चंदागिरी,चौथ वसूली का सांस्कृतिक संस्करण (व्यंग्य रचना) : डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’
शहर में इन दिनों चंदागिरी का मौसम पूरे शबाब पर है। यह हफ्तावसूली का धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्करण है। अंतर केवल इतना है कि हफ्तावसूली में आदमी पिटाई से डरकर पैसे देता है और चंदागिरी में श्रद्धा, प्रतिष्ठा तथा बदनामी,तीनों से डरकर।
चंदागिरी में प्रायः वही लोग सक्रिय मिलते हैं, जो खाली समय में दादागिरी भी कर लेते हैं। जैसे ही शहर में किसी जागरण, शोभायात्रा, स्थापना, रथयात्रा अथवा महोत्सव की घोषणा होती है, चंदावीरों की टोली जागृत हो जाती है और संभावित दानदाता भूमिगत। दुकानदार कर्मचारियों से कहलवाने लगते हैं,“सेठजी बाहर गए हैं।” डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में चले जाते हैं, वकील अदालत में और व्यापारी अचानक तीर्थयात्रा पर।
वैसे चंदा देना पुण्य का काम है। सरकार भी टैक्स के नाम पर हमसे सरकारी चंदा ही तो लेती है। सरकारी चंदे की सिर्फ रसीद मिलती है और सामाजिक चंदे में कभी-कभी आशीर्वाद के साथ चेतावनी भी,“अगली बार आपका नाम विशेष रूप से याद रखा जाएगा।”
शहर में देवी भक्त मंडल, राम भक्त मंडल, गणेश भक्त मंडल, हनुमान भक्त मंडल और गौ भक्त मंडल सबकी अपनी-अपनी दुकानें हैं। धंधा मौसमी है, इसलिए पंद्रह दिन में बारह महीने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
संस्थाएँ बनती बाद में हैं, चंदे की रसीद-बुक पहले छप जाती है।
किसी ने पूछा, “संस्था किसे कहते हैं?”
मैंने कहा, “जो चंदा लेकर चाँदी काटे, वही संस्था है।”
वह बोला, “आपके शहर में तो चंद संस्थाएँ होंगी।”
मैंने कहा, “संस्थाएँ बहुत हैं, पर अधिकांश केवल चंदे के लिए हैं।”
हमारी वर्णमाला में भी ‘च’ का विशेष महत्त्व है,चंदा, चाँदी, चम्मच और चमचा। लगता है ‘चंदू के चाचा ने चाँदनी रात में चाँदी के चम्मच से चटनी’ नहीं, चंदा ही चटाया होगा।
चंदाखोरी कोई चिंदी चोरी नहीं है। यह प्रशिक्षित धुरंधरों का काम है। नई संस्था बनते ही सबसे पहले ऐसे चंदावीर खोजती है, जो संस्था के लिए जीवनदायिनी ‘चंदामृत’ जुटा सकें। इसी चंदामृत का पान कर अनेक संस्थाएँ वर्षभर निद्रावस्था में रहती हैं और आयोजन के समय अचानक जीवित हो उठती हैं।
राजनीतिक दलों की प्राणवायु भी केवल वोट नहीं, चंदा है। जनता वोट देती है और उद्योगपति चंदा। जनता का वोट अमावस्या का चाँद है,दिखाई नहीं देता, पर मौजूद रहता है। उद्योगपति का चंदा पूर्णिमा का चाँद है,जिसकी रोशनी में घोषणापत्र, निष्ठा और नीतियाँ सब साफ दिखाई देने लगती हैं।
चंदा वसूलना असाधारण कौशल का काम है। इसमें साम, दाम, दंड और भेद,चारों का व्यावहारिक प्रशिक्षण आवश्यक है। टोली कभी अकेली नहीं आती। चार-पाँच चंदावीर एक साथ घर या दुकान में प्रवेश करते हैं, ताकि दानदाता रूपी बकरे की चारों टाँगें पकड़ी जा सकें। एक रसीद-बुक खोलता है, दूसरा कार्यक्रम का महत्त्व बताता है, तीसरा पिछले वर्ष चिंदी से दिए गए चंदे की याद दिलाता है और चौथा चेहरे से समझाता है कि इस बार कम देना सामाजिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
हर वर्ष चंदावीरों की टीम बदल दी जाती है। संस्था जानती है कि एक बार किसी चंदावीर की शक्ल दानदाता के मस्तिष्क में छप गई तो अगली बार उसका फोन ब्लॉक हो जाएगा। इसलिए नई शक्ल, नया नंबर, नई रसीद-बुक और पुराना शिकार।
एक दिन एक गौ-रक्षक चंदावीर मेरे क्लिनिक पर पधारे। व्यक्तित्व सांड जैसा प्रभावशाली, गले में लाल पट्टा और हाथ में छह फुट का डंडा। गाय उन्होंने कभी पाली नहीं थी, लेकिन गौ-रक्षा के क्षेत्र में उनका आत्मविश्वास दुग्ध उत्पादन से कहीं अधिक था। महीने-दो महीने में किसी संदिग्ध वाहन को रोकना, दो लाठियाँ चलाना, पुलिस के साथ फोटो खिंचवाना और फिर गौशाला के नाम पर चंदा जुटाना,यही उनकी कर्मभूमि थी।
मैंने चंदा देने से इनकार किया तो उन्होंने मुझे लगभग गौ-द्रोही घोषित कर दिया। मैंने खिड़की से बाहर घूमती
बीमार, घायल और भूखी गायों-सांडों की ओर संकेत करके कहा,
“इनका क्या? इन्हें गौशाला क्यों नहीं पहुँचाते? दूध न देने वाली गाय माता नहीं रहती क्या? और जब गाय
माता है तो ये सांड भी कम-से-कम पिताश्री तो हुए। इनकी सेवा का कोई मंडल क्यों नहीं?”
चंदा माँगते समय उनका चेहरा गाय जैसा करुण था। मेरी बात सुनते ही धीरे-धीरे मरखने सांड में बदलने लगा।
डंडे पर उनकी पकड़ मजबूत हुई और धर्म पर मेरी पकड़ कमजोर।
उस दिन समझ आया,चंदागिरी में सवाल पूछना सबसे बड़ा अधर्म है। चंदा दीजिए, रसीद लीजिए और पुण्य कमाइए। हिसाब पूछेंगे तो पुण्य बाद में मिलेगा, प्रसाद तत्काल भी मिल सकता है।