वो बंद अलमारी : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

शहर के उस सबसे पुराने मोहल्ले की आखिरी गली में, जहाँ सूरज की रोशनी भी पड़ोसियों से इजाजत लेकर दाखिल होती थी, दीनदयाल जी का पुश्तैनी मकान खड़ा था। घर के भीतर एक गूँजती हुई खामोशी थी, जिसे मोहल्ले के लोग 'मर्यादा' कहते थे। दीनदयाल जी ने अपने पैंसठ सालों में कभी पलकें गीली नहीं कीं। उनके लिए पत्थर होना ही पुरुषार्थ का पर्याय था। उनके घर में भावनाओं का प्रवेश वैसे ही वर्जित था जैसे किसी मंदिर में चप्पल-जूतों का। उनका बेटा, जो अब खुद एक पिता बन चुका था, बचपन में जब घुटने छिलने पर सिसकता, तो दीनदयाल जी की कड़कती आवाज़ गूँजती, "भीतर ले जाओ इसे, मर्द की आँख का पानी खानदान की साख बहा देता है।" वह घर एक ऐसा अजायबघर बन गया था जहाँ संवेदनाएं कांच के बक्सों में बंद थीं, जिन पर धूल जमी थी और चाबी कहीं खो गई थी।

रिश्तों की उस सूखी ज़मीन पर तंज का नमक छिड़कना दीनदयाल जी की पुरानी आदत थी। मोहल्ले में जब कोई नौजवान अपनी प्रेमिका के विरह में या किसी शोक सभा में सुबकता, तो दीनदयाल जी अपनी लाठी ठोकते हुए कहते, "आजकल की नस्ल के नल की टोटी ढीली हो गई है, ज़रा सा दबाव पड़ा नहीं कि रिसने लगती है। घर की दीवारों पर लगी पूर्वजों की तस्वीरें भी शायद अपनी कठोरता पर गर्व करती होंगी कि उन्होंने सदियों से इस वंश की सूखी आँखों की परंपरा को सहेज कर रखा है।

एक शाम अचानक घर के आंगन में चीख-पुकार मच गई। दीनदयाल जी के इकलौते पोते की देह ठंडी पड़ चुकी थी। पूरा मोहल्ला उमड़ पड़ा। स्त्रियाँ छाती पीट रही थीं, बेटा बदहवास फर्श पर गिर गया था। हर आँख से सावन बरस रहा था, पर दीनदयाल जी पत्थर की मूर्ति बने बरामदे में बैठे थे। उनकी आँखों में वही चिर-परिचित सूखापन था। लोग कानाफूसी करने लगे कि क्या यह आदमी वाकई इंसान है या मिट्टी का ढेला? क्या इसकी धमनियों में खून नहीं, पानी दौड़ता है? श्मशान की ओर बढ़ते कदमों के बीच भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वे उस दुखद नाटक के सबसे तटस्थ दर्शक थे। उनकी खामोशी एक भयावह रहस्य की तरह गहरा रही थी। अंत्येष्टि के समय जब अग्नि की लपटें आसमान चूमने लगीं, तब भी वे निर्विकार खड़े रहे, जैसे किसी लंबी यात्रा की थकान उतार रहे हों।

घर लौटने के बाद जब सन्नाटा पूरी तरह पसर गया, तब दीनदयाल जी अपने उस बंद कमरे में गए जहाँ उनके सिवा किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने भीतर से सांकल चढ़ाई। अलमारी के सबसे पीछे छिपे एक पुराने लोहे के संदूक को निकाला। कमरे के बाहर सिसकियों की आवाज़ें अब भी आ रही थीं। उन्होंने कांपते हाथों से संदूक खोला। भीतर कोई गहना या वसीयत नहीं थी, बल्कि कांच की सैकड़ों छोटी-छोटी शीशियां थीं, जिन पर तारीखें लिखी थीं। उन्होंने आज की तारीख वाली एक खाली शीशी उठाई और उसे अपनी आँखों के नीचे सटा दिया। अचानक, जैसे कोई बांध टूट गया हो। उनकी आँखों से रक्त-रंजित जल की बूंदें नहीं, बल्कि पिघला हुआ कांच गिरने लगा। वे चीख नहीं रहे थे, बस वो शीशी भर रहे थे। संदूक के भीतर एक नोट लिखा था— "इस दुनिया में मर्दों को रोना मना है, इसलिए मैं अपने हिस्से का हर आंसू इस संदूक में जमा करता रहा ताकि घर की साख बची रहे।" जैसे ही आखिरी बूंद शीशी में गिरी, दीनदयाल जी का पत्थर जैसा शरीर अचानक रेत की तरह बिखर गया। कमरे के बाहर लोग समझ रहे थे कि 'मर्द' अब भी अडिग है, जबकि भीतर एक इंसान अपनी उम्र भर की सहेज कर रखी गई तरलता के बोझ तले ढह चुका था। मोहल्ले ने मर्यादा जीत ली थी, पर एक रूह हार गई थी।