समय ने बदली चाल (बाल कहानी) : अनुराधा प्रियदर्शिनी

खुशी बहुत ही चंचल और शरारती बच्ची थी दिनभर खेलना मोबाइल और टी वी देखना बस यही उसकी दुनिया थी। बहुत बार खुशी के देर तक खाना खाने की आदत से उसकी माँ परेशान हो जाती थी। उन्होंने कई बार उसे समझाया लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था। फिर एक दिन खुशी की माँ को एक युक्ति सूझी वो उसे लेकर गंगा जी के तट पर पहुँची जहाँ रेत की चादर बिछी थी।

खुशी को भी मजा आ रहा था ऐसे प्राकृतिक वातावरण में खुली हवा और दूर तक फैला नीला आसमान। वहीं पास में कुछ बच्चे रेत से खेल रहे थे। वो उस रेत को मुठ्ठी में रोकने का असफल प्रयास कर रहे थे।

खुशी ने भी देखा देखी यही हरकत करनी चाही लेकिन रेत को जितना पकड़ो वो फिसलती जा रही थी। उसकी माँ सब देख रही थी।

आखिर कार उन्हें यही समय खुशी को वक्त की अहमियत बताने का उचित लगा और बोलीं, “खुशी बेटा इधर आओ और देखो ये समय की भाँति ही रेत होती है। समय की गति को रोक पाना असंभव है वो हथेली में रखे उसी रेत की भाँति है जो नदी के तट पर एक हाथ से फिसल कर दूसरे हाथ की हथेली पर गिरती है और पुनः वहाँ से फिसलती हुई नदी की धारा के साथ बहती चली जाती है।”

समय के धारा को रोकने की बजाय समझदारी उसके साथ चलने में हैं। जीवन में सफलता भी उसे ही मिलती है जो समय की कीमत को समझता है और अपना समय व्यर्थ न करते हुए वर्तमान में मिले कर्मों को एक नियोजित ढंग से करता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।

कोई भी व्यक्ति अपने बीते हुए कल में पुनः नहीं जा सकता और न ही उस काल परिस्थिति में लिए गए अपने कर्म विशेष के निर्णय को नहीं बदल सकता। जिस प्रकार भूतकाल के कर्म आज परिणाम बनकर उसके सम्मुख हैं वो खुशी या दुख कुछ भी हो सकता है इसी भाँति जो वर्तमान है वो उसके भविष्य को प्रभावित करता हैं।

अत: वर्तमान के प्रत्येक क्षण को रेत के कणों की भांति संजोकर उसे अपने सुकर्मों द्वारा वो अपने सुनहरे भविष्य का महल खड़ा कर सकता है।

वहाँ देखो वो शिवाय जो दिख रहा है इन्हीं रेत के कणों और पत्थरों से बना है।

खुशी ने मंदिर की ओर देखा जो अपनी भव्यता का बखान खुद ही कर रहा था। मंदिर के शिखर पर लहराता झण्डा आसमान से बातें कर रहा था।

इस घटना का असर खुशी के दैनिक जीवन के प्रत्येक घटना पर पड़ा वो अब सुबह स्कूल जाने के लिए एक बार जगाने पर उठ जाती थी। स्कूल से आकर अपना ड्रेस, जूते मोजे और किताबों से भरा बैग एक निश्चित स्थान पर रखने लगी थी।

आते ही दोपहर का खाना खा लेती और फिर मम्मी से बोलती होमवर्क करने को। इसका परिणाम यह हुआ कि अब उसे शाम को खेलने जाने पर डाँट नहीं पड़ती थी। धीरे धीरे वार्षिक परिणाम का समय भी आ गया। खुशी अपनी कक्षा में बहुत अच्छे नंबरों से पास हुई थी। अब वो समर कैंप में डांस क्लास में भी भाग ले रही है।

खुशी की शैक्षणिक और व्यवहारिक प्रगति ने उसमें आत्मविश्वास भर दिया था और यह सब केवल समय की महत्ता को समझकर ही संभव हुआ था।

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