शीशे के पार एक अधूरी चीख : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

उस अठारह गुणा चौबीस के कांच के टुकड़े पर एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। ड्रेसिंग टेबल के उस पार खड़ी माया अपनी उंगलियों से उस सतह को सहला रही थी, जहाँ सूखे गोंद के निशानों ने एक अजीब सा नक्शा बना दिया था। वहां लाल, नीली और सुनहरी बिंदियों का एक जमघट था। कुछ के रंग उड़ चुके थे, कुछ का मखमल घिस गया था, और कुछ बस अपनी आखिरी सांसें गिनते हुए कांच से लटकी थीं। "तुम इन्हें हटाती क्यों नहीं?" मैंने गलियारे से गुजरते हुए पूछा। माया ने बिना मुड़े जवाब दिया, "इतिहास मिटाया जाता है, विसर्जित नहीं किया जाता।" उसकी आवाज में वह भारीपन था जो अक्सर पुराने मकानों की सीलन में होता है। वह आईना नहीं था, वह उन लम्हों की एक ऐसी नुमाइश थी जहाँ हर बिंदी एक मुकम्मल दास्तान दबाए बैठी थी। शहर के इस शोरगुल वाले फ्लैट में वह कोना एक ऐसी शांत घाटी बन गया था, जहाँ समय रुकने का ढोंग कर रहा था।

जैसे-जैसे दिन ढलते गए, उस कांच पर बिंदियों की तादाद बढ़ती ही गई। ऐसा लगता था कि माया अपनी माथे की रौनक को हर रात उस ठंडे कांच पर गिरवी रख देती है। "आज फिर एक नई?" मैंने छेड़ा। उसने शीशे में मुझे देखते हुए कहा, "सिर्फ एक और गवाह।" वह आईना अब एक चेहरा नहीं, बल्कि एक रोजनामचा बन चुका था। हर बिंदी एक हार थी, एक समझौता था, या शायद किसी अनकही चीख का मौन स्मारक। धूल की एक परत ने उन पर अपनी चादर बिछा दी थी, जिससे वे किसी प्राचीन शिलालेख की तरह दिखने लगी थीं। मोहल्ले की औरतें कहती थीं कि माया का श्रृंगार उसकी ताकत है, पर मुझे उस आईने को देखकर लगता था कि वह कांच हर रोज उसकी रूह का एक कतरा नोच लेता है और बदले में एक बेजान बिंदी चिपका देता है।

एक रात बारिश की झड़ी लगी थी। कमरे में बिजली गुल थी और मोमबत्ती की लौ में वे बिंदियां दीवारों पर डरावने साये बना रही थीं। हवा की सरसराहट से भी डर लग रहा था। मैंने देखा कि माया उस आईने के सामने बैठी रो रही थी। नहीं, वह रो नहीं रही थी, वह हँस रही थी—एक ऐसी हँसी जो रूह को भीतर तक कंपा दे। "क्या ढूँढ रही हो उसमें?" मैंने कांपती आवाज में पूछा। उसने उन अनगिनत बिंदियों के बीच एक खाली जगह की तरफ इशारा किया। "वहां एक कमी है," वह बुदबुदाई। उसकी बातें किसी अनसुलझी पहेली की तरह लग रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो वह कांच कोई मूक दर्शक नहीं, बल्कि एक ऐसा शिकारी है जो धीरे-धीरे हमारे घर की खुशियों को अपनी मखमली गिरफ्त में ले चुका है। वातावरण में एक ऐसी बेचैनी थी कि जैसे कोई बड़ा धमाका होने वाला हो, पर शोर बिल्कुल गायब था।

सुबह जब सूरज की पहली किरण ने उस आईने को छुआ, तो मंजर वह नहीं था जिसकी कल्पना किसी ने की होगी। कमरा खाली था, खिड़की खुली थी और हवा में एक अजीब सी गंध थी। मैं भागकर ड्रेसिंग टेबल के पास पहुंचा। वहां आईने पर लगी वे तमाम बिंदियां गायब थीं। वहां बस एक साफ, चमकता हुआ कांच था। पर जैसे ही मेरी नजर नीचे पड़ी, मेरी चीख गले में ही फंस गई। फर्श पर माया का शरीर बेजान पड़ा था। उसके माथे पर एक भी बिंदी नहीं थी। बल्कि, वे सारी पुरानी, फीकी और धूल भरी बिंदियां अब माया के पूरे चेहरे पर नहीं, उसकी बंद आंखों के पपोटों पर, उसके होंठों पर और उसके गले के घाव पर चिपकी हुई थीं। कांच अब पूरी तरह खाली था, क्योंकि रूह ने अपना 'कब्रिस्तान' आईने से बदलकर देह को चुन लिया था। वह आईना अब मुझे देख रहा था। उसके ठीक बीचों-बीच मेरे अपने खून से एक बिंदी लगी थी, जो मैंने खुद रात के अंधेरे में अपने माथे से उतारकर वहां चिपकाई थी, बिना यह जाने कि मैं भी उस अंतहीन कतार का अगला हिस्सा बन चुका हूँ।