मुखौटा (तमिल उपन्यास) : वासंती (अनुवाद : एस. भाग्यम शर्मा)

Mukhauta (Tamil Novel in Hindi) : Vaasanthi (Translator : S. Bhagyam Sharma)

अध्याय 1

मुझे अक्सर एक सपना आता है। सच जैसा सपना। अवचेतन से आता है तो निश्चित ही कोई शर्म की बात नहीं है, मैं स्वयं को तर्क देती हूँ । मेरा उससे कोई संबंध नहीं है, ऐसा मैं उठते ही खुद ही से घबरा कर बोलती हूं। मुझसे बदला लेने के लिए आया हुआ यह सपना नहीं एक शैतान है !

पर वह है बड़ा मजेदार । सपना टूटने पर मैं नशे में डूबी-डूबी सी हवाओं में तैरती हुई, ऊपर ...और ऊपर...अन्तरिक्ष में कहीं ग्रहों के चक्कर लगा रही होती हूँ । मुझे लगता है कि मैं कृष्णन के आगोश में हूं। मेरे शरीर में नई ऊष्मा भर जाती है, होंठ कुछ मुलायम हो जाते हैं, छाती, नाभि आदि में एक कम्पन होती है। मेरी सांस फूलने लगती है। सारा शरीर पिघलने लगता है। प्रतीत होता है जैसे एक महत्वपूर्ण कामशक्ति मेरे भीतर समा गई है । पर वश की सीमा तक । चराचर को हिला कर रख देने वाली है वह शक्ति ।

आज मैं एक ऐसे ही सपने से जागती हूं। कृष्णन के शरीर ने जो गर्मी मुझे दी, उससे मेरा शरीर अभी भी तप रहा है । उसके होंठों से जो छू गए थे, मैं मेरे उन गालों को छू कर देखती हूं । यह क्या ? गाल पर रेत ही रेत रगड़ खा रहे हैं। जैसे कि हम समुद्र के किनारे बैठे हुए थे । मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी । मेज, कुर्सी सभी के ऊपर पतली सी रेत की परत जमी हुई दिखी ।

कल रात आंधी चली होगी। मुझे होश भी नहीं कब तो मैं सोई थी। देखा तो सब खिड़कियां बंद थी। नलिनी ने बंद किया होगा। पहले मुझे भी उसी की तरह रात 2:00 बजे तक पढ़ने की आदत थी।

"यह क्या पढ़ाई है रे पूरी रात लाइट जला कर ?" रात को बीच-बीच में बाथरूम जाने को उठी नानी झांक कर देखती तो पूछती।

"यह बस हो गया अम्मां " मैं बिना मुंडी ऊपर किये जवाब देती। नानी, नानी जैसे नहीं थी। उनकी उम्र छोटी थी इसीलिए उन्हें नानी न कहकर अम्मा ही बुलाते थे हम । मेरी मां की शादी के समय नानी की उम्र 35 साल थी। मेरे पैदा होने के 4 साल बाद मामा पैदा हुआ। नानी के प्रसव के समय मदद करने के लिए मेरी अम्मा अपनी सास से बहुत अनुनय विनय कर अनुमति लेकर मैके जा पाई थी ।

"समधिन ने मुझे नीचा दिखा कर इतनी गालियां दी कि मुझे चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए था । पता नहीं मैं कैसे नहीं मरी !” वह बात याद आते ही मेरी नानी ऐसा बोलती।

"ऐसी परिस्थिति में लाकर मुझे खड़ा कर दिया इस आदमी ने । सोच कर मुझे बहुत गुस्सा आता था।" नानी बोलती।

अब सोचती हूं तो लगता है क्या नानी के अनिच्छा से उनके गर्भ रहा होगा ? जरुर गर्भ न ठहरने के उपाय नहीं जानने के कारण गर्भ ठहर गया होगा।

सिर्फ वंश के बढ़ने के लिए ही दोनों के शरीर का मिलन हो, ऐसी ही कोई शर्त पति-पत्नी ने अपनाया होता तो सुबह उठकर जल्दी से कहीं दौड़ने की जरूरत नहीं होती। मेरी पड़दादी को भूत-ऊत ने पकड़ लिया था। वह किस तरह का भूत था वह तो मुझे बाद में पता चला। पति से उनकी सास उन्हें मिलने नहीं देती थी। बहुत परेशान करती थीं । भूत पकड़ने की, हिस्टीरिया होने वाली लड़कियों की कई कहानियां मेरी नानी सुनाया करती थी। परंतु भूत ने उन्हें कैसे पकड़ा नानी को सब पता होगा.....मुझे हंसी आ रही है. लगता है, मेरे मरने तक नानी की याद मेरे चारों तरफ बनी रहेगी. उनका 'जीन' मेरे अंदर है। मेरे जींस मेरी पोती उठाएगी। कड़ी दर कड़ी यह एक जंजीर है। हजारों वर्षों के पहले की लड़कियों की तहजीब अभी तक मुझ में है। उनके दुख, खुशी, बल, कमजोरी मुझे और मेरे वंश को मिलाती है।

मैंने उठकर खिड़की खोली । ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। 'आंधी' के कारण गर्मी कम हो गई थी। आंधी के आने के बाद के बदले हालात देखने से पता चल रहा था।

"क्या समय हुआ दीदी ?" नलिनी ने पूछा।

मैं बिना मुड़े ही "पांच" बोली।

"क्यों इतनी जल्दी उठती हो ? यूनिवर्सिटी की अभी तो छुट्टी ही है ?"

"नींद खुल गई, क्या करूं ?... रात में आंधी आई थी क्या ?"

"आराम से पूछ, कुंभकरण जैसी सो रही थी !"

उसकी तरफ मुड़ कर मैं मुस्कुराई। "डस्टिंग की ड्यूटी अब मेरी है, ओके !"

"निश्चय ही मेरी नहीं है।" कहकर नलिनी ने आंखें बंद कर ली। "दीदी बाहर जाओगी क्या ?"

"हां अमेरिका के सेंट्रल लाइब्रेरी जा रही हूं। शाम को ही आऊंगी। तुम्हारे लिए खाना बना कर जाऊंगी।"

"खाने की जरूरत नहीं। ब्रेड बहुत है एक अकेली के लिए।"

"शादी हो जाएगी तो क्या करेगी नलिनी ?"

"जिसे खाना बनाना आता हो देखकर ऐसे पुरुष से शादी करूंगी। तुमको भी खाना बनाने वाला चाहिए क्या ?"

"नहीं !”

“अब बच्चे पैदा करने के लिए तो उसे नहीं बोल सकते न !", नलिनी हंसने लगी।

"तुम्हें याद है क्या दीदी ? अपनी बड़ी मां (मां की बड़ी बहन) बोलती थी ना, - लड़के की पोस्टिंग आगरा हो गई ; खाने के लिए परेशान हो रहा है ! आते ही उसकी शादी करनी है। - गॉड ! एक के लिए खाना बनाने के लिए, उसके साथ सोने के लिए ही सिर्फ शादी याद आती है ? कितनी ओछी बात है !"

"अब विवाद की बात मत शुरू कर दे । सोना है तो सो। मैं अपना काम देखती हूं।"

"खाना मत बनाना।"

"ओ .के !" कह कर मैं दांत साफ करने चली गई।

बड़ी मां का लड़का बालू की पत्नी मल्लिका को, मुझे नहीं लगता, इस तरह की असमंजस का सामना करना पड़ा होगा । मुझे नहीं लगता वह ऐसे सोचती भी होगी कि पति के लिए खाना बनाना, उसके साथ सोना ही कर्तव्य है । खुश होकर खाना बनाती है । स्वयं स्वाद लेकर उसे खिलाती है । उसके साथ सोने में भी खुशी का अनुभव करती है, ऐसा ही मैं सोचती हूं। हमेशा उसके चारों तरफ सेंट की खुशबू, पावडर की महक उड़ती रहती है। उसका बालू को देखना प्रेम ही दिखता है। शरीर की भूख सिर्फ पुरुष को ही होती है क्या ?

लड़कियों के चारों ओर हमेशा एक पर्दा टंगा रहता है। इस पर्दे को हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक देना चाहिए, ऐसा सोचते हुए मुझमें गुस्से का भाव है। अप्पा ने जो कहानी कही थी मुझे याद आ रही है। राजस्थान में जब जंगल में शौच के लिए औरतें बैठी होती है तब गलती से कोई पुरुष उधर चला आए तो अपने लंबे चौड़े घाघरे को उठाकर अपना चेहरा ढक लेती थी। यही तो सभी औरतें किसी न किसी रूप में हमेशा ही करती हैं, ऐसा मुझे बार-बार लगता है। इन सब बातों की आदमियों को जरूरत होती है। मेरे पिताजी की आंखों में इस कहानी के कहते समय जो बिजली सी चमकती हुई खुशी दिखाई देती थी, अभी भी मुझे याद है।

मुहावरों का अर्थ पूछकर मैंने नई कॉफी डिगाशन बनाया। दूध की बोतल लेकर आती कामवाली बाई, लक्ष्मी, बाहर पड़े अखबार भी ले आई।

मैं पेपर पढ़ते हुए दूध को गर्म करने चढ़ा दिया. कॉफी बनाकर लक्ष्मी को कप पकड़ा, मैं भी पीने बैठ गई ।

"सब्जी काटना है क्या ?" लक्ष्मी ने पूछा।

"नहीं । खाना नहीं बनाने वाले हैं। ब्रेड रखी है।"

"घर में आदमी नहीं है तो ऐसा ही होता है।" लक्ष्मी बोली।

मेरी हंसी छूट गई ।

"क्यों, आदमी के लिए ही सब लोग खाना बनाते हैं ?"

"तरीके से तभी तो बनाने की सोचते हैं। मेरे पति को रोजाना नया-नया ही चाहिए। नहीं तो थाली उठाकर मुझ पर ही फेंक देगा। दस दिन के लिए गांव की तरफ गया था देखो, मैं अकेली कभी बनाती तो कभी नहीं। कभी-कभी दो इडली लेकर खा लेती और सो जाती।

"तेरे पति के जीभ तूने ही इतनी लंबी की है लक्ष्मी ! "

"अरे, मुझे लंबी करने की क्या जरूरत पड़ी थी ? आदमियों की जीभ जन्म से लंबी होती है।"

मैं जोर से हंस पड़ी।

"यह सब बेकार के काम नहीं करना चाहिए इसीलिए तो आपने शादी नहीं की, है न दीदी ?"

मेरी हंसी एकाएक रुक गई । "पहले घर को अच्छी तरह से साफ करो, बहुत मिट्टी है।" मैंने बात बदल दिया था । "मैं डस्टिंग कर देती हूं।" कहकर मैं उसके साथ हो ली।

"अम्मा यदि जिंदा होती तो ऐसा छोड़ देती ?"

लक्ष्मी के प्रश्न को मैंने सुना-अनसुना कर दिया। मां के मौत तो मेरे लिए भी अनापेक्षित थी। आराम से बैठी टी.वी देख रही थी। अचानक बोली कि छाती में दर्द हो रहा है । हम उठकर ‘क्या हुआ’ पूछते, इसके पहले ही उनकी साँसें थम गई।

हार्ट अटैक आया था । अचानक उठा वह दर्द और भय उनकी खुली पलकों में कहीं ठहर गया था. हमें इस आघात से मुक्त होने में बहुत समय लगा। मां की आँखें बंद करने के बाद कई दिनों तक मेरे अंदर स्वयं के दोषी होने की भावना उठती रही । पर्दा ही क्या एक मुखौटा ही मेरे लिए जरूरतहै, मैंने सोचा। लोग क्या कहेंगे इस बात से डरती थी मैं ।

लक्ष्मी के जाने के बाद मैं नहा कर तैयार होकर बाहर निकलने लगी तो नलिनी उठ गई। उसने पूछा "क्या कह रही है लक्ष्मी ?"

"अपने घर के ब्रेड से वह बोर हो गई है। शादी कर लो फिर खाना बनाने का तुम्हारा मन करेगा !"

नलिनी मुझे देखकर हंसी। फिर जल्दी से बोली "तुम्हें एक दोस्त की जरूरत है दीदी। शादी करना जरूरी नहीं है।"

मेरे अंदर एक संकोच फैल गया। ये खेत के किनारे पर बैठकर प्रेम के गीत गाने जैसी स्थिति है।

"तेरी इस योजना के लिए धन्यवाद !" कहते हुए मैं रवाना हो गई। मेरी दादी को जिस भूतनी ने पकड़ा शायद वह मुझे भी पकड़ लेगा, यही सोच कर डर रही है क्या ?

"पुरानी बातों को पकड़े मत बैठो मालिनी । " मेरे साथ यूनिवर्सिटी में काम करने वाली सुभद्रा रोजाना ही मुझे देख कर नाराज होती बोलती है। "कोई नया दोस्त बनाओ।"

"मुझे तो कोई भी नहीं दिखाई दे रहा है।"

अध्याय 2

"मैं किसी से तुम्हारी जान पहचान कराती हूं।"

"अभी मैं शांति से हूं । मेरी शांति तुम्हें पसंद नहीं क्या सुभद्रा ? जरा बताना तो मेरे चेहरे पर हंसी नहीं है क्या ?"

"यह तुम्हारा अपना पहना हुआ मुखौटा है। अपने को धोखा देने के लिए हंसती हो।"

अब तो यह याद करके भी अचंभा होता है। मेरी पूर्वजों के जींस से यह हंसी मुझे मिली हुई है।

सुंदरी बुआ की हंसी। सुंदरी बुआ की आयु अम्मा के बराबर ही होगी । सुंदर, अति सुंदर ! साथ ही उतना ही मीठा गाने वाली महिला। शादियों में नाचते हुए गाना होता है, तो सब उसको ही बुलाते थे। शादी के समय विभिन्न रीति-रिवाजों के वीडियो बनाने के लिए गाना होना ही चाहिए। वह गाती थी । अतः हर शादी वाले घर में उसकी पूछ होती थी और उसको सप्रेम बुलाते थे। सभी आयोजनों में तैयार होकर सुंदरी बुआ सबसे पहले, सबसे आगे खड़ी रहती। ठहाका मारकर हंसती। जहां पुरुष होते वहां पर बड़े उत्साह के साथ अपनी योग्यता का प्रदर्शन करती थी। बड़े साहस के साथ सब से बात करती। अपने पल्ले को सीने पर से जानबूझकर थोड़ा सरका देती। उसकी सुडौल छाती लड़कियां भी मुंह फाड़ कर देखती रह जातीं । वह जहाँ होती सबकी निगाह वहीँ होती। विशेष अवसरों पर लड़कियां ख़ास तवज्जों पाने को उसके पीछे-पीछे भागती, चिपके-चिपके रहतीं।

"कितनी बेशर्म औरत है ! अपने आदमी से इतनी बुरी तरह तो पिटती है। फिर भी कोई बुलाए तो तुरंत हंसते हुए आ जाती है!"

"यह औरत इस तरह नाचती फिरती है तो उसका आदमी क्यों नहीं पीटेगा ?"

क्यों ? यह सब किस लिए ? इसके बारे में सोचने-समझने के लिए किसी के पास धैर्य नहीं है। बुआ और उसके पति में कोई भी तो समानता नहीं थी, इस बात को किसी ने कभी सोचा ही नहीं। वे बड़े ही भद्दे थे. उनमें सुंदरता का एक लक्षण भी नहीं था। इसके अलावा वे एक नंबर के बेवकूफ थे । संदेह करने की बड़ी बिमारी थी उन्हें । संगीत में कोई रुचि नहीं थी उनकी । यह जानते हुए भी कि अगर वह नाचने-गाने बाहर जाएगी तो पति उसे बुरी तरह मारेगा फिर भी सुंदरी बुआ कैसे चली जाती है यह आश्चर्य की बात है। ऊपर से पुरुषों के सामने सीने के पल्ले को थोड़ा सा खिसका देने वाली वक्रबुद्धि से तृप्त होने वाली के बारे में आज सोच कर आश्चर्य होता है। उसका पति जब मरणासन्न अवस्था में था मैं उन्हें देखने गई थी । बुआ एकदम से कमजोर हो गई थी। मुझसे लिपटकर वे बहुत रोई थी ।

"यह फूल, और यह बिंदी सब इसी के कारण ही तो ! इसी के रहते तो, मालिनी, मैं मनुष्य जैसे गौरव से घूम रही हूं ! यह चले जाएं तो मेरे लिए तो सब कुछ चला जाएगा।"

सेंट्रल के अंदर घुसते ही मैं आश्चर्य से भर गई । रोहिणी ऐसे खड़ी हुई थी जैसे किसी का इंतजार कर रही हो । हमेशा की तरह बड़े लगन से किए हुए श्रृंगार से सुशोभित थी। साफ-सुथरा चेहरा । यह मेरे साथ पैदा हुई है सोच कर मुझे गर्व हो रहा था। हम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए। उसके हाथ को उत्सुकता से पकड़ कर मैंने पूछा "तुम भी इसकी मेंबर हो ?"

"नहीं, किसी सहेली ने बुलाया है । वह दिख नहीं रही । चलो तब तक कॉफी पीएं।", वह आत्मीयता से बोली .

"हां" कहकर उसके कंधे को पकड़ती हुई मैं चलने लगी। "दुरैई कैसा है ?"

"फाइन !" क्षण भर को मुझे देखकर वह पूछी, "यूनिवर्सिटी कब खुल रहा है ?"

"अगले महीने 10 तारीख को।"

"घर में बैठे-बैठे बोर नहीं होती ?"

"नहीं तो ! पढ़ना, लिखना... कब समय कट जाता है पता ही नहीं चलता। मालिनी अभी घर पर है।"

रेस्टोरेंट में कूपन लेकर बैठे तो रोहिणी बताने लगी, "मुझे भी शादी नहीं करना चाहिए थी, मैं भी फंस गई।"

मैं हंसी।

"तुमने अपनी मर्जी से ही तो शादी की थी रोहिणी। दुरैई बहुत अच्छा आदमी है। तुम्हें क्या कमी है ? वह तुम्हारी पूजा करता है।"

"वही तो, बहुत बोर है ! जीवन बहुत ही डल हो गया। उसे इंटरेस्टिंग ढंग से बात करना नहीं आता। नपुंसक है वह !... इसीलिए मुझे बच्चा भी नहीं हुआ।"

मुझे लगा जैसे किसी ने आसमान से नीचे फेंक दिया । उसकी बातों से नहीं। उसकी आंखों से फटाफट बहते आंसुओं की धारा देख कर।

कॉफी की ट्रे आता देख उसने स्वयं को संभालते हुए बड़े नाजुकता के साथ आंखों को पोंछ लिया। अपने झूठे चेहरे को ठीक कर लिया जैसे "सॉरी" कह रही हो. बोली, "मेरा दुख तुम्हारे और नलिनी के समझ में नहीं आएगा। लड़कियों की स्वतंत्रता के बारे में सिर्फ लेक्चर देना ही तुम लोगों को आता है। मेरे विषय की बात आती है तो तुम दुरैई के पक्ष में ही बोलोगी।”

मैंने अपनी हंसी को नियंत्रित किया.

"तुम्हारी स्वतंत्रता पर अभी क्या विपत्ति आ गई जो तुम ऐसा सोच रही हो?" मैं कॉफ़ी बनाने लगी थी .

"तुम नहीं समझोगी मालिनी !", उसने बड़ी तीव्रता से अपना सिर हिलाया ।

"कैसे बोलूं ? मुझे... कुछ एक्साइटमेंट चाहिए। दुरैई वह नहीं दे सकता। लगता है जैसे उससे बात करने के लिए भी कोई विषय ही नहीं है । इससे छुटकारा कैसे मिलेगा ? इससे कैसे बाहर निकलूं ? क्या कारण बताऊं ? कौन सा कोर्ट मुझे डायवर्स दिलवाएगा ?"

मैंने चकित होकर उसे देखा।

"यह क्या बेवकूफी है रोहिणी ? ‘सिनेमा के हीरो जैसा पुरुष होना चाहिए’ तुमने ही अपेक्षा की थी ना ? अपनी बुद्धि को किसी और बात में लगाओ, नौकरी पर जाओ ।"

"कौन सी नौकरी मिलेगी सिर्फ B.A. पढ़ी हुई को ?"

"फिर फ्रेंच या जर्मन भाषा सीखो।"

"यह सब मेरे बस की बात नहीं है।"

"फिर से गाना सीखो ! तुम्हें तो गाना पसंद है ना, सुंदरी बुआ जैसे ?"

अरे ! यह तो मैंने अपनी तरफ से मिला कर कह दिया ! मैंने अपने होंठों को दबा लिया।

रोहिणी ने तुरंत गर्दन ऊंची करके देखा।

"यू नो समथिंग ? सुंदरी बुआ की याद मुझे अक्सर आती है। जैसा उपहास उसका उड़ा शायद मेरे साथ भी वही होना है। आखिर में वह जैसे शून्य होकर खड़ी हो गई वैसे ही मुझे खड़ा होना पड़ेगा, ऐसा लगता है।"

"क्या बक रही है ? बके मत।" मैंने सख्ती से कहा । "बुआ और तेरे बीच कोई समानता नहीं है। तुमने बहुत कुछ कल्पना कर लिया है, जरुरत से ज्यादा सोच लिया है। खुशी को एक सामान की तरह ढूंढते मत फिरो। यदि कुछ नहीं है तो उसे ढूंढते हैं। जो हम ढूंढ रहे हैं वही सच है।"

"यह विचित्र बात है, विचित्र बातें मेरी समझ में नहीं आती !"

मैं निराश होकर चुप हो गई। उसने मुझे घूर कर देखा।

"यह तुम बोल रही हो कि तुम खुशी को नहीं ढूंढ रही हो ? "

"नहीं ! खुशी से यूनिवर्सिटी जाती हूं। खुशी से पुस्तकें पढ़ती हूं। खुशी से खाना बनाती हूं। ख़ुशी तो मेरे साथ है !" मैंने मुस्कुराकर कहा।

रोहिणी ने दयनीय दृष्टि से मुझे देखा।

"ऐसा है तो तुम अपने आप को धोखा दे रही हो, मालिनी !"

"खुशी एक भावना है, मैं ऐसा मानती हूं।"

कुछ देर वह चुप रही।

फिर बड़े ही सहज हो बोली "अमेरिका से कृष्णन आया हुआ है।"

थोड़ी देर के लिए मेरी बुद्धि ने काम करना ही बंद कर दिया। यह मेरे लिए अनअपेक्षित समाचार था। फिर मैंने अपने आप को संभाल कर सिर उठाकर रोहिणी को देखा तो उसकी नजरों में कशमकश दिखाई दी ।

"कैसे मालूम ?"

"उसने मुझे टेलीफोन किया था ।"

अंदर ही अंदर मुझे दर्द हुआ। उसने मुझे नहीं किया। अरे, मैं तो पागल हूं। किस मुंह से मुझे फोन करता ? मैंने अपनी आवाज में बेफिक्री घोलते हुए पूछा, "कब ?"

"कल शाम को। उसकी बातों में नरमी महसूस हो रही थी। फोन में आने वाली आवाज सहलाने वाली जैसे थी। तुम्हारे बारे में पूछ रहा था।"

मैं सीधे होकर बैठ गई ।

"उसके लिए ही मैं पिघल रही हूं, ऐसा तुमने बोल तो नहीं दिया ?"

नैपकिन से अपने होठों को नाजुक तरीके से पोंछ कर रोहिणी बोली, "इसे किसी को कहने की जरूरत नहीं। वह ऐसा सोचता होगा।"

"कैसे ?"

"उसे तुम्हें धोखा दे कर गए तीन साल हो गए। तुम किसी और से शादी क्यों न कर सकी ? अभी भी उसको भुला नहीं सकी, इसीलिए ही तो ?"

"किसी से भी शादी करना है, ऐसा मुझे नहीं लगता।"

"क्यों ?"

"पता नहीं, मेरा इंटरेस्ट खत्म हो गया लगता है ।"

"नॉनसेंस....! क्यों लगता है ऐसा ? उसने तो बिना कुछ सोचे समझे फटाक से किसी से शादी कर ली, तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए। अभी तुम्हारा यूँ त्याग की मूर्ति जैसे रहना कृष्णन के इगो को तृप्त ही करेगा।"

मैं हंसी।

"अभी तुम स्वयं ही तो परेशान हो रही थी कि अकेला रहना ही तुम्हारा मकसद है। शादी करना ही गलत है । और अब मुझे फंसने के लिए बोल रही हो ?" मैंने बात की दिशा को बदला।

अपनी स्थिति की याद आने पर रोहिणी का चेहरा फिर से उदास हो गया ।

"मैं तुम्हें पूछना भूल जाती हूं रोहिणी। तुम और दुरैई मेडिकल चेकअप क्यूँ नहीं करवा लेते अपना।"

"वह तो हमने करा लिया, डॉक्टर का कहना है कि सब नॉर्मल है ।"

"तुम्हें बच्चे की ज्यादा ही इच्छा हो तो उसका भी एक सरल-सा समाधान है, एक अनाथ बच्चे को गोद लेकर पाल सकते हो तुम लोग ।"

"मैं ऐसा नहीं करूंगी । मुझे अपना स्वयं का बच्चा चाहिए, नहीं तो नहीं।"

मैं हंसी। "अपने कोख से पैदा हुआ बच्चा ही पुत्र है और वही पुत्र तुम्हें स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ाएगा, ऐसी है तुम्हारी सोच ?"

"नहीं मालूम ! रोजाना बोर होती रहती हूं. उस बोरियत को बच्चा दूर करेगा। मजाक नहीं है, हमारी नानी-दादी, परदादी ने इसीलिए ही तो दस-बारह बच्चे पैदा किये होंगे, है न ?"

"तुम बहुत टेंशन के साथ सोने जाती हो मुझे लगता है।", कहते हुए मैं उठी । "तुम और दुरैई कुछ दिनों के लिए शिमला, मसूरी जा आओ।"

"वहां जाने से वह बदल जाएगा ?"

'तुम बदल जाओ ' मैं अपने-आप में बड़बड़ाई । फिर थोडा संभल कर मैंने कहा, “ उसके साथ तुम्हें थोड़ी करुणा के साथ पेश आना चाहिए।"

"उपदेश मत दो मालिनी, प्लीज !"

अध्याय 3

नानी होती तो वह 'कहीं जाकर मरो' श्राप देती। मैं मौन होकर उसे चुपचाप जाते हुए देखकर लाइब्रेरी के अंदर घुस गई।

"मुझे एक्साइटमेंट चाहिए। हुंह ! "

सुंदरी बुआ नाचने जाने के लिए सज-धज कर तैयार रहती । शायद इसीलिए, मुझे कई बार लगता है कि क्या उससे बदला लेने के लिए ही उसका आदमी मरा ? जब तक वे जिंदा रहे उसकी सुंदरता, उसकी योग्यता और उत्साह को वे दबा नहीं सके। उसे एक कोने में पटकने की एक मूर्खतापूर्ण सोच ने ही उन्हें मार डाला।

सुंदरी बुआ और रोहिणी में कोई साम्यता नहीं। मिलान करके देखें तो ? मेरा मन पुस्तक पढ़ने में लगाने की कोशिश कर रही हूँ। थोड़ी देर में रोहिणी के बारे में फिक्र कर मन फिर दुखी हो रहा है। अचानक एक बात ने मुझे हिला दिया। आज एक बहुत जरूरी सूचना कानों में पड़ी थी । वैसे भी वह याद बहुत मुख्य जगह न ले सका।

‘कृष्णन आया हुआ है !’

थोड़ी देर के लिए मन परेशान हुआ, घबराया। उस घबराहट को दबाकर ही रोहिणी से बात करना पड़ा था, मुझे अच्छी तरह से याद है। फिर यह याद कैसे पीछे सरक गई ! आधी रात में अचानक आंखें खुल जाया करती हैं । भूत जैसे घूमने वाले इस मन को दबाने का मैंने कितना प्रयास किया, विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया । मार्क एंटोनी सीजर ने शव को दफनाते समय जो बोला था, उससे मन में बहुत बड़ा और बलशाली सदमा लगा था। यह पक्का है सोच कर जिसका इंतजार था, वही मेरे घर के आगे से चला जाए तो कैसा दर्द उठेगा ! जैसे शरीर का एक अंग कट गया हो, जैसे पूरा जीवन ही लड़खड़ा गया हो । परंतु उस दुख को लेकर जश्न मनाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है । लड़कियां कष्ट पाने के लिए ही पैदा हुई हैं क्या ? हमेशा अपना दुखड़ा लेकर बैठने वाली, कमी को प्रदर्शन करने वाली ? उसको वर्णन करके नई बातें सुनाने से मुझे कोफ़्त होती है। रोने वाले लड़के को जब लंगड़ा कह कर चिढ़ाया जाता है तो रोने वाली लड़की भी तो लंगड़ी ही हुई ना ! रोना भी दिव्यांगता ही होती है। मैं रोने के लिए नहीं पैदा हुई ! लड़कियों का रोना स्वाभाविक है, यह बात एक कवच है। मुझे किसी कवच की, पर्दे की जरूरत नहीं। मेरे खुले चेहरे को देख कर किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं।

इन तीन सालों में कितनी ही बातों में मन निर्मल हो गया। प्रेम जो है वह सिर्फ भ्रम है, अब मेरी समझ में आ गया। प्रेम के वशीभूत होकर ही जाना सत्य क्या है। बस उचित समय ही अमृत्व को प्राप्त होता है। जोड़ियों का मिलना और समय के साथ बिछड़ना भी एक शाश्वत सत्य है. जो भी जम गया है वह उचित समय में पिघल जाएगा। कृष्णन और मैं एक दूसरे के लिए पैदा हुए हैं, इसी लालसा में रहते हुए समय निकल रहा था। फोन में उसकी आवाज सुनते ही चेहरे पर जो खुशी आती थी अवर्णनीय है । शरीर में नया खून दौड़ने लगता । कान लाल होकर गरम हो जाते। अब वह याद आए तो थोड़ा क्रोध भी आता है, मन खिन्न हो उठता है। निराशा होती है। इसीलिए तो नलिनी और सुभद्रा दोनों मुझे बोलती हैं कि 'तुम्हारे लिए एक दोस्त की जरूरत है । शादी करने की जरूरत नहीं है।'

इन लोगों की बातें नानी के और अम्मा के कानों में ना पड़े, मैं यही प्रार्थना करती हूं। प्रेम का मतलब एक नशा है। एक बेहोशी। यह जो गाजा-बाजा-शादी वगैरह है न, यह सब बड़े लोगों की तृप्ति के लिए है। नशे में डूबते समय इन सबका कोई स्थान नहीं है। मन और शरीर मिलते समय ही सचमुच में मुहूर्त की घड़ी होती है। इस दुनिया के सभी चराचर प्राणी इस सच्चाई को समझ गए हैं। मैं और कृष्णन, हम दोनों ने किसी उचित समय का इंतजार नहीं किया। वह एकदम प्राकृतिक, बिना रोक सकने वाला संगम था। हमारे इन नज़दीकियों के बारे में अम्मा को नहीं मालूम होगा, ऐसा नहीं हो सकता। परंतु, वह ऐसे रह रही थी जैसे उन्हें इसका ज्ञान ही नहीं हो । ‘मुझमें शादी के पहले जो अज्ञानता थी वही बेटी में होगी’ ऐसा एक पर्दा या मुखौटा उनके चेहरे पर था । कुछ समय इस पर्दे के हटते समय आंखों में एक संदेह नजर आता था। उनके शब्दों में बिना मतलब का एक चिड़चिड़ापन दिखाई देता था। लड़कियों की पूरी पवित्रता उनकी कोख तक सीमित है, ऐसे मानने वालों की तरह थी अम्मा । 'अगले दो महीनों में मालिनी की शादी है' ऐसा बोलकर वो अपने आप को समझा लेती थी। कहानी दूसरी दिशा में खत्म होते ही अम्मा को सबसे ज्यादा आघात लगा।

'अरे पापी ! वह तेरी जिंदगी को ही नाश करके चला गया। तू धोखा खा गई री !' कह कह कर बड़बड़ाती रहती। उसका बड़बड़ाना ही मेरे लिए उन दिनों बहुत भारी हो गया था। दुःख तो इस बात का है कि उस दबाव में वह स्वयं ही दब कर रह गई ।

कृष्णन ने मेरा उपभोग किया, इस बात का मुझे दुःख नहीं है, ऐसा मैं बिल्कुल नहीं कहूंगी। मगर उसकी दोस्ती को मैंने पूरी तरह से अनुभव किया, बोलने में मुझे कोई संकोच नहीं है। ‘मैंने धोखा नहीं खाया’ कहना बचकाना होगा। बिना किसी पूर्व सूचना के उसने हमारे रिश्ते को खत्म कर दिया। ऐसा करना एक विश्वासघात है. और यह आघात ही मुझे गुस्सा दिलाता है।उसके बारे में मैंने जो सोच रखा था, वह सब गलत साबित हुआ । यही बात मुझे हीन भावना से ग्रसित करती है। वैसे देखा जाए तो अपने मुंह पर कालिख पोतने वाला स्वयं वही था, मैं नहीं थी।

मुझमें आये इतने बड़े परिवर्तन को देख कर मुझे बेहद आश्चर्य होता है। मतलब मेरी नानी के घर में, जब मैं छोटी थी, उस समय जो मापदंड थे, उनको एक-एक कर दूर कर देने वाली यह मालिनी अलग है।

उस समय फ्रॉक पहनने वाला ही समय था। मोटी-मोटी दो चोटियां नीचे कमर तक लटकती थीं। उस समय मैं सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही थी। दोनों जांघों में बड़ा दर्द हुआ। पेट के निचले हिस्से में कुछ अजीब सी हरकत मालूम हुई। उस पर ध्यान ना देकर मैं खेलती रही।

"ए मालिनी, तुम्हारी फ्रॉक में यह दाग कैसा ?" एक सहेली बोली।

मैंने कूदना बंद कर पीछे फ्रॉक पर ध्यान दिया। अंदर जो चिपचिपाहट था उसे मैंने अभी महसूस किया। सब लोग मुझे आंखें फाड़ कर देख रहे हैं। सब आपस में फुसफुसा कर बोल रहे हैं।

"अरे, जाकर अपनी नानी को बता।"

मैं घबराहट में नानी के पास अंदर दौड़ी। खून जाने लगा तो कहीं ‘मैं मर जाऊंगी क्या’ इस खयाल ने मुझे डराया। नानी के सामने जाकर खड़े होने तक मन में दुख, आंखों से आंसू बहने लगे।

नानी, साल में बैठकर हाथ में भभूति लगाकर दीपक के लिए बाती बना रही थी ।

"अम्मा अम्मा ! " शब्द बाहर आने में लड़खड़ा रहे थे।

"क्या हुआ री ?"

"मुझे कुछ तो भी हो गया ! यह देखो, खून !"

मैंने पीछे मुड़कर अपनी फ्रॉक दिखाया। नानी के चेहरे पर चिंता झलक आई ।

"हे भगवान, इतनी जल्दी ?" और उन्होंने अपने माथे को हाथों में थाम लिया । मुझे बड़ी निराशा सी हुई। मैं तो यह उम्मीद कर रही थी घबराकर मेरे पास आएगी ।

"पास में मत आ। वहीँ दूर खड़ी रह !" वे जल्दी से बोली।

"क्यों अम्मा ?" मैं और घबरा गई ।

"ऐसा ही है। बेकार के प्रश्न मत पूछ। इसका नाम अस्पृश्य है। इसके लिए तीन दिन तुम्हें सबसे अलग बैठना पड़ेगा ।"

मेरे समझ में कुछ नहीं आया। मुझे रोना आ रहा था।

"डॉक्टर के पास जाना है क्या ?"

"नहीं। यह तो सभी औरतों को आता ही है। तुम 10 साल ही की उम्र में बड़ी औरत बन कर खड़ी हो गई ! हे भगवान।"

मुझे फिर से रोना फूट पड़ा। नानी की आंखों में भी आंसू आ गए। "मत रो।" मुझे समझाते हुए बोली।

"औरत का जन्म लिया है तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा, क्या कर सकते हैं ! अभी से तुम्हें संभाल के रखना पड़ेगा।“

मैं और अधिक घबराहट और परेशानी के साथ खड़ी रही।

"बाथरूम में जाकर एक तरफ खड़ी हो।"

बाथरूम में गरम पानी करने के चूल्हे के कारण चारों तरफ काला और अंधेरा था । मैं उसके अंदर गई, नानी ने जहाँ दिखाया उस स्थान पर खड़ी रही। कुछ विपरीत हो गया, यह सोच मेरे मन में बैठ गई । मेरी अम्मा भी इस समय दिल्ली में अप्पा के साथ है।

"मत रो बच्ची ।", नानी का स्वर दुःख से बोझिल था । अगले चार-पांच दिन कैसे संभल कर रहना चाहिए मुझे विस्तार से बताया।

"थोड़े दिन अब फ्रॉक मत पहनो, पावडे (घाघरा) ब्लाउज पहनो " वह बोली।

नानी जो कुछ बोल रही थी वह सब वैसे ही करने में मेरा पूरा ध्यान था। किसी को भी बता नहीं सकते, अब ऐसा एक रहस्य हम दोनों के बीच में था । वह मेरे लिए भ्रम पैदा कर रहा था।

नानी ने जैसा बोला वैसे ही मैंने ड्रेस चेंज कर लिया । अब जा कर मुझमें थोड़ी हिम्मत आई।

"किसी के ऊपर से ना लांघते हुए, किसी को छुए बिना, मैं जो जगह बता रही हूं जाकर चुपचाप वहां बैठ जाओ !", नानी बोली।

"आधे खेल में से मैं आ गई हूं अम्मा।"

"अब खेलने जा सकती है क्या ? बहुत अच्छा है चुपचाप बैठ जा।"

नानी ने कमरे के एक कोने को दिखाया। एक रंगी हुई दरी और एक तकिया मुझे लाकर दे दिया।

"मुझे होमवर्क करना है।"

अध्याय 4

"सब आराम से कर लेंगे, कोई जल्दी नहीं है । राज खुल कर सबके सामने आ जाएगा। उसको किताब सब निकाल कर देने को बोलना। तीन दिन तक स्कूल नहीं जा सकोगी।“

"क्यों?"

"जो बोला है उसे मानो मालिनी", अम्मा बड़े बेमन से बोली। फिर अड़ोस-पड़ोस में देखकर धीमी आवाज में बोली; "यदि घाघरे में दाग लग जाए तो ? सब को पता नहीं चलना चाहिए ! वह शर्म की बात होती है!"

"यह क्यों ऐसे आया ?" मैं आश्चर्यचकित थी ।

"यह सभी लड़कियों को आता है री मेरी मां। तुम्हें कुछ जल्दी आ गया है।"

"सिर्फ हमें क्यों आता है ?"

"वही बोला तो था, अपनी तकदीर खोटी है।"

मैंने महसूस किया कि एक गंदा सा पर्दा मेरे चारों ओर तना हुआ है ।

राज मेरे से 2 साल बड़ा था। मुझे कोने में देखकर -

"यहां क्यों बैठी है रे ?" आश्चर्य से पूछा।

"पास में आ रे,...छूना नहीं।" संकोच से बोली।

वह शरारत से मुझे छूने के लिए पास आता है।

"उसके पास मत जा रे !" चिल्लाते हुए नानी अंदर से आई। नानी के वेग और फुर्ती ने मुझे भीतर तक डरा दिया। मुझे क्या हो गया है ?

"वह अस्पृश्य है !"

"ऐसा बोले तो ?"

"तेरा सर ! एक आदमी के बच्चे जैसे दूर रह। औरतों की बातों में बीच में मत बोल।"

राज मुझे व्यंग से देखकर चला जाता है। अचानक मैं दूसरों से अलग हो गई, मुझे इस बात का दुख हुआ।

उस दिन जो मेरे अंदर दुख और भय समाया वह कई दिनों तक रहा। याद में, सोच में, कार्य में लगातार बना रहा। लड़कियां एक पजल जैसे ना समझ में आने वाला एक रहस्य अपने अंदर समाए हुए हैं . इसी रहस्य ने मुझे दूसरों से अलग किया। यह रक्षा किये जाने वाली एक वस्तु है जिसे दूसरे को सौंपना है। इसका दुरुपयोग करने का हक मुझे नहीं है।

घर में पहुंचने तक एक युग की परिक्रमा करके अंदर आने जैसी थकावट... बुजुर्गियत का एहसास हुआ।

नलिनी किताबों के एक ढेर के बीच बैठी हुई थी। मैंने अपने लिए पानी लेकर बर्फ डाला. पीती हुई उसके पास जा बैठी।

"लाइब्रेरी में आज मैंने रोहिणी को देखा", मैंने धीरे से नलिनी को बताया ।

"रोहिणी लाइब्रेरी भी जाती है क्या.... वेरी गुड !" हाथ के किताब पर से आँखें उठा कर नलिनी हंसी। "कैसी है वह?"

"हमेशा की तरह स्लिम-ट्रीम दिख रही थी। परंतु जीवन से विरक्त होने की बात कह रही थी" मैं अपने-आप में खोई बोल रही थी ।

"आलस और स्वार्थीपन ही उसकी बीमारी है", नलिनी फिर से हंस दी, "उसका पति इतना अच्छा है कि बड़बड़ करने के लिए भी उसके पास कोई कारण नहीं है।”

"यही तो उसकी प्रॉब्लम है कि वह बहुत अच्छा आदमी है ।"

"सुंदरी बुआ के पति जैसा होना चाहिए था उसे !"

मैं एकदम से चौंक गई। यह कैसे हम तीनों के मन में सुंदरी बुआ घूम फिर कर आ जाती है?

"एक मजाक की बात बताऊँ तुम्हें नलिनी ? सुंदरी बुआ की याद मुझे भी आई। रोहिणी को एक्साइटमेंट चाहिए। सुंदरी बुआ भी एक्साइटमेंट ही ढूंढती हुई दौड़ती थी। दुरई अपनी जेब में से निकाल कर उसे एक्साइटमेंट दे, यह उसकी उम्मीद है।"

"समाज के लिए उसे कुछ सेवा करने को बोलो। नहीं तो आगे पढ़ने को बोलो।"

"वह सब काम उसके बस का नहीं है। गाना सीखने के लिए बोला मैंने ।"

"हां, यही सीखने दो उसे ।"

"मन को कहीं दूसरी तरफ मोड़ कर खुश रहने का दिखावा करने की इच्छा मेरी नहीं है । मैं ऐसा दिखावा करती हूं ?"

नलिनी एकदम से चुप हो गई। मैं खाली टंबलर अंदर रख कर आ गई।

"तुम दिखावा करती हो ऐसा मैं नहीं सोचती; परंतु कुछ भार जरुर ढो रही हो ऐसा लगता है।"

सुन कर मेरे आश्चर्य को छुपाते हुए मैं हंसी।

"भार?”, मैं फिर हंसी। “पहले से मेरा वेट बढ़ गया है। यही उसका कारण है।"

"मैं तो सीरियसली कह रही हूं दीदी। तुम्हें एक दोस्त की सख्त जरूरत है।"

"दोस्त कोई दुकान में मिलने वाली वस्तु है जो ऐसे बार-बार बोलती हो।"

"कृष्णन एक मेंटल ब्लॉक उत्पन्न करके चला गया लगता है।"

"बकवास ! उसको मैं कब का भूल गई। क्यों जरुरी है एक पुरुष की दोस्ती का होना ?"

"होना चाहिए मैं नहीं कह रही। परंतु, उस रास्कल के लिए तुमको सन्यासी का जीवन नहीं जीना चाहिए।"

"मैं उस हद तक बेवकूफ नहीं हूं नलिनी !"

सभी के द्वारा एक ही राग बार-बार अलापे जाने से मुझे चिड़चिड़ाहट होती है। मुझे लगता है कि मेरी दशा के लिए ये सब लोग एक तरह से अपने-आप को दोषी मानते हैं । यही बात मेरे दिल पर एक बोझ बन कर मुझे दबाती है। कई बार मुझे आवेश आता है कि ‘मुझे अकेला छोड़ दो’ ऐसा जोरों से चिल्लाऊं । हो न हो मेरी मां को हार्ट अटैक इसी वजह से आया हो ! इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। 21वीं सदी शुरू होने को है, इस युग की महिला होते हुए भी नलिनी में इस बात का होना मुझे विचित्र लगता है। नलिनी से विवाद को बढ़ाना ना चाह कर मैं उठ गई। पर नलिनी ने नहीं छोड़ा।

"मुझे इसलिए संदेह हो रहा है क्योंकि तुम एक साधारण संसार की लड़की हो। कृष्णन के लिए जो गुस्सा होना चाहिए, वह भी दिखाई नहीं देता।"

"मैं साधारण हूं या कमतर मगर मैंने अपने-आप को ही जीत लिया. बिलकुल बड़ी मां नारायणी जैसे", मैंने जोर देकर कहा । चप्पल पहनकर "बाहर थोड़ा घूम कर आती हूं !" कह कर उसके जवाब का इंतजार किये बिना मैं बाहर निकल गई।

रात 7:30 बजे हैं. पूरी तरह अंधेरा नहीं हुआ है । हवा में अभी तक गर्मी है। परंतु मुझे एकांत चाहिए था। एकांत जो मुझ में से निकल गया है। इन महीनों में शाम को भी 7:30 बजे तक दिल्ली की गलियां खाली सी हो जाती हैं जिससे पैदल चलने वालों के लिए आराम हो जाता है। चारों तरफ देखने का मन नहीं किया । नारायणी बड़ी मां की याद आई। कितनी तरह की महिलाएं हैं मेरे परिवार में, मुझे आश्चर्य होता है। मेरी स्मृति में परदादी-नानी के समय से अभी तक में मेरी भावनाएं, मेरे सपने, मेरे विचार... सब लड़कियां मिलकर नर्सरी राइम के जैसे हाथ मिला कर 'रिंग-ए-रिंग-अ रोजेज ' सब लोग नाच सकते हैं, नाचे हैं । तभी तक यह नाटक है। फिर, 'हाईशा पुईशा ऑल फॉल डाउन' यही सब जीवन है। इसमें नाच कर गिरने वाले ही ज्यादातर हैं। जीत की भावना रखने वाले कुछ ही लोग हैं । ‘इसका विरोध करके फायदा नहीं है’ सोचने वाले बहुत लोग हैं । इस भीड़ से एकदम अलग दिखने वाली नारायणी बड़ी मां है। एक तपस्वी हैं। सूली पर लटकाए जाने के बाद भी 'हे भगवान ! इन लोगों को क्षमा कर दो; ये नादान है' ऐसे सोच कर हंसने वाली है वह । उसके बारे में याद करते समय मुझे हंसी आती है। मेरी समझ में इस हंसी की भी एक व्याख्या है । मेरे पिताजी की यह बड़ी मां के पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। इसी कारण ही नानी के घर में ही रहती थी । यह बात मुझे बड़ी होने के बाद ही मालूम हुआ।

'नारायणी बड़ी मां यहां क्यों हैं ?' ऐसा प्रश्न पूछने की जरूरत किसी को भी नहीं होती। क्योंकि वह घर की एक मुख्य सदस्य थी। गोरी-चिट्टी, दुबली-पतली देह की वह। सिर हमेशा ढके रहती । कोसा सिल्क की साड़ी (विधवाओं का पहनावा ) पहन हमेशा मुस्कुराती और मजाक करती रहती।

'ऐसी क्या बात है हंसने की ?’ घर पर आने वाली सिल्क की रंग बिरंगी साड़ीयां पहनकर माथे पर बिंदिया, शीशफूल लगाने वाली औरतें चिड़चिड़ा कर बोलती। यह बात मुझे अच्छी तरह से ध्यान है। परंतु हम सबके लिए नारायणी बड़ी मां ही हमारी परम प्रिय सहेली थी। विशेष त्योहार के दिनों में बड़े और पुए बनते समय चूल्हे के पास जाकर हम हाथ फैलाते।

'भोग लगने के पहले नहीं दे सकते।' बाकी औरतें ऐसा बक-बक करती। कहती 'भोग लगने के पहले खाओगे तो भगवान आंखें फोड़ देगा।' यदि नारायणी बड़ी मां बना रही होती तो हमारे लिए बहुत अच्छा रहता। हम अपने छोटे-छोटे, नरम-नरम हाथों को फैलाते –

"तुम्हारे लिए ही है।" कहकर हंसते-हंसते सबको दोनों हाथों में देती। उनके और हमारे बीच यह एक बहुत बड़ा रहस्य था । हम वडा और पुए लेकर दबे पाँव भाग जाते।

"भगवान आंखें तो नहीं फोड़ेगा ?"

जब 8 साल की बच्ची, मैं, उससे पूछती तो वह जिन निगाहों से मुझे देखती वह आज भी मुझे याद है।

"भगवान आंखें नहीं फोड़ते बच्चे.....”

"फिर नानी बोलती है ना ?"

"हां, वह बिना समझे बोलती है।"

वड़ों को तेल में पलटते हुए हंसते हुए बड़ी मां बोलती।

"कौन आंखें फ़ोड़ता है उसको नहीं पता।"

"कौन?"

जल्दी से बड़ी मां मुझे देख कर नकली गुस्सा दिखाती।

"यह ले, तुझे जो चाहिए वह मिल गया ना ? अब भाग जा !"

हम लोगों को मेहंदी लगाना, चोटी में फूल लगाकर तैयार करना आदि में बड़ी मां को बिल्कुल थकान नहीं होती। कितना हंसती! कितनी मस्ती ! बच्चों संग हंसी-मजाक... कभी अचानक जो उनके सिर का पल्ला सरक जाता तो छोटे-छोटे काले-काले बाल झांकते। कभी-कभी एकदम चिकनी खोपड़ी उसमें थोड़ा चंदन लगाया हुआ दिखता।

अध्याय 5

"आप सिर क्यों मुंडाती हो ? क्यों रंगीन साड़ी नहीं पहनती हो ? आपने माथे पर बिंदी क्यों नहीं लगाई ? गहने क्यों नहीं पहनती हो ? आप थाली में क्यों नहीं खाती हो ?"

एक दिन हमारे पूछने पर नानी मां ने बहुत पिटाई की ।

"छोटी बच्ची हो तो बच्ची जैसे ही रहो, ज्यादा बड़ी बनने की कोशिश मत करो !"

"बच्चों को क्या पता है ? उनको क्यों मारती हो ?"

उस रात बड़ी मां का मेरे पास आना, मुझे चिपका कर लेटना मुझे याद आ रहा है। चंद्रमा की चांदनी की रोशनी में जो असाधारण चमक मुझे उनकी आंखों में दिखाई दी, बहुत दिनों बाद उनके मरने पर मुझे समझ में आया।

बड़ी मां की 8 साल की उम्र में शादी हुई थी। 14 साल की उम्र में जब वे ‘बड़ी’ हुई, शुभ मुहूर्त देखकर उनका गौणा का मुहूर्त देख सब तैयारियां होने लगी। यहां पर मिठाइयां वगैरह बननी शुरू हो गई थी. उसी समय की दर्दनाक समाचार प्राप्त हुआ. दामाद कावेरी में जाते समय डूब गए और उनकी मृत्यु हो गई। हाहाकार मच गया । सब लोग आठ –आठ आँसू रोये । अपनी छाती, अपना माथा पीट-पीटकर रोए। इस श्रीहीन लड़की के दुर्भाग्य पर सबने दुख जताया।

"इस लड़की ही की कुंडली में पति की मृत्यु लिखी थी !" लोगों ने कैसी-कैसी बातें बनाई ! उसी समय उसका सिर मुंडवा दिया गया । उसके गहने उतरवा लिए गए, उससे छीन लिए गए । आधे घंटे पहले जो श्रृंगार युक्त हो लाल कांजीवरम में सजी-धजी बैठी थी, उसे विधवा कह कोसा सिल्क ऑफ-व्हाइट साड़ी पहना दिया गया।

कई बार जब नानी इस दुर्घटना की बातें विस्तार से बताती तो मैं कितना परेशान हो जाती थी ।

"यह सब देख कर नानी आप से कैसे चुप रहा गया ?"

"उस समय सब ऐसा ही होता था ।", नानी ने ऐसे कहा जैसे यह सब बेहद साधारण बात हो ।

"कोई मुंह खोल नहीं सकता था । मुंह खोलने का विचार भी नहीं आता था जहन में । बड़ों से डरने का समय था वह ! हमारी तकदीर ऐसी ही है यही सोच हम चुप रहते।"

“14 साल की उम्र में ? यह कैसे संभव है ?”

"रही थी ना ! एक दिन भी परेशान हुई थी क्या ? बिना दुखी हुए वह कितनी ही स्त्रियों की चोटी बनाती, फूल लगा कर सजाती । स्वयं उनके कितने लंबे बाल थे, पता है?"

मेरी आंखों में पानी भर आता। इन सब बातों को कैसे उन्होंने ज़ब्त किया ? अपनी जवानी को उन्होंने कैसे जलाया ?

"एक दिन भी किसी की भी गलती पर उसने मुंह खोला क्या ? कभी कोई शिकायत नहीं की ।"

एक दिन की बात है. घर में सबके साथ बैठ जब नानी यह सब बता रही थी तो मुझे बड़ी मां की हंसी याद आ रही थी।

'भगवान आंख नहीं फोड़ते। आँख कौन फोड़ता है उसको नहीं पता।'

मैं अचानक बोल पड़ी, "बड़ी मां इसीलिए तो हमेशा हंसती रहती थी।"

"क्यों ?"

"अपने आसपास रहने वाले लोग मूर्ख हैं सोच कर।"

नानी मुझे व्यंग से देखकर हंसती है।

"मुझे नहीं पता।"

अब सोच कर देखने पर लगता है कि उनके अपने साथ जो कुछ भी अन्याय हुआ उसका कारण सिर्फ 'मेरी तकदीर’ ही नहीं, कुछ और भी कारण हैं, यह बात बड़ी मां ने महसूस किया होगा। फिर कैसे ऐसे हंसती थी ? कहां से प्रेम का भंडार फूटता था ? गुस्सा क्यों नहीं आया ? अहंकार क्यों नहीं उमड़ा ? यौवन की इच्छाएं, लालसाएं, वक्र बुद्धि... कुछ नहीं ? जिस ग्रह पर सिगमंड फ्रायड पैदा हुए उस भूमि पर निश्चय ही इस तरह की प्रकृति वाले लोग नहीं रह सकते।

क्रॉस पर लटके येशु के चेहरे पर वेदना दिखाई देती है। नारायणी बड़ी मां के चेहरे पर हमेशा हंसी रहती थी - आखिर में मैं ही जीती, अलंबंगला जैसे। बड़ी मां अभी होती जर्मन कंरीयरै को खा गई होती- फेमिनिज्म के एक नए कोण को प्रदर्शित की होती । सन्यासी कर्म व योग दिखा दी होती -लिप्यते नसपापे गण पदम पत्र मीमांसा-

बड़ी मां जैसी मेरी दृष्टि है, ऐसा मैं नहीं कह सकती। अभी भी औरत और आदमी एक दुसरे का हाथ पकड़ कर जा रहे होते हैं तो मेरे मन में एकदम कुछ भावनाएं जागृत हो जाती हैं। एक जलन की भावना उत्पन्न होकर मुझे परेशान करती है। मैं बड़ी मां के पैर की धूल के भी बराबर नहीं हूं।

परंतु मैं यीशु जैसे रहने की इच्छा नहीं रखती हूँ । बिना कारण के एक भार को उठाने के लिए मैं तैयार नहीं।

रात को खाना खाते समय जैसे नलिनी को कुछ याद आया. "रोहिणी ने और क्या कहा?"

मैं सांभर से कढ़ी पत्ते को दूर करते हुए बोली। "कृष्णन आया हुआ है।"

आंखें फाड़कर नलिनी ने मुझे देखा और सिटी बजाई।

"उसको किसने बताया ?"

"उसने उसको फोन किया।"

फिर से आंखें फाड़ कर देखती हुई सिटी बजाई। "क्या बोला ?"

"मैंने नहीं पूछा।" आवाज में पर्याप्त उदासीनता घोलते हुए मैंने कहा।

"यह ठीक है।" धीमी आवाज में बोली। "अब कुछ भी बोले तो क्या है ?"

अचानक मैं अपनी यादों में चली गई। उसकी बातें, मुझे आकर्षित करने वाली उसकी नरमी। पूर्ण खुशी या संतोष यही है । मुझे अभी ही समझ में आया कि मुझे जो बेहोशी छाई थी-पूर्णता को प्राप्त होना यानी संतोष जैसी ही एक भावना होती है यह ।

"नारायणी बड़ी मां और तुम में क्या संबंध है?", अचानक नलिनी बोली।

"कोई संबंध नहीं है।“, मेरी आवाज कमजोर पड़ गई थी । "बड़ी मां संसार को देखकर जैसे हंसती थी, मैं भी वैसे ही हंसने की आदत डालूंगी, बस सिर्फ यही बात।"

"बड़ी मां ने जो पर्दा डाल रखा था वह...!" नलिनी जैसे एक क्षण को चुप हो आगे जोड़ा, " वह बड़ी होशियारी वाला पर्दा था । हंसती हुई हमेशा नहीं रहती तो जॉइंट फैमिली में औरतों के बीच में ही संभालना मुश्किल हो जाता। बड़ी मां की इच्छाएं नहीं रही होगी, ऐसा क्यों सोचती हो ?"

"ऐसा तो नहीं है कि इच्छाएं नहीं रही होगी । परंतु वह हमेशा ही एक असाधारण महिला थी।" धीरे से मैं बोली। "वह व्यव्हार सिर्फ होशियारी नहीं थी । इट वाज समथिंग मोर देन दैट, वह एक साधना थी, उपासना थी ।"

उस रात जब बड़ी मां गीली आंखों से मुझे अपने से लिपटा कर सोई थी, मुझे आज भी याद है। किसी को नहीं पता उस बड़ी मां का।

मुझे अचानक से लगता है कि अन्य लड़कियों की नजर में जो संसार में जीवन हैं - फूल और बिंदी के साथ बच्चों के साथ जीना, वास्तव में जीवन वही तो नहीं है, कुछ और भी है । बड़ी मां को ऐसा कोई दुख नहीं था। उसको तो इस बात का दुःख था कि ‘पुरुषों के सुख के लिए ही लड़की है’ का सिद्धांत ही उसके साथ अन्याय होने का कारण था । इसीलिए उसके चेहरे पर हंसी- ‘अरे बेवकूफ लोग’ ऐसी हंसी थी ! 'भगवान आंखें फोड़ देंगे ' ? कितने दिन तुम लड़कियों को इस तरह से धोखा दोगे, अरे मूर्खों’ - यह वही हंसी थी।

मुझे में और बड़ी मां में कोई संबंध नहीं है, ठीक है। परंतु लड़की का जन्म है, यही दोनों का संबंध है। उनकी भावनाओं को समाज तुच्छ समझा । मेरी भावनाओं को कृष्णन ने तुच्छ समझा। मेरी हंसी बड़ी मां की हंसी जैसी ही है । जैसे कहना चाहते हैं, ‘तुम मेरा अपमान नहीं कर सकते’ । अपनी करनी के कारण तुम ही तुच्छ साबित हुए, ऐसी एक व्यंगभरी हंसी।

पूरी रात मैं पलट-पलट कर सोने की असफल कोशिश करती रही. कंन्नागी के वेश में नारायणी बड़ी माँ भयंकर रूप से हंसी। पूरा मदुरई ही जला। देवी कन्नागी की एक कहानी है. उन्होंने एक धनि व्यापारी के बेटे कोवलन से विवाह किया था . कुछ समय पश्चात कोवलन की एक नर्तकी माधवी से मुलाकात हुई और वह अपनी पत्नी भूल कर उस नर्तकी पर अपना सब धन-संपत्ति नौछावर कर दिया. आखिरी में कन्नागी की एक पायल बेचने जब मदुरै गया तो चोरी के इलज़ाम में राजा के सैनिकों द्वारा मौत की सजा पाई. जब यह खबर कन्नागी ने सुनी तो व्यथित हो दूसरे पांव की पायल ले दरबार पहुंची. अपना सब कुछ ख़त्म पा कन्नागी ने रानी को श्राप दिया कि उसका साम्राज्य ख़ाक हो जायेगा. कहा जाता है कि सच्ची और पवित्र कन्नागी के गुस्से से मदुरै शहर धू-धू हो जल उठा. मैं भी गुस्से से तमतमा रही थी...दौड़ कर अपने कृष्ण में समा गई !

सुबह जब लक्ष्मी ने आकर घंटी बजाई, उसी समय मेरी आंखें खुली।

हमेशा की तरह कॉफी तैयार कर मैं पेपर पढ़ने लगी और यंत्रवत खाना बनाना शुरू किया ही था कि नलिनी उठकर आई।

"क्या खाना बना रही हो दीदी ?" वह उत्सुकता से बोली ।

"क्या बनाएं, बोलो!"

"कुछ भी मत बनाओ।"

सब्जी काट रही लक्ष्मी की तरफ देखि तो वह भी सिर उठाकर देखती हुई हंसी।

"खाना नहीं बनाए तो ?"

"चाणक्य में 11:00 बजे के शो देखकर वहां से निर्लोंस में खाना खाएंगे।"

"बहुत बढ़िया" मैंने लक्ष्मी की तरफ ध्यान न देकर कहा, "आज मेरा भी खाना बनाने का मूड नहीं है।"

"फिर सब्जी का क्या करूं अम्मा ?", लक्ष्मी ने पूछा।

"काट के रख दो शाम को काम में ले लूंगी।'

‘कैसी लड़कियां हैं ये भी’ लक्ष्मी ऐसे सोचती होगी सोच कर मुझे हंसी आई। ‘बिना लगाम की घोड़ियां हैं’ सोच रही होगी। लगाम जरूरी है ऐसे सोचने वाली वर्ग की है वह।

अध्याय 6

टिकट लेकर जब हम थिएटर में घुसे तो देखा पिक्चर शुरू होने में अभी देरी थी। बाहर, यहाँ-वहां युवक और युवतियां झुण्ड बनाकर खड़े बातों में मशगुल थे. किसी ने नलिनी को देखकर हाथ हिलाया।

"अभी आती हूं दीदी, तुम अंदर जाकर बैठो।" कहकर उसने एक टिकट मुझे पकड़ा कर ये गई वो गई ।

मैं थिएटर के अंदर चली गई। अपनी सीट ढूंढ कर बैठते समय मेरे पैर ठिठक गए । मेरी अगली सीट पर से कृष्णन की धीमी आवाज़ मेरे कानों से टकराई, "हेलो मालिनी" ! मेरा शरीर जैसे लोहा बनकर कस गया।

खून मेरे चेहरे के रोम-रोम तक दौड़ आया जो अँधेरे में मैंने ही महसूस किया। मेरी धड़कन तेज हो गई । ‘क्या है यह सब ? कहीं मेरे साथ कोई साजिश तो नहीं कर रहा ?’ उस हल्की रोशनी में भी मेरी आंखें उसके पास बैठी हुई उसकी पत्नी को ढूंढ़ी रही थी । उसके पास एक आदमी ही बैठा था।

कृष्णन का चेहरा भी सफेद हो गया था मुझे देख कर और पूछते हुए उसके चेहरे पर एक संकोच की लहर दौड़ गई थी । मेरी आशंकाएं धूमिल हो गईं ।

'ओ हलो !" मैंने अपने-आपको संभालते हुए मुस्कुराई, “'कब आए?"

"आए एक हफ्ता हो गया, बैठो ना", थिएटर के मालिक जैसे बोला। "अकेली आई हो ?"

"नहीं नलिनी भी आई है।'

उसने पास बैठे अपने दोस्त से मेरा परिचय कराया।

"मीट माय फ्रेंड मालिनी। एंड दिस इज माय बॉस इन न्यू जर्सी।"

उसका इस तरीके से मेरा परिचय देने पर मुझे एक जलन की अनुभूति हुई।

मेरे बैठते ही "सॉरी मालिनी" बोला।

"किसलिए?"

"मैंने आते ही तुम्हें इन्फॉर्म नहीं किया।"

मैं जानबूझकर हंसी। अरे, ‘अल्प बुद्धि' नारायणी बड़ी मां के जैसी हंसी ।

"उससे क्या ? मुझसे बढ़कर और काम तुम्हारे लिए नहीं है क्या?"

वह परेशान हो इधर-उधर देखने लगा।

"तुम्हारा नंबर मेरे पास नहीं था।" धीमी आवाज में बोला।

'प्लीज कृष्णन ! मैंने कोई सफाई तो मांगी नहीं । तुम बताओ कैसे हो ? तुम्हारी पत्नी कैसी है?"

"फाइन !", उसकी उदिग्नता कम हो गई थी । मुझे जितना याद था पहले से अब ज्यादा स्मार्ट है । बातों में ज्यादा पॉलिश था।

"सिनेमा के लिए नहीं आई ?"

"उसको पिक्चर देखने में इंटरेस्ट नहीं है।", इसके आगे क्या बात करूं मेरी समझ में नहीं आया।

अब उसकी दुनिया दूसरी है, अब तक यह ख़याल आ गया था मुझे।

"तुम कैसी हो मालिनी ?" इसका मतलब यह पहले ही से सोची समझी साजिशें नहीं हैं । मेरा हाथ को उसने पहले के ख्याल में पकड़ा अथवा अमेरिकन व्यवहार के कारण मुझे पता नहीं। दिल में हल्का धक्का-सा जरुर लगा।

अचानक बिना किसी वजह के नानी याद आई। ‘किसी को भी छू कर बात करना गलत आदत है।‘ वह कहती। ‘स्पर्श में बहुत शक्ति होती है। आचार-विचार, स्पर्श, अस्पृश्य यह सब बड़े लोगों ने इसीलिए तो रखा है!’, नानी को फ्रायड के बारे में जानने की जरूरत नहीं। उनके बुजुर्गों ने पीढ़ियों से जो कहा है वह फ्रायड को भी हरा देगा । मैंने धीरे से अपने हाथ को खींच लिया।

"मैं अच्छी हूं, देखो"। कहकर में हंसी। "तुमने मुझे देखा उससे उम्र ज्यादा हो गई बस इतना ही...."

"उम्र हो गई ?"आंखें फाड़ कर बोला। "उम्र कम हो गई ऐसा लग रहा !"

"मस्का मत लगा ",मैंने उससे अपनी निगाहों को हटाते हुए कहा । "तीन साल के तीन कैलेंडरों को रख रखा है। पहले की नायिकाएं दीवार पर नाखून से दिनों के हिसाब से निशान बना कर रखती थी। उसके बदले मैंने कैलेंडर को गोले बनाकर रखा है......"

कृष्णन ने बहुत धीरे से मेरे कान के पास बोला, "तुम्हें मुझ पर कितना गुस्सा है मुझे मालूम है।"

"मुझे गुस्सा बिल्कुल नहीं है कृष्णन।"

"मैं विश्वास नहीं करता !"

"तुम विश्वास नहीं करते तो वह मेरी समस्या नहीं है ।"

"दुख ?"

"प्लीज कृष्णन। मेरी बात करने की इच्छा नहीं है।"

"सॉरी। मैंने क्यों नहीं बताया ! "

हॉल में पूर्णतया अँधेरा हो गया और इश्तेहार शुरू हो गए । फिल्म शुरू होते समय टॉर्च की रोशनी में नलिनी जल्दी-जल्दी दो पॉपकॉर्न के पैकेट लेकर आकर बैठी।

कृष्णन ने आगे को झुककर 'हाय नलिनी' बोला।

नलिनी की घबराहट उसके चेहरे पर दिखाई दी। जवाबी 'हाय' कहकर उसने संदेह से मुझे देखा। मैंने सिर हिलाकर होंठ बिचका दिए ।

यह देख नलिनी व्यंग से हंसी। "सो प्रकृति खेल रही है, देखा ? नहीं तो इतनी भीड़ में वह आया है हमें पता नहीं चलता।“

“उससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता।" मैंने तपाक से कहा ।

फिल्म शुरू हो गई।

कृष्णन झुक कर मेरे सामने से अपने हाथ को बढ़ाकर नलिनी के हाथ को साधारण ढंग से छूकर बोला, "फिर बात करेंगे।"

नलिनी चेहरे को गंभीर बनाकर पीछे की तरफ सहारा लेकर बैठ गई। थोड़ी देर के मौन के बाद फिर मुझसे धीरे से बोली:

"तुमसे इसके पास कैसे बैठा जा रहा है ?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। उसका प्रश्न मुझे किसी छोटे बच्चे के प्रश्न जैसा लगा। मुझे आखिर किस से डर कर भागना है ? उलटे कृष्णन को ही संकोच होना चाहिए। शुरू में मेरा जो झुकाव था वह अब कम हो गया है, ऐसा लगा मुझे ।

यही बात तो आपत्तिजनक है। मुझे ऐसे छूएगा ? मुझे तनाव महसूस हुआ । पहले छूने की बात अलग थी, एक खेल था । एक आनंद की अनुभूति। एक प्रेम का संकेत। अब उसका स्पर्श मुझे अपमानजनक लगता है। मेरी पवित्रता खत्म हो जाएगी ऐसा एक रोष उत्पन्न हुआ। मैं पवित्र हूं बोलने से ये हंसेगा। मुझे उसके बारे में कोई परवाह नहीं।

पर्दे पर कौन सी कहानी चल रही है मुझे समझ में नहीं आ रही । मेरे मन में एक अलग ही उधेड़बुन चल रही है। मैंने कनखियों से देखा, कृष्णन का चेहरा मेरे पास ही दिखाई दे रहा था।

"कल तुम फ्री हो क्या ?" वह बोला।

"फ्री हूं, क्यों ?"

"मैं घर आऊंगा।"

'नहीं' बोलते-बोलते शब्द को निगल कर "वाइफ को भी लेकर आना। " जवाब में कहा ।

"ओ .के." वह बोला मगर उसकी निगाहें पर्दे पर थीं । इस बात से जाने मैंने क्यूँ अंदाजा लगाया कि वह नहीं लेकर आएगा। मेरे मन में एक उत्सुकता जगी, इसकी पत्नी किस तरह की होगी । मैंने पर्दे पर अपना ध्यान लगाने की कोशिश की। उसकी जांघ मेरी जांघ के ऊपर थोड़ी सी छूती महसूस किया मैंने । मैं जल्दी से सरक गई। इसके अंदर जो अहंकार है वह इसकी परवरिश की बदौलत है। कहीं जाने की जगह न होने के कारण आधा तो लड़कियों के कारण है बाकी इसने स्वयं बटोर लिया। तभी अच्छी बात यह हुई कि इंटरवल हो गया । अपनी चेयर से जल्दी से उठते हुए मैंने नलिनी से कहा, "टॉयलेट चलें" । वह तुरंत उठ गई। मैंने कृष्णन की तरफ बिल्कुल नहीं देखा।

बाहर आते ही "तुम्हें पिक्चर देखना है ?" नलिनी से बोली।

"नहीं देखना।" मुस्कुराकर जवाब दिया उसने । दोनों जने मौन ही मिलन रेस्टोरेंट में खाना खाने के लिए कूपन लेकर बैठ गए। मैं अपने अंदर डूबी सी किन्हीं योजनाओं में फंसी थी। अचानक लगा जैसे नलिनी मुझसे कुछ कह रही है, "उसे तुम्हें भूलना चाहिए।"

मैं संभल कर हंसी।

"भूल तो गई, मगर जानबूझ कर अचानक इतना पास आए तो आघात नहीं होगा क्या ?"

"होगा।" बड़ी आत्म्तियता से नलिनी ने कहा । "तभी तो कहती हूँ कि वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके बारे में ज्यादा सोचो । बिजनेस पार्टनर धोखा देकर जाए तो कुछ दिनों तक सदमा रहेगा। फिर दूसरे पार्टनर को लेकर बिजनेस शुरू कर देना चाहिए।"

"तुम कहना चाह रही हो कि सब लेन-देन का हिसाब है ? "

"ऐसा ही है। लड़कियों के विषय में यही तो हो रहा है अपने समाज में ।" वह आवेश में थी । "जया मौसी और कप्पू मौसी ने जो अपमान सहा उसको मैं समझ सकती हूं। मगर तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हुआ ? आदमी होने के गरुर के कारण ही कृष्णन अपने स्वयं के लाभ का सोच तुम्हें झटक के चला गया ?"

"विश्वासघात कोई भी कर सकता है नलिनी।"

"राइट ! फिर उसके बारे में ही मत सोचती रह । नए-नए विश्वासों को उत्पन्न करना है। नहीं तो दुनिया ठहर जाएगी ।"

मुझे हंसी आई। मेरी छोटी लाडली बहन है यह !

"मुझे स्वयं पर विश्वास है क्योंकि मेरे भविष्य की सोचने की स्वतंत्रता मेरे पास है।"

"गुड ! बेस्ट ऑफ लक !" कहकर नलिनी फीकी हंसी हंसी ।

लेकिन वह जया मौसी और कप्पू मौसी के साथ मेरी क्या तुलना कर रही है, आश्चर्य की बात है ! वे दोनों अम्मा की बहने थीं। मुझे लगता था जया मासी हमेशा एक हीन भावना में ही रहती थी । वह एस.एस.एल.सी. में फेल हो गई थी। उसके बाद वह आगे नहीं पढ़ी। इसी वजह से हीन भावना हो सकती है। थोड़ी ठिगनी, थोड़ी मोटी थी पर वैसे सुंदर लगती थी। उसे अपने पर बहुत घमंड था। बहुत बढ़िया खाना बनाती। उसे देखने के लिए बहुत से लड़के आए। नाश्ता-वाश्ता खा-पीकर कहते, “हम जाकर फिर बताएंगे.” कहकर चले जाते, फिर अपने घर/शहर से खत लिख देते, ‘हमें रिश्ता पसंद नहीं’। हमारे नानाजी शुरू हो जाते कि ‘तुमने इस रंग की साड़ी क्यों पहनी, तुम्हें उस रंग की साड़ी पहननी चाहिए। तुमने काजल बहुत ज्यादा लगाया।‘ इस तरह के बातें वर्णन कर करके कहते। बेचारी मौसी कभी मुंह नहीं खोलती। कभी-कभी कमरे के कोने में जाकर खड़ी होकर आंसू बहाती। हमें लगता यह नाना जी की बातें सुनकर ही रो रही है। हर एक के सामने दिखावटी वस्तु जैसे खड़ा कर देते फिर हर बार वह आये उस नए लड़के को अपना होने वाला पति मानती, फिर उसे यह अपमान सहना पड़ता..... एक अदद पति पाने के लिए और कोई उपाय था भी नहीं । पता नहीं किसके पुण्य प्रताप से, आखिरकार एक अच्छा पति उसे मिल ही गया । और कप्पू मासी की तो बात ही कुछ अलग है.....

अध्याय 7

"दीदी, कौन आ रहा है देखो !" नलिनी बड़े उत्साह से बोली। मैं अपने विचारों को झटक कर उस तरफ देखने लगी। दुरैई आ रहा था । उसके साथ कोई और भी था। हम लोगों को देखकर हाथ हिलाता हुआ मुस्कुराता पास आ गया।

"हेलो !" बोला। "छुट्टी एंजॉय कर रहे हो क्या? नलिनी के कंधे को धीरे से थपथपाया, छोटी साली कैसी है?" बड़े अपनेपन से बोला ।

"बड़ी होती जा रही है।" कहकर मैं हंसी।

फिर जैसे कुछ याद आया, दुरई ने अपने दोस्त से हमारा परिचय कराया।

"श्रीकांत, सैन फ्रांसिस्को में रहता है। छुट्टियों में यहां आया हुआ है। गिण्डी में हम दोनों साथ ही पढ़ते थे ।"

श्रीकांत ने हाथ जोड़कर 'नमस्ते' किया ।

"क्यों दुरैई, आज तुम्हारा ऑफिस नहीं है क्या?" नलिनी बोली ।

"है ना। आज इसको अमेरिकन एंबेसी में काम था। खाने का समय हो गया। इसलिए यहीं खा लेंगे सोच दोस्त को यहाँ ले आया।"

"घर में खाना खिलाने में दुरैई डरता है।" कुर्सी में बैठते हुए श्रीकांत मजाक में बोला।

"अचानक मेहमान को लेकर जाओ तो रोहिणी से रात को मार खाना पड़ेगा।", कहकर आंख मिचकाते हुए दुरैई भी मजाक में साथ दिया ।

"रोहिणी कैसी है ?”

“उन्हें देखने से बहुत सीधी दिखाई देती हैं।“ श्रीकांत बीच ही में बोल कर फिर हंसा।

"अय्यो उस पर विश्वास मत करो, देखने में गाय झपट्टा, मारने में शेर है।“

"अभी तो तुम झपट्टा मार रहे हो दोरैई" कहकर मैं हंसी।

"झपट्टा नहीं मार रहा हूं। इसको भी तो सब मालूम होना चाहिए ना ?", दुरैई कम हाज़िरजवाबी नहीं है । आगे बोला, “दस साल से अमेरिका में रह रहा है। सोचता है कि हमारे देश की औरतें अभी भी अपने मां के जमाने जैसे मुंह बंद करके रहती हैं । बहुत कम बदली होंगी, ऐसा यह सोचता है।“

"मनुष्य बिना बदले कैसे रह सकते हैं ?" नलिनी मोर्चा सँभालने के मूड में आ गई थी, "बिना बदले रहे हैं का अर्थ है कि समाज मर गया ।"

"बदलाव तो हुआ होगा। परंतु अभी तक कोई नुकसान नहीं पहुंचा।" श्रीकांत बोला।

"जितना होना चाहिए उतना बदलाव नहीं हुआ यही तो आघात का विषय है।" नलिनी जोश में बोली जा रही थी । “शिक्षा कितनी लड़कियों को मिली है ? पढ़ी-लिखी लड़कियों में से कितनी लड़कियां स्वयं से सोच- समझ कर फैसला कर सकती हैं या करना जानती हैं?"

"श्रीकांत, तू इससे मत उलझ ।", फटाक से दुरैई बोला। “सब बातों के लिए यह झंडा उठा कर चल देगी। आधा घंटा इसके साथ रह जाये तो तेरे विचार ही बदल जाएंगे।"

"कौन से विचार?" मेरी हंसी में व्यंग की झलक थी।

"इसका विचार है कि जैसी इसकी मां है, सभी लड़कियां वैसी होती हैं । इसके पिता जी जो बोलें उसको आँख मूंद कर मानने और करने वाली स्त्री थीं इसकी अम्मा । अपने बारे में कोई विचार न रखें सब कुछ पति ही, पति ही संसार है मानने वाली लड़की।" दुरैई बोले जा रहा था।

"साधारणतया सभी अम्मा और नानी- दादी ऐसी ही रही होंगी दुरैई!" नलिनी ने बीच में टोका ।

"कहां चली गई वह भीड़ ?" दुरैई ने अपनी आवाज में दुःख भरने का नाटक किया ।

नलिनी तेज हंस दी। श्रीकांत बिना बीच में बोले चुपचाप मुस्कुराता हुआ बैठा रहा । बीच में मुझे देख कर मुस्कुराया। अभी यह भारतीय लड़की से शादी करने के लिए ही भारत आया है मैं समझ गई। विदेशी लड़कियों की स्वतंत्रता से यह डर गया होगा। भारत की लड़की है तो परेशानियां नहीं होगी। अच्छी तरह से जीवन यापन की सुविधाएं दे दो तो मुंह बंद कर रहेंगी।

"हम आइसक्रीम लेकर आते हैं।“, कहकर नलिनी और दुरैई उठ गए।

उनके जाते ही श्रीकांत मुझे से मुखातिब हुआ ।

"नौकरी करती हैं क्या ?" पूछा।

"हां । यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हूं। नलिनी पीएचडी की तैयारी कर रही है।"

"आप लोग दिल्ली में ही रहे हैं क्या ?"वह बोला।

"रोहिणी और नलिनी दिल्ली में ही पढ़ें हैं। हमारे अप्पा बहुत सालों से दिल्ली में ही थे। मेरी स्कूलिंग बेंगलुरु में ही हुई और नानी के घर ही रही।"

उसने आश्चर्य से मुझे देखा।

"आपको कन्नड़ आती है?"

"हां, आती है।"

"मैं कन्नड़ ही हूं !" खुश होकर, "हमारे पिताजी की सर्विस थी चेन्नई में, इसीलिए वहां रहना पड़ा। तुम्हारे अम्मा-अप्पा यहीं रहते हैं क्या?"

"अभी दोनों जने ही नहीं रहे ।"

आइसक्रीम के कप उठाए दुरई और नलिनी आ गए थे ।

"तुम्हारे देश के आइसक्रीम खा कर देखो", कहकर दुरैई ने छेड़ते हुए एक कप श्रीकांत की तरफ बढ़ाया।, "खराब नहीं होगा।"

"अमेरिका मेरा देश नहीं है।"

"ऐसा बात करने वाला ही 10 साल से वहां बैठा है क्या?" दुरैई मुझे देखकर हंसा।

"उस वेतन में मुझे यहां एक काम ढूंढ कर दे दो।,"

सुन कर नलिनी हंस दी ।

"आप क्यों हंस रही हैं ?", श्रीकांत पूछे बिना नहीं रह सका ।

"आपको अमेरिका का रुपए चाहिए, वहां की सुविधाएं चाहिए, मुंह बंद रखने वाली भारतीय लड़की पत्नी होनी चाहिए। कितने लालची हैं आप !"

श्रीकांत के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी । "मुझे भारतीय पत्नी ही चाहिए। तभी घर में भारतीय संस्कृति होगी और बिना मुसीबत के रह सकेंगे। मुंह बंद करके रहने वाली पत्नी की मुझे जरूरत नहीं। परस्पर एडजस्टमेंट के लिए होशियार जरूर होना चाहिए..….."

"बेस्ट ऑफ लक !", कहकर नलिनी हंसी।, "अमेरिका जाने के लिए कितनी लड़कियां तैयार होंगी। वे अक्लमंद भी होगी क्या, आपको देखना पड़ेगा।"

श्रीकान्त को भी हंसी आ गई ।" मैं पहले ही बहुत असमंजस में हूं। आप मुझे और भी असमंजस में डाल रही हैं।"

"क्या असमंजस ?"

"फिर किसी और दिन इसके बारे में बात करते हैं। अभी हमारे पास समय नहीं है। यू मस्ट एक्सक्यूज अस।"

वह उठा। साथ में दुरई भी । "मालिनी, आपकी तो छुट्टियां है ना, रोहिणी और आप दोनों कहीं हॉलीडे के लिए जाकर आइएगा। बेचारी रोहिणी को बदलाव की आवश्यकता है । ऑफिस छोड़कर मैं निकल नहीं पाता।" दुरैई बोला।

"तुम दोनों ही का जाना जरूरी है दुरैई ।"

"छुट्टी मिलना बहुत मुश्किल है। मिले तो सब मिलकर चलेंगे ।"

मैंने दयनीय दृष्टि से उसे देखा।

उनके रवाना होते ही मैं और नलिनी ऑटो पकड़ कर घर आ गए।

अचानक मुझे रोहिणी की याद आई। मुझे लगा दुरैई का सबसे इतना प्रेम से मिलना-जुलना, सामाजिकता निभाना ही रोहिणी को जीवन से निराशा देता है क्या ? इसके प्रेम में कोई कठोरता नहीं है। बहुत सुसंस्कृत है इसका प्रेम । वह चाहती है कि एक मैच्योर पुरुष हो जिसमें पुरुषत्व ज्यादा दिखाई देता हो; जबरदस्ती कर मेसोस्टिक ( Masochist) प्रेम दर्शाने वाला पति हो. जिसमें कठोरता भी हो। मिल्स एंड बूंस वाली उम्र में ही वह अभी भी चल रही है। अपने आप को फंसाया हुआ रोमांस मे फंसी हुई है।

"क्या कारण बताऊँ ? कौन सा कोर्ट मुझे डाइवोर्स दिलाएगा ?", उसके ये वाहियात प्रश्न याद आते ही मेरे अंदर एक आघात लगता है। यह क्या हो रहा है ? मेरे समझ में तो ये नहीं आता कि जो अपने पैरों पर खड़ी ना हो उस महिला में ऐसी एक सोच कैसे आ सकती है ? जो चीज नहीं है उस स्थिति को महसूस करना ही इस आंसुओं का एक कारण था। 'छुडा के कहां जाऊं?' यह प्रश्न के पूछे जाने पर मुझे कप्पू की याद आई। कप्पू को मैं जितना पहचान सकी मुझे लगता है मैं रोहिणी को इतना भी नहीं पहचान सकी ।

कप्पू और मैं करीब-करीब एक साथ ही बड़े हुए। फिर भी असमानता अच्छी तरह दिखाई देती है। वह बहुत ही फुर्तीली है। वह बाहर के काम हो चाहे घर के काम, सभी में बहुत होशियार थी। बहुत बढ़िया मिमिक्री करती थी। मैं उसके जितना होशियारी नहीं थी इसलिए शायद मैं हमेशा पढ़ाई में डूबी रहती ।

जब-जब मुझे कप्पू की याद आती है तब-तब मुझे कन्नड़ का एक गाना याद आता है। उसी ने मुझे पहले-पहल गा कर सुनाया था और मेरे आंखों से आंसू आ गए। शायद इसका कारण रहा होगा 'गोविंद हाडू' नाम की कविता का गाना। पुण्यकोटी नाम की एक गाय घास चरते-चरते रास्ता भूल कर जंगल की तरफ चली जाती है, वहां भूखा शेर अपने भोजन का इंतजार कर रहा था तो वह उसे अपनी ओर झपटते देख गाय पुण्यकोटी बड़ी नम्रता से विनती करती है,

'मेरा एक छोटा बछड़ा है। उसे मैं दूध पिला कर किसी के पास छोड़ कर आती हूं, तब तक तुम मेरा इंतजार करना।'

“तुम और वापस आओगी ? मुझे बेवकूफ बनाना चाहती हो ?”

“अपने दिए हुए वचन को मैं नहीं तोड़ती। तुम मुझ पर विश्वास करो ।” पुण्यकोटी के ऐसा कहने पर शेर कुछ सोच कर उसे छोड़ देता है। अपने झुंड में आने के बाद बछड़े को दूध पिला पुन्यकोटी सब विस्तार से बताती है। दूसरी गायों से कहती है, 'तुम जैसे अपने बछड़ों को संभालती हो, वैसे ही दूध पिला कर मेरे इस बछड़े को भी संभाल लो।' सब गाएं बोलती हैं, 'तुम वापस जंगल में उस शेर के पास मत जाओ।‘

‘मैंने जो वचन दिया है उसे नहीं तोडूंगी।‘ ऐसा कहकर पुण्यकोटी शेर के पास वापस चली जाती है। वह वापस आएगी ऐसा शेर ने नहीं सोचा था। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

"तुम जैसे उत्तम प्राणी को मारने की मैंने सोचा ! मैं हीं पापी हूं।" ऐसा कहकर शेर पुन्यकोटी को छोड़ देता है।

मुझे लगता है यह कहानी बताने वाले कप्पू में और उस पुण्यकोटी के बीच कोई संबंध है । 'मुझे बली के लिए बुला रहे हो, अभी आ रही हूं।‘ ऐसा ही कप्पू ने बोला होगा- 'थोड़ा ठहरो मैं अपनी आत्मा को खत्म करके आती हूं।'

वयोवृद्ध नानी- नाना अपने लड़कों के दया पर रह रहे थे उस समय कप्पू की शादी हुई। शादी होने के 2 महीने बाद मैंने कप्पू को देखा। मैं एकदम चौंक गई। उसकी पर्सनैलिटी ही बदल गई थी। पंख को तोड़कर बगल में रख लिया हो जैसे । उसकी आंखों में एक डर दिखाई दिया। उसकी भाषा ही बदल गई। पालघाट की भाषा बोल रही थी।

"क्या हुआ रे कप्पू ? तेरी भाषा तो बदल गई !"

"उनके घर जाने के बाद उनके जैसे ही मुझे बात करनी चाहिए, सुनी ?", ज्ञानी जैसे मुस्कुराते हुए उसने कहा ।

"मौसा जी कैसे हैं ? तुम्हारे साथ प्रेम से रहते हैं?"

"हां, थोड़े सख्त हैं।"

अध्याय 8

"सख्त मतलब ?"

"उश्श..! थोड़ा धीरे बात कर! वे सुन न लें।"

"सुन ले तो ?"

उसने परेशान होकर मुझे देखा।

"उनको, सासु मां को, जोर से बात जोर से बातें करना, जोर से हँसना पसंद नहीं।"

सासू मां से, पति से उसके डर के बारे में मैं नहीं समझ सकी। पीहर वाले उनके घर जाएं तो वह स्वयं कॉफी बना कर नहीं लेकर आती है। सासु मां यदि देने को बोलें तो ही अपने को कॉफी मिलेगी। यहाँ कोई समस्या तो नहीं, उससे पूछ भी नहीं सकते। उन्होंने उसे कभी पीहर भेजा ही नहीं। उनके घर में उसे अकेले में मिलकर पूछो तो भी ‘उश्श..!’ कहकर हमें डरा देती। क्या यह स्नातक पढ़ी हुई है, मुझे आश्चर्य होता। ओरिजिनल कप्पू मर ही गई बोले तो भी वह कभी अपना मुंह खोलकर अपने पति के बारे में या सास के बारे में बुराई नहीं की।

एक बार उसके ‘उश्श..!’ को सहन न करने के कारण मैं बोली, "क्या है रे! ये जेल में रहने वाले कैदी जैसे डरती है? मैं होती तो कब की भाग गई होती।"

उसने तुरंत मुझे सर उठाकर देखा।

"भागकर ?"

उसकी बात में जो तेजी थी उसे देख मैं हड़बड़ाई।

"भाग कर कहां जाएँ ?", वह आगे बोली "मैं यहां हूं तभी तक मेरा गौरव है। लात मार के आ जाऊं, मेरे भाई लोग एक दिन भी मुझे सहन नहीं करेंगे। अकेले खड़ी रह कर क्या हासिल कर लूंगी ? अगर मैं चहुँ कि मेरा बेटा कल अच्छी तरह रहे, उन्नति करता रहे तो मुझे सभी बातों के लिए मुंह बंद करके ही रखना है। अब बता इसमें क्या कमी है ?"

"यह आत्महत्या है कप्पू?"

"तुम इसे चाहे जो कहो!"

"लड़की हो तो उसे कप्पू जैसे ही रहना चाहिए।", मामा लोग बड़े तृप्ति से बोलते। नानी अपना मुंह नहीं खोलती। कप्पू के मामले में पूरे कुटुंब के लोग आंखमिचौनी खेल रहे हैं, ऐसा मुझे लगता। ‘भाग कर कहां जाए?’ कप्पू के इस सवाल से बचने का खेल।

यह अच्छी बात है कि मैं इस तरह की किसी बात में नहीं फंसी । अरेंज किया हुआ मैरिज मुझे नहीं चाहिए, मैंने नानी को पहले ही बता दिया था । नानी थोड़ी देर कुछ नहीं बोली। थोड़ी देर बाद धीमी आवाज में कहा, "हां, जो शादियां करके रखी सब कौन अच्छे हैं? तुम्हें जो पसंद है देख कर शादी कर लो। यहीं से मैं तुम्हें आशीर्वाद दे दूंगी।"

शादी के नाम से ही उनको निराशा हो गई, ऐसा मुझे संदेह है। उनके मरने तक मेरी शादी नहीं हुई इसके बारे में वह ज्यादा परेशान नहीं हुई।

अचानक मुझे कृष्णन की याद आई। कृष्णन से दोस्ती होते समय तुरंत ही शादी कर ली होती तो क्या हुआ होता यह कल्पना मुझमें एक विनोद की भावना उत्पन्न करती है। 'तुम खुश हो ऐसा नाटक कर रही हो।' ऐसा बोलकर जो डंक मारते हैं वे ऐसा नहीं बोलते तब । मेरी मां का अचानक हार्ट फेल नहीं हुआ होता । एक बच्चा भी हो गया होता । चराचर कुटुंब की लड़की जैसे। बाहर की घंटी बजी तो अपने में डूबी हुई मैं दरवाजा खोलने गई।

"हेलो !", बड़े बेतकल्लुफ़ी के साथ कृष्णन अकेले अंदर आ गया।

अपने आप को संभालने में मुझे कुछ क्षण लगे। अभी तो इसका ध्यान मुझे अंदर उद्वेलित कर रहा था कि सामने देखते ही मुझे थोड़ी शर्म आई।

"वाइफ को साथ में नहीं लाये ?", बोलते समय मेरे जबान लड़खड़ाई।

"यहां की गर्मी उससे सहन नहीं हो रही। थकावट के कारण लेटी हुई है।", कह कर वह हंसा। दीवार का सहारा लेकर दीवान पर बड़े धृष्टता के साथ पैरों को फैलाकर लेटा। मुझे सिर से लेकर पैर तक घूर कर बेशर्मी से देखा। उसके चेहरे पर थोड़ा व्यंग भी दिखाई दिया।

"नलिनी नहीं है क्या?", निगाहों को चारों तरफ घुमा कर देखता हुआ पूछा ।

"नहीं।"

"मुझे थोड़ा पानी चाहिए मालिनी।", उसकी आवाज में संतुष्टि उभर आई ।

मैंने फ्रिज में से पानी ला कर उसे दिया। उसने एक ही बार में वह पीकर गिलास को मेज पर रख दिया और उठा।

‘रख कर आती हूं’ कह कर मैं गिलास लेने झुकी तो उसने तुरंत मुझे झटके से खींच कर अपनी बाहों में भर लिया, अपने से चिपका लिया । क्षणांश ही में उसके अधर मेरे अधरों पर थे। उसकी जिह्वा मेरे अधरों के बीच से जगह बनाने में सफल हो रही थी । ऐसा लगा कि मेरा शरीर मेरे वश में नहीं है । उसकी अमेरिकन सेंट की खुशबू से मुझे बेहोशी छाने लगी। मेरे अधर उसके अधरों का स्वाद लेते समय सब पुरानी यादें मेरे सामने आने लगी। जैसे सब कुछ मालूम हो, इसे नॉर्मल तरीके से उसने अपने हाथों को मेरे ब्लाउज के अंदर डाला। उसका गरम स्पर्श मेरे छाती पर पड़ते ही मेरा वश अपने शरीर पर बिल्कुल ही नहीं रहा, वह फिसलता चला गया। वह झुका तो मेरे मुंह से उसका सर टकराया। मुझे दर्द हुआ। उसने "सॉरी" बोला। यह सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि उसका भ्रम टूट गया। उसकी कड़ी पड़ी नसे क्षण भर में ढीली पड़ गई। मैं तुरंत अपने आपको उससे अलग कर खड़ी हो गई। ब्लाउज को ठीक करके उसे मैंने गुस्से से देखा ।

"इसी के लिए तुम आए हो तो कृपया तुम यहां से चले जाओ कृष्णन।" मेरी आव़ाज थरथरा रही थी ।

वह हंसा।

"ओह ! कमॉन ! वी आर नॉट स्ट्रेंजर्स। सच बोलो। तुम्हें चाहिए था या नहीं?"

"इसके लिए क्या। यह तो बेशर्म शरीर है। उसे जरूरत है।"

"फिर उसको धोखा मत दो। यदि धोखा दोगी तो वह प्रकृति के खिलाफ होगा। ऐसा होना तुम्हें एक हिप्पोक्रेट साबित करता है ।"

"नहीं ! इसका अर्थ है कि मैं एक मनुष्य हूं । इसका यह अर्थ है मैं कुत्ते या सूअर की जाति की नहीं हूं।"

कृष्णन मुझे देख कर व्यंग भरी हंसी हंसा।

"तुम्हारी नानी तुम्हारे अंदर से अक्सर झांकती रहती है।"

अचानक मुझे उस पर बहुत तेज गुस्सा आया।

"कृष्णन, तुम्हारे बारे में और बुरा मेरा अभिप्राय हो उससे पहले तुम यहां से निकल जाओ ! चले जाओ।"

मेरे पास आकर उसने फिर से मुझे आलिंगन में लेना चाहा।

"मुझे मत छू!", मैं उग्र होकर उस पर चिल्लाई। "बिना मेरी जानकारी के तूने किसी दूसरी से शादी कर ली। उसको बिना बताये मेरे पास आ गया। हम दोनों का तुम अपमान कर रहे हो। तुम्हें कैसे मैंने उस समय एक आदर्श पुरुष समझा मेरी समझ में नहीं आ रहा है।

थका हुआ सा वह फिर से पैरों को फैला कर बैठ गया।

"मैंने तो अपने ही साथ बहुत बड़ी गलती की है। मानता हूं । परंतु मुझे एक कठिनाई में ऐसा करना पड़ा मालिनी।"

"नहीं। मुझे ये सिनेमा की कहानियां जानने की कोई इच्छा नहीं है।"

"करीब-करीब सिनेमा की कहानी जैसे ही है। मेरे पिताजी का देहावसान हुआ तब मैं गांव गया था ना..."

“कृष्णन, मुझे कुछ भी जानने की जरूरत नहीं।"

"मुझे बोलने दो ! मेरे पिताजी मेरे सर पर बहुत सारा कर्ज रखकर चले गए।"

"उस कर्ज को चुकाने के लिए बड़े घर की एक लड़की से शादी करके अमेरिका जाने का प्लान तुमने बना लिया ! ऐसी लड़की मिले तो कैसे छोड़ सकते थे, हैं न ?"

"तुम कठोरता से बात कर रही हो मालिनी।"

मैं हंसी।

"कठोरता के बारे में बात करना तुम्हें शोभा नहीं देता है कृष्णन। एक पत्र लिखे बिना, एक शब्द बात किये बिना तुमने अपने मामा के द्वारा समाचार भेज दिया ! मुझे कैसा लगा होगा… सोचा तुमने ?"

"सब दोषों को मैं मानता हूं। इन सब को भूल जाओ। कोई अच्छा आदमी देख कर शादी कर लो। तुम ऐसे ही रहोगी तो मुझे दर्द होता है।"

मैं फिर से हंसी।

"मेरे लिए दर्द महसूस करने की जरूरत नहीं है। मेरे शादी ना करने का कारण तुम नहीं हो।"

"आई एम ग्लैड।"

"सब आदमी तुम्हारे जैसे नहीं होंगे, फिर भी मैं संभल कर रहती हूं।"

"बहुत ही 'सिनिकल' बातें कर रही हो।“

यह अब भी घमंड से बोल रहा है देख कर मुझे गुस्सा आया।

"तुम्हारी पत्नी को मेरे बारे में पता है?"

"पता नहीं है। मैंने उसे नहीं बताया ।"

मैं हंसी।

“अमेरिकन इंग्लिश भाषा ही आई है। इंडियन हिप्पोक्रेसी नहीं गई !”

"बताया नहीं ! इसका मतलब नहीं है कि छुपा रहा हूं । कुछ बातें पत्नी को नहीं बोलना ही ठीक रहता है।"

"तू सिर्फ हिप्पोक्रेट ही नहीं है। तू एक डरपोक भी है ।"

"तुम्हें मेरी वाइफ के लिए फिक्र करने की जरूरत नहीं है। वह बहुत सिंपल गर्ल है। हम अब भी फ्रेंड्स रह सकते हैं।"

वह मुझे कुछ इस तरह देख रहा था जैसे शोध कर रहा हो कि जिस विषय में वह बात कर रहा है वह मुझे कुछ समझ आया भी या नहीं। मैंने जिसे प्रेम किया था यह वह नहीं है। मुझे सदमा लगा । पहले जो चेहरा मुझे दिखा था वह एक झूठा चेहरा रहा हो सकता है। नहीं तो हो सकता है मेरी ही दृष्टि में कोई खराबी रही होगी। अब मुझे उस 'सिंपल गर्ल' पर दया आ रही थी। मेरा धैर्य खत्म होने लगा।

"प्लीज कृष्णन गो अवे।" मेरे स्वर में पर्याप्त घृणा झलक रही थी.

वह उठा।

"फिर एक दिन आऊंगा। मुझे एकदम से नफरत करके मत हटाओ, हम लोग परिस्थितियों के अधीन हैं। एक दिन तुम समझोगी।" वह अंग्रेजी में कह रहा था ।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। उसके रवाना होते समय वह मुझे एकदम ही अपरिचित लगा। दरवाजा बंद करके मैं दीवान पर आ कर धम्म से पड़ गई । उसमें से आने वाली अमेरिकन सेंट की बू से मेरा दम घुटने लगा। मैं उठकर बेडरूम में जाकर कूलर ऑन करके लेट गई। मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था, दुख से गला भर आया था । वह मुझे दोबारा छूने आया ? यह उसका अहंकार है या अमेरिकी स्वछंदता के लक्षण ? यह सब कुछ ने मुझे बहुत ही असमंजस में डाल दिया।

अध्याय 9

‘तुम्हारी नानी तुम्हारे अंदर से बार-बार झांकती हैं।‘

यह अहंकार नहीं तो और क्या? लड़कियों का भी अपना आत्मसम्मान होता है, यह सोच ना होना अहंकार नहीं तो और क्या ? जन्म जन्मांतर से एक पर्दे के होने का ही अहंकार है। 'छेड़छाड़ करना यह मेरा खेल है। तुम किस हद तक इस पर्दे में रहती हो इसे देखना मेरा आनंद है।‘ ऐसा एक क्रूर आदमी होने का गर्व है कृष्णन में ।

मेरे अम्मा के एक मामी थी। उसका नाम मुझे याद नहीं। हमंम्गा थी। देखने में वह साधारण थी। परंतु, वह हमेशा सारे गहने पहने रहती। उसके वे सारे गहने पीहर के थे। आदमी तो उसका मस्तराम था। ऐसी मेरी मां सभ्य भाषा में बोलती थी। वरना सही वर्णन किया जाये तो ‘वह महा पापी था’। हमंम्गा को कमरे में ही बैठाकर उसके सामने ही वेश्याओं से संबंध बनाता था। हमंम्गा यह सब सहन करती हुई रहती थी। उसके सारे गहने एक-एक करके वैश्यायों को देता जाता था। फिर भी वह अपने पति के लिए वट सावित्री का व्रत रखती है। जब वह मरा तो वह सिर को दीवार पर पटक पटक कर रोई। यह सब करना एक पर्दा है, जरुरी दिखावा है, यही सोच कर तो उसने ऐसा किया होगा। या फिर यह सत्य उसे अधिक दुःख देता होगा कि बिना पति के जीवन इससे भी बेकार, इससे भी भयंकर होगा । संभवतया उसका पति भी अपनी इतनी कीमत जानता होगा । शायद इसी बेवकूफी के कारण ही उसका पति उसको इतना परेशान करता था, ऐसे सोचो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा जन्म जन्मांतर से होता आ रहा है ।

कृष्णन की पत्नी भले ही सिंपल गर्ल हो, फिर भी वह किस हद तक सहन करेगी मुझे यह फिक्र हुई। मैं उससे कुछ कह ना दूं इस डर से ही कृष्णन उसे लेकर नहीं आया, ऐसा लगता है।

नलिनी से उसके आने के बारे में बोलने में ही मुझे संकोच हो रहा था। कुछ क्षणों के लिए मैं कमजोर पड़ कर खड़ी रही, मेरी यह बात मुझे अपमानित कर रही है।

मैं अपने आप से अपमानित महसूस कर रही हूं। हम तीनों में नलिनी ही होशियार है, ऐसा मैं अक्सर सोचती हूं। मुझे परेशान करने वाली पिछली पीढ़ी की यादें उसे नहीं है। वह पूरा-पूरा ही दिल्ली में पढ़ी-लिखी, पली-बढ़ी, शायद इसलिए । रोहिणी की तरह 'ना:सिस्ट' (Narcissist) नशा भी उसमें नहीं है। उसके साफ देखने के निगाह में दिखावा नहीं है। उसके निगाहों में मनुष्यता है, दया भाव भी है। परंतु मूर्खतापूर्ण बातों को वह सहन नहीं कर सकती। उसकी गणना में मैं जिस स्थान पर हूं उससे मुझे गिरना नहीं चाहिए, मेरे अंदर उत्पन्न होने वाली यह भावना एक विचित्रता ही है। वह मुझ से 8 साल छोटी है।

पुस्तकों में मेरा मन नहीं लगा। किसी से बात करने की इच्छा तीव्र होने लगी। दो दिन बाद मैं रोहिणी के घर गई । मुझे देख कर जो बच्चों जैसे खुशी उसने जाहिर की उससे मेरे मन में हिम्मत बढ़ी। वह ऐसे कहीं तैयार होकर खड़ी थी जैसे कहीं जाने वाली हो ।

"बहुत बोर हो रही थी। सोचा कनॉट प्लेस जाकर आएंगे ।" वह चहकी ।

"चलते हैं, आओ ना", मैं बोली।

"चलें क्या ?", वह प्रसन्न हो गई । "कॉफी पी कर चलते हैं", कहकर बड़ी फुर्ती से फ्रिज में से दूध निकालकर कॉफी बना लाई।

हमेशा से आज कुछ ज्यादा ही चमक रहा था उसका चेहरा । ऐसा लगा कोई ताज़ा खिला फूल हो। कोई गाना गुनगुनाते हुए वह काम कर रही थी जिसे देख कर मुझे खुशी हुई। उस दिन लाइब्रेरी में मिनट भर में आंसू बहाने वाली उस रोहिणी में और इसमें बहुत अंतर था। लगता है उस दिन मैं दूरई को जो गूढ़ चेतावनी दी थी वह उसे समझ गया ।

"क्या बात है, आज तुम बड़ी उत्साहित दिखाई दे रही हो ?", मैंने उसे छेड़ा।

वह जैसे हड़बड़ा गई जो मुझे आश्चर्यजनक लगा।

"हमेशा जैसे ही तो हूं", अपने को संभालते हुए बोली। परंतु उसमें निश्चित रूप से एक बदलाव था।

"मैं हमेशा से ही उत्साहित रहने वाली हूं मालिनी", हाथ के टम्बलर में दूध को देखती हुई दोबारा बोली । "मेरे बराबर दुरैई के उत्साहित नहीं रहने के कारण ही मेरा मुड आऊट हो गया था।"

"दुरैई कोई चिड़चिड़ा देने वाला गंभीर तो नहीं है ! किसी-किसी के चेहरे पर हंसी ही नहीं होती। कप्पू के पति को तो तूने देखा है ?"

"कप्पू और मुझमें कोई समानता नहीं है!", वह जरा गुस्से से बोली। "संबंध हो तब भी तुलना नहीं कर सकते। पति और पत्नी के बीच का संबंध बहुत ही विचित्र होता है। बाहर वाले आदमी इसे समझ नहीं सकते। दुरैई पर्फेक्ट है ऐसा तुम सोचती हो। परंतु वह परफेक्ट हसबैंड हो ही यह जरूरी तो नहीं !"

मैं भी बिना कुछ जवाब दिए उससे कॉफी को ले ली। बहुत ही साफ सुथरा सजाकर रखे हुए अपने घर को देखती हुई वह जैसे अपने पक्ष के लिए बहस कर रही हो, फिर से शुरू हो गई,

"मैं परफेक्ट वाइफ हूं क्या, मुझे नहीं पता। मैं बहुत खराब वाइफ भी हो सकती हूं। ऐसा नहीं है कि दुरैई से मुझे प्रेम नहीं है । परंतु जिंदगी बिना किसी उत्साह के ही चल रही है।"

उसकी बात करने की शैली में सिर्फ स्वयं का पश्चाताप नहीं लग रहा है । सच्चाई है ऐसा लगता है।

"उस उत्साह को रोहिणी तुम्हें ही उत्पन्न करना चाहिए।", मैं सौम्यता से बोली।

"इसीलिए तो अभी मैं कनॉट प्लेस के लिए रवाना हो रही हूं", कहकर वह हंसी। अब मुझे लगता है किसी से शादी करने के कारण मैं अपनी खुशी को क्यों छोड़ूं । गाना सीखने जा रही हूं। तुमने जैसे बोला वैसे।"

"गुड् !", मुझे शांति मिली । उस दिन उसकी बातों ने सचमुच में मेरे अंदर एक घबराहट पैदा कर दी थी। मेरे बोलने का फल ही इसके बदलाव का कारण है, मैंने सोचा।

ऑटो रिक्शा पकड़ कर हम अभी उसमें बैठे ही थे कि अचानक रोहिणी को कुछ ध्यान आया, "कृष्णन तुमसे मिलने आया था क्या ?" उसने पूछा।

"हां", मैंने जवाब दिया ।, "यहां भी आया था क्या?" मुझे संदेह था ।

"हां ।" वह धीरे से बोली। ‘क्यों आया’ मैंने नहीं पूछा। उसके बारे में इससे पूछते हुए अचानक मुझे संकोच महसूस हुआ। उसका गरम हाथ जो छाती पर पड़ा था, वह याद कर अभी भी छाती कुम्लहा गई।

"सोच कर देखें तो हर एक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण होता है।" रोहिणी बोली। "लगता है जैसे हम सभी परिस्थितियों के वश में हैं ।“ कृष्णन ने अंग्रेजी में जिन शब्दों का प्रयोग किया था उन्हीं शब्दों में रोहिणी के कहा ।

मैं आश्चर्य से उसे देखते रह गई ।

"सभी लोग इस सबको भूलकर अपने किए हुए गलती से बचने की सोचते हैं रोहिणी।" मेरी आवाज में पर्याप्त गुस्सा था ।

"क्या ठीक, क्या गलत ? इन सबका क्या मतलब है बताओ !", समझ में ना आने वाली तीव्रता के साथ रोहिणी बोली ।

उसकी तीव्रता ने मेरे अंदर एक संकट पैदा कर दिया। लगा अभी यह विपक्ष की तरफ से है । यह बात मुझे कमजोर करने लगी।

"कुछ मनुष्यों के लिए धर्म कुछ भी, कभी भी नहीं होता है रोहिणी", मेरी आवाज में आक्रोश था।, "मैं सोचती हूं विश्वासघात बहुत बड़ा धोखा है ।"

रोहिणी थोड़ी देर कुछ नहीं बोली, सड़क पर नज़रें गड़ाए बैठी रही । पल भर बाद उसी ने आगे जोड़ा,"चलो छोड़ो। वह कहानी खत्म हो गई।"

मैं भी चुप्पी लगा गई । मगर मन में उथल-पुथल मची थी। कृष्णन ने इससे क्या कहा होगा, मुझे उत्सुकता हुई। कुछ भी कहा हो, इसकी बुद्धि तो भ्रष्ट हो गई न ! यह सोच मुझे गुस्सा आया। अपना पक्ष मजबूत करना चाह रही क्या मेरे घर में ?

कनॉट-प्लेस आ गया था । हम बाजार के सामने उतर गए। बड़े उत्साह से बाहर घुमने आने वाली रोहिणी के उत्साह को मैं खराब नहीं करूंगी, मैंने सोच लिया। वहां क्वालिटी आइसक्रीम वाले से दो चोकोबार खरीदी, एक उसको पकड़ाया। चोकोबार का स्वाद लेते हुए कनॉट-प्लेस के अंदर गली की दुकानों को देखते हुए हम पैदल चल रहे थे। एक छोटी लड़की की तरह रोहिणी इधर-उधर उमंग से लबरेज़ हर दूकान में, हर दिशा में देख रही थी, सबमें रुचि ले रही थी। सिनेमा, राजनीति और फैशन आदि सभी विषयों पर हमने बात करते हुए आइसक्रीम खत्म किया। परंतु हम दोनों इतना तो संभले रहे कि न दुरैई के बारे में और न ही कृष्णन के बारे में कोई बात हमने छेड़ी । मेरे साथ काम करने वाली सुभद्रा से तो मैं जैसे अपनी अंतरंग बातें करती हूं वैसे अपने साथ पैदा हुई बहन के साथ नहीं कर सकती, यह विचित्र बात है। मैंने अपनी अंतरंग बातें अपनी मां से भी कभी नहीं की। कोई एक संकोच ऐसा करने से रोकती रही थी । लगता है अपना मुखोटा पहन लें । यह जो अहसास है उसकी क्या व्याख्या करूं ? जो बहुत निकट के होते हैं उनके सामने इस मुखोटे को बेकार का कपड़ा समझ हटा देते हैं या फिर कठोरता से वह उसे फाड़ दें तो उसे सहन करने की शक्ति हमारे पास नहीं होता है। अपने बचाव के लिए ही बाहर के दूसरे लोगों से अपनी अंतरंग बातें बांटते हैं।

बात करती हुई रोहिणी का चेहरा सामने आए किसी को देखकर प्रसन्न हुई, जिसे मैंने पीछे मुड़कर देखा। कृष्णन आ रहा था। मेरे चेहरे के अचानक बदलते भावों को मैं ही महसूस कर रही थी।

अध्याय 10

“व्हाट अ प्लेजेंट सरप्राइज !", बड़े उत्साह से कृष्णन बोला। हम दोनों को बारी-बारी से देख रोहिणी से बोला, "यू लुक ब्यूटीफुल ! एक टीनएजर लड़की जैसे लग रही हो, जिसकी शादी भी नहीं हुई हो !"

"तुम एक खराब ब्लास्टर हो !", कहकर रोहिणी हंसी। उसके गाल पर कनपटी तक शर्म से गर्म लहू दौड़ गया था । मैं आश्चर्य से उसको देखती रही।

"तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था रोहिणी", कृष्णन शरारत से बोला।

"बेकार मत बोल", रोहिणी बोली। उनके बात करने में जो घनिष्ठता दिखी, उसने मुझे आश्चर्य में डाला। मुझे लगा मेरे पीछे कुछ साजिश हो रही है, और सोचते हुए मैंने अपमानित महसूस किया।

"सच में" कृष्णन बोला। "मेरे एक फ्रेंड ने मुझे चाय के लिए बुलाया है। वह तुम्हारे घर के पास रहता है। सोचा थोड़ी देर पहले निकलूँ ताकि तुम्हें और दुरैई को भी मिल लूँ ।"

"हाँ हाँ, क्यूँ नहीं !”, खुश होकर रोहिणी बोली।

"यहां क्या कर रहे हो तुम दोनों?", कृष्णन ने बात आगे बढाई ।

"कुछ नहीं सिर्फ विंडो शॉपिंग।"

"यहां से कहीं और नहीं जा रहे हो तो मैं ही तुम्हें घर पर ड्रॉप कर देता हूं", उसको देखकर उसने प्रस्ताव रखा ।

"मुझे ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी जाना है", मैं बीच ही में बोल पड़ी । “तुम आ रही हो क्या रोहिणी ?"

"नहीं ! मैं घर ही चली जाती हूं मालिनी", वह हिचकते हुए बोली। "कृष्णन उस तरफ से जा रहा है तो मैं उसके साथ जाकर वहां उतर जाऊंगी।“

उसके इस तरह बेशर्मी से जवाब देने पर मुझे बहुत गुस्सा आया।

"रास्ते में तुम्हें भी ड्रॉप कर दूंगा आ जाओ ।", कृष्णन पहली बार मुझसे मुखातिभ हुआ ।

"नो, थैंक्स", मैं झट से बोली। "वो रास्ता तुम्हारा नहीं है।“ और बिना एक पल गँवाए वापस सामने वाली दिशा की ओर चलना शुरू कर दिया।

रोहिणी ने जल्दी से आकर मेरा कंधा पकड़ा ।

"तुम भी आ जाओ ना घर। तुम्हें लाइब्रेरी जाना जरुरी है क्या ?" धीमी आवाज में बोली। फिर लगभग फुसफुसाते हुए, “तुम क्यों तेजी दिखा रही हो, बे-वजह ! उसके बारे में जो तुम गलत सोच रखती हो, ऐसा तुम ना सोचो इसलिए भी एहतियात बरत रहा होगा वह ।“

रोहिणी के बर्ताव पर मुझे और गुस्सा आया। मेरी भावनाओं का क्या इसको ज़रा भी परवाह नहीं ? यह विचार मेरे गले में भार जैसे जम गया।

"हां रोहिणी मुझे जाना है", मैं बमुश्किल कहकर उससे छुटकारा पाई। मुझे कुछ क्षण वह संकोच से देखकर "ठीक है फिर", बोल रोहिणी मुड़ गई।

मेरे अंदर मुझे ही समझ में ना आने वाली एक व्याकुलता उमड़ आई और गुस्से से मैं दूसरी दिशा की ओर चलती हुई एक ऑटो पकड़ कर बैठ गई। कृष्णन मुझसे अनुचित तरीके से छेड़खानी कर रहा है। मेरे पक्ष के लोगों को अलग करना चाह रहा है। उनकी सहानुभूति प्राप्त करने के लिए उसने झूठी कहानी कह कर आंसू बहाए होंगे। पहले तो रोहिणी को उसकी करनी में गलती दिखी थी ! आज वह उसके पक्ष में बोल रही है ? आज वह जो बात बोलता है उन्हीं शब्दों को वह मुझे ट्रांसफर कर देती है। - 'हम सब परिस्थितियों के अधीन है'।

(बुल शिट ) बेवकूफ ! ये एक पक्ष से दूसरे पक्ष की ओर भागना हुआ। तुम सुंदर हो, कुँवारी लड़की जैसी लग रही हो !’ एक आदमी के मुंह से ये सब बातें सुनने वाली बेवकूफ, एक नंबर की बेवकूफ है !...

ब्रिटिश काउंसिल के बाहर पहुँचते ही मुझे सुभद्रा किसी युवक के साथ सामने खड़ी हुई मिली।

"लाइब्रेरी बंद है। कोई रिपेयरिंग का काम चल रहा है", मैंने उसे सूचित किया ।

"दिस इज गौतम", पास में खड़े आदमी से उसने परिचय कराया।

"आओ मालिनी दासाप्रकाश में बैठ कर कॉफी पिएंगे। गौतम कार लेकर आया है"। सुभद्रा ने पेसकस किया ।

'ठीक है', कहकर उनके साथ चल दी। मेरा मन तो पहले ही चाह रहा था कि कहीं जा कर बैठा जाए तो ठीक रहेगा ।

दासाप्रकाश में सहन करने लायक ठंडे वातावरण में एक पंजाबी परिवार इडली-डोसा स्वाद लेकर खा रहा था । लालगुडी के वाइलन के बारे में बात करते हुए कुछ लोग सफेद मेटल के प्लेट में मसाला डोसा खा रहे थे। सुभद्रा लगातार बातें करती जा रही थी। रोहिणी-कृष्णन को भूलने के लिए मैंने बड़े इंटरेस्ट से सुभद्रा को देखा। ये कुछ ज्यादा ही बात कर रही है, ऐसा लगा। उसकी हंसी में उत्साह उफन रहा था। वह शादीशुदा है। यह गौतम कौन है, पता नहीं। नई दोस्ती हो सकती है। परंतु उनके बातचीत में और हंसी में एक बेशर्म निकटता दिखाई दी। सुभद्रा उत्तर प्रदेश की है। जैसा कि वह मुझे बताती रही है वह बहुत ही परंपरावादी और पिछड़े परिवार से है। मैं जिस हंम्मगा बुआ की लड़की के बारे में बताती हूं वैसी कहानियां वह अपने परिवार की भी बताती है। आज दिल्ली में उसका और उसके पूर्वजों का कोई संबंध दूर-दूर तक नहीं दीखता । वह जिस ढंग से पली है उसका विरोध जताने के लिए, जैसे अपने अतीत धो चुकी हो वह सिगरेट पीती है । उसका पति परितोष एक बंगाली है। मार्क्सवादी है। इसको शाम को वाइन देते हैं। वे घर पर ध्यान से विभिन्न डिजाईनों की बोतलों वाली नायाब शराब वगैरह रखते हैं। "कभी-कभी यह रिश्ता बहुत ही घुटन जैसे हो जाता है।", सुभद्रा दुखी होकर मुझे बताती। शायद हवा खाने के लिए ही गौतम के साथ आई है ।

मुझे फिर से रोहिणी की याद आ गई। वह भी तो एक घुटन में रहती है। नहीं तो यह उसकी कल्पना है कि वह घुटन में रहती है । हवा खाना कोई गलत काम नहीं है, यह कृष्णन ने उसके दिमाग में भरा हो सकता है।

"और क्या खाओगी मालिनी ?", सुभद्रा पूछी। दूर से आती आवाज सुन कर रोहिणी से मैं स्वयं में लौट आती हूँ और ‘कुछ नहीं चाहिए’ में सिर हिला देती हूँ । मुझे लग रहा है कि मेरा दिमाग खराब हो गया है । मेरी कल्पनाओं का फिर कोई और क्या कारण हो सकता है मेरी समझ में नहीं आया।

गौतम सिर्फ कॉफी पी कर उठ गया। मुझे देखकर बोला, "सॉरी, मुझे और काम है ।"

और फिर सुभद्रा से मुखातिब हो कर, "कल फोन करूंगा" बोला। उसकी आंखें हंस रही थी। कुछ संदेह है उसकी नजरों में, सुभद्रा मुझे देख कर प्रेम से हंसी।

"ग्रेट !" उसने गौतम को जवाब दिया ।

"वह कौन है ?" गौतम के दूर निकल जाने पर मैंने सुभद्रा से पूछा ।

"आई.आई.टी. में लेक्चरर है। लाइब्रेरी में है, दो महीने पहले मिली।“

इसको ऐसे कैसे दोस्त मिल जाते हैं, मुझे आश्चर्य हुआ।

"दोस्त ? मतलब किस तरह का दोस्त?”, भरसक भोलेपन से मैंने पूछा।

"बहुत ही निकट का दोस्त", कहकर वह हंसी।" तभी तो ! वरना इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं होता ।"

जितने खुलेपन से सुभद्रा मुझसे बात करती है, मुझे पता है, वह वैसे और किसी से नहीं करती । मेरे और कृष्णन के बीच जो निकटता थी वह उससे भलीभांति वाकिफ है । इसके बावजूद भी इसकी बातों से मुझे हल्का आघात लगा।

"परितोष को पता है क्या?" धीरे से मैं बोली।

"नहीं मालूम।" उसने धीरे से सिगरेट सुलगा कर धुंए को हवा में उड़ा दिया । थोड़ी देर उस खेल को देखती रही। उसके बाद बड़ी तीव्रता से शुरू हुई- "मालूम होता तो भी अनजान ही बनता, बीच में नहीं बोलता। मेरे विषय में वे बीच में नहीं पड़ते।“

मैं कुछ देर चुप रही।", परितोष की भी किसी से मित्रता होगी, ऐसे सोचती हो क्या?, "संकोच से पूछा।

"होगा ! नहीं भी हो सकता। मैं इन बातों में नहीं पड़ती। हम दोनों का परस्पर विश्वास है। इसीलिए तो साथ रह रहे हैं। विश्वास ख़त्म हो जाये तो साथ रहने का मतलब ही नहीं। मैं सोचती हूँ ऐसी परिस्थिति नहीं आएगी ।"

विश्वास का मतलब बातों का प्रमाण ? मेरी समझ में नहीं आया। "बाहर ही दोस्ती क्यों रखती है?", हल्के से मैंने पूछा।

"नहीं तो मैं घुटकर मर जाऊंगी। बाहर की दोस्ती की वजह से मेरे दांपत्य जीवन के लिए कोई खतरा नहीं है । ऐसा नहीं कि घर की मैं परवाह नहीं करती हूं । आई लव परितोष। वह, वे जानते हैं।“

मुझे लगा यह बहुत ही जटिल विषय है । बच्चे होने पर भी ऐसी स्वतंत्र जीवन जीएगी क्या, मेरे अंदर एक प्रश्न उठा। यह स्वतंत्रता कहीं चली नहीं जाए इसीलिए बच्चे नहीं चाहिए, ऐसा इसने निर्णय ले लिया क्या ? यह एक नपुंसक-व्यवस्था है, मैंने सोचा। लड़कियों को स्वतंत्रता चाहिए, शादी का बंधन भी नहीं टूटना चाहिए तो इस तरह की व्यवस्था ही संभव हो सकती है। बट्रेंड रसैल ने कहा था जैसे-अंतपुर में हिजड़ों को राजा सहन करते थे, उसी तरह जिनके बच्चे नहीं होते उन पत्नियों के प्रेमी को उनके पति लोग सहन करते हैं ।-एक नई दृष्टि में इसे चूर-चूर करो।

"आई लव परितोष, रियली", सुभद्रा फिर से बोली।

यह सरलता से जिन शब्दों का प्रयोग कर रही है, मुझे जो अर्थ मालूम है उनकी व्याख्या उसके बाहर की होनी चाहिए ‌। फिर तो सुभद्रा कहेगी कि ये सिर्फ शब्द हैं जिनका अंतर अनुभव कराता एक बेहोशी है । फिर तो सुभद्रा कहेगी कि ऐसा मैं मेरे अपने जीवन में धोखे के कारण कह रही हूं । मेरी पड़-दादियों को इन शब्दों का अर्थ बिल्कुल समझ में नहीं आएगा। मेरे पिताजी और अम्मा दोनों साथ में कैसे रहे मुझे आज तक आश्चर्य होता है। मेरे अप्पा से मेरी मां हर बात में एक पायदान ऊपर थी। मेरे अप्पा अच्छे आदमी थे परंतु अम्मा के साथ बड़े कठोरता से पेश आते थे। अम्मा के प्रकाश में उनकी आँखें चौंधिया जाती थी। बिना किसी कारण के सबके सामने वे मेरी अम्मा को नीचा दिखाते रहते थे। उन्हें लगता था अम्मा को दबाकर रखना ही उनका अपना झंडा फहराने का एकमात्र साधन था।

एक बार, ' तुम सोचती हो कि तुम बड़ी विद्वान हो ?', ऐसा चिल्लाकर अप्पा बाहर चले गए। अम्मा के चेहरे पर दुख और अपमान दिखाई दे रहा था। आंखों में आंसू थे। उस समय मैं चौदह साल की थी। मुझे देख कर माँ अचानक बोली :

"इस आदमी के साथ रहना सिर्फ उधारी चुकाने जैसा है, प्रेम नहीं।"

अध्याय 11

'मैं हत्यारिन हूं' ऐसा मेरी मां अपने शब्दों से व्यक्त कर रही है, मेरे कोमल मन में आघात हुआ। उस आघात की याद आज भी मेरे मन में वैसा का वैसा ही है। मेरे पिताजी जब बिस्तर पकड़ लिए थे मेरी मां ने ही उनकी एक छोटे बच्चे की जैसे देखभाल की. मुझे लगा जैसे कमजोर क्षणों में मुझसे जो एक बात कही दी उसका प्रायश्चित ढूंढ रही है ।

संपूर्णता को प्राप्त कर लिया जैसी एक भावना के साथ बैठी सुभद्रा को देख मुझे आश्चर्य हुआ। इसको लगता है कि इसका इसके पति के साथ जो रिश्ता है वह शॉक प्रूफ है। मुझे लगता है कि इसका ऐसा सोचना सिर्फ एक भावना है।

"क्यों हंस रही हो ?", सुभद्रा ने पूछा।

"कुछ नहीं। मुझे लगता है हम सब आदिकाल से ही आज तक कोई एक भावना के सहारे ही जिंदगी को चला रहे हैं ।"

"तुम एकदम बोर हो मालिनी !", एक लापरवाही से सुभद्रा बोली। "विद्वानों की भाषा में ही तुम फंसी हो। कृष्णन के जाने के बाद ऐसे अलग खड़ी हो जैसे पुरुषों की दोस्ती ही नहीं चाहिए । प्रेम में धोखा खाने से कुछ दिनों तक विरक्ति आती ही है। परन्तु उसके लिए अपनी खुशी को तुम्हें क्यों त्यागना चाहिए ? जस्ट रिलैक्स एंड एंजॉय ! बाय फ्रेंड्स रखो। हैव सेक्स। तुम बदल जाओगी। तुम्हारी सोच में सेक्स एक ख़राब चीज है ! सेक्स पाप है, ऐसी सोच तुम्हारे अंदर है। तुम्हारी नानी अभी भी तुम्हें काबू में रख रही है।"

मुझे हंसी आई। कृष्णन ने भी तो यही कहा था । मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस मेरे पूर्वजों के साथ 'रिंग-अ-रिंग-अ-रोजेज' नाची। उन सब की मानसिकता का दबाव मुझे महसूस हुआ । परंतु उनमें और मुझे में अंतर है, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ। मुझे स्वयं ही सोचना आता है। ये पाप-पुण्य की बातें मेरे साथ नहीं चलेगी। कृष्णन के साथ मेरा जो रिश्ता था वह बिल्कुल शुद्ध था सोच कर अपने को छोटा करने का कोई प्रयास मेरे द्वारा नहीं। परंतु सेक्स को खेल जैसे लेना भी मेरे लिए संभव नहीं। मुझे कोई चोट नहीं लगी यह दिखाने के लिए मुझे कुत्ते जैसे फिरने की क्या जरूरत ? बल्कि वैसा करना ही मुझे कमजोर बताएगा, छोटा दिखाएगा। मेरी हार की जिम्मेदारी मेरी नानी या नारायणी बड़ी मां, कोई भी कारण हो सकता है। परंतु यह पुराना वाद-विवाद नहीं है। यह मेरी स्वतंत्रता है।

सुभद्रा कुछ बात कर रही थी। यह जो कुछ भी कर रही है, वह सिर्फ एक खेल ही खेल रही है। एक सिद्धांत के विरुद्ध है। अपने जीवन में उत्साह भरने के लिए उसने जो रास्ता निकाला है अगर उसे ही वह एक आन्दोलन कहती है तब तो मैं ही एक मूर्ख हूँ ।

"और तुमको जो वो मानसिक बीमारियां हैं, उनका कारण उन्हें दबा के रखना ही हैं", वह बोली। मुझे मेरी पड़ –नानी याद आई जिन्हें भूत ने पकड़ा था‌।

"मुझे कोई बीमारी नहीं होगी, फिकर मत करो।", हंसते हुए मैं उठी । वह भी उठ खड़ी हुई ।

"आने से पहले एक अच्छे आदमी को देख कर बताती हूं।" वह बोली।

"देखने वाले सभी अच्छे आदमियों को तू ही अपनी तरफ खींच ले तो फिर तुझे मेरी याद कहां से आएगी ?", कहकर मैं रवाना होने लगी तो वह खिलखिला पड़ी ।

जब भी उसे देखती हूँ तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता है. अत्याधुनिक लड़कियों की प्रतिनिधि हो जैसे ! युवाओं जैसे वह मन के नियंत्रण में नहीं है वह ! मन के कैद से बाहर आ गई एक साफ-सुथरे छवि दर्शाती उसकी बातें मुझमें भ्रम पैदा करती है। लड़कियों के अधिकार की परिभाषा ही बदल गई है। कोख की रक्षा का दायित्व सिर्फ लड़कियों का नहीं आदमियों का भी है, यह वाद-विवाद का विषय नहीं रहा अब । बाहरी संबंध रखने की छूट यदि पुरुष को है तो यह स्वतंत्रता लड़कियों को भी है, सिंपल लॉजिक।

"कोख की पवित्रता के बारे में तिरूमंपावै" की पढ़ी बात याद आई। बार-बार चाबुक से कोई मार रहा जैसे याद आ रही थी वह बात और आघात कर रही थी । इसके साथ 'गोविंद हाडू' की पुण्यकोटी की याद आई। पवित्रता का मतलब वही है। इस पवित्रता में आदमी-औरत का कोई भेद नहीं है। मेरे गुस्से और विश्वास का यही एक आधार होना चाहिए।

घर पहुंचते ही ताला लगे दरवाजे के सामने श्रीकांत खड़ा हुआ मिला ।

अपने आश्चर्य के भाव छुपाते हुए मैंने उससे हंस कर 'हेलो' कहा ।

संकोच के साथ उसने भी 'हेलो' कहते हुए मुस्कुराया। या फिर इसके मुस्कुराने का तरीका ही यह है मुझे लगा।

"आप कब आए?" ताले को खोलते हुए मैंने पूछा।

"अभी-अभी" वह थोड़ा संकोच से बोला। "इस तरफ़ एक दोस्त से मिलने आया था । फिर याद आया कि आप यहीं रहती हैं ।"

"गुड ! अंदर आइये !”, कह कर मैंने जल्दी से पंखे का स्विच ऑन किया और कूलर सोफे की तरफ घुमाया, ठंडा पानी लाकर मेज पर रखा। उसने 'थैंक्स' कहकर पानी लिया और पी कर सोफे पर बैठ गया।

"मैं तो भूल ही गया था कि दिल्ली में इतनी गर्मी है ।" कुम्हला गए अपने चेहरे को रुमाल से पोंछते हुए बोला।

"मुझे लगा था आप बेंगलुरु चले गए होंगे ।" मैंने हंसते हुए कन्नड़ में बोला।

उसके चेहरे पर आश्चर्य भरी मुस्कान तैर गई ।

"कल जा रहा हूं। यहां कुछ लोगों से मिलना था।"

'कितनी लड़कियों को देखा होगा इसने इस हफ्ते में', मैंने मन ही मन हिसाब लगाया।

"अमेरिका में इतने वर्षों से रह रहे हो। कॉमेडी और कन्नड़ फिर भी आप नहीं भूले!" मैंने बातचीत आगे बढाते हुए मैंने कहा ।

"मेरे जनरेशन के लोग नहीं भूलेंगे। बशर्ते किसी अमेरिकन से शादी ना करें ।", कहकर वह हंसा ।

"इस बार शादी करने के लिए ही आए हैं लगता है।"

"विचार तो है ।", कहने में संकोच किया। दो पल ठहर कर, "सच्ची बात कहूं, मैं बहुत बड़े असमंजस में हूं। मुझे यहां के इस संस्कृति में पली-बढ़ी भारतीय लड़की से शादी करने की इच्छा नहीं है। यहां की लड़की से शादी करने में सोचना पड़ रहा है।"

"क्या सोचना ?"

"अमेरिका में एडजस्ट करके रहना इतना आसान नहीं है। अपने को जो जरूरत है वह इमोशनल एडजस्टमेंट वहां नहीं है। वहां, आपको पता है, कई भारतीय लड़कियों को परेशान होते मैंने देखा है।"

"आपकी अम्मा जैसे लड़की होनी चाहिए, ऐसी आप उम्मीद रखते हैं तो आप परेशान होंगे ही।"

"दुरैई बेकार बकवास करता है।", कहकर वह हंसा। मेरी अम्मा जैसी पत्नी मुझे नहीं चाहिए। क्योंकि मैं अपने अप्पा जैसे नहीं रहूंगा।"

‘तुम्हारे पिताजी कैसे हैं’ मैंने नहीं पूछा। इसमें कृष्णन जैसा आकर्षण नहीं है। बातें भी नपा-तुला ही करता है । बोलने में और देखने में दिखावटी नहीं है। एक सम्माननीय आदमी जैसा दिखाई देता है।

'भारत में सदमा देने लायक बदलाव मैंने अभी तक नहीं देखा', इसने जो बोला था वह मुझे याद आ रहा है। पता चले कि सुभद्रा जैसी लड़कियां यहां रहती हैं तो यह विश्वास भी नहीं कर सकता।

"कितने दिनों तक भारत में रहोगे?”, बात जारी रखने के लिए मैंने पूछा।

"एक महीना। मद्रास जाकर, वहां से मैसूर, बेंगलुरु जाना है। दिल्ली आकर ही अमेरिका जाऊंगा।"

"वाइफ के साथ!"

"आई एम नॉट शोर ! एक लड़की के बारे में कुछ भी नहीं जानते हुए उससे शादी करना असमंजस जैसे लगता है। शादी के बाद तुरंत उसे दूसरे देश लेकर जाना उसे कैसा लगेगा ?"

“आप ऐसे असमंजस में मत पड़ो । वरना आप शादी ही नहीं कर सकते।"

"ऐसा ही हो होगा लगता है।" तपाक से जवाब आया ।

"पढ़ी-लिखी होशियार लड़कियां होंगी बेंगलुरु, मैसूर में । बात करके देखोगे तो कुछ हद तक स्वभाव का भी पता चल जाएगा।", मैंने समाधान करते हुए कहा।

"आपने अभी तक क्यों नहीं की शादी?”, मैंने जिस प्रश्न के बारे में सोचा भी नहीं था श्रीकांत वही प्रश्न पूछ बैठा ।

मैंने हड़बड़ा कर उसे देखा। उसका चेहरा साधारण था। मैंने जरा मुस्कुराते हुए कहा: "किसी से करने का सोचा था मैंने । आखिर में वह हुआ नहीं। उस आदमी ने दूसरी जगह शादी कर ली।"

श्रीकांत कुछ सोचते हुए मुझे देखा। "सॉरी, मुझे आपसे पर्सनल प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था।“ वह कुछ धीमी आवाज में बोला और मेरे किसी प्रतिक्रिया से पहले ही वह आगे बोल पड़ा, "आप उसी धोखे में अब तक है क्या ?"

'मैं आपको आपके दुःख से अलग करूंगा, आपसे शादी करूंगा।', कहीं वह ऐसा तो कहने नहीं जा रहा ! यह बात मुझे गलत लगी । इसी सदमे को बर्दाश्त कर थोड़ा संभल कर धीरे से बोली-

"नहीं, थोड़े दिन तो मैं सदमे में थी। परंतु अब ठीक हो गई हूँ ।", मुझे लग रहा था कि वह कुछ सोचते हुए मुझे देख रहा है । कुछ तवं सा महसूस हुआ । उस उत्पन्न हुए कठिन वातावरण को टालने के लिए मैं हंसते हुए उठी।

"थोड़ा जूस लेकर आती हूं, ठहरिए।" कहकर अंदर जाकर कांच के गिलासों में फलों का रस भरा। रसोई के सिंक में हाथ धोकर आते समय खिड़की के कांच में अपने चेहरा पर नज़र पड़ी। मैंने बिखरे बालों को हाथों से ठीक किया, ठंडे पानी से चेहरे को सिंक में धोकर पोंछा। फिर से स्टिकर बिंदी को ठीक किया तो लगा चेहरा एक नयापन लिए हुए है। अचानक बहुत साल पहले देखी 'दी स्ट्रीट कार नेम डिजायर' फिल्म की याद आई। टिनेसी विलियमस नायिका विवियन लिविंन द्वारा घंटी बजाने पर दरवाज़ा खोलने के पहले जल्दी से कांच में अपना चेहरा देख थोड़ा पाउडर लगाती है। नायिका मेरी जैसे बिना शादी किये बड़ी उम्र की होती है.....

मुझे अभी देखते समय श्रीकांत को विवियन लिविंन की याद नहीं आनी चाहिए, मुझे फिक्र होने लगी । यह मेरी बुद्धि को क्या हो गया है ! मैं आश्चर्य से मेरे अंदर उठते सवालों के स्वयं ही जवाब दे रही थी ।

"बहुत गर्मी है!", कहते हुए उसको फलों का रस दिया।

अध्याय 12

"आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की ?", अचानक मैंने पूछ लिया। "आपके साथ भी कोई धोखा हुआ?", लगता है मेरी अक्ल सचमुच में मेरे बस में नहीं है ।

वह स्वाभाविक ढंग से हंसा।

"नहीं, इतने दिन शादी करना है जैसा लगा ही नहीं । रिसर्च प्रोजेक्ट में बहुत ही डूबा हुआ था। अम्मा जब तक थी बेचारी बोलती रहती, ‘एक बार आकर शादी करके चले जा।‘, मैं आ ही नहीं पाया।"

"अभी अम्मा नहीं है क्या ?"

"नहीं है। उन्हें गए पांच साल हो गए। उसके बाद इंडिया आने का यह उद्देश्य भी कम हो गया। अभी ही शादी करना चाहिए इस उद्देश्य से आठ साल बाद यहां आया हूं।

अभी तक यह बिना किसी लड़की से दोस्ती किये रहा होगा क्या, ऐसा सोचते हुए मैंने उसे "बेस्ट ऑफ लक" कहा । इतने में कॉलिंग बेल बज उठी। श्रीकांत ने उठकर दरवाजा खोला। दुरैई और नलिनी दोनों अंदर आए।

"रोहिणी नहीं आई क्या ?” श्रीकांत ने पूछा।

"उसे लेकर आते हैं सोचकर उसके घर गया था मैं । वह कहीं गई हुई थी । घर में ताला लगा था। रास्ते में नलिनी मिली तो उसे लेकर आ गया। रोहिणी यहां नहीं आई क्या?”, दुरैई ने मुझे देखकर पूछा।

अभी तक रोहिणी घर नहीं गई सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ।

"नहीं आई।", मैंने झट जवाब दिया। "मैं और वह कनॉट प्लेस गए थे। वहां से मैं ब्रिटिश काउंसिल चली गई। और उसने घर जाने को बोला था !"

‘कृष्णन के साथ गई हुई है’ बोलने में मुझे संकोच हुआ।

"घर पर नहीं थी।", दुरैई दोहराया। सर झटकते हुए श्रीकांत से, - “क्या बात है श्रीकांत?” बड़े उत्साह से बोला।

"कुछ नहीं ! इस तरफ से गुज़र रहा था तो इनसे भी मिलता चलूँ, सोच कर यहां आ गया", श्रीकांत बोला।

"दिल्ली में कोई लड़की देखी क्या ?"

"नहीं!", कह श्रीकांत मुझे देख कर मुस्कुराया।

फिर दुरैई को देखकर,"अभी हम बात कर रहे थे। अभी तक शादी क्यों नहीं हुई इस बारे में।"

"हमें भी जूस मिलेगा क्या दीदी ?" नलिनी बोली।

"क्यों नहीं!", हंसते हुए मैं उठ कर भीतर गई। मैं कांच के गिलास के साथ वापस आई तो दुरैई मेरे पास आया. कुछ सोचते हुए मेरे चेहरे पर निगाह टिका कर, "कृष्णन आया हुआ है?" धीमी आवाज में बोला ताकि कोई और न सुन ले ।

'तेरी पत्नी के साथ अभी घूम रहा है।' मन में बोलते हुए प्रत्यक्ष में, "हां", बोल कर मैंने पूछा "किसने कहा ?"

"नलिनी ने बताया। क्या कह रहा है कृष्णन ?"

"कुछ तो भी कह रहा है।", मेरी आवाज में उदासीनता भर आई । "अब उन सब बातों का क्या अर्थ है दुरैई ?"

"वह ठीक है", सहानुभूति दिखाते हुए। "उसी के बारे में तुम्हारे सोचते रहने से भी कोई मतलब नहीं है।"

पता नहीं क्यों अचानक ही मुझे तेज गुस्सा आ गया। "आप लोग बार- बार वही बात बोलते हो, मेरी समझ में नहीं आता है दुरैई। सब लोगों ने मुझे मूर्ख ही समझ लिया लगता है। अभी मेरा क्या बिगड़ गया ? उस आदमी का स्वाभाव पता चलने से अब शांति से ही हूं मैं!"

तभी मुझे कमरे में फैली एक तनावपूर्ण शांति महसूस हुई । हमारी बातें श्रीकांत के कानों में भी पड़ी होगी ।

"सॉरी मालिनी। आपको दुखी करने की मंशा नहीं थी मेरी ।", जल्दी से बोल कर दुरैई उठकर श्रीकांत के पास जा बैठा। उसकी बात ने मुझे और शक्तिहीन कर दिया, मैं और उदास हो गई ।

"आज विज्ञान भवन में आग लग गई, पता है ?"

बातचीत की दिशा बदलने से मुझे राहत मिली। उसके बाद उसी विषय पर विवरण देते हुए दुर्रई उसी में मस्त हो गया।

जब वे चलने को उठ खड़े हुए तब मैं दुरई से बोली, "तुम्हें रोहिणी के साथ ज्यादा समय व्यतीत करना चाहिए।"

"आई नो!", कहकर वह हंसा। "आज उसके लिए जल्दी घर गया तो वह नहीं थी। उसका बर्थडे आने में अभी सिर्फ 10 दिन बाकी हैं। उसके लिए साड़ी सिलेक्ट करने तुम मेरे साथ बाज़ार चलना !" वह बोला।

मुझे हंसी आई।

"आऊंगी, कब जाना है बोलो", मैं बोली।

"शनिवार को चलें ? तुम फ्री हो ना?"

"हां। मेरी छुट्टी है।"

"राइट, फिर चलेंगे", दुरैई उत्साह से बोला।

"घर चल रहे हो क्या श्रीकांत ? अब तक रोहिणी आ गई होगी।"

"नहीं, मुझे 8:00 बजे किसी को देखने जाना है। मैं रवाना होता हूं। कहकर श्रीकांत भी उठ खड़ा हुआ। फिर मुझे देख कर, "मैं बाहर जाकर आता हूं", बोला।

"बेस्ट ऑफ लक!" कहकर मैं हंसी।

"हां, बेस्ट ऑफ लक ! नलिनी ने यह और मिला दिया - "लड़की ढूंढने जा रहे हो ना!"

अनिश्चितता की एक हंसी हंसते श्रीकांत हाथ हिलाता हुआ रवाना हुआ।

"इसको क्या लगता है जैसे दुकान में सामान खरीदना हो वैसे पत्नी भी सेलेक्ट करना है ?", नलिनी श्रीकांत की कार के रवाना होते ही बोली।

और मुझे लगा कि वह ऐसा नहीं सोच रहा है शायद, इसीलिए असमंजस में है ।

"परंतु मुझे नहीं लगता, ये जाने से पहले इतनी जल्दी शादी कर पायेगा !”, नलिनी बोली।

"क्यों?" आश्चर्य से मैंने पूछा।

वह एक 'नियर पर्फेक्ट' लड़की को ढूंढ रहा है, ऐसा लगता है।

मैंने बिना कुछ जवाब दिए हंसी। पर्फेक्ट यानि करीब-करीब उसकी मां समान, अब ऐसी कोई लड़की तो कहां मिलेगी ? वह बोल तो रहा था कि ‘ऐसा सब मैं अपेक्षा नहीं कर रहा हूं ।‘ फिर क्या अपेक्षा कर रहा है ? मुझे तो संदेह कि उसको वह पता भी है कि उसकी अपेक्षा क्या है ? शादी का जो बंधन है अब एक सामान्य विषय नहीं रहा ।

समझौता करना हम्मांगा के काल में वन वे ट्रेफिक था. भारत की लड़कियां बदल रही हैं, इसे वह समझ नहीं सका तो वह परेशान होगा। ‘नियर परफेक्ट लड़की को ढूंढने जा रहा है, नलिनी के कहने से मुझे हंसी आती है। क्योंकि मुझे नहीं लगता कि वह ऐसे किसी विश्वास में रह रहा है। खुशी और पूर्णत्व दोनों सिर्फ भावनाएं हैं, यह उसे भी पता है। अमेरिका में तो जो वे चाहते हैं वाही सही है। नलिनी की बात पर मेरी हंसी का यही तो कारण है । "मुझे सब समझ में आता है। मैं एडजस्ट कर लूंगा। आने वाली कर लेगी क्या?" यह डर है।

इस तरह की असमंजसता क्या कृष्णन को रही होगी ? पता नहीं ! अचानक एक अनजान लड़की से कैसे शादी कर लिया पता नहीं! करीब दो साल पत्नी जैसे मुझसे अंतरंगता रख कर मुझ लड़की को छोड़ सका फिर उसके लिए कोई भी कठिन काम नहीं हो सकता। ‘कैसे वह इतनी आसानी से छोड़ पाया’, कई दिनों तक यह प्रश्न मुझे परेशान करता रहा था। जैसे एक सच के प्रमाण को तोड़ दिया हो मुझे ऐसा आघात लगा। कृष्णन ने ऐसा किया तो मन फट गया। उसने मुझे जो चेहरा दिखाया था उसे देखकर ही मैंने इस पचड़े में नहीं पड़ी कि उसे कैसा होना चाहिए। जैसी मैंने इच्छा की थी, वह वैसा ही था इसीलिए मैं कल्पना में ही खो गई।

शब्दों, वचन, सत्य इन सब विषय में पुरुषोचित है ऐसा मुझे लगता था । वही तो एक लोकगीत प्रसिद्ध हुआ है, जो आंखों में आंसू लेकर आता है। बोलने में, वचन में सम्मान ना देने वालों का अभाव दुनिया में होने से ही सब लोग इस खेल में बड़े आराम से शरीक हो रहे हैं। यही बात लोकगीत को चिरंजीवी बनाता है। जीवन का खेल एक झूठ का खेल ही है । मेरे पूर्वजों को यह बहुत ही अच्छी तरह से मालूम है। नारायणी बड़ी अम्मा, हम्मंगा, कप्पू तक । एक मदमस्त हाथी को कभी कोई पेड़ नहीं छिपा सकता ..अपने मन की बात को अपने मन में नहीं रखते तो जैसे पड़ -दादी को भूतनी ने पकड़ लिया वह भूत इन्हें भी पकड़ लेता।

अपना यह ढोंग जन्मजात है, यही सोच कर कृष्णन ने मुझसे घमंड में बोला था, "तुम्हारी नानी तुम्हारे अंदर से झांक रही है।" नानी के पास नहीं रही रोहिणी इसीलिए नहीं, बल्कि इसलिए कि वह उसे फंसाने में लग रहा है। उसकी अभागी पत्नी की सोचकर मेरे मन में दया आती है। कृष्णन का स्वभाव उसको मालूम होगा क्या, यह विचार मेरे मन में आ रहा है। परंतु उसको वह तृप्ति देने वाला पति हो सकता है; बड़े आराम से तृप्ति देने वाला होने के कारण ही वह सिंपल गर्ल है, वैसी ही रहने दो। एक दिन रोहिणी उसके साथ कनॉट प्लेस में घूमी हो तो कुछ बहुत बड़ी खराबी नहीं होगी। उसके बाद भी और दिनों तक उसके बारे में सोचना मेरे अंदर मन की कमजोरी को बाहर दिखाता है।

"आज मेरी मां की तिथि है ?" सुबह लक्ष्मी द्वारा पूछते ही मुझे भी एकदम से ध्यान आया। आज अम्मा की पुण्यतिथि है । कभी अपना दर्द व्यक्त नहीं करने पर भी, मुझे पता है, अम्मा ने मन में एक बड़ी कमी महसूस की थी । पुत्र नहीं होने की कमी। ‘बुढ़ापे में लड़का हमारी देखभाल करेगा’ यह सोच होगी, श्मशान में आग लेने के लिए सोचती थी क्या ? या फिर विश्वास करती थी कि पुत्र उन्हें नरक जाने से बचा लेगा, मुझे पता नहीं। 'मुझे लड़का समझो' एक बार मैंने मजाक में उनसे कहा था । 'तुम्हारा लड़का होता तो क्या करता, वह सब मैं कर दूंगी।', लड़की और लड़के की स्थिति में अंतर होता है, शास्त्रों की ऐसी बातों पर विश्वास करने वाली वह थी। परंतु फिर भी उसके आखिरी दिनों में वह मेरे पास ही रही। उसके मरने वाले दिन को सोचकर मैं, जिस पर उसे बहुत विश्वास था उस मुरूगन के दरबार में जाकर अर्चना करके जरूर आती थी; उसको दिए हुए वचन का मैंने पालन किया, ऐसा विचार मुझे आता है।

अध्याय 13

नलिनी आज सुबह से ही कहीं गई हुई है। लक्ष्मी को जल्दी काम खत्म करने को कह कर मैं उत्तर स्वामी पहाड़ी पर जाने के लिए रवाना हुई। वहां के पुजारी मुझे पहचान कर हंसे।

"आप अकेले ही आए हो क्या?", पूछे। उनका पूछने का मतलब था कि अभी तक तुम्हारी शादी नहीं हुई ! उस पर ध्यान न देकर मैंने कहा, "हां"। भीड़ में यहां के नॉर्थ इंडियंस भी थे। पर्दा लगा कर मुरूगन का अलंकार हो रहा था। (कोई तमिल भजन) ‘तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो’, यह किसी ने गाना शुरू किया। बहुत ही मधुर, बिना स्वर लडखडाये बढ़िया ताल और लय के साथ गाया जा रहा था तो मुझे बहुत अच्छा लगा। बहुत दिन हो गए थे तमिल गाने को सुनकर। मां को हमारी जड़ों पर मुझसे ज्यादा विश्वास होना था । यहां पर तमिल गाने को सुनने ही अक्सर आती थी, ऐसा मुझे लगता है। ऐसा एक आकर्षण शक्ति होने के कारण है मेरे द्वारा कन्नड़ में बात करते समय श्रीकांत का चेहरा कैसे खिल गया था !

अर्चना की थाली वापस देते समय, "याद से प्रसाद लेकर जाइए", पुजारी जी बोले। खिचड़ी और गरमा-गरम बड़े थे प्रसाद में । मुझे याद आया रोहिणी को यह बहुत पसंद है। इसे लेकर उसके घर जाकर लंच किया जाये तो कैसा रहेगा ! ऐसा सोच कर मैं रवाना हुई। रोहिणी से मिलने की इच्छा हो रही थी। उस दिन कृष्णन के साथ उसके चले जाने के बाद से मन विचलित हो रहा था।

मेरी उम्र हो गई इसकी निशानी भी हो सकती है यह। करीब-करीब अम्मा के जैसे ही मुझे भी सभी बातों के लिए फिक्र होना शुरू हो जाता है । उसके घर पर पहुंचते ही ऑटो रिक्शा को वापस भेज कर ऊपर उसके घर के लिए लिफ्ट से पहुंच गई । घंटी के बटन को दबा कर ‘प्रसाद के खिचड़ी और बड़ों को देखकर उसका चेहरा कैसे खिलेगा’ कल्पना करने लगी। दरवाजा नहीं खुला। मैंने दोबारा घंटी बजाई। कोई जवाब नहीं। झुक कर देखा, घर में ताला नहीं था । हो सकता है नहा रही होगी । पड़ोस के फ्लैट में रहने वाले को मैं जानती हूं। वहां जाकर बैठूँ सोच उनकी घंटी बजाई।

"मेम साहब नहीं है ।", तमिल कामवाली ने बोला।

"कोई बात नहीं, यहां मैं थोड़ी देर बैठ जाती हूं, मेरी बहन नहा रही है लगता है।"मैं बोली।

कामवाली बाई कूलर लगा कर ठंडा पानी पीने के लिए ला कर दिया। धूप में आने की थकावट को दूर करते हुए मैंने सोफा पर आंख बंद करके सर पीछे टिका दिया । रोहिणी बहुत ही आलसी हो गई है, मुझे गुस्सा आया। इस समय का क्या नहाना ?

कहीं दरवाजा खोलने की आवाज आई। मैं आंख बंद करे बैठी रही।

"अम्मा तो यहीं हैं।", बाई बोली। "अभी एक आदमी बाहर जा रहे हैं।"

उसकी बात का रिफ्लेक्शन एक्शन जैसे मैंने यंत्रवत खिड़की से बाहर झाँका तो देखा कृष्णन रास्ते में जा रहा था।, नीचे दिखी । एक ब्लॉक आगे मैंने टाटा सूमो कार जो उस दिन हमारे घर लेकर आया था खड़े देखा । मैं अवाक् रह गई कृष्णन रास्ते में जा रहा था। कुछ पल के लिए मेरी बुद्धि अचंभित रह गई। उसके बाद ऐसे लगा जैसे पेट के अंदर ज्वाला उठ रही हो।

"आप आए हैं, उन्हें मैं बोल दूं ?", कामवाली बाई बोली।

"नहीं, नहीं ! नहीं, मैं ही चली जाती हूं", मैं थोड़ी घबराहट के साथ बोली । परंतु मेरे पैर सरके नहीं, जहां खड़े थे वही खड़े रहे। कृष्णन के चल कर गाड़ी के अंदर बैठने के बाद उसके रवाना होने तक मैं देखते हुए वहीँ खड़ी रही। मुझे होश आने पर कामवाली बाई को मेरे जाने का इंतजार करते पाया । यही वजह थी कि मुझे रोहिणी से मिलने जाना पड़ा। नहीं तो रोहिणी को देखने और बात करने की मनःस्थिति में मैं नहीं थी । दुख, गुस्सा, अहंकार, अपमान जैसी बहुत सी भावनाएं दबाते हुए मैंने रोहिणी के दरवाजे पर पहुँच घंट बजाई। तब तक बाई तमाशा देखती हुई खड़ी थी। रोहिणी ने दरवाजा खोला। उसका प्रसन्न चेहरा मुझे देख कर ऐसा हो गया जैसे कि भूत देख लिया हो । मेरे मन में आया कि उसकी इस अवस्था पर उस कामवाली बाई का ध्यान नहीं जाना चाहिए ।

"आओ, मैंने तुम्हारी आने की उम्मीद नहीं थी।", रोहिणी मन के भाव ढांपने के प्रयास में हंसते हुए अंदर जा एक तरफ खड़ी हुई।

मैं उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहती थी अतः मैं बैठक के अंदर दूसरी तरफ बढ़ गई। भारी पर्दों से खिड़की ढके होने से कमरे में अंधेरा हो रहा था। पूरा कमरा लैवंडर की खुशबू से महक रहा था । कुछ देर के लिए दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। जो बच गया था वह गुस्से में आग बबूला हो रहा था । शब्द मुंह में नहीं आकर गले ही में फंस कर मौन हो गए।

"यह सब क्या है?", कहते हुए मेरे हाथ से बर्तनों को उसने लिया तब मेरे दिमाग में थोड़ी हलचल हुई।

"उम्मीद नहीं होने के कारण ही दो बार घंटी बजाई तो भी तुम्हें सुनाई नहीं दिया ?", मैं और अधिक चुप ना रह पाई।

"दो बार बेल बजाई क्या ?", उसने थोड़ा हडबडाते हुए पूछा ।

"मुझे आए हुए आधा घंटा हो गया !", मैं अब भी उसकी तरफ नहीं देख रही थी । "दरवाजा नहीं खुलने से मैंने सोचा कि तुम नहा रही हो सो पड़ोसी के घर में जाकर बैठी।"

“ओह, हो सकता है ! तुमने जब घंटी बजाई उस समय मैं बाथरूम ही धो रही थी। नल की आवाज में सुनाई नहीं दिया हो । आज कामवाली बाई नहीं आई ना ।"

मुझे लगा और प्रश्न पूछ कर उसे और झूठ बोलने का अवसर देना मेरे लिए ही अपमान है । मुझे याद आया छोटी उम्र में बहुत सी गलतियों को छुपाने के लिए झूठ बोलने पर मेरी नानी बीच चौक में खड़ा कर, "झूठ बोलेगी क्या, बोल ! बोलेगी ?”, पलट-पलट कर दोनों गालों पर चांटा मारती थी। जो गलती किया उस से बढ़कर झूठ बोलना बड़ा दोष है । गुस्से के कारण मेरे शरीर में आग जैसे लग गई । लगा यह ज्वाला भड़की तो यह उसमें भस्म हो जाएगी ।

रोहिणी मेज पर जाकर डिब्बों को खोलते ही उचक कर बोली "यह क्या है ? प्रसाद ! मंदिर गई थी?" मुझे अम्मा की याद आ गई.

"अम्मा के मरने का दिन है आज।" मेरी आवाज में दम नहीं था।

"ओह ! हां, भूल ही गई।" कैलेंडर पर नजरें घूमाती हुई वह बोली ।

तुम और कई विषय भूल गई हो, मैं अपने मन ही मन बोली। मार खाए हुए मनुष्य की सभ्यता ही कुछ और होती है, तुम वही भूल गई ? मेरे साथ धोखा देने वाले के साथ तुम प्रेम दिखा रही हो ? ऐसा कर तुम मुझे ही नहीं, अपने आपको भी अपमानित कर रही हो। ‘क्या ठीक है, क्या गलत है इसका तुम्हारे पास कोई मानक है?’- उससे ऐसा पूछना ठीक नहीं होगा। मनुष्य की सभ्यता ही इसका मापदंड है। 'परिस्थितियों, संदर्भ, इन सबके गुलाम हैं हम', ऐसे कुतर्क करने वाले मनुष्य के समझ में न आने वाला तत्व है सही और गलत के मापदंड । वह कुछ कुछ किये जा रही थी और मैं मुक्का मारे प्याज की तरह जिसका एक एक परत अपनी जड़ों से हिल कर बिखर गया हो, मैं उसे काम करते हुए देख रही थी । पतली साड़ी में दिख रहे उसके छाती के उभार, बिना आस्तीन के उसका ब्लाउज में दिखाई दे रहे उसकी भुजाओं को देख गंदे शब्द याद आए। सुंदरी बुआ के बारे में बात करते समय अप्पा हमेशा उसे 'साली भगोड़ी' कह कर दांत पीसते थे। 'इसे बांध के ना रखो तो नकेल छुड़ा कर भाग जाएगी' । सुंदरी बुआ को स्वतंत्रता नहीं थी ‌। यह अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करती हैं।

दो प्लेटो में बड़े और खिचड़ी निकाल कर रख मेरी तरफ देने के लिए आई तो विदेशी सेंट की खुशबू मेरे नथुनों में घुसी। मैंने उसे देखा।

"सुबह के समय किसके लिए यह सेंट सब ?", मुझसे चुप नहीं रहा गया, बड़ी रुखाई से आगे जोड़ा, "तुमको देखने से तो नहीं लग रहा है कि तुम बाथरूम धो रही थी !"

उसका चेहरा तुरंत बदल कर सख्त हो गया। "अपने लिए ही लगाया सेंट !", धीमी आवाज में बोली। अच्छी तरह से ड्रेसअप होकर, खुशबू लगाने से आई फील गुड ! ताकत आ गई ऐसा लगता है। व्हाट इज रॉन्ग?"

मेरे अंदर की ज्वाला एकदम से लपकी । मेरे शब्द फट पड़े।

"गलती नहीं है ? बेचारा पति के ऑफिस चले जाने के बाद सेंट डालकर दूसरे पुरुषों को खुशबू देना गलत बताऊँ तो मुझे अच्छे से पता है कि तुम फिर क्या बोलोगी मुझे ! यही ना कि मैं नानी जैसे बोल रही हूँ ?"

उसके चेहरे का रंग उड़ गया। "तुम क्या बोल रही हो मेरे समझ में नहीं आ रहा।" रोहिणी ने कमजोर आवाज में कहा ।

मैं अपने हाथ की प्लेट तिपाई पर रखकर स्वयं को नियंत्रित करने के लिए उठकर कूलर के सामने जाकर खड़ी हुई। उसकी तरफ देखने की भी इच्छा नहीं हुई, "कृष्णन यहां आया था मुझे पता है ।" मैं उसे इतना ही कह पाई, मगर मन में मेरे संवाद कहाँ थम रहे ! सोच रही हूं ऐसा कुछ नहीं हुआ मुझसे मत कहना। पता है नानी तुमको सांप का पेड़ कहती थी। यह बात मुझे अभी समझ में आ रही है।

उस कमरे में कूलर के आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं थी। मैं उसे घूम कर देखी तब वह सर झुका कर बैठी थी। मेरे मुड़ने को महसूस कर अपना सर बिना ऊपर उठाए "सॉरी मालिनी" बोली। "कैसे तो भी यह हो गया । मैंने ऐसा नहीं सोचा था । तुम्हें गुस्सा आएगा ही......."

"गुस्सा ?", मैं व्यंग में बोली। "किसलिए ? क्या यह बात महत्वपूर्ण है कि मुझे गुस्सा आएगा ? कृष्णन का अपना कोई मत नहीं है, वह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं। फिर भी, इज इट फेयर टू दुरैई ? यह बात पता होते ही वह टूट जाएगा।"

उसने एकदम से सर ऊपर उठा मुझे देखा, "उसे जानने की जरूरत नहीं।" जोर से बोली।

अध्याय 14

अप्रत्यक्ष रूप से उसने आज्ञा दी ‘तुम नहीं बोलोगी।‘

"कृष्णन 4 दिन में अमेरिका चला जाएगा। हमारा संबंध सीरियस वाला नहीं है। हम दोनों के परिवारिक जीवन इससे बाधित नहीं होंगे ।"

लगा जैसे यह करीब-करीब सुभद्रा जैसी बात कर रही है । परंतु, सुभद्रा जैसे सिद्धांत बताना इसको नहीं मालूम। कृष्णन का फैलाया जाल है यह। यह प्रेम के लिए तड़प गई है ऐसा उसे अंदाजा है। ‘यह शरीर जो है सिर्फ एक कपड़ा है, इसको कोई महत्व नहीं देना चाहिए’ ऐसे तत्व की उसने बातें की होगी, इसकी सुंदरता की तारीफ करके। मन में चल रहे झंझावातों से मुझे बहुत थकावट लगी, ऐसा लगा जैसे मेरी उम्र ज्यादा हो गई है। मन अभी भी अधीर हो रहा था। इन 10 दिनों में रोहिणी ने अचानक एक नया रूप धारण कर लिया है। 'कौन सा कोर्ट मुझे ड्राइवर्स दिलायेगा ?' अब यह बदला रूप ऐसा बोलकर आंसू नहीं बहायेगा। अपने जीवन में उत्सुकता लाने के लिए इतनी बड़ी कीमत देने की जरूरत नहीं।, "क्यों-क्या'' मैं पूछूँ तो वह 'आई एम जस्ट हैविंग फन !' ऐसा वह बोलेगी। हंगम्मा के पति को इस तरह की ही इच्छा रही होगी। 'एक दूसरी स्त्री के साथ मेरे सोने के कारण मैं तुम्हें अलग नहीं करूंगा।' आदमियों के वर्ग से बदला लेने के लिए ही सुभद्रा के रूप में, रोहिणी के रूप में हंगम्मा ने दूसरा जन्म लिया होगा। लगता है जैसे हंगम्मा की जगह पर अब दुरैई रह रहा है।

मैं रवाना होने के लिए तैयार हुई। "दुरैई बहुत अच्छा है।" मैं कांच को देखते हुए बोली । मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि रोहिणी रोना शुरू कर देगी । वो रोना स्वयं के पश्चाताप का या स्वयं को दोषी मानने के कारण था, मेरी समझ में नहीं आया।

रोते हुए बोली, "दुरैई अच्छा आदमी हैं ! अच्छा किसे कहते हैं ? किसी को भी कैसे भी परेशान न करने वाले आदमी को ? उसकी अच्छाइयां नॉर्मल नहीं है। किसी चीज को तोड़ो, कोई चीज गुम गई हो, उसे गुस्सा नहीं आएगा। अच्छी साड़ी पहनकर सामने खड़े हो जाओ, 'सुंदर लग रही हो' उसे अप्रिशिएट करना नहीं आता। मेरे अंदर भावनाएं हैं, ऐसा उसे नहीं लगता। उसको अपने ऑफिस के अलावा, और किसी चीज के बारे में बात करने के लिए उसके पास समय होता है ? मैं बोर होती हूं। मैं साधारण मनुष्य हूं।"

मैं धीरे से बाहर निकली। मन अभी तक पत्थर से मार खाया जैसे स्तंभित था। 'ओ-ओ' की आवाज कर जोर-जोर से रोऊं, लगता है तभी मेरे मन का भार कम होगा । परंतु मुझे रोने की आदत नहीं। कृष्णन-रोहिणी के व्यवहार के बारे में दुरैई को बताना मेरी ही कमजोरी होगी। इसको मैं अपने अंदर ही गाड़ दूं, यह कैसी समझ है ? शायद यही मेरा धार्मिक कर्तव्य है । अच्छी बात है, कृष्णन बाहर चला जाएगा...अधिक नुकसान होने के पहले। रोहिणी गाना सीखने में अपना मन लगा लेगी। अपने दोषी मन को संतुलित करने के लिए वह दुरैई के साथ दया से पेश आए तो आश्चर्य की बात नहीं।

मुझे लगा जैसे अचानक कोई रस्सी कट गई, किसी बंधन का आख़िरी आभास भी टूट गया । कृष्णन ने मेरा भी उपयोग किया, यह बात मेरी समझ में अभी आई । मैं उसके साथ मिल कर रही तब मैंने जो सुख का अनुभव किया क्या वह एक सपना था ? मुझे वह बात बहुत ही परेशान कर रही है। असंतोष का कारण वह नहीं है। शरीर का कामी होने की वजह से जो संतुष्टि मिली वही उसका कारण है। बिना जिम्मेदारी के किसी सामिप्य में संतुष्टि ज्यादा होती है। आज ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरा सपना टूट गया ।

मैं घर पहुंची तब तक नलिनी नहीं आई थी। लेटर बॉक्स में मेरे लिए एक पत्र था. मैंने देखना चाह उसमें हस्ताक्षर किसका है, पहचान नहीं पाई. वह श्रीकांत का पत्र था। शादी का इनविटेशन होगा सोच कर खोला।

यहां जितनी लड़कियां मैंने देखी उससे मैं संतुष्ट नहीं हुआ। आपको मैं पसंद करता हूं। आपको मुझसे शादी करने की इच्छा हो तो मैं बहुत खुश होऊंगा। बस इतना सा लिखकर ही साइन किया हुआ था पत्र में । मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। फिर मुझे हंसी आई। इसको मेरे बारे में क्या पता है ? आपको मैं पसंद करता हूं- यह एक विचित्र घटना मुझे खुशी दे रही थी । बिना उम्मीद के मिली प्रशंसा जैसे। परंतु उसको मेरे बारे में कुछ भी तो नहीं पता। ‘अम्मा के जैसी लड़की नहीं चाहिए’ बोलते समय अपनी अम्मा की छवि ही उसके मन में रखी होगी । दस साल से दूसरे देश में रहा हुआ है फिर भी उस संस्कृति में पली-बढ़ी लड़की नहीं चाहिए। भारतीय लड़की ही चाहिए। इसका मतलब इसके मन में रहने वाली लड़की बहुत पवित्र होगी।

पवित्रम - बहुत ही निंदनीय नाम ही नहीं-यह तो बड़ी ऊंची चीज लगी। क्या गलत, क्या सही, जैसे रोहिणी ने पूछा, ‘वैसे पवित्रता से उसका क्या मतलब है, उसका परिणाम क्या है ?’ यह सब जानने समझने में मुझे कोई रुचि नहीं। मैं सच बोले बिना नहीं रह सकती। कृष्णन और मेरा अभी कोई संबंध नहीं है फिर भी, उसके साथ मेरी रही घनिष्ठता के बारे में बिना बताए मैं नहीं रह सकती। उसको हजम करने की शक्ति उसमें हो तो मुझे शादी करने में कोई परेशानी नहीं। उससे शादी करूं तो कन्नड़ नहीं भूल पाऊंगी ऐसा एक बचकाना ख्याल मुझमें उठा। उस दिन जो मन की परेशानी थी उसे भूल मैंने श्रीकांत को बिना कुछ छुपाए एक पत्र लिख डाला। उस पत्र को देखकर उसे कैसा लगेगा, यह सोचते हुए मैं गली के कोने में जो लेटर बॉक्स था, उसमें डालने के लिए रवाना हुई। सच को नंगा देखने का साहस किसी में नहीं। नंगा दिखाना कुरूपता है इसीलिए इस बात को मन में रखकर लोग झूठे चेहरे ढूंढते हैं। या मुखौटा पहनते हैं, एक ही बात है। असली चेहरा देख कर भी नहीं देखा जैसे मिलते रहो, यही दुनिया है। रोहिणी-कृष्णन के बारे में दुरैई को पता चले तो वह क्या करेगा, मैंने सोचा । जान कर भी अनजान बनकर रहेगा, और क्या । 'उसकी एक अच्छाई है जो नॉर्मल नहीं है। कोई चीज टूट जाए या गुम हो जाए तो उसे गुस्सा नहीं आता, वह पहले टकराव से बचना चाहता है।‘ यह आंख-मिचौनी का खेल आदिकाल से चला आ रहा है। जाने कहाँ से एक अवधूत स्वामी जी की कहानी मुझे याद आ रही है। कहानी नहीं, एकदम सत्य घटना । उस समय मेरी उम्र 10 साल थी। अम्मा के साथ गांव गई थी। दूर के रिश्तेदार के घर गए थे । उनके घर में सिर्फ एक लंगोटी बांधे मस्त मौला शरीर वाला बीच उम्र के एक स्वामी जी आए थे। ‘ये ही भगवान हैं’, ऐसे घर वाले कह रहे थे। गांव के लड़कियों-लड़कों को दर्शन देने के लिए आए थे। रिश्तेदार के लड़की अभी कुंआरी थी। उसके 2 महीने का बच्चा था। ‘यह स्वामी जी का दिया प्रसाद है’, उसकी मां ने बताया था । भगवान ही पैदा हुए हैं। इसके चेहरे पर कितना तेज है देखिए ! ‘मेरा झूठा खाओ ऐसा कह एक केला आधा खा कर उन्होंने दिया..... बेंगलुरु वापस आने पर, एक दिन मेरे मामा ने एक अमरुद आधा खाकर बचा हुआ आधा अमरुद मुझे दिया। "नहीं रे, मुझे नहीं चाहिए फिर मुझे बच्चा हो जाएगा।" ऐसा कह मैंने मना किया।

श्रीकांत के पास से आने वाले प्रस्ताव को अधिक महत्व नहीं देते हुए बात मैंने नलिनी को नहीं बताया। मैं रोहिणी के घर गई वह भी मैंने नहीं बताया, बात बताते समय कहीं मुझे गुस्सा ज्यादा न आ जाए।

दूसरे दिन मैंने दुरई को फोन किया।

"रोहिणी के लिए साड़ी लेने के जाना था ना ?”

"नहीं, कल घर लौटते वक़्त लेकर आ गया", वह उत्साह से बोला।

"साड़ी लेने से ही नहीं हो जाता दुरैई", प्रेम से समझाते हुए मैं बोली। "उसके साथ तुम्हें समय बिताना चाहिए, कुल्लू-मनाली कहीं हॉलीडे मना कर आओ।"

” इस साल नहीं हो सकेगा। कुल्लू-मनाली कहां भाग कर जाएगा ?” वह बोला। "यू नो समथिंग ? मैं ज्यादा देर उसके साथ रहूं तो वह बोर हो जाती है।"

मेरा दिल धक से रह गया। "यह क्या कल्पना है दुरैई", नरमी के साथ बोली। "उसके पसंद के विषय में तुम भी इंटरेस्ट दिखाओ। सब रिश्तों को निभाने के लिए परिश्रम की जरूरत होती है दुरैई।सही समय का इंतजार नहीं कर सकते।"

"यू आर राइट", उसकी आवाज में उदासी उतर आई थी। "कभी-कभी लगता है, मैं उसके लिए उपयुक्त पुरुष नहीं हूं, मालिनी।"

"नॉनसेंस ! तुम्हें पसंद करके तो उसने शादी की । काम को भूलकर ज़रा कहीं घूम-फिर आओ साथ । दोनों के लिए अच्छा होगा ।"

"ओके, देखेंगे। उसके बर्थडे के दिन कनिष्का में खाना खाएंगे। आप और नलिनी भी आइए ना।"

"हम क्यों ?"

"वैसे ही आईए ! हॉलीडे में मत आना।", कह कर वह हंसा।

नलिनी को पार्टी के बारे में बताया तो उसने उत्साह से सीटी बजाई। "रोहिणी के नाम पर अच्छा खाना खाएंगे ! प्रेजेंट भी तो लेना पड़ेगा ? मेरा एक दोस्त बेंगलुरु से इलेक्ट्रॉनिक बाजा लेकर आया है। ले लें क्या? " उसने पूछा ।

कीमती होने पर भी रोहिणी के उपयोग की चीज है सोच कर मैंने खरीदने को हाँ कर दिया । अचानक मुझे अम्मा की याद आई। मेरी जगह वह होती तो बाजे को भूलकर पूछती, ‘कौन है वह दोस्त ?’ नलिनी के लिए लड़का-लड़की बराबर ही है। मुझे तो लगता है किसी भी आदमी के साथ अभी तक उसका संबंध नहीं हुआ । होता तो मुझे बताती जरुर ।

"दीदी आप मेरी फ्रेंड गीता को जानते हो ना ? उसकी शादी रुक गई है ।", वह बोली।

"क्यों?”, चौंक कर मैंने पूछा‌। "वह लड़का अमेरिका में पढ़ रहा था ना?"

"हां। उसे पता चला कि वहां वह बहुत सी लड़कियों के साथ घूमता था । इसीलिए गीता ने कह दिया कि शादी नहीं कर सकती । फोन पर गीता को क्या कहता है मालूम ? ‘इन सब बातों को इतना सीरियसली मत लो, यह सब ऐसे ही फन है ।‘ यहाँ यह ऐसे घूमती होती तो वह चुप रहता क्या, रास्कल !"

मैं कुछ नहीं बोली। मुझे परितोष की याद आई। आदमी-औरत का रिश्ता, धार्मिक दृष्टि से बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड है ; पुराने जमाने में और इस जमाने में अपने-अपने ढंग से उसकी आकृति प्रकृति लेने के कारण विषय बदल जाता है।

"वह तो वचनों को तोड़ना हो गया न ?", नलिनी बोलती जा रही थी । "अभी से अनुशासित नहीं होने वाला शादी के बाद ठीक कैसे रहेगा भला ?"

‘कृष्णन इसी तरह का आदमी है’, मैंने अपने मन में सोचा। मेरे मन में आशंका थी कि उसकी पत्नी कैसी होगी । कहाँ पता था कि उससे दूसरे दिन ही मुलाक़ात हो जाएगी ।

रोहिणी के जन्मदिन का गिफ्ट उसके घर जाकर ही दे कर हम शाम को कनिष्का होटल जाएंगे। नई साड़ी में रोहिणी सितारे-सी चमक रही थी । दो दिन पहले जो कुछ हुआ था उसे मैंने और रोहिणी, दोनों ने भूल जाने का नाटक किया। दुरैई अपने हमेशा जैसे भोलेपन से बात कर रहा था। डिनर आर्डर कर हम इंतजार कर रहे थे तभी अचानक वहां अपनी पत्नी के साथ कृष्णन आया। जहाँ रोहिणी का चेहरा एकदम खिल गया वहीँ उसे देख मैंने अपमानित महसूस किया।

अध्याय 15

हम सबको वहां देख "व्हाट ए प्लेजन्ट सरप्राइज !" कृष्णन बोला। मैं जानती थी वह जानबूझकर आया है । "मीट माय वाइफ !", उसने बड़ी अदा से अपनी पत्नी उषा का हम सबसे परिचय कराया। मेरे आशानुरूप ही उषा एकदम किसी गुड़िया जैसी थी। कृष्णन रोहिणी की तारीफ़ में "यू लुक ब्यूटीफुल" बोल रहा था। दुरैई संकोच भरी नज़रों से मुझे देखा। जैसे कह रहा हो ‘मैंने नहीं बुलाया’।

"हम आपके साथ बैठे सकते हैं क्या?", आकर्षक शैली में कृष्णन बोला।

"ओ श्योर, प्लीज !", दूसरा कोई चारा ना देख दुरई बोला। कृष्णन, रोहिणी और नलिनी के बीच जा बैठा। "तीन साल पहले तुम छोटी लड़की थी। अब अपनी दीदियों जैसे तुम भी सुंदर और बड़ी हो गई हो ।", कृष्णन अब नलिनी से मुखातिब था । उषा को अच्छा नहीं लगा, यह बात मेरी नज़रों से छुप नहीं सकी ।

"दूसरे आदमी को देखो कृष्णन", उसने उसे बीच ही में काटा। "मैं धोखा नहीं खाऊंगी।"

मैं मुस्कुराकर उषा की तरफ घूमी।, "अमेरिका में रहना कैसा लग रहा है? आपको पसंद आया न? "मैं बोली।

"हां पसंद है !" उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आ गए थे। "वहां सब सुविधाएं हैं। जीवन की सुविधाएं अधिक हैं। दो गाड़ी, दो टीवी इत्यादि साधारण लोगों के पास भी हैं ।"

श्रीकान्त के मन में जो असमंजस था वैसा इसके मन में नहीं है ।

"दूर देश में हैं ऐसा कभी नहीं लगा। हर 15 वे दिन में इंडिया में फोन कर लेते हैं।"

मैं हल्के मुस्कुराहट के साथ उसकी बातों को सुन रही थी। अमेरिका की बढ़ाई करते हुए लगता है वह बिल्कुल नहीं थकेगी । परंतु हो सकता है यह भी पर्दा ही हो । कृष्णन की रोहिणी से निकटता से बात करने को भी वह देश से हुई बात बता रही थी। मेरे बारे में कृष्णन ने कुछ नहीं कहा होगा मुझे लगा। उषा एक दीर्घ श्वास ले अपने चारों तरफ देखने लगी।

"वहां रहते समय बहुत इच्छा हो रही थी कि इंडिया आना है । यहां आने के बाद कब लौटेंगे ऐसा लग रहा है।"

"क्यों?" मैंने बिना ध्यान दिए पूछ लिया ।

"कुछ अलग सा हो गया ऐसा कुछ समझ में नहीं आ रहा।" सीधी लड़की है। जोड़ी सीधी रहते-रहते दूसरे की बदमाशी अधिक हो जाती है। पुरुष, महिला दोनों की ही समान नीति है। जिसके पास नहीं होता है-जिसके पास होता है दोनों के बीच लड़ाई जैसे।

"परंतु अभी सिर्फ 1 दिन ही है", मैं बिना समझे उसे देखा।

"कल रात हम न्यूयॉर्क के लिए रवाना हो रहे हैं।"उसके चेहरे में एक प्रकाश दिखाई दिया, जैसे बच्चे बोलते हैं न - कल से स्कूल जाने की जरूरत नहीं है ।

खाना खत्म कर उठते ही कृष्णन ने सबसे हाथ मिलाया। उसने बताया कि कल रवाना होंगे। और यह भी कि दोबारा 3 साल बाद आना होगा ।

"उसके पहले दुनिया शायद उलट जाएं।", मैं तपाक से बोली। उस पर बिना ध्यान दिए सबसे हाथ मिलाकर कृष्णन सपत्नी रवाना हो गया ।

"इसमें शर्म-वरम कुछ नहीं है ! नीरा बेशर्म आदमी है ये।" नलिनी बडबडा उठी, "आकर ऐसे खड़ा हो गया जैसे आमंत्रित हो !" मैंने भी रोहिणी की तरफ ना देख कर चुपचाप आकर कार के अंदर बैठ गई। लगा जैसे एक अध्याय खत्म हुआ ।

सचमुच में मन का दबाव कुछ कम हुआ सा लगा। कृष्णन के चले जाने के कारण होगा शायद। बेवजह ही एक तूफान खड़ा करने आया हो जैसे । अचानक आकर खड़ा हुआ वैसे ही रवाना भी हो गया। और 'अभी कुछ भी नहीं हुआ' ऐसे उसके छांव में रहने वाली उसकी पत्नी है। रोहिणी हमेशा जैसे रहने लगी है । एक नए उत्साह के साथ कुल्लू-मनाली जाने के लिए जब दुरैई ने उसे कहा तो रोहिणी बड़े उत्साह के साथ रवाना हुई । यह जानकर मुझे शांति हुई । बीच में श्रीकांत की याद भी आई। उसके पास से कोई जवाब ही नहीं आया था । इस विषय में मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं है। कुल्लू-मनाली जाने के पहले दुरई ने मुझसे कहा था -

"श्रीकांत के पास से कोई समाचार नहीं आया। अभी भी कोई लड़की पसंद नहीं आई लगता है।", मैं चुप रह गई । फिर जैसे कुछ अचानक याद आया हो -

"उसके अप्पा और अम्मा कैसे थे ? तुम्हें पता है ?"

"हां, अब दोनों जने नहीं रहे। उसके पिताजी बहुत गुस्से वाले थे। उसकी अम्मा बहुत सुंदर थी। उसकी मां बेचारी बहुत ही सहनशील और धैर्यवान थी। उनके पास वह बहुत कष्ट पाई है ऐसे श्रीकांत बोलता है। उसे वह बात अभी भी परेशान करती है।"

मैं मौन रह गई। मेरे घर में भी ऐसी कहानियां नहीं है क्या। लड़कियों के रहने वाले सभी घर में कहानियां होती है। महिला और पुरुष के रिश्ते से कहानियां पैदा होती है। मन को परेशान करने वाली वे कहानियाँ अगली पीढ़ी को भी परेशान करती है।

“उसके अप्पा शंकालु स्वभाव के थे। इसीलिए बेटा भी जल्दी से किसी को पसंद नहीं कर सका।“ मेरा ऐसे कहना सुन दुरैई हिचकिचाया होगा। भारत की लड़कियां ऐसे भी बिना संकोच के बात कर सकती हैं क्या श्रीकांत ने सोचा होगा। हो सकता है उसे सदमा भी लगा होगा। उसे भूलने के लिए उसको एक अच्छे लड़की की जरूरत है। इस बार नहीं मिली तो अगली बार...... वह अच्छा है। ‘वह एक नियर परफेक्ट को ढूंढ रहा है, ऐसा लगता तो नहीं’- उस दिन नलिनी बोली। नियर परफेक्ट लड़की कैसी होगी सोचने में भी इंटरेस्टिंग लग रहा था। निश्चय ही वह मैं नहीं हूं ऐसा मुझे आभास हुआ। परफेक्शन तो एक माया है। मनुष्य के विरोधी है। सोने का शाल ओढाकर तख्त पर बैठाने जैसे हुआ। तख्त-शॉल की मुझे जरूरत नहीं। मेरे पुरानी पीढ़ी जिस तरह फंसी हुई थी वैसे फंस कर मुझे परेशान नहीं होना है।

आज सुबह उठते समय पूरा घर धूल से भरा हुआ था। कल रात में आंधी आई होगी। नलिनी ने सभी खिड़कियों को हमेशा की तरह बंद कर दिया होगा। मैं गहरी नींद में सो रही होंगी। परंतु अब वह बेशर्म सपने नहीं आते। मैं सचमुच में नारायणी बड़ी मां जैसे स्थिति में आ गई लगता है।

'यह एक बेकार सिटी है"। कहती हुई लक्ष्मी झाड़ू और डस्टिंग के लिए कपड़ा लेकर आई। ठंड भी मार डालती है और गर्मी भी मारती है।

"तुम्हारा कौन सा गांव है ?"

"परणी के पास। गर्मी तो वहां पर भी पड़ती है। परंतु ऐसी नहीं।"

"यहां क्यों आई फिर ?"

"क्रोध !", कहकर हंसी। "पति कोई दूसरी औरत को घर में लेकर आया। मैं तुरंत वहां से रवाना हो गई।"

"यहां है जो ? मैं असमंजस में पूछी। "यहां दूसरे से शादी कर ली। जबान का तो अच्छा चाहिए ना!"

ठीक नहीं रहा तो यह भी छोड़ने वालों में से नहीं, मैंने मन ही मन सोचा। नलिनी करीब-करीब इसके जैसी ही होगी। मिडिल क्लास मेंटेलिटी से बाहर आने की एक सोच है यह।

दोपहर को रोहिणी का फोन आया। “कुल्लू-मनाली से आए 2 दिन हो गए । तुम्हें एक जरूरी बात बतानी है। घर आओ !”

"क्या बात है?, " मैंने पूछा ।

"घर आओ !", उसने जिद की । क्या बात होगी मैं अंदाजा नहीं लगा पा रही थी । मुझे फिक्र हुई। हो सकता है दुरैई और उसके बीच में कुछ तकरार हुई होगी। पश्चाताप की भावना के कारण उसे लगा होगा ‘अब मैं इसके साथ नहीं रह सकती’ ऐसा फैसला किया होगा। मैं धूप की परवाह किए बगैर ही उसके घर पहुंची। वह कुछ थकी हुई, कुछ कमजोर नजर आई।

"क्या बात है?", मुझमें धैर्य कहाँ था ।

"मैं गर्भवती हूं ।" वह बड़े साधारण ढंग से बोली।

मेरा दिमाग ठनका । अचानक मुझे कुछ समझ में नहीं आया, झट से मेरे मुंह से अंग्रेजी में एक प्रश्न फिसल गया -

"वह भाग्यशाली अप्पा कौन हैं?"

"क्या बक रही हो?", गुस्से के साथ रोहिणी बोली। "इतनी कठोर मत बनो मालिनी। दो महीने का गर्भ है, ऐसा डॉक्टर ने आज ही कंफर्म किया है।"

दो महीने। कृष्णन आने के पहले का समय। सच हो सकता है। धीरे-धीरे मेरे घबराहट जाती रही।

"दुरई ने क्या बोला ?", कमजोर आवाज़ में मैंने बोला।

"उसको तो बहुत खुशी हुई। अभी से वह सपने देखने लगा है।"

मैं थोड़ी देर तक कुछ नहीं बोली। फिर "गुड, तबीयत का ख्याल रखना ।" उसने कुल्लू मनाली में लिए हुए फोटो दिखाए । वह और दुरैई सब में बड़ी खुश नजर आ रहे थे। उसने जो कॉफी बनाई तो पीकर मैं उठ खड़ी हुई। मैं रवाना होने लगी तब वह धीरे से बोली: “फोन में बात बताती तो तुम्हारे समझ में नहीं आता । इसीलिए यहां बुलाया।“

मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, चल दी। मैंने अपने आप को अचानक अकेला पाया। लगा जैसे बहुत अधिक थकावट मेरे अंदर आ गई है । ‘इट इज ऑल ए गेम ऑफ ब्रिटेन’ कह रही है रोहिणी। सब कुछ आंख मिचौली का ही खेल है है। किसी की पकड़ में न आने वाले अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार बचते हैं । मैं अपनी सोच में डूबी हुई घर पहुंची। मेरा मन अपनी ही इच्छा से जाने कहाँ कहाँ घूम रहा था। 'आइशा हूइशा वी ऑल फॉल डाउन '- सब लोग देख रहे हैं-अम्मा, नानी, सुंदरी बुआ, कप्पू-

शाम को मैं अपनी धुन में पुण्यकोटी की कहानी के गाने को गा रही थी। गंगे पारे, गौरी पारे, तुमभद्रे, तायु पारे-इडियन आओ आओ, सब को बुला लिए... गायों से मेरा रिश्ता है एक भ्रम उत्पन्न हुआ। मेरे साथ हाथ पकड़ कर नाचने वाली मेरी पूर्व पीढ़ी के साथ... गंगे, गौरी, तुगभद्रा बेबी सब आकर मेरे साथ डांस करने लगे ...शेर की सामना कर रहे हो जैसे। मैं इसमें अकेली हूं। पुण्यकोटी पशु जैसे। ऐसी कोई पागल होगी क्या ? भीड हंस रही है! मुझे जीने के लिए एक नई चीज मिल गई। उसे मैं क्यों खराब करूं?

"अभी तक भी तुम्हें यह गाना याद है?", कहकर नलिनी आश्चर्यचकित हुई। मेरी स्थिति में खड़े हो कर और कितनी ही बातों के बारे में उसे बताऊं तो वह विश्वास भी नहीं करेगी। संकेत की असर बहुत गंभीर होता है। मैं कई लड़कियों को जानती हूं, उन सब का एक-एक संकेत है। मैं जो भी बनी हूं इन विचारों के परिणाम स्वरूप ही बनी हूं। विचारों का एक परिणाम होता है। गोविंदा हाडू भी मेरे मन में एक संकेत दिया ही है। झूठे चेहरे से नफरत करने का एक सबूत ही है।

"बहुत सुंदर गाना है यह।", नलिनी बोली। इसको जब-जब सुनती थी तो उस छोटी-सी उम्र में मैं रोती थी।“

"एक असंभव कहानी है यह नलिनी", मैं अपने आप में बात कर रही थी जैसे। "यह सच नहीं है, इसीलिए आंखों में आंसू आ जाते हैं।"

सत्य को सामने देखने की हिम्मत अब शेर में भी नहीं है।

कॉल बेल बजी । लाली ही दरवाजा खोलने दौड़ी। वहीं से जोर से आवाज दी, "दीदीss ! कौन आए हैं देखो!" ।

मैं बैठक में गई तो देखा वहां श्रीकांत खड़ा था। "हेलो!" हँसते हुए बोला ।

मेरी भावनाएं उमड़-घुमड़ कर उठने लगी । मुझे जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था सो पूछ ही लिया, "मेरा लेटर मिला क्या?"

"मिला। इसीलिए तो आया हूं।" वह बोला।

शेर की जगह अब मैं हूं ऐसा भ्रम मुझ में पैदा हो गया।

समाप्त

  • मुख्य पृष्ठ : वासंती : तमिल कहानियाँ और उपन्यास हिन्दी में
  • मुख्य पृष्ठ : संपूर्ण हिंदी कहानियां, नाटक, उपन्यास और अन्य गद्य कृतियां