पुस्तक समीक्षा - मंगला रामचंद्रन की प्रसिद्ध कहानियां : वसन्त निरगुणे

मंगला रामचंद्रन की प्रसिद्ध कहानियों का सन् 2023 में किताब घर दिल्ली से नया संग्रह आया है। जिनके माध्यम से मंगला रामचंद्रन को जाना पहचाना जाता है। एक तरह से यूँ कहा जा सकता है कि पाठकों ने इन्हीं कहानियों को पढ़कर मंगलाजी को देश की सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों की पंक्ति में बैठाया है। इसीलिये संभवतः कहानी संग्रह का नाम मंगला रामचंद्रन की प्रसिद्ध कहानियाँ दिया गया है। इन्हें मंगलाजी भी कहानियों को श्रेष्ठ मानती हैं, जिन्होंने इन्हें बड़े मन से रचा है। संक्षिप्त प्रस्तावना में मंगलाजी लिखती है- मैंने सदैव विविध भावनाओं और विषयों पर ही अपने कथानकों को सूत्रबद्ध किया है "मेरे लिए भावनाएँ और संवेदना ही मेरे लेखन का संभल है। तमाम लेखन इसी बलबूते पर किया है।' यह सच है कि संवेदना के बिना सब शून्य हैं। संवेदना एक लेखक की पूँजी होती है। यह पूँजी जितनी अधिक खर्च की जाती है उतनी ही पाठक के माध्यम से लेखक के नाम लौटकर आती है, और लेखक के मन में विश्वास जगाती है कि वह जो कुछ भी लिख रहा है, समाज में उसका मूल्य है। यह विश्वसनीयता ही लेखक को और अच्छा और अच्छा तथा अछूता लिखने के लिए प्रेरित करती है। मंगलाजी इसी के आधार पर जीवन के विविध विषयों पर कहानियों का सृजन करती हैं।

मंगलाजी उम्र के अस्सीवें पड़ाव को अगले वर्ष छूने वाली और चार दशकों से लेखनरत् हैं। मैंने उनसे सहज रूप से पूछ लिया कि वह कहानी क्यों लिखती हैं? उनका जवाब उन्होंने संग्रह की कुछ कहानियों के ताने- बाने को बुनने की हकीकत के साथ दिया। यहां में उन्ही शब्दों को हूबहू व्यक्त करता हूँ-

‘सरना' कहानी पाठक गौर करें- “सरना एक गोंड आदिवासी की कथा है। एक गोंड आदिवासी के साथ हुए अन्याय की कहानी कहने की कोशिश की है।' जिससे मैं मिली थी। आखरी बार उसे जिस हाल में देखा था, उससे मन अत्यधिक व्यथित हो गया था। कई दिनों तक बेचैनी बनी रही।' इस एक कहानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लेखिका के मन में गहरे तक अन्याय के खिलाफ एक आक्रोश और सहिष्णुता और विरोध बना रहता है। अन्याय सह नहीं सकती, फिर वह कहीं भी हो। सजग लेखक की यही पहचान है।

‘पोहा’कहानी खरगोन- इंदौर से भोपाल आते-जाते ऐसे बच्चों को देखती थी। मन में उठे भावों को कहानी में पिरो दिया शब्द से लेखिका के मन की पीड़ा की कसक उठती है। शायद पोहा पढ़कर आपके मन में ऐसी कसक उठ सकती है। यदि उठती है तो यह लेखन की सफलता ही कही जा सकती है।

‘काउंट-डाउन' कहानी के बारे में मंगलाजी का कहना है कि ये कैक्टस मेरे पास था। फूल पौधों से जुनूनी प्रेम ने मुझे उनसे इस तरह जोड़ दिया था, कि लगता था, मैं उनकी एक एक सांस, एक-एक हरकत से वाकिफ हूँ । कैक्टस भले ही कांटों से भरा पौधा होता है पर कई तरह के कैक्टस में बहुत सुंदर और मन मोहने वाले फूल लगते हैं, पर उसे देखकर हरदम व्यक्ति के मन में एक टीस उठती है। कैसे डंडेनुमा वह पौधा गमले से लगाकर खेत की बागड़ तक में अपनी सत्ता फैलाने में सक्षम होता है। इसे कई लेखकों ने अपने लेखन का अलग-अलग दृष्टिकोण से विषय बनाया। कहानी से कविता-आख्यान तक साहित्य में कैक्टस फैला है। मंगला की कहानी में वह दर्द बनकर उभरा है। कैक्टस के रोम-रोम में काँटों की तरह ।

रामर से नियाग्रा तक यह यात्रांत कथा कहानी है। एक अनपढ़ मां के सम्पूर्ण जीवन यात्रा के साथ उसके किए गए शारीरिक यात्राओं का अद्भुत तथा मार्मिक कहानी है। गांव से अनेक महानगरों से गुजरते हुए विदेश तक पहुंचने और कुशल प्रबंधन की धाक जमाने वाली स्नेहशील महिला की कहानी । वह भी मां की मधुर यादों के साथ व्यक्त हैं। वे कहती है- “यह मेरी सलोनी सुंदर अनपढ़ मां की कहानी है। दक्षिण भारत के गांव सें महानगरों में निवास करना ही दुश्वार था, जिसे अपने आत्मविश्वास और बुद्धि से उन्होंने सफलता से संपूर्ण किया। अपने समस्त बच्चों को जहां जड़ों से भी जोड़कर रखा और प्रगतिशील सोच के साथ स्वयं भी प्रगति की एवं बच्चों को भी बहुत बेहतर जीवन दिया। पिता की मृत्यु के पश्चात् भाइयों के साथ अमेरिका में रही और वहां भी उसी सहजता से अपने आसपास एक छोटा समुदाय स्थापित कर लेती है।

‘दहशत की परछाइयां' दुःख में सिहर जाने की कहानी है। कहानी को मंगलाजी महसूस करती हैं और लिखती है- “हमारे परिचय परिवार में एक दंपत्ति के पति को यह महा रोग था। उसकी पत्नी की मनोदशा की कल्पना कर मैं सिहर जाया करती थी। जब भी उसकी परिस्थिति में स्वयं को रखकर सोचती कि क्या मैं उसकी तरह रह पाऊँगी। हर बार मन को पलायन करता हुआ महसूस करती। उसी मनः स्थिति पर कहानी का विस्तार हुआ है'यह लेखिका की संवेदना के चरम की अभिव्यक्ति है। विशु के पैरों की उंगलियों के गलने की महा भयंकर अछूत बीमारी हुई थी। उसके प्रति समाज के तिरस्कार पूर्ण रवैया की वजह से उसकी पत्नी के कारण स्वयं लेखिका का दामन पीड़ा से भर जाता है और वह स्वयं भी उस महारोग को भुगतते हुए स्थिर नहीं रह पाती। बेटे अश्विन में पिता के रोग के कीटाणु न फैले। इसके भय से नायिका सूखने लगती है। लेकिन फिर भी पति का महारोग पीछा नहीं छोड़ता उसकी यह शंका की दीवार तभी टूटी, जब अश्विन के पैरों की उँगलियों में हरकत देखी।

इसके अतिरिक्त संग्रह में बारह और कहानियों का कलेवर है। पत्थरचट्टा, पापा नाराज हो?, बेआवाज तमाचा, स्पर्श, खंडित दर्प, तिलिस्म से बाहर, पत्रं पुष्पम् समर्पयामि, प्रारब्ध, राजे मेरा देव, हबीब हम केवल दोस्त हैं, सजायाफ्ता, वो मैं तो नहीं! सजायाफ्ता कहानी को कथाबिम्ब पत्रिका के वार्षिक आकलन में कमलेश्वर कथा सम्मान प्राप्त हुआ था। हर कहानी के पीछे मंगलाजी की सोच और संवेदना का समर्पण कुछ ऐसा देखा जा सकता है कि लगता है मंगलाजी को जीवन में कहानियाँ ही लिखना था। वह कहानी लिखने के लिए ही बनी है। दक्षिण भारतीय तमिल भाषी होते हुए भी हिन्दी साहित्य के सहारे साहित्य में अपना नाम दर्ज कराना कोई मामूली बात नहीं है। यह हिन्दी साहित्य की महिला लेखिकाओं में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वह अपने बारे में लिखती हैं- वैसे तो मेरी समस्त कहानियों का आधार वास्तविक होता है जब कथा सूत्र में पिरोना होता है तो कल्पना का ऐसा पुट देना पड़ता है जो संभव लगे। कुछ आधार मेरे स्वयं के अनुभव पर तो कुछ दूसरों के साथ घटी घटनाओं पर और कुछ समाचार देखते सुनते हुए विचार उठने पर कहानी का आधार बन जाते हैं। निश्चित रूप से मंगला जी यह बात रचना प्रक्रिया के बारे में कह रही हैं। हर रचनाकार अपनी अपनी रचना प्रक्रिया से गुजरता है। वास्तव में रचना प्रक्रिया ही वह मंथन की क्रिया है। जिससे मक्खन निकलता है।

मंगलाजी का लेखन सहज है। चेतनामयी है। 'अभी तक उनकी चैदह पुस्तकें प्रकाशित हैं। सुब्रमण्यम भारती के जीवन पर पुस्तक प्रकाशित कहानियां स्कूल और कालेजों में पाठ्यक्रम में शामिल हैं। कुछ कहानियों का तमिल, मराठी, उर्दू, अंग्रेजी में अनुवाद हुआ। एक व्यंजन पुस्तक दक्षिण भारतीय व्यंजन प्रकाशित।'

विगत वर्षों में कई पुरस्कार सम्मानों से अलंकृत मंगला रामचंद्रन से मेरे लगभग तीस वर्षों से लेखकीय संबंध हैं। मुझे उनकी कहानियाँ पसंद है। संभवतः मैंने उनकी अधिकांश किताबों पर लिखा है। यह मंगलाजी का मुझ पर अतिरिक्त अधिकार है वरना में कोई आलोचक, समीक्षक, साहित्यकार नहीं हूँ मैं जनजाति और लोक के समाज विज्ञान का लेखक हूँ । आलोचना-समीक्षा साहित्य के क्षेत्र में बहुत बड़ी चीज है। हर कोई आलोचक समीक्षक नहीं हो सकता। उसके लिए बहुत बड़ी मेधा की जरूरत होती है, जो मुझ में बहुत सामान्य रूप से है। अस्तु! क्षमा करेंगे।

वसन्त निरगुणे
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