व्यंग्य (111-120) - महेश केशरी
Hindi Vyangya (111-120) - Mahesh Keshri
जोमेटो ले आएगा - (व्यंग्य) - महेश केशरी
कहोगे कलियुग में ये आदमी प्रवचन दे रहा है। हो सकता है ना मानो मेरी बात। लेकिन हे मूर्ख इतना काहिल और जाहिल मत बन जाओ की अपने हक की बात सुनने से रह जाओ। सही भी है आज के समय में जब बाप- बेटा का नहीं, पति- पत्नी का नहीं, दोस्त -दोस्त का नहीं। तब ये समझाना तुम्हें मेरा उल्टा भी पड़ सकता है। हो सकता है निकालो लाठी और कर दो मेरी पिटाई। लेकिन ना दिखाओ इतनी ढ़िठाई। आज लोग बाप -को- बाप नहीं कहते बल्कि आज की दुनिया में रूपया ही बाप है। सारी समस्या की जड़ रूपया है।
जब लोग ज्यादा लगते हैं कमाने । तो रिश्तेदारों को लगते हैं भूलाने । जो भलाई का रास्ता दिखाता है।वही बुरा बन जाता है। जिस घर में पैसा ज्यादा आने लगता है।वहाँ क्लेश बढ़ जाता है। पैसा संबंधों में स्पीड ब्रेकर बन जाता है। सब फसाद की जड़ है पैसा। पैसा आदमी को अँधा बनाता है। संबंधों की लुटिया डुबाता है। आज हर पैसे वाला है दुखी। रोगी है उसकी काया। चैन गया है छीन . रात में आती नहीं नींद। भागते- भागते उसका बीतता है दिन। नींद आँखों से गायब है। शरीर में रहती है हरारत । रात को आती नहीं है नींद। पैसा ही मनमुटाव का कारण बन जाता है।संबंधों में कटुता लाता है। मतलबी हैं लोग मतलब के हैं रिश्ते। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रूपया। ऐसा लोगों की सोच है। भाई ये जीवण में है सबसे बड़ी मोच। अगर गिर गए कभी रास्ते में उठाने ना आएगा कोई। जिसने पैसा पहचाना रिश्ते की खोई साख । बाद में पछताता है। हाथ उसके कुछ ना आता है। जिसका मन मलिन है। वो दिखता है भोग-विलास में तल्लीन। ऐसे लोग हमेशा रहते हैं दुखी । दुनिया में वही है सुखी। जिसके पास है , रिश्तों की जमा पूँजी। रिश्तों को बचाओ जीवण में सफलता की है बड़ी कुँजी। अगर बिस्तर पर पड़ जाओगे। तो रिश्ता ही बचाएगा। पैसा पानी लेकर बिस्तर पर नहीं आएगा। मुँह में दवाई नहीं खिला सकता पैसा। रोटी भी नहीं बना सकता है पैसा। कहोगे रोटी बाजार से आ जाएगी। जोमेटो ले आएगा। मान लो जोमेटो ले आएगा। लेकिन क्या मुँह में भी खिलाएगा। क्या सहारा देकर पैसा बिस्तर से उठाएगा। जब तक जवानी है। मानो कर लोगे ऐश। लेकिन जब आएगा बूढ़ापा तब याद आएगा अपनो का सहारा। इसलिए रिश्तों का दो महत्व। आज ही कर को संकल्प।
अगर रूपये को छोड़ दो तो रिश्ते जुड़े रहते हैं। रूपया जहाँ बीच में आया रिश्ते को खाया। पैसों से बनाओ दूरी कर लो जीवण को सुखी।
इश्क का बारहमासी बुखार - (व्यंग्य) - महेश केशरी
कहीं सास, दमाद को लेकर हो रही है फरार। कहीं ससुर, बहू का उतार रहा बुखार। बेटा गया है कमाने विदेश। ससुर और बहू कर रहें हैं , ऐश।
कम कमाओ लेकिन घर में ही रहो। नहीं तो धो दोगे तुम अपनी बीबी से हाथ। इश्क का आजकल लोगों को चढ़ा है बुखार। बुखार कुछ ऐसा है कि घर- घर में है इसका प्रभाव। संबंध जोड़ते समय करो लड़की और लड़के की जासूसी। हायर करो किसी शर्लक होमस को।
नहीं तो लाश मिलेगी नीले ड्रम में ढ़ूँसी। व्योमकेश बक्क्षी को जल्दी करो हायर। नहीं तो झेलो सामने से फायर।
दिमाग खुला रखो। आजकल किसी पर नहीं जताना है , विश्वास। नहीं तो होगा बेटा तुम्हारा सर्वनाश। चाहे वो तुमहारा लगता हो भाई, या कोई चाचा, या लगती हो ताई। प्रेमिका और पत्नी पर भी अब ना करना भरोसा। नहीं तो मिलोगे किसी खाई में लेटे ।
सोशल मीडिया में ऐसे प्रकरणों की चर्चा है। कि जीजा ने साली को अपने पर खर्चा है। इसको प्रेम कहना है ,बेकार। ऐसे संबंधों से होता है अपमान। सुखमय जीवण में आता है ,क्लेश। सामाजिक व्यवस्था में लोगों की हिल गई है चूल। रिश्तों में लोग जब से करने लगे हैं ऐसी भूल। भूल गए हैं लोग रिश्तों की मर्यादा। उनको मिटानी है दैहिक अभिलाषा। यही नहीं खत्म होती कहानी है। आजकल की बुढ़िया चार- चार बच्चों और पति को छोड़ अपने से आधे उम्र के लड़के के संग भागी है। गाँव में बखेड़ा है। लोगों ने घेरा है। अरे और क्या होगा लड़का और लड़की का ही झमेला है। चालीस की बुढ़िया पकड़ाई है। अपने बेटे की उम्र के प्रेमी के संग धरायी है। बेटा जब धराए हो चालीस की बुढ़िया के साथ। तो पंचायत भी लेगी अपना इंतकाम। जब गाँव में पकड़ाए हो रंगेहाथ। तो पंचायत के नियम से लेना होगा फेरे सात।
फेसबुक का प्यार लोगों को भा रहा है। इसीलिए देश हमारा रसातल में जा रहा है।
गाँव की गरिमा ना हो कलंकित। इसलिए गाँव वाले रहते हैं सशंकित । सिंदूर लगाने के बाद लड़का नहीं पकेगा , तंदूर में इसकी गारंटी है।
उनका कहना भी सही है। बिना सिंदूर के रिश्ता होता कलंकित है ।
सिंदूर का महत्व ऐसे घट रहा है। लोगों में जैसे ये राशन की तरह बंट रहा है। सिंदूर ऐसे बंट रहा है .मानो कोई चंदा है। लोगों ने बना लिया है, इसको अब धँधा है ।
लोग बूढ़ापे में अपने से आधे उम्र के लोगों से प्रेम कर ले रहें हैं। प्रेम की आड़ में हवस की रोटियाँ सेंक रहें हैं।
प्रेम करने वालों के बारे में आप सोच रहें होंगें बच्चे हैं। जी नहीं ऐसे लोग अक्ल के कच्चे हैं। बनते हैं समाज में ऐसे लोग खलनायक।ऐसे ही लोगों को हम कहते हैं नालायक।
लव एट फर्स्ट साइट - (व्यंग्य) - महेश केशरी
चँगूलाल मोबाइल प्रेमी जीव थे। उनका मोबाइल का "लव एट फर्स्ट साइट " वाला सीन था। लोग लड़कियों के के प्रेम में घायल होते हैं। लेकिन वो मोबाइल प्रेम में घायल थे।
महीनों वो पत्नी को देखे बिना रह सकते थे। लेकिन मोबाइल को देखे बिना नहीं। ऐसे में हीट वेव की एडवाइजरी से वो दुखी थे। चँगू लाल को और सब बातों से तो मतलब ना था। उनको बस देखने के लिए मोबाइल और खाने के लिए गुटखा मिल जाए इतना काफी था। चाहिए होगी किसी को तख्त। रखते होंगें लोग अमीर बनने की ख्वाहिश। लेकिन उनकी बस एक ही ख्वाहिश थी। वे रहें और उनका मोबाइल उनके साथ। ऐसे में हीट -वेव की एडवाइजरी जारी हुई थी। घर से बहुत जरूरी हो तभी निकलें। भाई घर से चँगू लाल ना निकलें तो दफ्तर कैसे जाएँ। आदमी काम ना करेगा तो भूखों मर जाएगा। दफ्तर में जब लोग ऊँघते तो चँगूलाल मोबाइल में घुस जाते। पानी की बोतल साथ में रखें। चँगू लाल अपने थैले में हमेशा पानी की एक बोतल रखते थे। पेय पदार्थों लस्सी , छाँछ , दही की शर्बत पीते रहें। मँहगाई की गर्मी ने पहले ही लोगों जूस निकाल दिया है। क्या लोग जूस पीएँ। मोबाइल का इस्तेमाल कम -से- कम करें। चँगूलाल ने एडवाजरी उल्टी ली। कम-सकम करने लगे। बस -बस यही बात जो उनको खटकती थी। मोबाइल से दूरी पर उनको वो गाना याद आ जाता था। "एक पल ,एक दिन जी सकेंगें ना हम एक दूजे की बिन।"
नींद तो अव्वल आती ना थी। आ भी जाती तो सपने में उनको वो गाना सुनाई देता। " मुझे नींद ना आए, नींद ना आए। मुझे चैन ना आए, चैन ना आए । कोई जाए जरा ढ़ूँढ़ के लाए। ना जाने कहाँ मोबाइल खो गया। हालत क्या है कैसे तुझे बताऊँ मैं। करवट बदल बदल के रात बिताऊँ मैं। पूछो जरा पूछो क्या हाल है। हाल मेरा बेहाल है। "
अव्वल मोबाइल तो खोया नहीं था। फिर भी मोबाइल के खोने की तरह का ही दुख था। उनको और जमाने से कोई मतलब नहीं था। मोबाइल का उनका जो प्रेम था। वो पहली नजर का प्रेम था। मोबाइल देखे बिना उनको चैन नहीं पड़ता था। सुबह उठते तो मोबाइल देखते मिलते। दोपहर को खाना खाते हुए भी मोबाइल देखते । बस मोबाइल- ही- मोबाइल था उनकी जिंदगी में। दोपहर में खाना खाकर पीठ सीधा करते समय भी मोबाइल पर नजरें जमीं रहतीं उनकी । पत्नी कहती कभी मोबाइल को छोड़ भी दिया करो। क्या दिनभर मोबाइल में ही घुसे रहते हो। चश्मे का नंबर बढ़ जाएगा। लेकिन इससे उनको कोई मतलब नहीं था। और जब काम नहीं कर रहे होते। तब भी वो मोबाइल ही देख रहे होते। रात में दो -तीन बजे तक मोबाइल देखते। और फिर मोबाइल देखते- देखते ही सो जाते।
कार चलाते वक्त मोबाइल का उपयोग ना करें। मोबाइल की बैटरी फट सकती है। और कार में आग लग सकती है। ये एडवाइजरी जब सुनी चँगूलाल ने तो चँगूलाल का मुँह लटक गया। लेकिन बजरंग बली का नाम लेकर उन्होंने मोबाइल कार में भी चलाना जारी रखा। सौ केस में ऐसा होता है जरूरी थोड़ी है मेरे साथ ही हो।
बैटरी के फटने से आप घायल भी हो सकते हैं। चँगू लाल तो मोबाइल प्रेम में पहले से ही घायल थे। दिल लगी दीवार से तो परी क्या चीज है। घायल तो वो पहले से ही थे। थोड़ा -बहुत हाथ -मुँह बैटरी फटने से ना जले तो वो भी भला कोई इश्क है। हाथ की नस काटने से बढ़िया है। थोबड़ा थोड़ा बहुत जल जाए। चँगूलाल मोबाइल से लव एट फर्स्ट साइट करते हैं। मोबाइल चँगूलाल से प्रेम थोड़े ही करता है।
हेलमेट दिखाईए और तेल ले जाईए - (व्यंग्य) - महेश केशरी
प्यारेलाल सामान को इधर -उधर फेंक -फेंककर कुछ ढ़ूँढ़ रहे थे। पत्नी ने देखा तो पूछा लिया। क्या ढ़ूँढ रहा हैं पतिदेव। पतिदेव बोले तेल लाने का जुगाड़ ढ़ूँढ़ रहा हूँ। पत्नी बोली कौन सा तेल लाने को ढ़ूँढ़ रहे हैं जुगाड़। बताने का कष्ट करें सरकार। अब तेल की बात ना ही पूछो तो अच्छा है। हर तरह क तेल ने आदमी का तेल निकाल दिया है। देशों की अर्थव्यवस्था इसी तेल ने खराब कर दी है। कैटरीन , करीना को देखकर लोगों की नीयत जितनी खराब नहीं होती होगी। उतनी नीयत इस तेल ने लोगों की खराब कर दी है। कब कोई दोस्त तेल के चक्कर में दुश्मन बना जाता है पता ही नहीं चलता। दोस्ती और दुश्मनी सब तेल करवाती है। इससे तेल मत खरीदो। उससे तेल ले लिया तो आज से मेरे दुश्मन। तेल उधार मिले तो दोस्त। तेल ना मिले तो कट्टर दुश्मन। ऐन तेल संकट के समय उस देश ने मदद ना की। इसलिए आज से ये हमारा कट्टर दुश्मन है। तेल ,दोस्ती दुश्मनी सब करवाता है। रिश्तेदारों को बिना तेल- घी के खाना परोस दो तो बेइज्जती। इसी तेल ने लोगों की जान बचाई है।
हर तरह के तेल से आदमी परेशान है। किस तेल कि बात करूँ। सबका एक ही हाल है। ज्यादा तेल खाकर डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। फिर दिल का इलाज करवाना पड़ता है। और बिना तेल के जीवण बहुत सूना -सूना -सा लगता है। जिंदगी में माशूका हो ना हो। चल जाएगा । बिना तेल के जीवण एक कदम नहीं चल सकता। सब्जी में तेल ना हो जो सब्जी का स्वाद नहीं आता। और अगर माथे में तेल ना हो तो लोग तेल(भाव ) नहीं देते। इस तेल ने सारा खेल ही बिगाड़ दिया है। फिलहाल मैं अपने तेल की जुगाड़ में लगा हूँ। तभी तो बाजार जाऊँगा। आयं तुम कौन सी मशीन हो जो तुमको तेल की जरूरत पड़ने लगी है।प्रिये तेल की जरूरत किसको नहीं है। इस संसार में पत्ता भी बिना तेल के नहीं हिलता है ।तेल अगर आदमी ना खाए। ना सिर में लगाए तो उसका काम नहीं चल सकता है । खाकर ही आदमी दौड़ता -भागता और काम करता है। लिहाजा हुई ना आदमी को तेल की जरूरत।
पहेलियाँ मत बुझाओ। तेल के बारे में बताओ। इस कबाड़ में भला तेल लाने का जुगाड़ कहाँ मिलगा। अरे मिलेगा जरूर मिलेगा। कबाड़ में ही जुगाड़ मिलेगा। रूको जरा ढ़ूँढने तो दो। छोड़ो चलो किचन में दो तेल के गैलन देती हूँ। एक में अपना तेल लेते आना। दूसरे में मेरा तेल लेते आना। भर गैलन तेल ला देना महीने भर के लिए।
फिर मैं तुम्हें तेल लाने को महीने भर ना कहूँगीं। लेकिन तुम्हारे तेल से मेरा तेल जरूरी है। पहले मेरा तेल ला दो। नहीं तो आज खाना नहीं बनेगा। खाने की छोड़ो। तेल लाने के लिए पहले बाजार जाना होगा। उसके लिए हेलमेट ढ़ूँढ़ने में करो मेरी मदद ।
आयं हेलमेट से तेल का क्या संबंध। क्या अब बिना पैसे दिए केवल हेलमेट देखकर तेल मिल रहा हैं। गलतफहमी मत पालो प्रिये। तेल लेने के लिए पैसा तो चाहिए ही । अब हेलमेट भी चाहिए होगा। और हेलमेट और तेल में बहुत ही गहरा संबंध है प्रिये। जैसे शरीर का दिल से। संगीत का हारमोनियम, तबले,और ढ़ोलक से संबंध है। वैसे ही हेलमेट और तेल का संबंध है, सरकारी आदेश है कि बिना हेलमेट के तेल नहीं देना है। नहीं तो तेल देने वाले का तेल निकाल दिया जाएगा। लिहाजा इस फरमान से कारिंदे -कर्मचारी सब डरे सहमें हैं। कर रहें हैं सरकारी आज्ञा का पालन। इसीलिए अगर चाहिए बाईक में तेल तो साथ में लाना होगा हेलमेट।
अच्छा तब तो कल को सरकार ये भी कह सकती है कि डायपर लेना है तो बच्चे को भी साथ लेकर आना होगा। ये भी कोई बात हुई भला!
सुंदरीकरण का बुखार - (व्यंग्य) - महेश केशरी
जब से हेलमेट के बिना पेट्रोल नहीं देने का नया नियम आया है। लोगों का चेहरे हैं हलकान। आम आदमी परेशान। है ये इलाज भी जरूरी था। क्योंकि आम आदमी नियमों को धत्ता बताता था। इसलिए ऐसा होना भी जरूरी था। लेकिन गेहूँ के साथ साथ घुन भी पिसाता है।
पहली बार हुआ है कि दुकानदार के पास माल रहते हुए माल नहीं बेच पा रहा है। पहली बार हुआ है पेट्रोल पंप वालों का बुरा हाल है । कहाँ तो पेट्रोल वाला राजा कहलाता था। अब उसकी गिनती बी. पी. एल. परिवार में होती है। इनका ही नहीं औरों का भी है बुरा हाल। बाजार में चिंता पसर गई है। दुकानदार का लटक मुँह गया है। आँखें बाहर आ गईं है । पेट अंदर धसक गया है । आँखों के आगे छाने लगा है , अँधेरा। दिखता नहीं अब कोई चेहरा। दिन में दिखाई देने लगा है तारा । सुबह से शाम तक दिखते नहीं , ग्राहक। खत्म हो गई है आमद। दिनभर रहता है ,खर्चे की चर्चा। यानि इनकमिंग जीरो आउटगोइंग जोरों पर है। जिस तरह से आऊटगोइंग चालू है। कर्ज लेकर हो रहा है गुजारा।
क्या पता कब कौन सा नया नियम आ जाए। और आदमी बेकार हो जाए। अतिक्रमण तेजी से हट रहा है। आम - आदमी जड़ से कट रहा है। जहाँ होती थी ठेले और दुकानें। वहाँ रो रहे हैं आवारा कुत्ते ढ़ेर सारे । नगर निगम का आदेश है। भीड़ नहीं होना चाहिए शहर में। ऑटो को हटाया जा रहा है। पेट पर लात जमाया जा रहा है। आदमी की भूख बड़ी है। सामने से यही दुख पड़ा है। शहर से दूर बसाया जा रहा है। कैसा सितम ये ढ़ाया जा रहा है। क्या आदमी सब्जी लेकर मील भर चलेगा। तब जाकर ऑटो पकड़ेगा। चौड़ीकरण के कारण सुंदरता जरूर बढ़ जाती है । लेकिन इसमें जनता निपट जाती है । भीड़ ही नहीं रहेगी तो किसके लिए रहेगा नगर निगम। क्या ऑटो वाले नहीं भरते हैं कोई टैक्स। तो क्यों लगती है इनको बार बार ठेस। ऐसा लोग -करते हैं व्यहवार। मानों आम आदमी हो लाचार। अगर ये दुकानदार और ऑटो वाले हो जाएँगें बेकार। तो बेरोजगारों की संख्या में हो जाएगा इजाफा।
शीशे का टोटका - (व्यंग्य) - महेश केशरी
शीशे के बारे में बहुत सुना था। लेकिन इधर हाल में शीशे को लेकर बहुत सी नई- नई बातें पता चली थी, कि घर में टूटा हुआ शीशा नहीं रखना चाहिए। टूटा शीशा रखना अशुभ होता है। एक दिन दुकान के ऐन ओपनिंग पर शीशा टूट गया। लोगों ने कहा कि उदघाट्न के दिन अगर शीशे का टूट जाए तो शुभ होता है। मैं तब से शीशे के बारे में बहुत गंभीरता से सोचने लगा। अब शीशा रहस्यमयी लगने लगा था। शीशे के आविष्कार और शीशे के पहली बार प्रयोग के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर ली । सीसा पानी में भी पाया जाता है ये भी पता चला।
दिन बीतते गए और मैं शीशा यानी टूटे हुए शीशे के बारे में जयादा सोचने लगा। हालाँकि टूटे हुज शीशे को मैं लोगों के कहने से दुकान से बाहर निकालकर कब का फेंक चुका था। और दुकान में नया शीशा भी लगवा लिया था। लेकिन जैसा कि लोगों ने कहा था कि शीशा टूटना बहुत शुभ माना जाता है। खासकर उदघाट्न वाले दिन। इस तरह शीशे में मेरी रूचि बढ़ने लगी थी। और मैं शीशा प्रेमी जीव हो गया था। इसका केवल यही कारण नहीं है। इसके पीछे एक और कहानी है।
उन्हीं दिनों हमारे गाँव में एक शीशे वाले बाबा आए हुए थे। उनका एक प्रसिद्ध टीला था। सामने धुनी रमाए। शरीर पर भभूत मले, चिलम फूँकते हुए वो बाबा लोगों को दिखाई देते थे। छह महीने तक वो हमारे गाँव में ही रहे। बाबा का टीला जहाँ था वहाँ कई पेंड थे । पेंड के ऊपर शीशे- ही- शीशे टँगें थे। लाल कपड़े में बँधे शीशे। बाबा के पास लोग प्रसाद के तौर पर शीशे ही चढ़ाते थे। लिहाजा आसपास के सैलून वाले, छोटे दुकानदार। पीढ़ा पर बैठकर बाल काटने वाले को बाबा साधारण से शीशे को चमत्कारी शीशा बोलकर देते थे ।
लोग शीशे वाले बाबा के पास जाते और अपनी मुराद पाते। इनमें वैसे लोग पहुँचते। जिनको अपनी जमीन किसी दुश्मन से छुड़ानी होती थी । या किसी का पति किसी और से फंस गया था । लिहाजा पत्नी को पति वापिस चाहिए था तो लोग संपर्क करते थे। कुछ लोग पर्चे पास करने के लिए बाबा के पास पहुँचते थे। बाबा, बाबा कम डॉक्टर ज्यादा थे। उनके पास नसों की परेशानी, सुजाक, लिंग का टेढ़ापन ,पतलापन, शी्घ्रपतन जैसी समस्या का भी इलाज होता था । हर तरह से हारे लोगों का सहारा थे बाबा । सौतन से मुक्ति कैसे पाएँ। आदि -आदि समस्याओं का शर्तिया इलाज था, बाबा के पास। बच्चे को नजर- गुजर लग जाती तो बाबा के पास । उसको भी शीशे वाले बाबा ठीक करने का दावा करते थे।
एक दिन मैं भी उनके दरबार में गया। शीशे वाली बात बताई।लोगों की कही बातें बताई कि कैसे मेरे दुकान के उदघाट्न के दिन शीशा टूट गया था। और लोगों के कहे अनुसार दुकान के उदघाट्न के दिन शीशा टूटना शुभ माना जाता है या नहीं। कृपया ये बताएँ। बाबा ने तस्दीक किया कि नहीं ये ठीक है। लोग सही कह रहें हैं । मैं खुशी -खुशी घर चला आया। और दुकान में ज्यादा ध्यान लगाने लगा कि दुकानदारी चल पड़े।
अब जब भी मैं घर में, बाहर या दुकान में , या सैलून में जब भी शीशे को देखता तो शीशे के प्रति मेरी अगाध श्रद्धा बढ़ जाती। शीशे को किसी मूर्ति की तरह प्रणाम करता। बस फूल और प्रसाद चढ़ाना शेष रह गया था। उसका भी कारण था कि दुकानदारी अभी ठीक से नहीं चल रही थी। नहीं तो अपनी ये दिली इच्छा भी पूरी कर लेता। दुकान के आगे कोई बाल झाढ़ते। या कोई सेविंग करता शख्स दिखाई दे जाता तो मेरा मन साष्टांग दंडवत करने को करता। कि जब शीशा जैसी वस्तु के आगे कोई आदमी बाल झाड़ रहा है। या शीशे के सामने खड़े होकर कपड़े पहन रहा है। तो सोचो वो आदमी कोई पुण्यात्मा ही रहा होगा। कोई, देवदूत, या कोई फरिश्ता ही रहा होगा। खैर बहुत दिनों तक मेरी शीशे पर श्रद्धा बनी रही।
लेकिन टूटे शीशे को हटाए जब चार -पाँच महीना बीत गया। और कृपा नहीं हुई । तब मैं फिर से एक दिन शीशे वाले बाबा के पास फिर गया। समस्या बताई, कि एक समय लोगों के कहने पर दुकान का टूटा हुआ शीशा अशुभ मानकर मैनें बाहर फेंक दिया था। अब बताईए क्या कारण है कि कृपा रूकी हुई है। बाबा ने बताया बस यही कारण है। तुमको टूटा हुआ शीशा नहीं हटाना चाहिए था। अगर फिर से कभी दुकान का शीशा टूट जाए तो मत हटाना। लेकिन ध्यान रहे शीशा अपने से टूटना चाहिए। जानबूझकर खुद से तोड़ा हुआ शीशा काम नहीं करेगा।
मैं बाबा की बात मानकर चला गया। और शीशे के टूटने का इंतजार करने लगा था । अब सोते -जागते बस दुकान में शीशे के टूटने के इंतजार था। शीशे को जानबूझकर झटके से खोलता था। ताकि शीशा टूटकर गिर जाए। दुकान का शटर जोर से पटकता था। ताकि शटर के जोर से शीशा टूटकर गिरे और टूट जाए। और कृपा होने लगे । खैर बाबा जा चुके थे। और मुझे शीशे का टोटका समझना था। मेरी दिली इच्छा थी कि शीशा टूट जाए। बस किसी तरह शीशा टूट जाए। और एक दिन प्रयोग के तौर पर बाबा की बात के उलट मैनें शीशे को पत्थर से मारकर तोड़ दिया। सोचा प्रयोग करने में क्या जाता है। और मैनें शीशे को पत्थर मारकर एक दिन तोड़ दिया। आज साल भर के बाद भी टूटा हुआ शीशा वैसे ही दुकान से लटका हुआ है। लेकिन दुकान में कृपा नहीं हुई। अब नया शीशा भी लगवाना है।शीशे का टोटका आजतक काम नहीं आया है।
फसल की तरह रिश्तों में गारंटी नहीं है - (व्यंग्य) - महेश केशरी
हमारे आसपास तमाम ऐसे चेहरे हैं जिनको देखकर नहीं लगता कि वे गैर जिम्मेदार हैं। नाक-नक्श आदमी की तरह। बोलते- बतियाते एक जैसे हैं। खाते -पीते -सोते -जागते वे हमारी तरह दिखाई देते हैं। । हमारी तरह की देह हमारी तरह का माथा। बोली व्यहवार, रंग- गंध सब एक जैसे। लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी ऐसे लोग पकड़ में नहीं आते हैं। आदमी में आदमीयत ढ़ूँढ़ना दरअसल भूसे में सुई ढ़ूँढ़ने के समान है। ऐसे लोग जो बोलते नहीं। या तोल -मोल कर बोलते हैं। इसके पीछे उनकी मनसा होती है। कोई समझ ना जाए उनकी बात। दिल में कुछ और चल रहा है। और मुँह से कुछ और बोलते हैं।
जिस तरह से दूध में पानी नापने के लिए लैक्टोमीटर मीटर आता है। कि दूध में कितना पानी मिला है। उसी तरह का एक लैक्टोमीटर आदमी के अंदर की बेईमानी और टुच्चे पन को नापने के लिए होना चाहिए था।
इस हिसाब से डेयरी मालिक देखा लेता है कि ग्वाला कितना हेर-फेर कर रहा है। डेयरी वाला पकड़ लेता है। एक बाल्टी दूध में कितना पानी मिलाया है। इसी तरह एक मुकम्मल आदमी के अंदर की बेईमानी का भी पहले से पता करने का कोई यंत्र होना चाहिए था। एक किलो दूध निकालकर खोया मारकर ये पता चल जाता है कि बाल्टी की दूध से कितना खोया मिलेगा। लेकिन आदमी की थाह नहीं मिलती। आदमी समँदर से भी गहरा होता है। औरत बेकार में बदनाम है, कि औरत के दिल की बात का कोई पता नहीं लगा सकता। ये इश्क़- मुश्क के मामले में ठीक है।
खैर ,आदमी से खोया क्या गोबर भी मिलने की उम्मीद नहीं है । क्योंकि आदमी की सोच में गोबर भरा है। अपने लिए जीता है। केवल और केवल अपने स्वार्थ के लिए। आदमी खाता अनाज है। पूड़ी ,पकवान,,दूध - दही, जलेबी। लेकिन मीठा खाकर भी उसका मन मीठा नहीं होता। जलता है अपने ही लोगों से। माँ-बाप ,भाई -भतीजे से कड़वाहट भरे संबंध रखता है। लेकिन गोबर नहीं करता है। आदमी की बुद्धि बैल की है। कृतघ्न होता है आदमी। गृहस्थी और खेती दोनों एक तरह से जुआ है। खेती और लड़कों की पैदाईश -पैमाईश एक सी होती है। कहावत है कि गुड़ देखकर केतारी ( गन्ना )नहीं रोपा जाता। इसीलिए बेटे के जन्म पर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। पूत सपूत तो धन काहे का।इसके उलट पुत कपूत तो धन काहे का। पूत सपूत हो या कपूत धन आपका ही जाना है। अव्वल तो आपका ध्यान इस बात पर रहता है कि बेटे को ज्यादा- से -ज्यादा पढ़ाया-लिखाया जाए और होनहार बनाया जाए। लेकिन याद रखिए होनहार हो या बेवकूफ। वो आपके काम नहीं आएगा । बड़ा होगा तो बीबी के पल्लू से बंध जाएगा। आपकी एक ना सुनेगा।
और हालत वही ढ़ाक के तीन पात , जैसी । यानी कहानी वहीं जहाँ से हम और आप चले हैं और वहीं पहुँच जाते है। यानि की समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। लोग सपनों के महल खड़े करने लगते है़ं। बेटा की शादी धूमधाम से करेंगें। ये करेंगें वो करेंगें।लेकिन सारी मुराद दिल में धरी -की -धरी रह जाती है।
बढ़िया खाद और बीज डालकर हम फसल तैयार करते हैं। सोचते हैं कि फूल गोभी के सीजन में फूल गोभी सौ रूपये किलो बिकेगी। और हम मालामाल हो जाएँगें। लेकिन खेती और बच्चों की परवरिश दोनों बड़े जोखिम का काम है।
जिस तरह खेती को लेकर हम आश्वस्त नहीं हो सकते कि फसल अच्छी ही होगी। और समय पर आ जाएगी। फसल की तरह औलाद के बारे में भी नहीं कह सकते।
जो बर्तन धोकर भी निपट गए - (व्यंग्य) - महेश केशरी
पत्नी आगे पढ़ाने को बोले तो बात उसकी मत मान लेना। लड़की का बाप कोई बुड़बक थोड़ी था। जो आगे नहीं पढ़ा पाता। नहीं थी कोई कमी उसके पास पैसों की। जो बाप दस -बीस लाख रूपये शादी में फूँक सकता है। वो पढ़ाई जैसी चीज पर भी लाखों फूँक सकता है। लेकिन लड़की का बाप देख चुका होगा लड़की की चाल-ढ़ाल। उसको लगा होगा कि अब पानी सर से ऊपर भी निकल सकता है। पीठ में धूल लगे उससे पहले निकल लो पतली गली पकड़कर। देखो कोई जवान पट्ठा।जो देखने में हो हट्ठा -कट्ठा। अपनी मरखाई गाय उसको बाँध दो।
बाप उसका लड़की की गति और मति देख चुका होगा इसीलिए हो गया होगा सतर्क। उसको अपनी मुसीबत किसी ना किसी के गले तो मढ़ना ही था। तुमसे बेहतर गला किसी और का नहीं हो सकता था। इसलिए तुम्हें , तुम्हारे ससुर ने फांस लिया।
फिर चला नहाने काशी। जिसके सिर पर पड़ेगी मुसीबत उसको झेलनी है ,बेटी उसकी। जिस मुसीबत को झेला पच्चीस साल। उसको दामाद के पास ठेलना है अगले पचास साल। अब से आटा, दाल, चावल , का भाव दामाद को भी मालूम पड़ जाएगा। दामाद भी मँहगाई के रेत में दब जाएगा। बहुत घूमे हो निठल्ला और आवारा। अब चूल्हा चौकी से पड़ेगा नाता ।
शादी नहीं किया है तो बहुत बढ़िया। मैं तो कहूँगा नहीं किया है मत ही करो। लेकिन फिर कहोगे कि खुद इसने कर ली है। लेकिन मुझे मना कर रहा है। लगता है मुझसे जलता है।
शादी का लड़डू जो खाए वो पछताए। जो ना खाए वो भी पछताए। इसीलिए इस लड़डू को कभी भूल से भी मत खाना। मैनें कर ली है ये गलती।तुम मत दुहराना। गड्ढ़े में गिरकर नहीं। दूसरे गिरने वाले से सीख लो। मुफ्त में सलाह लो। बात मेरी मान लो। मैं केवल गड्ढे़ में ही गिरा हूँ। शुक्र है मरा नहीं हूँ।
खैर, अगर शादी करनी ही है तो बर्त्तन माँजने, कपड़े धोने का काम सीख लो। आगे इसकी जरूरत पड़ने वाली है। हो सकता है फिर भी इतनी सेवाएँ देने के बाद भी खुदकुशी कर लो। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ गई है। जो झाड़ू, बर्तन, कपड़े धोने के बाद भी निपट गए। हो सकता है तुम्हारी तकदीर यहाँ ठीक हो। लेकिन जरूरी नहीं कि तुम ड्रम में पैक होने से बच जाओ। इसीलिए समय है अभी भी शादी से भाग जाओ। या मान लो खुशनसीब हुए। लकिन घूमने जाने का भी तो शौक होगा। हो सकता है इसी बहाने से पहाड़ पर भी निपटा दिए जाओ ।
उक्ति की सूक्ति पकड़कर चलना चाहिए - (व्यंग्य) - महेश केशरी
आजकल के लोग काँईं हैं। पैसों के मामले में बहुत चाँईं हैं। कोई छोटा हो या बड़ा हो सामान माथे पर उठाना है गँवारा। लेकिन कुली को नहीं देना है एक धेला। चाहे ले जा रहा हो कोई पचास इंच का टी. वी.। या ले जा रहा हो जम्बो कूलर। एक आदमी बैठा लीजिए पीछे। टी.वी. हो चाहे कूलर वो पकड़ लेगा। फिर टी.वी. या बीबी बाईक में पीछे लटककर आ जाएगी। लेकिन सामान ले जाने के लिए नहीं जानी चाहिए जेब से एक भी फूटी कौड़ी। पैसे को हर हालत में बचाना है। आज पैसे को बचा लो तो कल पैसा तुमको बचा लेगा। इसी उक्ति और सुक्ति को पकड़कर चलना है। कुली को पैसा देते समय निकल जाती है जान । भले ही सामान बीच- बीच में चेक करना पड़े।
भले हो लाख असुविधा हो। मन में हो अनगिनत दुविधा। इसी पैसा बचाने की सुविधा के लिए एक दिन देखा। सड़क पर एक बाईक सवार के पीछे एक लड़का बैठा था। पकड़ा रखा था जम्बो कूलर। दाँत- मुँह चियार रहा था लड़का। लगता है अब गिरा तब गिरा कूलर। फिर भी किसी तरह संभाले था कूलर। गंतव्य तक ले जाना था। अगर घनघोर आबादी से दूर कहीं जंगल में खत्म हो गया तेल। तो सारी होशियारी हो जाएगी फेल।फिर खुद कैसे जाओगे। क्या टोचन लगवाओगे।
रास्ते में देखा पीछे बैठे सवार को। था बहुत परेशान वो। कभी कूलर इस हाथ से सरकाकर उस हाथ में ले जाता था । कभी उस हाथ से सरकाकर इस हाथ में ले आता था । हाथों और जाँघों में अब होने लगा था पेन । बीच- बीच में हर पाँच मिनट में हाथ के साथ -साथ जाँघ भी बदलता था। बाईक को कुछ दूर ले जाकर बार- बार रोकता था। एक दिन एक गड़रिया ले जा रहा था लादे बाईक पर खल्ली। एक मन से कम ना होगा वो सामान। पड़ता था बीच में एक बरसाती नाला। सड़क थी खराब। बाईक का टायर था चिकना। रास्ते में फिसलने और गिरने का डर था।
रास्ता था संकरा। किसी ने लगा दी थी रास्ते में बाईक। लेकिन गड़रिया रास्ते को धत्ता बताते हुए गली में जबरजस्ती घुस गया था। बाइक का स्टैंड निकला था बाहर।गड़रिया की जबरजस्ती बगल में खड़ी बाईक को ठेल कर गली पार करने की इच्छा थी । बोरा का एक कोना फंस गया। और बोरा किनारे से फट गया। खल्ली और दाना सड़क पर पसर गया। किसी तरह उठाया वापस सामान। फिर दूसरे बोरे में भरा । लेकिन फिर भी नहीं मानी हार।
थोड़ा और आगे सरका गड़रिया। तो सड़क पर थी भारी फिसलन । बाईक सीधे नाले में जा गिरी। इस तरह गड़रिया का बचा -खुचा खल्ली और दाना दोनों नाली में समा गया। लोगों ने समझाया। अगर सौ पचास वैन वाले पर खर्च देते तो क्या चला जाता। बच जाती जान नाले में जाने से । ऐसी होशियारी किस काम की। इसलिए जरूरत से ज्यादा होशियारी भी नहीं दिखानी चाहिए। जरूरत से ज्यादा होशियारी करने से मुँह की खानी पड़ती है।
पति की कुँठा का इलाज - (व्यंग्य) - महेश केशरी
हमारे यहाँ की समाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि लोग कुँठा पालने लगते हैं। तब जब पत्नी पति से ज्यादा कमाने लगती हो तो ये कुँठा और बढ़ जाती है।
जब पत्नी को घर में पति से ज्यादा क्रेडिट मिलने लगता है तो पति मन -ही- मन जलने लगता है।अपना हाथ मलने लगता है। पति के मन में बढ़ने लगता है टेंशन। असुरक्षा का बढ़ने लगता है खतरा।
जवानी में ही पेंशन पाने का एहसास हो जाता है। रही -सही कसर समाज में निठल्ले और आवारा लड़के पूरा करते हैं। कान भरते हैं कि अरे मौगा है क्या जो औरत की कमाई खाता है। तब साँप की तरह उफान मारने लगती है मर्द की मर्दांनगी। तब मर्द की मर्दानगी उसको अंदर से दहाड़ती है। मानवता को पछाड़ती है।
मर्द पर लानत भेजने वाले ऐसे लोग होते हैं। जो खुद तो कुछ करते नहीं हैं । लेकिन समाज में कुँठा फैलाते हैं।
मर्द होने से पहले वो औरत के साथ ही होता है। मर्द होकर माँ की छाती से चिपटा रहता है। माँ का दूध पीकर ही बड़ा होता है। फिर पत्नी रूपी माँ ,बहन, बेटी ,बहू से जब पुरूष अपनी सेवाएँ लेता है। तब उसकी कुँठा कहाँ चली जाती है। माँ दफ्तर को देर हो रही है। जूता पालिश हुआ है या नहीं। जुराबें धुली हैं कि नहीं। सब काम स्त्री करती है। और केवल कमाई नहीं करने के कारण आदमी ,नामर्द हो जाता है।
पत्नी कि कमाई से पति को कुँठा नहीं पालनी चाहिए। अगर इतनी ही कुँठित मानसिकता का समाज है। तो अपनी कुँठा मिटाने के लिए वो घर कि सफाई, खाना- पकाना, कपड़ा धोने का काम, बच्चों को स्कूल से लाने ले जाने का काम। घर की साफ -सफाई, बागवानी और पेंड़ पौधों की छँटाई का काम भी कर सकता है।
ध्यान रहे कि हमारा संविधान हमें बराबरी का हक देता है। इसलिए कुँठा पालने की जरूरत नहीं है। सरकार तो दे ही रही है बीस किलो अनाज महीने में।
जब बेरोजगार लोग कुँठा नहीं पालते। बल्कि बाप के पैसों पर ऐश कर रहें हैं। तो यदि आपको कमाऊ पत्नी मिली है तो पर गर्व कीजिए। ऐसी पत्नी मिली है तो इसके लिए बजरंगबली को सवा किलो लड़डू का प्रसाद चढ़ाईए। कि आपको ऐसी लाखों में एक नहीं करोड़ों में एक पत्नी मिली है। आजकल पहाड़ से धक्का देने वालियाँ मिल रहीं हैं। ड्रम में पतियों को पैक करने वाली पत्नियाँ मिल रहीं हैं। भाग्य सराहिए। कुँठित लोगों की बातों पर कान मत दीजिए। ब्लकि पत्नी से मेल-जोल बढ़ाईए।
ये पत्नी की कमाई के कारण कुँठा पालने का समय नहीं है। बल्कि आप ऐसी कमासुत पत्नी पाकर धन्य हुए हैं। ये आपका सौभग्य है। आप सप्ताह में दो दिन कमासुत पत्नी के साथ रेस्टोरेंट में जाईए। वहाँ पत्नी का पैसा जमकर फूँकिए। ना हो तो ऐसा कहने वालों के मुँह पर अगर तमाचा मारना हो तो पत्नी के साथ उसके पैसों से कहीं देश -विदेश घूमने चले जाईए। और महीना भर घूमकर आने के बाद वैसे लोग जो औरत की कमाई खाने वाले को नामर्द कहते हैं। अपनी हनीमून की कहानी बताईए। हर घूमने -फिरने की यात्रा को तफसील से सुनाईए। ऐसा रस ले -लेकर घटनाओं को बताईए की सामने वाले को नामर्द कहने की कभी हिम्मत ना पड़े। औरतें ने जब सालों खाया है। तो क्या पुरूषों को कुछ समय खिलाकर अपना कर्ज नहीं उतार सकती।