तेरहवीं सदी की विदुषी संत कवियित्री अव्वैयार (आलेख) : मंगला रामचंद्रन

तमिल में अव्वैयार एक पदवी होती है जो उम्र दराज परिपक्व विदुषी को दी जाती है। तमिल साहित्य में तीन ऐसी विदुषियों का उल्लेख हुआ है जो साहित्य के विभिन्न कालखंड में उपस्थित थीं। इन्हीं में से एक अव्वैयार, तामिल रामायण के रचयिता कंबर की समकालीन मानी जाती हैं। चोल वंश के समय में 13 वीं सदी में इन दोनों का तामिल साहित्य में वृहत योगदान रहा। इन्हीं को अधिकृत रूप में एक दूरदर्शी विदुषी पाटी (दादी) के रूप में आज तक चित्रित किया जाता है। उनकी कविताएं, सूक्तियां आदि तमिल जनमानस में अपनी पैठ बना कर बैठी हैं। बच्चों को सद्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने के लिए उन्होंने अनगिनत छोटी-छोटी और सरल भाषा में सूक्तियां रची हैं जो अनेक स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल हैं।

अव्वैयार का जन्म एक ब्राम्हण पागवान और आदि नामक शूद्र स्त्री के संसर्ग से हुआ।पर पागवान इस विवाह से मानसिक रूप से समझौता नहीं कर पाया। उसने असमंजस में पड़ कर तय किया कि होने वाली संतानों को वो ग्रहण नहीं करेगा। अपनी पत्नी से भी वचन ले लिया कि होने वाली संतानों को वो लोग तज देंगे। अव्वैयार सात संतानों में प्रथम संतान थी। अन्य संतानों का कहीं जिक्र नहीं है। पति-पत्नी एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकले थे तभी अव्वैयार का जन्म हुआ। पति पत्नी ने उसे लावारिस छोड़ कर आगे यात्रा पर जाने का निर्णय लिया।पणार समूह का एक गायक कवि, जो उसी राह से गुज़र रहा था, ने नन्ही बच्ची को अपने संरक्षण में ले लिया।बचपन से ही वो बच्ची कविता रचने लगी थी।चार वर्ष की नन्हीं उम्र में उसने एक ऐसी कविता को पूर्ण कर दिया जिसे दिग्गज कविगण भी पूर्ण नहीं कर पा रहे थे।

हालांकि अव्वैयार का सही नाम क्या था ये किसी को नहीं मालूम पर पैदाइश का स्थान तामिलनाडु का सेलम शहर माना जाता है।यह शहर चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है।उत्तर में नागर मलै दक्षिण में जेरगमलै, गोदुमलै पूर्व में तथा पश्चिम में कंजनामलै। तामिल में मलै का अर्थ पहाड़ होता है।

अव्वैयार के साथ एक किंवदंती जुड़ी हुई है ।अव्वैयार लगातार भ्रमण करती रहतीं थीं और प्रकृति से जुड़ी रहती थीं।एक समय ऐसा आया कि उन्हें लगने लगा कि उनके पास विशेष कुछ शेष नहीं रहा जिसे वो लोगों के साथ साझा करें। दंतकथा के अनुसार भ्रमण करते करते थकी हुई तथा भूखी प्यासी अव्वैयार ने जंगल में जामुन का वृक्ष देखा और उसीके नीचे विश्राम करने बैठ गईं।इस वृक्ष पर एक बालक बैठा हुआ था।अव्वैयार ने उसे कुछ फल नीचे गिराने को कहा।बालक ने पूछा उसे ठंडे फल चाहिए या गर्म और असमंजस में पड़ी अव्वैयार के सामने फल गिरा दिए। अव्वैयार उन फलों को फूंक फूंक कर खा रही थी।बालक ने हंसते हुए पूछा "क्यों दादी फल गर्म थे क्या? "तब जाकर उन्हें उसके पूर्व में पूछे प्रश्न का गूढ़ अर्थ समझ आया।बालक के रूप में वो भगवान मुरुगन थे। मुरूगन भगवान को तामिल साहित्य के संरक्षक माने जाते हैं।मुरुगन और अव्वैयार के बीच कई संदर्भों में अनेकों संवाद हुए उनमें से कुछ प्रसिद्ध संवाद इस तरह हैं:

मुरुगन : दुनिया में दुर्लभ क्या है?
अव्वैयार : जगत में मानव शरीर में जन्म लेना दुर्लभ है पर उससे भी दुर्लभ है बिना किसी दोष के जन्म पाना।अगर दोष के साथ जन्म ले ही लिया है तो ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करना और भी दुर्लभ या दुर्गम है। पर इन सबसे अनूठा और अति विरल है दान और भक्ति का संयोग जिसे करते रहने से ऐसे लोगों के लिए स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं।
मुरुगन : बुरा क्या है ?
अव्वैयार: गरीबी से पीड़ित होना बुरा है, उससे बुरा है बचपन गरीबी में बिताना। इससे बुरा होता है लाइलाज बीमारी और उससे भी बुरा होता है एक प्यार-विहीन पत्नी का होना । इन सबसे खराब या बुरा होता है ऐसी पत्नी द्वारा दिए जा रहे भोजन को गृहण करना।

मुरूगन ने अव्वैयार को समझाया कि उनके विश्राम का समय अभी नहीं आया और उन्हें तामिल साहित्य के लिए बहुत कुछ योगदान देना अभी शेष है।इस प्रसंग के बाद उन्होंने अपना समस्त ध्यान बच्चों पर केंद्रित करते हुए उनके लिए महत्वपूर्ण विशाल साहित्य रचा।यह साहित्य हजार वर्षों के पश्चात आज भी रूचि से पढ़ा गुना जाता है।इन रचनाओं की रोचकता और प्रासंगिकता वर्तमान समय में भी बनी हुई है। अव्वैयार की रचनाएं आज भी तामिलनाडु के स्कूलों में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा के रूप में सिखाई जाती है।

तामिल साहित्य के विद्वान साहित्यकार अपनी रचनाओं में क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कर अपनी रचनाओं को जटिल से जटिलतर बना दिया करते थे। इसके कारण जनसाधारण साहित्य से घबरा कर दूर चला जाता था। अव्वैयार ने साहित्य की भाषा सुरूचिपूर्ण और सरल रख कर अधिक से अधिक लोगों को तामिल साहित्य के प्रति रूचि पैदा करने का कार्य किया। बच्चों के लिए रचित उनके साहित्य को मात्र बच्चे ही नहीं वरन् वयस्क स्त्री पुरुष भी चाव से पढ़ते और समझते और आज तक उद्धरण देने में प्रयोग करते हैं। उनकी चार कालजयी रचनाएं: आतिसूड़ी,कोनरैवेनुतम्,मुत्तुऊरै और नलवयी हैं।आतिसूड़ि एक एक वाक्य के एक सौ नौ सूत्र हैं जो अत्यन्त अर्थपूर्ण हैं।कोनरैवेनुतम् शिवजी की स्तुति से प्रारंभ होकर उनके पुत्र गणेश की महिमा का बखान है।गजानन या गणेश उनके प्रियतम् ईश थे।मुत्तुऊरै अर्थात् मोती सम शब्द और नलवयी अर्थात् सही राह।उनका मानना था कि बच्चे का मस्तिष्क साफ़ स्लेट की तरह होता है जिसमें हम नीतिपूर्ण और सदाचार की कहानियों द्वारा एक सही और अच्छे राह की ओर प्रवृत्त कर सकते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि अव्वै बचपन से ही धार्मिक एवं साहित्यिक प्रवृत्ति की थी और मानव सेवा के प्रति जागरूक थी।अपनी सुन्दरता और बुद्धि चातुर्य के लिए भी वो जानी जाती थीं। अच्छे-अच्छे घरानों के युवक उनसे विवाह करने के इच्छुक थे। जहां साधारण युवतियां ऐसी स्थितियों का स्वागत् करतीं अव्वैयार को ये परिस्थितियां जानलेवा और डरावनी लगती थीं।वो ईश्वर से कहा करतीं थीं कि ये सब मेरी युवावस्था और सुंदरता को ही देख पा रहें हैं जबकि मैं स्वयं को ज्ञान की देवी को अर्पित करना चाहतीं हूं।वो उनसे प्रार्थना करतीं कि 'मेरी युवावस्था और सुंदरता को वापस लेकर मुझे मेरे इच्छित मार्ग पर चलने में सहायता कीजिए।' गजानन उनकी प्रार्थना सुनते रहे और अंततः उनकी मनोकामना पूर्ण होती दिखाई दी। असमय ही उनके शरीर पर झुर्रियां पड़ने लगी, केश का रंग श्वेत होने लगा, आंखें धुंधलाने लगी, स्तन ढीले होकर लटकने लगे और सारे अंग शिथिल पड़ गये। उन्होंने पास के कुएं में झांककर अपना प्रतिबिंब देखा और प्रसन्न हो ग‌ईं कि उनके इष्टदेव गणेश ने उनकी इच्छा का अनुमोदन कर दिया।अब वो स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रहीं थीं।

साधारणतया इंसान स्वयं को घर के सुरक्षित घेरे में रखना चाहेगा पर अव्वैयार घर को तज कर तामिलनाडु के विभिन्न प्रदेशों में भ्रमण करने लगीं।ऐसा लगता था मानो वे प्रकृति में छिपे सत्य को खोज रहीं थीं।उनकी दिनचर्या योग, आध्यात्मिक साधना और ज्ञान प्राप्त करने में बंटी हुई थी।अनेक राजघराने जो अपनी वीरता, परमार्थ और सद्भावना के लिए जाने जाते थे अव्वैयार की विद्वता से प्रभावित थे। उन्होंने अव्वैयार की साहित्यिक कृतियों को प्रोत्साहन दिया तथा उनके संस्कारित प्रतियों द्वारा उनको दूर दूर तक प्रसिद्धि दिलाई। यहां तक कि भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ विदुषी के रूप में स्थापित कर दिया।चेर राज्य के दो नामी शासक सुंदरर् एवं चेरमन अथवा सेरमन अव्वैयार के समकालीन थे।ये दोनों ही शिवभक्त थे और पुराण में शैव संत के रूप में इनका वर्णन किया गया है। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अव्वैयार जब अपने इष्टदेव की पूजा कर रहीं थीं उन्हें एक अलौकिक दृश्य के दर्शन हुए। सन्त सुंदरर् और सन्त सेरमन अपनी अंतिम यात्रा पर कैलाश पर्वत की ओर विचरण कर रहे थे।सुंदरर् एक श्वेत गज पर विराजमान थे और सेरमन श्वेत अश्व पर। अव्वैयार की तरह ही वो दोनों भी उन्हें देख पा रहे थे। अव्वैयार व्याकुल हो ग‌ईं कि उसे भी उन दोनों के साथ अंतिम यात्रा पर जाना है। वो अपनी पूजा को शीघ्रता से पूर्ण करने की चेष्टा करने लगी।तभी उनके इष्टदेव गणेश प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोले कि वो शांत और स्थिर मन से अपनी पूजा सम्पन्न करें। गणेशजी स्वयं उन्हें कैलाश पर्वत पर उन दोनों महानुभावों से पहले पहुंचा देंगे।

इस दृष्टांत के पश्चात अव्वैयार अवचेतनावस्था के गहरे दौर में पहुंच गईं और अपने इष्टदेव की स्तुति में उन्होंने "विनायक अहवाल" रच दिया।इस भजन या स्तुति को तामिलनाडु में वर्तमान में भी गाया जाता है, खास कर वार्षिक विनायक चतुर्थी के पुण्य अवसर पर।इस रचना को अव्वैयार ने जैसे ही समाप्त किया गणेशजी उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने अपनी सूंड से बड़ी ही सौम्यता से उन्हें उठाया और कैलाश पर्वत पर रख दिया।उनके दोनों आध्यात्मिक मित्र जब वहां पहुंचे तो आश्चर्य से पूछा कि वो पहले कैसे पहुंच ग‌ईं।इस प्रश्न पर तत्काल उन्होंने गणेशजी का आव्हान करते हुए एक दीर्घ काव्य रचना की।इस रचना में उनके इष्टदेव ने उनके जीवन में किस सुंदरता और लालित्यपूर्ण तरीके से परिवर्तन कर अपने आशीर्वाद से सराबोर रखा इसका वर्णन है। अपने नश्वर शरीर को छोड़ कर स्वर्ग लोक पहुंचने के अनुभव को साझा करते हुए वो पुलक और भावुकता से भर उठती हैं।बहत्तर पंक्तियों के इस काव्य को गणेश आव्हान के शीर्षक से तामिलजन वर्तमान में इतनी सदियों बाद भी गाते हैं।

तामिल भाषा या लिपी में प्रथम ग्रंथ "अगस्तियम" था जो अगस्त्य मुनि द्वारा बोला तथा गणेशजी द्वारा लिपीबद्ध किया हुआ माना जाता है।पर वर्तमान में उपलब्ध "तोल कापियम्" ही सबसे प्राचीन माना जाता है। 'तिरूकुरल' एक श्रेष्ठ तामिल ग्रंथ है जिसे अग्रिम स्थान का महत्व मिला हुआ है।पर अव्वैयार के 'आतिसूड़ी' को एक विशिष्ट स्थान मिला हुआ है। बच्चों को शिक्षा के प्रारंभ में ही इसे जन्मघूंटी की तरह या यूं कहें कि मां के दूध की तरह पिलाया जाता है। डेढ़ सौ वर्षों पूर्व के श्री उ. वे. स्वामीनाथन अय्यर को तामिल भाषा का दादा माना गया है जब कि तामिल भाषा की दादी मानी जाने वाली अव्वैयार हज़ार वर्ष से भी पूर्व पैदा हु‌ई थीं।अव्वैयार का मानना था कि बच्चे जब छोटे होते हैं तभी से उन में वैश्विक मूल्यों की अलख जगा देनी चाहिए। उनका रचित आतिसूड़ी एक ऐसा मूल्यवान रत्न है जो बच्चों में अक्षर ज्ञान के साथ इन मूल्यों की नींव भी रख देता है।इस रचना में अ से अनार या आ से आम अथवा ए से एप्पल और बी से बाॅल नहीं वरन् दो या तीन शब्दों का एक अर्थपूर्ण वाक्य है।एक सौ नौ इस तरह के वाक्य हैं जो इंसान को जीवन मूल्यों की अहमियत सिखाते हैं।

उदाहरणार्थ : अ से 'अरम चेय्य विरूम्पू' अर्थात् 'सदाचार करने की इच्छा रखो।'
आ से 'आरूवदु चीनम' अर्थात् 'क्रोध को नियंत्रण में रखो'।
इ से 'इयलवदु करवेल' अर्थात् 'दान पुण्य करना ना भूलें।'
ई से 'ईवदु वील्लकेल ' अर्थात् 'लोकोपकार करने से मत चूको।'
समस्त वर्णमाला इसी तरह के आदर्श वाक्यों से युक्त है।

यह सही में अद्भुत है कि हजार वर्षों बाद भी अपनी छोटी छोटी,सहज रचनाओं से अव्वैयार जनमानस के दिलोदिमाग पर छाईं हु‌ईं हैं। बच्चों के आदर्श और मार्गदर्शक के रूप में आज भी उनकी रचनाओं का उपयोग करते हैं। कदाचित इनकी सहज और आश्वस्त करने वाली लेखन शैली से यह संभव हुआ है। वैश्विक स्तर पर माने जाने वाले जीवन मूल्यों को कम से कम शब्दों में सुरूचिपूर्ण ढंग से व्यक्त करना सरल नहीं होता है। अव्वैयार यही करती रहीं और अपनी रचनाओं के साथ अमर हो ग‌ईं। उनके दो बहुमूल्य कथन तो ना जाने कितनी बार उदाहरणार्थ दिए गए होंगे: १.कोई मंदिर माता से अधिक पवित्र नहीं हो सकता तथा २.कोई मंत्र पिता के कथन से बड़ा नहीं हो सकता ।

सन् २००१ में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी,बर्कले में जब तामिल विभाग का शुभारंभ हुआ तो विद्वान कुमार कुमर‌अप्पन ने कहा था- "भाषा मात्र परस्पर संवाद करने हेतु नहीं होती।भाषा एक ऐसा कोष है जो उस समाज का सम्मिलित इतिहास और विरासत को समेटे हुए होता है।"

श्री कुमार कुमर‌अप्पन का यह कथन कितना सही है इसे हम प्रत्यक्ष महसूस कर पा रहे हैं। वरना सदियों पहले रची गईं कृतियां हमें उस इतिहास और उसकी विरासत से कैसे परिचित करातीं! अव्वैयार की कृतियों की कुछ पंक्तियों में हम उनके अनुभवों की थाह पा सकते हैं। उनका कहना था- "सूर्य जिस तरह बादलों में छुप कर हमें दिखाई नहीं देता उसी तरह हमारी स्वयं की सच्चाई भ्रम में छुपी रहती है। हमारा अहं हमें अपनी सच्चाई से दूर करता है। पर फिर भी इंसान अपनी असलियत और सच्चाई के बिना अस्तित्व नहीं रखता है। हमारा झूठा दंभ ही मैं को अहं बनाता है अर्थात् अहंकार पैदा करता है जब कि मैं आत्मा से विलग नहीं है।'ओम् ' जिसे हम अंतर्मन से उच्चरित करते हैं वही सच्चाई है 'ओम्' शिव एवं गणेशजी का साझा प्रतीक या चिन्ह है। गणेश योगियों के इष्ट हैं जो जीवात्मा और परमात्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करते हैं।"

यह कितना अद्भुत लगता है जब हजारों वर्षों पश्चात उनकी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद २०२० में सुश्री गीता धर्मराजन द्वारा कथा इंडिया के लिए हुआ। ' डियर अर्थ' शीर्षक से सुशोभित ये रचनाएं अव्वैयार को धरती से जुड़ी हुई प्रकृति प्रेमी की तरह पेश करतीं हैं। उनके कथनों को समय समय पर देश ही नहीं विदेशों में भी प्रेरणादायक वाक्यों की तरह प्रस्तुत किया गया है। अमेरिका के 'नासा' में वैज्ञानिकों और अन्य कर्मचारियों को सतत् प्रोत्साहन हेतु उनके कथन का अंग्रेजी अनुवाद लिखा हुआ है। जिसका आशय इस तरह है : 'जितना तुमने सीखा या ज्ञान प्राप्त किया वो मात्र मुठ्ठी भर है और जो सीखना शेष है वो एक समुद्र के बराबर है।'

अभी हाल में हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने एक सन्दर्भ में उनके कथन को श्रद्धा पूर्ण भाव से प्रस्तुत किया। उनका कहना था : 'निस्वार्थ सेवा भाव उसी तरह है जैसे नारियल का वृक्ष जमीन से पानी लेकर अपने फल नारियल द्वारा मीठा जल प्रदान करता है।' तामिलनाडु में मुरूगन के छः प्रसिद्ध मंदिर,आरूपडै वीडु टेम्पल्स के नाम से मशहूर हैं।पयमुदुच्चोलै नामक स्थान पर जो मुरूगन मंदिर है उसी स्थल पर भगवान ने अव्वैयार को दर्शन दिए थे तामिलनाडु के नागरकोविल में अव्वैयार के नाम पर बना अव्वैयार अम्मन कोविल है।

अव्वैयार अपने इष्टदेव गणेश की कृपा से स्वत: दीप्त हु‌ई और स्वत: प्रमाणित भी हुईं। उन्होंने गणेशजी की आराधना करते हुए शिव की उच्च चेतना की अवस्था को प्राप्त किया था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि तामिलजन आश्वस्त हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी के नौनिहालों को एक सही और सच्चे मार्गदर्शक के रूप में अव्वैपाटी (दादी) अर्थात् विदुषी अव्वैयार की रचनाओं से प्रेरणा मिलती रहेगी।