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आख़िरी ख़त : किरण विश्नोई
Aakhiri khat : Kiran Vishnoi

संध्या की लालिमा में डूबा शहर जैसे अपने पुराने रंग भूल चुका था।
पलक बालकनी में बैठी थी, हाथ में एक पुराना ख़त था — पीला पड़ा हुआ, लेकिन उसमें अब भी किसी की खुशबू थी।
ख़त पर लिखा था — “मेरी प्रिय पलक, अगर ज़िंदगी ने साथ दिया तो फिर मिलेंगे…”

हर शब्द, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर नई उँगली रख देता था।

पाँच साल पहले की बात है।
राज और पलक एक ही कॉलेज "आर.के. मेमोरियल कॉलेज" में पढ़ते थे — दोनों साहित्य विभाग के।
राज थोड़ा चुप, पर उसके शब्द गहराई लिए होते।
पलक उसके शब्दों से खिंच गई थी, और राज उसकी मुस्कान से।
दोनों अक्सर लाइब्रेरी में मिलते — किताबों के बहाने, दिल की बातों के लिए।

एक दिन कॉलेज के आख़िरी सेमेस्टर में, राज ने एक छोटी डायरी पलक को दी।
उसमें लिखा था — “मैं तुम्हें चाहता हूँ, पर कह नहीं पाता, तुम्हारी हँसी में मेरी सुकून की छाँव है।”

पलक ने डायरी बंद की और बस मुस्कुरा दी। वो “हाँ” नहीं बोली, मगर उसकी आँखों ने सब कह दिया।

कॉलेज ख़त्म हुआ। राज को दिल्ली नौकरी मिल गई, पलक अपने शहर में पढ़ाने लगी।
शुरू में रोज़ बातें होती थीं — चिट्ठियाँ, ईमेल, फोन कॉल्स।
फिर ज़िंदगी की रफ़्तार बढ़ी, और संवाद कम होता गया। कभी “कल बात करेंगे” कहते-कहते महीने बीत गए।

एक दिन राज बिना बताए शहर आया। पलक स्कूल से लौटी तो दरवाज़े पर वही खड़ा था — वही मुस्कान, पर आँखों में थकान थी।
दोनों चाय की दुकान पर बैठे, बारिश हो रही थी।
राज बोला — “पलक, शायद अब हमारा मिलना मुश्किल है… लेकिन मैंने हर दिन तुम्हें चाहा है।”

पलक कुछ नहीं बोली। बस आँसू उसके गालों पर गिरते रहे — बारिश में मिलते हुए।

तीन महीने बाद राज का ख़त आया —
"पलक,
अगर कभी ज़िंदगी फिर से लिखी जाए, तो मैं उसमें सिर्फ़ तुम्हारा नाम चाहूँगा।
शायद इस जनम में नहीं, पर किसी और सुबह में ज़रूर मिलेंगे।”

इसके बाद राज का कोई संदेश नहीं आया। वह नौकरी के दौरान किसी दुर्घटना में चला गया — ख़बर अख़बार के कोने में थी।

सालों बाद भी पलक हर शाम उस ख़त को खोलती है।
वह अब स्कूल की प्रिंसिपल है, लेकिन हर शाम उसी बालकनी में बैठी रहती है जहाँ कभी राज के साथ सपने देखे थे।
ख़त उसके हाथ में है, और दिल में वही अधूरी ख्वाहिश।

उस रात उसने सपना देखा —
वही राज, वही मुस्कान, वही सादगी।
वह बोला — “पलक, अब ख़त नहीं, मिलन का वक़्त है।”
और पलक मुस्कुराई — उसकी आँखों में शांति थी।

अगली सुबह खिड़की खुली थी, हवा चल रही थी, टेबल पर वही ख़त रखा था — और पास में एक नई पंक्ति:
“अब ख़्वाहिश पूरी हो गई…”

पलक अब नहीं थी, शायद वह भी राज से मिलने चली गई थी।

लोगों ने कहा — “यह एक प्रेम कहानी थी।”
पर सच्चाई यह थी — यह दो आत्माओं की ख़्वाहिश थी जो आखिर पूरी हो गई।
ख़त अब भी पलक के कमरे में रखा है, और उसके ऊपर लिखा है —

“कुछ प्रेम कहानियाँ ख़त्म नहीं होतीं, वो बस अनंत हो जाती हैं…”