प्राचीन भारत की परंपरा, आधुनिक विश्व की आवश्यकता (हिंदी निबन्ध) : सूर्य प्रकाश शर्मा

भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान-विज्ञान तथा अध्यात्म का केन्द्र रहा है। हमारे वेद, उपनिषद्, श्रुति, आरण्यक तथा वेदांग आदि उस महान आध्यात्मिक ज्ञान को सँजोए हुए हैं। भारतीय दर्शन की जो परंपरा है वह एक ऐसी नदी के समान है, जिसने समय-समय पर आवश्यकता पड़ने पर शुष्क पड़ी हुई मानवता को अपने ज्ञान तथा अध्यात्म के द्वारा अभिसिंचित किया है। प्राचीन काल में जब अन्य सभ्यताएँ विस्तारवादी नीति अपनाकर अपने क्षेत्राधिकार को बढ़ाने में व्यस्त थीं, तब भारत मुखरित स्वर में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसी अवधारणा का उद्घोष कर रहा था।

परवर्ती काल की विस्तारवादी संस्कृतियाँ जब शैशव अवस्था में थीं, तब भारतीय संस्कृति शक्तिसंपन्न थी। दक्षिण में महासागर से लेकर उत्तर में हिमालय तक (उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रश्चैव दक्षिणं)1 भारतीय संस्कृति का परचम लहरा रहा था। यदि भारत भी अन्य संस्कृतियों जैसी विचारधारा अपनाता तो कई संस्कृतियों को शैशव अवस्था में ही नष्ट करने का दम भारत में था। किन्तु गुरुकुल में शिष्यों ने अपने गुरु के समीप बैठकर “अयं निजः परो वेति गणनां लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”2 जैसा ज्ञान अर्जित किया था, जिसे भारतीयों ने शताब्दियों तक अपना आदर्श वाक्य बनाए रखा। केवल आदर्श वाक्य ही नहीं बनाया अपितु इस पर अमल भी किया। भारतीय संस्कृति के महानायक मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने जब रावण को परास्त किया तो युद्ध नियमों के अनुसार उनका लंकापति के रूप में राज्याभिषेक किया जाना चाहिए था, किन्तु श्रीराम ने विभीषण का राज्याभिषेक करवाकर भारतीय परंपरा के आदर्श को प्रमाणित किया। ऐसे एक नहीं, हज़ारों उदाहरण हमारी परंपरा में भरे पड़े हैं।

चार-पाँच हज़ार वर्षों में कई सभ्यताएँ बदलीं, कई संस्कृतियों का उत्थान-पतन हुआ, सामाजिक परिदृश्य भी बदले किन्तु सदियों पहले वृक्षों के नीचे बैठकर जो आदर्श ज्ञान की धारा प्रवाहित हुई थी, उसकी प्रासंगिकता आज भी जैसी की तैसी बनी हुई है।

विस्तारवादी विचारधाराएँ आज भी हैं। जो निरंतर वैश्विक ध्रुवीकरण करने का प्रयास करती रहती हैं। कुछ संस्कृतियों का तो संपूर्ण भूत और वर्तमान साम्राज्यवादी विस्तारवादी विचारधारा पर ही आधारित है। उन्होंने अपना साम्राज्य दूसरी संस्कृतियों का विध्वंस करके स्थापित किया है। भारत पर भी कई विदेशी सभ्यताओं ने कई बार हमले किए। हालांकि समय के साथ वे सभी साम्राज्यवादी संस्कृतियाँ या तो नष्ट हो गई या उनका महत्त्व कम हो गया किन्तु भारतीय संस्कृति का ध्वज आज भी विश्व में उसी ऊर्जा के साथ लहरा रहा है।

ये बात कहते हुए मुझे उर्दू के प्रसिद्ध शायर अल्लामा इक़बाल का एक शे’र याद आ रहा है कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा”। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि हमारी हस्ती इतने प्रहार होने के बाद भी क्यों नहीं मिटी? इस प्रश्न का उत्तर हमें डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘अशोक के फूल’ में मिलता है, जिसमें उन्होंने बताया है कि वर्तमान की भारतीय संस्कृति अनेक संस्कृतियों के मिश्रण से बनी है। भारत में आक्रमण के उद्देश्य से जो लोग यहाँ आए थे, वे सभी यहाँ की संस्कृति में मिश्रित हो गए और ऐसा केवल इसलिए संभव हो पाया क्योंकि भारतीय संस्कृति में समन्वय तथा सहकारिता का भाव था। ऐसा शायद ही कोई संस्कृति कर पाई हो।

आज भी मैं देखता हूँ कि एक-दूसरे देश आपस में युद्धरत हैं। इतने शक्तिसंपन्न होने के बावज़ूद वे विश्व में शान्ति स्थापित करने की बजाय अपने प्रभुत्व के क्षेत्राधिकार का विस्तार करना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें चाहे कितना ही रक्तपात क्यों ना करना पड़े। जिस विज्ञान का उद्बव मानव जाति के विकास के लिए हुआ था, आज उसी विज्ञान का प्रयोग मानव जाति के विनाश के लिए किया जाता है। इसका कारण सिर्फ़ ये है कि उनके आदर्शों में कभी सहकारिता के तत्त्व नहीं रहे।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि “सारा संसार एक अखाड़ा है”। जो कि कई बार सत्य भी सिद्ध होती है। अमेरिका और रूस विश्व की दो बड़ी महाशक्तियाँ हैं। उनकी महत्वाकांक्षाओं ने विश्व को युद्ध और अशांति में ही उलझाये रखा है। यदि उन दोनों ने सहकारिता की भावना के साथ मिलकर के कोई कार्य किया होता, तो आज सम्पूर्ण विश्व की छवि कुछ और ही होती। ऐसे कई देश हैं जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने सम्पूर्ण विश्व को युद्धभूमि बनाया हुआ है। आज कई देशों ने मिसाइलें, परमाणु बम तथा अन्य विविध प्रकार के विध्वंसकारी हथियार प्राप्त कर लिए हैं। इसी कारण, आज मानवता डर-डरकर के जी रही है क्योंकि सदैव यही भय बना रहता है कि कहीं युद्ध हुआ और इन हथियारों का प्रयोग हुआ, तो मानवीय सभ्यता नष्ट हो सकती है। ये ख़तरा निरंतर लगभग प्रत्येक देश के सिर पर मँडराता रहता है।

इस स्थिति में, मानवता को नष्ट होने से बचाने का उपाय केवल उस संस्कृति के पास है, जो सिर्फ़ अपने हित के बारे में ना सोचकर ‘विश्व का कल्याण हो’ की विचारधारा में विश्वास रखती है। सम्पूर्ण विश्व में ये आज के युग की महती आवश्यकता है कि सारा संसार भारत की परंपरा को समझे और उसे आत्मसात भी करे।

आज के इस युद्ध और अशांति के माहौल में शांति स्थापित करने का दम सिर्फं भारतीय परंपरा के पास ही है। भारत की परंपरा आज के समय संपूर्ण विश्व की आवश्यकता बन चुकी है। यदि मानवता को बचाना है तो सम्पूर्ण संसार के लोगों को जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और एक सीमा से अधिक राष्ट्रवाद जैसी संकीर्ण मानसिकता को त्यागकर सम्पूर्ण वसुधा को अपना कुटुंब (परिवार) मानना होगा और भारत के स्वर में स्वर मिलाकर एक साथ उद्घोष करना होगा –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग् भवेत्”।

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