कॉफी कप वाला रिश्ता : किरण विश्नोई
Coffe cup wala rishta : Kiran Vishnoi

साक्षी ने जब दिल्ली के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में जॉइन किया, तो उसके मन में बस एक ही डर था — “क्या मैं यहाँ फिट हो पाऊँगी?”
पहले दिन उसने सफेद शर्ट और नीली जींस पहनी थी। आँखों में सपने, दिल में थोड़ी घबराहट।
रिसेप्शन पर ID बनवाते हुए उसकी मुलाकात हुई — प्रशांत यादव से।
डिपार्टमेंट का सीनियर टैक्स असिस्टेंट, चेहरे पर हल्की मुस्कान, और आवाज़ में वो सादगी जो किसी को भी सहज कर दे।

साक्षी धीरे-धीरे प्रशांत से घुलने-मिलने लगी।
पहले ही हफ़्ते में प्रशांत ने साक्षी से कहा,
“कॉफी पीती हैं क्या साक्षी? यहाँ की मशीन का स्वाद बस शुरुआती लोगों को अच्छा लगता है।”

वो दोनों कैंटीन गए।
कॉफी कप से उठती भाप के बीच बातचीत शुरू हुई — काम से लेकर किताबों तक।
साक्षी को हैरानी हुई कि प्रशांत भी वही किताबें पढ़ता है जो उसे पसंद थीं — आचार्य नरेन्द्र शास्त्री की "यदुराज", पाउलो कोएले की "अल्केमिस्ट", कैलाश विश्नोई मांजू की "कलेक्टर साहिबा" इत्यादि।

हर दिन अब एक नई कॉफी और एक नई बात लाता था।

धीरे-धीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी।
लंच टाइम, टीम मीटिंग्स, वीकेंड मेल्स — हर जगह साक्षी को प्रशांत का साथ अच्छा लगने लगा।
वो कभी-कभी उससे मज़ाक में कहती,
“आप बिना बोले इतने कुछ बोल जाते हैं, प्रशांत सर।”

प्रशांत बस मुस्कुरा देता।
उसे साक्षी का मासूम उत्साह पसंद था, पर शायद वो इसे ज़ाहिर करने से डरता था।

एक शाम प्रोजेक्ट की डेडलाइन के कारण दोनों देर तक ऑफिस में रुक गए।
खिड़की के बाहर बारिश हो रही थी।
साक्षी ने धीरे से कहा —
“कभी-कभी लगता है, हम दोनों सिर्फ़ कॉफी के लिए बने हैं।”

प्रशांत मुस्कुराया —
“शायद… या फिर किसी कहानी के लिए।”

उसके जवाब में साक्षी के दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
वो जानती थी कि कुछ है, लेकिन इस रिश्ते को नाम नहीं दे सकती थी।
अगले कुछ हफ़्तों में सब बदल गया।
प्रशांत को एक नया प्रोजेक्ट मिला और वह दूसरी टीम में चला गया।
अब न लंच साथ होता, न कॉफी।
साक्षी के लिए ऑफिस फिर वैसा नहीं रहा।
वो दिन में कई बार उसकी सीट की ओर देखती, पर अब वो खाली रहती।

रातों में वह खुद से पूछती, “क्या मैं उसे सिर्फ पसंद करती हूँ… या उससे प्यार?”

एक दिन साहस जुटाकर साक्षी ने प्रशांत को मेल लिखा — “आप शायद नहीं जानते, पर आपकी चुप्पी ने मेरे हर दिन में रंग भर दिए हैं। अगर कभी वक्त मिले, तो एक कॉफी साथ पी लें — उस आखिरी वाली की तरह।”

वो मेल उसने भेजी नहीं। बस “Drafts” में रख दी — जैसे कोई अधूरी कहानी।
लेकिन अगले दिन कुछ अप्रत्याशित हुआ।

शाम को ऑफिस से निकलते समय प्रशांत सामने आ गया।
उसके हाथ में दो कप कॉफी थे।
“आज आपकी टीम ने अच्छा काम किया, जश्न तो बनता है न?”

साक्षी के होंठों पर मुस्कान फैल गई।
कॉफी वही थी — Cappuccino with extra sugar.
प्रशांत ने हँसते हुए कहा — “आपको लगता था मैं भूल गया हूँ?”

कॉफी खत्म होने के बाद प्रशांत ने धीरे से कहा — “साक्षी, जब तुम आई थी, तो ऑफिस थोड़ा और ज़िंदा लगने लगा था।
मैं नहीं जानता ये प्यार है या कुछ और, पर तुम्हारे बिना ये जगह सूनी लगती है।”

साक्षी चुप रही, पर उसकी आँखों में जवाब था।
उसने बस इतना कहा — “कॉफी ठंडी हो गई है, पर दिल गर्म हो गया।”

उस दिन के बाद सब कुछ सहज था —
न कोई वादा, न कोई डर, बस एक सुकून भरा रिश्ता।
अब ऑफिस में लोग मज़ाक करते, “कॉफी कप कंपनी की है या आप दोनों की?”
दोनों हँस देते।
अब कॉफी सिर्फ़ पेय नहीं थी, वो एक रिश्ते की पहचान बन गई थी।

कुछ महीनों बाद प्रशांत ने साक्षी को प्रपोज किया —
न गुलाब से, न रिंग से,
बस एक सिंपल कागज पर लिखे नोट से: “कॉफी मशीन पर तुम्हारा नाम डाल दूँ?”

साक्षी ने जवाब लिखा —
“हाँ, अब वो सिर्फ़ हमारी कॉफी बनेगी।”

ऑफिस वही रहा, काम वही, पर अब हर दिन में एक मीठी ख़ुशबू थी —
कॉफी की और अपनेपन की।