हवा ऐसी चली कि मुँडेर पर बैठा कौआ भी अपने पंख समेटने लगा। गलियारे में सन्नाटा तो था, पर ऐसा जो कानों में सुइयाँ चुभा रहा था। कमरे के भीतर चार सिर झुके हुए थे। कल तक जो 'साहब' की छींक पर सात बार 'जुग-जुग जियो' की दुआएँ पढ़ते थे, आज उनकी आँखों में गिद्ध जैसी चमक थी। "चले गए?" छोटे ने धीरे से पूछा। बड़े ने खैनी थूकते हुए जवाब दिया, "चले क्या गए, जान छुड़ा गए।" मँझला चुपचाप कोने में रखे उस भारी संदूक को ताक रहा था, जिसमें बरसों की कमाई और 'इज़्ज़त' बंद थी। सुबह का सूरज अभी निकला भी नहीं था कि पूरे मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई। लोग जमा होने लगे, दुख बाँटने के लिए नहीं, बल्कि यह देखने के लिए कि अब कौन सा खूँटा कहाँ गड़ेगा। एक पड़ोसी ने दूसरे के कान में फुसफुसाया— "भाई साहब, यह तो होना ही था, जिसकी लाठी उसकी भैंस।" भीतर भाई एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे मानो आँखों-आँखों में ही ज़मीन नाप लेंगे।
"बिस्तर उठा दूँ?" नौकर ने काँपती आवाज़ में पूछा। "अभी नहीं, पहले हिसाब होगा," मँझले की आवाज़ में बर्फ़ सी ठंडक थी। बाहर बरामदे में बैठे चाचा अपनी माला फेरते हुए बोले, "बड़े सिद्धांतों वाले आदमी थे भाई साहब, पर सिद्धांतों से पेट कहाँ भरता है?" पास बैठे मुंशी जी ने ठहाका लगाया, "सिद्धांत? वे तो उस पोंछे जैसे थे जिससे वे रोज़ अपना दाग़दार चेहरा साफ़ करते थे।" घर के भीतर खींचतान शुरू हो गई थी। हर कोई यह साबित करने में लगा था कि वही सबसे वफ़ादार है। जो चले गए, उन्हें 'ग़द्दार' घोषित कर दिया गया। छोटे ने कहा, "शहर वाली ज़मीन मेरी।" बड़े ने उसे घूरकर देखा, "और जो कर्ज़ा छोड़ गए हैं, वह? वह क्या तेरा बाप भरेगा?" छोटे की आवाज़ भर्रा गई, "बाप तो चले गए।" बड़े ने मेज़ पर मुक्का मारा, "वो तो सबको जाना है, पर जो यहाँ बचा है, उसे यहाँ रहने की क़ीमत तो चुकानी ही होगी!"
हवा में एक अजीब सी गंध थी—इत्र और सड़न का मिला-जुला अहसास। "तुम रो नहीं रहे?" एक रिश्तेदार ने पूछा। "आँसू सूख गए साहब, अब बस प्यास बची है," उत्तर मिला। घर की औरतों ने सिसकियाँ लेनी शुरू कीं तो लगा जैसे कोई बेसुरा साज़ बज रहा हो। उन सिसकियों के पीछे कौन सी साड़ी किसकी होगी, इसका गणित चल रहा था। हर कोई अपनी जगह पक्की करने के लिए दूसरे की जड़ें काटने में लगा था। "वे तो बेचारे बहुत सीधे थे," बाहर से किसी की आवाज़ आई। भीतर से तुरंत जवाब मिला, "इतने सीधे कि लकड़ी बन गए, अब जलने के ही काम आएँगे।" धूप तेज़ हुई तो साये छोटे होने लगे। कुर्सियाँ अपनी जगह टस से मस नहीं हुईं, बस उन पर बैठने वालों का हुलिया बदल रहा था। हर नया दावेदार खुद को उस विरासत का असली वारिस बता रहा था, जिसे कल तक वह बोझ कहता था। रिश्तों के चिथड़े उड़ रहे थे और वफ़ादारी का बाज़ार गर्म था।
शाम ढली तो वह संदूक खोला गया। सबकी साँसें ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गईं। चाबी घूमी, ढक्कन खुला। भीतर न सोना था, न काग़ज़। बस एक पुराना आईना रखा था और उस पर एक पर्ची थी। काँपते हाथों से बड़े ने उसे पढ़ा। लिखा था— "मैं कहीं नहीं गया, बस छत के ऊपर वाले उस कमरे में बैठा हूँ जिसकी चाबी खो गई थी। तुम सबका तमाशा देख रहा था।" अचानक ऊपर के बंद कमरे से एक ज़ोरदार ठहाका गूँजा। नीचे खड़े चारों भाइयों के चेहरे सफ़ेद पड़ गए। उनकी आँखों में अब आँसू नहीं, बल्कि मौत का डर तैरने लगा। वे समझ गए कि जिसे वे 'गया' समझकर बंदरबाँट कर रहे थे, उसने तो उनकी रूहों का सौदा पहले ही कर लिया था। घर में असली मातम अब शुरू हुआ था, क्योंकि 'जाने वाला' लौट आया था और 'रहने वाले' अब कहीं के नहीं रहे थे।