वो सीट जहाँ तुम बैठते थे : किरण विश्नोई
Vo seat jahan tum baithte the : Kiran Vishnoi

मुंबई की सुबह हमेशा एक जैसी होती है —
शोर, जल्दी, और ट्रेन की पटरियों पर दौड़ते सपने।
नंदिनी भी उन्हीं में से एक थी — ऑफिस जाती, मोबाइल में गाने सुनती,
और रोज़ 08:42 की लोकल ट्रेन पकड़ती।

एक दिन उसकी नज़र उस पर पड़ी —
वो शांत-सा लड़का, हाथ में किताब, और आँखों में अजीब सुकून।
ट्रेन चल पड़ी, लेकिन नंदिनी के दिल में कुछ रुक गया था।

अब हर सुबह वही सिलसिला।
नंदिनी उस डिब्बे में सिर्फ़ इसलिए चढ़ती, जहाँ वो बैठता था।
वो भी मुस्कुराकर “गुड मॉर्निंग” कह देता।
पहले एक मुस्कान, फिर एक “हाय”, और फिर रोज़ की बातें —
ट्रैफ़िक, बारिश, ऑफिस, ज़िंदगी।

वो उसका नाम जान गई — ललित
एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जो कभी देर नहीं करता था।

दिन बीतते गए, और उनकी बातें बढ़ती गईं।
कभी चाय का कप साझा, कभी फोन नंबर का बहाना।
नंदिनी को अब ट्रेन की देरी बुरी नहीं लगती थी —
क्योंकि देरी का मतलब था, ललित के साथ ज़्यादा समय।

कभी-कभी वो सोचती — “क्या ये सिर्फ़ ट्रेन का रिश्ता है, या कुछ ज़्यादा?”

एक सुबह मुंबई की बारिश जैसे आसमान का मन भीग गया हो।
ट्रेन रुकी हुई थी, और दोनों खिड़की के पास बैठे थे।
ललित ने पूछा —
“कभी सोचा है, अगर ये ट्रेन यहीं रुक जाए तो?”
नंदिनी मुस्कुराई —
“तो शायद हम दोनों किसी स्टेशन के नाम से ज़्यादा याद रह जाएँ।”

उनकी आँखों में वो पहला अनकहा इकरार था।

दो हफ़्ते बाद ललित ने बताया कि उसका ट्रांसफ़र पुणे हो गया है।
नंदिनी चुप रही, सिर्फ़ इतना कहा —
“ट्रेन की अगली बोगी में भीड़ ज़्यादा है, शायद मैं अब वहीं बैठा करूँ।”

उस दिन के बाद दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा।
बस आख़िरी दिन ललित ने एक काग़ज़ नंदिनी के हाथ में रख दिया —
“कभी अगर ट्रेन छूट जाए, तो यह पढ़ लेना।”

उस दिन नंदिनी ने काग़ज़ नहीं खोला। सोचा — “कल पढ़ लूँगी।”
पर अगली सुबह ललित नहीं आया। और न ही अगले दिन।

तीसरे दिन उसने ख़त खोला —
“नंदिनी,
तुम्हारे साथ बिताए वो कुछ मिनट मेरे दिन के सबसे शांत पल थे।
अगर ज़िंदगी ने मौका दिया तो फिर किसी प्लेटफ़ॉर्म पर ज़रूर मिलेंगे।”

अब वो रोज़ उसी सीट पर बैठती, जहाँ कभी ललित बैठता था।
ट्रेन चलती रही, लोग बदलते रहे,
पर वो सीट उसके लिए अब भी आरक्षित थी —
“वो सीट जहाँ तुम बैठते थे।”

तीन साल बीत गए। नंदिनी अब एक नई कंपनी में थी, ट्रेन की समय-सारणी बदल गई थी।
एक दिन प्लेटफ़ॉर्म पर अचानक उसने वही किताब देखी —
“Love in the Time of Rain”
पन्नों में एक नोट था —
“कुछ अधूरे सफ़र भी यादों में मुकम्मल हो जाते हैं। – ललित "

उस दिन नंदिनी ने ट्रेन नहीं पकड़ी। वो प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी रही, सिर्फ़ रेल की आवाज़ सुनती रही।
पहली बार उसने महसूस किया —
ट्रेनें सिर्फ़ यात्रियों को नहीं, यादों को भी लेकर जाती हैं।

आज भी जब लोकल ट्रेन 08:42 पर निकलती है,
तो कोई नंदिनी जैसी लड़की खिड़की के पास बैठी होती है,
और किसी ललित जैसी आत्मा उसे देख रही होती है।

कहानी खत्म नहीं हुई — बस अब वो समय और दूरी के पार चल रही है।

“कुछ प्रेम कहानियाँ रेल की पटरी जैसी होती हैं —
साथ-साथ चलती हैं, पर कभी मिलती नहीं…”