Chhote-Chhote Sawal (Novel) : Dushyant Kumar

छोटे-छोटे सवाल (उपन्यास): दुष्यन्त कुमार

सलेक्शन कमेटी (अध्याय-2)

इंटरव्यू खत्म हो चुके थे, मगर उस कमरे में गहमागहमी थी। अलग-अलग स्वरों में दस-बारह आवाजें एक-दूसरे पर प्रस्थापित होने की कोशिश कर रही थीं। खड़ी बोली एक तो यूं ही खड़ी होती है, फिर अपने उद्गम-स्थान ज़िला बिजनौर में वह जरा स्वाभाविक रूप में चलती है। इसलिए साधारण-सी बहस एक छोटे-मोटे बलवे का मजा दे रही थी। आखिर लाला हरीचन्द से न रहा गया। उन्होंने मेज पर एक छोटा-सा घूँसा मारकर कहा, "भय्यो ! जरा सोच्चो तो। बरोब्बर के कमरे में सारे मास्टर लोग बैठे हैं। कोई सुनेगा तो क्या कहवैगा ?"

मैनेजिंग-कमेटी के सारे सदस्य इंटरव्यू-कमेटी के भी सदस्य थे। चुनांचे प्रिंसिपल के कमरे से बड़ी मेज़ निकलवा दी गई थी ताकि तेरह कुरसियाँ और एक छोटी-सी मेज उसमें आ सके। एक अतिरिक्त कुरसी उम्मीदवार के बैठने के लिए रखी गई थी जो उस छोटी-सी मेज के बिलकुल सामने थी। मेज़ के बीच में कमेटी के प्रेसीडेंट लाला हरीचन्द, दाहिनी ओर वाइस प्रेसीडेंट चौधरी नत्थूसिंह और बाईं ओर सेक्रेटरी श्री गनेशीलाल बैठे थे। सेक्रेटरी की बराबर में एक बिना हत्थे की कुरसी पर ज्वाइंट-सेक्रेटरी गुलजारीमल और वाइस-प्रेसीडेंट के बाजू में कमरे के बाहर पड़ा हुआ एक स्टूल उठाकर मास्टर उत्तमचन्द बैठे हुए थे।

लाला हरीचन्दजी की बुजुर्गी की कस्बे में भी इज्जत थी और कमेटी के मेम्बर भी उसकी इज्जत करते थे। इसलिए थोड़ी देर के लिए कमरे का वातावरण शान्त हो गया और लोग धीरे-धीरे बातें करने लगे। मगर जब फिर किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाए तो आवाजें ऊँची उठने लगीं। एक मेम्बर दूसरे से ऊँचा बोलकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करने लगा और इस प्रतिस्पर्धा ने फिर लाला हरीचन्द के कोमल हृदय को छू लिया। लालाजी बोले, "भय्यो, बड़े अफसोस का मुकाम है। अब लौ आप लोग किसी फैसले पर नहीं पहुंचे। इत्ती देर में तो सुनते हैं जरमनीवाले ने पूरा जापान जीत लिया था। तो भय्यो, मैं तो चला भट्टे पर। मेरी पचास हजार ईंटों का चक्कर पड़ा है। आप पंचों की जैसे मरजी हो मुझे वहीं खबर कर दीजो। मैं आप लोग्गों से बाहर थोड़े ही हूँ!

लालाजी का इंटों का खासा बड़ा कारोबार था। सारे इलाके के मकान उन्हीं के भट्ठे की ईंटों से बने थे। आजकल उनका बिजनेस शहर में ज़रूर मन्दा था, मगर आसपास के गाँवों में धड़ाधड़ पक्के मकान बनते जा रहे थे। लालाजी अपनी बात खत्म करते हुए उठने को हुए तो उनके साथ ही मास्टर उत्तमचन्द भी खड़े हुए। लालाजी को उनकी छड़ी देते हुए उत्तमचन्द दरवाजे की ओर बढ़ने ही वाले थे कि सेक्रेटरी गनेशीलाल अवसर का लाभ उठाकर बोले, "मामले को बिना चित्त-पट्ट करे हम आपको जाने नहीं देंगे, लालाजी ! हमारा भी बजार का दिन है आज। पचास कलदार का तो सैंधा नमक बिक गया होता अब लों। मगर मास्टरों के सलेक्शन का मामला अटका है तो इसका फैसला भी आप ही करेंगे।"

गनेशीलाल की पसरहट्टे की दुकान थी। लालाजी को उठते देख उन्हें सहसा दुकान का ध्यान आ गया और इस बात का भी कि आज बाजार का दिन है। और हालाँकि वह अपने छोटे भाई सोहन को, जो लेन-देन का काम करता था, दुकान पर छोड़ आए थे, पर उनके मन को तसल्ली नहीं हो रही थी। क्योंकि कागज पर अंगूठा लगवाकर रुपवा देना, और तराजू पर अँगूठा लगाकर सौदा देना, दो अलग चीजें होती हैं। और इस बारे में उन्हें अपने भाई की बुद्धि पर जरा भी भरोसा नहीं था। पर यहाँ भी उसी भाई की इज़्ज़त का सवाल था सो बीच में से कैसे उठते?

तभी वाइस-प्रेसीडेंट चौधरी नत्थूसिंह सिर की गोल टोपी सँभालते हुए बोल उठे, "हाँ, लालाजी, जब तो फैसला आपके ही हाथ में है।" फिर अपने साथियों की ओर देखकर वह बोले, "मैं अपनी तरफ से लालाजी को पूरे इख्तियार देता हूँ। जिसे चुन लेंगे मुझे मंजूर होगा।" अब कोई चारा ही न था। चूनाँचे तुरन्त ही सेक्रेटरी गनेशीलाल ने भी अपनी ओर से लालाजी को सारे अधिकार सौंप दिए। और लालाजी, जो इस स्थिति को टालने के लिए ही वहां से खिसक जाना चाहते थे, बुरी तरह फंस गए।

बात यह थी कि मास्टरों के चुनाव में लालाजी को छोड़कर शेष बारह मेम्बरों में से छह-छह के दल बन गए थे। एक दल गनेशीलाल के साथ था और दूसरा चौधरी नत्थूसिंह के। लालाजी ने आज तक किसी को नाराज करना सीखा ही न था। सदा ठकुर-सुहाती ही कही थी।
कुछ देर माथे पर हाथ रखकर सोचने के बाद लालाजी बोले, "अब देख्खो कित्ती सान्ती है। ऐसे में मन से विचार भी उपजता है।"

वास्तव में कमरे में निस्तब्धता छा गई थी। दोनों पक्षों के लोग अपनी-अपनी सफलता की आशा में मुँह बाए लालाजी की ओर ताक रहे थे। लालाजी पर सबको विश्वास था कि फैसला हमारे पक्ष में करेंगे। तभी लालाजी बोले, "जग-जाहिर बात है भय्यो कि मास्टरों के चुनाव में दुनिया के हर स्कूल में प्रिंसिपल जरूर रहवै है। मगर हमारे यहाँ कोई प्रिंसिपल नहीं है इसलिए अगर पंचों की राय हो तो उत्तमचन्द का वोट भी ले लिया जावै, और वो जिसकू कहै उसै ही हम रख लेवें।"

लालाजी ने अपनी समझ से अपने बच निकलने की पूरी तैयारी की थी। पर दोनों पक्ष आज जैसे लालाजी को अपने प्रति वफादारी को तौल लेना चाहते थे। अतः कोई राजी नहीं हुआ। गनेशीलाल ने तो यहाँ तक कहा कि उत्तमचन्द लौंडा है। चौधरी नत्थूसिंह ने कहा कि लालाजी के होते हुए उससे राय मांगना निहायत बेवकूफ़ी है।

अपना नाम सुनते ही उत्तमचन्द कुरसी से कुछ आगे को झुक आए मगर सेक्रेटरी और वाइस-प्रेसीडेंट की अपने सम्बन्ध में ऐसी राय सुनकर उन्होंने टेढ़ी करते हुए अपनी गर्दन झुकाई और मुख पर सहमति-सूचक सलज्ज मुस्कान बिखेरकर असमर्थता में हाथ जोड़ दिए।

लालाजी की व्यावहारिक बुद्धि को यह समझने में देर नहीं लगी कि अब उनकी परीक्षा का समय आ गया है। अतः उन्होंने अपना कर्तव्य निश्चित किया और बोले, "तो भय्यो, बखत कू क्यूँ बरबाद करा जावै। उधर मास्टर लोग भी सुबह से इन्तजारी में बैट्ठे हैं। अगर पंच बुरा न मान्नें तो दोन्नों तरफ का एक-एक आदमी रुक जाये, और बाक्की पंच लोग दूसरे कमरे में चले जावें।"

बात माकूल थी। किसी को एतराज नहीं हुआ। सारे मेम्बर खुद ही कमरे से उठकर चले गए। केवल गनेशीलाल और चौधरी नत्थूसिंह ही वहाँ रह गए। लालाजी ने कहा, "हाँ, भय्या गनेसीलाल, अब कहो क्या बात है ?"

गनेशीलाल खखारकर गला साफ़ करते हुए बोले, "लालाजी, आप तो जान्नै ही हैं। दसियों साल्लों से कमेटी का मिम्बर हूँ। आज लौं मैंन्ने सदा न्याय की बात करी है। अब यही लो। आपने हिन्दी के प्रोफेसरों में पाठक को चुना। मैंन्ने चूं-चकर करी ? भगवान जान्नै है मेरे साले की चिट्ठी धरी है मेरी जेब में। उनने रोहतगी के लियो लिक्खा था। पर मैंन्ने करा आपका विरोध ?" और इतना कहकर गनेशीलाल जेब से चिट्ठी निकालने लगे।

किन्तु उनसे पहले ही चौधरी नत्थूसिंह ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकालकर लालाजी के सामने धर दी। बोले, "चिट्ठी क्या मेरे पास नहीं आई ! वह जो वर्मा था, मेरे बड़े लड़के की बहू का सगा मुमेरा भाई था। बल्कि मेरे यहाँ ही ठहरा था। कित्ती हिजो होगी मेरी, लड़के की ससुराल में। पर मैंन्ने ही क्या कहा ? कायदे की बात पै सबको झुकना पड़ता है।"

लालाजी को इन चिट्ठियों का पता पहले ही लग चुका था। उनके पास तो इस मरतबा कोई चिट्टी नहीं आई, पर पाठक के लिए डिप्टी साहब का जबानी सन्देश उन्हें जरूर मिला था। पाठक डिप्टी साहब का भतीजा था, और डिप्टी साहब की अदालत में लालाजी के भट्टे से सम्बन्धित मामले रोजाना जाते ही रहते थे इसलिए जान-पहचान भी गाढ़ी थी। अतः उनका काम करना ही था। जब उन्हें उत्तमचन्द ने बताया कि गनेशीलाल और चौधरी नत्थूसिंह के पास भी हिन्दी के प्रोफेसर के लिए उनकी रिश्तेदारी से चिट्ठियाँ आई हैं तो लालाजी ने उत्तमचन्द की ही मदद लेकर सात और मेम्बरों को गाँठना शुरू किया। और भगवान की दया से बात बन गई। डिप्टी साहब की अदालत में किसे काम नहीं पड़ता ? इसलिए पाठक का नाम आते ही सात हाथ एकदम उठ गए और आठवाँ हाथ लालाजी का। हिन्दी के लेक्चरर के लिए निर्विरोध चुनाव हो गया पाठक का।

अतः दोनों चिट्ठियाँ बिना पढ़े ही लौटाते हुए लालाजी बोले, "चिट्ठी-पत्री तो आवै ही हैं, भय्या। पर हमें तो न्याय करना है। हमें तो ऐसा आदमी लेना है जो हमारे बच्चों कू चार अच्छी बातें सिखावै और आदमी बनावै। अब पाठक को ही लो। मेरा उससे क्या वास्ता, क्या रिस्ता ? वो ब्राह्मन, मैं बनिया। पर मुझे उसकी सिच्छा सुद्ध लगी। पंचों की राय मिली और हमने उसे ले लिया।"

गनेशीलाल और चौधरी नत्थूसिंह दोनों पाठक की शिक्षा की हकीकत समझते थे। पर मौक़ा कुछ कहने का नहीं था। अब तो झगड़ा असिस्टेंट टीचर्स के चुनाव का था। गनेशीलाल ने बात शुरू की। बोले, "बीती ताही बिसार दे-ऐसा बुजुर्गों ने कहा है। परन्तु लालाजी, न्याय के विरुद्ध जो बात होवै, सो मुझसे बरदास्त नहीं होती। अब इनसे पुच्छो। चौधरी साहब खामखाँ उस मुसलमान्न लौंडे को मास्टर रखना चाहें हैं। मैं तो कहूँ कि हिन्दू कॉलिज नाम रखकै अगर आप इसमें मुसलमान्नों कू भरै हैं तो कहाँ रयी आपकी मरयादा, कहाँ रया धरम ? क्या सारे हिन्दू लौंडे मर गए?"

गनेशीलाल ने अपने हिसाब से बात को सैद्धान्तिक मोड़ देकर धर्म के नुक्ते पर लाकर छोड़ दिया। वह जानते थे कि यह लालाजी का मर्म स्थान है। फिर बोले, "वह सोत्ती बच्चा है, बाह्मन है, पास का है। दस-बीस रुपए कम पर तैयार हो जावेगा। मैंने इनसे कया कि उस मुसलमान्न से तो वह बाह्मन का लौंडा ही लाख जगह अच्छा है। पर इनकी समझ में काए कू आवै।"
लालाजी बोले, "बोल्लो भय्या नत्थूसिंह, क्या कहो हो?"
नत्थूसिंह बोले, "लालाजी, बात हिन्दू-मुसलमान की नहीं है। बात दरअसल ये है कि इनके छोटे भाई सोहन के पास आज ही रामचन्दर वकील साहब का लम्बा-सा तार आया है बिजनौर से। इसीलिए ये सोती को लेना चाह रहे हैं।"
फिर अगली बात सोचने का अवसर ढूँढ़ते हुए बोले, "क्यों गनेशीलाल ! बोलो, क्या मैंने कुछ गलत कहा?"

गनेशीलाल फौरन सिद्धान्त की पटरी से उतर गए; बोले, "मैं ये कब कहूँ तार नई आया । सो मेरा सोत्ती के लिए कहना ठीक भी है। पर तुम्हारे पास तो कोई तार भी नई आया, फिर तुम क्यों उस मुसलमान लौंडे के पीछे पड़े हो? न सूरत, न सकल, न अकल। कम-से-कम सोत्ती..."
और सोती की प्रशंसा का वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि लालाजी ने बात काटकर कहा, "मुझे कुछ खियाल नहीं आ रया, भैय्या। ये मुसलमान लौंडा कौन-सा था?"
"अजी वही इकरार या इसरार, क्या नाम है उसका ? वही जो भंडेलोबाला पजाम्मा पहने था।" गनेशीलाल ने विरक्ति से कहा।

चौधरी नत्थूसिंह को अपना पाला कमजोर पड़ता दिखाई दिया तो बोले, "कोतवाल साहब का भानजा है, लालाजी। आपको ख्याल नहीं रहा। जरा फिर से बुलाकर देखिए, तबियत खुश हो जाएगी। बड़ा होनहार लड़का है। चाल-चलन का बड़ा सच्चा है।"

कोई और दिन होता तो लालाजी कोतवाल के भानजे को ज़रूर ले लेते। पर आज वह डिप्टी साहब के भतीजे को ले चुके थे। थानेदार की क्या औकात है डिप्टी के सामने ! दूसरे, उन्हें यह भी लगा कि कोतवाल साहब ने खुद उनसे नहीं कहा। फिर वह चौधरी साहब को नाराज नहीं करना चाहते थे क्योंकि उनके और उनके डॉक्टर लड़के के हाथ में काफी वोट थे और लालाजी 'म्युनिसिपल्टी' का इलेक्शन लड़ने का पक्का निश्चय कर चुके थे।

लालाजी बड़े असमंजस में पड़े। दोनों अपने अपने पाले पर दृढ़ हैं। कोई हिलने को तैयार नहीं। तभी उन्हें ध्यान आया कि मावले के ठाकुर साहब से उन्होंने वादा किया था। कहीं उनके लड़के को लेकर भी तो इनमें मतभेद नहीं हो गया है। बोले, "अच्छा भय्या, जरा ये तो बताओ, दूसरा मास्टर कौन-सा पक्का हुआ?"

लालाजी के इस प्रश्न पर चौधरी नत्थूसिंह और गनेशीलाल दोनों ही एक साथ चौंक पड़े। गनेशीलाल का सबसे छोटा भाई इंडसाल का काम करता था और उसको सबसे ज़्यादा माल मावले के ठाकुर साहब के ही गाँव से मिलता था। गनेशीलाल ने सोचा, उस पोस्ट के लिए राजेश्वर की बात तो पहले ही पक्की हो चुकी है। फिर उसे दुबारा उठाकर लाला हरीचन्द किसी और को तो नहीं लेना चाह रहे ? लगभग इसी तरह की शंका चौधरी नत्थूसिंह के मन में भी आई जिनके बड़े लड़के की नई-नई होम्योपेथी की प्रेक्टिस को मावले के ठाकुर साहब द्वारा काफी मरीज मिल रहे थे। अतः फौरन बोले, "उसके लिए तो हम सब एक राय होकर राजेश्वर ठाकुर को पहले ही चुन चुके हैं। बड़ा अच्छा लड़का है।"

गनेशीलाल ने भी ताईद की तो लालाजी फ़ौरन बोले, "अरे हाँ, वो लौंडा। अच्छा है, बहुत अच्छा है।" फिर जैसे कुछ निर्णय की मुद्रा में आते हुए बोले, "हाँ तो भय्या गनेसीलाल, दूसरे मास्टर के लियो तुम सोत्ती का नाम ले रये हो और भय्या नत्थूसिंह तुम उसका, क्या नाम है, कोतवाल साहब के भानजे का? यही न?"
“जी हाँ," दोनों ने लगभग एक साथ सहमति दी। राजेश्वर ठाकुर के चुने जाने पर दोनों ने ही चैन की एक लम्बी सांस ली थी।
"तो भय्या, मेरी बात मानोगे ? लालाजी ने पूछा। "जी," दोनों ने उत्तर दिया।

"तो भय्या, तम्हारा वकील नाराज होवे है तो होने दो।" लालाजी ने गनेशीलाल की ओर मुख़ातिब होकर कहा और फिर चौधरी नत्थूसिंह की ओर देखकर बोले, "तुम भी भय्या कोतवाल को नाराज हो जाने दो। ज्यादा-से-ज्यादा चार-छह महीने का महमान ही तो है। जल्दी चाहोगे तो डिप्टी साहब से बात कर लेंगे। पर धरम की मरयादा, चाहे प्रान भले ही चले जावे, रहनी चाहिए। क्यों, क्या कहो हो ?"

दोनों कुछ सोच में पड़ गए थे। लालाजी ने मौन को स्वीकृति मानकर आगे कहा, “मुझे तो वह गुरुकुल का पढ़ा हुआ लौंडा भावै है। कैसी पवित्र आत्मा है उसकी। एकदम सच्चा और सुद्ध। फिर सबसे ज्यादा नम्बर भी उसी के हैं। और संस्कीरत का विद्वान। पूरा हिन्दू। बिलकुल वैसा ही हिन्दू जैसा भय्या गनेसीलाल चावै हैं। क्यों भय्या नत्थूसिंह, अब तुम भी कुछ अपने विचार सामने रक्खो ना !"
नत्थूसिंह के पास रखने को कोई विचार था ही नहीं। बोले, "ठीक है, मगर कुछ जंचता नहीं है।"

लालाजी ने भाँप लिया कि उनके निर्णय से कोई नाराज नहीं हुआ, तो वह फिर गनेशीलाल की और घूमे। गनेशीलाल ने कहा, "मेरे विचार से तो उसकू एक बार फिर से बुलाके इंटरव्यू कर लें।"

लालाजी को विश्वास हो गया कि आधी बाजी जीत ली है। इसीलिए तुरन्त गनेशीलाल की 'हाँ' में 'हाँ' मिलाकर उन्होंने कहा, "हाँ भय्या ! बच्चों की बात आजकल कू जनता को सिकायत होवै, क्या फायदा ? पहले से ही ठोक बजाकर देख लेना अच्छा है आदमी कू।" फिर घंटी बजाकर उन्होंने उत्तमचन्द को बुलाया, और उसे सत्यव्रत को बुलाने की आज्ञा दी। और मन-ही-मन समझौते के इस बिन्दु पर एकमत होते हुए तीनों आदमी इंटरव्यू लेने की मुद्रा में बैठ गए। चौधरी नत्थूसिंह ने कोट के बटन खोलते हुए अपनी गोल टोपी संभाली। गनेशीलाल ने हल्दी से रंगी अपनी धोती की पूंचड़ को लाँग में ठूँस लिया। लालाजी बोले, "इत्ती छोटी-छोटी बातों पर आपस में मनमुटाव नहीं करना चाहिए। मैं तो कहूँ हूँ इनसाप के लिए लोगों ने किते-किते त्याग कर दिए। अब यही लो, पाठक के लिए आप दोनों ने अपने अपने रिस्तेदारों को नाराज कर दिया तो भला वकील या कोतवाल किस खेत की मूली हैं?"

और इतना कहकर लालाजी अपनी बात का असर देखने की कोशिश करने लगे उन दोनों पर। पता नहीं लालाजी की बात का असर था कि उन दोनों की अपनी मज़बूरी का-मगर दोनों ही सहमति की मुद्रा में दिखाई दे रहे थे।
तभी मास्टर उत्तमचन्द, सत्यव्रत के साथ कमरे में दाखिल हुए।

"बैट्ठो भय्या ! लालाजी ने बड़े प्रेम से सत्यव्रत को सम्बोधित करके कहा और चौधरी नत्थूसिंह और गनेशीलाल की ओर बारी-बारी से घूमकर बोले, "हाँ भय्या, पूछ लो जो कुछ पूछना होवै।"

पहले गनेशीलाल को ही पूछना पड़ा, क्योंकि उन्होंने ही सत्यव्रत के दुवारा इंटरव्यू का आग्रह किया था। सहसा कुछ सूझ न पड़ा तो सत्यव्रत की ओर मुंह करके,भाषा में जरा साहित्यिकता लाते हुए उन्होंने पूछा, "सुबह कै बजे उठते हो जी ?"
"चार बजे।" सत्यव्रत ने उत्तर दिया।
"फिर क्या करते हो?" "उठकर जंगल आदि के नित्य कर्म से निवृत्त होने के लिए एवं वायु-सेवन के लिए जाता हूँ और वहीं थोड़ा व्यायाम भी करता हूँ। घर आने पर सन्ध्या करता हूँ और रविवार के दिन यज्ञ। तदुपरान्त थोड़ा स्वाध्याय और घर का काम-काज देखता हूँ।"
"प्याज खाते हो?" "जी नहीं। प्याज, लहसुन या इस तरह की अन्य वस्तुएँ हमारे घर नहीं खाई जातीं।"
"ठीक है।" गनेशीलाल सन्तुष्ट होकर लालाजी की ओर देखने लगे। आगे पूछने के लिए उनके पास कोई प्रश्न न था।

लालाजी ने अब चौधरी नत्थूसिंह की ओर देखा। बाजी हाथ से जाते देख नत्थूसिंह ने सोचा, क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिए जाएँ कुछ प्रश्न पूछकर। कम-से-कम कहने को तो हो जाएगा कि इस आदमी को हमने योग्यता के आधार पर लिया है, और न्याय किया है। रही कोतवाल साहब की बात, उन्हें समझा दूंगा कि गनेशीलाल की बदमाशी के कारण ही असरार नहीं लिया गया। और यह सोचकर ही उनका मुँह प्रसन्नता से चमक उठा कि कोतवाल गनेशीलाल को कहाँ गच्चा देगा ! फिर गम्भीर होकर चौधरी साहब ने सत्यव्रत से पूछा, "एक अच्छे विद्यार्थी में क्या-क्या खूबियों होनी चाहिए, बता सकते हो?"

"चरित्र और अनुशासन।" सत्यव्रत ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया और फिर जैसे कुछ सोचकर विस्तार से समझाते हुए बोला, “चरित्र में सत्यप्रियता, बड़ों की आज्ञा का पालन करना, दया और प्रेम आदि सारी बातें सम्मिलित हैं। और अनुशासन में अध्ययन..."

"शाबास !" चौधरी साहब गद्गद होकर बोले, "आज विद्यार्थियों में आपस में प्रेम नहीं रहा है। मैं चाहता हूँ कि हमारे स्कूल के विद्यार्थी भाई-भाई की तरह आपस में प्रेम करें। तुम्हारा क्या ख़याल है ?"

“आपने बिलकुल उचित कहा। सत्यव्रत उनकी नाटकीयता से प्रभावित होकर बोला, "छात्रों में परस्पर प्रेम तो होना ही चाहिए। प्राचीन आश्रम-शिक्षा-पद्धति की यही सबसे बड़ी विशेषता थी जो आज लुप्त होती जा रही है। सत्यव्रत ने निश्छल भाव से अपने विचारों को रख दिया।
"बस, मुझे और कुछ नहीं पूछना।" चौधरी नत्थूसिंह ने मुख पर पूर्ण सन्तोष का भाव व्यक्त करते हुए लालाजी से कहा।

लालाजी का यह तीर अकस्मात् ही निशाने पर जा लगा था। अतः उन्हें जल्दी न थी। उन्होंने एक पल रुककर धीरे से कहा, "पंचों का निरणय सर-माथे।" फिर सत्यव्रत की ओर देखकर बोले, "तो भय्या सत्तेबरत, तुम समझो कि हमने तुम्हें लेई लिया। पर भय्या तुम अभी हो बच्चे। जानते हो सिच्छक का कार्य कित्ती जिम्मेवारी का होवे है।"

सत्यव्रत ने सिर झुका लिया कृतज्ञता से। शिक्षा-दान का जो पुनीत संकल्प उसके मन में था, आदर्श शिक्षा प्रणाली की जो रूपरेखा उसने बनाई थी और विद्यार्थियों को नैतिक अनुशासन के जिस साँचे में ढालने की उसने कल्पना की थी-वे सारे-के-सारे स्वप्न उसे साकार होते दिखाई देने लगे। अन्य उम्मीदवारों के बीच बैठकर उसने इस कॉलेज के बारे में कोई अच्छी धारणा नहीं बनाई थी, पर अब अचानक ही वह सारी भूमिका बदल गई। उत्तमचन्द जी का सिगरेट की निन्दा करना और मैनेजिंग कमेटी के इन तीन प्रमुख सदस्यों का चरित्र-निर्माण से सम्बन्धित प्रत्येक छोटी-छोटी बात पर ऐसे प्रश्न करना क्या इस बात का प्रमाण नहीं कि ये लोग साधु-प्रकृति के हैं और अपनी संस्था को आदर्श बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं? सत्यव्रत को प्रसन्नता हार्दिक हुई।
लालाजी फिर बोले, "क्यों भय्या ! तुम्हारे विचार में अच्छे सिच्छक में क्या गुण होने चाहिएँ? और तुमने सिच्छक होने का ही निश्चय क्यों करा?"

यह प्रश्न बिलकुल सत्यव्रत के मन का था। आवेदन-पत्र भेजते समय उसने क्या-क्या कल्पनाएँ नहीं की थीं! गुरुकुल की शिक्षा अधूरी न रह जाती तो वह समस्त भारत में शिक्षा और संस्कृत का प्रचार करता हुआ घूमता। किन्तु पिता की असमय मृत्यु और माँ की बीमारी के कारण उसे अपने छोटे-से गाँव में लौट आना पड़ा। लड़कपन में जब गुरुकुल गया था तो सत्यव्रत मुश्किल से सात वर्ष का था। बीच-बीच में वह थोड़े दिनों के लिए गांव आता भी रहा, किन्तु अब हमेशा के लिए लौट आया तो उसे बड़ा विषाक्त लगा गाँव का वातावरण । उसका दम घुटने लगा वहाँ। फिर भी उसका दोष उसने किसी को नहीं दिया बल्कि उन परिस्थितियों में भी सत्यव्रत ने अध्ययन जारी रखा। और उसने निश्चय किया कि घर पर ही तैयारी करके बी.ए. की परीक्षा दूँगा। खेती का काम छोड़कर अध्यापन का कार्य करूंगा। मेरे भीतर ज्ञान की छोटी-सी ज्योति ईश्वर ने जलाई है, उसका प्रकाश जब तक जन-जन में नहीं फैल जाएगा तब तक में गुरु-ऋण से मुक्त नहीं होऊँगा। वह अक्सर सोचा करता, 'अहा ! कितना पवित्र कार्य है शिक्षक का, ज्ञान-दान ! दूसरों के जीवन का निर्माण करना, बच्चों को पढ़ाना, अर्थात् आकारहीन पत्थर के टुकड़ों को तराशकर उन्हें एक कलात्मक आकृति प्रदान करना। ऐसी शिलाएँ बनाना जिन पर भावी पीढ़ी की बुनियाद रखी जा सके।

सत्यव्रत ने अक्सर इन्हीं प्रश्नों पर गम्भीरता से सोचा था। अतः प्रश्न का उत्तर देने में कोई असुविधा न हुई उसे। तीनों सदस्य भी पूरी तरह सन्तुष्ट हो गए। लाला हरीचन्द को लगा कि चलो, दोनों में से कोई भी नाराज नहीं हुआ और एक सच्चे हिन्दू को चुनकर उन्होंने धर्म-सबाब का काम किया। वकील या कोतवाल उन्हें क्या देते? कोतवाल तो उनके पास तक नहीं आया !

चौधरी नत्थूसिंह को खुशी थी इस बात की कि अब कोतवाल गनेशीलाला से कांटे ज़रूर निकालेगा। असरार नहीं लिया गया तो श्रोत्रिय भी नहीं लिया जा सका। दोनों में से जीत किसी की नहीं हुई।

गनेशीलाल भी बिलकुल वही सोच रहे थे जो चौधरी नत्थूसिंह ने सोचा था। फर्क इतना था कि नत्थूसिंह की कल्पना में कोतवाल गनेशीलाल को सता रहा था और गनेशीलाल की कल्पना में नत्थूसिंह को।

फिर अचानक अपने-अपने काम का ध्यान आया तो सबसे पहले गनेशीलाल वहाँ से उठे। उनके साथ ही चौधरी नत्थूसिंह भी उठ खड़े हुए। अब सत्यव्रत का वहाँ बैठना फ़िजूल था। हाथ जोड़ते हुए वह उठा तो लालाजी भी छड़ी सँभाले हुए साथ ही उठ लिए और चलते हुए सत्यव्रत के कन्धे पर हाथ रखकर सनेह से कहा,
"तुम कल उत्तमचन्द से मिलकर अपनी नियुक्ति का पत्र अवश्य ले लेना, भय्या !"

सत्यव्रत का मस्तक स्वयमेव श्रद्धा से नत हो गया। उसे लालाजी में वह गंगा-तटवासी स्वामीजी दिखाई दिए जो 'श' को 'स' बोला करते थे मगर जिनकी दृष्टि भविष्य में झाँकती थी। उसने अपने इंटरव्यू के विषय में सोचा तो लगा कि यद्यपि गनेशीलाल और चौधरी साहब के प्रश्न भी चारित्रिक दृष्टि से बड़े महत्त्व के थे, पर लालाजी के प्रश्नों जैसी गहराई उनमें न थी।