पिंटू एक सीधा-साधा लड़का था, जब तक कि उसके घर में 'स्मार्ट टीवी' नहीं आया था। पहले विज्ञापन ने उसे बताया कि उसकी मुस्कान 'पीली' है, इसलिए उसे लड़की नहीं मिलेगी। पिंटू ने तीन तरह के 'कोयले वाले पेस्ट' खरीदे। दूसरे विज्ञापन ने उसे यकीन दिलाया कि उसका शरीर 'मर्दाना' नहीं है, क्योंकि वह एक खास ब्रांड का 'एनर्जी ड्रिंक' नहीं पीता। पिंटू ने डिब्बे के डिब्बे खाली कर दिए, पर एनर्जी के नाम पर उसे केवल 'शुगर' मिली। फिर एक 'फेयरनेस क्रीम' आई, जिसने दावा किया कि सफलता का रास्ता 'मेलेनिन' को मारने से होकर गुजरता है। पिंटू ने चेहरे पर इतना लेप लगाया कि उसकी अपनी माँ उसे पहचान नहीं पाई। विज्ञापनदाता जानते थे कि पिंटू को सामान नहीं, बल्कि 'हीनभावना' बेचनी है। उन्होंने उसे बताया कि उसके जूतों की आवाज 'सस्तेपन' का अहसास कराती है और उसके फोन का कैमरा 'गिरे हुए स्टेटस' का प्रतीक है। पिंटू ने अपनी मेहनत की सारी कमाई उन चीजों पर खर्च कर दी जिनकी उसे जरूरत नहीं थी, उन लोगों को दिखाने के लिए जो उसे जानते तक नहीं थे। एक दिन पिंटू ने आईने में देखा, तो उसे वहां कोई इंसान नहीं, बल्कि एक 'चलता-फिरता विज्ञापन' दिखा। उसकी शर्ट पर कंपनी का नाम था, जूतों पर लोगो था, और दिमाग में विज्ञापन की टैगलाइन्स। जब पिंटू की जेब खाली हो गई, तो विज्ञापनों ने उसे 'लोन' के विज्ञापन दिखाने शुरू कर दिए। अब पिंटू अपनी 'किस्तों' के लिए जी रहा था। उसे समझ आया कि उसने अपनी 'मौलिकता' को 'ब्रांड' के नाम पर नीलाम कर दिया है, और अब वह समाज के उस शोरूम का एक हिस्सा है जहाँ इंसान नहीं, केवल 'प्राइस टैग' बसते हैं।