मनुष्य का पहला विद्यालय है माँ (लेख) : गोलेन्द्र पटेल
Manushya ka pehla vidyalaya hai maan : Golendra Patel

माँ जीवन की ज्योति है! मातृ दिवस केवल फूल, शुभकामनाओं और भावुक संदेशों का उत्सव नहीं है; यह मनुष्य की सभ्यता, संस्कृति और संवेदना के सबसे मूल स्रोत को स्मरण करने का दिन है। यह उस स्त्री के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिसने अपने शरीर, श्रम, सपनों और जीवन को जलाकर अगली पीढ़ियों के लिए भविष्य का दीपक बनाया। संसार की प्रत्येक भाषा में “माँ” शब्द सबसे पहले सीखे जाने वाले शब्दों में है, क्योंकि मनुष्य का पहला विद्यालय माँ की गोद ही होती है। वह केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ देने वाली सत्ता है। इसी कारण भारतीय परम्परा में कहा गया, “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।।” यह वाक्य केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का नैतिक उद्घोष है कि माँ मनुष्य के अस्तित्व का प्रथम आधार है।

माँ की ममता को किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता। वह भाषा से बड़ी अनुभूति है। सच तो यह है कि मनुष्य स्वयं एक शब्द हो सकता है, पर माँ पूरी भाषा होती है। उसकी गोद में शिशु केवल दूध नहीं पीता, बल्कि विश्वास, सुरक्षा, धैर्य और प्रेम का पहला पाठ सीखता है। कड़कती धूप में माँ शीतल छाया की तरह होती है; जीवन के अंधेरों में दीपक की तरह; निराशा के क्षणों में साहस की तरह। संसार में मनुष्य जितना भी कठोर क्यों न हो जाए, उसकी स्मृतियों में माँ हमेशा सबसे कोमल जगह घेरती है। यही कारण है कि बचपन की सबसे उजली स्मृतियों में अक्सर माँ का चेहरा, उसका आँचल, उसकी डाँट, उसकी थपकी और उसकी लोरियाँ उपस्थित रहती हैं। किन्तु मातृ दिवस का अर्थ केवल भावुक होकर माँ की तस्वीर साझा कर देना नहीं होना चाहिए। यदि समाज सचमुच माँ का सम्मान करना चाहता है, तो उसे उन परिस्थितियों को बदलना होगा जिनमें करोड़ों माताएँ अपना जीवन काटती हैं। विशेषकर दलित-बहुजन, श्रमिक, किसान और वंचित वर्ग की माताओं का जीवन केवल ममता का नहीं, बल्कि कठोर संघर्ष का इतिहास है। वे ईंट ढोती हुई माँएँ हैं, खेतों में काम करती हुई माँएँ हैं, दूसरों के घरों में श्रम करती हुई माँएँ हैं, जो अपनी भूख मारकर बच्चों का पेट भरती हैं। उनके हिस्से में अक्सर सम्मान नहीं, अपमान आता है; शिक्षा नहीं, अभाव आता है; विश्राम नहीं, अंतहीन श्रम आता है। समाज माँ को “देवी” तो कहता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसी स्त्री को पितृसत्ता, गरीबी, जातिगत भेदभाव और अशिक्षा की बेड़ियों में जकड़ देता है। यह विडम्बना है कि जिन स्त्रियों के चरणों में स्वर्ग बताया गया, उन्हीं के जीवन में नरक जैसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं। मातृ दिवस का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल पूजा से माताओं का जीवन बदल जाएगा? क्या केवल कविता या श्लोक पढ़ लेने से किसी माँ के आँसू रुक जाएँगे? क्या केवल “माँ महान है” कह देने से वह सुरक्षित, शिक्षित और स्वतंत्र हो जाएगी? यदि नहीं, तो हमें भावुक आदर्शवाद से आगे बढ़कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में सोचना होगा। भारतीय समाज में माँ के प्रति सम्मान की एक समृद्ध परम्परा रही है। “नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।/ नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा।।” जैसे श्लोक माँ को संसार की सबसे बड़ी छाया और आश्रय बताते हैं। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” माँ और मातृभूमि को स्वर्ग से भी महान मानता है। इन वचनों में निहित संवेदना अत्यंत सुंदर है, किन्तु इनका वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब समाज हर माँ को गरिमामय जीवन देगा। यदि कोई माँ अपने बच्चों को छुआछूत, भुखमरी, अपमान और हिंसा के बीच पालने को मजबूर है, तो केवल शास्त्रीय वंदनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। माँ का सम्मान तभी सच्चा होगा जब उसकी सामाजिक स्थिति बदलेगी।

आज का समय हमें आत्ममंथन के लिए भी बाध्य करता है। आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य अपनी माँ से दूर होता जा रहा है। महानगरों की चमक में बूढ़ी माँओं के लिए जगह छोटी पड़ती जा रही है। जिन माँओं ने बच्चों का बचपन अपने हिस्से के सुख त्यागकर सँवारा, वही माँएँ बुढ़ापे में अकेलेपन, उपेक्षा और वृद्धाश्रमों की पीड़ा झेल रही हैं। यह केवल पारिवारिक संकट नहीं, बल्कि संवेदनहीन होती सभ्यता का संकेत है। संतान बचपन में माँ के प्रेम को अधिकार समझती है, पर जब माँ को सहारे की आवश्यकता होती है, तब वही संतान अक्सर जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेती है। यह विसंगति मातृ दिवस को और अधिक गंभीर बना देती है। माँ के प्रति प्रेम का अर्थ केवल भावुक स्मृतियों में डूबना नहीं, बल्कि उसके श्रम और त्याग को समझना भी है। माँ वह स्त्री है जो अपने हिस्से की भूख बच्चों के हिस्से की रोटी में बदल देती है। वह अपने सपनों को स्थगित कर बच्चों के भविष्य का निर्माण करती है। उसकी उँगलियों के स्पर्श में चिकित्सक की तरह उपचार की क्षमता होती है। उसकी डाँट में भी करुणा छिपी होती है। वह टूटती है, पर परिवार को टूटने नहीं देती। वह रोती है, पर बच्चों के सामने मुस्कुराती है। इसी कारण माँ केवल जैविक संबंध नहीं, बल्कि मानवीय सभ्यता की नैतिक आत्मा है। मातृ दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि माँ का सम्मान केवल निजी नहीं, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न भी है। जब तक महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति, निर्णय और स्वतंत्रता का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक मातृ सम्मान अधूरा रहेगा। किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी स्त्रियों की स्थिति से मापी जाती है। इसलिए मातृ दिवस पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम स्त्रियों के अधिकारों, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष करें। विशेष रूप से दलित-बहुजन माताओं के संघर्ष को समझना और उनके साथ खड़ा होना आज की ऐतिहासिक आवश्यकता है।

माँ केवल घर की चारदीवारी तक सीमित अस्तित्व नहीं है; वह सभ्यता की निर्माता है। नील नदी से लेकर गंगा तक, मिस्र से भारत तक, हर संस्कृति की जड़ों में माँ की उपस्थिति है। मानव इतिहास की हर बड़ी यात्रा में स्त्रियों का मौन श्रम शामिल है। उन्होंने खेतों में अन्न उगाया, घरों में जीवन बचाया, बच्चों में संस्कार डाले और समाज को संवेदना दी। यदि माँ न होती, तो न भाषा होती, न संस्कृति, न मनुष्यता। इसलिए मातृ दिवस का वास्तविक अर्थ यही है कि हम माँ को केवल “त्याग की मूर्ति” कहकर उसके कष्टों को सामान्य न बना दें, बल्कि उसके श्रम को सम्मान दें, उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार करें और उसके जीवन को गरिमा प्रदान करें। माँ को पूजा की वस्तु नहीं, अधिकार सम्पन्न मनुष्य के रूप में देखना ही आधुनिक और मानवीय दृष्टि है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम मातृ दिवस को बाज़ारवादी उत्सव से निकालकर सामाजिक चेतना के दिवस में बदलें। यह संकल्प लेने का दिन होना चाहिए कि कोई माँ अशिक्षा, गरीबी, हिंसा और अपमान में जीवन जीने को मजबूर न रहे। हर माँ को सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता मिले। हर माँ का बुढ़ापा स्नेह और गरिमा से भरा हो। हर बच्चा यह समझे कि माँ का ऋण केवल शब्दों से नहीं, संवेदनशील व्यवहार से चुकाया जा सकता है। माँ अनंत है। वह समय और शब्दों से परे है। उसके बिना न मनुष्य का अस्तित्व है, न समाज का। इसलिए मातृ दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि मनुष्यता की आत्मा को पहचानने का अवसर है। “मई में माई की याद” केवल मातृ दिवस की भावुक स्मृति नहीं, बल्कि स्त्री के श्रम, संघर्ष, स्वप्न, अस्मिता और अधिकारों को पहचानने की सामाजिक चेतना है। यह उन माताओं, विशेषकर दलित-बहुजन, श्रमिक और वंचित वर्ग की स्त्रियों को स्मरण करने का अवसर है, जिन्होंने जाति, गरीबी और पितृसत्ता के बीच भी जीवन और समाज को सँभाला। मेरी दृष्टि से माँ का सम्मान केवल पूजा या महिमामंडन में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा, स्वतंत्रता, सुरक्षा, समान अधिकार और सामाजिक गरिमा सुनिश्चित करने में निहित है। “मई में माई की याद” दरअसल संवेदना से आगे बढ़कर न्याय, सशक्तिकरण और परिवर्तन का संकल्प है। सच्चा मातृ वंदन तभी होगा जब संसार की हर माँ भयमुक्त, सम्मानित, शिक्षित और स्वतंत्र होगी। वही मातृ दिवस की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। क्योंकि मातृ दिवस भावुक स्मृति नहीं, सामाजिक चेतना का दिवस है। जय जननी। मातृशक्ति को कोटि-कोटि नमन!