ऐतिहासिक आलेख संग्रह : प्रफुल्ल सिंह
Historical Articles : Praful Singh
संगरूर : पंजाब के हृदय में बसा एक शांत पर्यटन नगर
पंजाब के मालवा क्षेत्र में स्थित संगरूर एक ऐसा शहर है जहाँ इतिहास की गूंज, धार्मिक आस्था और ग्रामीण-सांस्कृतिक सौंदर्य एक साथ अनुभव किए जा सकते हैं। भीड़-भाड़ से दूर, सादगी और आत्मीयता से भरा यह नगर उन पर्यटकों के लिए आदर्श है जो शांति, संस्कृति और परंपरा को करीब से देखना चाहते हैं।
ऐतिहासिक आकर्षण :
संगरूर का इतिहास राजसी वैभव से जुड़ा रहा है। यह क्षेत्र कभी जींद रियासत का अहम हिस्सा था, जिसकी झलक यहाँ की इमारतों और पुरातन स्थलों में दिखाई देती है। शहर के आसपास फैले पुराने कुएँ, हवेलियाँ और स्थापत्य अवशेष इतिहास प्रेमियों को अतीत की यात्रा कराते हैं।
धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र :
संगरूर धार्मिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ स्थित गुरुद्वारा नानकियाना साहिब सिख श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके अतिरिक्त शहर और आसपास के क्षेत्रों में अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे, मंदिर और मस्जिदें हैं, जो धार्मिक पर्यटन को समृद्ध बनाते हैं।
धार्मिक पर्वों के समय संगरूर की रौनक देखते ही बनती है, जब श्रद्धालु दूर-दूर से यहाँ पहुँचते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य और ग्रामीण अनुभव :
संगरूर के चारों ओर फैले हरे-भरे खेत, शांत ग्रामीण परिवेश और खुला आकाश पर्यटकों को मानसिक सुकून प्रदान करते हैं। ग्रामीण जीवनशैली, पारंपरिक खेती और पंजाबी आतिथ्य यहाँ आने वालों को विशेष अनुभव देता है। सुबह-शाम की सैर के दौरान ठंडी हवा और खेतों की हरियाली मन मोह लेती है।
पंजाबी संस्कृति और खानपान :
संगरूर में पंजाबी संस्कृति अपने पूरे रंग में दिखाई देती है। लोकगीत, भांगड़ा-गिद्धा और पारंपरिक पहनावा यहाँ की पहचान हैं। पर्यटकों के लिए यहाँ का मक्के की रोटी और सरसों का साग, लस्सी और पंजाबी मिठाइयाँ स्वाद का अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करती हैं।
खरीदारी और स्थानीय बाज़ार :
संगरूर के स्थानीय बाज़ार सादगी और पारंपरिकता का सुंदर मेल हैं। यहाँ से पर्यटक पंजाबी हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र और स्थानीय उत्पाद खरीद सकते हैं, जो स्मृति-चिह्न के रूप में यादगार रहते हैं।
यात्रा और ठहरने की सुविधाएँ :
संगरूर सड़क और रेल मार्ग से पंजाब के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा है। यहाँ बजट होटल, धर्मशालाएँ और अतिथि गृह उपलब्ध हैं, जो पर्यटकों को सुविधाजनक और किफायती ठहराव प्रदान करते हैं।
संगरूर उन पर्यटकों के लिए एक उपयुक्त गंतव्य है जो पंजाब की आत्मा को करीब से महसूस करना चाहते हैं। यह शहर इतिहास, आस्था, संस्कृति और प्राकृतिक शांति का ऐसा संगम है, जो हर आगंतुक को अपनापन और सुकून देता है।
प्रफुल्ल सिंह रघुवंश "संवेदन स्पर्श"
शोध सदस्य (राष्ट्रीय ऐतिहासिक पर्यटन एवं पर्यावरण उद्यानिकी)
गुरु गोबिंद सिंह जयंती (प्रकाश पर्व) : साहस, करुणा और धर्मबोध का दिव्य उत्सव
भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जो केवल किसी कालखंड के नहीं होते—वे समय के पार जाकर चेतना का पथ बनाते हैं। दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, ऐसे ही महापुरुष हैं। उनका प्रकाश पर्व केवल एक जन्मतिथि का स्मरण नहीं, बल्कि मानवता के भीतर निर्भयता, आत्मसम्मान और धर्म के जागरण का उत्सव है।
प्रकाश का अर्थ : केवल जन्म नहीं, चेतना का उदय --
“प्रकाश पर्व” शब्द अपने आप में गहन है। यह देह के जन्म का नहीं, बल्कि धर्म-चेतना के अवतरण का संकेत है। गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन अंधकार के युग में प्रकाश का उद्घोष था—ऐसा प्रकाश, जो अन्याय से टकराने का साहस देता है और करुणा को त्यागता नहीं।
खालसा की स्थापना आत्मसम्मान की क्रांति थी। यह केवल एक धार्मिक दीक्षा नहीं थी, बल्कि मानव गरिमा की घोषणा थी।
पाँच ककार—केश, कंघा, कृपाण, कड़ा और कच्छेरा — व्यक्ति को अनुशासन, साहस और आत्म-संयम का स्मरण कराते हैं। खालसा बनने का अर्थ था—डर से मुक्ति और धर्म के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व।
त्याग की पराकाष्ठा --
गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन केवल उपदेश नहीं, आचरण की चरम सीमा था। अपने चारों पुत्रों—चार साहिबजादों—का बलिदान इतिहास की सबसे हृदयविदारक और प्रेरणादायक घटनाओं में से है। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए वह दिया, जो किसी पिता के लिए सर्वस्व होता है—पर उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।
योद्धा और कवि का अद्भुत समन्वय --
गुरु गोबिंद सिंह जी केवल महान योद्धा ही नहीं थे, वे उच्च कोटि के कवि और दार्शनिक भी थे। दसम ग्रंथ में संकलित उनकी रचनाएँ वीर रस के साथ-साथ आध्यात्मिक गहराई का भी अद्भुत उदाहरण हैं। उनकी वाणी तलवार की तरह तेज थी, पर उसका उद्देश्य विनाश नहीं—अन्याय का अंत था।
गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु घोषित करना --
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने देहावसान से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब को सदा के लिए गुरु घोषित कर दिया। यह निर्णय बताता है कि गुरु व्यक्ति नहीं, विचार और वाणी होते हैं। इससे सिख परंपरा को स्थायित्व मिला और व्यक्तिगत सत्ता की बजाय शाश्वत सत्य को केंद्र में रखा गया।
आज के युग में गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रासंगिकता --
आज जब भय, अन्याय और नैतिक विचलन समाज को जकड़ रहे हैं, गुरु गोबिंद सिंह जी का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है। वे सिखाते हैं— अन्याय के विरुद्ध खड़े होना हिंसा नहीं, धर्म है।
साहस करुणा से अलग नहीं होता। सच्चा धार्मिक व्यक्ति वही है, जो दूसरों की रक्षा को अपना कर्तव्य माने।
प्रकाश पर्व : आत्मपरीक्षण का पर्व --
गुरु गोबिंद सिंह जयंती हमें दीप जलाने से आगे बढ़कर भीतर के अंधकार को पहचानने का अवसर देती है। यह पर्व पूछता है—
क्या हम अन्याय के सामने मौन हैं? क्या हम सत्य के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं? क्या हमारा धर्म हमें श्रेष्ठ मनुष्य बना रहा है?
गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जब भीतर साहस जागता है, तभी इतिहास का अंधकार छँटता है।
प्रफुल्ल सिंह रघुवंश "संवेदन स्पर्श"
शोध सदस्य (राष्ट्रीय ऐतिहासिक पर्यटन एवं पर्यावरण उद्यानिकी)
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com