारे कोमल गीतों से नहीं। अपनी इस कमज़ोरी को 'सच्ची शक्ति' का नाम देना बंद करो! यह जो तुम इतना बोल रहे हो ना वह भी इसलिए कि तुम उड़ सकते हो।" शेर सिंह ने पाखी की बात को हवा में उड़ा दिया और फिर से अपनी राह पर चल पड़ा लेकिन पाखी की शाँत आँखें और उसका जवाब शेर के दिमाग में कहीं अटक गया था।
कुछ ही दिन बीते थे कि जंगल में भयंकर गर्मी की वजह से भीषण आपदा आ गई। जंगल के एक कोने से भयानक आग की लपटें उठने लगीं। हवा तेज थी, इसलिए सूखे पत्तों से होती हुई आग जंगल के हरे-भरे पेड़ों को तेजी से अपनी चपेट में लेने लगी। धुएँ का गुबार पूरे आसमान पर छा गया। जंगल के सभी जानवर अपनी जान बचाने के लिए पागलों की तरह इधर-उधर भागने लगे। चीख-पुकार और घबराहट से पूरा जंगल थर्रा उठा।
शेर सिंह भी अपनी सारी ताकत भूलकर बस भाग रहा था लेकिन भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया। भागते-भागते वह एक ऐसे विशाल पेड़ के पास फँस गया जिसके चारों ओर आग की लपटें बढ़ी आ रही थीं। अपनी जान खतरे में देख, शेर सिंह ने ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ कर अपने साथी शेरों को मदद के लिए पुकारा। उसकी दहाड़ की आवाज़ दूर-दूर तक गई लेकिन कोई भी उसकी मदद के लिए नहीं आया। जंगल के दूसरे शेर जो हमेशा उसकी दहाड़ से डरते थे, उस संकट में उसकी दहाड़ को अनसुना कर गए। उसकी ताकत की दहाड़ आग को डरा नहीं सकी, हवा को रोक नहीं सकी और ना ही उसे वहाँ से बाहर निकाल सकी। इस समय वह पूरी तरह से असहाय और घबराया हुआ था।
इस अराजकता के बीच, एक छोटा सा साया आग की ओर तेजी से उड़ता हुआ आया। वह कोई और नहीं बल्कि पाखी था! पाखी ने दूर से ही खतरे में पड़े शेर सिंह को देख लिया था। पाखी जानता था कि छोटी चोंच से पानी लाकर आग बुझाना असंभव है इसलिए उसने तुरंत अपनी सच्ची शक्ति यानि बुद्धिमानी और संगठन का उपयोग करने का निर्णय लिया।
पाखी तुरंत ज़ोर-ज़ोर से सीटी बजाकर जंगल के सभी पक्षियों और जानवरों को इकट्ठा करने लगा। अपनी मधुर आवाज़ को एक तीखे आदेश में बदलकर, पाखी ने उन्हें तुरंत आग और शेर के बीच की सूखी ज़मीन से पत्ते और टहनियाँ हटाने और उनकी जगह गीली मिट्टी व हरी पत्तियाँ डालने को कहा।
जंगल के जिस हिस्से में अभी आग नहीं फैली थी वहाँ से सभी जीव तोते, मैना, कबूतर, भालू, बंदर, हाथी और हिरण एकजुट होकर आ गए। पक्षी अपनी चोंच में गीली मिट्टी और गीली हरी पत्तियाँ भरकर लाने लगे, जबकि भालू और बंदर अपने बड़े पंजों और हाथों से रेत और मिट्टी उठाकर आग की ओर फेंकने लगे। हाथियों ने अपने मोटे पंजों से ज़मीन की मिट्टी खोदनी शुरू की और सूँड में भरकर आग पर डाली।
आग की लपटों से घिरे शेर सिंह ने अपनी आँखों से यह अविस्मरणीय दृश्य देखा। उसने देखा कि जिन छोटे-छोटे जीवों को वह हमेशा कमज़ोर और ताकतहीन समझकर उन पर दहाड़ता था वे आज अपनी जान की परवाह किए बिना उसकी जान बचाने के लिए एक महान सेना की तरह काम कर रहे हैं। पाखी की बुद्धिमानी और प्रेम ने सैकड़ों जीवों को एक सूत्र में बाँध दिया था जबकि उसकी अपनी दहाड़ ने किसी को भी उसके पास नहीं आने दिया।
शेर सिंह के दिल में बैठा सारा घमंड और अहंकार पल भर में पिघलकर बह गया। उसे अपनी पिछली बातों पर, अपने रौब और अपनी हर दहाड़ पर गहरा पछतावा हुआ। वह अपनी जान बचाने के लिए उन छोटे जीवों का ऋणी था। उसकी आँखों में कृतज्ञता और पश्चाताप के आँसू आ गए।
जैसे ही आग की लपटें धीमी हुईं और खतरा टला, शेर सिंह ने काँपते हुए कदम आगे बढ़ाए और सीधे पाखी के सामने झुक गया। उसका सिर पहली बार किसी के सामने विनम्रता से झुका था। भारी आवाज़ में उसने कहा, "पाखी, आज तुमने मुझे असली सबक सिखाया है। मैंने सोचा था कि मेरी दहाड़ ही दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है लेकिन मेरे सबसे बड़े संकट में मेरी ताकत व्यर्थ हुई और मेरी दहाड़ किसी अपने को नहीं बुला सकी। मेरी दहाड़ से कोई नहीं डरा। तुमने सही कहा था कि सच्ची शक्ति ताकत में नहीं बल्कि प्रेम, दया, बुद्धिमानी और मदद करने की भावना में है।" कहते हुए शेर सिंह ने सच्चे दिल से माफ़ी माँगी।
"शेर महाराज, यहाँ कोई बड़ा है तो कोई छोटा, कोई कमज़ोर तो कोई ताकतवर लेकिन अगर हम सब एक हो जाएँ तो हर मुसीबत का मुकाबला मिलकर कर सकते हैं।" पाखी ने बेहद नम्रता से कहा।
उस दिन के बाद से शेर सिंह पूरी तरह बदल गया। वह अब केवल 'शेर सिंह' नहीं बल्कि जंगल का सबसे दयालु और न्यायप्रिय राजा बन गया था।