दीवारों पर उड़ने वाला घोड़ा : सुखबीर
Deewaron Par Udne Wala Ghoda : Sukhbir
बंटी बहुत खुश था। आज उसे पहली बार स्कूल जाना था। मेरे मन में खुशी भी थी और बेचैनी भी। इस उम्र में कभी मैं भी स्कूल गया होऊंगा, इसी तरह खुश, इसी तरह चाव-चाव में या शायद रोता हुआ। मैं बंटी में अपने धुंधले बचपन को देख रहा था। चीनी डिजाइन वाले कपड़े की बुश्शर्ट और निक्कर में वह बड़ा चुस्त लग रहा था। वह इसलिए खुश था कि उसने पहली की जगह दूसरी क्लास में दाख़िल होना था। पिछले साल सेहत कुछ ठीक न रहने के कारण उसको स्कूल में दाख़िल नहीं करवाया जा सका था और घर पर ही थोड़ा-बहुत पढ़ाया था। मैं उसका साल बचाना चाहता था। एक स्कूल के हैड मास्टर से मेरी जान-पहचान थी। मैंने उससे सलाह की तो उसने कहा कि बच्चे को दूसरी में दाख़िल कर लिया जाएगा।
मैं दफ्तर में गया तो हैड मास्टर ने तनिक खड़े होते हुए कुर्सी की ओर इशारा किया, “तशरीफ़ रखें।” फिर वह बंटी की ओर देखकर बड़ी उदारता से मुस्कराये।
मैंने बंटी से कहा, “नमस्ते कहो इनको।”
बंटी ने धीरे से दोनों हाथ ऊपर उठाकर जोड़े पर मुंह से कुछ नहीं बोला।
“नमस्ते।” हैड मास्टर ने प्यार से मुस्करा कर कहा, “आओ इधर आओ न।”
बंटी झिझका।
“आओ, बेटा आओ।” हैड मास्टर ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
बंटी धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हैड मास्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “शाबाश !”
और फिर कुछ अटक कर पूछा- “बहुत सुंदर नाम होगा तुम्हारा। क्या है भला?”
“बंटी। पिताजी बंटी कहते हैं, माताजी बंटु।”
“वाह-वाह।” हैड मास्टर ने कहा। “बहुत सुंदर नाम हैं दोनों ही। बंटी और बंटु। और भला, हम किस नाम से बुलाएं आपको?”
“आपको कौन सा नाम अच्छा लगता है?” बंटी ने बिना झिझक के पूछा।
हैड मास्टर ने सोचने का दिखावा करते हुए कहा, “भाई हमें तो दोनों नाम ही पसंद हैं। तो कहो तो दोनों नामों से ही बुलाया करेंगे बंटी-बंटु…..”
बंटी अचानक हंसा। “ऐसी आवाज तो हमारे क्लॉक में से आया करती है, टंटी-टंटु, टंटी-टंटु।”
हैड मास्टर खिलखिला कर हंस पड़े। “वाह ! तुम तो सचमुच बहुत होशियार लड़के हो। टंटी-टंटु, बंटी-बंटु। हा..हा ..हा….”
बंटी मेरी तरफ देख कर मुस्कराया। मैं भी मुस्कराया।
“तुम्हारे पिताजी ने बताया था कि तुम्हें बहुत सारी कविताएं याद हैं।” हैड मास्टर ने कहा।
“नौ हिंदी की, तीन इंग्लिश की।”
“भला कुल कितनी हो गईं?”
बंटी ने हाथ उठाकर उँगलियों पर गिना और कहा, “बारह।”
“बिल्कुल ठीक। अब भला सुनाओ ना कोई कविता।”
बंटी ने मेरी तरफ देखा, जैसे पूछना चाहा हो कि कौन सी सुनाए।
“कोई भी सुना।”, मैंने कहा।
बंटी ने कुछ सोचा और एक कविता चुनी। तब वह एक्टिंग के साथ सुनाने लगा।
“बहुत अच्छे!” कविता पूरी होने पर हैड मास्टर ने उसकी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी। फिर वह मेरी ओर मुड़े। “बड़ा होनहार बच्चा है। इंटेलिजेंट भी है और संवेदनशील भी। ऐसे बच्चों को अगर ठीक तरह से हैंडल किया जाए तो वे क्या नहीं बन सकते। आसमान छू सकते हैं।”
“बस अब यह आपके हाथों में है।”, मैंने कहा।
हैड मास्टर एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने कुछ गंभीर होकर कहा, “ऐसे बच्चों को देखकर कई बार मैं सोचता हूं कि हमारे स्कूल इनके लिए नहीं बने हैं। पता नहीं, वे स्कूल कब जन्म लेंगे, जिनमें बच्चे टूटेंगे नहीं। अच्छे स्कूल, जिनमें योग्य अध्यापक पढ़ाएंगे। आजकल तो आमतौर पर वे लोग ही अध्यापक बनते हैं जिन्हें और कहीं अच्छी नौकरी नहीं मिलती। फिर खूंटों की तरह गड़ जाते हैं स्कूल में, और निकलने का नाम नहीं लेते। इस स्कूल से कुछ ऐसे खूंटों को मैंने बड़ी मुश्किल से उखाड़ा है।”
मैं वर्तमान स्कूलों के बारे में पहले भी कई बार हैड मास्टर की बातें सुन चुका था। वे आज के तालिमी ढंग से संतुष्ट नहीं थे पर कुछ कर नहीं सकते थे। हां, अपने स्कूल में उन्होंने बहुत कुछ किया था। इस स्कूल में आए हुए उन्हें तीन वर्ष हो चुके थे। इससे पहले वह एक अन्य स्कूल में अध्यापक थे। वहां उन्होंने लगभग बीस वर्ष तक पढ़ाया था। बहुत ही कामयाब अध्यापक थे वो। अध्यापक होकर सिर्फ अच्छा पढ़ा ही सकते थे, स्कूल को नया रूप नहीं दे सकते थे। पर इस स्कूल में हैड मास्टर बनने पर उनके सामने नई संभावनाएं आई थीं और उन्होंने स्कूल को धीरे-धीरे नया रूप देना शुरू किया था। वैसे भी उस स्कूल को नया रूप देना आसान काम नहीं था– ख़ासकर ऐसे पुराने स्कूल को, जो ग़लत ढांचे में खड़ा था और बड़ी ग़लत हालत में चल रहा था। फिर भी उन्होंने उसको बदला था, उसमें कई तरह के नए प्रयोग किए थे और आज यह स्कूल शहर के सबसे अच्छे स्कूलों में गिना जाता था। तालिमी महकमे के इंस्पेक्टरों और अन्य स्कूलों के अध्यापकों में हैड मास्टर के नाम की चर्चा थी। पिछले साल तीन स्कूलों ने उनसे काफी अच्छी तनख़्वाह पर अपने पास आने के लिए बुलाया था पर वह गए नहीं। उन्होंने सोचा था कि नए स्कूल में जाकर पुनः नए सिरे से काम करना पड़ेगा और तब अपने इस स्कूल में किया हुआ उनका काम व्यर्थ चला जाएगा। वैसे वह अपने इस स्कूल से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे क्योंकि वे उसे वैसा आदर्श स्कूल नहीं बना पा रहे थे, जैसे स्कूल की वे कल्पना किया करते थे। साथ ही, वे यह भी कहा करते थे कि देश के वर्तमान सामाजिक ढांचे में आदर्श स्कूल का बनना किसी तरह भी संभव नहीं है।
वे मेरे साथ कुछ देर स्कूल के बारे में बातें करते रहे। आखिर उन्होंने एक काग़ज़ लिया और उस पर लिखने लगे। तब उन्होंने वह काग़ज़ मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, “बच्चे का टेस्ट लेने के लिए लिख दिया है। तीन अध्यापकों के नाम हैं इस पर। आप बच्चे को उनके पास ले जाएं। औपचारिकता ही है यह। मामूली सा टेस्ट होगा।” फिर उन्होंने घंटी बजाई और बंटी की ओर मुड़े। “तो दूसरी में दाख़िल होने पर पेड़े खिलाओगे ना?”
“पेड़े नहीं, लड्डू”, बंटी ने कहा। “पिताजी कहते थे कि लड्डू बाटेंगे।”
हैड मास्टर हंसे। “लड्डू ही सही। पर पहले हम आपको चॉकलेट खिलाएंगे।” उन्होंने मेज की दराज में से चॉकलेट का एक पैकेट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया।
बंटी लेने से झिझका, तो मैंने कहा, “ले-लो।”
बंटी को अभी भी झिझक थी।
मैंने फिर कहा, “ले लो, जो भी बच्चा स्कूल में दाख़िल होने के लिए आता है उसे यह चॉकलेट देते हैं।”
बंटी ने पैकेट पकड़ लिया और धीरे से कहा, “थैंक यू।”
“नो मेनशड़ ,नो मेनशड़।” हैड मास्टर ने बंटी की दोनों गालों को सहलाया। “बहुत अकलमंद बच्चा है।”
तभी चपरासी अंदर आया तो हैड मास्टर ने टेस्ट लेने वाले तीनों अध्यापकों के नाम उसको बताए और मुझे उनके पास ले जाने के लिए कहा।
* * * * *
पहले अध्यापक, जिसकी कक्षा में चपरासी मुझे लेकर गया, का नाम सूर्य प्रताप सिंह था। वह पहली कक्षा थी। उस समय पीछे कोने में बैठे दो लड़के आपस में झगड़ रहे थे और सूर्य प्रताप सिंह उन्हें डांट रहा था। बड़ी रोबदार आवाज थी, उसकी। कुछ और बच्चे भी शोर कर रहे थे। उसने दो-तीन बार मेज पर हाथ मारा तो बच्चे चुप हो गए। पर कोने में बैठे दोनों लड़के अभी भी कुछ-कुछ लड़ रहे थे। वे बैंच के नीचे एक दूसरे को टांगे मारते हुए लग रहे थे। मैं दरवाजे में खड़ा सोच रहा था कि सूर्य प्रताप सिंह मेरी और देखे तो आगे बढूं। उसको देखकर मुझे कुछ हैरानी भी हो रही थी। उसने नीली बुश्शर्ट और खाकी पतलून पहनी हुई थी। कद काठ का वह इतना ऊंचा-लंबा था कि उन बच्चों के सामने खड़ा बहुत ही बड़ा लग रहा था। वह किसी छोटी कक्षा का अध्यापक लगता ही नहीं था। मैंने सोचा, इसको तो बड़ी कक्षाओं को पढ़ाना चाहिए- नौवीं, दसवीं को। बल्कि कॉलेज के विद्यार्थियों को।
तभी उसने मेरी ओर देखा। मैं खड़ा रहा। वह वैसे ही मेरी ओर देखता रहा। तब मैं आगे बढ़ा और हैड मास्टर वाला काग़ज़ उसे दे दिया। वह काग़ज़ लेकर कुर्सी पर बैठ गया और कुछ देर उसे पढ़ता रहा फिर उसने पूछा, “कहां है लड़का?”
मैंने बंटी की ओर इशारा किया।
“आपका बेटा है?” उसने पूछा।
“जी।”
वह काग़ज़ को दोबारा देखने लगा। शायद दूसरी बार पढ़ने लगा था। मुझे अजीब सा लगा।आखिर दो ही तो पंक्तियां थीं काग़ज़ पर- साफ लिखी हुईं और साफ अर्थ वाली। और उनके नीचे तीनों अध्यापकों के नाम थे। भला इतनी देर क्यों लगा रहा है? मैंने सोचा और उसकी और देखता रहा। वह कुर्सी पर बैठा हुआ भी काफी बड़ा लग रहा था। एक बार मेरी नजर बच्चों की ओर मुड़ी तो वे मुझे और भी छोटे-छोटे लगने लगे। वे कुछ हैरानी के साथ मुझे देख रहे थे और शोर करना भूल गए थे।
“इधर आ।”, सूर्य प्रताप सिंह ने बंटी से कहा।
बंटी उस से कुछ दूर खड़ा था। वह वहीं खड़ा रहा और हैरान आंखों से उसकी ओर देखता रहा।
“इधर आ भई।”, सूर्य प्रताप ने कुछ और ऊँची आवाज में बुलाया। मैंने मन ही मन कहा, जरा धीरे बुला। पास ही तो खड़ा है, और अच्छी तरह सुन सकता है।
बंटी आगे न बढ़ा तो मैंने उसको बाजू से पकड़कर धीरे से आगे किया और हौसला दिया, “डरो मत। ये कुछ नहीं कहेंगे।”
सूर्य प्रताप सिंह ने सामने विद्यार्थियों की ओर मुंह फेरकर कहा, “एक किताब लाओ जरा !”
आठ-दस विद्यार्थी अपनी-अपनी पुस्तकें लेकर उसकी ओर दौड़े। उसने एक की किताब ली तो दूसरे ने कहा, “पहले मैं लाया था। मेरी लें।”
“नहीं, पहले मैं आया हूँ, मेरी पकड़ें।” एक और विद्यार्थी ने अपनी पुस्तक आगे बढ़ाते हुए कहा।
“भागो यहां से!” सूर्य प्रताप सिंह ने मेज पर हाथ मार कर कहा।
सभी विद्यार्थी भागे और अपनी-अपनी जगह पर जाकर बैठ गए।
सूर्य प्रताप सिंह ने किताब खोली और मुझे कहा, “आप जरा बाहर जाएं।” फिर, उसने बंटी से कहा, “जरा पढ़ना यहां से।”
मैं दरवाजे के पास जाकर खड़ा हो गया। बंटी ने एक बार मेरी ओर मुड़कर देखा। फिर वह किताब की ओर देखने लगा, पर चुप रहा।
“पढ़ो भई।”, सूर्य प्रताप सिंह ने कहा। “चुप क्यों खड़ा है?”
बंटी ने फिर मुड़कर मेरी ओर देखा।
मैंने आगे बढ़ कर उसे हौसला देते हुए कहा, “पढ़ दो। यह पाठ तो तुम्हें आता है।”
“आप कृपा करके बाहर ही रहें।”, सूर्य प्रताप सिंह ने मुझे कहा। फिर उसने बंटी से कहा, “पढ़ो, पढ़ोगे नहीं तो पास कैसे होगे? फेल हो जाओगे, तो पहली में ही बैठना पड़ेगा। समझे? हां पढ़ो।”
बंटी ने किताब हाथ में ले ली। उस समय उसके हाथ कांप रहे थे। मैंने उसे कहना चाहा कि किताब मेज पर रखकर पढ़े, पर चुप रहा और दरवाजे में ही खड़ा रहा।
बंटी ने पढ़ना शुरू किया, “एक—एक था” और वह रुक गया।
“आगे पढ़ो। आता है या नहीं? और ठीक तरह पढ़ो।”
“एक था—एक था— किसान।” बंटी ने फिर पढ़ना शुरू किया। “वह एक गांव—एक गांव— में रहता था। उस—उस— गांव में……”
बंटी ने अटक-अटक कर दो पंक्तियां और पढ़ लीं। सूर्य प्रताप सिंह ने उसके हाथों में से किताब ले ली और पूछा, “लिखना आता है?”
बंटी ने हां में सिर हिलाया।
“बोल कर बताओ कि आता है।”, सूर्य प्रताप सिंह ने कहा। “बोलना नहीं आता है क्या?” तभी उसने विद्यार्थियों की ओर मुड़कर कहा, “एक स्लेट लाओ जरा। और स्लेटी भी।”
इस बार फिर कई विद्यार्थी स्लेट लेकर उसकी ओर दौड़े। उसने एक से स्लेट और स्लेटी ली और मेज पर हाथ मार कर सबको भगा दिया।
“लिखो,” उसने स्लेट बंटी के सामने रखकर कहा, “भगवान एक है।”
बंटी कांपते हुए हाथों से लिखने लगा।
सूर्य प्रताप सिंह ने तीन वाक्य लिखवाये और बंटी से स्लेट लेकर पढ़ने लगा।
इसके बाद उसने हैड मास्टर वाला काग़ज़ उठाया और उस पर कुछ लिखने के लिए मेज पर झुका।
मैं आगे बढ़ा।
उसने अपने नाम के सामने लिखे हुए ‘हिंदी’ शब्द के आगे नंबर लिखे और उसके सामने अपने पूरे नाम के लंबे से हस्ताक्षर कर दिए। मैंने देखा, उसने बंटी को बीस में से चार अंक दिए थे। इतने कम अंक देख कर मुझे दुख हुआ। तभी सूर्य प्रताप सिंह ने मेरी ओर मुड़कर कहा, “बहुत कमजोर है हिंदी में, आप इसे पहली कक्षा में ही क्यों नहीं दाख़िल करवा देते? पक्का होकर दूसरी में जाएगा।”
मैंने कहा, “थोड़ा घबरा गया है वर्ना यह किताब तो बड़ी अच्छी तरह पढ़ लेता है।”
“नहीं, दूसरी के लायक नहीं पढ़ सकता।” सूर्य प्रताप सिंह ने काग़ज़ मेरी ओर बढ़ाया।
मैं कुछ और कहना चाहता था, पर चुप रहा और बंटी को लेकर बाहर आ गया। बाहर आकर मैं कुछ देर बरामदे में खड़ा रहा। ऐसे लगा, जैसे बीस में से चार अंक बंटी को नहीं, मुझे मिले हों। एक बार बंटी पर गुस्सा भी आया कि क्यों इतना डर गया था। पर मैं संभला। इसे कुछ नहीं कहना चाहिए, मैंने मन ही में कहा। फिर मैंने काग़ज़ से दूसरे अध्यापक का नाम पढ़ा— श्री अवध नारायण चतुर्वेदी। इतने लंबे नाम से मेरे सामने सूर्य प्रताप सिंह से भी लंबी-चौड़ी डील-डौल वाला आदमी आया। मुझे घबराहट हुई। मैंने उससे नीचे वाला नाम पढ़ा—कुमारी शीला गुप्ता। और मैंने सोचा कि अवध नारायण चतुर्वेदी के पास जाने की जगह पहले इसके पास जाएं तो अच्छा रहेगा। लड़की है, बच्चे से जरा नरमी से बात करेगी और अवध नारायण चतुर्वेदी ने ‘सामान्य ज्ञान’ का टेस्ट लेना है। क्या पता, उल्टी-सीधी बातें पूछे और बंटी डर जाए और उसके बाद शीला गुप्ता के पास जाकर गणित के सवाल भी ठीक ढंग से न कर सके।
मैं दफ्तर में चपरासी से मिला। वह मुझे शीला गुप्ता की कक्षा में ले गया। वह दूसरी कक्षा थी। उस कक्षा में चुप्पी छाई हुई थी। सभी विद्यार्थी एकदम शांत बैठे थे।
शीला गुप्ता ने मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर उसे एक नजर देखा और फिर बंटी की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कराई।
मुझे उसका मुस्कराना अच्छा लगा। वह खुद भी अच्छी लगी। और मैंने सोचा कि वास्तव में बच्चों को पढ़ाने का काम तो औरतों को ही करना चाहिए। तभी मुझे उस पर कुछ तरस भी आया। लगभग पेंतीस वर्ष की उम्र थी उसकी, और सूखा हुआ कमजोर चेहरा। क्या इसकी जिंदगी में खुशी नहीं है? मैंने सोचा। नहीं तो इस तरह मुस्कराने वाली लड़की का चेहरा तो फूल की तरह ताजा और खिला हुआ होना चाहिए। उसका लिबास भी साधारण सा ही था- कुछ पुराने फैशन का और नाप से कुछ खुला; हल्के गुलाबी रंग का सूती ब्लाउज़, जिसकी कोहनियों तक बाहें थीं और हल्के हरे रंग की रेशमी साड़ी, जो पांवों से थोड़ा सा ऊपर बंधी हुई थी। नीचे उसके काले रंग के सैंडल पूरी तरह दिखाई दे रहे थे। वे सैंडल भी उसके चेहरे की तरह ही रूखे थे। न चेहरे पर मेकअप था, न सैंडल पर पॉलिश थी। तब मुझे उस पर और भी दया आई, और मैंने मन ही मन कहा, बेचारी मास्टरनी !
“क्या नाम है तुम्हारा?” वह बंटी से पूछ रही थी।
बंटी डरा नहीं पर धीमी आवाज में बोला, “बंटी।”
“यह कैसा नाम है!” शीला गुप्ता ने हैरानी के साथ कहा और मुस्कराई। “यह तो लड़कियों जैसा नाम है। क्या तुम लड़की हो?”
बंटी ने जवाब नहीं दिया और चुप रह कर उसकी ओर ताकता रहा। अगर उसकी उम्र के किसी लड़के ने उसे लड़की कहा होता, तो वह उसके मुंह पर थप्पड़ दे मारता।
“ख़ैर, तुम्हारा असली नाम क्या है?” शीला गुप्ता ने पूछा।
“बंटी।”
“यह तो वैसे ही बुलाने का नाम हुआ। असली नाम क्या है?”
मैंने कहा, “नाम अभी तक रखा नहीं है। बंटी कह कर ही बुलाते हैं।”
इस बार उसने हैरानी के साथ मेरी ओर देखा, पर मुस्कराई नहीं। “तो बिना नाम के इसे दाख़िल कैसे करवाएंगे? दाख़िले का फार्म कैसे भरेंगे?”
“तब तक कोई नाम रख देंगे।” मैंने कहा। “या बंटी ही रहने देंगे। बाद में बदल लेंगे।”
“बाद में बदलने में बड़ा झंझट होगा।”
“तो पहले ही कोई रख लेंगे। कल फार्म भरना है, कल तक कोई नाम सोच लेंगे।”
“इसे दूसरी में भर्ती करवाना चाहते हैं?”
“जी।”
“पहली कक्षा में कहाँ पढ़ता था?”
“घर में ही पढ़ता था। इसलिए तो यह टेस्ट लिया जा रहा है।”
“क्या आपने इसका पहली में कहीं भी दाख़िला नहीं करवाया?” उसे जैसे मेरी बात पर यक़ीन ही न हुआ हो।
“नहीं।”
“क्यों?”
“इसकी सेहत ठीक नहीं रहती थी।”
“उम्र कितनी है इसकी?”
“लगभग छह वर्ष।”
“छह वर्ष!” उस ने हैरानी से बंटी की ओर देखा।
“जी,” मैंने कहा।
“तब तो यह दूसरी में दाख़िल नहीं हो सकेगा।”
“मैंने हैड मास्टर से पूछा था। उन्होंने कहा है कि दूसरी में दाख़िल हो सकेगा।”
“नहीं हो सकेगा,” शीला गुप्ता ने आत्मविश्वास से कहा। “कम से कम छह वर्ष की उम्र तो पहली कक्षा के लिए ही चाहिए।”
“अब शायद रूल बदल गया है। आप टेस्ट ले लें। हैड मास्टर साहब खुद इस मसले को हल कर लेंगे।”
“नियम नहीं बदला है।” शीला गुप्ता ने पुनः उसी आत्मविश्वास के साथ कहा। “वैसे भी जब इसे पहली कक्षा में ही दाख़िल करवाना है, तो टेस्ट लेने का क्या फायदा? पहली कक्षा में तो टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती। पहली में—”
“पहली में नहीं”, मैंने उसकी बात काटते हुए कहा,”दूसरी में दाख़िल करवाना है।”
“पर दूसरी में कैसे हो सकेगा? या फिर, इसकी उम्र ज्यादा लिखवा दें। पर उसमें भी बाद में झंझट होगा।”
मैं चुप रहा।
एक पल शीला गुप्ता भी चुप रही। फिर, उसने कहा, “ख़ैर, हैड मास्टर ने टेस्ट लेने के लिए लिखा है, तो लेना ही पड़ेगा।”
“हैड मास्टर भी बस अजीब हैं!” तभी उसने बुरा सा मुंह बनाया। “ख़ैर, इसको आपने घर में पढ़ाया ही होगा? पहाड़े भी याद करवाए होंगे? और गिनती सौ तक आती होगी? पहली के कोर्स में सौ तक गिनती है और दस तक पहाड़े। और सवाल भी करवाए होंगे— जोड़ घटा के?”
“पूछ लें इसको?” मैंने उसके सभी सवालों के जवाब में कहा।
“दस तक पहाड़े आते हैं न?” उसने बंटी से पूछा।
बंटी ने हां में सिर हिलाया।
“अच्छी तरह आते हैं?”
बंटी ने फिर हां में सिर हिलाया।
“अच्छा सुनाओ तो छह का पहाड़ा, देखना, भूलना मत, ठीक ठीक सुनाना।”
बंटी सुनाने लगा और ‘छह छक्के’ कहकर रुक गया।
“आगे?” शीला गुप्ता ने कहा।
बंटी सोचता हुआ चुप रहा।
“ख़ैर, यहां तक ही सही”, शीला गुप्ता ने कहा।
इसके बाद वह गिनती लिखवाने लगी। गिनती लिखवाते-लिखवाते ही उसने हैड मास्टर वाले काग़ज़ पर ‘गणित’ के सामने अंक लिखे–बीस में से सात। फिर, उसने मुझे कहा, “ख़ैर, पासिंग अंक दे दिए हैं। आपको शुरू से ही इसका ख़्याल रखना होगा, नहीं तो चलेगा नहीं दूसरी में। हमारे स्कूल में हर साल ज्यादातर विद्यार्थी गणित में फेल होते हैं, क्योंकि शुरू से ही गणित की ओर ध्यान नहीं देते। मैंने कई बार कहा भी है हैड मास्टर को। ख़ैर, मैं भी ख़्याल रखूंगी। वैसे, आप भी घर में ख़्याल रखना। पर छह साल की उम्र है, तो यह दूसरी में दाख़िल नहीं हो सकेगा हो। हो सके, तो उसकी उम्र ज्यादा लिखवा देना। पर बाद में झंझट होगा।”
“धन्यवाद”, मेरे मुंह से निकला। मैं जाने ही लगा था कि रुका और पूछा, “कितना अर्सा हो गया है आपको यहां?” मैं जानना चाहता था कि आखिर वह क्या ‘चीज’ थी।
“मैट्रिक के बाद यहां ही हूं। यह सोलहवां साल है।”
“सोलहवां साल!” उसने ऐसे कहा जैसे वह उसकी उम्र का सोलहवां साल हो। और मैंने मन में कहा, शीला देवी, तुम्हारी उम्र में कभी सोलहवां साल आया भी होगा? तभी मैंने उसको कहा, “काफी शौक लगता है आपको पढ़ाने का?”
“जी हां।”
“तुम्हारे पतिदेव भी इसी लाइन में होंगे? या—”
“जी नहीं, मैं विवाहित नहीं हूं।”, उसने कुछ गर्व से कहा।
“ओह,माफ करना। मैं समझा था—”, मैंने बात पूरी नहीं की और मन में कहा, वैसे भी तुम्हारे जैसी सूखी हुई भिंडी से शादी करेगा भी कौन? पर फिर भी, तुम्हें विवाह करवा लेना चाहिए, शीला देवी, तो जो तुम्हारे चेहरे पर रौनक आए और क्लास में ये छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां ऐसे पत्थरों की तरह चुपचाप न बैठें। आखिर तुम्हारी क्लास में यह पथराई हुई चुप्पी क्यों है? क्यों भयभीत हुए बैठे हैं ये बच्चे तुम्हारे सामने?.....
शीला गुप्ता कह रही थी, “....असल में, मैं शुरू से ही विवाह के ख़िलाफ़ रही हूं।”
“क्यों?” मैंने दिलचस्पी से पूछा।
“झंझट है!” उसने कहा। “तब, शायद मैं पढ़ा न सकूं।”
“क्यों ?”
“क्या पता, घर की चारदीवारी में ही बैठना पड़े।”
“तब तो तुम्हारी बड़ी कुर्बानी है— इन बच्चों की ख़ातिर!” मैंने व्यंग्य से कहा।
शीला गुप्ता ने व्यंग्य समझा नहीं बल्कि खुश होकर मुस्कराई और धीरे से मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर उस पर सात की जगह दस अंक कर दिए।
मैं धन्यवाद न कर सका।
* * * * *
अब मुझे श्री अवध नारायण चतुर्वेदी के पास जाना था। मुझे घबराहट होने लगी। मैंने सोचा, भला जिस आदमी का नाम ही इतना लंबा है, वह आदमी…….. ख़ैर। वैसे नाम में क्या रखा है। और फिर, जो होगा, देखा जाएगा।
मैं अवध नारायण चतुर्वेदी की क्लास के पास पहुंचा तो बच्चों की एक साथ खिलखिला कर हंसने की आवाज कानों में गूंजी। वह एक मिनट धीमी पड़ी और पुनः गूंजी। मैं आगे बढ़ा, तो खिड़की में से देखा कि मेज के पास धोती-कुर्ता पहने औसत कद का एक आदमी खड़ा था। बीस-इक्कीस वर्ष की उम्र थी उसकी और सांवला रंग। मैंने मन में ही कहा, तो यह है- श्री अवध नारायण चतुर्वेदी! यह तो ‘धोती-प्रसाद’ लगता है। उस समय वह बच्चों को कुछ बता रहा था। जब मैं दरवाजे के पास पहुंचा, तो बच्चे एक बार फिर खिलखिला कर हंसे। अवध नारायण चतुर्वेदी ने मुझे दरवाजे के पास खड़े देखा, तो विद्यार्थियों की ओर हाथ उठाकर, चुप रहने का संकेत करते हुए, मेरी ओर आया। “बताएं”, उसने मेरे पास आकर कहा। “मुझसे कोई काम है?”
मैंने बिना कुछ बोले मुख्याध्यापक वाला काग़ज़ उसकी ओर बढ़ा दिया। उसने लेकर एक नजर देखा और कहा, “आएं, अंदर आएं।”
मैं बंटी को लेकर मेज के पास गया। अवध नारायण चतुर्वेदी ने एक बार कुर्सी की ओर देखा, जैसे बैठना चाहा हो, पर बैठा नहीं। तब उसने बंटी की ओर देखा, और हल्का सा मुस्कराया। वह कुछ पल मुस्कराता रहा। फिर, उसने कहा, “तुम्हारी यह बुश्शर्ट तो बहुत सुंदर है। हम भी लाएंगे ऐसी ही एक।”
बंटी ने एक बार अपनी बुश्शर्ट की ओर देखा और पुनः अवध नारायण की ओर देखने लगा, पर चुप रहा।
अवध नारायण ने फिर कहा, “अगर बाजार से न मिली तो आप से ही यह ले लेंगे। दोगे न?”
“यह तो छोटी है, आप बड़े हैं।”, बंटी ने कहा। “आपको कैसे आएगी?”
“हम छोटे बन जाएंगे।”
“बड़े छोटे नहीं बन सकते,” बंटी ने जैसे समझाते हुए कहा। “छोटे बड़े बन सकते हैं।”
“वह कैसे?” अवध नारायण ने हैरानी जाहिर की।
“रोज दूध पीकर।”
“तो तुम रोज दूध पीते होगे। भला कितना दूध पीते हो?”
“एक गिलास सुबह, एक गिलास शाम।”
“वाह! इस तरह तो तुम बहुत जल्दी बड़े हो जाओगे। अच्छा, भला किस जानवर का दूध पीते हो?”
“भैंस का।”
“भैंस के बिना और कौन-कौन से जानवर दूध देते हैं?”
“गाय। और— बकरी।”
“इनमें से कौन सा जानवर तुम्हें सबसे अच्छा लगता है?”
बंटी ने कुछ सोचा। “मुझे तो घोड़ा सबसे अच्छा लगता है।”
“अच्छा! वह क्यों?” अवध नारायण मुस्कराया।
“घोड़ा बहुत तेज दौड़ता है। और घोड़े पर बैठकर शिकार भी खेलते हैं।”
“किसका शिकार? बिल्ली का?”
“शेर का!” बंटी ने गर्व से कहा।
“तो तुम शेर का शिकार कर सकते हो?”
“असली बंदूक हो, तो कर सकता हूं।”
“तो क्या तुम्हारे पास नकली बंदूक है?”
“जी। वह तो चिड़िया को भी नहीं मार सकती। पर पिताजी कहते हैं कि मैं दूध पीकर बड़ा हो जाऊंगा, तो मुझे असली बंदूक लेकर देंगे।”
“और साथ में घोड़ा भी न ?” अवध नारायण ने कहा और मेरी तरफ देख कर मुस्कराया।
बंटी ने मेरी ओर देखा, जैसे पूछा हो, ले दोगे न?
“हां, घोड़ा भी ले देंगे तुम्हारे पिताजी।", अवध नारायण ने मेरी ओर से कहा। “अच्छा, बताओ तो भला, कैसा घोड़ा लोगे? कितनी टांगों वाला?”
“सारे घोड़े चार टांग वाले तो होते हैं,” बंटी ने कहा, “पर मैं उड़ने वाला घोड़ा लूंगा।”
“वाह-वाह ! फिर तो बहुत बड़े-बड़े पंख होंगे उसके?”
“नहीं, उसके पंख नहीं हैं। वह तो जादू से उड़ता है।”
“जादू से? भला ऐसा भी कोई घोड़ा होता है?”
“एक कहानी में ऐसा ही घोड़ा है। उसकी फोटो भी है किताब में मेरे पास।”
“वह कहानी आती है तुम्हें?”
“आती है। और भी बहुत सी कहानियां आती हैं।”
“हमें सुनाओगे ?”
“सुनाऊंगा।”
“बहुत अच्छे!” अवध नारायण ने बंटी की पीठ थपथपाते हुए कहा। तभी वह काग़ज़ पर अंक लिखने लगा। एक ओर उसने गणित और हिंदी के अंक देखे और फिर ‘सामान्य ज्ञान’ के सामने बीस में से अठारह अंक लिखे। और अपने छोटे से हस्ताक्षर किए। इसके बाद उसने पुनः गणित और हिंदी के अंकों की ओर देखते हुए कहा, “बच्चा तो बड़ा होशियार है, पर गणित और हिंदी में काफी कम अंक मिले हैं।”
मैं उसे बताने ही लगा था कि उसने मुस्कुराकर कहा, “जरा ठहरें।” फिर कक्षा की ओर मुड़कर मॉनिटर से कहा, “पहली कक्षा में जाकर हिंदी की पुस्तक लाओ।”
“जी अच्छा।” मॉनिटर फुर्ती के साथ उठा और चला गया।
“यह कौन सी कक्षा है?” मैंने अवध नारायण से पूछा।
“दूसरी।”
“आप कौन-कौन सी कक्षाओं को पढ़ाते हैं?”
“दूसरी और तीसरी को।”
“और ये दोनों अध्यापक?” मैंने काग़ज़ की ओर संकेत किया।
“यह भी दूसरी और तीसरी को। एक पहली को भी, जो सूर्य प्रताप सिंह हैं।”
मॉनीटर किताब लेकर आया तो अवध नारायण ने उसे एक जगह से खोल कर बंटी की ओर बढ़ाते हुए कहा, “यह पाठ सुनाना तो।”
बंटी किताब लेकर पढ़ने लगा। वह पहली पंक्ति पर थोड़ा सा अटका और फिर ऐसे पढ़ने लगा जैसे जुबानी सुना रहा हो।
“शाबाश !" अवध नारायण ने बंटी से किताब ले ली और काग़ज़ पर हिंदी के सामने लिखे चार अंकों की ओर संकेत करते हुए मुझे कहा, “दिल करता है कि इस चार के साथ एक लगाकर चौदह बना दूं पर मेरे हाथ में इतनी ताकत नहीं है। वैसे, हैड मास्टर साहब खुद ही समझ जाएंगे। वे सोचेंगे कि कहीं गड़बड़ जरूर है। या इन चार अंकों में, या मेरे दिए अठारह अंकों में।” उसने काग़ज़ मेरी ओर बढ़ाया।
तब उसने बंटी की ओर मुड़ कर कहा, “अच्छा, कल से आओगे न स्कूल? हम आपसे कहानी सुनेंगे। और खुद भी तुम्हें कहानी सुनाएंगे–उड़ने वाली घोड़े की कहानी, जिसमें–”
“वह तो मुझे आती है।” बंटी ने कहा।
“तो तैरने वाले घोड़े की कहानी सुनाएंगे, जो समुंदर में एक बहुत बड़े मगरमच्छ से लड़ाई करता है।…. और फिर, एक लोहे के घोड़े की कहानी—”
“भला लोहे का घोड़ा भी होता है?” बंटी ने अविश्वास से पूछा।
“लोहे का घोड़ा, यानी रेलवे इंजन,” अवध नारायण ने कहा। “अभी-अभी मैं इन बच्चों को लोहे के घोड़े की कहानी सुना रहा था।”
बंटी हंसने लगा। उसको शायद अजीब लगा था कि इंजन को लोहे का घोड़ा कहा गया था।
आखिर, अवध नारायण ने मेरी और मुड़कर कहा, “अच्छा, तो अब आप हैड मास्टर साहब से मिल लें। बच्चे को दूसरी कक्षा में दाख़िला मिल ही जाएगा।”
“धन्यवाद,” मैंने बड़ी गर्मजोशी से कहा। “बड़ी खुशी हुई आपको मिलकर ! कब से हैं इस स्कूल में?”
“जी, तीसरा वर्ष जा रहा है।”
“बड़ी अच्छी लाइन चुनी है आपने। बच्चों को आप जैसे अध्यापक ही चाहिएं।”
“बस चुननी पड़ गई। और कोई चारा नहीं था।”
“क्यों ?”
उसने कुछ संकोच से कहा, “मैं पढ़ रहा था। आर्थिक तंगी आई, तो यह नौकरी कर ली।”
“कोई ख़ास कोर्स कर रहे थे !”
“नहीं। इंटर साइंस में था। केमिस्ट्री में एम.एससी करना चाहता था। किसी फर्म में लग जाता, या कॉलेज में प्रोफेसर बन जाता। पर अब तो शायद यहीं सारी उम्र निकल जाएगी। वास्तव में, आदमी बड़े-बड़े सपने देखता है, पर वे पूरे नहीं हो सकते। कई बार रास्ते में कोई ऐसी दीवार आ जाती है कि वह जीवन भर एक ही जगह अटका रहता है। कई बार—” वह अचानक चुप हो गया।
मैं भी चुप खड़ा रहा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आगे क्या कहूं।
तब जैसे बात का रुख़ बदलने के लिए अवध नारायण ने बंटी की ओर देखा और मुस्करा कर कहा, “बड़ा होनहार बच्चा है। रास्ते में कोई दीवार न आ गई, तो बहुत आगे निकल जाएगा। भगवान करे, कोई दीवार न आए इसके रास्ते में।”
अचानक मेरी आंखें गीली हो गईं। साथ ही, मन में तल्ख़ी जागी। और मेरे मुंह से निकला, “दो दीवारें तो आपकी इस दूसरी कक्षा में ही हैं, जो इसके सामने खड़ी हैं।”
अवध नारायण ने हैरानी से मेरी ओर देखा, जैसे बात समझ न पाया हो।
“मेरा मतलब हिंदी और गणित के इन दोनों अध्यापकों से हैं,” मैंने कहा। उन्हें देखकर मैंने सोचा था कि बच्चे को यहां दाख़िल नहीं करवाऊंगा, पर अब आपको देखकर सोचता हूं कि हो सकता है, बच्चा उड़ने वाले घोड़े पर बैठकर इन दीवारों को लांघ जाए और आसमान के चांद-तारे छू ले। हो सकता है, लोहे के घोड़े पर वह सारी दुनिया का सफ़र करे और बड़ा कुछ नया सीखे।…. सचमुच आपको मिलकर बहुत खुशी हुई।”
अवध नारायण कुछ न बोल सका और चुप किए खड़ा रहा।
आखिर, मैंने कहा, “अब मैं चलता हूं। आपसे कभी-कभी मुलाकात होती रहेगी।”
अवध नारायण ने दोनों हाथ जोड़ दिए। उस वक्त उसकी आंखों में मुझे भीगी हुई चमक दिखाई दी। वह हाथ जोड़े चुप ही रहा और ‘नमस्ते’ न कह सका।
(मूल पंजाबी से अनुवाद : मुलख सिंह)