साख पर बट्टा : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

उस दिन घर के स्टोर-रूम के सबसे अंधेरे कोने में, जहाँ मकड़ियों ने अपनी नई रियासत बसाई थी, एक दिल दहलाने वाला हादसा हुआ। घर की नई बहू ने कबाड़ साफ करते हुए एक भारी, आयताकार पत्थर को पैर से ठेल दिया। वह पत्थर, जो कभी इस घर की रसोई का भीष्म पितामह था, जिस पर मेरी दादी ने अपनी पूरी जवानी घिस दी थी और जिसकी रगड़ से निकली खुशबू मोहल्ले के आवारा कुत्तों की भूख भी जगा देती थी, आज अपनी ही औलादों के घर में अछूत हो गया था। सिलबट्टा मरता नहीं है, वह बस चुप हो जाता है। उसकी यह चुप्पी किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की संवेदनाओं से साक्षात्कार करने लगती है। आज के इस ग्लास-फिनिश वाले ज़माने में, जहाँ रिश्ते भी इंस्टेंट नूडल्स की तरह दो मिनट में बनते और बिगड़ते हैं, वह सिलबट्टा उस पुराने, वफादार मज़दूर की तरह कोपभवन में पड़ा है, जिसे जबरन वीआरएस के बाद घर के बाहर वाले कमरे में खटिया दे दी गई हो।

सिलबट्टे का जाना दरअसल हमारे घर की ममता का अंत है। हमें याद है, माँ जब उस पर लाल मिर्च और लहसुन का इंसाफ करती थी, तो पत्थर और बट्टे की जो जुगलबंदी होती थी, वह किसी रूहानी संगीत से कम नहीं थी। वह सूँ-सूँ की आवाज़... वह पत्थर का पत्थर से टकराना... वह केवल मसाला नहीं पिस रहा होता था, बल्कि माँ अपने दिन भर की सारी थकान, सारा गुस्सा और सारा प्यार उस सिल पर उंडेल देती थी। सारा गुस्सा सिलबट्टे पर उंडेल देने से घरवालों से लड़ाई-झगड़ा करने का मन ही नहीं होता था। सिलबट्टे से चटनी नहीं बनती थी, वह माँ के हाथ का रक्तचाप होता था जो हमारे पेट में जाकर हमें सुकून देता था। आज की मिक्सी तो कैंसर की मशीन है। वह चलती है तो ऐसा लगता है जैसे घर में कोई इलेक्ट्रिक कटर चल रहा हो। इस आवाज़ का दिमाग पर भी असर होता है। इस आवाज़ के चलते छोटी-छोटी बातें कब पहाड़ बन कर अनबन कर दें, पता ही नहीं चलता है। मिक्सी मसालों को पीसती नहीं है, उनके अरमानों का कत्ल कर देती है। मिक्सी के ब्लेड मसालों को इतनी बेरहमी से काटते हैं कि बेचारे धनिये का डीएनए बदल जाता है। स्वाद तो उस रगड़ में था, उस घर्षण में था, जो अब केवल इतिहास की किताबों में मिलेगा। दरअसल सिलबट्टा वह बुजुर्ग था, जिसकी उपस्थिति मात्र से रसोई में एक अनुशासन रहता था। जब सुबह-सुबह उस पर लयबद्ध तान छिड़ती थी, तो ऐसा लगता था जैसे प्रकृति स्वयं कोई राग दरबारी गा रही हो। वह सिल को टांकने (छेदने) वाला शिल्पकार जब साल भर बाद आता था, तो वह हमारे लिए किसी सॉफ्टवेयर अपडेट करने वाले इंजीनियर से बड़ा होता था। वह छेनी-हथौड़ी से पत्थर पर जो झुर्रियां उकेरता था, वही स्वाद का असली माइक्रोचिप हुआ करती थीं। अब तो रसोई स्मार्ट हो गई है, पर उसमें वो सौंधापन कहाँ से लाओगे जो केवल मिट्टी और पत्थर के मिलन से पैदा होता था?आज की मिक्सी तो मसालों के साथ वही थर्ड डिग्री बर्ताव करती है जो पुलिस कस्टडी में किसी गुनहगार के साथ होता है। इतनी जोर से घुमाती है कि धनिया अपनी खुश्बू भूल जाता है और जीरा अपना वजूद। मिक्सी ने हमें समय तो दिया, पर उस तृप्ति को छीन लिया जो केवल पत्थर के सीने पर रगड़ खाकर ही निखरती थी।

पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब हम देखते हैं कि इस महान पत्थर को अब केवल विवाह की रस्मो में एक दिखावे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। शादी के दिन, जब घर के आंगन में सूप, ओखली और सिलबट्टे जैसे विंटेज कलाकारों को सजाकर रखा जाता है, तो वह दृश्य देखकर कलेजा मुँह को आता है। वह वैसा ही है जैसे किसी बूढ़े बाप को वृद्धाश्रम से सिर्फ इसलिए एक दिन के लिए घर लाया जाए ताकि बेटे की शादी की फोटो में पारिवारिक परंपरा दिख सके। यह तो केवल विवाह के मंडप में स्पेशल अपीयरेंस देने के लिए बचा है, जिसे साल भर कोई नहीं पूछता, पर रस्म के नाम पर उसे कुंभ के मेले में छूट गए सूप और ओखली जैसे अपनों के बगल में बिठाकर उसकी फोटो खींच ली जाती है। शादी के दिन उसे हल्दी की रस्म में नहलाया जाता है, कलावा बांधा जाता है, जैसे वह कोई बहुत बड़ा शहीद होने जा रहा हो। दूल्हा-दुल्हन उसे छूकर कसमें खाते हैं, मानो कह रहे हों, "देखो भाई, आज देख लो, इसके बाद तो हम 'ऑनलाइन डिलीवरी' और मिक्सर ग्राइंडर के हवाले हैं।" शादी खत्म होते ही उस बेचारे सिलबट्टे का तलाक हो जाता है और उसे स्टोर रूम के उस अंधेरे कोने में फेंक दिया जाता है जहाँ छिपकलियां अपनी अदालत लगाती हैं।

सिलबट्टे के जाने से जो गुण गए, उनमें सबसे कीमती गुण था— ठहराव। आज की पीढ़ी 'चुटकी बजाते ही हो जाए' में विश्वास रखती है। उन्हें सब कुछ जल्दी चाहिए। जल्दी खाना, जल्दी सफलता, जल्दी ब्रेकअप। सिलबट्टा धैर्य सिखाता था। वह बताता था कि अगर स्वाद चाहिए, तो रगड़ना पड़ेगा। वह बताता था कि निखार तभी आता है जब तुम खुद को घिसते हो। मिक्सी ने हमें आलसी और अहंकारी बना दिया है। वह बटन दबाते ही काम कर देती है, इसलिए हमें मेहनत की कीमत समझ नहीं आती। यह सोचकर आँखें भर आती हैं कि जिस पत्थर ने पीढ़ियों तक हमारे सीने की जलन को अपनी ठंडक से शांत किया, आज हम उसी को बोझ समझ रहे हैं। वह सिलबट्टा आज भी स्टोर-रूम में पड़ा शायद यही सोचता होगा कि क्या मेरी रगड़ इतनी चुभने वाली थी कि तुमने मुझे ज़िंदा दफ़न कर दिया? आज की बहुओं को सिलबट्टा चलाने में स्लिप डिस्क का डर लगता है, पर जिम में जाकर पाँच किलो का डंबल उठाना स्वैग लगता है। क्या विडंबना है! हमने अपनी विरासत को कचरा समझ लिया और प्लास्टिक को अपनी पहचान। मिक्सी ने जार में जो बारीक पेस्ट बनाया है, वह दरअसल हमारी भावनाओं का कीमा है।

मिक्सी से आप पेट तो भर लोगे, पर वह तृप्ति कहाँ से लाओगे जो माँ की उंगलियों से उस सिल पर पुछी गई आखिरी बूंद चटनी में होती थी? वह सिलबट्टा महज़ एक पत्थर नहीं था, वह घर की औरतों का मनोवैज्ञानिक था। वह उनके दुखों को पीसकर ज़ायका बना देता था। आज घर में मिक्सी है, माइक्रोवेव है, चिमनी है, पर वह बरकत नहीं है। क्योंकि बरकत तो उस मेहनत में थी जो पत्थर पर पसीना बनकर गिरती थी। सिलबट्टे का वनवास हमारी आत्मा का वनवास है। हमने मशीनों को घर में जगह दे दी और अनुभवों को बाहर निकाल दिया।

जब आप अगली बार अपनी रसोई में मिक्सी का बटन दबाएं, तो एक पल के लिए रुककर उस चीख को सुनिएगा जो उस मशीन के अंदर मसालों के जलने से पैदा होती है। और फिर याद कीजिएगा उस शांत, गंभीर और सहनशील पत्थर को, जो आज भी आपके घर के किसी अंधेरे कोने में अपनी शहादत का इंतज़ार कर रहा है। सिलबट्टा मर चुका है। हम उसकी तेरहवीं पर ज़ोमैटो से मंगाई गई फीकी दाल खाकर आधुनिक होने का ढोंग कर रहे हैं। यह उस हर इंसान के गाल पर तमाचा है जिसने अपनी जड़ों को ओल्ड फैशन कहकर काट दिया है। सच तो यह है कि असली स्वाद बटन दबाने में नहीं, बल्कि हाथ चलाने में है।