व्यंग्य (121-) - महेश केशरी

Hindi Vyangya (121-) - Mahesh Keshri

कछुआ काम आता है - (व्यंग्य) - महेश केशरी

कछुआ छाप अगरबत्ती देखकर पत्नी बोली। क्या ढ़ेर सारा कछुआ छाप अगरबत्ती उठा लाए हो। भूल गए क्या तुम्हें दूध ,तेल , तरकारी और मोमबत्ती ही लानी थी। लाने भेजा था अंड ले आते हो शंड। दिमाग तुम्हारा लगता है काम नहीं कर रहा है।

कछुआ छाप अगरबत्ती के काटून का भार किसी तरह कुर्सी पर अलगाया। फिर बेटे को ठंढ़ा पानी के लिए दौड़ाया। खींचकर कुर्सी पसर गया। सोचा बाजार से लौटा हूँ तो थोड़ा हवा में सुस्ताऊँगा। फिर श्रीमती जी के आदेश पूराऊँगा। पत्नी ने आँख दिखाया। ठंढ़ा पानी कहाँ से आएगा। जब बिजली है चौबीस घँटे से गुल। क्यों जाते हो इस बात को भूल। क्यों उठा लाए काटून भर कछुआ छाप अगरबत्ती। तुमको बताया था लेनी थी मोमबत्ती । पत्नी को समझाया। बोला जिस तरह से कछुआ चाल से चल रही है बिजली। आने से ज्यादा जाने की रहती है जल्दी।

आगे समझाया अभी गर्मी का सीजन है तो रात कैसे कटेगी। कोई तो साधन हो जीने का। फ्रीज में रखा हो ठंढ़ा पानी पीने का। जब शरीर से चू रहा हो पसीना। और हमला होता हो मच्छरों का तो यही कछुआ कमाल का हो जाता है। मोमबत्ती से ज्यादा काम आता है । चालीस रुपये का कछुआ चार लाख का खून बचाता है। रखता है शरीर से मच्छरों को दूर। तब ये मच्छरों के लिए यमराज कहलाता है। गर्मी में जब पसीना आता है। तब कोढ़ में खाज होने का एहसास कराता है। खुजली करने से त्वचा जाती है फूल। इसीलिए मोमबत्ती लाना गया हूँ भूल।

आने वाला है बरसाती सीजन। बरसात के सीजन में बढ़ जाता है मच्छरों का प्रकोप। कुछ नहीं होगा तो कम-से-कम कछुआ के कारण अच्छी नींद आएगी। इसीलिए उठा लाया हूँ एक काटून कछुआ अगरबत्ती। मोमबत्ती भी लेते आऊँगा। पहले थोड़ा सुस्ताने दो। देह की सारी थकान मिटाने दो। बेटा फ्रीज का ना सही घड़े का पानी ही लेते आओ। प्रिये जवानी में बेटा पानी तो पिला ही रहा है। तब तक तुम मेरे लिए झटपट बना दो एक कप चाय। पत्नी बोली गर्मी है बहुत चाय तो रहने दो। कुछ नींबू शीकंजी चलने दो। मैनें कहा प्रिये जैसे लोहा लोहे को काटता है। वैसे ही गर्मी को गर्मी ही काटती है। छोड़ो शिकंजी और नींबू का मोह। नींबू अभी आ रहा है चालीस का दो। शिकंजी तो माशूका की तरह सीजनेबल है। बारहों महीने पत्नी ही काम आती है। थोड़ा पसरता हूँ। आराम करता हूँ।
तब तक तुम झटपट बना दो मेरे लिए चाय ।

श्राद्ध का फैशन - (व्यंग्य) - महेश केशरी

दादाजी निकल गए चलो अच्छा हुआ था। पापा और मम्मी मिलकर ठेल आए थे उनको वृद्धाश्रम। दादाजी वहीं वृद्धाश्रम में निपट गए थे। तब से हर साल दादाजी की मनती है बरसी। जीवित रहते दाद का पेट सूखी रोटी के लिए तरसा था । उनकी आँखें खाने के लिए कई बार बरसी थी। इधर बरसी का फैशन चल पड़ा है। जीते-जी ना जो खाए थे खीर। उनका हो रहा है पिंडदान। इस बार कौओं के भाग से छींका फूटा है। उनको मिलने वाली है मीठी खीर। आज घर में साज सज्जा ऐसी हूई है। मानों श्राद्ध का नहीं किसी विवाह का आयोजन हुआ है। पापा के जानने -पहचानने वाले एक- एक कर आ रहें हैं। टेंट पंडाल पर लाखों फूँक दिया गया है।

दिन भर निपटा रहे लोग मुर्गे की बोटी। भेज- नॉनवेज सबकी व्यवस्था है। लोग छककर खा रहें हैं। और पूरब प्रसाद का नाम गा रहें हैं। जीते जी जो आदमी एक कप चाय को तरस गया था। आज लोग उनके नाम से स्कॉच उड़ा रहें हैं। आज दादाजी की बरसी है। कॉलोनी में रौनक पसरी है। पापा की बैठक में टँगी है माला लगी फोटो। एक- एक कर लोग आते हैं। दादाजी की फोटो पर आकर फूल चढ़ाते हैं। लोग कहते नहीं थकते। पूरब प्रसाद बड़े अच्छे आदमी थे। लेकिन मैं दादाजी को मानता हूँ फूल। क्योंकि दादाजी अपनी संपत्ति कर गए थे पापा और बड़े पापा के नाम से। ये थी दादाजी के जीवण की सबसे बड़ी भूल।

एक दिन धक्के मारकर पापा ने दादा को निकाल दिया था। दादा को याद दिलाते हुए उनकी भूल। भूल से याद आया पापा ये सब सोसायटी को मेंटेंन करने के लिए करते हैं। इस बात पर मम्मी- पापा की हफ्ते भर पहले हुई थी लड़ाई। मम्मी की तरफ से रहती है हर साल कड़ाई, कि जरूरी तो नहीं हर साल मनाई जाए दादाजी की बरसी। पैसा कोई पेंड पर उगता नहीं है जो इस तरह से खर्च रहे हो । पहले जब ऐसा कहते थे। तब अब क्यों नहीं समझते हो । आज क्यों दिल खोलकर बाप के ऊपर खर्च कर रहे हो। इसी पैसे से मुझे कहीं बाहर घूमाने का प्लान क्यों नहीं बनाते हो । इस तरह तुम हर साल क्यों मुझे सताते हो। मरे आदमी को जब खिलाया ही नहीं तो दोस्तों पर पैसे क्यों लूटाते हो। पापा का यही कहना है। दादाजी तो चले गए। लेकिन हमें सोसाईटी में ही रहना है। जब सब लोग हर साल अपने -अपने बाप का श्राद्ध मनाते हैं। तो ये हमारी भी मजबूरी है। जब वे लोग श्राद्ध में हमें बुलाते हैं। और छप्पन भोग खिलाते हैं। तो हमारा भी कुछ फर्ज सोसायटी के लिए बनता है। आदर -सत्कार से ही समाज हमारा चलता है।

पति की बरसी - (व्यंग्य) - महेश केशरी

यूँ तो सालों भर रहती है मौजमस्ती। उनका स्लोगन है अपने लिए जियो। दूसरों से मत रखो मत कोई उम्मीद । लेना वो जानती हैं। देने में करतीं हैं परहेज । वैसे वो एक नंबर की बेईमान हैं। दूध के पैसों में की थी बेईमानी । चेहरे से दिखती है भोली । दिल की हैं काली। कोई कुछ माँगे तो दिखा दो आगे का रास्ता।

सोशल मीडिया पर कुछ लाईक्स पातीं हैं। दिन भर सोशल मीडिया पर गुलछर्रे उड़ाती हैं। पति छोड़ गया है पैसा। इसलिए दिखातीं हैं भाव। इस बात का रहता है उनको बहुत ताव। कुछ लंपट किस्म के लोग लेते हैं रूचि। दिन भर उनके लिए करते हैं बातें ऊँची -ऊँची। लड़के स्टनिंग और आई.लव.यू. तक कहते हैं। उनको नहीं पता कि उनके मजे लेते हैं। उनके चेहरे पर रहती है हमेशा बेफिक्री । अभी कल ही पूराई थी पति की बरसी । बरसी के दिन वो रहतीं हैं दुखी। चेहरे पर दुख फैलाती हैं। चेहरे को बड़ा बनाती हैं।

बाकी दिन ऑल टाईम रहतीं हैं सुखी। पति की बरसी केवल औपचारिकता है। आँखों में रहती है झूठी नमी।

कहने को बेवा हैं। देतीं वो सोशल मीडिया पर सेवा हैं। दिन भर कमर मटकाने से उनको नहीं रहती है फुर्सत। बस चार दिन होते हैं आँखों में आँसू। फिर होंठों पर रहती है हमेशा खिलखिलाहट। पता ही नहीं चलता कि पति के साथ हैं या पति के बाद। उनसे दुनिया में नहीं है कोई सुखी। श्रद्धा के लिए श्राद्ध है। बात ये बेकार है। इतनी तैयारी है। मानों घर में आई बारात है । जीते जी जो कभी पूरियों को तरसा। उसके घर में रसगुल्ला है बरसा। शराब से लेकर शबाब है। हर चीज का इंतजाम है। फिर जैसे- तैसे बीतता है श्राद्व। फिर से आ जाती है सोशल मीडिया पर बहार । पति का श्राद्ध भूला दिया जाता है।

पति के लिए घड़ियाली आँसू बहातीं हैं। मोटी है चमड़ी दूसरों पर कभी खर्चती नहीं हैं दमड़ी । पति जिसका जाएगा। क्या वो कमर मटकाएगा। फिर जैसे ही बीतता है श्राद्ध। आ जाती है सोशल मीडिया की याद। नयी- नयी साड़ियों में रील्स वो बनातीं हैं । चेहरे पर पाऊडर और लाली लगातीं हैं । विधवापन को बताती हैं धत्ता।

बस आप पीठ घुमाईए - (व्यंग्य) - महेश केशरी

जब आप दूसरों पर हँसते हैं। तो दूसरों को भी आप पर हँसने का मौका मिल जाता है। आप किसी की आर्थिक- सामाजिक हैसियत पर हँसते हैं। कोई लड़की किसी के लड़के के साथ भाग जाए तो आप उसके माँ-बाप ,उसके संस्कार को दोष देते हैं। कोई दहेज पीड़िता लड़की हो तो उसके परिवार पर हँसते हैं। लेकिन क्या आपको नहीं पता कि आप पर भी लोग हँस सकते हैं।

हँसते रहिए ,हँसना जरूरी है। लेकिन सेहत बनाने के लिए हँसिए। सेहत बनाने के लिए हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। मैंनें ऐसे -ऐसे लोगों को देखा है। जो दूसरों पर हँसते थे। बहुत मामूली बात पर भी हँसते हैं। छोटी -छोटी बातों पर जैसे आपके कपड़े हल्के हों। आपका घर खराब हो । आप हद से ज्याद मोटे हों। आप हद से ज्यादा पतले हों।सामने वाले की हँसी निकल जाती है। एक बार शादी समारोह में जाना हुआ। मैं पंडित के बगल में बैठा था। सारे संस्कार मुझे ही करवाने थे। एक तरह से मैं जजमान था। जेब में मेरे खुदरे पैसे थे । पंडित को रेजगारी दान दिया तो रिश्तेदार हँसने लगी। उनके अनुसार मैं चिल्लर दे रहा था। लिहाजा मैं चिल्लर था।
अब पंडित जी खुद ज्ञानी आदमी हैं। जिनके पास ज्ञान है। उसको भला धन की क्या जरुरत है। उसको पैसों की क्या दरकार है ।

वैसे ही व्यहवारिक आदमी व्यहवार का भूखा होता है। पैसों की दरकार अपंगो, गरीबों, असहायों को होती है। जो सहाय हैं, जो समर्थ हैं। उनको पैसे क्यों देना है । लेकिन रिश्तेदार समझतीं ही नहीं थी। लोग मरे जाते हैं दिखाने के लिए। कोई शादी -ब्याह हो। कोई ऑकेजन हो। लोग दिखाने में लग जाते हैं। भर- भर कर अँगूठियाँ। भर -भर के राजहँस हार दिखाते हैं । शादी- ब्याह गरीब रिश्तेदारों को जलील करने का हमें अवसर देता है। शादी- ब्याह और ऑकेजनों में ही तो ऐसा मौका मिलता है। जिसमें हम अपना धन दिखाएँ ।

दूसरा गरीब रिश्तेदारों को। एक हमारा पड़ोसी होता है। जिसको हम अपना ठाठ -बाट दिखाना चाहते हैं। दूसरे हमारे रिश्तेदारों की शादियों में ऐसा अवसर हमें मिलता है। जिसमें हम ठाठ -बाट का प्रदर्शन करते हैं। शादी -विवाह भी तुरंत नहीं पड़ता है। कमबख्त चुनाव की तरह दस -पाँच सालों में आता है। जिस तरह कुँभ का लोग दस बारह- सालों तक इंतजार करते हैं। वैसे ही शादी - ब्याह का इंतजार करते हैं। लालायित रहते हैं ऐसे लोग धन का प्रदर्शन करने के लिए।

सोचिए वैसे लोगों की मनोदशा जो दिखावे के लिए मरे जा रहें हैं। ये कुछ -कुछ वैसा ही है। जैसे कोई सालों से तपस्या कर रहा हो शादी ब्याह में जाने के लिए । सालों बाद ऐसा मौका आने वाला होता है। दिखाने का। दूसरों को जलाने का। अपने पहने हुए कपड़ों को इंपोर्टेड बताने का। कोई पूछे तब भी , ना पूछे तब भी। कुछ लोग तो हमसे बात भी बस इसीलिए करते हैं कि उनकी चीजों पर चर्चा हो। कब खरीदा ,कितने में खरीदा, कहाँ से खरीदा। अच्छा लग रहा है , वगैरह -वगैरह। अगर शादी विवाह में ऐसा हो गया। लोगों ने अगर उनको अगर हाथों -हाथ लिया। तो उनका खरीदा हुआ सोना , कपड़ा, गहना सब सवारथ चला जाता है। ना चर्चा हो तो उनको लगता है उनकी खरीदी हुई चीजें बेकार चली गईं।

कितने तोले का हार किसने दिया है। फलनवी कितना मँहगा साड़ी पहनी है। ले- देकर खाली दिखावा करना है। आखिर लोग शादी ब्याह में जा रहें हैं।
ऐसे ही लोगों को कहते सुना होगा। पेट में क्या खाया है , कौन देखता है। खाना खराब खाने से चल सकता है। लेकिन कपड़े बढ़िया होने चाहिए। लोग इसी दिखावे में भारी -भारकम कोट ,टाई ,जूता -मोजा चढ़ाकर चले जाते हैं। भले ही मई का महीना हो। सुविधा- असुविधा बाद में देखी जाएगी। ऐसी भारी -भारी साड़ियाँ महिलाएँ पहनतीं हैं कि क्या कहने। कान के झूमके इतने बड़े -बड़े कि लगता है का कान कटकर अलग हो जाएगा। लेकिन पहनेंगीं।

ये वही लोग हैं। जो आपके मुँह पर आपकी साड़ी आपके ड्रेसिंग सेंस,आपके कोट की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन अकेले में आपके ऊपर हँसने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते हैं । बस आप पीठ घुमाईए। और आपके शान में कसीदे पढ़े जाने लगते हैं। आप दिखाने के लिए मोटा गहना, मोटा कपड़ा शादी में चढ़ाते हैं। लेकिन बाद में वही समधी आपकी बेटी को दहेज के लिए और परेशान करता है। फिर ऐसा दिखावा किस काम का। तो मैं रिश्तेदार की बात कर रहा था। आखिर उनका भी समय आया। समय ने उसकी हँसी निकाल दी। बेटे को बड़े मनोयोग से पढ़ाया। बड़ा होकर बेटा इंजीनियर बन गया। जब लड़का इंजीनियर बन गया तो रिश्तेदार के पाँव जमीन पर नहीं पड़ते थे। सबको कहती फिरती थीं कि मेरा बेटा इंजीनियर बन गया है।

अब लाखों कमाने लगा है । सोचा दुख के दिन बहुरेंगें। सुख दिखाई देगा। लेकिन कहते है़ं ना कि दूसरों पर नहीं हँसना चाहिए। बेटा का जॉब मल्टीनेशनल कंपनी में लग गया। बेटा अपनी पत्नी को लेकर फुर्र हो गया।
आखिर -आखिर तक घर को रिश्तेदार ने बचाने की बहुत कोशिश की।
आखिर -आखिर तक रिश्तेदारों से अलगाव की बात को ढ़ँकती थी। ताकि दुनिया को पता ना चल जाए कि घर में बिखराव शुरू हो गया है। ताकि लोग ,समाज उन पर ना हँसे।