व्यवहारिक ज्ञान (लघुकथा) : अनुराधा प्रियदर्शिनी

सौम्या चौंक गई थी जब उसकी ननद ने अपनी बेटी रूपा से कहा, “एक काम करो ये जो मामी ने तुम्हारे लिए झुमका लाया है उसे यहीं रख देना ससुराल ले जाने की जरूरत नहीं है। वहाँ तुम्हारी सास तुमसे लेकर तुम्हारी ननदों को दे सकती हैं। जब यहाँ दुबारा आना तब ले जाना।”

अभी कुछ दिन पहले की तो बात है सुजाता अक्सर सौम्या से कुछ न कुछ रस्मों के बहाने गहने कपड़े पैसे माँगती रहती थी। बड़ी ननद हैं तो वो भी सारी बातें मान लेती है अब घर में सासू माँ के न होने पर सारे फर्ज उसे ही निभाने थे।

आज रूपा को दिए जा रहे ज्ञान को सुन रही थी और मन ही मन सोच रही थी दीदी आप कौन हैं मेरी जो कभी मेरे कंगन, कभी चेन और कहीं अंगूठी पाकर बहुत प्रसन्न होती हैं। आज पांच वर्ष हो गए और सौम्या ने उन्हें वही सब गहने दिया था जो उसे शादी में मिले थे।

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