इलाहाबाद का समोसा (लेख) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

इलाहाबाद का समोसा किसे प्रिय नहीं है। गांव हो या शहर समोसे की ओर सब आकर्षित होते हैं। इलाहाबाद में आकर समोसा नहीं खाया। इसका मतलब आप इलाहाबाद के अंत:मन को नहीं छुआ। इलाहाबाद की अपनी रवायत है। अपनी संस्कृति है। अपनापन है। इलाहाबादी समोसा खाने का मज़ा ही कुछ और होता है।

समोसे के साथ कोई मीठी चटनी खाने का शौकीन है तो कोई खट्टी चटनी से समोसे का चटकारा लेता है। महिलायें तो समोसा खाने में जितनी निपुण हैं उतनी घर पर भी बनाने की शौकीन होती है। यह समोसा सुबह से शाम तक खाने में लोग लगे रहते हैं। समोसा की दुकान ढूढते हैं। समोसा मिलते ही लोग टूट पड़ते हैं। मजे से खाते हैं।

इलाहाबाद की कोई गली ऐसी नहीं कि जहाँ समोसा नहीं मिलता है। समोसा एक ऐसा मजेदार टेस्टी व्यंजन होता है जिसका स्वाद निराला होता है। इलाहाबाद के सिविल लाइन से लेकर दारागंज, अल्लापुर से लेकर कटरा, चौक से लेकर इलाहाबाद जंक्शन तक , झूंसी से लेकर संगम तट तक। अशोकनगर से लेकर हाइकोर्ट तक। कचेहरी के आस-पास। हर जगह समोसे का अपना धंधा है।

आप अगर बाहर के है तो इलाहाबाद आने पर समोसे जरूर खाइये। खाने के बाद ठंडा पानी पीने का जो तरावट होती है। वह एक आत्मसुख की तरह होती है। यहाँ के समोसे की पहचान है। इलाहाबाद में समोसे की दुकानें बहुत संख्या में हैं और कई लोगों को समोसे ने रोजगार दिया है।

कुछ लोग समोसे खाने के बेहद शौकीन होते हैं। उनको समोसा जरूर चाहिए। समोसे का आनंद ही अलग है। समोसा देखने के बाद मुंह में पानी आ ही जाता है। इलाहाबादियों में एक परम्परा है आज तुम खवाओ, कल हम खिवायेंगें। इसी बहाने समोसा खाया जाता है। इस तरह से कई लोग मिलकर खाते हैं तो खाने का मज़ा दुगुना हो जाता है।

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