कहानी: बाँझिन की बददुआ : गोलेन्द्र पटेल
Baanjhin ki baddua : Golendra Patel

ज्ञान का आदिकोश वेद है। वेद केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि सृष्टि के अनुभव का संचित सार हैं। वेद चार हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों वेदों में जीवन का आरंभ, विस्तार और अंत सब निहित है। ऋग्वेद में प्रकृति की ऋचाएँ हैं, यजुर्वेद में कर्मकांड की विधियाँ, सामवेद में स्वर और लय का अनंत विस्तार, और अथर्ववेद में लोकजीवन के दुःख-सुख, रोग-निवारण और जादुई-यथार्थ का संगम।

जब यज्ञ का सुयोग बनता था, तो इन चारों वेदों का पाठ क्रमशः होता। अध्वर्यु यज्ञ की क्रियाओं का संचालन करता, उद्गाता सामगान करता और ब्रह्मा समस्त प्रक्रिया का मौन पर्यवेक्षक बनकर उसकी शुद्धता सुनिश्चित करता। उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि स्वयं ब्रह्मांड अपने अस्तित्व को पुनः रच रहा है; जैसे समय स्वयं अपने को दोहरा रहा हो। इसी वैदिक परंपरा में साय नामक एक ऋषि थे। वे केवल ज्ञान के साधक नहीं थे, बल्कि संवेदना के संरक्षक भी थे। उनका आश्रम केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि जीवन के अर्थ की खोज का स्थान था। उनके अनेक शिष्य थे, पर एक शिष्य ऐसा था, जिसने अपनी गुरुभक्ति से साय के हृदय को विशेष रूप से छू लिया था, वह था नंद।

नंद की गुरुभक्ति में कोई आडंबर नहीं था। वह सेवा करता था, पर सेवा के भीतर प्रश्न भी करता था। वह शास्त्र पढ़ता था, पर शास्त्रों के भीतर जीवन को खोजता था। उसकी दृष्टि में ज्ञान केवल शब्द नहीं था, वह कर्म था, संवेदना थी। साय उसकी इस प्रवृत्ति से प्रसन्न रहते थे। एक दिन उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, “वत्स नंद! तुम्हारी करुणा तुम्हें उस स्थान तक ले जाएगी, जहाँ तुम स्वयं भगवान विष्णु के पिता कहलाओगे।” यह आशीर्वाद एक साधारण वाक्य नहीं था, यह नंद के जीवन की दिशा बन गया। समय बीतता गया। एक दिन साय अपने शिष्यों के साथ नदी के मार्ग से वन की ओर जा रहे थे। नदी शांत थी; जैसे कोई साध्वी ध्यान में लीन हो। उसकी धारा में एक लय थी, एक स्थिरता थी। किनारों पर वृक्ष खड़े थे, जैसे वे इस यात्रा के साक्षी हों।

परंतु प्रकृति की शांति स्थायी नहीं होती; जैसे ही वे जंगल के मध्य पहुँचे, आकाश का रंग बदलने लगा। काले बादल घिर आए। हवा का स्वर बदल गया। धीरे-धीरे वह एक गर्जना में बदल गया। नदी की लहरें उठने लगीं। देखते-देखते जलप्लावन की स्थिति उत्पन्न हो गई। ऐसा लगा मानो प्रलय का एक अंश सामने खड़ा हो।द्वीप डूब गए। जंगल डूब गया। धरती और जल के बीच का अंतर मिटने लगा। स्थलीय जीवन का अस्तित्व संकट में पड़ गया। चारों ओर केवल जल ही जल दिखाई देने लगा।

इस विकट परिस्थिति में नंद ने तत्काल निर्णय लिया। उसने केले और बाँस का एक बेड़ा तैयार किया। उसने अपने गुरु और अन्य ऋषियों को उस पर बैठाया और स्वयं उसे संभालने लगा। वह उस समय केवल एक शिष्य नहीं था, वह जीवन का रक्षक था। बेड़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लहरें उसे डगमगातीं, पर नंद का संतुलन उसे स्थिर रखता। उसी समय उसने देखा, एक नाव विपरीत दिशा से आ रही है। उस नाव में कुछ मनुष्य थे। उनकी आँखों में भय था, पर उससे अधिक लालच था। उन्होंने अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ अपनी नाव में भर रखी थीं। जब लहरें तेज हुईं और नाव डगमगाने लगी, तो उन्हें लगा कि नाव डूब सकती है।

तब उन्होंने एक निर्णय लिया, अपने ही साथियों को पानी में फेंकना। एक-एक करके वे कमजोर लोगों को जलमग्न जंगल में फेंकने लगे। यह दृश्य केवल भयावह नहीं था, यह मनुष्यता के पतन का दृश्य था। इसी क्रम में उन्होंने दो बकरियों को भी पानी में फेंक दिया। वे बकरियाँ बूढ़ी थीं। उन्होंने कभी बियाया नहीं था। उनके जीवन में मातृत्व का कोई अनुभव नहीं था। वे केवल अस्तित्व थीं, बिना विस्तार के, बिना वंश के। जैसे ही वे पानी में गिरीं, लहरों की चोट से चीखने लगीं। उनकी चीखों में एक गहरा दर्द था, एक ऐसा दर्द, जो केवल शरीर का नहीं, आत्मा का था। वह चीख केवल जीवन बचाने की नहीं थी, वह अपने अस्तित्व के अपूर्ण रह जाने की पीड़ा थी।

उनकी पीड़ा धीरे-धीरे एक मंत्र में बदलने लगी। वे एक मंत्र का उच्चारण करने लगीं, एक ऐसा मंत्र, जो समय की गहराइयों से निकला था। कहा जाता है कि उसका सृजन स्वयं शिव ने किया था। बाद में ब्रह्मा ने उसमें कुछ परिवर्तन कर उसे अपना नवसृजन बताया। इस मंत्र को लेकर पार्वती और सरस्वती के बीच बहसें भी हुई थीं। और विष्णु अपने विभिन्न अवतारों में उन बहसों का आनंद लेते रहे थे, पर उस समय वह मंत्र किसी विवाद का विषय नहीं था। वह पीड़ा की आवाज था। वह मनुष्यता का मंत्र था। नंद ने जब यह दृश्य देखा, तो उसका हृदय भीतर तक हिल गया। उसके सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा था, क्या वह अपने गुरुजनों को सुरक्षित रखे या इन असहाय प्राणियों को बचाए?

बेड़े पर स्थान सीमित था। वह जानता था कि यदि वह बकरियों को बेड़े पर चढ़ाएगा, तो गुरुजनों का जीवन संकट में पड़ सकता है। और यदि वह उन्हें छोड़ देगा, तो उसकी आत्मा उसे कभी क्षमा नहीं करेगी। क्षण भर के लिए समय जैसे ठहर गया। फिर नंद ने निर्णय लिया। उसने बेड़े से छलांग लगा दी। उसने बकरियों को अपने सहारे में लिया और प्रवाह के विरुद्ध तैरने लगा। यह केवल तैरना नहीं था, यह संवेदना का संघर्ष था। यह मनुष्य के भीतर के मनुष्य का संघर्ष था। लहरें उसे पीछे धकेलती रहीं, पर उसका संकल्प उसे आगे बढ़ाता रहा।

वह तैरता रहा लगातार, बिना रुके।
एक घंटा… दो घंटे… दिन… रात…
समय का बोध खो गया।
वह छिहत्तर घंटे तक तैरता रहा।

उसका शरीर थक चुका था। साँसें भारी हो चुकी थीं, पर उसकी आत्मा अभी भी जाग रही थी। उसकी पकड़ ढीली नहीं पड़ी। अंततः दूर उसे एक पहाड़ दिखाई दिया, हिमालय जैसा। स्थिर, अडिग, और धैर्यवान। वहाँ पहुँचने से पहले उसे एक डूबे हुए गाँव से गुजरना पड़ा। घरों की छतें पानी में डूबी हुई थीं। कहीं कोई आवाज नहीं थी। केवल जल का शोर था। उसी गाँव की एक छत पर एक नाव बंधी हुई थी। नंद ने सोचा, कुछ देर विश्राम कर लिया जाए। बकरियों को उस पर बैठाकर उनकी थकान दूर कर दे।

जैसे ही उसने बकरियों को नाव पर चढ़ाना चाहा, एक स्वर गूँजा, “हे मनुष्य! यह मेरी नाव है। इन बकरियों को नीचे उतारो।” नंद ने ऊपर देखा। एक अप्सरा खड़ी थी। उसके स्वर में अधिकार था, और आँखों में घृणा। नंद चुप रहा। वह कुछ नहीं बोला। उसके भीतर शब्द थे, पर वे लहरों के शोर में कहीं डूब गए थे। अप्सरा की आँखों में घृणा थी; जैसे करुणा उसके लिए कोई दोष हो।

“क्या सुनाई नहीं देता? यह मेरी नाव है!”, अप्सरा ने फिर कहा। नंद ने बकरियों की ओर देखा। वे थक चुकी थीं। उनके शरीर काँप रहे थे। उनकी आँखों में भय और भरोसा एक साथ तैर रहा था। वह जानता था कि यह नाव केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं है, यह जीवन और मृत्यु के बीच की एक पतली रेखा है, पर वह मौन ही रहा।

तभी जल के भीतर से कुछ और हलचल हुई। कुछ देवगण वहाँ प्रकट हुए। वे अप्सरा की ओर देख रहे थे, उनकी दृष्टि में एक अजीब-सा असंतोष था। अप्सराएँ सुंदर थीं, पर उनकी सुंदरता कभी-कभी देवताओं को भी सुई की तरह चुभती थी। उनमें से एक देवता आगे बढ़ा और बोला, “यदि यह नाव तुम्हारी है, तो हमारा भी कुछ कर्तव्य है।”

उन्होंने अपनी नाव को आगे बढ़ाया, “इन बकरियों को इसमें बैठा दो।” नंद ने एक क्षण के लिए उन्हें देखा। यह दृश्य विचित्र था, देवगण स्वयं जल में उतर रहे थे और बकरियों को स्थान दे रहे थे। बकरियाँ नाव पर बैठ गईं। नंद ने राहत की साँस ली। अब वह भी उनके साथ तैरने लगा। देवगण भी उसके साथ थे। तैरना केवल शरीर का श्रम नहीं था, यह लहरों से संवाद था। हर लहर एक प्रश्न की तरह आती, हर साँस एक उत्तर की तरह जाती।

धीरे-धीरे वे किनारे की ओर बढ़ने लगे। जब वे किनारे पहुँचे, तो वहाँ का वातावरण अलग था। जल पीछे छूट गया था, पर उसकी स्मृति अभी भी हवा में थी। उसी किनारे पर एक व्यक्ति खड़ा था—वात्स्यायन। उन्होंने नंद को देखा और मुस्कराते हुए पूछा, “मित्र, आपकी कुशलता कैसी है? सब ठीक है न? और यह क्या, उम्र की इस उमस में ये बूढ़ी बकरियाँ? इनकी मूत से तो बहुत बदबू आती है!”

उनके शब्दों में व्यंग्य था, और व्यंग्य में एक प्रकार का अस्वीकार। नंद ने उनकी ओर देखा, पर कुछ नहीं कहा। उसका मौन अब उसकी भाषा बन चुका था। हवा में तरह-तरह की बातें फैलने लगीं। बकरियों की गंध को लेकर लोग बातें करने लगे। कोई हँसता, कोई नाक सिकोड़ता।उसी क्षण अचानक एक विचित्र प्रकाश फैला। साय की आत्मा वहाँ प्रकट हुई। नंद ने तुरंत उनके चरणों में प्रणाम किया। साय ने उसे देखा, उनकी दृष्टि में गर्व था, पर उसके भीतर एक गहरा रहस्य भी छिपा था। उन्होंने कहा, “वत्स, तुमने अपने कर्म से विमुख नहीं हुए। तुमने धर्म का पालन किया है। अब समय है गुरु-दक्षिणा का।” नंद ने सिर झुका दिया, “आज्ञा दें, गुरुदेव।” साय बोले, “मुझे ये बकरियाँ दे दो।”

नंद के भीतर एक हल्की-सी हलचल हुई। पर उसने बिना प्रश्न किए बकरियों को उनके हवाले कर दिया। साय उन्हें लेकर चले गए। नंद वहीं खड़ा रह गया मौन, किंतु भीतर से प्रश्नों से भरा हुआ। दिन बीतते गए। उसके मन में एक ही प्रश्न घूमता रहा, गुरुदेव ने बकरियाँ ही क्यों माँगीं?उसकी चिंता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। एक दिन जब वह अकेला बैठा था, तभी एक मधुर वीणा की ध्वनि सुनाई दी।

देवऋषि नारद प्रकट हुए। नंद ने उन्हें प्रणाम किया। नारद मुस्कराए, “वत्स, तुम्हारे मन में प्रश्न है।” नंद ने कहा, “हे देवऋषि! ये बकरियाँ कौन थीं? गुरुदेव ने इन्हें ही क्यों माँगा?” नारद ने गम्भीर होकर कहा, “वत्स, ये साधारण बकरियाँ नहीं थीं। ये साय की पुत्रियाँ थीं—देवकन्याएँ।यज्ञ से प्राप्त हुई थीं। एक बाँझिन की बददुआ के कारण इन्हें यह रूप मिला।”

नंद स्तब्ध रह गया। उसने पूछा, “पर ऐसा क्या हुआ था?” नारद ने कहना शुरू किया, “वत्स, वह बाँझिन स्त्री तुलसी माता की भक्तिन थी। वह प्रतिदिन पूजा करती थी।
हर वर्ष तुलसी का विवाह कराती थी, पर उसके अपने जीवन में दुःख का अथाह सागर था। विवाह के कुछ ही दिनों बाद उसके पति की मृत्यु हो गई। हर वर्ष वह सफेद साड़ी पहनती, सफेद रंग, जो सारे रंगों को अपने भीतर समेट लेता है, जैसे दुःख का दीपक संसार के अंधकार को पी लेता है।”

नारद की वाणी धीमी हो गई, “लोक में कोई स्त्री बाँझ नहीं होती, वत्स। लोक उसे माई, मौसी, चाची, बहन, बेटी; किसी न किसी रूप में पूर्ण मानता है, पर मनुष्य की दृष्टि जब संकुचित हो जाती है, तब वह स्त्री को केवल उसके गर्भ से मापने लगता है।” नंद ध्यान से सुन रहा था। नारद आगे बोले, “एक दिन वह बाँझिन पुष्प लेने आश्रम आई।
पुष्प वही सँभालती थी, वह उस आश्रम की खानदानी मालिन थी, पर उन देवकन्याओं को अपनी आभा का अभिमान हो गया था। उन्होंने उसे ‘बाँझ’ कहकर पुष्प तोड़ने से रोक दिया। उनकी बातों ने उसके हृदय को चीर दिया। वह पीड़ा से काँप उठी और उसी पीड़ा में उसने कह दिया, ‘जाओ, तुम भी बाँझ हो जाओ।’”

नंद ने धीरे से कहा, “फिर?”

नारद बोले,
“शब्द लौटते नहीं, वत्स।
वे भाग्य बन जाते हैं।
उसे तुरंत पछतावा हुआ।
वह रोई,
‘मैंने क्या कर दिया… स्त्री होकर स्त्री को बददुआ…!’

तीनों साय के पास गईं। साय त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने सब जान लिया। उन्होंने अपनी पुत्रियों को मुक्ति का मंत्र दिया और कहा, ‘समय आने पर यह मंत्र तुम्हें बचाएगा।’” नारद ने नंद की ओर देखा, “वत्स, वही समय जलप्लावन का था। वही मंत्र तुम्हें उनके पास बुला रहा था। तुम्हारी करुणा ही उनकी मुक्ति बनी।”

नंद की आँखों से आँसू बहने लगे। अब उसे सब समझ में आ गया था। नारद ने अंत में कहा, “वत्स, यह नारी को बचाने का नक्षत्र है। हर नर के भीतर की नारी को जीवित करना ही धर्म है। स्त्री केवल शरीर नहीं है, वह पृथ्वी है और पृथ्वी कभी बाँझ नहीं होती।” नंद मौन हो गया। उसका मौन अब शून्य नहीं था, वह समझ से भरा हुआ था। वह जान चुका था, संवेदना ही सच्चा ज्ञान है और “बाँझिन की बददुआ” केवल एक कथा नहीं, एक चेतावनी है कि शब्दों में आग भी होती है और मुक्ति भी और यह कि स्त्री का अपमान, अंततः सृष्टि का अपमान है।