दीप शिखा (तमिल उपन्यास) : आर. चूड़ामणि (अनुवाद : एस. भाग्यम शर्मा)

Deep Shikha (Tamil Novel in Hindi) : R. Chudamani (Translator : S. Bhagyam Sharma)

(1)

जो अपने ख्यालों को ही जीवन समझ लेता है उसका जीवन भी एकविचार ही बन कर रह जाता है उसमें कोई स्वाद या पूर्णता कहाँ से आएगी? संसार में आकर भी इस संसार को अपने से अलग समझें तो पूर्णता कैसेआयेगी ? इस लड़की के मन में आने वाले कुछ विचारों के भावी संकेत इसपत्र में है। एक अजीब ख्याली जिंदगी के लिए ही फड़फड़ा रही है क्या ?

संसार को पीठ दिखाना क्या एक नव यौवना के विषय में एक बिना अर्थवाला ख्याल नहीं? भला ये भी कोई सारगर्भित बात हो सकती है ?

गीता की चिट्ठी उसके हाथों में फड़फड़ा रही थी। कागज में लिखे शब्दभारी पत्थर जैसे लग रहें थे। उसके शब्दों ने उनके मन में भी वजनी पत्थर रख दिया हो ऐसा लग रहा था। उसकी बातें उसके शब्द और उनका अर्थ कोई जादूई मंत्र जैसे न हो जाए

क्या ? ऐसे विचार से पेरूंदेवी ने फिर से पत्र को पढ़ा ।

कई-कई पेजों में उत्साह भरा वर्णन किया था ऋषिकेश जाने का और वहां का वर्णन तो गीता ने पहले ही पत्र में लिख दिया था । वहां से अलकनंदा के किनारे किनारे बद्रीनाथ को जाने वाले रास्ते के बारे में लिखा था। वहां के प्राकृतिक दृश्यों, रास्तो में हिम वर्षा, बादल जंगल में तरह-तरह के पेड़ ठंड़ी-ठंड़ी हवाएं आदि के बारे में लिखा था। पहले बद्रीनाथ पहुंच गए थे।

वापस आते समय यह.......! प्राकृतिक सुंदरता को चाहने की भी तो एक सीमा होती है ?

वहाँ तक तो ठीक भी है। आगे के वाक्यों में “अब लौटने वाले यात्रियों के साथ मैं नहीं आ रही हूं, कुछ दिन और सब कुछ भूल कर बद्रीनारायण जी के मंदिर में स्वंय को भूल कर उनके आनंद में लीन होना चाहती हूं। ”

आनंद में लीन की वही बात तो उसे डराती है, क्योंकि एक मनुष्य अपनी सीमा को यहाँ लांघ जाता है। मनुष्य के अपने हिसाब से अपने सामर्थ्य के अन्दर जो कुछ आता है उसे समेटना चाहिए। यदि दुनियां वालों के विपरीत दूसरे ढंग से काम करे तो यह संसार से विमुख होने की निशानी नहीं होगी क्या ? यह........ यह..... भी ! पेरूंदेवी का शरीर ठंडा बर्फ जैसे हो गया। इस विचित्र वेश की आवश्यकता नहीं है। इस नए जीवन में उसे नहीं जाना चाहिए। मुझे जो समझ में आता है उसी के अन्दर गीता को रहना चाहिए। आकाश की तरफ न देख इस भूमि में ही पैर रख कर चलने वाली ही मुझे हमेशा दिखाई दे……..

उनके समझ में आए ऐसा इस पत्र में कुछ नहीं है क्या ? यहां यहां.....

“तुम्हें मेरे बिना रहना कष्टदायक तो होगा अम्मा, मुझे भी वैसा ही लगेगा, तुम मेरे पास नहीं हो मुझे वह कमी बहुत अखर रही है तुम्हें भी साथ लेकर आ सकती थी क्या ? उनसे मैंने क्यों नहीं पूछा इस बात का मुझे बहुत दुख हो रहा है। बस कुछ दिनों की बात है। थोड़ा सहन करो। दौड़ कर तुमसे गले मिलूंगी ।”

इन शब्दों मे बच्चे की आवाज आ रही थी ! ये एक परिचय है। यहीं उसकी असली दिखाई देने वाली शक्ल है। पेरूंदेवी को उसकी आवाज सुने बिना ही एक मुस्कान उसके चेहरे पे आ गई। दूसरे ही क्षण फिर से पहले वाला डर । भगवान और मंदिर दोनों में कौनसा आकर्षण है जो गीता को अपनी ओर खींच रहा है ?

उसका मन तड़प उठा और घबराहट में एक प्रार्थना मन से उठी! “हे प्रभु तुमसे मैं स्पर्धा कर सकती हूं क्या ? आप मेरी बच्ची को मेरे पास ही रहने दो । ”

‘पुरानी कहानी फिर से शुरू नहीं होनी चाहिए। गीता में जीवन जीने का चाव खत्म नहीं होना चाहिए...... इस बद्रीनाथ यात्रा के लिए उसे गीता को रोक देना चाहिए था..... परन्तु बच्ची की इच्छा हो रही थी!

मुंह को गोल कर, आंखों में उत्साह और फूल से खिले चहरे से मेरे कंधे को पकड़कर बोली थी “मैं भी उन लोगों के साथ बद्रीनाथ जाकर आऊं! मुझे इन सब जगहों को देखनें की बहुत इच्छा है!” इस तरह प्रेम से पूछने पर मैं कैसे मना कर सकती थी । मैं हृदय से जिसे चाहती हूं वही मेरी लाड़ली है

गीता का होठ हिलते ही मेरा दिल कठपुतली जैसे नाचने लगता है। ’

घर के बाहर पीछे की दीवार के अंदर की तरफ कांटे का पेड़ उगा था जो दरवाजे से उसे दिखाई दे रहा था उसे लगा ये कांटा उसके हृदय को छलनी कर रहा है। उसकी घबराहट कम ही नहीं हो रही थी। पत्र को लेकर पीछे की तरफ के कमरे में ढलते हुए शरीर के साथ बैठे धीरे-धीरे झूला झूल रहे अपने पति के कमरे के में बड़े संकोच के साथ आ खड़ी हुई ।

“इसे देखा क्या ? गीता ने पत्र भेजा है। ” सारनाथन उसे घूर कर देखने लगे। कहीं और जो ध्यान लगा रखा था । उसे बड़े प्रयत्न से खींच उसके ऊपर ध्यान को केन्द्रित करने की कोशिश कर रहे थे।

बड़े मनोवेग के साथ बोले आए हुए का स्वागत है ? पेरूंदेवी अन्दर ही अन्दर बहुत संकुचाई। उसे एक तरफ क्रोध आ रहा था साथ में कुछ संकोच, डर और हिचकिचाहट भी थी । पिछले दिनों इसी तरह की निगाहों से डरा कर भगाने वाले आज पुरानी बातें की वजह से ही ऐसे बदल गए हैं ना ? वही अकेली है। इस अकेलेपन में एक सहेली बन गीता ने उसके मन को बांध कर रखा है। अब उस बच्चे को भी छोड़ना पड़ेगा ? ऐसा भी होगा क्या ? तीर जैसे चुभे दर्द से वह तिलमिलाई । ऐसी दशा में एक

आश्वासन की जरूरत होने के कारण संकोच को छोड़कर वह बोली ‘‘आप ही पढ़कर देखो। ” पत्र को उन्होंने लिया ही नहीं । अपने नजरों को दूर कोने के मेज पर पड़े उस प्लास्टिक के कवर को घूरते हुए बोले “तुम ही बताओ क्या है । ”

“बच्ची के लिखे हुए पत्र को पढ़ने की आपकी इच्छा नहीं है क्या?”

‘‘मेरी बच्ची एक ही थी वह अब इस संसार में नहीं है। ”

पेरूंदेवी को रोना ही आ गया। इस ख्याल से ही वह संकोच से दूर हो जाती है। वही क्या इनकी एक अपनी है ? जो अभी सामने है वह इन्हें अपनी ओर नहीं खींचती ? ये तो उसी में अपने को खत्म कर रहें है। उनकी सोच उनकी याद उनका अपना शरीर सब कुछ अंधेरे में ही तो है। ये जो यादें है वही तो अन्धकार है।

‘‘कल कुछ लोग वहां से रवाना हो रहें है परन्तु उनके साथ गीता नहीं आ रही है। ”

‘‘ठीक है। ”

‘‘उसकी सहेली मीना के बुलाने पर ही तो ये गई ? उसके साथ उसे वापस आना चाहिए ना।”

‘‘हाँ ठीक है। ”

‘‘क्या हां, अगले हफ्ते दूसरे और लोग रवाना होंगे उन्ही के साथ वह लड़की आ रही है। ”

‘‘ठीक है। ”

‘‘ये भी ठीक है, सब ठीक है। उसको बद्रीनाथ मन्दिर में और कुछ दिनों अधिक रहने की इच्छा है। ”

‘‘ठीक है। ”

‘‘क्या ठीक है ? इसे क्यों ऐसी इच्छाएं अभी से है ? अपनी गीता अभी बीस की पूरी नहीं हुई है याद है ना ?”

‘‘उससे क्या है ?”

‘‘इस उम्र में संसारिक बातों में इच्छा होना सही होता है। भगवान मन्दिर.?........दूसरी बार भी ?”

उन्होंने घूर कर देखा ‘‘क्या बोल रही हो”?

“एक तो असाधारण... क्या-क्या बोल कर, कैसे-कैसे व्यवहार कर, स्वयं भी दुःखी होकर, दूसरों को भी रूला कर चली गई। ये लड़की भी ऐसे ही मन्दिर तीर्थ......”

‘‘जाने वाली ऐसे भगवान के लिए पागल होने वाली तो नहीं थी?”

‘‘अरे, वैसे ही ये दूसरी तरह की असाधारण अनोखी है ये कह रही हूं। न कोई दुनियादारी न कोई मोह-बन्धन........ इस मामले में तो दोनों ही एक है ना ?”

सारनाथन की निगाह अचानक स्थिर हो गई। कमरे में अगरबत्ती जला दी ऐसा लगा। कोई मीठी-मीठी सुगन्ध फैली।

‘‘ऐसा होगा तुम बोल रही हो गीता के लिए ?.....

अरे......रे..... ये क्या भाग्य है! इस बार मैं गलती नहीं

करूंगा......

‘‘अय्यों, मैं बेकार में फिकर कर रही हूं । ये ऐसा नही होना चाहिए, ये..... सिर्फ उस लड़की का प्राकृतिक सुन्दरता का मोह और युवा अवस्था की एक उत्साह भरी यात्रा समझ कर प्रसन्न होने वाली बात ही होनी चाहिए ।

पेरूंदेवी ने अपने विश्वास को पक्का कर प्रार्थना की। उनके मन में जो अशांति थी उसे शान्त करने लिए ही ऐसा सोचा होगा, शायद ऐसा ही होगा। सभी लोग मेरी बच्ची जैसे हो सकते है क्या ? बोलकर वे फिर अपने पुराने यादों में खो गई।

यादें, क्या चली गई उसकी यादें। ताजा घाव की तरह उनके मन में बस गई है वह । उनके मन में अन्दर तक बसी यादें इनसे चिपक गई हैं। रिश्ते की काली छाया बन हमेशा उन्हें घेरे रहती हैं यादें। ये अन्धेरा है। उसकी यादें अंधेरा ही तो है।

नहीं नहीं ऐसा सोचना गलत है। वह अंधेरा नहीं है रात है। रात का मतलब सिर्फ अन्धकार ही नहीं है रात में सुगन्ध है जीवन है आश्चर्य भी है !

नीले आकाश में तारे अपनी रोशनी बिखेरते हैं। उसकी कृपा से शरीर का एक पवित्र सम्बन्ध है। उस अन्धकार में न मिटने वाला एक मर्म भी तो है।

वह........ सिर्फ अंधेरा नहीं। वह एक रात्री की ज्योती, एक दीप शिखा है।

(2)

बहुत साल पहले कहीं पढ़ी एक कविता उसके मरने के बाद उनको याद आई। वह उनके अन्दर आत्मध्वनि बन गूंजने लगी

नीले आकाश की रात

मन की याद

फूल जैसे खिली है कौन

मेरे मन के अन्दर बसी हुई जाने कौन?

वे उसके दुःख को महसूस कर आखिर में जवाब देने वाले भी वे ही है। फिर भी हृदय में प्रेम की पीड़ा खत्म नहीं हुई। तड़प कर सब जगह जाकर भी, बिलखने पर भी चैन नहीं मिला। पिछवाड़े में बगीचे के कुंए के पास खड़े होकर आकाश को देख रहे थे। रात के समय नीले आकाश का रंग काला हो गया। उसमें असंख्य तारे टिमटिमाने लगे, उस समय वह काला रंग जीवित होकर सांस लेकर हिलने का भ्रम होता है। उसके हिलने पर एक आवाज फैलती है ।

दीप की ज्योति में

उस अंधकार के फैलने में कौन सहायक है

चलते हुए भी छुपने वाले कौन है ?

अंधकार में एक ज्योति, उसको ऐसे ही सोच सकते हैं । उसके मन की भावनाओं को समझने वाला अंधकार ही तो था ? अंधेरे में डूबे हुए हृदय में भावनाओं का उमड़ना-घुमड़ना जारी था परन्तु अंधकार को रोशन करने जैसे तीव्र भावनात्मक बिलखना जैसे ही तो था।

उसकी याद उनको छोड़ कर न जाने वाली हमेशा ही साथ रहने वाली थी । वे एक विशेष आयोजन के लिए मन्दिर में कुछ देर रहे जैसे उसे याद करने का यही सही समय हो उसका सपना देखते और कविता करते हुए समय निकालते थे ।

सारनाथन की उस समय आयु बत्तीस साल थी। राजकीय नौकरी में बड़े पद पर थे। परम्परागत सम्पदा व सारी सहुलियतें थी। अपना निजी मकान था। बिना कष्ट का आरामदेह जीवन चल रहा था। बत्तीस साल के उम्र तक उन्हें दो बच्चे हुए पर होना न होना बराबर हो गया। दोनों लड़के मरे हुए पैदा हुए । पेरूंदेवी तो बहुत दुःखी होकर बिलख-बिलख कर रोई। अपने भी एक बच्चा पैदा होकर जीवित रहेगा कि नहीं सोच-सोच कर बड़ी दुःखी रहती थी। उस समय तीसरी बार जब पेरूंदेवी को एक लड़की पैदा हुई वह बच्ची जिन्दा रही । सारनाथन को भी खुशी हुई लेकिन लड़की हुई इस बात का दुःख व निराशा भी थी और उसके काले रंग पर क्रोध भी था । वह कुछ ऐसे नक्षत्र में हुई अतः रात जैसी काली व रात्री में ही पैदा हुई। उसका नामकरण संस्कार करते नाम रखते समय मोहक रसभरे और कोमल नामों को छोड़कर गुस्से में नाम रखा यामिनी।

पेरूंदेवी यह सोच कर खुश थी कि वह बच्ची कैसे भी हो उसने मुझे बांझपन से मुक्ति तो दिला दी । उसे उसका यामिनी नाम पसन्द नहीं था । परन्तु पति की पसंद के कारण समझौता कर लिया। सुन्दरता को चाहे किसी भी नाम से पुकारो क्या फर्क पड़ता है । उसके दुःख का विमोचन हो गया, नाम उसका कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है उसने जो पौधा लगाया वह मुरझा जायेगा यह बात तो खत्म हुई। ये बात ही उसके लिए बहुत है।

अभी तो बेटी हुई है अगली बार लड़का हो जायेगा सारनाथन को विश्वास था। दूसरे साल लड़का भी हुआ पर हमेशा की तरह मरा हुआ। उसके बाद कुछ नहीं हुआ। उनके तकदीर में बच्चे के नाम पर सिर्फ यही एक लड़की ही है इसे सारनाथन जी हजम ही नहीं कर पा रहे थे । मां ने यामिनी पर अपने पूरे प्यार व स्नेह को न्यौछावर कर दिया । बच्ची को दूध पिलाते समय वह अपने सारे प्यार को उड़ेल देती। सोती हुई बच्ची को हाथों में लेकर प्यार से बिना समय के बारे में सोचे घंटो निहारती रहती। उस भयानक काले मुख पर एक अनोखा तेज था जाने कैसी अजीब सी कांति उसके चेहरे पर थी जो उसे बहुत अच्छी लगती । बिजली चमके तो आंखेँ चुंदिया जाती है पर काला रंग तो अन्दर तक आराम से प्रवेश कर जाता है।

सारनाथन तो उस पर ध्यान ही नहीं देते थे परन्तु एक दिन शाम को घर वापस आकर कपड़े बदल कर आराम कुर्सी में आंखों को बन्द कर लेटे थे तब फूल जैसे हाथों का उनके गाल पर स्पर्श हुआ, आंखें खोलीं तो देखा दो साल की यामिनी खड़ी थी। वह बच्ची रात के अंधेरे में भगवान की मूर्ति जैसे कांतिमान चेहरा लिए और सफेद मोती की लडी जैसे चमकीले दांतों से हँसती हुई दिखाई दी, गालों पर हंसने से जो गड्ढे पड़ रहे थे वो देख व उस बच्ची के स्पर्श को वे अपने चेहरे पर पा हतप्रद रह गये । उनके बैठे हुए इस स्थिति को देख बच्ची ने सोचा शायद वे रो रहे हैं, शहद घुले हुए तोतली जबान के बोल कमरे में गूँजें !

‘‘रो रहे हो क्या अप्पा मत रो” उन्होने उस दिन उसे उठाकर गोदी में लेकर गले लगा लिया। फिर उसके प्यार और ममता ने उन्हें जकड़ लिया।

बच्ची बड़ी होती गई।

पेरूंदेवी का असमंजस दिन पर दिन बढ़ता ही गया। अब धीरे धीरे बच्ची से उसकी घनिष्टता कम होती गई। दूसरे बच्चे तो अब भी खाना मां के हाथों से खाते थे। पर यामिनी मैं ही खा लूंगी मां कहती। नहाने कपड़े पहनने बाल बनाने सब कुछ वह बच्ची स्वयं ही करना चाहती। सब बातों में ऐसी क्या स्वतंत्रता सात साल की उम्र में ही बिना किसी के साथ के अकेले कमरे में सो जाती। दूसरे बच्चियों जैसे रहना पहनना फूल लगाना भिन्न-भिन्न तरीके से तैयार होना ये सब बच्ची को पसन्द नहीं था । स्कूल से वापस आती तो छोटी बच्ची अपनी पुस्तकों को सम्भाल कर ले आती । वह बिखेरे तो मैं ठीक करूं पेरूंदेवी सोचती, लेकिन सब ठीक से करते समय उसे देखती रहती । यामिनी ऐसा मौका ही न देती । हमेशा ही सब काम सही-सही परफेक्ट तरीके से करती। सभी बातों में ऐसे ही थी। उसके ऐसे रहने से उनके बीच में एक दूरी हो रही थी। ऐसा पेरूंदेवी ने महसूस किया। उसने सोचा मेरे हृदय से प्रेम की अनवरत धारा बह रही है उसमें आने को उसकी लड़की हिचक रही है क्यों ? उसने उस प्यार को देखा ही नहीं ? क्या उसको वह महसूस नहीं कर पा रही है ? उसे महसूस करायें तो कैसे ?

‘‘ये ले मेरी राजकुमारी इधर आ मेरी बेटी ।”

‘‘आाती हूं अम्मा पर राजकुमारी कह कर क्यों बुला रही हो यामिनी कह कर बुलाओ तो नहीं आऊँगी क्या ? इस तरह अपनी आवाज में बिना किसी बदलाव के सीधे सपाट शब्दों में जवाब देने को क्या कहें ?

मुर्गीयों के साथ यामिनी खेलती थी। अलग-थलग तो वह नहीं रहती परन्तु खेलते समय दूसरी बच्चियां से हिल-मिल कर हँस- हँस कर खेलते समय अचानक कोई बात हुई जैसे एक अलग एकांत ढूंढ कर चली जाती। घर के काम काज में नाम मात्र के लिए मां की मदद करती, उसकी काम काज में अधिक रूचि नहीं रहती और एकांत में बैठे रहने में ही उसका अधिक चाव होता। दूसरों से मिलने-जुलने में पीछे तो नहीं रहती परन्तु उसकी कोई रूचि भी नहीं रहती । बचपन में ही ऐसी पूर्णता होना ठीक है ? कभी-कभी उसे कहीं अकेले में बैठ एक ज्योति जैसे चमकती हुई अपने आप में लीन देख पेरूंदेवी को एक अजीब सा डर लगता।

यामिनी जब दस साल की थी तब एक दिन आधी रात को अपने बिस्तर पर नहीं थी पर खिड़की की तरफ खड़ी हो खिड़की के लोहे के सरियों को पकड़कर आकाश को देख रही थी उसे देख पेरूंदेवी घबराकर पास आई। “अभी तक बिना सोये मेरी लाड़ली बाहर क्या देख रही है। “

‘‘लाड़ली वाड़ली मत बोलो मां। मुझे इस तरह प्रेम, स्नेह से लाड़ लड़ाना अच्छा नही लगता मैंने तुम्हें कई बार कहा है ना? मुझे बुरे-बुरे सपने आ रहे थे। तभी मैं डरकर उठ गई। ”

माँ का हृदय बहुत घबरा गया। “मुझे बुलाना चाहिए था ना मेरी सोना ? मेरे पास आकर मेरे पास सो जा मैं तुझे पकड़ लेती हूँ, डर मत। ”

प्यार से उसे गले लगाने लगी तभी यामिनी बड़ी बेरुखी से अलग हो गई! “नहीं अम्मा मैं जगी रहूं तो मुझे कोई डर नहीं है। तुम जाकर सोओ। ”

इस बीच सारनाथन भी जाग कर वहां आ गए। “अम्मा को जाने दे तुम मेरे पास आ जाओ राजकुमारी। ” ऐसा कह उन्होंने उसे गले लगाने की कोशिश की तो उसने जबर्दस्ती से अपने आप को छुड़ा लिया। मीठी आवाज में मुसकरा कर बोली “मुझे अभी कुछ नही हुआ अप्पा। मैं यही खिड़की के पास खड़ी रहती हूं। फिर........ अप्पा तुम मुझे यामिनी कह कर बोलो राजकुमारी बोलना मुझे तो पसंद नही। ”

अम्मा और अप्पा अलग हो दुःखी होकर असंजस में पड़ गए। ऐसे अकेले अपने आप में रहना ! ये कौन सा तरीका है कोई घनिष्टता, स्नेह, प्यार, लाड़ ये सब इसे कुछ नहीं चाहिए क्यों ? सभी बच्चे जो प्रेम, प्यार, स्नेह स्वाभाविक रूप से चाहते है वह भी उसे नहीं चाहिए ! उससे दूर भागती है।

‘ये इस तरह मेरे पेट में नौ महीने मेरी बनकर कैसे रही। ’ ऐसा अचानक एक ख्याल पेरूंदेवी के मन में उठा।

‘‘तुम कहो तो हम चले जाते है यामिनी, पर तुम इस तरह अंधेरे को देखते हुए खड़ी मत रहो डर लगेगा ” सारनाथन बोले। तुरन्त वह हँस कर बोली ‘नहीं अप्पा अंधेरे को देख मुझे डर नहीं लगता। अंधकार, अंधकार..... अंधेरा मुझे पसन्द है। ”

फिर वह अंधेरे में खिड़की से देख गर्दन ऊंची कर मुंह को कटोरे जैसे खोल ऐसे देख रही थी कि सबको अपने में समेट लेगी। उस काले चेहरे में कितनी कांति है! रात उसके लिए बड़े साधारण ढंग से कुछ कह रही थी। उसको रात का जो आकर्षण है उसमें गाने जैसे आवाज आती थी ।

सारनाथन और पेरूंदेवी को जब वह अपने से अलग करती है तो उन्हें बडा अजीब असमंजस सा लगता था। उन्हें ऐसा भी लगा शायद हमारे में ही कुछ खराबी हो क्योंकि तीन बच्चे मरे पैदा हुए। ये बच गई, इसलिए यह भी अजीब तरीके से व्यवहार करती है। इसका मतलब हमारे जीन्स में ही कोई खराबी है। इसीलिए संसार में होकर भी लोगों से दूर हो रही है । नन्हीं बच्ची ही तो है बड़ी होने पर सब ठीक हो जाएगा......

वह सबके जैसे नहीं है वह साधारण नहीं है इसीलिए ये ऐसा व्यवहार कर रही है क्या ? सभी के जैसे ही वह भी है, एक सामान्य लडकी । उसी की पुष्टी करते हुए उसमें जो बदलाव हुए तो वह फिर से बड़ी परेशान हुई। जैसे अपने स्वयं से ही नाराज और परेशान हो । वह उस समय तेरह वर्ष की थी।

ये परेशान होना ही क्या उसमें काई खराबी की बात है क्या? उसके शारीरिक घटन में ही कोई खराबी है या कोई और कमी ? या लड़की पैदा होने का ही वह विद्रोह है ? या वह प्राकृतिक किसी भी तरह के बदलाव को सहन न कर पाने से परेशान हो रही है या घबरा रही है ?

लड़की से युवा होना मां-बाप के लिए खुशी, फिकर और जिम्मेदारी होती है। वह तो रोए जा रही थी। उसे सांत्वना देना भी बेकार ही रहा। “बिटिया रानी मत रो। ये तो प्राकृतिक ही है। इसमें डरने जैसी कोई बात नही। ” ऐसे कहने वाली अम्मा को जोर से चिल्लाकर उसने दूर भगा दिया ।

पूर्ण युवती कहलाने योग्य सौभाग्य दूसरे को वारिस देने योग्य बनने के अनुभव से वह पुलकित नहीं हुई। उसकी भावनाएँ बड़ी अजीब ही थी। अपने एकांत और साफ-सुथरे जिन्दगी में तूफान आया जैसे फड़फड़ाहट उसे दूर करने जैसे लड़ाई।

‘‘नहीं.....नहीं.......नहीं......।

‘‘यामिनी यहां देखो.......”

‘‘मुझे मत छुओ! अपने सिर को हिलाकर उसने गर्दन ऊंची की, उसका आँखों को फाड़कर देखना बहुत ही भयंकर लगा ।

(3)

गीता आ गई। पूरा घर एक ही क्षण में प्रसन्नता व खुशियों से भर गया।

घर के अन्दर घुसते ही उत्साह से उछलते हुए अम्मा! चिल्लाते हुए भागकर आकर उसके गले मिली तो बुढ़िया का हृदय खुशियों से भर गया। हे भगवान चलो मेरी बच्ची पहले जैसी ही है! मेरा डर बेकार था। बड़े शान्ति से दीर्घ श्वास छोड़ते हुए स्नेह प्यार से अपने कठोर अंगुलियों से उसके कोमल चेहरे को सहलाने लगी। एक महीना ही हुआ था उससे अलग होकर कई युग बीत गए ऐसा लग रहा था!

‘‘आजा मेरी रानी बिटिया! तेरे बिना मेरा घर सूना हो गया था।

‘‘ तुम्हें देखने के लिए मेरी आंखे तरस गईं अम्मा! उसकी बातों से अमृत की वर्षा हो रही थी। पेरूंदेवी उसके चेहरे को निहारती रही व थू थू कर उसकी नजर उतार अपनी अंगुलियों को चटकाने लगी। इस सुन्दर चेहरे पर न जाने कितने लोगों की नजर लगी होगी!

‘‘तुम मेरे साथ नहीं हो ये कमी मुझे बहुत अखर रही थी। ” गीता ने बच्ची जैसे उसके झुर्रीदार गालों पर अपने होठों से चूमा । बीस साल की होने जा रही एक जवान लड़की का कृत्य है क्या ये ? छोटी सी बच्ची ही है! पेरूंदेवी खुशी से खिल गई। इतना प्यार उसको दिखाने का तरीका इतनी नजदीकियां प्रेम में ये सब बातें सही है जिसे वह जानती है।

‘‘ठीक है रे मेरे गाल को जूठा मत कर मैं नहा कर आई हूं नकली गुस्सा दिखाते हुए उसके हाथों को अपने हाथों में लिया। गीता के हाथों की अंगुलियों में मेहंदी की लाली कम हो गई थी। एक महीना हो गया वह यहां नहीं थी! घर पर होती तो महीने में एक बार बिना नागा मेहंदी लगाती। उसे तरह तरह से सजना संवरना पसंद था। यह सोचना ही पेरूंदेवी को उत्साहित करता था।

‘‘मेरी पसंद का खाना ही है न आज”

‘‘फिर आलू का चिप्स पटोरिया का कुट्टू, टमाटर की पच्चड़ी (रायता) और सब तेरे पसंद का ही है। वही नहीं एक महीने के बाद आज बाहर से आई है ना इसलिए आज चावल की खीर भी बनेगी। ”

‘‘हाय! मेरी सोनी अम्मा! अच्छा मैं तीर्थ यात्रा कर के आई हूं ना! बड़े भक्तों को देने वाले आदर-सत्कार भी मुझे नहीं दोगे क्या ?”

पेरूंदेवी जल्दी से सिकुड़ सी गई। जल्दी से फिकर के साथ उस युवा चेहरे को घूरकर देखने लगी। भक्त शिव कामिनी ऐसा वह मजाक से ही तो कह रही है ना या खेल जैसा इसके मन में कुछ है तो नहीं........

‘‘एक बात है अम्मा मेरी आपके पास आने की कितनी भी इच्छा हो पर उस जगह को छोड़ने को मेरा मन नहीं था। वह बद्रीनाथ की यात्रा उन पहाड़ी चोटीयों के बीच नारायण बद्री भगवान का मन्दिर। वहाँ की ठण्ड, वहां की बर्फ, वहां की पूजा की जगह और वहां हम.....अरे.....रे.....रे.... क्या अनुपम अनुभव।

एक क्षण में ही उसे अपने से बहुत दूर जाते देख पेरूंदेवी आश्चर्यचकित हो गई । वह आश्चर्य से सोचने लगी , उसकी दूर देखती दृष्टि उसके चेहरे के आते जाते भावों को देख क्या वह उसके अन्दर जो है उसे वह समझ सकती है! पिछले जन्म के जैसा ये रूप दूसरी बात को प्रतिपादित नहीं करता है ? इसी तरह ही तो थी वह भी! दोबारा फिर से ?

इसको भी जाने से रोकने के लिए वह बूढ़ी उस नवयौवना के पास आकर उसे अपने से चिपकाती है।

‘‘क्या है अम्मा क्यों मुझे ऐसे बांध रही हो दर्द हो रहा है ना अम्मा! पेरूंदेवी अपनी पकड़ को ढीला करती है। थोड़ी देर पहले जो खुशी से बढ़ा हुआ उत्साह था उसमें अब भय व्याप्त हो गया ।

‘‘क्यों अम्मा अजीब सी शक्ल कैसे हो रही है !”

‘‘अजीब सा क्या! मेरा चेहरा बदला नहीं वही तो है। हँस कर बात को सम्भाल लिया। तुम जाकर हाथ-मुंह धोकर आओ गीता। मैं काफी बनाकर रखती हूं। ”

‘‘तुम्हारे लिए मैं बद्रीनारायण की चांदी की एक मूर्ति लेकर आई हूं दिखाऊं क्या ?”

‘‘ठीक है ठीक है पहले काफी पीओ। ”

‘‘उसकी क्या जल्दी है! भगवान से ज्यादा जरूरी है क्या वह। ”

‘‘मुझे सब पता है रे। स्वामी और भक्ति। मुझ बूढ़ी से भी ज्यादा तुमको पता है क्या ? पहले काफी व नाश्ता होने दो। ”

‘‘ठीक है तुम गुस्सा मत करो! इठलाती हुई हँस कर बोली। ” पेरूंदेवी उससे पिघल गई।

‘‘शरारती लड़की!......देखा में तो बोलना भूल गई! तुम आज आ रही हो लिख दिया था तो दोपहर को खाने पर तेरे अप्पा और अम्मा (दूसरी मां) को बुलवाया है। ”

‘‘आह! बड़ी अच्छी बात! मैं अप्पा के लिए भी एक चांदी की मूर्ति लेकर आई हूं। ताता (नाना) कहाँ है अम्मा बगीचे में हैं क्या ? मेरा स्वागत करने के लिए बाहर आकर एक आदमी को खड़ा नहीं होना चाहिए....... नाना..... ।”

कूदती हुई गीता सारनाथन को ढूंढती हुई अन्दर की तरफ भागी।

‘मैं बूढ़ी हूं परन्तु मुझे भी ऐसे देवस्थान के दर्शन करने हैं ऐसा कभी लगा नहीं। जीवन में एक बार काशी जाकर आना है यह भी नहीं सोचा। ऐसा क्यों! यही पर रहने के बाद भी मैलापुर के कबालिस्वर मन्दिर में नहीं गई। मुझमें देवभक्ति नहीं है ऐसी भी बात नहीं परन्तु उसके तो खून में ही है भक्ति और हमारे संस्कार भी कपड़े जैसे ओढ़े ही हैं। इसमें बहुत तेजी या कमी कभी नहीं रही। मेरे लिए पति ही काशी है कुटुम्ब ही मन्दिर इसमें ही मैंने अपनी तृप्ति पाई। ऐसे में मेरे ही शरीर मेरे ही हाड़ मांस से बनी यामिनी की राह अलग थी। पुराने को भूल नये का आश्वासन सोचे तो वह फिर से उबारने जैसे ही नहीं है क्या ? लेकिन गीता का ये बदलाव ?

गीता की सहेली मीना के घर वाले सपरिवार यात्रा पर जा रहेथे, तब बड़ों के बीच अपने लिए एक सखी की जरूरत को महसूस कर उसको साथ ले गई । युवाओं के लिए वह सिर्फ घुमने वाली बोरिंग यात्रा ही होनी चाहिए। यहां तो उसके बदले ये तो उस यात्रा को अपने हृदय से चाह रही है! बाल्य काल से ही गीता किसी भी तरह आचार-विचार को मानने वाली नहीं थी। उसमें रिश्तों के बन्धन से नफरत करने वाली कोई चीज दिखाई नहीं दी। किसी भी बात में यह उसके जैसे नहीं थी। गीता शाम के समय घर के कमरों में रोशनी कर देती है, इसको अपनी माँ की तरह अंधेरा पसंद नहीं।

अचानक ये क्या एक नई शक्ल। न समझ आने वाला एक मायाजाल कई सालों तक ठहरने के बाद आखिर में इसे भी खींच कर अपने में मिला रहा है क्या । जाने वाली का खून फिर से इस नए अवतार में फलना-फूलना चाह रहा है क्या, जाने वाली इस मामले में अलग थी पर यह तो सबको अपनी ओर खींचती है.....

नहीं नहीं ये सब भ्रम ही है। कितनी बार ऐसी कठिनाईयां आएगीं ? संसार में रम कर रहने वाली पेरूंदेवी के नाम की कितनी पीढ़ियां इस संसार से दूर भागेंगी ।

सुबह दस बजे ही रामेशन व उसकी पत्नी आ गए। यात्रा से आई गीता से बातचीत करने उसकी कुशलता पूछने, आराम से पूरा दिन प्रसन्नता से गुजारने के लिए।

‘‘हलो गीता कैसी हो ।” रामेशन ने जो धूप का चश्मा पहने हुआ था उसे उतार कर अपनी शर्ट के जेब में उसकी एक डंड़ी को बाहर निकाल कर रखते हुए पूछा।

सारनाथन आए हुए लोगों का आदर सहित आवभगत कर दूसरे कोने के कमरे में जाकर झूले पर बैठ गए। पुराने जमाने का मोटी लकड़ी में पीतल के काम वाला नक्काशीदार झूला था। उनके घर में वे दो जगहों पर ज्यादा बैठते थे। एक पिछवाड़े के कुंए में उसके साथ कुंए के दीवार से सट कर दीवार को पकड़ के खड़े होना और उसमें झांक कर देखना वह भी विशेष कर रात के अंधेरे में जो काला दिखाई देता उसमें उनको एक मित्रता का अहसास होता। दूसरी तरफ ये कोने का कमरा, यहां वे झूले पर बैठ कर कमरे के कोनों में घूर-घूर कर उनका देखना वो कितना हृदय विदारक होता। यहां वे इस झूले पर बैठे लोहे की सांकल को पकड़ पैरों से जमीन को छूते हुए धीरे-धीरे से उसे हिलाते । उसके हिलाने से सांकल की आवाज से ताल दे रहे हों ऐसा लगता था। लगता जैसे बच्चे को झूला झुला रहे हों धीरे-धीरे झूलाने पर वह हिलता । लोहे की सांकलों से जो ध्वनी निकलती है वह ताल की ध्वनी जैसा लगती । आवाज के बीच एक दीप्त तरंग अपने आप आकर समा जाती जो उनकी लड़की है ऐसा दस साल से सोच रहें हैं। इसी बात के दर्द को क्या वे दस साल से अपने अंदर पाल रहे हैं ?

बैठक में नंदलाल वासु, राय चौधरी की तस्वीरें टंगी थीं । बीचों बीच विदेशी चित्रकार पिकासो और उनके फोलोअर नवीन पाणी इंडिया के कलाकार इन लोगों के चित्र लगे थे । समयानुसार नए युग के गीता की अपनी पसंद से चुने हुए चित्र भी थे । कोई चीज पसंद नहीं आने पर सुविधा से उठा कर फेंकने वालों में से नहीं है वह ।

इन तस्वीरों के ठीक नीचे सफेद रस्सी से बुने हुए नीले रंग के सोफे में रामेश्वरन व वसंती के बीच में गीता बैठी थी, सामने जो मेज रखी थी उस पर अंगुलियों से लाइन खिंचते हुए स्वंय के देखे हुए स्थानों के बारे में वर्णन कर रही थी । रामेश्वरन की सभी इंद्रिया, आँखें बन कर गीता को देख रही थीं जिसके कारण, उसको कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । कितनी सुंदर है मेरी लड़की ! साथ ही होशियार ! उसके वसंती से पैदा हुए दोनों लड़के ही हैं इसलिए, लड़की का एक अलग ही सपना है जो इस लड़की में है। गीता भी उससे ही नहीं, छोटे भाइयों से भी और वसंती के साथ भी प्रेम व अपनत्व से रहती थी । वसंती भी उससे प्रेम व स्नेह रखती थी । फिर भी, रामेशवरन ने अपने पास ही बेटी को रहने के लिए मजबूर नहीं किया । एक ही शहर में रहने पर भी उसे मालूम है पेरुंदेवी के लिए गीता कितनी प्यारी व जरूरी है उसके दुखी हृदय को गीता ही सांत्वना देने वाली है, वह समझता था । गीता का पालन-पोषण कर बड़ा करने वाली पेरुंदेवी ही थी । उसने नौकरी की शुरुआत भले ही चेन्नई से की पर बीच में चेन्नई से वह बाहर बदली होकर कई-कई शहरों में चला गया था । अब फिर से चेन्नई में ही आ गया था । वसंती गीता से बोली “बढ़िया है, तुम सभी मुख्य-मुख्य स्थानों को देख कर आई हो ।”

“हाँ छित्ती (मौसी), ऋषिकेश, हरिद्वार, बद्रीनाथ उससे पहले और कई जगह ! जंगल, नदियां........ गंगा की आरती में दीपक के बहाए जाने वाला दृश्य मुझसे भूलाया नहीं जाता.....”

“त्रिवेणी संगम में जाकर स्नान करके आई है ! तुम्हें देख मुझे सच में ईर्ष्या भी हो रही है !”

“ये क्या बड़ी बात है ! तुम व अप्पा मिल कर जा सकते हो !”

“ये होने वाला काम है क्या ! तुम्हारे दोनों भाइयों के सभी कार्यो को मुझे ही करना पड़ता है । उनके स्कूल रवाना होकर जाने के बाद ही मुझे कुछ आराम मिलता है । ऐसे में कहाँ यात्रा पर जाऊँ !”

“उन्हें आज छुट्टी लेने को बोल कर साथ लेकर नहीं ला सकती थीं क्या छित्ती (मौसी) !”

“छोटे बच्चों को स्कूल से छुट्टी लेने के लिए हमें उकसाना चाहिए क्या गीता ? शाम को वे तुम्हें मिलने को आयेंगे । नहीं तो तुम ही घर आ जाना ।”

कुछ दूर पर खड़ी मुसकराती उनकी बातें को ध्यान से सुन रही पेरुंदेवी बोली “तुम्हारे अप्पा तुम्हारे लिए आधे दिन की छुट्टी लेकर आए हैं ना” ।

“अप्पा तो अप्पा ही है !” गीता अपने पिता को देख मुसकराई । उस समय वातावरण में एक समुन्द्र की सफेद लहर उठी ।

रामेशन के मन में खुशी छाई । ऊपर से बोला “क्यों अप्पा की चमचागिरी कर रही है ?”

गीता लाड़ से हँसती हुई अपनी जीभ दिखा कर बोली “मुझे क्या जरूरत है तुम्हारी चमचागिरी करने की ? छित्ती (मौसी), बेचारी यात्रा जाने के लिए बहुत इच्छुक है । लेकर जाईये ना अप्पा ! महेश व रमेश दोनों को यहाँ छोड़कर, आप दोनों लोग आराम से आनंद लेते “दूसरा हनीमून के लिए रवाना हो जाओ ।”

“इस जमाने के बच्चे बड़े-छोटे के लिहाज को भूल ही गए है।”

“छोटे को ही मर्यादा दिखाना चाहिए क्या अप्पा ?”

“चल रे शरारती !”

सरनाथन के कुटुम्ब में सुखद बातें हो रही थीं। पेरुंदेवी शांति से आराम कुर्सी में अधलेटी हो गई । गीता अब आकाश में नहीं उड़ेगी।

“अप्पा, आप लोगों के लिए कांसे के लोटे में गंगाजल और भगवान की मूर्ती, प्रसाद सब लेकर आई हूँ।”

“अच्छा। तू बड़ी हो गयी क्या, हम सब को प्रसाद देने के लिए!”

“उम्र कुछ भी हो तो क्या होता है अप्पा ? वहाँ जाने पर मन में कैसी शांति महसूस होती है पता है ? ऋषिकेश में साधुओं को देख कितनी भक्ति के भाव आते हैं। उन लोगों के साथ मिलकर हिमगिरि को देखते हुए योग करने बैठ जाएँ ऐसे लगता है।”

पेरुंदेवी उठ कर खड़ी हो गई । उसका पूरा शरीर उत्तेजना में हिल रहा था। “बस कर रे बातें ! आजा वसंती यहाँ आकार बगीचे को देखो ? सेम की फली की नयी बेल लगाई है।” बात बदलने लिए तड़पकर बोली ।

“ऐसा है क्या अत्तैय मैं आई ।” कह कर वसंती उठी।

पति के अत्तैय [बुआ ] को वसंती उसी रिश्ते से ही बुलाती। पेरुंदेवी को वह पसंद है। अपनी लड़की की जगह आई है ऐसा सोच कभी भी उससे जलन या वैर नहीं करती । वसंती उनके सब्जी वाले बगीचे पर एक निगाह डालती है । बैंगन के बाजार भाव के बारे में बात करती है । बच्चों के बुखार होने पर परेशान हो उनकी राय पूछती है । पति के साथ देखे नाटक के बारे में विवरण उसे देती है । दो पेंट, तीन साड़ियों और दो जरीवाली साड़ियों को देने पर एक ढक्कनदार स्टील का डब्बा व चम्मच लिया वो बताया, और उसने एक गिलास भी साथ में मांगा वह बदमाश बिलकुल ही देने से मना कर गया, ऐसा कह कर अपना दुखड़ा भी सुनाती है । वसंती को देख उन्हें मन में डरने या घबराने की जरूरत नहीं । वसंती जो रामेशन की पत्नी है, इसलिए वह अपनी बेटी को उसके स्थान पर रखकर देखने की पेरुंदेवी की काल्पनिक इच्छा की पूर्ति होती है। रामेशन की दूसरी शादी कराने की पेरुंदेवी ने ही कोशिश की थी। दामाद के होने से पहले वह पेरुंदेवी के भाई का बेटा अर्थात भतीजा था । जो भी दुर्भाग्य पूर्ण घटना घटी उसके कारण उसकी सहानुभूति का झुकाव धीरे-धीरे उसकी ओर हुआ जो स्वाभाविक ही था । रक्त के संबंध के साथ रिश्ते का संबंध भी तो था।

सब लोग उठकर पिछवाड़े आ गये। वहाँ खुली जगह में सब्जियों के अलावा फूलों के पौधे भी लगे हुए थे। सेम की फली, करेला, लौकी, कुमडा इनके बेल फैले थे । नीचे पालक, मेथी, विभिन्न सब्जियों के पौधे लगे हुए थे । साथ साथ गीता ने वर्णन किया कैसे गंगा का पानी में दीपों के जगमगाते प्रकाश में झिलमिला रहा था । मोटे-मोटे मोगरे और लाल-लाल कनेर दिखाई दे रहे थे । किनारे किनारे चमेली की बेल और आदमी की ऊंचाई तक का मेहँदी के झाड़ जो बाउंडरी का काम कर रहें थे। बीच में पत्ते लगाकर सजा दिया हो जैसे । इस सबसे थोड़ी दूर पर एक कुआं, उसमें सीढियाँ बनी हुई थी। उसके पास ही सरनाथन थे।

अचानक पेरुंदेवी को गुस्सा आया । ये क्यों उसके जाने के बाद से अपने आप को इस तरह परेशान कर भावनाओं में डूब कर दुखी रहते हैं, वह जो शून्य में फटी फटी आँखों से देखती रहती थी इसका कारण क्या यही थे क्या ? ऐसा तो नहीं जो वह सपना देखती थी उसके चले जाने के बाद ये देखने लगे ? या फिर उसके साथ रहते हुए ही ये ऐसे हो गए ?

“मेरे लिए वह लड़की नहीं थी क्या? क्या मुझे दुख नहीं हुआ ? इन्ही को ज्यादा उससे स्नेह था ऐसा दिखाने के लिए ऐसा करना चाहिए क्या ? उसके जाने के समय भी आवेश में आकर इन्होंने कई बेसर-पैर की बातें बोली थीं । जैसे इन लोगों को संसार की कोई चिंता ही नहीं । ये सब उच्च स्तर के हैं और हम निम्न स्तर के हैं क्या ?

‘मान लिया मैं निम्न स्तर की हूँ जड़ बुद्धी हूँ, तो क्या ? मैं इस दुनिया की हूँ ना । मेरे जैसे लोग दुनियादारी की जरूरतों को समझकर लोगों की सहूलियतों का ध्यान रखते हैं इसलिए तो इस तरह के ‘उच्च स्तर’ के लोग आराम से बैठे आकाश में उड़ते रहने की कल्पनाएं करते रहते है । पैर तो सबके जमीन पर ही पडे हैं न। ये धूल मिट्टी ही हमारे लिए सोना है । उसका सपना वह आकाश नहीं है, इस हथेली में है । वह भी एक मानव प्राणी ही तो है ? क्या उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं ? उसे भी अपने बराबर प्रेम करने के लिए एक साथी की जरूरत नहीं ? उसकी वह साथी गीता ही है । अच्छी बात है गीता इनके जैसे या जो चली गई उसके जैसे नहीं । गीता मेरे जैसे ही है । वह भी इस पृथ्वी की ही जीव है, पेरूंदेवी सोच रही थी ।

“यहीं इसी आकाश को देख कर योग करने बैठ जाए ऐसा लग रहा है।” गीता बोली ।

‘ये भी हाथ से निकल जाएगी लगता है ! पेरुंदेवी ने तड़प कर घबरा कर गीता को देखा । उस समय गीता दो मोटे-मोटे मोगरों को दो पत्तों सहित लेकर बालों में लगा रही थी, पेरुंदेवी ने उसे साफ-सुथरे तरो-ताजा सफेद उज्जवल साड़ी और ब्लाउज में मुसकराती हुई को देखा तो उसे लगा जैसे वह उसे पहली बार देख रहीं हो । कान में मोती के टॉप्स और गर्दन में जो मोतियों की माला उसके मुसकराते ही मोती जैसे दांत गोरी सलोनी गीता उसने सोचा प्यारी बच्ची को मेरी नजर ना लगे ! वह खड़ी हुई तो वह सफेद फुले चंपा जैसे अपार सुंदरी सी लगी ।

पेरुंदेवी का दिल तड़पा । वह जो चली गई रात को पसंद करती थी । वह एक काला रहस्य ही थी । उस काले में से ये सफेद ! जैसे आकाश में काले व सफेद दोनों ही दिखते हैं । इस काली रात के बाद ही तो सफेद सबेरा आता है उसी तरह उसमें से ये आई है! इस तरह वह उससे अलग है जैसे बादल से बिजली की चमक निकली हो पर उससे अलग । ये ही बात भगवान मुझे बता रहा है उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी ।

थोड़ी देर वहीं बातें करते रहने के बाद वे लोग अंदर आए । सरनाथन कब बगीचे में से अंदर आए ? कोने के कमरे से झूले की आवाज, थाप जैसे आ रहीथी ।

“गीता, जाकर अपने ताता (नाना) को खाना खाने बुला” पेरुंदेवी ने कहा ।

“तुम्ही बुलाओ न अम्मा !”

“जो कह रही हूँ मानोगी नहीं ? जा जाकर बुला ।” उस कमरे में घुसने में एक हिचक उसके लिए स्वाभाविक ही हो गया था !

खाने के समय पेरुंदेवी बड़ी उत्साहित ही रहीं । बगीचे में जो दृश्य उसने देखा वह अब भी उसके हृदय में अमृत घोल रहा था उसके अनुरूप ही गीता का हँस-हँस कर हंसी मज़ाक करना बातें करना उन्हें बहुत सुहाया ।

“बद्रीनाथ जाने के रास्ते में एक दिन मैंने भी टमाटर की पच्चड़ी (खट्टा-मीठा) बनाई थी अम्मा ।”

“अरे ! खाना भी बनाई तू ?” वसंती बोली ।

“फिर ? हम जहां ठहरे थे वहाँ नीचे ही दुकान थी ऊपर खाना बना कर खाने की जगह थी । मैंने एक दिन खाना बनाया ।”

“कितने लोग खाने बैठे उसमे से कितने जिंदा उठे ?” रामेशन बोले ।

“सही है सबने मुझसे पूछा, तुमने इतना बेकार खाना कैसे बनाया ?”

“अच्छा ऐसा हुआ !”

“मेरे अप्पा ने मुझे सिखाया मैंने बोला”

“अरी चंट”

दही डालने के पहले चावल परोसा गया । तब गीता के चावल में एक बाल आया उसे उठा कर “इसे किस डिस में शामिल किया अम्मा ?” पेरुंदेवी को देख कर बोली ।

“ठीक है री, उसे फेंक कर पत्ते (केले के पत्ते) को देख खाना खा” लाड़ से डाट लगाई ।

“वह क्या था गीता ?” आंखे मारकर आगे बोले “केशाचारी ! शवरीराजन ! बोले ।

“दोनों नहीं । रोमपुरी शेर” गीता की बोली सुन रामेशन हँसा ।

पेरुंदेवी अति प्रसन्न हुई । जाने वाली ऐसी कोई हंसी की बात बोलेगी ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते है ?

“अपने गीता से जो शादी करेगा वह भाग्यशाली होगा ।” वसंती बोल कर प्रेम पूर्वक से उसे देखने लगी ।

“मैं भी बोलने वाला था अत्तैय । गीता बीस साल की होने वाली है । बी. ए. कर लिया । जल्दी ही अच्छा वर देख शादी कर दूँ, सोचता हूँ । आप क्या कहती हैं ?” कहते हुए रामेशन ने पेरुंदेवी को देखा ।

इसमे क्या संदेह है ‘बाबू’ ये नाम ही आया । “समय के अनुसार करनी ही चाहिए अच्छा वर देख ।” कहते हुए गीता को देख उसके चेहरे पर आँख गडाई । गीता का चेहरा अचानक क्यों कुम्हला गया ? जो बिना इच्छा के कारण ऐसा हुआ ? उसके भौंहों के बीच सिकुड़न क्यों ? अय्यो भगवान, जो कहानी खत्म हुई उसे फिर शुरू करोगे ?

“क्यों गीता क्या हुआ परेशान सी लग रही हो ? डर व घबराहट के साथ पेरुंदेवी बोली । गीता ने जवाब नहीं दिया । दही चावल में ही अंगुलियों से कुछ लिखने जैसे करती रही । चेहरे पर एक अपार वेदना दिखाई दी ।

“गीतू!”

“शादी की बात सुन शरमा रहीं है” वसंती ने सफाई दी ।

“इसमें शर्म क्या है ? अबोध बालक तो नहीं है ? अभी मैं अपने मन में चार-पाँच लड़कों के बारे में सोच रहा था । आजकल की लड़कियों के मन में अपने होने वाले पति के बारे में कुछ कल्पनाएँ होती हैं । मैं पहले गीता से पूछ कर ही आगे बढ़ूँगा । क्यों गीता तुम्हें किस तरह का पति चाहिए ? तुम्हें पढ़ा-लिखा चाहिए या समाज में वह खास हो, कैसा सोचती हो ? या कुछ और बता.....”

“अप्पा !”

वह शब्द उच्च स्तर पर न उठा । फिर भी पेरुंदेवी हिल गई । उस आवाज में अपना विरोध करने की चेतावनी उसके समझ में नहीं आती क्या ?

गीता उठ कर खड़ी हो रही थी । खाना थोड़ा बाकी था ।

“ये बातें........ ये बातें मुझे बहुत तकलीफ दे रहीं हैं । मैं जा रही हूँ ।” वह जल्दी से उठ कर चली गई ।

ये सब देख रहे लोगों की निगाहें बदली नहीं ।

अभी तक मौन रहें सारनाथन अचानक हँसने लगे ।

“शाबाश गीता ! सब लोग उस लड़की की बात को माने क्या ? शादी ! हाँ....हाँ.......हाँ.......” क्या हंसी ऐसी, अंदर के सभी पर्दों को फाड़ कर बाहर आने जैसी आवाज !

पेरुंदेवी और रामेशन दोनों ने उनके आघातों को नफरत से देखा ।

पेरुंदेवी का गुस्सा उमड़ा व एक क्षण में ही दुख ने उसे घेर लिया । शरीर व दिल दोनों ही तड़फड़ाने लगे । क्या हो गया है इन्हें ! ये किस पाताल लोक में उसके जीवन का चक्र घूम रहा है, बार-बार गड्ढे में फँस जाता है ! उसका ही अनुसरण कर रही है ये भी ? गीता के मुख पर ये विद्रोह, ये नफरत..... शादी की बात ही सुनना पसंद न कर उठ कर चले जाना इसका क्या अर्थ है ?

यात्रा तो एक महीने पहले ही हुआ । उससे पहले गीता में कोई बदलाव नहीं दिखा क्या ? इसके पहले वह शांत हो चुपचाप बैठती थी तब सोचा था कुछ नहीं है सोच कर छोड़ दिया था तो भी – अब इस क्षण तो इसका अर्थ दूसरा ही नजर आ रहा है । ऐसा सोच पेरुंदेवी के दिल में भयंकर तूफान उठने लगा । जो चली गई उसके समान ही ये भी अंधेरा, एकांत आदि में डूब रही है क्या ? वह न समझ आने वाला दुख जैसा ही इसका भी अंत है क्या ? ये उसी की परछाई नहीं क्या ?

‘हे भगवान, इसे तुम ही बुला रहें हो तो भी नहीं ! मैं इसे तुम्हें नहीं दूँगी । मेरे मन को मत तोड़ो । इसे इस संसार के लिए छोड़ दो । एक बार प्रार्थना कर धोखा खा गई, पर अब यह मुझे मिलनी चाहिए । इसे शर्मीली बहू, प्यार भरी पत्नी, भरे-पूरे परिवार की मुखिया और प्रेम बरसने वाली जैसे इसे देखना चाहती हूँ । इसके पैर मिट्टी में जाए तो मिट्टी को उससे चिपकने दो । मेरा जो ताजा जख्म है उसे इसके द्वारा भरने दो । इसे मत उठा लेना, इसे छोड़ दें, छोड़ दें…….! पेरुंदेवी हृदय से प्रार्थना कर भगवान से याचना करने लगी ।

तड़फड़ाते मन से आँखों में नफरत व दीवानी दृष्टि और आँसू लिए चेहरा, बंद दरवाजा, प्रार्थना.......

‘हे प्रभु, छोड़ दे, मेरे हृदय को एक बार फिर से मत तोड़, मैं सह नहीं पाऊँगी, अब मुझमें इतनी शक्ति नहीं है.....’ बड़बड़ाते हुए पेरूँदेवी का हृदय टूटने लगा । उसे ऐसा लगा हृदय से पिघलकर पानी बह रहा है । पानी ....... कहाँ जा रहा है ? उसका....... कोई आकार है..... ऐसा लग रहा है मेरे अंदर पानी छोटी सी जगह से इकट्ठा हो गया । कुएँ जैसे ।

अगले कुछ दिनों वह गीता के कार्य-कलापों को घबराहट के साथ ध्यान पूर्वक देख रही थी ।

इससे पहले तो भगवान के कमरे में इतनी देर वह नहीं रहती थी ? इतनी प्रार्थना किस लिए व क्या प्रार्थना करती है ? क्या उसकी छाया के बिना ही ये फूल भी भगवान को अर्पित हो जाएगा ? पेरुंदेवी घबराई व अन्दर ही अन्दर हिल गई । एक तरफ सफेद दूसरी तरफ काला दोनों तरफ के जीवन उसे धोखा देकर चले जाएगें क्या ?

गीता बहुत देर तक किसी सोच में डूबी रहती थी । आँखों में वेदना सी भरी कई बार रहती थी । रात में कई बार परेशान होकर कमरे के बाहर घूमती रहती है । क्या करे उसके समझ में नहीं आता और परेशान हो बार-बार दौड़-दौड़ कर पूजा के कमरे में जाती और बद्रीनारायण की तस्वीर के सामने सिर झुकाती, मुरझाई सी रहती।

उस दिन भी वह नहा धोकर पूजा घर में घंटों आँखें बंद कर प्रार्थना में लीन थी, फिर जैसे कोई जरूरी फैसला कर पेरुंदेवी को पूजा के कमरे में बुलाया ।

“अम्मा, थोड़ा यहाँ आकर बैठो ना ।”

उसके कहते ही वह आ कर बैठ गई । उसके पैर जैसे अशक्त हो गए थे ।

गीता तुरंत न बोली मौन रह चिंतन कर रही थी । वह उसे कैसे बताए । पेटी में से एक-एक मोती निकालकर देख कर फिर उसी में रखते जैसे अपने शब्दों को निकाल-निकाल कर परख रही हो जैसे ‘ये पूरा नहीं है, ‘ये ठीक नहीं, ’ ‘ये ज्यादा हो जाएगा, ’ ‘ये उनको समझा नहीं पाएगा’, ‘ये उनको दुखी कर देगा’ ऐसा सोच कुछ नहीं कह पाई ।

उनसे कैसे कहे एसा सोचते हुए उसकी आँखें बंद होती कभी आँखें खुल कर चमकने लगती । ये क्या प्यारी भगवान को ही समर्पित हो जाएगी ? ये क्या मीरा है ? कोदा तपस्विनी उसका हृदय काँपा और क्या ‘कन्या’ ही रहेगी । बुजुर्ग औरत कांपी व अपने होठों को काटने लगी उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया, वह सिहर गई ।

अंत में एक तरफ गीता ने अपने मन को अपने भावों को शब्दों का, कपडों जैसे उसने जामा पहनाया, उसे सजाया, संवारा, उसे तैयार किया । गर्दन को सीधी कर, बिना मुसकराहट के गंभीरता से बोली “अम्मा, मैं तुमसे एक बहुत ही जरूरी और खास बात बोलने वाली हूँ ।”

अचानक पेरुंदेवी का सर चकराने लगा । उसका पूरा शरीर ही बेकार एक टूटे खाली बर्तन जैसे शक्तिविहीन हो गया । उसके सूखे मुंह में जीभ को भी हिलाना मुश्किल हो गया । उसे एक अजीब से डर ने कमजोर कर दिया उसे उसने महसूस किया । नहीं हो सकता, उससे गीता की बातों को नहीं सुना जाएगा । इस समय इसके पास उसे सुनने लायक साहस उसमें नहीं । बाद में देखेंगे, इस समय नहीं । उसने उसके कहने वाली बात के बारे में अनुमान लगा लिया तो भी उसकी बातों को सुनने के लिए मन तैयार नहीं था वह संकोच से भर गई। शब्दों में जब तक न सुने तो सच नहीं होता । उस समय तक तो एक भरोसा होता है ना........

“गीता, अभी मुझे कुछ काम है । आज एकादशी है ना, तुम्हारे ताता (नाना) को एक समय ही खाना है अत: इडली बनानी है । रसोइया भी ठीक से नहीं आ रहे है । तुम्हें जो बोलना है उसे फिर सुनेगी......”

अशक्त हुए पैरो को शक्ति दे वह जल्दी से उठ कर बाहर चली गई ।

उसे पता है । गीता बोलेगी, “मैं शादी नहीं करूंगी ।” ऐसा ।

(4)

“मैं शादी नहीं करूंगी !” यामिनी चिल्लाई । कौन सी लड़की ऐसा नहीं कहती ? यह तो एक प्राकृतिक विरोध है, मन पर पर्दा डालने वाला, एक झूठ है, इसके लिए इतना सोचने की जरूरत नहीं । अचानक से इसके जीवन की दिशा बदल जाएगी नए-नए रिश्तों से जुड़ना पड़ेगा ऐसे में इसका यह सोच नए परिवेश में कैसे रहेगा ? मन हमेशा स्थिर नहीं होता। डर दूर होते ही रिश्ते की मिठास, उसकी पूर्णता को वह महसूस करेगी । ऐसा ही सोच पेरुंदेवी पति से कहने लगी “अभी ऐसे ही बोलेगी । कल ही शादी के बाद दो दिन आकर अपने साथ रहने को कहेंगे तो बोलेगी ‘वे ऐसा, वो वैसा बहाने बनाकर वहाँ से नहीं आएगी आप देखना ।”

सिर में लगी कंघी को मेज पर रख यामिनी घबराई आवाज में बोली ।

“अम्मा, मैं ऐसे ही नहीं बोल रही हूँ ! सुचमुच में ही कह रहीहूँ । शादी के बारे में सोचना ही मुझे पसंद नहीं, मुझे कुछ अजीब सा लगता है, मुझे मरने के लिए बोल रहे हो एेसा लगता है......”

“छिं छिं, ऐसे अपशकुन की बातें मत बोल । शादी नहीं करोगी तो क्या करोगी ?”

यामिनी को समझ नहीं आया क्या कहे । उस समय कोई अद्रश्य लक्ष्य जैसे उसे पुकार रहा था उस ही की आवाज उसका पीछा कर रही थी, वह गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं चाहती थी । वह इसका स्पष्टीकरण न दे सकी । पर वह विद्रोह कर सकती थी । अपने पक्ष में वह किसी साथी को ढूंढ भी सकती थी ।

उसका विरोध सिर्फ एक ख्याल ही नहीं था, उसकी बुद्धि विरोध के तरीके खोज रही थी । शादी का ख्याल ही उसे परेशान कर रहा था । भूख, नींद, प्यास आदि जो जरूरी है वह सब सुगमता से समझ और कर रही थी ।

“बोल रे !”

“दूसरा कुछ और करना है तो इसके लिए मैं मना नहीं कर रही हूँ । पर मैं शादी नहीं करूंगी, ये ही बात है ।”

“बहुत ही अच्छा है । कोई सुनेगा तो हँसेगा । छोटी उम्र से तेरी इच्छा के मुताबिक तुझे छोड़ दिया । लाड़ प्यार करने पर तुम स्वच्छंद हो जाओगी ऐसा नहीं सोचा था । कोई नहीं चाहिए, ऐसा सोच तुम अकेली शून्य में आकाश को देखते हुए बैठी रहती हो ना, इसे भी वैसा ही विषय समझ लिया क्या ?”

“तुम्हारी जो इच्छा हो कह लो अम्मा । पर मैं शादी नहीं करूंगी।”

“नहीं बोलोगी तो तुम्हें कौन छोड़ देगा ?”

“छोड़ना ही पड़ेगा । मुझे शादी नहीं करनी । मुझे बाध्य करने का तुम्हें अधिकार नहीं है ।”

अठारह साल की युवा लड़की साधारण शरीर और सुंदर चेहरे वाली लड़की अचानक आँखों में एक भयंकर समुन्द्र जैसागहरा विचित्र सा भाव उसमें आ गया । उसकी दृष्टि को देख कर एक समझ न आने वाला भय पेरुंदेवी को डरा रहा था । उसे देख पेरुंदेवी थोड़ी देर मौन रह गई । पास में बैठे सारनाथन ने असमंजस में बेटी को देखा ।

“इतने पक्के इरादे से बोल रही है ये लड़की ! तो हम कुछ दिनों तक अपने इरादे को टाल दें तो क्या है ?” सारनाथन अपनी पत्नी से बोले ।

“दोबारा सोचने की कोई जरूरत नहीं । इसमें जिद्द ही ज्यादा है । जब काम अपने हाथ की मुट्ठी में है तब ही काम कर लेना चाहिए । ऐसे ही इस शादी को कर देना ही अच्छा है । इसके अलावा अन्ना (बड़ा भाई) भी जल्दी कर रहे हैं।” बोली पेरुंदेवी ।

“मैं नहीं करूंगी, नहीं करूंगी, नहीं करूंगी !” यामिनी आवेश के साथ मेज पर दनादन हाथ से मुक्के मारने लगी । फिर, दुखी हो तेज स्वर में रोने लगी ।

सँवारने के लिए खोले गए रेशमी घुँघराले बाल रोने के कारण, घुटने तक आ गए, उसने उसके चेहरे और पीठ को ढक लिया वह ऐसा लगा जैसे वह अंधेरे में डूब गई । सारनाथन जी को बहुत दया आई । “मत रो माँ (सभी को माँ बोलते है) यामिनी । सब कुछ सही हो जाएगा ।” वे पास जाकर उसके सिर को सहलाने लगे ।

बादल छंट गए जैसे यामिनी सिर को एकाएक झटकाकर दूर जा खड़ी हुई ।

“छूओ मत अप्पा ।”

फिकर से, तड़पते हुए माँ-बाप उसकी तरफ देखने लगे ।

पेरुंदेवी के आँखों में एक योजना दिखाई दी । इसका स्वभाव तो बदला ही नहीं ! यामिनी जब छोटी सी लड़की थी तब एक समारोह के लिए घर में सब लोग इकट्ठा हुए थे । बच्चे व बच्चियाँ इकट्ठे हो खेल रहे थे । चौपड़, ताश, साँप-सीढ़ी, गेंद, छुपन-छुपाई खेलना शुरू किया तो बच्चे खूब शोर मचा रहे थे । बच्चे जहां भी जाते वहाँ तो खूब शोर-शराबा होता ही है । अचानक यामिनी अलग होकर अकेली आकर बैठी । थोड़ी देर के ही बाद छोटा रामेशन पेरुंदेवी के पास आया ।

“अत्तैय यामिनी आधे खेल में ही आ गई, उसे दुबारा खेलने आने को बोलो ना........”

“क्यों आ गई ?”

“पता नहीं ! अचानक ‘मैं अब नहीं खेलूँगी’ बोल कर चली गई ।”

“इस बेवकूफ को और क्या काम है ? एकांत एकांत जब देखो तब एकांत ।”

बोलने पर रोमेशन के गाल में डिम्पल पड़ रहे थे ‘पर वह खेलने नहीं आ रही’।

“क्यों नहीं जा रही हो ?”

“मुझे पसंद नहीं”

“बहुत बड़ी हो गई हो, जो पसंद ना पसंद बोलने को । क्यों पसंद नहीं ? वही तो कम से कम बोलो तो ।”

“छुपन-छुपाई के खेल में दूसरों को छूना पड़ता है अम्मा ।”

“अरे पापी ! छूने से क्या ?”

“मुझे, पसंद नहीं । मुझे कोई छूए या मैं दूसरों को छूऊँ दोनों ही मुझे पसंद नहीं” पेरुंदेवी से हिला भी नहीं गया ।

“ये कितनी पागल है ना अत्तैय (बुआ) ? आखिर में मुझे ही दौड़कर इसे पकड़ना था । मैंने उसके हाथ को छूआ भी नहीं था कि ये जोर की आवाज में चिल्लाई तुम्हें पता है ?” रामेशन ने शिकायत की ।

“मैं तुम्हारे लिए ही सिर्फ नहीं बोली “बाबू ! (रामेशन का घर का नाम) मेरे पास जो भी आए मुझे पसंद नहीं, तुम नाराज मत हो? यामिनी ने उसे अपनी सफाई दी ।

पेरुंदेवी का हृदय बर्फ सा जम गया । ये क्यों ऐसी है अपनी लाड़ली बेटी !

“तुम्हें इस तरह बातें नहीं करनी चाहिए यामिनी । बच्चे सब छूकर नहीं खेलते क्या ? उसमें क्या गलती है ?” वह एकदम तड़पती हुई बच्ची के समझ न आने वाली बात बोल रही है वह यह भी भूल गई और बोली “बाबू ने तुम्हारे हाथ को छुआ इसीलिए तुम आ गई ? कल वही तुमसे शादी करने वाला है, याद रखना ।”

बच्ची का चेहरा एकदम से स्याह हो गया । शादी जैसे शब्दों को पूरी तरह समझने की उसकी उम्र नहीं है, फिर भी मारने से दुखेगा ऐसा सोच उसने कहालेकिन उसके शब्दोंने उसमें विरोध को जन्म दिया ।

“ये सब कुछ नहीं । मैं शादी नहीं करूंगी । उस समय तो बच्चे की बात है अक्ल नहीं है अबोध है ऐसा सोच सकते हैं पर आगे जो वह बोली उसी ने माता को अधीर कर दिया । ‘मैं बहुत ज्यादा पढ़ने वाली हूँ, मैं अंबूलै जैसे नौकरी करने वाली हूँ’ ये साधारण बच्चों वाली बात तो नहीं बोली उसने । पेरुंदेवी कुछ नहीं बोली तो वह आगे बोली “मैं अकेले ही रहूँगी ।”

उसके इस तरह के एकांत व अकेली रहने की बात को सुन कर सारनाथन आश्चर्य में पड़ गये । उसको समझना उन के लिए दूसरी भाषा के कागजों के पुलिंदों को खोल-खोल कर पढ़ने जैसा भ्रमित करने वाला होता ।

एक बार जब वह पूर्ण युवती बनी तब की बात है ।

वह हमेशा की तरह रात में बड़ी उदास और दुखी हो बैठी थी । उसी समय वे भी उसी को देखते हुए मौन होकर थोड़ी दूर पर बैठे थे ।

रात, वह भी अंधेरी काली रात, उस अंधेरे को दूर करने की कोशिश में तारे जी जान लगा कर चमक रहे थे । हवा में एक खुशबू थी। रात की रानी के फूल अंधेरे में खुशबू फैला रहे थे या अंधेरा ही फूल बनकर खिला था ?

स्वयं की लिखी कुछ कविताओं को वह धीमी आवाज में पढ़ रही थी । पर उसके शब्द पता नहीं क्यों वहाँ फैले मौन को कम नहीं कर रहे थे । कविता तो मन के मौन से प्रकट होने वाला तत्व ही है क्या?

अकेले या एकांत में बड़बड़ाने का क्या अर्थ ? क्या ये सामान्य है ? उसकी कोई भी खास सहेली नहीं है वे जानते थे । कुछ सहेलियों थीं ऐसे ही, एक बार उसको कुछ जानने वाली सहेलियां घर आईं। दूसरे दिन सब साथ पिक्चर जाएंगे, ऐसा कह उन लोगों ने सिनेमा का टिकट भी ले लिया । यामिनी उस समय उन्हें रोक न पाई । दूसरे दिन सिनेमा जाने के समय सिर दर्द का बहाना कर घर पर ही सोई रही । उसने उन्हें अपना दोस्त नहीं समझा क्या ?

उसकी रुचि साहित्य पढ़ने में थी । वह रुचि उसने सारनाथन से ही विरासत में प्राप्त की थी। परन्तु परिवार, कुटुम्ब, प्रेम, प्यार वगैरह को लापरवाही से दूर छोड़ देती । उसका प्रेम रात के अंधेरे से ही है क्या?

उसका रंग काला था पर उसमें खूबसूरती की चमक थी ! कविता में जैसे वर्णन आता है वैसे चमकीली आँखें, भोहें जैसे तीर की कमान सी झुकी हुई, पनीली पतले-पतले होंठ, मुंह पर लावण्य, ऐसा लगता है जैसे सुंदरताकी कोई मूरत हो ।

उस दिन तल्लीनता से अपने अप्पा से बातें करने लगी । माँ की ममता सारनाथन की आँखों में दिखाई दे रही थी, जो डर के कारण उस समय सूख गई थी जब वह पैदा हुई थी । तब उससे स्नेह न रखने वाले अप्पा समय के साथ-साथ उसके ऊपर स्नेह उड़ेलने लगे । वह भी दूसरों की अपेक्षा उनसे अधिक घनिष्टता का अनुभव करती थी ।

“पूरी दुनिया को घूमकर देखकर आने की इच्छा होती है अप्पा ! संसार में जो कुछ है सबको जानने की इच्छा होती है । चन्द्र मण्डल, दूसरे ग्रहों को ही नहीं संसार के किसी कोनेको भी न छोड़ सभी जगह यात्रा कर देखने की इच्छा है ।”

वे आश्चर्य चकित रह गए । संसार के प्रति बिना किसी अपनत्व के ये क्या इच्छा है ! न समझ में आने वाली ये क्या तड़प है ! समय आने पर शायद वह परिपक्व हो जीवन में रुचि लेगी क्या ?

उसका ऐसा सोचना उच्च स्तर के सोच का नतीजा है क्या ? पूरी दुनिया के लिए ही अपने को समर्पित करने वालों में ढूँढने से यही बात उनमें भी होती है क्या ? इसी कारण शादी करने से जीवन का विस्तार खत्म हो संकुचित हो जाएगा शायद यही सोच कर ही गृहस्थ जीवन नहीं चाहती है । उसके मना करने का यहीएक कारण है क्या ? किसी के साथ रहने की इच्छा ही नहीं है, मनुष्यगत स्नेह, प्रेम आदि को बांटना ही नहीं चाहती और इन सबसे दूर रहना चाहती है ऐसा भी हो सकता है ? गृहस्थ जीवन साथ रहने का है और ये तो अकेले अंधेरे को देख कर रहना चाहती है इसीलिए जिद्द कर रहीहै ? गृहस्थ जीवन में आने से डर रही है या ये सिर्फ उसका बचपना ही है ? ‘सेक्स’ से डरना आदि तो नहीं ? ऐसी अनेकों बातों को सोच-सोच कर वे डर रहे थे वह शादी करने से क्यों डर रहीहै ?

कुछ भी हो असाधारणरूप से वह विचित्र है इसमें कोई संदेह नहीं । उनका मन बहुत असमंजस में रहा । फिर भी पेरुंदेवी के पक्ष को छोड़ नहीं सकते । यामिनी को अकेले रहते हुए एकांत की आदत ही पड़ गई हो ऐसा भी हो तो सकता है? यदि ऐसा हो तो समय के साथ वह ठीक हो जाएगा । ऐसे कई बातों को सोचते हुए उन्होंने सोचा लड़की की शादी बिना किए कैसे रहें ?

शादी की तैयारियां शुरू हो गई ।

शादी के मुहूर्त के चार दिन पहले यामिनी घर पर नहीं मिली । परेशान माँ-बाप, दूसरे लोग पूरे शहर में ढूँढने लगे । पुलिस को सूचित किया गया । सारनाथन जी के मन में तरह-तरह के विचार आने से वह परेशान हुए । पेरुंदेवी भी असमंजस में थी । पापी, लड़की इस तरह परिवार को अपमानित करने के लिए कैसे ठान ली, ?

दूसरे दिन रात को यामिनी एरुम्बूर स्टेशन पर रेल में चढ़ने वाली थी तो पुलिस ने आगे होकर पकड़ लिया ।

किसी तरह लड़की को ढूंढ कर पकड़ कर लाए तो पेरुंदेवी को तसल्ली हुई तो भी, यामिनी के जोर जोर सेचीखने चिल्लाने से उसे बहुत गुस्सा आया ।

“नहीं, मैं शादी नहीं करूंगी, मुझे अच्छा नहीं लगता, मुझे छोड़ दो, मुझे छोड़ दो.......”

“मुंह बंद रख, तेरा जिद्दीपन ज्यादा ही हो गया है। अबकी बार बोलेगी तो मैं तेरे जीभ को जला दूँगी । गधी कहीं की !”

“अम्मा, मुझे शादी नहीं करनी, मैं नहीं करूंगी, मुझे पसंद नहीं..... अप्पा इसे रोक दो, आप तो...... मेरे लिए शादी रोक दो अप्पा.......अप्पा ।”

तड़पी, लड़ाई करी, चिल्लाई, उछली ये सब सारनाथन सहन न कर पाये । “वह इतना शादी का विरोध कर रही है ! हम गलती तो नहीं कर रहे ? इस शादी की तैयारी को रोक दें क्या ? इसकी उम्र भी ज्यादा नहीं हुई । अठारह ही तो है । कुछ साल बाद देखेंगे !” उनके कहते ही पेरुंदेवी ने विरोध किया ।

“बहुत अच्छी है आपकी बातें । ये सब साधारण सी बातें है । कितनी ही लड़कियां पहले शादी के लिए मना कर तूफान खड़ा करती हैं फिर पति के साथ खुशी से रहती हैं ! जो शर्मीली लड़कियां होती हैं वे शादी बोलते ही ‘हाँ’ कह कर मुँह थोड़ी ना फाड़ती है ? अभी ऐसा ही रहेगा । गले में तीन गांठ (पीले मंगल सूत्र मोटी रस्सी जिसमें पति तीन गांठ लगाता है) पड़ जाए सब ठीक हो जाएगा । पहले से ही इतना अपमानित हो रहे हैं । मेरा भाई है इसलिए कुछ नहीं कह रहा है । इस समय आप शादी को टाल देंगे तो हम फिर पूरी उम्र सिर नहीं उठा सकते ।”

वह बिदकी, दूसरे दिन भी लड़ी । बहुत रोई गिडगिड़ाई । इसी सबके बीच उसका श्रृंगारभी हुआ । आँखों में काजल डाला, तो वह बह कर निकल गया । पूरा श्रृंगार किया । कपड़े दो लड़कियों ने मिलकर बदले । सारे आभूषण पहनाए । बालों को संवार कर चोटी बनाई । चोटी को केवड़े के फूलों से सजाया, रात को दिन बनाने के कितने प्रयत्न करने पड़े । हाथों में मेहँदी लगाई तो ऐसा लगा काले सौंदर्य में आग लग गई हो।

उसकी आँखों में संवेदनाए ही खत्म हो गई । हृदय की धड़कन धीमी हो गई । आँसू से भीगी आँखों के साथ ही गर्दन में मंगल सूत्र भी पहना दिया गया।

(5)

उसके बाद जो भी हुआ सब विपरीत ही हुआ । शहर के दूसरे कोने में रहने वाले उसके पति के घर एक अच्छा दिन देखकर उसे छोड़ आए ।

“बच्ची वहां पता नहीं कैसे रहेगी !” ऐसे बोलते हुए सारनाथन हॉल में बने झूले पर बैठे । उस समय झूला वहीं लगा था । हॉल की दीवार पर कुछ चित्र लगे थे । उसमें से कुछ पेरुंदेवी ने कपड़े व चमकीली पन्नियों से बनाऐ थे और रवि वर्मा के बनाए चित्र भी टंगे थे ।

“कैसे क्या ? अच्छी ही रहेगी । इतने दिन कुछ विशेष जैसे रही, अब सब कुछ ठीक ठाक सामान्य हो जाएगाऔर क्या?” पेरुंदेवी ने अपनी शादी-शुदा जिंदगी में जैसा ठहराव देखा उसे देख कर शांति मिली । वैसा अनुभव उसकी लड़की को नहीं मिलेगा क्या ? “उसका अब सब सही हो जाएगा आप देखना” वह बोल कर अपनी आँखों को पोंछने लगी। माँ के मन में बेटी के विछोह का दु:ख नहीं होगा क्या ? पर अब बेटी को अपना जीवन जीना चाहिए, नहीं क्या ?

“हमारी लाड़ली का अब सब ठीक हो जाएगा, आप देखना ।”

रात के अंधेरे को खत्म होते हम महसूस कर सकेंगे ? सुबह का मतलब रात का अंत ही तो है ? पता नहीं कौन सी कल्पना में सारनाथन डूब गए ।

कुछ आवाज सुन पेरुंदेवी बाहर आई । बरामदे में बांस का ढेर लगा था उसी के पास यामिनी खड़ी थी।

“ये क्या है री ?”

काले लम्बे बालों वाले सिर को ऊंचा उठा कर, यामिनी बड़ी-बड़ी आँखों को फाड़-फाड़ कर उसे ही देख रही थी । तड़फडाती, फुफकारती हुई तीक्ष्णदृष्टि से देखतीबोली“अम्मा, मैं वहाँ नहीं रहूँगी ।”

“अय्यों, ये क्या अनर्थ है ! बिना बोले आ गई क्या ?”

“मैं वहाँ नहीं रहूँगी ।”

“अरे पापी लड़की ! तुम पागल हो क्या ?”

“मुझे वहाँ अच्छा नहीं लग रहा है ।”

“छि.......छि बको मत, तुम्हारे पति का घर है तुम्हें वहीं रहना होगा ।”

“नहीं, नहीं रहूँगी ! मुझे पसंद नहीं । मुझे डर लग रहा है…….. मुझे नफरत है.......” उसका स्वर तैरने लगा ।

“हे भगवान ! किस लिए ये सब हो रहा है ? ये मुझे ये कैसी लड़की पैदा हुई.....” उसने बेटी को गले लगाकर उसे समझाने की कोशिश की । “मेरे प्यारी बच्ची ये देखो मेरी लाड़ली...”

यामिनी अपने को छुड़ाते हुए पीछे हटी । “मुझे मत छू । मुझे ऐसे मत बुला ।”

थोड़ी देर में ही रामेशन घबराया हुआ आया । वह वहाँ सुरक्षित है मालूम होने पर उसे तसल्ली आई । उसके चेहरे पर चिंता व चिड़चिड़ाहट को देख कर पेरुंदेवी उससे आँखें न मिला सकी । उसे अपनी बेटी पर ही गुस्सा आया ।

“अरी यामिनी रोमेशन तुम्हें ले जाने आया है देख, तुरंत जाओ।”

“नहीं जाऊँगी, नहीं आऊँगी ।”

उसने पक्के इरादे से मना कर दिया । पति की तरफ क्रोध से आँखें फाड़ कर देखा । उसकी निगाहों में कितनी घृणा और विरोध था !

“तुम्हें जाना ही पड़ेगा ।”

“नहीं जाऊँगी…….” उबलती, घबराई, आँखें पिता को देख कुछ ठीक हुईं । “अप्पा मुझे मत भेजना अप्पा, प्लीज, मुझे मत भेजना !” सारनाथन सहन नहीं कर पाये, “उसके मन को थोड़ा शांत होने दो बाबू, दो एक दिन यहाँ रह जाने दो।” वे बोले ।

रामेशन ने पत्नी को देखा । उसकी दृष्टि में गुस्सा, उसके विरोध का आश्चर्य, उसके विरोध के कारण का मालूम होने न का असमंजस सभी सम्मलित था ।

फिर वह पेरुंदेवी की तरफ मुड़ाशांत ढंग से तसल्ली से उसने पूछा “आपको मुझसे क्या विरोध है अत्तैय ? आपने क्यों मुझसे उसकी शादी कराई ?”

पेरुंदेवी तड़प गई । “अय्यो, ऐसा सब मत बोलो बेटा ! मैंने अच्छा सोच कर ही ऐसा किया...... तुम कुछ फिकर मत करो बाबू ! समय के साथ-साथ सब ठीक हो जाएगा । उसका स्वभाव एकांत में रहने वाला है, डरने वाला है………”

डर हो तो ठीक हो जाता । परंतु वह डर नहीं वह तो आंदोलन था । कारागृह की दीवारों से पक्षी के सिर टकराने जैसा रोना था ।

लेकिन उसके रोते-बिलखते ही वे उसे वापस भेज दिया गया। पीहर आने पर उसे फिर वापस भेजेंगे सोच कई बार वहाँ भी न जाकर कहीं ओर चली जाती ।उसेबार बार ढूंढ कर पकड़ कर लाये ।

सारनाथन दिन पर दिन बहुत चिंतित रहने लगे और फिकर करने लगे । अपनी बेटी की शादी करके सही किया या गलत उनके मन में बार बार ये विचार उठने लगा । रात के समय छत पर चाँद की चाँदनी में बैठे मन की शांति खोकर विचारों में डूब जाते, और सिर ऊपर उठा आकाश को देखने लगते ।

‘मैंने किया वह ठीक ही है ना ? मेरी बच्ची खुशी से तो रहेगी ?

कई महीने बीत गए ।

‘मैंने जो किया वह सही तो है ? मेरी बच्ची हँसी-खुशी से तो रहेगी ?’ इसी तरह एक साल बीत गया ।

मैंने किया वह गलत था क्या ? मेरी बच्ची कभी खुशी से नहीं रहेगी क्या ?

हर बार सवाल करते लेकिन रात के अंधेरे से उन्हें कोई जवाब नहीं मिलता । एक दिन यामिनी शोक में डूबी हुई सारनाथन के सामने जमीन पर घुटने को मोड़कर आकर रोने लगी । वह आवेश कहाँ गया ? यह दु:ख भरा घड़ा! वहयुद्ध में हारे हुए योद्धा का बोझ लादे हुई थी, हैरान, परेशान । ये क्या हुआ प्रश्न चिन्ह आँखों में लिए देख रही थी । बाढ़ उतरने के बाद सूखी धरती जैसी स्थिति में आया उसका शरीर बिना हिले डुलेथा पर उसका हृदय अंदर से बिलख बिलख कर रो रहा था।

वह गर्भवती थी ।

(6)

एक दिन रामेशन आया ।

‘उसकी तबियत ठीक नहीं है ऐसा लगता है । उसका इस तरह चिल्लाना, पुकारना, रोना, डॉक्टर हिस्टीरिया बोल रहे हैं....... उसका चेहरा कुम्हलाया हुआ था । कितनी आशा थी कैसे कैसे सपने देखे थे कि प्यारी पत्नी हो, प्यारे बच्चे हों ! प्रेम शांति से गृहस्थ जीवन चले । दोनों आँखों से एक दृष्टि जैसे पति-पत्नी कष्ट में सुख में मिलकर रहें । बीज जैसे पेड़ होता है वैसे ही धीरे-धीरे आगे बढ़कर परिपक्व होकर दोनों अधेड़ अवस्था में पहुंचेंगे ऐसा सोचा और अपेक्षा की । इसमें कोई गलती की क्या ? हर समय घृणा, विरोध.... उसके बच्चे को यामिनी एक बीमारी जैसे देख रही थी । उसमें प्रेम, प्यार मिठास था ही नहीं । कितना दुर्भाग्य है उसका ।’

पेरुंदेवी को उसके मौन का रहस्य समझ में आ रहा था । अपने को दोषी मान उसने सिर झुका लिया ।

सारनाथन बोले “यदि वह ऐसी है तो कुछ दिनों उसे यहाँ छोड़ दो ना बाबू ! शायद कोई फायदा हो जाए, देखते हैं ।” फायदा जरूर होगा उन्हें पता था । पति को देखते ही उसका आवेश बढ़ जाता है । बच्ची पीहर आए तो थोड़ी ठीक होगी ।

यामिनी के यहाँ आने के बाद वह एक तरह की शांति में है ऐसालगा । परंतु वह पूर्णत: सामान्य नहीं थी । वह शांति, निराशा का खालीपन था ।

कुछ भी बात किए बिना वह घंटों हॉल के झूले में बैठ कर झूलती रहती । खाली आकाश में अचानक कुछ बादल के टुकड़े आ जाते हैं जैसे उस शमशान की शांति में अचानक एक भाव उबलता हुआ आता । आवेश क्रोध और वेदना का खालीपन चेहरे में लिए आँखों में नफरत का तूफान लिए अजीब सी निगाहों से सबको घूरती, दांतों से जीभ को काटती हुई अपने पेट पर दोनों हाथों को रखकर उसे दबा कर देखती । अंदर से ज्वालामुखी फटा हो जैसे निराशा आंसुओं के रूप में बहने लगती ।

“अरे यामिनी, ऐसा मत करो बेटी ! अभी क्या ऐसी विचित्र बात हो गई क्या बाढ़ सिर के ऊपर से थोड़ी निकल गई ?” ऐसे अपनत्व व प्रेम से पेरुंदेवी के बोलते ही उसका भयंकर काला चेहरा, उनकी तरफ मुडा, तो और सारे भाव आदि तो पीछे रह गए माँ बुरी तरह से डर गई ।

पेरुंदेवी को कुछ भी समझ में नहीं आया । एक दिन शाम को बेटी से बोली “शाम हो गई देखो यामिनी भगवान का दीया जला दो ।” यामिनी दरवाजे के पास खड़ी होकर सिर झुका कर धीमी आवाज में बोली “नहीं अम्मा, मुझे दीया जलाने को मत बोलना । भगवान के कमरे में शुद्ध लोग ही तो जा सकते हैं।” ऐसी बात बोलते ही माँ को गहरा सदमा लगा उन्हें ठीक होने में बहुत देर लगी ।

सारनाथन जब जब बेटी को देखते अपनी गलती को सुधार न पाने का अफसोस ज्यादा हो जाता । उसको रोते हुए देखने से उनका हृदय भी जख्मी हो जाता । शादी होने पर सब ठीक हो जाएगा ऐसा सोच कर उन्होंने शादी कर दी थी । परंतु अब तो वह हमारी एक छोटी सी बात पर भी विश्वास नहीं कर पाती। शायद बच्चा होने के बाद सबके जैसे सामान्य हो जाएगी? माँ का ममत्व शायद इसकी दवा बन उसके जख्मों को ठीक होने में सहायता करे ? इस विश्वास के साथ ही वे कहने लगे “रो मत बेटी, मेरी बच्ची । सब ठीक हो जाएगा, भगवान भी तो है न ।” अपने वात्सल्य से उसे सांत्वना देने का प्रयत्न किया ।

लेकिन वह तो बिगड़ी, चिल्लाई, रौद्र रूप धारण किया और फिर मुरझाई सी पड़ गई ।

रात हो जाए तो उसमें थोड़ी सी शांति दिखाई देती थी । तारों को देख और फूलों की खुशबूओं के साथ वह बाहर आती थी । पिछवाड़े के बगीचे में खड़े होकर सिर ऊपर कर आकाश को देखती । पेड़ के नीचे जो खुशबूदार फूल बिछे होते जो लाखों नक्षत्रों जैसे दिखते उन्हें निहारती, बाहर की तरफ फैले पौधे व बेल की सुगंध वातावरण को खुशनुमा बना रही थी। विभिन्न फूलों की खुशबूओं से कदंबम (‘कदंबम मालै’ का अर्थ विभिन्न फूलों से गुथा हुआ हार तमिल में) का आभास हो रहा था । पेड़ों और घरों की वजह से आकाश को देखने में रुकावट होने से वह थोड़ी ही देर में ऊपर की खुली छत पर चली गई । वहाँ से खुले आकाश को जी भर चारों तरफ देख सकते थे । उसके गहरे काले रंग की कोई सीमा नहीं । दूसरे रंगों की सीमा होती है। काले रंग की कोई सीमा कहाँ ? पेड़ों और मकानों की ऊंचाई सबको पार कर दूर तक फैला आकाश मीठी गहराई लिए पूरा का पूरा उसके लिए उपलब्द्ध रहता । वह अपने सांवले मुख को ऊंचा कर ताकती रहती है । वह जब मुसकराती है तो गाल में डिम्पल पड़ते है । उसकी ये मुस्कान अब सिर्फ चाँदनी रात में ही खिलती है ।

दुबारा फिर उसे पति के घर ले जाने के लिए कोशिश की तो जैसे आँधी तूफान आ गया हो ऐसा ही हुआ । यामिनी का चिल्लाना चीखनासमय के साथ ज्यादा होने लगा । एक बार पीतल के फूलदान को उठा कर पति पर फेंक दिया । उसके बाद उसके इतने उतेजित होने से उसमें बच्चे पर विपरीत असर पड़ेगा । ये सोच रामेशन डर के कारण “बच्चे के होने के बाद ही ले कर जाऊंगा ” कह कर उसे पीहर में रहने के लिए छोड़ दिया । उसके उदास चेहरे पर खत्म न होने वाले फिकर से तड़पती आँखों को देख, पेरुंदेवी को उस पर बहुत ही दया आई, गुस्सा भी आया । उससे भी ज्यादा उसे लगा अपनी लाड़ली एक समस्या बन कर रह गई है । स्वयं भी सुख नहीं पा रही थी औरों को भी दुखी कर रही है। ऐसी बात सोच वह अंदर ही अंदर घुट रही थी । ‘बच्चे है बच्चे ।’ पैदा होते समय माँ के शरीर को कितना कष्टदेते हैं । फिर लगातार मानसिक दुख देते ही रहेंगे क्या ?

एक दिन यामिनी घर में नहीं थी तो पेरुंदेवी घबराई बाहर देखा परिवार की पहचान वाली एक डॉक्टर के साथ कार से उतर रही है ।

“इसको अभी से क्या तकलीफ है पेरुंदेवी अम्मा ? ये ही तो इसका पहला है ? मैंने बिल्कुल मना कर इसे लेकर आ गई ।” उस महिला के बोलते ही पेरुंदेवी आश्चर्य चकित रह गई । अरे ये पापी लड़की ! तुमने ऐसा प्रयत्न किया ?

इसी तरह चार-पाँच बार बाहर और घर के अंदर भी उसने ऐसे कई प्रयत्न किए । डिलिवरी होने तक उसका ध्यान रखने के साथ रखवाली भी करनी पड़ी ।

जो अभी संसार में आया ही नहीं उससे इतना वैर ? पेरुंदेवी जब-जब माँ बनने वाली थी तब-तब स्वयं कितनी खुश रहती थी उसे सोचकर उसने देखा । अभी अपनी बेटी की आँखों में जो विद्रोह का भाव उबल रहा है उसे देख उनका मन काँपने लगा दिनों दिन यामिनी में बदलाव आ रहा था । जब वह परेशान होकर बैठती तो उसमें पहले से ज्यादा ही बदलाव दिखाई देता था ? कोई उसको बुलाए तो वह अनजान बन नफरत से देखना चाहिए ? ये क्या तरीका हुआ ? ये क्या देखना हुआ ?

नाजुक हृदय में चलन कुछ नयापन लिया हुआ होगा ऐसा सोचा? इसके तो हृदय से ही नफरत के भाव प्रकट हो रहे हैं ? अपने अंदर पल रही जान से उसे जो परेशानियाँ हैं वह परेशानियाँ ही उसको ऐसा करने को प्रेरित कर रही है क्या ? या फिर ये किसी नये विस्फोट की ही शुरुआत है ?

आखिर ये विस्फोट हो ही गया ।

बच्चा होकर तीसरा दिन ।

उसी दिन यामिनी ने अस्पताल में आँखें खोली । पेरुंदेवी अपने हाथ में नाजुक बच्चे को लेकर धीरे से आई । बेटी जाने कैसे प्रतिक्रिया करेगी इसका उसे डर था । फिर भी बच्चे का प्रेम, वात्सल्य में जो शक्ति है उस पर उनको विश्वास था । इन सब से बढ़कर उस नए जीव के मुख को देख उसमें प्रेम उमड़ेगा ऐसा उसने सोचा ।

“ये देख यामिनी तुम्हारी बच्ची को कितनी सुंदर है देख । गोरी-गोरी पूर्ण चन्द्र जैसी.....”

रात को ही पूर्ण चंद्र निकलता है । परंतु रात इसे देखता नहीं । काला व गोरा दोनों इतने पास रहने के बावजूद वे एक दूसरे के विरोधी है । वे मिलते ही नहीं ।

ये बात कुछ क्षण बाद पेरुंदेवी ने महसूस किया । उसका हृदय बर्फ जैसे जम गया । विश्वास न करने लायक प्रतिक्रिया हुई और पेरूंदेवी दुखी हुई । एकदम से उस वातावरण से निकलकर बाहर न आ पाई । उस नव जीव को छाती से लगाने के बदले वह विरोध प्रकट कर पीछे हटी । उसके सामने ये क्या दृश्य है ?

यामिनी की गहरी काली आँखें बिना हिले स्थिर रहीं । सामान्य तौर पर वह जब अपने मन के विकार में स्थिर रहती है ये वैसा नहीं था । ये जो भ्रम था वह सब कुछ छोड़ने, सब कुछ ठंडा पड़ने इससे ज्यादा विरक्ति भाव क्या होता ?

सामने जो है उस संसार को ही छोड़ देने की बात उन आँखों में झलक रही थी । सब कुछ लुट जाने का विरोध उसकी आँखों में दिखाई दिया ।

“अरी यामिनी ये क्या ऐसे कैसे देख रही हो ?” उसकी आवाज उस तक नहीं पहुंची ? जवाब देने लायक उसके चेहरे में कोई भी तो भाव नहीं था उसमें जैसी काली स्लेट में जो भी लिखा सबको मिटा दो तो कैसे साफ हो जाता है वैसे ही ये क्या पूर्ण खालीपन?

“अरे, अय्यो, अय्यो मुझे डर लग रहा है यामिनी !”

सारनाथन और रामेशन दोनों कमरे में आए ! बिस्तर पर पड़ी यामिनी की निगाहें घूमी रामेशन के ऊपर जाकर टिकी । थोड़ी देर वह घूर कर देखती रही । फिर उसके अधर थोड़े हिले, हवा में उसकी आवाज फैली

“अरे बाबू छुपन-छुपाई खेलें क्या ! चेस खेलें ।”

कमरे में जैसे बिजली गिरि ? तीनों चेहरे एक क्षण में ही सफेद पड़ गए । ये क्या नया वेश अचानक किसी ने ज़ोर से चांटा मारा जैसे, तीनों तड़प कर खड़े देखते रहे।

दूसरे ही क्षण यामिनी ज़ोर से चिल्लाई उछलकर उठी और दीवार के किनारे जाकर छिपी । कमजोरी के कारण शरीर लडखडाया । सहायिका के पास जाते ही बड़े आक्रोश से उछल कर दूर हुई ।

“अरे बाबू, मैं तुझसे शादी नहीं करूंगी पता है न तुमको ? मैं अलग रहने वाली हूँ मुझे मत छूना !”

आघात से जमी हुई निगाहें उस पर जा टिकी । थोड़ी देर उस कमरे में असहनीय शांति थी । फिर रामेशन थोड़ा हिला ।सबके मन की बातों का प्रतिनिधित्व करते हुए डर से मिश्रित स्वर में धीरे से बोला “पागल !”

यामिनी की नफरत अभी भी बदली नहीं । अचानक एक तीव्र स्वर में “तुम ही पागल हो !” फिर वह हँसने लगी ।

ऐसा लगा जैसे सारे तकलीफ़ों के बोझ को उठा कर फेंक दिया हो । क्या ये हल्की हो गई थी । आँसू बिना सूखे रोने वाली अब बिना रुके हँसती जा रही थी । ये दृश्य बहुत ही करुणामय था ।

उसके हँसने से सारनाथन का दिल डूबा जा रहा था । मेरी बच्ची, मेरी यामिनी आखिर में ये ही दशा तुम्हारी होनी थी क्या? हम सब ने मिलकर ये कैसा फैसला कर डाला सब कुछ सत्यानाश कर दिया ?

कालिमा में जो ज्योति थी वो खोगई ? जो रोशनी थी धोखा दे गई ? वह कैसे रह सकती थी ? जिस शादी को सोच वह काँप जाती थी । नफरत से अलग खड़ी होती थी, नहीं चाहिए बहुत चिल्लाई । भगवान ने उसे ऐसा बनाया था तो उसके विरोध में जबरदस्ती करने का नतीजा ये ही होना था । ‘अय्यो, मैंने क्या कर दिया, क्या कर दिया !’ वे तड़पते रहे, वह हँसती रही।

इन सब के बीच पेरुंदेवी का स्वर गूंजा ।

“अरी, यामिनी, क्यों ऐसा हँस रही है ?” बड़ी वेदना में भर वह बोली “बाबू तेरा पति है.......”

पति के शब्द के गूँजते ही अचानक हँसी रुकी । यामिनी पलकों को बिना बंद किए घूरे जा रही थी । बिना हिले ही जो मौन पसरा उसका वर्णन नहीं कर सकते पर उसने एक डर पैदा कर दिया । बहुत-बहुत ऊंचे पहुंचे हुए सज्जन जैसे देखते है वैसे ही यामिनी की काली स्थिर निगाहें उन लोगों पर जमी । बहुत गहराई से कुछ शक्तियाँ गंभीर होकर उफनती हुई उठ उस मौन को भरने लगी ।

बुद्धि के विघटन से अतीत में जो घटा वह सामने आकर खड़ा हुआ । बाल बिखर गए आँखें फैली शून्य को ताकती, सिर उठा उन लोगों को देख, जो तूफानी वेग में चिल्लाई “मैं कन्या हूँ, मैं कन्या हूँ ।” उसका वेग उठता चला गया क्या । थोड़ी देर बाद ही दर्द से हताश हो गई । फिर परेशान हो बिलख बिलख कर रोने लगी ।

(7)

उसकी स्थिती जब ज्यादा बिगड़ती गई तो फिर आखिर में उसे मनोरोग अस्पताल में भर्ती कर चिकित्सा करवानी पड़ी ।

पेरुंदेवी पूरे समय बुदबुदाती रही । सुबह शाम विधि के विधान को सोच रोती रही । बच्ची गीता यदि उसके पास नहीं होती तो उसका कमजोर शरीर ये दुख सहन नहीं कर पाता ।

बच्ची पर पेरूंदेवी का विशेष प्रेम उमड़ता रहा । बिना कोई हिचकिचाहट के बच्ची की माँ जैसे ही उसने प्यार दिया । उसकी देखरेख करने के हर छोटे-बड़े काम को उसने बड़े ही उत्साह के साथ किया । भले ही उसे परेशानी हो पर बच्चे को नहीं हो इसका ध्यान रखती थी । हर बात में वह सोचती उसकी माँ होती तो ऐसा करती मुझे भी ऐसा ही करना चाहिए ऐसा वह तन, मन, धन से करती । उसके लालन-पालन में कोई कमी नहीं छोडी । उसकी माँ होती तो क्या करती ऐसा सोच वह भी वही करती और जितना उसका ख्याल रखती उतना ही उसका प्यार बच्चे से बढ़ता जाता ।

‘उसे बच्चे को ऐसे उठाना चाहिए था ।’

‘उसे इस तरह से प्यार करना चाहिए था ।’

‘बच्चे को अपनी छाती से लगा उसे ऐसे पुलकित होना चाहिए था’ । अब वह नाजुक जीव उसके हाथों में एक आशा की किरन थी । परन्तु पेरुंदेवी की आँखें उस किरन से चौंधियाई नहीं । अंधेरे को घूर-घूर कर देखने के बाद भी उसकी बेटी को कुछ न मिला और वह एक पहेली बनी उस अंधेरे से टकराती रही पर उसका ये प्रकाश पेरूंदेवी को सांत्वना दे रहा था ।

बच्ची भी उसके साथ चिपकी रहती थी । बच्ची ने सबसे पहले पेरुंदेवी को ही देखा । उसकी पहली खूबसूरत मुसकान पेरुंदेवी के लिए ही थी। उसने ‘अम्मा’ कह कर पेरुंदेवी को ही बुलाया ।

अपने ही पेट में पैदा होने वाला एक जीव रास्ता भूल कर गलती से यामिनी के पास आकर, फिर घर आ गया है इस ख्याल से जब बच्चे को उठा कर वह दुलारती तो रोना भी अंदर से फूट-फूट पड़ता ।

सारनाथन अक्सर अपनी बेटी को जाकर देख आते थे । उनका बोलना बहुत ही कम हो गया । चिंता करते हुए बिना पलकें झपकाएरात का एकांत ही उनका साथी बन गया । वे अंदर से कितने टूट चुके हैं ये उनकी हर एक बात से पता चलता था । कभी कभी किसी समय वे मौन को तोड़कर रोने लगते तो पेरुंदेवी दुखी हो उन्हें आश्वासन देने की कोशिश करती । तो वे “कुछ नहीं है तुम जाओ ।” धीरे से बोल उसे अपने से दूर कर देते । इनका भी दिमाग खराब हो गया क्या ? या इनकी ही कोई कमी विरासत में बेटी को मिली ? ऐसे सोच पेरुंदेवी दुख के कारण क्रोधित भी होती । कुछ भी हो यामिनी के बहुत नजदीक जा रहे थे । वह अपने आप को उसी राह में ले जा रहे हैं उसे ऐसा लगा । इसी कारण शायद वे दोस्तों से ज्यादा संबंध नहीं रखते थे । कुछ सोचते रहते आँखों से बच्ची को देखते पर कुछ बोलते कहते नहीं। उसकी हँसी पर वे हँस देते । उसकी तोतली बोली पर वे सिर हिला देते, पर किसी बात को उत्सुकता से नहीं लेते । दूध के कटोरे में इलायची के टुकड़े तैर रहे हों जैसे उसके छोटे से गोल गोल गोरे गाल पर और ठोडी पर पेरुंदेवी जो नजर उतारने के लिए काली बिंदी लगाती उसे देख “सुंदर है” एसा पूछने पर ही कहते उस समय भी बच्चे के चेहरे को वात्सल्य से छूकर नहीं दुलारते थे ।

यामिनी ठीक हो अस्पताल से घर आ गई ।

कुछ दिनों तो वह ठीक ही रही । मतलब, जैसी वह थी । झूले में बैठना, अकेले रहना, रात में चेहरा देखो तो स्थिर दृष्टि से घूर रही होती । अंदर ही अंदर उबल रही है ऐसा लगता । पेरुंदेवी उसके पास जाने में ही हिचकिचाती थी । सारनाथन तो उससे पहले जैसे ही व्यवहार करते रहे । परंतु ऐसा हमेशा नहीं रहा । एक दिन रामेशन उसे ले जाने आया । प्रेम से बात करना शुरू किया ।

“मैं दुकान की तरफ गया था । बहुत सुंदर कढ़ाई किए हुए, छोटे छोटे रुमालों को देखा । क्या हुआ पता है ? एक दर्जन तुम्हारे लिए लेकर आया हूँ । ये देखो ।”

उसने उसके दिये हुए उपहार को नहीं लिया पर उसके चेहरे को ही घूर कर देखने लगी ।

“सुंदर नहीं है क्या ? लो ले लो ।” उसने रुमाल से भरे डिब्बे को उसके आगे बढ़ाया । वह डरी हुई आँखों से अपने आप में संकुचित हो पीछे हट कर खड़ी हो गई ।

एक नफरत, एक आक्रोश उसकी आँखों में फैल गया ।

“क्यों, तुम ऐसे मुझसे क्यों डरती हो यामिनी ? इस बात से मैं बहुत दुखी होता हूँ पता है ? मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ तुम उसे नहीं समझीं क्या ? हम पति पत्नी नहीं है क्या यामिनी ? अब से तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए पता है ? बच्ची की वजह से तो हमें अब साथ में खुशी से जीना चाहिए ।”

वह कुछ नहीं बोली ।

“यामिनी मेरी तरफ देखो, तुम्हें मैं क्यों पसंद नहीं हूँ ? मैं अपने आप को कैसे बदलूंजो तुम्हें पसंद आऊँ ? तुम्हारे मन में क्या है बोलोगी नहीं तो कैसे पता चलेगा ?” उसने हाथ बढ़ा कर उसके हाथ को पकड़ा । उसने अपने हाथ को खींच कर अलग कर लिया। फिर उसने आँखों को सिकोडा, उसकी आवाज बदली और आक्रोश से चिल्लाई ।

“मैं कन्या हूँ ! कन्या !”

दुबारा चिकित्सा के लिए ले जाना पड़ा । पेरुंदेवी को बहुत निराशा हुई क्या ये स्थिति बदलेगी नहीं क्या ? वह असमंजस में पड़ी ।

समय तो अपनी गति से चल रहा था । बच्ची डेढ़ साल की हो गई ।

एक दिन निराश व थकी पेरुंदेवी के पास घुटने से चल कर मुस्कुराती हुई आई बच्ची “अम्मा.......! माँ !”

पेरुंदेवी ने एकदम से आगे बढ़ उसे उठा गले लगा लिया । इस बच्चे को भी तो याद नहीं करती है यामिनी ! इसे यदि वह एक बार देख लेती तो उसे वात्सल्य रूपी अमृत नहीं आएगा क्या ? “यामिनी !”

माँ की आवाज सुन यामिनी सिर ऊंचा किया । घनिष्टता को न चाहने वाली उसकी दृष्टि माँ के गोद में जो बच्चा था उसके छोटे से रूप पर गयी।

डर व उत्सुकता के साथ पेरुंदेवी बिना हिम्मत के एक बार मुस्कुराई ।

“इस दूध पीते बच्चे को देख यामिनी । इसे तुमने पैदा किया है ना ? कितनी प्यारी है ! इसे देखने से तुम्हारे मन में किसी तरह की कोई इच्छा नहीं होती ? ये प्यारा दूधमुहाँ बच्चा इसने तुम्हारे मन को पिघलाया नहीं क्या यामिनी ?”

सांवले चेहरे पर भावनाएं घुमड़ आई । यामिनी का पूरा शरीर कांपने लगा पर मुंह नहीं खुला ।`

वह दृश्य विश्वास के योग्य नहीं लगा लेकिन कोशिश को छोड़ने का मन नहीं था पेरुंदेवी का, चेहरे पर मुसकान लिए वह फिर बोलने लगी

“इसका तुम्हारी बेटी का क्या नाम रखा है मालूम है ? ‘गीता’रखा है सुंदर है ना ? तुम्हें ये नाम पसंद न हो तो दूसरा नाम जो तुम्हें पसंद हो बताओ, उसे रख लेंगे, प्यारी बच्ची गीतू, प्यारी गीता .....वह कौन है तुम्हें पता है ? तुम्हारी अम्मा है अम्मा, ”

बच्ची “माँ.....” बोलते ही हँसते हुए बच्ची पेरुंदेवी को ही दिखाने लगी ।

“मैं नहीं हूँ रे मेरी सोना ! वह ही है तुम्हारी अम्मा । तुम धीरे चल कर अम्मा के पास जाओ देखो !”

पेरुंदेवी काँपते हुए हाथों से धीरे से बच्ची को जमीन पर छोड़ा । जैसे नीचे बर्तन को रखें तो एक बार हिल कर रह जाता है वैसे ही बच्ची ने पैरों को आगे नहीं बढ़ाया सिर्फ हिल कर रह गई ।

“हाँ जा री, प्यारी अम्मा के पास जा !” उसकी आदत नहीं होने से फिर उसकी तरफ ही आने लगी बच्ची, तो उसने उसे पकड़ धीरे से यामिनी की तरफ आगे किया तो दो कदम आगे बढ़ी बच्ची।

यामिनी की आँखें चौड़ी हुई बच्ची को देख वह आँखें नम न होकर ये क्या! कठोर हो रही हैं ? एक दीर्घ श्वास छोड़ना, दांतों को पीसना, भौंहों की सिकुड़न, ये क्या आक्रोश भरा बदला चेहरा क्या ये संभव है ? एक माँ की अपनी बच्ची को देखने की निगाहें हैं क्या ये ? गुस्से में उबलते हुए यामिनी जल्दी से पीछे को जाकर दोनों हाथों सेठुड़ी पर ज़ोर से दबाते हुए तेज आवाज में जोर से चिल्लाई । डरी सहमी बच्ची को पेरुंदेवी ने जल्दी से गोदी में लिया । वह तो पता नहीं कैसे धनुष से बाण के छूटने जैसे पिछवाड़े कुएं की मुडेर को पार कर उसके अंदर कूदने वाली थी, उसी समय उस जगह पेड़ पौधों को देख रहे सारनाथन और माली ने भाग कर आ उसे पकड़ लिया ।

यामिनी आवेश में भर छटपटाई अपने को छुडाने के लिए जैसे पूरी शक्ति लगा कर कुंऐ की ओर अपने को खींचने लगी । अंदर रसोई में काम कर रहे रसोइयाऔर पडोस के घरों से दूसरे लोग इसके चिल्लाने की आवाज सुनकर बाहर आए सभी लोगों ने मिलकर उसे मुश्किल से रोका, वह आवेश सेभर पैरों और हाथों को छुड़ाने के लिए छटपटाने लगी । सबने मिलकर उसे घसीटा और पीछे वाले कमरे में ले जाकर छोड़ा । फिर भी उसका गुस्सा, आक्रोश, दीवानापन और चीखना-पुकारना कम ही नहीं हुआ तो उसे कमरे के अंदर डाल ताला लगा दिया । उसके बाद कई बार उसका इलाज चला ! हर एक बार यामिनी ठीक होकर अस्पताल से घर वापस आती । रामेशन जहां काम करता था वहां से उसकी बदली चेन्नई से बाहर हो गई । पति के साथ जाकर वह अपना परिवार संभालेगी ये विश्वास तो सपना ही था ये अब बिलकुल साफ हो गया । रामेशन अकेले ही चेन्नई छोड़ कर चला गया । उसके उस शहर में न रहने के कारण उसके अब अधिक न आने से यामिनी के आवेश में कमी आई । बच्चे को भी उसके सामने नहीं लाते थे । पेरुंदेवी इस बात का बहुत ध्यान रखती थी । इसलिए यामिनी बिना आवेश के शांति से रह रही थी । उसकी बातें व उसका व्यवहार ठीक ही रहा । परंतु.......

“यामिनी को खाना दे दिया क्या ?” सारनाथन ने पूछा ।

“दे दिया खाना खा रही है । दही लेजाने के लिए आई हूँ ।” पेरुंदेवी ने जवाब दिया ।

“कुछ अजीब तरीके से आजकल शांत है बच्ची” कहते हुए सारनाथन बेटी के रहने की जगह आए धक रह गए ! लड़की कहाँ है ?

बगीचे में वह क्या आवाज आ रही है ? एकदम भागकर पिछवाड़े गए । कुएं के पास जा रही उस काली आकृति को समय पर पहुँच कर झपट कर बांध लिया ।

दूसरे दिन शाम को बाप और बेटी चाँदनी में बैठे हुए थे । अधिक बात तो नहीं हुई फिर भी उनमें एक मिठास व दोस्ती थी । माँ को देखकर ही आवेश में आने वाली यामिनी, सिर्फ अपने अप्पा से स्नेह रखती थी । उनका मौन ही एक अकेला आधार है ऐसा उसे लगा ।

धीरे धीरे अंधेरा फैल रहा था । तारे जैसे आँखें खोल रहें हों लग रहा था । उन्हें पिछले रात की याद आई ।

“उस दिन तुमने जो कविता बोली आज भी कुछ बोलो बेटा ।”

वह नहीं बोली । उन्हें देख एक बार मुसकराई । उसने एक दीर्घ दीर्घ श्वास छोड़ा । फिर से अपनी आँखें आकाश की तरफ कर दी ।

उनका शरीर रोमांचित हुआ । उसे कविता बोलने की क्या जरूरत है ? वह खुद एक कविता ही है । वह एक रात ही है । काम करने वाली बाई वहाँ आकर बोली कि आपको देखने कोई नीचे आया है। सारनाथन उठ कर चले गए ।

घर के बैठक में घुसते ही उन्हें मन में ऐसा लगा कोई थपथपा रहा है । वे तुरंत पिछवाड़े में दौड़ कर गए । ऊपर से नीचे उतर पिछवाड़े में कोई जा रहा था कुंए की तरफ, वह कुएं में कूदे उसके पहले जाकर उसे पकड़ कर रोक दिया ।

उसके बाद समस्या को जानने में ज्यादा समय नहीं लगा । यामिनी कि बीमारी ने एक नई शक्ल अख्तियार कर ली थी । बाहर से देखने में स्वाभाविक दिखने पर भी, सच्चाई कुछ दूसरी थी । थोड़ी देर भी उसे अकेले छोड़ा तो वह सीधे कुएं कि तरफ भागती थी । अब उसकी बीमारी चिकित्सा से दूर करना मुश्किल था ।

उसके मन मुताबिक उसे अकेले जीवन जीने देते, तो उसके अंदर छिपी हुई कोई इच्छा समय के साथ उसके जीवन में वह एक सीधा रास्ता अपनाती या उसे अपनाने के लिए तैयारी वे करवाते। उसे ऐसे न करने दिया व बीच में ही रुकावट डाल उसके सपनों की जड़ को काट देने से जैसे वह मुरझा गई, उसका दिल टूट गया। अपने आप को मिटाने का ही मकसद उसके लिए रह गया क्या ? स्वयं जैसे रहना चाहती थी वैसे न रहने के कारण ही उस जीव का अपने आप को खत्म करना ही, उसका एक मात्र उद्देश्य हो गया क्या ?

उसका जीवन एक कैदखाने में कैद होकर रह गया । ताला जड़े किवाड के पीछे कोने वाला कमरा । उसके पसंद का झूला निकाल कर उस कमरे में रखने की सभी तैयारियां सारनाथन ने कर लीं। वह सिर्फ एक वही उसके पसंद की वस्तु वहाँ रहने दो ! कमरे के बाहर ताला उस बंद कमरे में वह । कमरे के अंदर वह और उसका अंधेरा, अब और उसे अकेले कैसे बाहर छोड़ सकते हैं ? अकेले छोड़ते ही सीधे वह कुएं में कूदने ही तो दौड़ती है ? कुएं को किवाड़ लगा ताला लगा दें ऐसा पहले सोचा । कुएं के अंदर उतरने वाला कुआं होने से वह ठीक जमा नहीं । उसके अलावा कुएं में ताला लगाने के वाबजूद भी उसे बाहर किसी के भी साथ घूमने देने की उनमें हिम्मत नहीं थी । कोई दूसरे मार्ग वह नहीं अपनाएगी ये भी कोई निश्चय नहीं था ?

दरवाजे को खोल कर पेरुंदेवी उसे खाना देती थी । उसको हवा में थोड़ी देर रखने के लिए माँ या पिता उसे बाहर अपनी निगरानी में साथ ले जाते फिर लाकर कमरे में बंद कर ताले में रख देते।

जैसे-जैसे साल बीतते गये यामिनी की मानो-दशा और भी खराब होती गई । कमरे में से कभी झूले की सांकल की आवाज आती । कभी गाने की आवाज आती । कभी-कभी रोने की आवाज, कभी-कभी चिल्लाने की आवाज आती । ज़्यादातर तो वह अंधेरे में घूर कर देखती हुई पत्थर जैसे बैठी रहती । सामान्य तौर पर देखना या बात करना उसका बहुत कम हो गया ।

ताले लगे कमरे के बाहर माँ बाप का मन तड़पता था । पेरुंदेवी के दुख को बच्ची गीता ने कुछ हद तक कम किया । सारनाथन को तो कोई बात सांत्वना न दे सकी ऐसे वेदना में वे समा गए । ये क्या हो गया ! अय्यो ये क्या कर दिया ! कोने का कमरा, झूला और ताला लगा दरवाजा । आखिर में एक दिन उसका भी अंत आया । गीता की उस समय आयु दस साल थी । पेरुंदेवी अब भी उस दिन के बारे में सोचती है तो उसका दिल टूट जाता है । बच्ची को मेहँदी लगा कर आई पेरुंदेवी को अपनी पुत्री को भी ऐसे ही मेहँदी लगा देखने की उसकी इच्छा अचानक जागृत हुई । पीसी हुई मेहँदी को प्लेट में लेकर कोने के कमरे को खोल अंदर आई ।

“यामिनी मैं तुम्हें थोड़ा मेहँदी लगा देती हूँ ! दया कर मान जाओ ना ?”

छूकर उसे मेहँदी लगाने आए हाथ को झटके से उसने दूर किया।

दरवाजे के पास उस समय आए सारनाथन की बोलने की आवाज साफ सुनाई दी

“यामिनी दूसरा कोई तुम्हें छूकर मेहँदी न लगाए तो तुम अपने आप ही लगा लो ।” उनकी आवाज में याचना थी । “तुम कैसे-कैसे सज कर रहती थी वैसे ही तुम्हें देखने की मुझे इच्छा हो रही है बेटी ।”

उसकी आँखें उन्हें देख ऊपर हुईं । वह क्या बोलेगी माँ बाप सोचने लगे । हँसेगी ? चिल्लाएगी ? अप्पा के कहने को समझ गई होगी क्या ?

वह समझ गई क्या ? अचानक वह उस प्लेट को पास खींच पिसी मेहँदी को लेकर अपने पैरों पर और हाथों के उँगलियों पर लगाने लगी । माँ बाप के मन में एक विश्वास का अंकुर फूटा ।

उसके बाद थोड़ी देर में फिर ऐसा लगा फिर बढ़ गई उसकी बीमारी फिर दो दिन....... फिर दो दिन बाद........ पूर्णमासी की रात, इसीलिए उसकी हरकतें ज्यादा तेज हो गई क्या ? पेरुंदेवी कितनी बार कितनी सालों से ये प्रश्न अपने से पूछती रहती है ! माँ की ममता! आँखों से आँसू रहने तक यह प्रश्न उठता ही रहेगा ।

हमेशा की तरह पेरुंदेवी ने उसको खाना दिया, खाने के बाद फिर सारनाथन बेटी को उस कमरे के बाहर लेकर आए । ऊपर की छत पर दोनों गए । छत पर पूरा संसार अपने हाथ में है सोचने वाली उसकी खुशी के लिए सारनाथन अकसर उसे यहाँ लाते ।

उसे वहाँ काफी देर हुई । पेरुंदेवी बैठक की दीवार का सहारा ले खड़ी होकर सामने की दीवार पर रवि वर्मा के बनाए सुंदर चित्र को देख रही थी । यामिनी उस ताला लगे दरवाजे के अंदर ज्यादा सुरक्षित थी ऐसा उसे विश्वास था और उसे बेटी के बारे में कोई दूसरी चिंता मन में नही थी । फिर वह सोने चली गई । सो रही छोटी बच्ची गीता को बिना पलकें झपकाए कुछ देर देखती रही फिर स्वयं भी सोने लगी ।

बीच रात अचानक कोई अजीब सी कुछ आवाज महसूस हुई तो घबराकर आँखें खोल पेरुंदेवी, बिस्तर से उठ कोने की कमरे की तरफ गई ।

कमरा अभी भी खुला था ।

घबरा कर जब वह पलटी तो सारनाथन छत की सीढ़ियों से कमरे की तरफ ही आ रहे थे ।

“यामिनी कहाँ है ?” घबरा कर माँ ने पूछा ।

“छत पर मेरे साथ लेकर गया था । तुम्हें तो पता है ना ? वहाँ आज अच्छी हवा थी । अत: उसने कुछ देर और बैठने की कहा थोड़ी आँखें बंद कर ली । अब वह पीछे आ रही है ।” बोले । बहुत ही थके हुए लग रहे थे ।

“पीछे कहाँ ? नहीं है ?”

अंधेरे में दिखाई नहीं दे रहा है लगता है ।” पेरुंदेवी लाइट जलाई। वहाँ कोई नहीं था ।

“अय्यो, ये क्या ?”

“क्या आश्चर्य है ! साथ ही तो लेकर आया” सारनाथन घबराए हुए आवाज में बोले पेरुंदेवी का मुंह सूख गया । “क्या आपके आँखों में धूल झोंक कर चली गई ? अरे यामिनी । अम्मा, मेरी प्यारी यामिनी माँ हडबडाकर दौड़ी । सारनाथन भी दौड़े घर में जो आदमी थे वे भी जग कर हडबड़ाए, अड़ोसी-पड़ोसी भी जाग गए । किस जगह की तरफ भागना चाहिए सभी को पता था ।

सबलोगों ने मिलकर शव को बाहर निकाला“यामिनी !” कह कर ज़ोर से चिल्लाकर बेहोश हो गिर गई पेरुंदेवी ।

उस रात किसी निर्जीव चीज जैसे जमीन में पड़ी थी यामिनी। शरीर पर चिपकी हुई पानी की बूंदें तारे जैसे चमक रही थीं ।

रात मौन साक्षी के रूप में सब देख रही थी ।

(8)

बुढिया ने सिर ऊपर उठाया, अगल-बगल सब निराश, कुम्हलाए चेहरे ऐसे लगा सांत्वना देने की कोशिश कर रहे हों जैसे।

प्रेम व सहानुभूति से गीता ने उसके कंधे को पकड़ रखा था ।

“अम्मा ! आपको कुछ हो गया है क्या ? आप इतना थकी और निराश क्यों लग रही हो ?”

पेरुंदेवी कुछ न बोली । जीवन में जो कठिनाईयां आई उसमें से बच निकलने की ही तड़प और दर्द है ये ।

“अम्मा ! अम्मा । बोलो माँ !”

“बोलने को कुछ भी नहीं गीता ? पता नहीं एक हफ्ते से मुझे बहुत थकावट लग रही है ।”

एक हफ्ते पहले ही गीता ने उसे पूजा के कमरे में बुला अपने मन की बात बताने की इच्छा जाहिर की तो, वह किसी तरह बच कर निकल आई । उसके बाद जो बीते सात दिन, एक-एक क्षण “गीता कब फिर से उस बात को शुरू कर देगी ? ऐसी घबराहट उनके मन में थी । पुराने ख्यालों का चिंतन उनके दिमाग में चल रहा था । फिर से एक बार क्या वही सब होगा ? जिस पैर पर चोट लगती है बार-बार उसी पर चोट लगती है जैसे मेरे दुखी घायल मन को बार-बार ये सदमा ये धक्का ? यामिनी पर उसने जो मोह-ममता रखी थी वह तो इस बच्ची में आकर ही पल्लवित हुई । उसी तरह उसने यमिनी के लिए जो सपने देखे, वह इसी से तो पूर्ण होकर मुझे फल नहीं देंगे क्या ? इस समय पके फल में कीड़े लग गए तो? उन इच्छाओं की पूर्ति तो इसी को पल्लवित पुष्पित होकर देखने से ही तो इस बूढ़ी के मन के घाव को मरहम लगेगा ?

‘हे भगवान, मैं साधारण स्त्री हूँ । फिर-फिर, अलग-अलग दृश्य देखने से तो मेरी आँखें चौंधिया जाएगी । मेरे जैसी साधारण स्त्री की साधारण इच्छा भी पूरी नहीं होगी क्या ?’

“तुम्हारी तबीयत ही ठीक नहीं है अम्मा । डॉक्टर को बुलाएँ ?”

“ऐसा बड़ा कुछ नहीं है मेरी प्यारी बेटी ।”बोलते हुए पुरानी यादों में से ही अचानक एक याद मन में कौंधी, क्या ऐसा सब मुझे मत बुलाओ अम्मा, ये मुझे पसंद नहीं लगा गीता एसा कहेगी, पर ये बात तो इसने नहीं बोली ! इस बदलाव के कारण वह बुजुर्ग थोड़ी देर अपने आप में उत्साहित रही । इसे छेड़ सकते हैं, इसे पुचकार सकते हैं और इसे प्यार से गले लगा सकते हैं । प्यार से चूम भी सकते हैं । वह अलग थी यह अलग है........ पेरुंदेवी उठ कर बैठ उसके बालों को सहलाने लगी।

“तुम्हें किसी सहेली के घर जाना है बोली थी ना गीता ?”

“फिर जाऊँगी । आज घर में ही कुछ काम करने की सोच रही हूँ।”

सभी सामानों पर से धूल झाड़ना, घर को साफ रखना ये काम गीता हीकरती थी । चीनी मिट्टी के बर्तनों को नौकरों के भरोसे न छोड़ स्वयं ही धोकर रखती । लिनोलियम फर्श के बिछाने को नौकर उसको तह न बना दें सोच कर उसे गोल गोल लपेट कर स्वयं ही छाया वाली जगह जहां धूप न आती हो कोने में रखती थी ।

“अम्मा, अपनी परिपूर्णम है ना ; उसे लगता है सभी वस्तुओं में जीवन है और इस विश्वास के कारण देखो ! जमीन को भी कितने धीरे से पोंछती है । ज़ोर से पोछों तो उसे दुखेगा सोच कर पोंछती ही नहीं उसकी सहृदयता देखो तो । धूल सब ऐसे के ऐसे ही है ।” ऐसा नौकरनी से मज़ाक करती । उसके हँसते हुए बोलने के तरीके से परिपूर्णय को भी गुस्सा नहीं आता ।

“पर्दे सब बहुत ही गंदे है ! क्यों अम्मा तुमने बदले नहीं ?” खिड़की को देखते हुए बोली ।

“ये सब मुझे क्या पता है री ? तुम एक महीने से यहाँ थी नहीं ! इसलिए गंदा है । अब बदल दो ना ? तुम सही तरीके से सब करती हो । मुझे ये सब मालूम नहीं ।”

खिड़की के पर्दे, पूरे घर के मेजपोश बदल डाले, दरवाजे के पर्दे, सोफा, कुशन के कवर सब को रंग देखकर उसने बदला । उसने कपड़े की गुड़िया बनाना भी सीखा था । उसने जो गुड़ियाएं बनाई उनमें से दो बैठक की एक काँच की अलमारी में रखींथीं। उसमें से एक किसान की बीबी दूसरी मुरली बजाते श्री कृष्ण जी उसने दोनों को उसमें से निकाल कर धूल झाड कर साफ कर फिर से अंदर रख दिया ।

दोपहर को जब सब लोग काफी पी चुके, “दूध बहुत सारा बचा है अम्मा ! थोड़ी सी आइसक्रीम बना दूँ ?” पूछा ।

“जो इच्छा है करो ।”

“तुम्हें भी खाना पड़ेगा ।”

“छि छि, मैं नहीं खाऊँगी ।”

“घर का ही तो बना है ना ? अंडा थोडी डाल रही हूँ ?”

“अब वही एक बाकी है ! वह नहीं है तो क्या हुआ ? उसमें एसेंस आदि कुछ-कुछ मिलाती हो, वह दुकान से ही तो खरीदते हो ना ?”

“ठीक है पडोस में इस तरह के फलों के एसेंस बनाना सिखाते हैं। मैं जाकर सीख कर उससे बना कर तुम्हें आइसक्रीम खिलाउंगी ।”

पेरुंदेवी बहुत खुश हुई । इस बच्ची को मुझसे प्यार है इसलिए ही तो कह रही है । इसको कितना व्यवहारिक ज्ञान है कितनी फुर्ती इसमें है और ये जमीन से जुड़ी है ये देख कर वह ज्यादा प्रसन्न थी ।

जो चली गई उसने कभी घर के लिए चिंता नहीं की, न कभी प्यार किया ना ही घर के कामों में रुचि ली ।

“तुम्हें मेहँदी लगाए बहुत दिन हो गए गीतू ?

आज रात पीस कर लगा देती हूँ ।”

“ठीक है अम्मा ।”

छूकर लगाने वाले हाथों को वह नहीं हटाएगी ।

“आइसक्रीम बनाना है बोली ना ! रसोइये को दूध गरम करने को कह दिया क्या ?

“नहीं माँ । मुझे कोई इसी समय करना है ऐसा नहीं है । वैसे भी तुम खाने वाली नहीं हो......”

“उससे क्या हुआ ? तुम खाओ, तुम्हारे अप्पा के घर फलास्क में डाल कर भेज दो, रामेशन को तो बहुत पसंद है ! फिर तुम्हारे ताता (नाना) को दो......” गीता हंसी ! और मज़ाक करते हुए बोली “देखो कितना उनका ध्यान है । मैं भूली तो भी तुम ताता (नाना) को भूलोगी क्या ?”

“उसमें क्या आश्चर्य है री ?” पेरुंदेवी उसे घूर कर देखी । “वही तो जिंदगी है गीतू ! मोह, ममता और जुड़ाव एक दूसरे का साथ, ये सब बहुत जरूरी है ।”

उसके अर्थ को छोटी के हृदय में बैठाने के लिएजो तड़प बुढिया में थी अत: ज़ोर से बोली । गीता की आँखों की तरफ उसने एक विचित्र दृष्टि से देखा कि ये क्या सोच रही है ? उस बात को समझ रही है क्या ? मान जाएगी क्या ? वही तो (हे प्रभु !) उसे मना कर रही है क्या ?

गीता ने सिर को दूसरी ओर कर लिया । “तुमसे एक बात कहनी है मैंने बोला था ना अम्मा.....”

“हाँ ठीक है, सब बाद में बात करेंगे । मैं कहाँ भाग कर जा रही हूँ ! अब जाकर थोड़ी देर आराम से सो जा ।” पेरुंदेवी ने फिर से शीघ्रता से ही उस विषय से दूरी बना ली । फिर वही सोच वही आँखें..... कन्या या तपस्वनी, जो भी हो तो क्या है ? बर्तन के ऊपर से दूध उबल कर बहे या फिर बर्तन के छेद से गिरे तो क्या ? दूध तो गया ।

शाम को वह गीता को बैठाकर उसकी चोटी बनाने लगी । जूड़ा बनाना गीता को पसंद था, फिर भी बड़ी बूढ़ी की खुशी के कारण वह जब उसे बुलाती थी तो वह उससे बालों को संवार कर चोटी बनवा लेती थी ।

पुराने जमाने जैसे टाइट चोटी कर देती फिर उसमें पेरुंदेवी बगीचे में जो मोगरे के फूल थे उसको सुई से पिरो कर हार सा बना उसे उसके चोटी में लगा देती । चश्मा पहन कर वह छियासठ साल की पेरुंदेवी युवा लड़कियों के बराबर सब काम करती थी । अब भी घर में तैयार किया हुआ तेल रोज अपने आधे सफेद आधे काले बालों में लगा कर, बालों को कंघी से खूब संवार कर बांध कर फिर थोड़े से मोगरे के फूलों को उसमें अंदर ठूस लेती थी । वह दुबली थी और ज्यादा ऊंची भी नहीं थी, पर उसका शरीर सुंदर आकृति का था । पेरुंदेवी को लड़की की वजह से जो संकट व समस्याएँ थीं, उसकी मौत का कभी खत्म न होने वाला दुख था वह भी पेरुंदेवी के चंदन जैसे बदन को खराब नहीं कर सके । उनके दांतों को ही सिर्फ पायरिया के कारण निकालना पडा । उन्होंने नकली दांत लगा रखे थे। उसकी वजह से होठ अंदर की तरफ चले गए व ‘पर्स के जैसे उनका मुंह’ हो गया। फिर भी नकली दांत के सेट लगवाने से वे अच्छी लग रही थीं ।

मुंह धोकर, तिलक लगाकर फिर गीता दूसरे कपड़े बदल कर सफेद कलर की साड़ी पहन कर आई ।

सफेदझक, जीवन के स्वागत का रंग सफेद ? पेरुंदेवी का मुंह बिगड़ा ।

“क्यों री सफेद साड़ी ? तुम्हारी उम्र में तो तरह-तरह के आँखों को चौंधियाने वाले रंगों का पहनना चाहिए ?

“मुझसे ज्यादा तुम स्टाइल से रहती हो अम्मा !” कह कर हंसने लगी गीता ।

“ठीक है री बड़बोली । जा जाकर कोई अच्छे से रंग की………” भूमि से मिलता रंग क्या है ? मिट्टी का रंग भूरा है । “कोई एक ब्राउन रंग की साड़ी निकाल कर पहन ले ।”

गीता भूरे रंग में पीले फूल के प्रिंट वाली साड़ी पहन कर आई ।

“कितनी सुंदर मेरी बच्ची, रवि वर्मा के चित्र जैसे लग रही है !” बुढ़िया उसकी नजर उतारने लगी ।

“जा, जाकर ताता (नाना) को दिखा कर आ ।”

“हाँ अम्मा । पर पहले भगवान का दीपक जला आऊं फिर जाकर उन्हें दिखाती हूँ । शाम हो गई है ।”

बुढिया का मन गदगद हुआ । उस यामिनी ने उस दिन दीप को जलाने से मना किया तो मन कितना परेशान हुआ अब इसके जलाऊँगी बोलते ही उसका मन खुश हो जाता है ।

भगवान का दीपक जला कर कोने के कमरे के बाहर आकर खड़ी होने में गीता को संकोच हो रहा था । अंदर लाइट नहीं थी । बीच हॉल में जो लाइट थी उसकी रोशनी थोड़ी आ रही थी । टूटे हुए फर्श के गड्ढे जैसे टुकड़े-टुकड़े अंधेरा छाया हुआ था। ताता की छाया जैसे झूले में बैठी थी । धीरे से उनकी पीठ पीछे की शर्ट हिली। धोती के बीच की सिलवट कुछ-कुछ दिख रही थी । झूले का सांकल हिल रहा था ।

“इतनी जल्दी सो गए क्या ताता (नाना) ? सात ही तो बजे है !” सारनाथन कुछ न बोले ।

“क्या बात है ताता ? तबीयत ठीक नहीं है क्या ?”

“ठीक ही है, तुम जाओ ।”

“अम्मा ने कहा कि मैंने जो साड़ी पहनी है उसे आपको दिखा कर आऊं ।”

“तुम्हें क्या है बेटा, तुम कुछ भी पहनो अच्छा लगता है ।” उसके मौन से उनके अंदर दया भाव उत्पन्न हुआ । “अच्छा अंदर आकर दिखाओ ।” लाइट जला कर वह उनके सामने आकर खड़ी हुई । झूले के तख्त पर से उठ कर बैठे, ऊपर उनके जो शर्ट था उसे खींचते हुए उसको देखने लगे ।

युवा लड़की, सुंदर, परंतु उनको उसमें पूर्णता नहीं दिखी ? उसके पीछे दूसरा अक्स, दूसरी कन्या...... उस दूसरी को उसके इच्छानुसार जीवन जीने देते, तो वह खुश होकर जीती । आज वह जीवित होती.....

ये..... ये लड़की..... मेरी लड़की जैसे नहीं । उनके हृदय में जम गया था कि वह दूसरी के साथ उन्होंने अनीति की अत: ऐसा हुआ......

छि....... छि........ ये क्या सोच है ! जो घटा उसमें इसका क्या कसूर ये बच्ची क्या करेगी ? अभी ये पेरुंदेवी को दिलासा दिलाने के लिए भगवान ने दया कर इसे भेजा है । लड़की से उनकी नजदीकियां होने से पेरुंदेवी से जो दूरी उन्होंने महसूस की थी, उससे उनके हृदय में दुख तो हुआ था । पर पेरुंदेवी के दुख को थोड़ा सा दूर इस गीतू ने किया था। उनको तो वही प्यारी थी, पेरुंदेवी को ये है ।

“ये साड़ी मुझ पर कैसी लग रही है ताता (नाना) ?”

“बहुत सुंदर है ।” मैं उसकी परवाह करता हूँ ऐसा उसको लगे ये सोच वे आगे बोले “नई साड़ी ही है ना ? कब लिया था ?”

“जाओ ताता । आप किस दुनिया में रहते हो ? पिछले महीने लिया था ? आप को तो उसी समय दिखा दिया था ?”

“ओ ऐसा.......”

“आज ही तो पहली बार पहनी है ना ।”

“ हाँ, देखो तो ? वह सोच कर बोली ।” उसके जाने के बाद वे बिना हिले फर्श को फटी फटी आँखों से देखते हुए बैठे रहे । यामिनी के जाने के बाद उन्होंने अपना सामान यहाँ लाकर इसे ही अपना कमरा बना लिया था । यहाँ कमरे के फर्श पर यामिनी, दीवारों पर भी यामिनी । इस कमरे की हर एक चीज पर वही थी ।

यहाँ की हवा में उसकी चीखों की प्रतिध्वनि सुनाई देती थी। बाहर अब भी किवाड़ पर ताला लगा है क्या ? यहीं पर वे बस गए ? और वह भी यहीं हमेशा के लिए बस गई । यही जगह, यही कुआं......ये दुख कभी नहीं जाएगा क्या ?

हाल में पेरुंदेवी से गीता बोली “अम्मा मैं जाकर आऊं ? थोड़ा फूल, केला, नारियल लेकर जा रही हूँ ।” बोली ।

“सहेली के घर जाने के लिए ये सब क्यों ?”

“सहेली के घर और किसी दिन चली जाऊँगी । अभी मंदिर जाने की सोच रही हूँ ।”

पेरुंदेवी के पैर ढीले पड़े । उस दिन पूरी रात उसे नींद नहीं आई। सोच-सोच कर दिल घबरा रहा था ।

दूसरे दिन सुबह आठ बजे उपमा खाकर काफी पी पेरुंदेवी नहाने चली गई । वहाँ जाकर दरवाजे को बंद कर अपने नकली दाँतो को निकालकर साफ कर तुरंत वापस लगाया । पोपले मुंह को कोई देख न ले इस बात की उसे चिंता रहती थी । दुबारा दांतों को लगाने के बाद जब वह बाहर आई तो सारनाथन पीछे बगीचे की तरफ जा रहेथे । उनके मुंह में भी कुछ ही दांत रह गए थे। परंतु वह असली दांत थे । जो दांत गिर गए तो वहाँ दूसरे नकली दांत लगवाना उन्हें पसंद नहीं था । पोपले मुंह और पिचके हुए गालों की उन्होंने कभी चिंता नहीं करी ।

गीता के कमरे में “रिकॉर्ड प्लेयर” चल रहा था । अलग अलग भजन भक्तों की मधुरआवाज में सुनाई दे रहे थे ।

पेरुंदेवी अशांत हुई ।

“इसे देखो ? थोड़ा रुको ना ।” सारनाथन रुके । “क्या है ?”

“मुझे बहुत फिकर हो रही है ।”

“किस के बारे में ?”

“गीता के बारे में ही । वह ‘कडगंगारी’ (गाली) तो नाटक कर के चली गई । अब ये.....”

“ये......?”

“यात्रा में जाकर आने के बाद ये ठीक ही नहीं है । अकेले में बैठ कुछ सोचती रहती है । मन में कुछ रख कर घूम रही है........ उसके पास से वह पत्र आया तब ही मुझे शक हुआ मैंने बोला था ना ? भगवान से बोलती है । मंदिर जाती है । मुझे डर लग रहा है ।”

“इसमें डर क्या है ? तुम सोच रही हो ऐसी कोई बात गीता के मन में हो तो हमें दूसरी बार भी कोई गलती नहीं करनी चाहिए । इसकी शादी नहीं करनी है बाबू से कह देंगे ।”

“अय्यो, ऐसा सब मत बोलो ! फिर से मैं सहन नहीं कर सकती । इसे तो शादी कर खुशी से अपने परिवार में जीवन यापन करना चाहिए.......”

“हैलो अत्थैय !”

रामेशन की आवाज गूंजी । रबर की चप्पलों को बाहर उतार फेंक वह अंदर आया ।

पेरुंदेवी ने अपने को संभालते हुए उसका स्वागत किया । घर के पोशाक तहमद व जिब्बा पहन कर आया था तो उसे लगा कि वह आराम से यहां बैठेगा, वह बोली “थोड़ा सा उपमा खाओगे बाबू ?”

“नहीं चाहिए, थैंक्स । गीतू कहाँ है ? जरूरी काम से आया हूँ मैं, मुझे फिर ऑफिस जाना है - -गीतू ?”

“अप्पा है क्या ? ये आई ।” रेकॉर्ड प्लेयर को बंद कर पिछली रात सोते समय बनाई दो चोटियों को हिलाते हुए, गीता दौड़ कर आई ।

“आइये अप्पा ! गाना सुना ? बहुत बढ़िया था ना ? इसी गायकी की अभी नई एल. पी. आई. है । दस भजनों को उसी ने उनको सेलेक्ट किया है.......”

“ये सब रहने दो गीतू, अब मैं जो बोल रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो । आज शाम को तुम्हें देखने एक लड़के के घर वालो को आने का निमंत्रण दिया है........”

“अप्पा !” गीता सदमें खड़ी रही ।

“तुम्हें पसंद न हो तो मैं पक्का नहीं करूंगा गीतू । परंतु तुम अपने लिए कैसा लड़का चाहिए ऐसा कुछ विशेष बात तुम्हारे मन में हो तो वह बेहिचक बोल देना । नहीं तो जो कोई भी तुमको पसंद है सोच कर बताओ वरना मैं जो पहले जगह पक्का जो होता है वहीं पक्का कर दूंगा ।

“अप्पा !” वह चिल्लाई । अंदर उसके जो भावनाओ का मानसिक द्वन्द चल रहा था उसके कारण उसका शरीर कांपने लगा । पसीने से वह भीग गई उसने अपनी साड़ी से पसीना पोंछा।

“अप्पा !”

“बोलो गीता । तुम्हारे मन में कुछ हो तो बोल दो ।”

वह अपनी स्वभाविक स्थिति में आई । अब आखिरी निर्णय का समय आ ही गया है वह समझ गई । उसकी घबराहट दूर हो गई । अब और देर की तो काम खराब होगा ऐसी स्थिति में सच को साहस के साथ कहने के लिए सिर ऊपर किया ।

“हाँ अप्पा, मेरे मन में जो है उसे बिना छिपाए मैं बोल रही हूँ ।” वह आत्मविश्वास के साथ बोली ।

“बोलो ।”

“अरी गीतू ! क्या री पावी (गाली) बोल रही है ?” सफ़ेद पड़े चेहरे से पेरुंदेवी बोलकर फर्श पर बैठ गई ।

सारनाथन अपने दोहिती के चेहरे को उत्सुकता से देखने लगे । उनकी श्वास तेज चलने लगा । एक बार की गलती से ही परेशान हूँ क्या ऐसा ही एक अवसर फिर आएगा ? बेटी के अंदर से आई ये भी ऐसे ही विचार लेकर उसी की तरह है क्या ? गलती से एक मूर्ति बना शिल्पी ने उसे मिटाया दूसरी मूर्ति बनाई और पिछले में जो कमी थी उसे इसमें भी रख दिया । हे भगवान हमें क्यों तरसा रहा है ।

‘मुझे मुक्त कर दो ऐसा गीता बोलेगी क्या ?’

(9)

“मुझे मुक्ति दो ।” यामिनी बोली ।

चंद्रमा की चाँदनी में पिता और पुत्री दोनों खड़े थे । पूर्णमासी की रात । आकाश में चंद्र अपनी सोलह कलाओं के साथ मौजूद था । उस प्रकाश में जो चमक थी काली यामिनी पर पड़ कर उसके सांवले रंग कोऔर चमका रही थी ।

सामान्य दृष्टि से अलग खोई हुई उसकी आँखें अब हमेशा भ्रमित रहने लगी थीं। अकेली छोड़ो तो अपने को खत्म करने दौड़ती। वह बाहर फटी-फटी आँखों से देख रही थी । उस समय उसके अंदर क्या हो रहा था कौन जाने ? पहले भी वह इस तरह फटी-फटी आँखों से देखती हुई बैठी रहती थी ।

तब उस मौन में कविता के से भाव रहते थे । अब देखने वाली आँखों की नीली पुतली शून्य में ताकती, दृष्टि में सिर्फ खालीपन ही है । बेकार की ही ये सृष्टि है क्या ? जो भी हो इस तरह बैठे हुए रात को देखते समय उसके हृदय में कितने उठते हुए तूफान फिर शांत हो जाते ये तो समझ में आता है । इसीलिए वे उसे कोने के कमरे की कैद से बाहर ऊपर की छत पर खुले में लेकर जाते थे । वहाँ फैला रात का अंधेरा और बहती हुई हवा उसकी पसंद होती थी । कुछ कुछ सोचती हुई, आँखें शून्य में घूरती, बिना हिले डुले वह स्थिर बैठी रहती ।

इसी पागलपन की स्थिति में पिता के सामने वह बैठी थी । सिर्फ उनकी ही बातें कभी कभी उसके समझ आती थी । उसका प्रमाण भी मिल गया, दो दिन पहले उनके बोलने से उसने अपने आप खुद के हाथों और पैरों में मेहँदी लगाई थी ।

रात के अंधेरे को देखते काली मूर्ति जैसे बैठी हुईउसे देख सारनाथन जी बहुत ज्यादा दुखी हुए । उन्होंने क्या कर दिया ? अपनी लाड़ली बच्ची के साथ उन्होंने कितना अन्याय कर दिया । उसकी क्यों शादी की ? दूसरों की बात उन्होंने क्यों सुनी ?

उसने तो अपनी भावनाओं को बड़ी स्पष्टता से कह दिया था ना! ‘मैं शादी नहीं करूंगी ।’ उसका वो ख्याल बहुत गंभीर था, गहराई लिए हुए बहुत ही सच्चा भी था । उसका कारण लोगों को समझ में नहीं आए तो क्या ? मनुष्यों में जाने कितने तरह के लोग होते हैं । संसार में अपनी भावनाओं व संवेदनाओं को प्रकट करने का गुण तो बहुत बड़ा गुण है उसके ऊपर कारण की क्या जरूरत है । उसे ऐसे ही अपनाना चाहिए । लकड़ी आग से क्यों जलती है ? वह लकड़ी की नियति है, उसमें सहन करने की शक्ति उतनी ही है । बस इतनी सी बात । ज्वाला को ठंडा नहीं कर सकते । उसे ठंडा करना चाहकर उसके उपर पानी डालों तो वह ठंडा नहीं होगा, पर बुझ जाएगा ।

बुझ ही तो गया ।

‘देखो कैसे बेकार मूर्ति जैसे बनी बैठी है, बिना किसी मतलब के बिना मकसद के । तीस साल में ही जैसे सब खत्म हो गया । उसकी बच्ची को उसकी आँखों से दूर छुपा कर पालने की मजबूरी एक दयनीय दशा ही तो है !

सालों इलाज करने पर भी कोई फायदा नहीं हुआ । उसकी उम्र पूरी 50 साल होगी क्या ? या साठ ? अस्सी ? पूरे जीवन भर ऐसे ही दीवानापनरहा तो जबरदस्ती कर कमरे के अंदर इसे रहना पड़ेगा क्या ? कैसी कठोर उमर कैद इसकी तकदीर में है !

‘उन्होंने स्वंय ही उसे बर्बाद किया’ अपनी पैदा की हुई बच्ची को उन्होंने उसका मनपसंद जीवन नहीं जीने दिया । इस दशा में वह अंदर की भावनाओं के कारण अपने को समाप्त करने का प्रयत्न करती है । कितनी ही बार दबाएे उसके अंदर के भावआज फिर सामने आ गये । हम जैसा जीवन चाहते हैं वैसा जीवन वह न जी सकी इसलिए उसका जीवन एक कैद खाना हो गया ?

उन्हें कंपकपी सी लगी । उनके शरीर में सिहरन दौड़ गई । विचारों के बोझ को वे सहन न कर सके । “चले आओ यामिनी” वे बोले । किसी यंत्र के जैसे वह उठी । ये ही उसकी नियति थी । दोनों खड़े हो गये । अब उसे ले जाकर फिर से उस कोने के कमरे में कैद करके रखना पड़ेगा..... ‘सृष्टि का नियम है कोई कोना कोई जगह छूटे बिना यात्रा करते रहना’ सोचते हुए बंद दरवाजा खोला ………

वे बहुत ही तड़फड़ाये । उनकी आँखों से आँसू निकल कर गालों पर बहने लगे ।

उनके भावपूर्ण शब्दों को वह मनोरोगी समझेगी या नहीं ये भी नहीं सोचा उन्होंने । उनके हृदय में जो प्रेम, प्यार, दु:ख था वह सब उनके दिल को चीरता हुआ बाहर आया

“मैंने गलती कर दी यामिनी ! मुझे माफ कर दो ।”

अचानक उसकी भ्रमित आँखें ठीक हुई । धीरे से वह सिर को घुमाकर उन्हें देखने लगी । कुछ भी समझ न आने वाली बातें दूर हो कर एक मिनिट में विचित्र तीव्रता के साथ उसकी निगाहों में एक उफान आया । जैसे काई दूर हो कर अंदर का साफ पानी दिखाई देने लगेउसी प्रकार उनकी बात को समझने लायक स्पष्ट और संदेह रहित एक क्षण आया । उसे समझते ही उसने जवाब दिया । कितनों ही दिन के बाद सामान्य हुई, उसके मुंह से बिजली के कडकने जैसे शब्द निकले - - -

“मुझे मुक्ति दे दो, मैं माफ कर दूँगी ।” पागल के मन में क्या होता है कौन जानता है ? वह जिंदगी को न जी पाई न उसे छोड़ पाई कैसे दुख व कष्ट उसके अंदर अनुभव करती है किसको पता ? उन कष्टों से ही मुक्ति चाहती है ?

किस अर्थ में वह यह बात बोली ? स्त्री ने मर्द को देख ऐसी बात बोली ? जो अपराध भार से भरा था उसे देख बोली । सभी को एक ही एक साँचे में भरने की कोशिश करने वाले दुनिया वालों से सवाल पूछ रही है इसीलिए बोल रही है ?

एक बात तो है, उन्हीं की बात को सोच उसे साधन बना उसके मुंह से बाहर आ ही गया । एक सिहरन उनके शरीर में दौड़ गया । दुख से भरे हृदय से, आश्चर्य से उन्होंने उसको देखा । बिना किसी संकोच या चंचलता के वह शांत सिर उठा कर खड़ी थी । एक अलग न होने वाला अकेलापन कालिमा का कठोर आवरण लिए उनके सामने खड़ी उनके चेहरे को ध्यान से देख रही थी । उनके जवाब के लिए रुकी हुई थी ? एक क्षण के लिए उनकी आँखें चौंधियाई । शरीर के साथ मन में भी सिहरन हुई ।

अगले ही क्षण वह बेहोशी खत्म हुई । उनकी लाड़ली बेटी बदल गई । अपने वात्सल्य, अपनापन, भावनाओं से भरा प्रेम उसकी वेदनाओं पर दुखी होने वाले वे भी बदले ।

बचपन में उसने कभी दूसरे बच्चों जैसे ‘गुड़िया दो’ नहीं मांगा । युवा अवस्था में दूसरी युवा लड़कियों जैसे ‘ऐसे कपड़े खरीद के दो’ कभी नहीं मांगा । युवती होने पर अन्य युवतियों जैसे ‘ऐसे पति दो’ नहीं मांगा । आज पहली बार उसने जीवन से मुक्ति की मांग की है ! वे कैसे मना कर सकते हैं ?

जीवन तो बहुत ही मूल्यवान वस्तु है, उसके बराबर कुछ नहीं। एक सिक्के के दो पहलू जैसे जीवन के साथ ही मृत्यु भी उसी के साथ जुड़ी हुई है । वो दो शक्तियाँ है । इसके जीवन को ठीक करना सिर्फ मृत्यु से हो सकता है ।

अपनी बेटी को जीवन नहीं दे पाने के कारण कई बार वे बहुत दुखी हुए ?

उसकी दशा को देख-देख कर मन बहुत दुखी होता । अब ये उस दुख से मुक्त होना चाह रही है ।

बुजुर्ग सारनाथन के शरीर में करंट दौड़ गया । हृदय का प्रेम उमड़ कर उफन कर बहने लगा, तो उन्होंने उसकी काली छाया को कुछ देर भरपूर दृष्टि के साथ देखा । छूकर उसके बालों को सहलाकर ‘जा मेरी प्यारी बेटी’ बोलने से उसे पसंद नहीं आएगा सोच चुप हो गए । परंतु, उनकी निगाहों में पूरा वात्सल्य भर कर उसे बच्चे जैसे उठा लिया । वह भी उस दिन बिना आवेश में आए खड़ी रही । उस क्षण दोनों बहुत पास आ गए ऐसा लगा । दृष्टि को धुंधलाने वाला आँसू का गीलापन चाँदनी में चमक उठा, वे उसे देख मुस्कुराऐ, समय जैसे ठहर गया, हंसी को जो भूल गयी थी वही उस क्षण जीवन में पूर्ण होने जैसे एक अपूर्व मुस्कान में जवाब दे रही थी। हँसते समय उसके गालों में डिम्पल पड़ रहे थे ।

“आजा माँ !” कहते उनकी जीभ लड़खड़ा रही थी । दोनों नीचे उतरे ।

सोने के कमरे में पेरुंदेवी और छोटी गीता दोनों सो रहेथे । पीछे की तरफ कोने का कमरा खुला । वहीं पर हमेशा यामिनी को ले जाकर ताला लगाना पड़ता । आज सारनाथन ने वह नहीं किया । उस कमरे को पार कर वे सीधे बगीचे में कुएं के पास गए । पीछे यामिनी आ रही है क्या देखा नहीं । रोज उसके साथ चलने वाले चौकीदार की आज जरूरत नहीं । कुएं के अंदर झुक कर देखा । उसका गहरा पानी अपने आगोश में उसकी लाड़ली को लेने के लिए तत्पर चांदनी व नक्षत्रों की चमक से झिलमिलाता साफ नजर आ रहा था । कुछ क्षण बिना हिले खड़े रहे फिर पिछवाड़े के दरवाजे से घर के अंदर घुसे, यहाँ वहाँ जो अंधकार छाया हुआ था वहाँ कहीं भी यामिनी जहां चाहे वहाँ रह सकती थी । उसे वैसे ही उसके पसंद के एकांत में छोड़ कर घर के अंदर चले गये सीढ़ियों की ओर । कांपते शरीर से वे अपने दोनों कानों को बंद कर खड़े रहे । कुएं से आने वाले आवाज को वे सुन नहीं पाएंगे । कुछ भी हो उनमें इतनी ताकत नहीं है, बंद आँखें थीं, दुख से जमे हुए ममत्व का क्या करें ?

कान व आँखें बंद किए लंबे समय तक खड़े रहे उनके हृदय की धड़कन अपनी सीमाओं को तोड़ बाहर जा रही थी । आज उनके जीवन की काली छाया का एक भाग हमेशा के लिए चला जाएगा –उसके साथ ।

बड़ी देर बाद उन्होंने धीरे से कानों से हाथ को हटाया । लगा जैसे पूरी दुनिया ही निशब्द हो गई हो । बहुत देर तक कानों को बंद कर खड़े थे उन्हें लगा वहअब भी जीवित है । वह पत्थर बने जीवित यंत्र की भांति अपने को संभाले हुए थे ।

पेरुंदेवी आ गई । इस बीच रात में ये कैसे जग गई ? फिर अपने को संभाल कर अभी ही वे छत से उतरे हों जैसे नाटक किया।

“यामिनी कहाँ है ?” घबराई पेरूंदेवी बोली ।

आखिर में जब उनकी लाड़ली पुत्री को निकाल कर बाहर लाये, तो पेरुंदेवी बेहोश हो गई, तब उनका हृदय भी टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गया । उसे शव के रूप में देख वे सहन न कर पाये । उसके गाल में डिम्पल पड़ कर हँसते हुए जैसे ही सुंदर लग रही थी । चारों तरफ रोने की आवाजों के बीच सारनाथन खुद को संभाल नहीं पाए बिलख-बिलख कर उनका रोना फूट पड़ा ।

उनके हृदय में वही एक दृश्य आया जब पहली बार उसके प्रेम को जानने वाला दिन था । मुस्कुराते चेहरे पर गाल पर पड़े डिम्पल उसकी सुंदरता बढ़ा रहे थे मुख की तेजी देखते ही बनती थी ।

ये मुख क्या इस शव का है ? इसकी आयु दो वर्ष की थी तब उनके मुंह पर अपने छोटे छोटे हाथों से उसने छूआ था । घुँघराले काले बाल और उसकी तोतली जुबान जैसे उन्हें बहला रहीहो ।

“रो रहे हो अप्पा ? मत रो ।”

उनका शरीर ढीला पड़ गया । बच्ची ने अभी भी यही तो बोला है? नासमझ लोग उसके लिए रोये । वे रो सकते है क्या ? मुक्ति दिलाने वाले को रोना चाहिए क्या ? नहीं ! सब भूल वह अपने ईष्ट को पा गई जानने के बाद रोना चाहिए ? उन्होंने धीरे से आँखों को पोछ लिया ।

सबेरा हुआ । वहाँ जितने लोग इकट्ठे हुए सब “पिता जी के साथ रहते भी वह लड़की उनसे बच कर दौड़ कर जा कुएं में कूद गई! पागल थी ना ! पागलों के आवेश में शक्ति बहुत होती है ना ?” ऐसा रोने के बीच में लोग बातें कर रहे थे तब उनकी दृष्टि तो उसकीलेटी हुई आकृति पर ही जमी रही । फूलों की मालाएँ व नई साड़ी में माथे पर कुमकुम की बिंदी से कैसे उसका श्रृंगार किया था । श्रृंगार ही पसंद न करने वाली को श्रंगार ! पैरों में और बांए हाथ के नाखूनों में मेहँदी खूब लाल लगी थी । सीधे हाथ के नाखूनों में मेंहदी नहीं थीक्योंकि उसने स्वयं अपने दाहिने हाथ से उठा कर मेहँदी लगाई थी ।

सीधे हाथ से लेकर दूसरे हाथ को लगाने के कारण सीधे हाथ की उँगलियों के अंदर के भाग में ही लाल रंग की मेहँदी लगी हुई थी । काले शरीर में लाल दिखने वाले पैर और हाथ ऐसे लगे जैसे वह जीवित हो ।

पेरुंदेवी का मातृ हृदय दुख में दुखी हो “मेरी बच्ची कुएं में कूदी उसकी आवाज भी मेरे कानों में नहीं आई । मैं ऐसी पापी हूँ!” बार-बार बोल रही थी पर परंपरा का भी तो ध्यान रखना होगा ना ? बोली “बाबू को तार दे दो तुरंत आने के लिए । उसे आना चाहिए यही बात नहीं, लड़का नहीं हो तो पति को ही अंतिम क्रिया करनी चाहिए ।” बोली ।

उस समय सारनाथन जो बात बोलेउसे सोच कई दिनों तक पेरुंदेवी, बेटी की मृत्यु के कारण ये पागल हो गए क्या सोच कर परेशान होती रही ।

सारनाथन तूफान जैसे चीरते हुए उठे, आवेशमें भर बोले-

“पति क्या है रे पति ! कहाँ से आया पति ? मेरी बेटी की कौन सी शादी सफल हुई ? मेरे लिए वह कन्या ही थी ! वह बोली नहीं क्या ? मेरी बेटी एक कन्या ही है । उसको अग्नि मैं ही दूंगा, उसे पैदा करने वाला पिता !”

उन्होंने ही अपने हाथों से उस काले सौंदर्य को अग्नि दी ।

सुबह अच्छा प्रकाश हो गया । रात की कोई बात बची नहीं थी ।

(10)

गीता के चेहरे को तीनों घूर कर देख रहे थे । रामेशन तो सिर्फ अपने प्रश्न के उत्तर के लिए उसको देख रहा था । लेकिन पेरुंदेवी, आने वाले शब्दों में जो तूफान होगा उसे सोच पहले से ही डरी हुई थी अत: उसका गला सूखने लगा और वह दयनीय दृष्टि से उसे देख रही थी ।

सारनाथन जी उत्सुकता से बेचैन थे । एक क्षण में ही सारी पुरानी यादें मस्तिष्क में घूम गईं, उनकी रोमावली खड़ी हो गई । उन तीनों की भावनाएँ, इच्छाएँ और मन के अंदर की बात सब एक साथ बाहर आने को है । तीनों की दृष्टि उसके ऊपर ही है ये जब गीता ने महसूस किया तो थोड़ी देर पहले उसमें जो हिम्मत और शांति उसमें थी वह गायब हो गई । वह बेचैन हो उठी, मैं जो बोलने वाली हूँ उसे ये लोग किस तरह लेगें ? इस डर ने उसे घेर लिया । उसका दिल तेजी से धड़कने लगा । उसने तीनों के चेहरों को एक के बाद एक डर और असमंजस के साथ देखा । ‘उस घबराहट के अनुभव को अधिक देर तक सहन करने से तो अच्छा है उस विषय को एकदम से ही कह दूँ थोड़ा-थोड़ा कर बताने के बजाय शायद यही ठीक रहेगा’ उसे लगा । पिछले हफ्ते जब अम्मा से बात करना चाही, तब अपने शब्दों को सजा कर शांत मन से जो बोलना चाह रही थी वह शांति अब मन में नहीं है । उसके अंतर्मन में छुपी निजी बात, उसके मन के नायक की बात, एक ही सांस में बाहर आ गई -

“मैं किसी से प्यार करती हूँ” वह बोली । कमरे में कुछ देर कोई आवाज नहीं आई । एक मौन चारों तरफ फैल गया । उसके अंदर की बात अचानक ही सामने आने पर सब आश्चर्यचकित हो गए । उनके कुछ बोलने से पहले यह मौन ही हजारों प्रश्न पूछ रहा हो जैसे उसे ऐसा लगा । तीनों के चेहरों को देख उसे लगा की विश्वास न करने जैसी कोई बात उसने बोल दीहो ।

क्षणभर में ही उसका जो निजी आन्तरिकभावहै वह प्रकट हो गया। ये लोग क्या सोच रहे होंगे? ‘हमारे परंम्परागत परिवार में ये क्या प्यार-व्यार ? ऐसा बोलेंगें ? जो सोच रहे हैं उसे बोल दें तो ये जो अति का संकट है वह खत्म हो ! वह हंसने का प्रयत्न करने लगी, पर हंस न सकी । अचानक उसे लगा मैंने कुछ अधिक दुस्साहस तो नहीं कर दिया! ऐसा ही लगता है । ऐसा सोच कर ही उसका शरीर कांपने लगा ।

“क्या है अप्पा ?........ अप्पा !...... कोई तो कुछ बोलो ना ! मैं बोल रही हूँ सुनाई दे रहा है ना ? ताता, (नाना) क्यों कुछ नहीं बोल रहे हो ? अम्मा, अम्मा क्यों अम्मा ऐसे बिना कुछ कहे आँखें फाड़-फाड़ देख रही हो ? बोलो ना माँ ! मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है अम्मा !”

अचानक सारनाथन ने जोर जोर से हँसना शुरू किया । धुएँकी तरह फैला मौन क्षण भर में हँसीमें हवा जैसे काफूर हो गया उनके हँसते ही रामेशन ने भी ‘वाह बेटा ! ऐसी बात है कहते कहते सीटी बजाई ।

पेरुंदेवी का हृदय तूफान के बाद हुई शांति के जैसे शांत हो गया । दुख के बाद खुशी भीआघात सी लगी। दिमाग जैसे भ्रमित सा हो गया । मन के अंदर सच को स्थान बनाने में समय लगा, एक डर व घबराहट थी। आखिर अपने को संभाल लेने पर उसके मुंह से बोल फूटे

“अरे बेटी कन्ने ! (प्यारी) मेरे पेट में दूध डाली ! (मुझे शांति मिली) गीता, मेरी गीतू, यहाँ आओ, मेरे पास आओ मेरी सोनिया !”

एक क्षण को गीता चौंकी, फिर उसका चेहरा खिल कर चमकने लगा । वह फर्श पर पैरों को फैलाकर बैठी हुई बुढिया नानी की गोद में जा बैठी ।

कांपती मोटी उँगलियों से, वात्सल्य से भरकर पेरुंदेवी ने उसके चेहरे को सहलाया, सिर को सहलाया फिर अपने से चिपकाकर उसे चूम लिया । हे भगवान........ हे भगवान तूने क्या दया दिखाई हम पर ! इसे मैं तुम्हें नहीं दूँगी मैं बोली, तुमने इसे मुझे दे ही दिया । मैं डर रही थी कहीं दूसरी बार भी मेरे हृदय को दुख: न पहुंचे, तूने मुझे अपार खुशियाँ दे दीं । मैंने इसके लिए जो चाहा वह सब कुछ तुमने दिया । मैं इसके लिए प्रभु को कितना भी धन्यवाद दूँ कम है ।

“अम्मा........ अम्मा”

“मेरा गला सूख रहा है....... थोड़ा पानी लेकर आ ।” पेरुंदेवी का शरीर भावनाओं के अतिरेक से शिथिल होने लगा वह डगमगाई ।

गीता भाग कर अंदर जा एक गिलास ठंडा पानी लेकर आई । ठंडा पानी होने के कारण चाँदी के गिलास के बाहर पानीकी बूंदें जम गई थीं । फ्रिज में काँच के बोतल में रखा अनाचार पानी पर भी ध्यान न देपेरुंदेवी ने बड़ी बेसब्री से उसे पी लिया । सांस का फूलना धीरे-धीरे ठीक हुआ । आश्वासन से आँखों के आँसू पूरी तरह खत्म हो गए । अपने चेहरे और आँखों को उसने अपने साड़ी के पल्ले से पोंछा, अपने कमजोर शरीर को गीता के हाथों का सहारा देकर धीरे-धीरे चार कदम चल कर पास में जो कुर्सी थी उस पर बैठ गई ।

गीता ने भी इस बीच अपने को संभाल लिया । पेरुंदेवी के मन की बात तो वह समझ गई, परंतु अप्पा क्या बोलेंगे ? उनकी आज्ञा ज्यादा जरूरी है ? उनके मना करने पर भी वह अपने प्यार को नहीं ठुकरायेगी । फिर भी उनकी आज्ञा व आशीर्वाद के बिना उसे अच्छा नहीं लगेगा । जाने वाले रास्ते को तो उसने तय कर ही लिया । उसके बाद भी बीच में कोई रुकावट न आए तो ही आसानी होगी ना ?

“अप्पा ! आपने कुछ नहीं बोला ! आपकी बेटी एक एटम बम को फेंक रही है.......”

“इसमें एटम बम की क्या बात है ? समय ऐसा ही है । आदमी औरत साथ मिलकर रहने वाले समाज में ये सब तो सहज बात ही है । इस बारे में अभी तक तुमने हमें नहीं बताया था और एकदम से इस बारे में सुन आश्चर्य हुआ । बस यही बात है । आजकल के समय में लड़की आकर ‘अप्पा, मीट माइ हस्बेंड’ कह कर मिलवाये तो भी आश्चर्य की बात नहीं !” कह कर हंसा रामेशन ।

“ओ, थेंक्यू अप्पा !..... परंतु..... परंतु सिर्फ एक ही बात है...... आप उसके लिए क्या बोलोगे ! अम्मा को भी पक्का पसंद नहीं होगा.....”

“वह कौन सी बात है ? क्या खींच रही हो ? जल्दी से बोलो।” पेरुंदेवी फिकर के साथ बोली ।

“वे….. वे चैन्नई में रहते हैं पर अपनी तरफ के नहीं । वे गुजराती हैं । इस बात पर तुरंत कोई कुछ नहीं बोला । रामेशन ने कुछ सोचते हुए उसे देखा । पेरुंदेवी के चेहरे पर जमी हुई बातों की छाया दिखी ।

“ये क्या है री, ये सब अपने लिए ठीक रहेगा क्या ?” उसके शुरू करते ही गीता का मुंह लाल हुआ उसका हृदय जोर से धड़कने लगा ।

“अम्मा, दया करके ऐसी बात मत बोलो । वे बहुत अच्छे हैं, मालूम है ? हम एक दूसरे से मिलकर एक दूसरे के गुणों को पहचान ही एक दूसरे को पसंद करने लगे, एक दूसरे को चाहने लगे । शादी कर हम खुशी से जीवन जीने का सपना देख रहे हैं । अब आप लोग इसका विरोध करोगे तो मन बहुत दुखी हो जाएगा अम्मा!” उसकी आवाज दब सी गई । घबराहट के कारण इतनी-इतनी बातें बोल गई सोचकर उसे शर्म आई ।

रामेशन ने पास आकर उसके कंधे को अपनत्व से पकड़ शाबाशी दी । उसकी आवाज गीतू के कानों में अमृत घोल रही थी ।

“गीतू ! हमेशा ही बोलता हूँ ना शादी के विषय में तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध मैं कुछ नहीं करूंगा । वह लड़का भी तुम्हें प्रेम करता है ? बोलो गीता, मैं पूरी तरह तुम्हारे साथ हूँ सारी बात मुझे बताओ । आज शाम को ही तुम्हारी मौसी (सौतेली माँ) को लेकर मैं उनके घर जाकर बातचीत कर शादी पक्की करता हूँ । आज जो आने वाले लोग हैं उनको भी मैं कुछ बहाना बना कर नहीं आने के लिए बोलता हूँ, बस ? तुम्हारी चिंता खत्म हुई ?”

“अप्पा !” वह थोड़ी देर खुशी के अतिरेक में बोल नहीं पाई । ‘अप्पा ! अप्पा ! ..... आप कितने अच्छे हैं !” पिता के आगोश में उस बच्ची को खुश देख पेरुंदेवी को लगा जो सोचकर वह बच्ची को पाल रही थी वैसे ही मंगलमय जीवन जीने वाली वह संसार की लड़की है । इससे ज्यादा वह और क्या चाहती है ?

इसके अलावा, कोई इसे प्रेम करने वाला प्रेमी मिले तो ही ठीक रहेगा वरना जो चली गई उसकी छाया से गीतू की परम्परागत शादी में कोई संकट आ सकता था । पिता के लाड़ प्यार से प्रफुल्लित गीता बोलती ही चली जा रही थी । उसका शर्म से लाल चेहरा बहुत कुछ कह रहा था । बातों ही बातों में उन लोगों ने बहुत कुछ उससे पता लगा लिया ।

उसकी सहेली मीना के पिता जी के व्यवसाय में एक गुजराती कुछ लोहे की वस्तुएं बनाने वाली कंपनी का चैन्नई के अंदर एजेंट है । उनका युवा पुत्र उसी उद्योगमें था । मीना के घर में एक उत्सव में वह भी आया था । मीना के घर के इस उत्सव में ही वह और गीता पहली बार उससे मिले । करीब एक साल से दोनों को कई मौके मिलने के मिले । एक दूसरे को जब चाहने लगे, उसके बाद ही बद्रीनाथ का प्रस्ताव आया । गीता अपनी सहेली के आग्रह को स्वीकार करने का कारण ही ये था कि वह युवक भी उस यात्रा में शामिल था । उसके साथ-साथ सभी जगहों पर जाकर देखने के कारण ही गीतू को यात्रा की एक-एक जगह, एक एक मूर्ति एक-एक स्थान उसे इतना पसंद आया । बद्रीनाथ से मीना के साथ लौटकर नहीं आई क्योंकि दूसरी ग्रुप में ही वह युवक भी लौट आने वाला था यही उसका कुछ और दिन रुकने का कारण था ।

पेरुंदेवी को आश्वस्त होने के साथ ही गुस्सा भी आया कि यही कारण था ! पर कैसे-कैसे उसने उसे डरा दिया था ये बदमाश लड़की ।

यात्रा से लौटते ही समय उन दोनों ने मिल कर तय कर लिया था कि हम अपने अपने परिवार जनों से मिलकर उन्हें बताएंगे कि वे शादी कि तैयारियां करना शुरू कर दें । उस बात को सोच-सोच गीता कितनी घबराई हुई थी । दूसरे प्रदेश के आदमी से शादी करने कि बात को अपने लोग कैसे मान लेंगे ? इस बात का उसे बहुत डर लग रहा था । इसीलिए कितनी बार कितने देवताओं से कितने तरीकों से उसने प्रार्थनाएँ की !

“ओह हो, यहीं छुपा था क्या उस भक्ति का कारण ? मैंने इसे कभी मीरा कभी आंडाल (देवी) सोचा इसी से मैं बहुत घबराई ! अरे बदमाश ! ये सब इस शादी के लिए ही किया ?” मुंह को मोड नकली गुस्सा किया तो उसके अंदर से खुशी का फव्वारा फूटा ।

बोलती जा रही गीता अचानक चुप हो सारनाथन को मुड़ कर देखने लगी । उन्हें भूल ही गई ! इस विषय के कारण ताता उससे नाराज होंगे क्या ?

“ताता ! (नाना) गुस्सा हो क्या ताता ?” सारनाथन की हँसी जाने कहां चली गई थी । इन सब से दूर अपने हृदय तल में वे अतीत की गहराई में एक दूसरे ही जीवन के साथ अकेले थे । रामेशन और गीता एक जैसे हैं परंतु वे दुसरी तरह के पिता हैं जो अपनी लड़की की याद में रहते हैं । वो बंधन ! कितना-कितना गहरा था क्या ये लोग महसूस कर सकते हैं ? जाने वाली के साथ उनका जुड़ाव कैसा था ये और कौन जानता है ? वह एक अलग ही किस्म की प्राणी थी । उसके जैसा कोई और हो सकता है क्या ?

‘अम्मा यामिनी, तेरी बेटी को प्यार हो गया है! ऐसा मन ही मन कहते समय उनके अधर भी साथ में हिल रहे थे । “ताता मैं जो बोल रही हूँ वह आप सुन नहीं रहे क्या ?”

वे चौंक कर अपने में आए और पूछा “क्या ?”

“आप नाराज हो क्या ?”

“जिस तरह तुम अच्छी रहो वही ठीक है ।”

पेरुंदेवी एकदम से बोल उठी “देख गीतू, ऐसे ही मत खड़ी रह, जाकर नहा ले। बाबू, वसंती को जाकर बात बता तो वह अपनी गीतू की शादी के बारे में बहुत उत्सुक रहती है । वसंती को जब ये बात बताओगे, तो वह बड़ी खुश होगी ! अपनी गीतू के शादी के लिए वह सब करने को तैयार है । तुम्हारे अप्पा और अम्मा को भी इस परिस्थिति के बारे में बता समझाकर बता उन्हें भी सहमति देने के लिए तुम्हें राजी करना होगा ।”

“वह सब मैं देख लूँगा अत्तैय” सब ठीक हो जाएगा । इस जमाने में सब को देखो तो चलेगा क्या ?पेरूंदेवी...... शाम को लड़के के घर तुम और वसंती के ही जाने से काम नहीं चलेगा क्या ? शादी वाली लड़की को भी ले जाना जरूरी है क्या ?”

“ये प्रेम विवाह है अत्तैय ! मत भूलो !” कह कर रामेशन हंसा ।

“ठीक है ठीक है, तुम्हारी मर्जी । ऐसा है तो गीतू शाम को वहाँ जाने के लिए अच्छे गहने, साड़ी ब्लाउज अभी से देख कर निकाल कर रख लो । सुंदर और साफ दिखना चाहिए ।

“तुम्हें भी जरूर हमारे साथ आना है अम्मा ! उनसे मैंने तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बताया है तुम्हें पता है ? मेरी प्यारी अम्मा, मेरी अच्छी अम्मा, तुम आओगी ना ?” गीता उनसे लाड़ लड़ाती हुई उसके गालों को चूमते हुए बोली।

“बस कर रे ! थूक लगा रही है, तुझे ये सब कुछ मालूम नहीं ?” गाल को पोंछती हुई गर्व से बोली, गीता चहरे को सहलाने लगी । “आज क्या बुधवार है ? सोना मिल जाएगा बुधवार नहीं मिलेगा ? आज ही जाकर आना ठीक रहेगा बाबू । राहूकाल साढ़े बारह से डेढ़ बजे खत्म हो जाएगा । शाम को हम चाहे कितने बजे भी रवाना हो सकते हैं ।”

“हम आ रहे हैं ये पहले ही उनको सूचित करना पड़ेगा । उसे कैसे करें गीतू ? उनके घर फोन है क्या ? उनको जब सहूलियत होगी उस समय मैं और वसंती यहाँ आकर तुम दोनों को लेकर जाएंगे अत्तैय ।”

“रमेश और महेश को भी........” संसार की मिट्टी में जमती जड़ को जमा कर उसको पानी देते लोग उत्साहित होकर बात कर रहे थे तो सारनाथन अपने कमरे में चले गए ।

उनका कमरा । उनकी अपनी बेटी का कमरा । वहाँ उसका फटी-फटी आँखों से देखना, झूले के साथ उसकी काली छाया सब उनको दिखता। पीतल की मूढ़ वाले काले तख्ते पर बैठकर वे अब भी वे उसे हृदय में बसा झूले में झूला रहे हों ऐसा ही लगा । उनकी कल्पना में वह हमेशा बच्ची ही है जिसको थपकी देने की जरूरत है। बड़ी होने पर ही तो युवती फिर किसी की पत्नी बनेगी ?

छ: फुट के गंभीर व्यक्ति, वे सीधे खड़े होते तो लम्बाई और चौड़ाई से वे कोई राजसी व्यक्ति लगते । उनकी पुत्री को भी उनकी ही लंबाई मिली थी । उसकीतरह रंग में काले नहीं तो वे पेरुंदेवी जैसे गोरे भी नहीं । उनका रंग गेहुआँ था जो उनकी खूबसूरती को कम नहीं होने देता था ।

इस बहत्तर साल की जीवन यात्रा में उनके शरीर के अंग ढीले पड़ने के बाबजूद उनके हर एक अंग विशेष कर आँखें उनकी गहरी आँखों में एक बड़प्पन टपकता है । यामिनी के रहते बासठ साल के होने पर भी इतनी परेशानियों व उम्र के तकाजे के बाबजूद उनके सिर के बाल काले ही थे । प्यारी बेटी चली गयी तब तुरंत ही उनके सिर के बाल एक महीने में ही सफेद हो गए । परंतु बालों का घनापन अभी भी कम नहीं हुआ ।

रात होते होते पूरे घर में एक उत्साह फैल गया । शादी की बातचीत सफलता पूर्वक पूर्ण हुई । पेरुंदेवी ने आकर सभी बातों को विस्तार से उनको बताया । लड़के ने बहुत विनम्रता से उनसे घुलमिल कर बहुत ही आदर से बातचीत की और अपनी बात कहने में वह पूरी तरह से सफल भी हो गया । उन्होंने सिर्फ ‘ऊम’ बोलकर सब बातों को सुन लिया ।

रात हो गई । कोने के कमरे से निकल सारनाथन पीछे की तरफ बगीचे में गए । रात में चमेली व रात की रानी की खुशबू चारों ओर फैल रही थी ।

उन्होंने कुएं के पास जाकर धीरे से अंदर झाँककर देखा । आकाश एक गोल आईने में अपने चेहरे को देख रहा था । सीधे होकर ऊपर देखा वहाँ रात में आकाश में तारे ही तारे नजर आ रहे थे । वहाँ वह किसका चेहरा है ? वे दुख को सहन न कर पाने के कारण पिघल कर पानी पानी हो गए । लंबी आकृति, सफ़ेद बाल गेहुआँ रंग, दांत गिरे हुए मुंह, ढलका हुआ शरीर, पुत्री के प्रेम में डूब कर खुद पानी हुए जा रहे थे । गले में शब्द अटक रहे थे, दीप की ज्योति, ये ज्योति रात में क्यों फैल रही है?

पैदा हुई व खत्म हुई वो कौन ?

वहीहै ! और कौन ? वह अलग है । वे अलग हैं । वे दोनों एक ही थे । काल के प्रवाह में प्रेम में बंधे साथी नहीं बने वे दोनों !

मेरी आँखों में मेरा जीवन रहने तक तुम रहोगी, मेरी आँखों के सामने तुम ही तो हर समय खड़ी रहती हो ! मेरा ही दिया नाम, वही मेरे जैसी तड़प, वही मेरे जैसा तप सब कुछ वैसा ही ।

परंतु इतने साल के तप के बाद भी मन में शांति तो मिली नहीं ?

मेरा मन टूट गया । ये दुख ये तड़प, ये शांति कभी मिलेगी या नहीं मिलेगी ?

अभी तक भी उसके बिछोह के दुख को सहन नहीं कर पा रहे । दस साल से दिल के अंदर दफन रहस्य को सोच-सोच मैं पिघल रहा हूँ अभी तक भी मैं सामान्य नहीं हो पाया । मेरे अंदर जो खालीपन है वह भर नहीं पाया । प्रेम और स्नेह का बंधन टूट न सका अब शांति का रास्ता बचा ही क्या है ? उन्होंनेफिर कुएं में झुक कर देखा । वहाँ भी वही उसका चेहरा ! उसमें कितनी शांति है ! वे अपनी निगाहों को दूर नहीं कर पाये । उसके चेहरे को देख आँखों में आँसू तैरने लगे ।

‘मुझे शांति चाहिए मेरी प्यारी, मेरी लाड़ली, मेरी कल्लों........! नहीं, ऐसे उसे पुचकारने से अच्छा नहीं लगता । बच्ची कह कर बुलाऊँ ? मेरी बच्ची ! मेरी बेटी ! यामिनी ! यामिनी........!

अंदर पेरुंदेवी अपनी खुशी की बातों में मग्न थी । कुएं से जो आवाज आई, इस बार भी उसके कानों को पता नहीं चला ।

समाप्त ।

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