नीले टिक का तर्पण : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

बनारस की उस पुरानी पुश्तैनी हवेली के दालान में गंगा की लहरों का शोर कम, नोटिफिकेशन की घनघनाहट ज़्यादा थी। पंडित दीनानाथ अपनी लकड़ी की आराम कुर्सी पर ऐसे पसरे थे, जैसे ऑफलाइन दुनिया के आखिरी पुरावशेष हों। हाथ में मोबाइल ऐसे चिपका था जैसे शरीर का कोई नया अंग प्रगट हो गया हो। पोता कल्लू पास आकर बोला, "बाबा, बगल वाले टोले से बुआ का फोन आया था... कह रही थीं कि फुआ की तबीयत बहुतै खराब है। दवा-दारू के लिए कुछ कह रही थीं।" दीनानाथ की उंगलियां स्क्रीन पर किसी सधे हुए तबला वादक की तरह थिरक रही थीं। "अरे गुरु... देते हैं। ज़रा ठहरो, ये जीवन के पाँच अटल सत्य वाला वीडियो ग्रुप में पेल दें, दुनिया का उद्धार हो जाएगा।" कल्लू ने माथा पीटा, "बाबा, फुआ को अस्पताल ले जाना पड़ेगा, बुआ घबराई हुई हैं।" दीनानाथ ने बिना चश्मा ऊपर किए जवाब दिया, "अरे लल्ला, घबराने से क्या होगा? ये देख, प्राणायाम के चमत्कार वाली रील मिली है। अपनी फुआ को फॉरवर्ड कर दे, देखते ही ऑक्सीजन लेवल चकाचक हो जाएगा!" कल्लू चला गया। पंडित जी अब उस परम फोटो की तलाश में थे जिसमें उगता सूरज थोड़ा वैराग्य ओढ़े लगे और नीचे लिखा हो— "रिश्ते देह से नहीं, डेटा से अमर होते हैं।" वे जुड़ाव की इस डिजिटल जुगाली में इतने विभोर थे कि दूर कहीं बजती एम्बुलेंस की आवाज उन्हें किसी बैकग्राउंड म्यूजिक जैसी लग रही थी।

सॉकेट पर चार्जर ऐसे लटके थे जैसे दशाश्वमेध घाट पर मन्नत के कलावा। बिजली की हर तरंग के साथ पुण्य का मीटर बढ़ रहा था। पंडित जी ने देखा, शुद्ध सनातनी सखा वाले ग्रुप में सन्नाटा है। उन्होंने फौरन एक फोटो डाली— ओस की ऐसी बूंद कि स्क्रीन भीग जाए। नीचे लिखा— "अपनों का संचय करें, समय बालू की तरह फिसल रहा है।" लिखते ही उन्हें जो ब्रह्मानंद मिला, लगा जैसे साक्षात् मोक्ष का द्वार उनके लिए खुल गया है। तभी कल्लू फिर आया, चेहरा एकदम भभका हुआ। "बाबा, बुआ का फिर फोन आया था। कह रही थीं कि फुआ अब कुछ बोल नहीं रही हैं। आप बड़े भाई हैं, एक बार वहां चले जाते तो..." पंडित जी झल्ला गए, "अरे काहे पैनिक फैला रहे हो बे? ये देखो, हमने ग्रुप में डाल दिया है कि चिंता चिता समान है। सब ओम लिख रहे हैं। तू भी लिख, पुण्य मिलेगा। और सुनो, ये फोटो देखो, इसमें गेंदे का फूल इतना असली है कि सुगंध सीधे आत्मा तक जाएगी।" कल्लू ने कांपते हाथों से अपना फोन देखा। वहां उसकी बुआ के संदेश के ऊपर सुप्रभात के चमकीले पीले फूलों का ढेर लग चुका था। संवेदनाएं आउटसोर्स हो चुकी थीं। पंडित जी मंद-मंद मुस्कुराए, देख, सबने प्रणाम वाला इमोजी भेजा है। अब फुआ को कुछ नहीं हो सकता। मॉडर्न काल है लल्ला, यहाँ यमराज भी बिना डेटा के नहीं आते।

रात गहरा गई। दीनानाथ ने शुभरात्रि का ऐसा बम फेंका कि ग्रुप के आधे लोग पापबोध से मर जाएं कि वे अभी तक सोए क्यों नहीं। खुद दो घंटे तक जागकर ये कुंडली खंगालते रहे कि किसने सीन किया और किसने इग्नोर। "धत तेरे की... ये मिश्रा जी ने अभी तक ब्लू टिक नहीं दिया? कल ही अहंकार का विनाश वाली रील भेजूंगा इनको।" अंधेरे कमरे में मोबाइल की नीली रोशनी उनके चेहरे को किसी शव की तरह धवल कर रही थी। तभी उनके फोन पर बुआ की तरफ से एक मिस्ड कॉल आई, फिर सब सन्न हो गया। पंडित जी को लगा शायद नेटवर्क चला गया। उन्होंने फोन झकझोरा। "अरे कल्लू, ज़रा देखो तो राउटर की बत्ती जल रही है क्या? इंटरनेट मर गया तो समझो हम भी मर गए।" कोई जवाब नहीं आया। दीनानाथ को क्रोध आया। उन्होंने ग्रुप पर मैसेज डाला— "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।" खुद की लिखी दर्शन की गहराई पर वे खुद ही लट्टू हो गए। उनकी उंगलियां अब भी चल रही थीं, भले ही कई मील दूर एक हृदय की धड़कनें एकदम सुस्त पड़ चुकी थीं। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि अगर वे एक पल के लिए भी डिस्कनेक्ट हुए, तो यह सृष्टि उनके बिना चलना बंद कर देगी।

सुबह का सूरज ठीक वैसा ही निकला जैसा पंडित जी की सुप्रभात वाली फोटो में था— थोड़ा धार्मिक, थोड़ा प्रखर। वे कल रात वाली परम फोटो के साथ ऑनलाइन प्रगट हुए। ग्रुप पर वही फोटो पोस्ट की— "अपनों को गले लगाओ, कल किसने देखा है?" तभी कल्लू का मैसेज फ्लैश हुआ। पंडित जी ने चश्मा पोंछा, चलो, कम से कम पोता तो डिजिटल धर्म को समझ रहा है। मैसेज खोला। भीतर कोई फोटो नहीं थी, कोई सुविचार नहीं था। सिर्फ एक लोकेशन पिन थी जो श्मशान घाट की ओर इशारा कर रही थी और नीचे लिखा था— "बाबा, फुआ कल रात ही विदा हो गईं। आप ऑनलाइन होकर मोक्ष ढूंढ रहे थे, वो ऑफलाइन होकर घाट पहुँच गईं। अब ये फोटो अपने ग्रुप में डाल दीजिए, बहुत लाइक और श्रद्धांजलि वाले इमोजी मिलेंगे।" पंडित जी के हाथ से फोन छूटकर दालान के पत्थरों पर जा गिरा। स्क्रीन कचर-कचर होकर टूट गई थी, पर भीतर से अब भी नोटिफिकेशन की टिटिहारी गूँज रही थी— "मिश्रा जी लाइक्ड योर स्टेटस।" कई मील दूर फुआ की पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हो रही थी और पंडित जी के हाथ अपनी ही उस फोटो को डिलीट करने के लिए थरथरा रहे थे, जिसमें लिखा था— "रिश्ते निभाने के लिए मोबाइल नहीं, मन चाहिए।" स्क्रीन के कांच के महीन टुकड़े उनके अंगूठे में चुभ गए थे, रक्त की बूंदें टपक रही थीं, पर अफसोस, उस सिसकते खून का कोई फिल्टर उनके फोन में मौजूद नहीं था। संवेदनाओं का एक्सीडेंट हो चुका था और एम्बुलेंस के बदले शुभकामनाओं के फूलों की डिजिटल सुनामी आ रही थी।