विश्वास (लघुकथा) : अनुराधा प्रियदर्शिनी

सुधा आलमारी और बॉक्स की सारी सामान फैला कर जाने क्या ढूंढ रही थी। बहुत बेचैन और परेशान सी बदहवास बस कभी यहां तो कहीं वहाँ सामान को फैलाए जा रही थी।

क्या ढूंढ रही हैं मम्मी? चारू ने पूछा।

वो जो रवि के शादी में चाँदी का पान सुपारी और कलश तिलक पर चढ़ा था वो नहीं दिख रहा आखिर कहाँ गया। यहीं तो रखा था अब मिल नहीं रहा शायद किसी ने चुरा लिया है। चंदा के शादी के लिए सामान भी यहीं इकठ्ठा करके दिया था। क्या पता वहाँ चला गया हो।

तुम्हारी बुआ तो वैसे भी नहीं बताएँगी।

चारू सोच रही थी आज बुआ के लिए मम्मी बोली यही है कल ऐसा ही मेरे साथ होगा।

उदास सी बोली

माँ एक बार भाभी से पूछ लीजिए शायद उन्होंने रख दिया होगा।

ऐसे कैसे पूछ ले वो मैंने रखा था कहेगी सासू माँ चोरी लगा रही हैं

तभी फोन की घंटी बजती नीरू का फोन था चारू ने कहा भाभी हैं आप पूछ लीजिए उनसे एक बार।

ठीक है फोन लाओ।

नीरू वो जो तुम्हारे शादी का पान सुपारी और कलश था वो कहाँ है तुम्हें पता है।

हाँ मम्मी जी मैंने देखा था आपने बक्से में रखा था। वो सब मेरा था मैंने रख लिया।

चारू सुधा का मुँह देखती रह गई थी।

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