सत्यार्थिन : गोलेन्द्र पटेल
satyarthin : Golendra Patel

1).

गाँव की सुबह हमेशा एक जैसी नहीं होती। कभी वह धूप से भरी होती है, कभी धुएँ से और कभी किसी अनकहे दुःख की गंध से। उस गाँव की सुबह भी कुछ ऐसी ही थी, जहाँ खेतों की हरियाली के पीछे एक घर था और उस घर के भीतर एक ऐसा अँधेरा, जो किसी को दिखाई नहीं देता था।

उस किसान के पास चौबीस बीघा जोतू ज़मीन थी। लोग उसे सम्पन्न कहते थे, इज्ज़त से उसका नाम लेते थे और पंचायत में उसकी बात सुनी जाती थी। उसका नाम परशुराम था। नाम में धर्म, लेकिन स्वभाव में हिंसा का ऐसा बीज, जो धीरे-धीरे पूरे घर को निगल रहा था।

मैं उस किसान को जानता हूँ। उसके पिता को भी जानता हूँ। उसके दादा की कहानी भी मैंने बुज़ुर्गों से सुनी है। वे लोग अलग थे। उनमें श्रम था, आत्मसम्मान था और परिवार के प्रति एक सहज जिम्मेदारी थी। परशुराम उस वंश का उत्तराधिकारी तो था, पर उस परंपरा का नहीं।

उसकी पत्नी सत्यवती। एक साधारण, सुंदर और सहनशील स्त्री; उस घर को संभाले हुए थी। उसकी आँखों में हमेशा एक थकान रहती थी, लेकिन उस थकान के पीछे एक अजीब-सी शांति भी थी, जैसे वह हर दुःख को स्वीकार करने की अभ्यस्त हो चुकी हो।

चार बच्चे थे—दुर्वासा, सत्यार्थनी, मांडव और सबसे छोटा उदयन।

दुर्वासा: सबसे बड़ा, अपने पिता की आँखों का तारा था, क्योंकि उसमें वही कठोरता थी, वही अकड़, वही निर्दयता।
सत्यार्थनी: घर की धड़कन थी।
मांडव: शांत, संवेदनशील, भीतर से नरम।
और उदयन: अभी इतना छोटा कि दुनिया को समझने के लिए भी उसे किसी की उँगली चाहिए थी।

लेकिन यह घर धीरे-धीरे घर नहीं रहा। एक ऐसी जगह बन गया, जहाँ हर दिन एक नया घाव जुड़ता था।

परशुराम सुबह खा-पीकर निकल जाता था। वह कहाँ जाता था, यह कोई नहीं जानता था या शायद सब जानते थे, लेकिन बोलते नहीं थे। शाम को लौटता, तो उसका चेहरा थका हुआ नहीं, बल्कि किसी अजीब संतोष से भरा होता।

घर आते ही उसका पहला सवाल होता,
“खाना कहाँ है?”

और अगर खाना तैयार न हो, तो उसका दूसरा रूप सामने आ जाता। लाठी, डंडा, हाथ—जो भी मिलता, वह बच्चों पर टूट पड़ता। सत्यवती बीच में आती, तो वह भी पिटती। धीरे-धीरे वह पिटाई, वह अपमान, वह निरंतर तनाव, उसके शरीर को खा गया। जब उदयन तीन साल का था, एक दिन सत्यवती चुपचाप लेटी रह गई। उस दिन घर में कोई शोर नहीं हुआ। कोई रोया भी नहीं पहले, क्योंकि बच्चों को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है। सत्यार्थनी ने सबसे पहले माँ को छुआ, उसका शरीर ठंडा था! उसने हिलाया, कोई जवाब नहीं। वह चिल्लाई नहीं, बस चुप हो गई! उस दिन से वह बच्ची नहीं रही!!

माँ की मृत्यु के बाद घर जैसे खुला छोड़ दिया गया, जैसे किसी ने दीवारें तोड़ दी हों, लेकिन छत अभी भी टिकी हो। परशुराम अब और भी बेपरवाह हो गया। उसने घर में एक औरत को रख लिया, जिसे गाँव वाले जानते थे, लेकिन कोई खुलकर कुछ नहीं कहता था। पंचायतें हुईं, बातें हुईं, पर अंत में सब चुप हो गए, क्योंकि परशुराम के पास ज़मीन थी और ज़मीन के साथ सत्ता आती है। दुर्वासा अब खुलकर पिता की तरह बनने लगा था। वह शराब पीता, छोटे भाईयों को मारता और घर में डर का एक स्थायी वातावरण बनाए रखता।

सत्यार्थनी अब माँ थी, वह सुबह उठती, चूल्हा जलाती, मांडव और उदयन को तैयार करती और फिर उन्हें लेकर खेतों की ओर निकल जाती। दिन भर वह पशु चराती, घास काटती और छोटे भाईयों को सँभालती। शाम को लौटकर खाना बनाती और रात को, जब सब सो जाते, वह चुपचाप रोती। उसकी उम्र तब कितनी थी, शायद दस या ग्यारह साल। लेकिन उसकी आँखों में उम्र से कहीं ज्यादा थकान थी। एक दिन, जब मार सहन से बाहर हो गई, वह ननिहाल चली गई। वहाँ उसे कुछ सुकून मिला और फिर जल्दी ही उसका विवाह कर दिया गया। जब वह विदा हो रही थी, उदयन उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था। वह रो रहा था,
“दीदी, मत जाओ…”

लेकिन सत्यार्थनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शायद अगर वह मुड़ती, तो जा नहीं पाती। उसके जाने के बाद घर पूरी तरह टूट गया। अब मांडव और उदयन अकेले थे। दुर्वासा की मार, पिता की क्रूरता और बीच में कोई नहीं जो उन्हें बचा सके। एक दिन, जब वे सिवान में बैल चरा रहे थे, मांडव ने अचानक कहा,
“चल भाग चलते हैं…”

उदयन ने पूछा,
“कहाँ?”
मांडव ने कहा,
“कहीं भी…”

वे दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर बिना कुछ सोचे, बिना कुछ समझे, वे चल पड़े। सिवान से स्टेशन तक का रास्ता उन्हें याद नहीं रहा, बस इतना याद रहा कि वे भाग रहे थे। एक ट्रेन खड़ी थी, वे उसमें चढ़ गए। उनके पास टिकट नहीं था, पैसा नहीं था और मंज़िल भी नहीं थी। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी, घर से दूर जाने की इच्छा। ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से बाहर खेत पीछे भाग रहे थे, जैसे उनका अतीत उनसे दूर जा रहा हो। कुछ समय बाद, वे अलग हो गए, कैसे, कब, उन्हें खुद नहीं पता!

उदयन एक दिशा में चला गया, मांडव दूसरी दिशा में। दोनों की ज़िंदगियाँ अब अलग-अलग कहानियाँ बनने वाली थीं। उदयन शहर दर शहर भटकता रहा। कभी स्टेशन पर सोता, कभी किसी ढाबे के पीछे। लोग उसे देखते, कुछ दया से, कुछ शक से और कुछ बिल्कुल नहीं देखते। आख़िरकार वह पटना पहुँचा, बारह साल का एक दुबला-पतला बच्चा, जिसकी आँखों में डर और भूख दोनों थे। एक चाय वाले ने उसे रख लिया, गिलास धोने के लिए। वह सुबह से रात तक काम करता और बदले में उसे खाना और सोने की जगह मिलती। लेकिन वह जगह घर नहीं थी, वह एक कोना था, जहाँ वह थककर गिर जाता था। कुछ महीने बाद, उसे एक हलवाई के यहाँ काम मिल गया। वहाँ काम ज़्यादा था और बंदिशें भी। रात ग्यारह बजे के बाद उसे दुकान में बंद कर दिया जाता। सुबह चार बजे उसे जगाया जाता, “उठ! भट्टी जलानी है…”

उसकी नींद अधूरी रहती, उसका शरीर थका रहता, लेकिन काम कभी खत्म नहीं होता। रात में जब उसे पेशाब लगती, तो वह बाहर नहीं जा सकता था। वह एक पॉलिथीन में पेशाब करता और सुबह शटर खुलते ही उसे बाहर फेंक देता। यह उसकी ज़िंदगी थी, एक ऐसी ज़िंदगी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकता था। हर रात, जब सब सो जाते, वह चुपचाप रोता। उसे अपनी माँ याद आती, बहन याद आती, मांडव याद आता। एक दिन, वह इतना बीमार पड़ गया कि काम नहीं कर सका। मालिक ने डाँटा, “नाटक मत कर!”

लेकिन उसका शरीर जवाब दे चुका था। कुछ दिनों बाद, उसने भागने की कोशिश की। वह शौच का बहाना बनाकर बाहर निकला और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ा। वह चलता रहा, दो किलोमीटर, तीन किलोमीटर, लेकिन कहीं कोई स्टेशन नहीं मिला। वह थक गया, डर गया और वापस लौट आया। मालकिन ने उसे खूब पीटा। रात में मालिक ने भी। उसकी पीठ पर नीले निशान पड़ गए, लेकिन उसकी आँखों में आँसू नहीं थे अब। शायद आँसू भी खत्म हो चुके थे। कुछ दिन बाद रक्षाबंधन था। मालकिन मायके चली गई। मालिक दुकान में व्यस्त था। उसने उदयन को भैंस का चारा डालने भेजा। उदयन गया, लेकिन इस बार वह वापस नहीं आया। वह दौड़ा, रेलवे लाइन की ओर।

नंगे पैर,
पत्थरों पर,
धूप में,
उसके पैर कट रहे थे,
ख़ून बह रहा था,
लेकिन वह रुका नहीं।

वह दौड़ता रहा, जब तक कि उसका शरीर ज़वाब नहीं दे गया। आगे एक गड्ढा था, जिसमें भैंसें पानी में खेल रही थीं। वह प्यास से बेहाल था। उसने वही गंदा पानी पिया, अपने गमछे से छानकर। उसी समय एक चरवाहा वहाँ आया। उसने उदयन को देखा, उसकी हालत समझी और बिना कुछ पूछे, उसे अपने साथ ले गया। उसने उसके पैर धोए, मरहम लगाया, उसे खाना दिया। उस रात, बहुत दिनों बाद, उदयन ने चैन की नींद सोई। सुबह, वह चरवाहा उसे साइकिल पर बैठाकर स्टेशन ले गया। उसने टिकट कटवाया और कहा, “घर जा…”

उदयन ने उसकी ओर देखा, जैसे वह पहली बार किसी इंसान को देख रहा हो। ट्रेन चली और वह अपने गाँव की ओर लौटने लगा।

2).

ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उदयन को पहली बार लगा कि रास्ते भी कभी-कभी घर बन जाते हैं। पटरियों के किनारे भागते पेड़, दूर-दूर तक फैले खेत, छोटे-छोटे स्टेशन, सब कुछ उसे एक साथ बुला भी रहे थे और धक्का भी दे रहे थे। उसके भीतर डर था कि घर पहुँचकर क्या होगा? और एक उम्मीद भी कि शायद इस बार सब ठीक हो जाए।

जब वह अपने गाँव के स्टेशन पर उतरा, तो उसे लगा जैसे वह कोई और जगह है। वही प्लेटफॉर्म, वही चाय की दुकान, वही भीड़, पर उसके लिए सब कुछ बदला हुआ था। वह धीरे-धीरे पगडंडी पकड़कर गाँव की ओर चला। रास्ते में मिलने वाले लोग उसे देख रहे थे, पर पहचान नहीं पा रहे थे। उसकी देह दुबली हो चुकी थी, रंग झुलस गया था, आँखों में बचपन की जगह थकान आ गई थी।

घर के सामने पहुँचते ही उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। आँगन में वही नीम का पेड़ था, पर उसकी छाँव अब वैसी नहीं लग रही थी। उसने धीरे से आवाज़ दी,
“बाबू…”

अंदर से परशुराम निकला। उसने कुछ क्षण उदयन को देखा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। फिर अचानक उसके चेहरे पर एक अजीब-सी नरमी आई,
“उदयन?”

उस एक शब्द में जितनी आश्चर्य, उतनी ही राहत भी थी। दुर्वासा भी बाहर आया। उसने उदयन को ऊपर से नीचे तक देखा,
“कहाँ था तू?”

उदयन ने झूठ गढ़ लिया, “हमको कुछ लोग पकड़ लिए थे… सिवान से… ट्रेन से ले गए… बेच दिए…” यह वही कहानी थी, जो उसने रास्ते में सोच ली थी। “लकड़सूँघ” का नाम उसने लोगों से सुना था और अब वही उसकी सच्चाई बन गई। कुछ दिनों तक घर में उसके प्रति सहानुभूति रही। उसे खाना ठीक से मिला, मार नहीं पड़ी और कुछ देर के लिए लगा कि शायद जीवन बदल सकता है।

लेकिन यह समय बहुत छोटा था। धीरे-धीरे सब कुछ फिर से पहले जैसा हो गया। परशुराम का स्वभाव नहीं बदला। दुर्वासा की क्रूरता और बढ़ गई। उदयन को समझ आ गया कि यह घर अब उसके लिए नहीं है, यह केवल एक जगह है, जहाँ उसका जन्म हुआ था, लेकिन जहाँ उसके लिए कोई स्थान नहीं बचा। एक रात, जब वह चुपचाप लेटा था, उसने फैसला किया, वह फिर भागेगा।

इस बार वह पहले जैसा बच्चा नहीं था। वह जानता था कि दुनिया कैसी है! कुछ दिनों बाद, उसे एक ट्रक ड्राइवर मिला। उसने उससे काम माँगा। ड्राइवर ने उसे देखा, “काम कर पाएगा?”

उदयन ने सिर हिलाया,
“कर लेंगे…”

वह उसके साथ चल पड़ा। अब सड़क उसकी ज़िंदगी बन गई। ट्रक के साथ उसने शहर दर शहर देखा, पटना, वाराणसी, कानपुर, दिल्ली, मुंबई…

हर शहर में एक नई कहानी थी, एक नया संघर्ष। धीरे-धीरे उसने गाड़ी चलाना सीख लिया। पहले छोटे-छोटे रास्तों पर, फिर लंबी सड़कों पर। पंद्रह-सोलह साल की उम्र में वह खुद ड्राइवर बन गया। अब वह किसी का नौकर नहीं था, वह खुद अपने रास्ते का मालिक था। लेकिन यह आज़ादी भी अधूरी थी। हर शहर में उसे कुछ मिलता, लेकिन कुछ छूट भी जाता।

रात में, जब वह किसी ढाबे पर गाड़ी खड़ी करता और आसमान की ओर देखता, तो उसे अपना गाँव याद आता। माँ का चेहरा, सत्यार्थनी की आवाज़, मांडव की हँसी, सब कुछ धुंधला-सा होकर भी उसके भीतर जिंदा था। वह हर पाँच-सात साल में गाँव लौटता। कुछ दिन रुकता, फिर चला जाता। घर अब भी वही था, पर उसके भीतर कोई अपनापन नहीं था।

दुर्वासा की शादी हो चुकी थी। उसकी पत्नी आई थी, लेकिन उसने भी उदयन को कभी अपनाया नहीं। वह घर में एक अजनबी की तरह रहता, जिसे सब जानते थे, पर कोई स्वीकार नहीं करता था। उसी बीच, परशुराम ने उससे शादी के लिए पैसे माँगने शुरू कर दिए। “इतना कमाता है… अपने बाप के लिए कुछ नहीं करेगा?” उदयन चुप रहता। वह जानता था, यह माँग केवल पैसे की नहीं है, यह उस रिश्ते की कीमत है, जो कभी बना ही नहीं। आख़िरकार, उसने खुद ही शादी कर ली— प्रेम विवाह।

उसने सोचा, शायद वह अपना घर खुद बना सके। उसकी पत्नी आई, कुछ समय तक सब ठीक चला। एक बेटा हुआ, एक बेटी हुई। लेकिन उसके भीतर जो खालीपन था, वह भर नहीं सका। वह खुद को “मूलनिवासी” कहने लगा, जैसे वह अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहता हो, उस पहचान से दूर, जो उसे जन्म से मिली थी। लेकिन जीवन फिर भी आसान नहीं हुआ। उसकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई। वह फिर अकेला रह गया, सड़कों पर, ट्रक के साथ।

दूसरी ओर, मांडव की कहानी एक अलग दिशा में बह रही थी। जब वह उदयन से बिछड़ा, तब वह भी एक बच्चा ही था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी ज़िद थी, जीने की, टिके रहने की। भटकते-भटकते वह लखनऊ पहुँचा। वहाँ उसने रिक्शा चलाना शुरू किया। सुबह से शाम तक; गर्मियों की धूप, सर्दियों की ठंड, बारिश की कीचड़, सब कुछ उसके हिस्से में था। लेकिन उसने हार नहीं मानी। एक दिन, उसके रिक्शे पर एक आदमी बैठा, साफ-सुथरे कपड़े, गंभीर चेहरा।

वह इलाहाबाद के एक विद्यालय का प्रधानाचार्य था। उसने रास्ते में मांडव से बातें कीं,
“पढ़े हो?”
मांडव ने सिर झुका लिया,
“नहीं…”
प्रधानाचार्य ने कुछ देर सोचा,
फिर कहा,
“काम करोगे?”
मांडव ने तुरंत हामी भर दी। वह उसके साथ इलाहाबाद चला आया। विद्यालय में उसे माली का काम मिला। वह पेड़-पौधों की देखभाल करता, फूल लगाता, घास काटता और साथ ही, बच्चों को पढ़ते हुए देखता। धीरे-धीरे उसने अक्षर पहचानना शुरू किया। उसने अपना नाम लिखना सीखा— “मांडव”

यह उसके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन यह सुख भी ज़्यादा दिन नहीं टिक सका। एक दिन विद्यालय में एक घटना हुई, एक माली ने एक छात्रा के साथ बदसलूकी की। जाँच शुरू हुई और शक मांडव पर भी गया, क्योंकि वह उसी माली के साथ रहता था। बिना पूरी सच्चाई जाने, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया। दो साल तक वह जेल में रहा। दो साल, जहाँ हर दिन एक जैसा होता है और हर रात बहुत लंबी। आख़िरकार, असली अपराधी पकड़ा गया। मांडव निर्दोष साबित हुआ, लेकिन तब तक बहुत कुछ खो चुका था। जेल से निकलकर वह पहले जैसा नहीं रहा। उसके भीतर एक गहरा खालीपन था और एक सवाल,
“मैं कौन हूँ?”

इसी सवाल ने उसे आगे धकेला। वह फिर भटकने लगा। इस बार उसकी भटकन केवल रोटी के लिए नहीं थी, वह अपने अस्तित्व की तलाश में था। उसी दौरान, वह एक लड़की से मिला। वह एक निम्न जाति की थी। समाज की नजर में “छोटी और अछूत”, लेकिन मांडव की नजर में वह एक इंसान थी। दोनों करीब आए और उन्होंने शादी कर ली। कुछ दिन साथ रहे, सपनों के साथ। लेकिन समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। घरवालों को जब पता चला, तो विरोध हुआ, अपमान हुआ। मांडव उस लड़की को लेकर अपने एक रिश्तेदार के यहाँ आया, लेकिन वहाँ भी उसे अपनाया नहीं गया। आख़िरकार, वह रिश्ता टूट गया या टूटने पर मजबूर कर दिया गया। उसके बाद, मांडव ने दुनिया से दूरी बना ली। वह चित्रकूट के जंगलों में चला गया। वहाँ उसने साधु का जीवन अपनाया। घास, पत्ते, जड़ें; जो मिला, खाया। दिनों तक मौन रहा, रातों तक जागता रहा। वह कहता है,
“मैंने तपस्या की… मुझे सिद्धि मिली…”

सिद्धि मिली या नहीं; यह कोई नहीं जानता, लेकिन इतना ज़रूर था, वह अब पहले वाला मांडव नहीं रहा। वह एक जोगी बन चुका था, जिसकी आँखों में संसार का दुःख बस गया था।

सत्रह साल बाद; वह अपने गाँव लौटा।
हाथ में सारंगी थी,
कंधे पर झोला
और चेहरे पर एक अजीब-सी शांति।
वह गा रहा था,
अपने जीवन की कहानी।

गाँव के लोग उसे घेरकर खड़े हो गए। कुछ उसे पहचानने की कोशिश कर रहे थे, कुछ उसे केवल एक जोगी समझ रहे थे। लेकिन उसकी आवाज़, उसमें कुछ ऐसा था, जो सीधे दिल तक पहुँच रहा था। उसी समय, एक स्त्री भीड़ को चीरते हुए आगे आई, वह सत्यार्थनी थी। उसने एक नज़र मांडव को देखा और तुरंत पहचान लिया।
“मांडव…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी। मांडव ने उसकी ओर देखा और उसकी आँखों में आँसू आ गए। सत्रह साल बाद; भाई-बहन आमने-सामने थे, लेकिन यह मिलन अधूरा था, क्योंकि अभी घर बाकी था।

3).

सत्यार्थनी की आवाज़ जैसे समय की परतों को चीरती हुई आई थी, “मांडव…” भीड़ कुछ क्षण के लिए थम गई। सारंगी की धुन रुक गई। हवा में जैसे एक अनकहा कंपन फैल गया। मांडव ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आँखों में पहले संदेह, फिर पहचान और फिर एक गहरी पीड़ा तैर गई।
“दीदी…”

बस इतना ही कहा उसने और यह एक शब्द सत्रह वर्षों की दूरी को पाटने के लिए काफ़ी था। सत्यार्थनी आगे बढ़ी, पर उसने मांडव को छुआ नहीं। जैसे उसे डर हो कि कहीं यह सपना न हो, कहीं यह छवि टूट न जाए। भीड़ अब कानाफूसी कर रही थी,
“अरे, ये तो परशुराम का बेटा मांडव है…”
“हाँ, वही… जो बचपन में भाग गया था…”
“अब देखो, जोगी बनकर लौटा है…”

लेकिन यह पहचान जितनी जल्दी गाँव के लोगों में फैल रही थी, उतनी ही सख्ती से घर के भीतर नकार दी जा रही थी। जब यह खबर परशुराम और दुर्वासा तक पहुँची, वे भी आँगन में आए। मांडव ने उन्हें देखा, वही चेहरे, बस समय ने उन्हें थोड़ा और कठोर बना दिया था। उसने आगे बढ़कर कहा, “बाबू…”

परशुराम ने उसकी ओर देखा और बिना एक पल रुके कहा, “हम नहीं जानते तुम्हें।”

यह वाक्य किसी पत्थर की तरह गिरा। भीड़ में सन्नाटा छा गया। मांडव कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने दुर्वासा की ओर देखा, “भइया…”

दुर्वासा ने हँसते हुए कहा, “कहाँ से सीखकर आया है यह नाटक? कौन भेजा है तुम्हें?”
“मैं मांडव हूँ…”
“नहीं, तू कोई बहरूपिया है। हमारा भाई मर गया था।”

यह केवल इनकार नहीं था, यह एक योजनाबद्ध अस्वीकार था, क्योंकि अगर वे उसे स्वीकार करते, तो उसे हिस्सा देना पड़ता। ज़मीन, जायदाद; इन सबके सामने खून का रिश्ता छोटा पड़ गया था।

गाँव के बुज़ुर्ग आगे आए, “परशुराम, पहचानो इसे… यह तुम्हारा ही बेटा है…” परशुराम ने कड़क आवाज़ में कहा, “हमको अपने ख़ून की पहचान है। यह हमारा खून नहीं है।”

यह सुनकर सत्यार्थनी का चेहरा तमतमा उठा,
“बाबू! ख़ून की पहचान तब नहीं हुई, जब हम लोग मार खाते थे? तब नहीं दिखा कि हम आपके बच्चे हैं?” उसकी आवाज़ में वर्षों का जमा हुआ आक्रोश था। परशुराम चुप रहा, लेकिन उसकी चुप्पी में स्वीकार नहीं, ज़िद थी। मांडव अब समझ चुका था, यह घर अब भी वही है, जहाँ सच की कोई जगह नहीं।उसने कोई विवाद नहीं किया। वह वहीं आँगन के किनारे बैठ गया। सारंगी उठाई और फिर से बजाने लगा, लेकिन इस बार धुन बदल गई थी। अब उसमें केवल दुःख नहीं था, एक स्वीकार भी था, एक विरक्ति भी!

कुछ दिनों तक मांडव गाँव में रहा। वह लोगों से मिलता, पुरानी बातें करता और रात में सारंगी बजाकर अपनी कहानी गाता। गाँव के बुज़ुर्ग उसके पास बैठते, उसके हाथ का बना खाना याद करते। “मांडव बचपन से ही रसोइया था…”
“कैसा स्वाद बनाता था…”

उसकी उदारता, उसका स्वभाव; सबकी यादें धीरे-धीरे लौट रही थीं। लेकिन घर के भीतर वही दूरी बनी रही।केवल दो लोग थे, जिन्होंने उसे बिना शर्त स्वीकार किया— सत्यार्थनी और वह औरत, जिसे परशुराम ने रख रखा था। वह औरत भी उसे पहचान गई थी, क्योंकि उसने उसे बचपन में देखा था। विडंबना यह थी कि जो संबंध समाज की नजर में “अवैध” था, वही सबसे सच्चा साबित हो रहा था।

मैं, जो इस पूरी कथा का साक्षी हूँ, मांडव को समझना चाहता था। उसकी आँखों में जो अनुभव था, वह केवल सुना नहीं जा सकता था, उसे जानना पड़ता था। मैंने गाँव के लोगों से पूछा, “मांडव कहाँ-कहाँ रहा? क्या-क्या किया?”

लेकिन किसी के पास पूरी कहानी नहीं थी। सबके पास कुछ टुकड़े थे, किसी के पास बचपन, किसी के पास उसकी रसोई, किसी के पास उसका जोगी रूप। आख़िरकार, मुझे एक आदमी मिला, जो कुछ समय तक मांडव के साथ रहा था। उसने कहा, “तुम सच जानना चाहते हो?”
मैंने कहा,
“हाँ…”

उसने लंबी साँस ली और फिर धीरे-धीरे बताने लगा। “जब मांडव लखनऊ में था, तब वह केवल रिक्शा नहीं चलाता था। वह लोगों को पढ़ते हुए देखता था। उसे अक्षरों से प्रेम हो गया था…” मैं चुपचाप सुनता रहा। “फिर जब वह इलाहाबाद गया, तो उसे लगा कि जीवन बदल सकता है… लेकिन जेल ने उसे तोड़ दिया…”
“और वह लड़की?” मैंने पूछा।

वह थोड़ा झिझका, फिर बोला,
“हाँ… वह उससे बहुत प्रेम करता था…
शादी भी की थी…”
“फिर?”
“समाज ने उसे रहने नहीं दिया…”
उसकी आवाज़ में एक थकान थी, जैसे वह भी उस कहानी का हिस्सा रहा हो।
“और चित्रकूट?”
“वहाँ वह खुद को भूलने गया था…
या शायद खुद को खोजने…”

मैंने पूछा,
“क्या उसे सच में सिद्धि मिली?”
वह मुस्कराया,
“अगर दुःख को समझ लेना सिद्धि है,
तो हाँ… उसे मिली।”

मांडव से जब मैंने खुद पूछा,
“आपने इतना सब कैसे सहा?”
वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“सहन नहीं किया… बस जीता रहा…”

उसके इस उत्तर में एक गहरी सादगी थी। फिर उसने एक और बात कही, जो शायद उसकी पूरी यात्रा का सार थी, “जब कोई अपना नहीं रहता, तो आदमी खुद का हो जाता है…”

इसी बीच, सत्यार्थनी का जीवन अपने अंतिम मोड़ पर पहुँच रहा था। उसकी कहानी मांडव से कम पीड़ादायक नहीं थी, शायद उससे भी ज़्यादा। पहले पति की मृत्यु ने उसे विधवा बना दिया, एक जवान उम्र में। फिर समाज ने उसे दूसरा विवाह करने पर मजबूर किया, एक ऐसे आदमी से, जो शराबी था, नशेड़ी था। उससे उसे चार बच्चे हुए, तीन बेटियाँ, एक बेटा। वह दिन-रात मेहनत करती, बच्चों को पालने के लिए। उसकी आँखों में अब भी वही थकान थी, जो बचपन में थी। बस फर्क इतना था कि अब वह थकान स्थायी हो चुकी थी। उसने अपनी बेटियों की शादी की, किसी तरह, उधार लेकर, मेहनत करके। लेकिन किस्मत ने वहाँ भी साथ नहीं दिया। बड़ा दामाद एक ट्रक दुर्घटना में मर गया। बेटी गर्भवती थी और अचानक विधवा हो गई।

दूसरे दामाद ने किसी और औरत को रख लिया। दोनों बेटियाँ मायके लौट आईं। सत्यार्थनी फिर से उसी चक्र में फँस गई, जहाँ वह बचपन में थी। बस अब वह खुद माँ थी।

एक दिन, अचानक, वह छत से गिर गई। लोग कहते हैं कि पैर फिसल गया। कुछ कहते हैं कि चक्कर आया। लेकिन सच्चाई क्या थी, कोई नहीं जानता। अस्पताल ले जाते समय, रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी देह सगड़ी पर रखी थी और सगड़ी सड़क पर चल रही थी। उसकी बेटियाँ रो रही थीं, ऐसे जैसे दुनिया खत्म हो गई हो। बड़ी बेटी रोते-रोते बेहोश हो गई और उसका पति, वह कहीं किनारे बैठकर शराब पी रहा था। दोपहर में उसकी चिता नहीं जली, रात में जली। जैसे उसका जीवन भी अँधेरे में बीता था, वैसे ही उसका अंत भी अँधेरे में हुआ।

तेरहवीं के कुछ महीनों बाद; उसका पति एक और औरत को घर ले आया और उसकी बेटियाँ, वे भी घर छोड़कर चली गईं। अपने-अपने प्रेमियों के साथ। शायद उन्होंने वही रास्ता चुना, जो उन्हें सबसे कम दर्द देता था। वे कभी-कभी मांडव को फोन करतीं, रोतीं, अपनी कहानी सुनातीं। मांडव चुपचाप सुनता और फिर धीरे से कहता,
“हिम्मत रखो…”, लेकिन वह जानता था, यह शब्द पर्याप्त नहीं हैं।

एक दिन, मांडव ने मुझसे पूछा, “तुम पढ़े-लिखे हो… बताओ, मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”

मैं चुप रहा।
उसने फिर कहा, “हर दिन कितनी सत्यार्थनियाँ मरती हैं… कोई उन्हें बचाता क्यों नहीं?”
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, लेकिन एक गहरा सवाल था।
मैंने बहुत सोचा, लेकिन मेरे पास कोई उत्तर नहीं था, क्योंकि यह प्रश्न केवल एक कहानी का नहीं था—
यह पूरे समाज का प्रश्न था।

4).

मांडव का प्रश्न हवा में तैरता नहीं था, वह भीतर उतरता था, जैसे कोई नुकीली चीज़ धीरे-धीरे दिल में धँसती चली जाए।

“तुम पढ़े-लिखे हो… बताओ, मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”

उसने यह सवाल यूँ ही नहीं पूछा था। यह प्रश्न उसके जीवन के हर मोड़ से होकर निकला था, माँ की मृत्यु, बहन का संघर्ष, अपने प्रेम का टूटना और उन असंख्य स्त्रियों का दुःख, जिन्हें उसने रास्तों, शहरों, जंगलों और गाँवों में देखा था।

मैं चुप था! मेरे पास शब्द थे किताबों के, सिद्धांतों के, विचारों के। लेकिन उसके प्रश्न के सामने वे सब हल्के लग रहे थे। मैंने उससे पूछा, “तुम्हें क्या लगता है?”

वह मुस्कराया, एक थकी हुई, लेकिन गहरी मुस्कान। “मुझे लगता है कि समस्या बाहर से ज़्यादा भीतर है…”
“कैसे?”

“जब आदमी औरत को इंसान नहीं समझता, तो कोई कानून, कोई समाज, कुछ नहीं बदल सकता…”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक अजीब दृढ़ता थी।
“हमारे घर में क्या हुआ?
माँ क्यों मरी?
दीदी क्यों मरी?
क्योंकि वे औरत थीं…
और उन्हें इंसान नहीं समझा गया…”

मैंने उसकी ओर देखा, वह अब जोगी नहीं लग रहा था, वह एक विचारक लग रहा था। गाँव में उसके आने के बाद कई दिन बीत चुके थे। लोग अब उसे “मांडव बाबा” कहने लगे थे। कुछ श्रद्धा से, कुछ जिज्ञासा से और कुछ केवल तमाशा देखने के लिए। वह रोज़ शाम को चौपाल के पास बैठता, सारंगी बजाता और अपनी कहानी के टुकड़े गाता। उसकी धुनों में अब केवल दुःख नहीं था, एक चेतावनी भी थी। लोग सुनते, कुछ समझते, कुछ नहीं।

परशुराम और दुर्वासा अब भी उसे स्वीकार नहीं कर रहे थे। लेकिन एक बदलाव आया था, अब वे खुलकर विरोध भी नहीं करते थे। शायद उन्हें डर था कि कहीं सच पूरी तरह सामने न आ जाए या शायद उन्हें भीतर से कहीं यह एहसास होने लगा था कि जिसे वे नकार रहे हैं, वह सचमुच उनका ही हिस्सा है। एक दिन, मांडव ने अचानक कहा, “मैं यहाँ ज़्यादा दिन नहीं रुकूँगा…”

मैंने पूछा,
“क्यों?”
वह बोला,
“यहाँ मेरा कुछ नहीं है…”
“पर तुम्हारी ज़मीन… तुम्हारा हक…”
वह हँस पड़ा,
“हक?
जिस घर ने मुझे बचपन में नहीं अपनाया,
उससे मैं अब क्या माँगूँ?”

उसकी हँसी में कोई कटुता नहीं थी, बस एक गहरी थकान थी।
“मैंने बहुत जगहें देखी हैं…
हर जगह एक ही कहानी है…
बस चेहरे बदल जाते हैं…”
मैंने कहा,
“फिर भी… कुछ तो बदल सकता है…”
वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“बदलाव तब आएगा,
जब लोग अपने घर से शुरू करेंगे…”

उसी दौरान, उसकी भांजियों का फोन आया। वे रो रही थीं, अपने जीवन की नई परेशानियाँ बता रही थीं, मांडव चुपचाप सुनता रहा। फिर उसने धीरे से कहा,
“डरना मत…
अपनी जिंदगी ख़ुद जीना…”

फोन कट गया।
उसने मेरी ओर देखा,
“देखो, ये लड़कियाँ भाग गईं…
लोग कहेंगे गलत किया…
पर मैं कहता हूँ,
उन्होंने जीने की कोशिश की…”

मैंने पहली बार उसकी आँखों में एक चमक देखी, जैसे वह दुःख के बीच भी जीवन की संभावना देख पा रहा हो। कुछ दिनों बाद, उसने एक और निर्णय लिया, वह विवाह करेगा। गाँव में यह ख़बर फैल गई, “मांडव बाबा शादी करेंगे!” लोग हैरान थे। एक जोगी, एक साधु, वह शादी क्यों करेगा?

मैंने उससे पूछा,
“तुम सच में शादी करना चाहते हो?”

उसने कहा,
“हाँ…
मैं भागते-भागते थक गया हूँ…”
“किससे?”
“खुद से…”

उसकी होने वाली पत्नी एक दिव्यांग लड़की थी, गूँगी, बहरी और पहले से एक बार विवाहिता। समाज के लिए वह “अयोग्य” थी, लेकिन मांडव के लिए वह एक इंसान थी। उसने मुझसे पूछा, “क्या मुझे उससे शादी करनी चाहिए?”

मैंने बिना झिझक कहा,
“हाँ…”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम उसके लिए एक सहारा बन सकते हो…
और वह तुम्हारे लिए एक घर…”
वह चुप रहा,
फिर धीरे से बोला,
“ठीक है…”

शादी सादगी से हुई। कोई बड़ा आयोजन नहीं, कोई शोर-शराबा नहीं। बस कुछ लोग, कुछ गवाह और दो जीवन, जो एक-दूसरे का सहारा बनने जा रहे थे।

शादी के बाद, गाँव की बूढ़ी औरतें कहने लगीं, “सत्यार्थनी का भाई सच में संत है…”

मांडव अब अपने घर में था, एक छोटे से घर में,
जहाँ शांति थी। वह अपनी पत्नी की सेवा करता,
उसे समझता, उसकी दुनिया में ख़ुद को ढालता। लोग कहते, “देखो, कैसे ख़्याल रखता है…”

और मैं सोचता,
शायद यही असली साधना है। समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। परशुराम बूढ़ा हो चुका था। दुर्वासा अब भी वही था, बस उसकी क्रूरता में अब एक थकान जुड़ गई थी। उदयन अपनी सड़कों पर था, कभी आता, कभी चला जाता। मांडव अपने छोटे-से संसार में था, जहाँ उसे अंततः कुछ शांति मिली थी। लेकिन सत्यार्थनी, वह अब केवल एक स्मृति थी। एक ऐसी स्मृति, जो हर बार एक प्रश्न बनकर लौटती थी।

एक शाम, मैं मांडव के साथ बैठा था। सूरज डूब रहा था, आसमान लाल हो रहा था। उसने सारंगी उठाई और एक धीमी धुन बजाने लगा। फिर उसने कहा, “तुम्हें पता है, ‘सत्यार्थिन’ का मतलब क्या होता है?”

मैंने कहा,
“जो सत्य की खोज में हो…”
वह मुस्कराया,
“हाँ…
पर कभी-कभी सत्य बहुत दर्दनाक होता है…”
“फिर भी?”
“फिर भी उसे जानना जरूरी है…”

उसने सारंगी की धुन तेज कर दी और गाने लगा,
“सत्य की राह कठिन बहुत है,
चलना है तो चलना होगा…
झूठ के साए से बाहर आकर,
ख़ुद को खुद से मिलना होगा…”

मैं उसे सुनता रहा। उसकी आवाज़ में अब कोई शिकायत नहीं थी, बस एक स्वीकार था। रात गहरा गई थी। गाँव में सन्नाटा था। मैं घर लौट रहा था, लेकिन मेरे भीतर एक हलचल थी। मांडव का प्रश्न अब भी मेरे साथ था, “मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”

शायद इसका उत्तर किसी एक के पास नहीं है।
शायद यह उत्तर हमें मिलकर खोजना होगा,
अपने घरों में,
अपने व्यवहार में,
अपने विचारों में,
क्योंकि जब तक घर नहीं बदलेंगे,
समाज नहीं बदलेगा,
और जब तक समाज नहीं बदलेगा,
सत्यार्थनियाँ यूँ ही मरती रहेंगी।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि यह केवल एक कहानी नहीं है। यह एक आईना है, जिसमें हम सब अपना चेहरा देख सकते हैं। प्रश्न यह है, क्या हम देखने की हिम्मत रखते हैं?