व्यंग्य (101-110) - महेश केशरी

Hindi Vyangya (101-110) - Mahesh Keshri

स्वास्थ्य मंत्री जी का स्वास्थ्य - (व्यंग्य) - महेश केशरी

परिवारवाद की जगह अब वंशवाद ने ले ली। जब सीटें सिमटने लगीं। तो नई बड़ी पार्टी ने मुख्यमंत्री जी को राज्यसभा भेजना ही ठीक समझा। वैसे साठ के बाद आदमी सठियाने लगता है। उनकी हरकतें भी कुछ ऐसी थी कि आलाकमान को ऐसा फैसला लेना पड़ा। इधर मुख्यमंत्रीजी बीच- बीच में कुछ उल्टा सीधा बक जाते थे। और गठबंधन के लोगों को बीच -बीच में आकर सफाई देनी पड़ती थी। खैर जब लड़का मुख्यमंत्री ना बन सका तो सांत्वना पुरस्कार के तौर पर उसको स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया।

उनके पिताजी हमेशा कहते हुए अघाते ना थे कि हमारे यहाँ जो विपक्ष है। उसके यहाँ परिवारवाद है। उनके यहाँ के लोग ही सत्ता चलाते हैं। ये भी सही है कि उनके नाम के आगे -कोई दाग नहीं था। लिहाजा उन्होंने जमकर विकास किया। इतना विकास किया कि वे विकास पुरूष कहलाए। कालांतर में उनकी राज चलाने की रणनीति और व्यहवार कुशलता के कारण उनको गठबंधन सरकार से इनाम मिला। और वे मुख्यमंत्री से सीधे राज्यसभा पहुँच गए। मुख्यमंत्री ने सचमुच में राज्य का बेहतरीन विकास किया था। राज्य की सड़कें मीलों बनीं। लँबी -चौड़ी और साफ सड़कें। क्राईम का घटता ग्राफ। मुख्यमंत्री जी ने सड़कें तो साफ - सुथरा बनवा दीं और क्राईम फ्री राज्य भी बनवा दिया। लेकिन अपना विकास करना भूल गए। जहाँ हमारे यहाँ के नेता नरेटी तक जनता को भकोस जाते हैं। उनका आचरण ऐसा नहीं था। उनकी ईमानदारी का सबूत देने के लिए यहाँ ये बात बताना लाजिमी है कि भ्रष्टाचार के पैसों से बच्चों के लिए कभी घर में कुछ खरीद कर नहीं ले गए। इतिहास में अगर सबसे विकास पुरूष नेता को याद किया जाएगा। तो श्रीमान् मुख्यमंत्री जी थे। चाहे कारण जो भी रहा हो । उनका बेटा शारीरिक रूप से कमजोर पैदा हुआ है ।

आप किसी राजनेता को उठाकर देख लीजिए। सत्तर, अस्सी से लेकर सौ सवा सौ किलो से कम नहीं होगा। छोड़िए बेकार की बातों को। सीधे मुद्दे पर आते हैं। जिस राज्य में लोग भूख से मर जाते हैं। वहाँ का स्वास्थ्यमंत्री बनना कोई बड़ी बात तो नहीं थी। लेकिन साँत्वना पुरस्कार तो साँत्वना पुरस्कार होता है।

तो जो नेताजी पहले मुख्यमंत्री थे। उनके लड़के को सीधे मुख्यमंत्री तो नहीं बनाया जाता था। लिहाजा उनको साँत्वना पुरस्कार के तौर पर स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था।

इस तरह से उनका बेटा आखिर था तो राजनेता। परिवार वाद ना सही लेकिन वंशवाद से कौन बच सका है। राजनीति में दोहरे मानदंड का होना कोई अपराध थोड़े है। तभी तो राजा का बेटा राजा बनता है।

इसलिए सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया। और बिना किसी औपचारिक चुनाव के बेटे को दल का नेता चुन लिया गया। उनके लिए अभी फिलहाल पाँच साल तक चुनाव को लेकर कोई खतरा नहीं है। आराम से पार्टी को गाईडलाईन दीजिये।

और इस तरह से एक नई व्यवस्था या पारीपाटी की शुरुआत हुई। परिवारवाद की जगह अब वंशवाद ने ले ली है ।सुना है नेताजी स्वास्थ्य मंत्री बने हैं। लेकिन वो जिस तरह से लुंजपुंज हैं। जिस तरह से सींकियाँ पहलवान हैं। उससे राज्य के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। स्वास्थ्य मंत्री जैसे भारी भरकम शब्द के लिए किसी भारी आदमी का स्वास्थ्य मंत्री बनाना चाहिए था ।

और उनके साथ खेला हो गया - (व्यंग्य) - महेश केशरी

उस फूल ने तो उसी समय हथियार डाल दिया था। जब आज से पाँच साल पहले व्हील चेयर पर ला दिया था। पैरों पर प्लास्टर चढ़ने का मतलब था। राजनीति पर प्लास्टर चढ़ना।

इस बार एक फूल ने दूसरे फूल की पाँच साल पुरानी हसरत पूरी कर दी है। फूल को आरामकुर्सी पर ला दिया है।मँचपर व्हील चेयर दिखाई देता है। एक महिला व्हील चेयर पर आती है। मँच पर अभी अँधेरा है। मँच पर हल्की रौशनी । एक महिला दिखाई देती है। जो व्हील चेयर पर नेपथ्य से चलकर आती है। पँद्रह मिनट तक मँच पर रहती है। और फिर वापस नेपथ्य में चली जाती है। अब मँच पर अँधेरा है।

इधर मँच पर दूसरी तरफ फूल दिखाई देता है। फूल ने फूल को सचमुच का व्हील चेयर पर ला दिया है। माँगी हुई मुरादें खाली नहीं जाती।जो हम दुआओं में माँगते हैं। वो हमें जरूर मिलता है। राजनीति में दुआएँ हर पाँच साल में कुबूल होतीं हैं।

एक फूल नारी सशक्तिकरण की बात करत है। इस फूल का नारीसशक्तिकरण की बात करना सेलेक्टिव है। अव्वल तो जो इनके यहाँ की नारियाँ है। उनका ही सशक्तिकरण नहीं हो पाया है। चले हैं देश की नारियों का सशक्तिकरण करने। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में खासकर आजादी के बाद एक नारी ने इतने बड़े फूल से पंगा ले लिया है। आश्चर्य की बात नहीं कि ये फूल लोगों को फूल ही बना रहा है । नारियों के लिए दाँव -पेंच खेलता है। सेलेक्टिव मुद्दे सेलेक्टिव चुनाव। यही है इस फूल की पहचान।

फूल का कमाल ऐसा है कि फूल ने फूल को पटखनी दी है। इस बार फूल ने फुटबॉल की हवा निकाल दी है। हवाई चप्पल की सादगी भी काम नहीं आई है। हवाई चप्पल घिस गई थी। और इस बार बिना मौसम की बारिश में हवाई चप्पल पहना फूल मुँह के बल औंधा गिरा है। खैर, राजनीति में उठना- गिरना तो लगा ही रहता है। खैर , चुनाव आयोग के बाद सबसे ज्यादा हलकान परेशान रहने वाली सी. बी. आई. और ई. डी. को थोड़ा आराम मिलेगा। लेकिन इसकी भी गुंजाईश अभी कम ही है। पंजाब में मसखरे को भी अँदर करना है। चार्जशीट के बहाने से। या कोई नई पुरानी फाईल खुलवाकर जाँच जाँच शुरू करवा देनी है। मसखरे को भी बड़े घर की सैर करवा ही देना है।

इस बार फूल और फूल ही लड़े थे। जिस तरह फूल का परचम लहरा रहा है। वो दिन दूर नहीं जब की श्रीलंका की पार्टी का कोई लड़े तो . तो हमारे यहाँ से वहाँ भी प्रत्याशी भेज दिया जाएगा । ये कहकर की फूल को इसलिए वोट दें क्योंकि हम लोग फिलीस्तिनियों को खदेड़ देंगें। कहाँ फिलीस्तीन और कहाँ श्रीलंका। खैर , नई -नई समस्या दिखाकर आपका हमारा वोट ऐसे ही लिया जाएगा। ये वोट लेने की कला है।

जो समस्या है नहीं। वैसी समस्या दिखाई और बताई जा रही है। कौआ कान ले गया। लोग कौआ देखने मे लगे हैं। कान को कोई टटोल ही नहीं रहा है। वैसे भी एन. आर . सी. करके दूसरे देशों का सिर दर्द फूल अपने सिर पर लेने को तैयार है। भाई लेने को तैयार नहीं है। ब्लकि ये हमारे गले पर मढ़ देगी। घी , धूप जजमान का। पंड़ित जी को खाली स्वाहा बोलना है। रायता फैला देना है। साफ हमारी जनता करेगी। भाई -भाई की मदद करने को तैयार नहीं है। प्रापर्टी विवाद में भाई -भाई का , बेटा, बाप को निपटाने में लगा है। और आप एन . आर . सी. की बात करते हैं। अपना घर सँभल नहीं रहा है। चले हैं पड़ोस की पंचैती करने। खैर प्रतिष्ठा में लोग प्राण गवाँ देते है़ं। यहाँ तो महज सिर छुपाने की जगह दी जा रही है। कुछ वैसी ही हालत अभी देश में है। डेढ़ -सौ करोड़ की आबादी को चीजें मयस्सर नहीं हैं। अस्पताल, स्कूल, एम्स , पर बात नहीं हो रही है। ईरान अमेरीका युद्व पर लोग कान दे रहें हैं।

इस फूल के जीत पर जनता फूले नहीं समा रही है। चाहे फूल लड़े या फूल। हर हाल में जनता ही फूल बनेगी । वैसे तो हमारी जनता आजादी के समय से फूल बन रही है। कोई न ई बात नहीं है।

पिछले बार व्हील चेयर ने फूल को पटखनी दी थी। पैरों में लगा प्लास्टर काम में आया था। लेकिन लगता है वो इस बार पैर तुड़वाना भूल गईं। इसलिए जनता की सहानुभूति नहीं बटोर सकीं। अरे पैरों हाथों पर प्लास्टर ना भी चढ़ा होता। लेकिन म़ँच पर कम- से -कम व्हील चेयर पर आना था।

बाप बनकर देखिए - (व्यंग्य) - महेश केशरी

आपको लगता है कि दुनिया का सिर्फ एक बाप परेशान है। आप गलतफहमी में जी रहें हैं। नहीं साहब जब से ये मोबाइल आया है। हम बापों की टेंशन कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। उम्र-दराज होने को हैं। दहाई का आंकड़ा छू लिया है। पचास के आसपास पहुँचने वाले हैं। लेकिन इस उम्र के लोगों को दम मारने की फुर्सत नहीं है। सुबह से शाम तक हलकान रहते हैं। रही सही कसर बच्चों ने पूरी कर दी है। भाई साहब की डिमाँड पूरी होती ही नहीं है। भाई साहब को घड़ी चाहिए थी। मैनें कहा भाई कोई सौ - दो - पाँच सौ रूपये की घड़ी खरीद लो। टाईम देखने से मतलब है। सौ रूपये की घड़ी भी उतना ही समय बताएगी। जितना पाँच सौ रूपये की या दस हजार की घड़ी बताएगी। घड़ी तो घड़ी है। घड़ी चाहे कितने रूपये की हो। घड़ी से समय देखने का ही काम लिया जा सकता है। सौ की नहीं लोगे तो पाँच सौ रुपये की ले लो। एक हजार रूपये की घड़ी ले लो। साहब महीने भर मुँह फुलाए रहे। लेकिन बीच बीच में मुँह खोलते भी थे। एडी चोटी का जोर लगाए हुए थे। चार- बार दुकानदार के पास गया। बहुत सी घडियाँ देख लीं।चैन वाली, बेल्ट वाली, वाटर प्रूफ। लेकिन‌ भाई साहब को कोई घड़ी पसँद नही आई।

उनको स्मार्ट वॉच चाहिए था। स्मार्ट वॉच पहनने के लिए आदमी को स्मार्ट होना होता है। कुछ कमाना -धमाना भी पड़ता है। बाप को कुछ रिलीफ भी देना होता है। जो स्मार्ट होता है रील्स देखकर समय नही जाया करता है। बल्कि समय का सदुपयोग करता है। क्षण -क्षण को बचाता है। " जो काल -करै सो आज कर" की उक्ति पर काम करता है। अब वॉच करने के लिए वैसी दृष्टि आपके पास तो है नहीं। दृष्टि होती तो सत्रह सौ की घड़ी ना खरीदते। ना तो आपके पास समय देखने का समय है। ना ही वैसी दृष्टि है। समय देखने से ज्यादा है। समय को देखना। जो समय को पहचान लेता है। उसको समय को देखने की जरूरत नहीं पड़ती है। जो मितव्ययी होता है। समय उसकी ही कद्र करता है। खर्चीले लोग हमेशा दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं। लिहाजा बुरे वक्त के लिए भी कुछ बचाकर रखना जरूरी होता है। लेकिन भाई साहब को महीन- से -महीन बात भी मोटी और बकवास लग रही थी। उनके सिर पर घड़ी का भूत सवार था। उनको हर हाल में स्मार्ट वॉच चाहिए था। चौदह -पँद्रह साल की उम्र में लोग शहंशाह बन जाते थे। बाहर से आक्रमण करके राजा बन जाते थे। कहने का तात्पर्य ये है कि राजा बनकर अपनी और अपने लोगों की दूसरों पर निर्भरता खत्म कर देते थे।

समय को पहचान ले ऐसी दृष्टि आजकल के युवाओं के पास कहाँ है। पैसे तो आपके लगने नहीं हैं, अपनी जेब से । जाना है बाप के पैकेट से। गरीबी में आटा गीला होना। इस कहावत का अभिप्राय उस दिन मुझे समझ में आया था। जब बीच का महीना चल रहा हो। हाथ तँग हो। किसी तरह दोस्तों से कर्ज लेकर काम चलाया।

लेकिन भाई साहब के पास तो भरपूर समय है। रील्स देखिए, गेम्स खेलिए। सही मायने में जिसको समय की कीमत पता हो उसके लिए ही घड़ी होनी चाहिए। जो समय से काम करता हो। एक रूपया में दस पैसा भी समय का महत्व समझता हो। जो समय का सेकेंड- सेकेंड बचाता हो। उनके लिए घड़ी की जरूरत है। जिनके लिए समय सोने से भी मँहगा है। उनके लिए नहीं जिनको सोने से फुरसत नहीं है। उनको घड़ी की भला क्या जरूरत है। सोने से मँहगे समय की जिसको कद्र नहीं है। उसको घड़ी की जरूरत भी नहीं है। भाई साहब ने सुझाया की घड़ी का मतलब सिर्फ घड़ी नहीं है। ब्लकि आजकल घड़ी से ज्यादा घड़ी का इस्तेमाल ब्लू टूथ से मोबाइल कनेक्ट करने के कारण घड़ी का महत्व बढ़ गया है। कुछ वैसे ही जैसे ग्रेजुएशन अब तीन की जगह चार साल का हो गया है। और इस लँबे सत्र के लोग फायदे गिना रहें हैं। मैनें भाई साहब से पूछा ब्लू टूथ से मोबाइल कनेक्ट करके क्या होना है। भाई साहब ने बताया उससे कॉल रिसीव करने के लिए मोबाइल को छूना नहीं पड़ेगा। केवल ब्लू टूथ से कनेक्ट करके घड़ी से ही बात किया जा सकता है। भाई साहब से मैनें पूछा। जब मोबाइल छूना ही नहीं है। तो फिर मोबाइल लिया ही क्यों। भाई साहब ने समझाया। मोबाइल, मोबाइल है। और घड़ी , घड़ी है।

मोबाइल साध्य है। घड़ी साधन है ।जैसे हम सीधे ईश्वर से कनेक्ट नहीं हो सकते। उसके लिए किसी बिचौलिए की जरूरत होती है। ठीक वैसे , जैसे भगवान् के ऐजेंट चर्च, मंदिर, मस्जिद में होते हैं। वैसे ही स्मार्ट वॉच ऐजेंट की तरह है। जो मोबाइल जैसे भगवान् से हमें सीधे कनेक्ट करवाता है।

जैसे नाव में पतवार की जरूरत होती है। जैसे पतवार के बिना हम नदी रूपी वैतरणी पार नहीं कर सकते। वैसे ही स्मार्ट वॉच के बिना हम मोबाइल से कनेक्ट नहीं हो सकते। एक तरह से मोबाइल आत्मा है। और घड़ी शरीर। वैसे ही मोबाइल के साथ घड़ी है। घड़ी देखकर जैसे टाईम पास नहीं किया जा सकता है। लेकिन मोबाइल देखकर अच्छे- से- अच्छे और खराब -से -खराब समय पास किया जा सकता है।

लेकिन लगता है इस जन्म में इस शरीर को आराम मिलने से रहा। कारण है कि दुनिया मे जितने भी बाप है। सब- के- सब उम्मीद पाले हुए हैं कि उनकी संतान कुछ करे। इस इंटरनेट के गड्ढे़ में भाई साहब भी डूबे हुए हैं। सुबह स्कूल जाते समय रील्स देखते हैं। स्कूल से आते ही शर्ट- पैंट- टाई फेंक देते हैं। बस्ता फेकों और रील्स पर नजरें गड़ाओ।

उनका जो कुछ भी ज्ञान है। वो रील्स अर्जित ज्ञान है। एक बाप की हसरत क्या होती है। उसका बच्चा पढ़े -लिखे। बाप को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति दे। लेकिन ज्यों- ज्यों आपकी उम्र बढ़ती जाती है। जिम्मेदारियों के चलते तनाव बढ़ता जाता है। जवानी के समय में बूढ़ापे की फीलिंग आती है। भाई साहब का पढ़ाई- लिखाई से लगाव खत्म होता जा रहा है। भाई मत बन आई. ए. एस. , मत बन डॉक्टर , मत बन इंजीनियर। टेक्स्ट की किताबों से तो जी ना चुरा।

अरे भाई नीट , यू.पी.एस.सी . , जे.पी.एस.सी , पी.सी.एस.की तैयारी छोड़ दो। उसके लिए पढ़ना पड़ता है। रील्स देखकर नीट नहीं निकलता है। बात यहीं खत्म नहीं हुई थी । स्मार्ट वॉच महीने भर भी ना पहना भाई साहब ने । स्मार्ट वॉच कहीं फेंका हुआ है टेबल पर किनारे। भाई साहब ननिहाल से लौटे हैं। हाथ में घड़ी ना देखी तो पूछा। भाई साहब आपकी घड़ी नहीं दिख रही है। स्मार्ट वॉच। भाई साहब से तो नहीं लेकिन श्रीमती जी से अदभुत जानकारी मिली कि भाई साहब ननिहाल से तो सकुशल लौट आए हैं। लेकिन स्मार्ट वॉच का चार्जर और केबल वहीं छोड़ आए हैं। भाई साहब बुद्धि के बलिहारी हैं। भाई साहब को भूलने की बेहतरीन बीमारी है। भाई साहब के कारण नया एडप्टर और केबल लेकर आना पड़ा। सत्रस सौ की घड़ी खरीदने के बाद तीन सौ का केबल का चूना भी लगा। साल भर बाद कि कहानी बता रहा हूँ। कहाँ केबल और अब कहाँ एडप्टर। स्मार्ट वॉच की बात ही मत पूछिए। चीजों को खरीदना है। चीजों की इज्जत इनके पास नहीं है। अभी साल भर ना बीता था कि भाई साहब को साईकिल खरीदने का खब्त सवार हो गया। भाई साहब को पढ़ना- लिखना तो है नहीं। कुछ -ना- कुछ तीन- पाँच सूझता रहता है। बैठल बनिया का करे। इस कोठी का धान उस कोठी। रोज सुबह शाम के तगादे पर आखिर एक दिन साईकिल खरीदनी पड़ी। दो- चार महीने ठीक चलाया। अब साईकिल में गियर लगवाने की कह रहें हैं, भाई साहब । अब साईकिल तक तो बात ठीक थी। वर्जिश हो जाती थी। लेकिन इधर भाई साहब को साईकिल खींचने में ताकत लगती है। भाई साहब पिज्जा खाकर काम चलाते हैं। उनको नहीं पता पिज्जा खाकर साईकिल नहीं चला सकते। लिहाजा गियर लगवाने की कह रहें हैं। भाई साहब के प्रिय खाने की चीजों में पिज्जा , समोसा और मैगी है। अब उनको कौन बताए कि ये सब खाने की चीजें नहीं हैं। खाने वाली,पीने वाली चीजों से उनका मन भागता है।.दूध पीना नहीं चाहते।. लस्सी देखकर उल्टी आती है। खीरा -तरबूज से परहेज है। भींगे चने देखकर ऊबकाई आने लगती है। अमरूद देखते हि गश खाने लगते हैं। तो भाई साहब चावल , दाल, दूध ,फल सब्जियाँ जब तक ना खाएँगें। तब तक आपको साईकिल में गियर की जरुरत पड़ेगी। और मैं साईकिल में गियर लगवाने से रहा!

फटे कच्छों की कहानी - (व्यंग्य) - महेश केशरी

पता नहीं फटेहाली खासकर पुरूषों के लिए कोई समस्या है या नहीं । पता नहीं पुरूषों ने अपने फटे कच्छे को लेकर कोई राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय आँदोलन किया है या नहीं। खैर मुझे जहाँ तक जान पड़ता है। ऐसा कोई आँदोलन कभी भूतकाल में नहीं हुआ है। ना ही कभी होने की संभावना है। सरकारों ने भी पुरूषों की इस राष्ट्रीय समस्या पर कभी ध्यान नहीं दिया है। लेकिन जब- जब मैं पुरूषों के फटे कच्छों पर नजर डालता हूँ। मुझे फटे कच्छों की समस्या एक राष्ट्रीय समस्या के तौर पर दिखाई देती है। जब - जब दीवारों पर या अलगनियों पर टँगे फटे कच्छे देखता हूँ तो सोचता हूँ कि आदमी में शर्म जैसी कोई चीज होती है नहीं। पुरूषों में शर्म जैसी कोई चीज अगर होती तो फटे हुए जालीदार कच्छे सावर्जनिक जगहों पर इधर -उधर हमें दिखाई नहीं दे रहे होते। ना चाहते हुए भी फटे और जालीदार कच्छे यहाँ वहाँ दिखाई दे जाते हैं। इस फटेहाली को बताने में या दिखाने में घर की महिलाओं की अहम भूमिका होती है। पता नहीं फेमनिज्म या नारी आँदोलनों की तरह पुरूषों को भी फटे कच्छे अब हम नहीं पहनेंगें। इस तरह की तख्तियाँ को लेकर उनको भी परेड कर देना चाहिए। ताकि लोगों को पता चल सके कि पुरूषों की राष्ट्रीय समस्या ये फटे कच्छे हैं।

भारतीय समाज में फटे कच्छे उत्सुकता और शोध का विषय हैं। अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों को इस विषय पर शोध करना चाहिए। पुरूषों से पूछा जाना चाहिए कि क्या पुरूषों को कभी फटे कच्छों को बदलने का मन करता है या वे फटे कच्छे शौक से पहनते हैं । हमारे देश के अलावा और किन- किन देशों में फटे हुए कच्छों के पहनने का रिवाज है।

संभावनाओ पर बात हो रही है। तो ये भी बात होनी चाहिए कि फटे कच्छे जब धुलते होंगें तो पत्नियाँ जिस तरह अपनी और जरूरतों को लेकर पति से बात करती हैं । क्या कच्छों को लेकर भी बार -बार अपने अपने पतियों से पूछती होंगीं । क्या आदमी के फटे कच्छे को देखकर ये भी कहती होगी कि कल बाजार जाना तो बाजार से अपने लिए दो मजबूत और टिकाऊ कच्छे खरीद कर ले आना।

पता नहीं आदमी की शर्म उस समय कहाँ चली जाती है। जब वो बात -बे -बात नाक कटने की बात कहता है। लेकिन फटे कच्छे पहनते हुए उसकी नाक नहीं कटती। फटे कच्छे हमारे यहाँ अमेरीकी लाल , नीले झँडे की तरह शान से लहरा रहे होते हैँ। और छेदों के बीच से अमेरीकी राष्ट्रपति ट्रँप का चेहरा टैरिफ जड़ते दिखाई दे रहा होता है।

राजनीति में झाड़ू - (व्यंग्य) - महेश केशरी

सफाई की बात निकली है तो झाड़ू की बात करनी होगी । ये वही झाड़ू है। जिसका कभी स्वर्ण युग का समय था। लोग इसके आजू-बाजू डोलते थे। आज झाड़ू बेकार में ही गिरी पड़ी है। जिनको ताकत का गुमान है। और जो कभी राजनीति के चंद्रगुप्त थे। वो अब खाक छान रहें हैं। उस देश में जहाँ हमाम में सब नँगें हों। वहाँ झाड़ू और साफ -सफाई की बातें कोरी बकवास ही लगती हैं। या हम सफाई की बात को परीलोक की कहानी मान लेते हैं। भ्रष्टाचार में हम नहीं डूबे हैं। बल्कि भ्रष्टाचार हममें डूबा है। लिहाजा सफाई की बात बेमानी है। साफ केवल नेताओ के कपड़े हैं। बाकी सब सब्जबाग है। मीरिचिका है। सफाई सिर्फ तिलस्म है। इसके अलावे और कुछ नहीं। तिलस्म स्थायी नहीं होता है। देश कभी साफ होगा। ये केवल दिवास्वप्न है। लेकिन इधर झाड़ू से उम्मीद बँधी थी। सबको मालूम है कि बिना झाड़ू के सफाई नहीं हो सकती। लिहाजा झाड़ू जरूरी थी।

लेकिन झाड़ू के दिन अभी खराब चल रहें हैं। लिहाजा क्रिकेट की भाषा में अगर हम कहें तो झाड़ू अभी बैकफुट पर भी नहीं खेल रही है । लिहाजा वो अभी रजनीति की पिच से बाहर हो गई है। यही हाल हाथ का है। डेढ़ दशक पहले इसी झाड़ू ने हाथ को ठेलकर राजनीति के पिच से बाहर धकेल दिया था। वही झाड़ू अब अपने दिन गिन रही है। मुफ्त की बस और सस्ती शराब भी झाड़ू को नहीं बचा पाई । एक समय था कि झाड़ू को लोग हाथ से पकड़कर चलाते थे। झाड़ू से लोगों को प्रेम था। लेकिन जनता का मूड कपूर की तरह होता है। धीरे- धीरे उड़ जाता है। कभी झाड़ू को चलाने के लिए हाथ का होना जरूरी था। हाथ अभी खुद बैशाखियों पर चल रही है। इधर झाड़ू किसी को रास नहीं आ रही है। पहले जनता ने और अब सांसदों- विधायकों ने झाड़ू को लताड़ दिया है । सुराख वाली नाव में बैठना कहाँ की अक्लमंदी है। लिहाजा सब लोग भाग रहें है़ं। नाव से कूदकर। वैसे भी सबके बस की बात नहीं है कि वो अकेले ही सफाई कर दे। वो भी तब जब सौ में पिच्यानवे बेईमान हैं हमारे देश में। राजनीति में झाड़ू को लोग पसँद नहीं करते। लोगों का मूड बदल गया है। राजनीति करने वाले लोग झाड़ू का नहीं बल्कि पाईपों का इस्तेमाल करते हैं। झाड़ू ने जिस तरह से सफाई करी थी। और एक साफ -सुथरा माहौल बनाया था। लोगों को दो सौ यूनिट फ्री की बिजली, फ्री की पानी , फ्री की स्वास्थ्य सुविधाएँ। बच्चों के लिए जिस तरह से वर्ल्ड क्लास स्कूल बनवाये थे। लोगों को रास नहीं आया। कहा जाता है कि जैसे मुफ्त के खाने में लोगों को स्वाद नहीं मिलता है। जो चीज सहज ही उपलब्ध हो उसकी लोग कीमत नहीं समझते । जैसे कुत्ते को घी हजम नहीं होती। वैसे ही मुफ्त की योजनाओं से लोगों ने कन्नी काट ली है।

होना कुछ नहीं है। वैसे लोग जो दूध की वैन पलटने पर दूध लूटने लग जाते हैं। तेल का टैंकर पलट जाए तो गैलन लाने घर की तरफ दौड़ पड़ते हैं। वैसे लोग आपको भ्रष्टाचार पर बात करते हुए किसी चाय की दुकान पर मिल जाएँगे!

क्यों अट्ठारह घँटे काम करतें हैं - (व्यंग्य) - महेश केशरी

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि लोग क्यों अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम कर रहे हैं। देश तो आलसियों से भरा पड़ा है।फाईलें जहाँ की तहाँ अटकी पड़ीं हैं। जब तक फाईलों पर दक्षिणा ना धरो काम है कि आगे ही नहीं बढ़ता है। तब इस लोकतंत्र में अट्ठारह- अट्ठारह घँटे काम करना कोरी बेवकूफी ही मानी जाएगी। लेकिन क्या कीजियेगा। अलग -अलग विचारों के लोगों से हमारा ये देश भरा पड़ा है। अधिकारी जबकि उनको भी आराम की जरूरत होती होगी। सुना नहीं है कि मशीन भी दस- बारह घँटे काम करने के बाद गर्म हो जाती है। लिहाजा उसको भी रेस्ट चाहिए होता है। लेकिन जब आप आदमी होकर अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम कर रहें हैं।तो दाँतों- तले ऊँगलियाँ दबाने का मन करता है। उनकी अच्छाईयों से जलन होता है। लेकिन इस बात पर मैंनें बहुत विचार किया। इतना विचार मैंनें पहले किसी बात पर नहीं किया था। जितना विचार इस बात पर किया। खैर मेरी पत्नी ने जब ये कहा कि मैं दस बजे सोकर क्यों उठता हूंँ। तो मुझे भी लगा कि ये उसका ठीक -ठाक प्रश्न है कि मैं दस बजे सोकर क्यों उठता हूंँ। मैंनें विचार किया कि वैसे लोग जिनको जीवण में कुछ नहीं करना होता है। ऐसे लोग ही सुबह दस बजे सोकर उठते हैं। पत्नी बोली कि मैं तो सुबह पाँच बजे भोर में ही उठ जाती हूँ। और सारा - सारा दिन काम करती रहती हूँ। और आप हैं कि रात को बारह बजे सोते हैं। और सुबह दस बजे उठते हैं। ऐसे लोग जीवण में कुछ नहीं करते जो दिन में दस बजे तक सोते रहते हैं। ये सच है कि मैं दिन में दस बजे तक और कभी -कभी ग्यारह बजे तक भी सोता रहता हूँ। पत्नी की तरह पिता ने भी आज से बीस साल पहले मुझसे यही बात कही थी, कि जो आदमी दस बजे तक सोता रहेगा वो जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा। यही हाल मेरे छोटे भाई का भी था। वो जब -तब ताने मारता रहता था कि दिन में दस -दस बजे तक सोते रहते हैं। आपसे तो कुछ नहीं हो पाएगा। एक चीज जो मैं नोटिस कर रहा था। सबको मेरे आराम यानि सोने से परेशानी है। बकौल पत्नी, पिता और छोटे भाई के अनुसार मेरा कुछ नहीं होना था। क्योंकि मैं दस बजे तक सोता रहता था । खैर, मैं ये मान चुका था कि दस- ग्यारह बजे तक सोने वाले लोगों की तरह मेरी भी कभी तरक्की नहीं होगी। मैं आज भी अपने आपको उस हद तक तरक्की की चोटी पर खड़ा नहीं देख पाता हूंँ। जैसा कि और लोग अपने को तरक्की की चोटी पर देख पाते हैं। मैंनें इस विषय को शोध के रूप में ले लिया। और शोध करने लगा कि भाई आखिर ऐसी कौन सी घुट्टी है जिसको पीकर लोग अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम करतें हैं। तो मैंनें देखा कि वैसे लोग जो घर परिवार के बँधनों से मुक्त हैं। जिनको आटा- दाल नहीं खरीदना पड़ता। वैसे लोग अट्ठारह - अट्ठारह घँटे काम करते हैं। आम आदमी तो घर परिवार से परेशान है। क्या काम करेगा अट्ठारह- अट्ठारह घँटे।

वैसे लोग अट्ठारह अट्ठारह घँटे काम करते हैं। इसके लिए घर -द्वार को छोड़ना पड़ता है। शोध की ये बात मैंनें पत्नी को बताई की अट्ठारह- अट्ठारह घँटे कोई मजदूर ही काम कर सकता है। या कोई देश के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति ही कर सकता है। इस तरह से अगर देखा जाए तो हर वो आदमी जो सुबह - सुबह तुम्हारी तरह पाँच बजे उठता है। उसका देश के सर्वोच्च पद पर जाना तय है। लेकिन इसमें एक दिक्कत है। दिक्कत ये है कि पाँच बजे जगने वाला मजदूर भी होता है। वो भी देश के सर्वोच्च पद पर बैठे आदमी की तरह अट्ठारह- अट्ठारह घँटे काम करता है। अट्ठारह- अट्ठारह घँटे कुछ लोग ही काम करते है़ं। और कुछ लोग बकैती करते हैं। तो वैसे लोग जो सुबह- सुबह पाँच बजे उठते हैं। तो ऐसे लोगों को भी आगामी आने वाले चुनावों में चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे लोगों में देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने की संभावना अधिक रहती है। बशर्ते उनको बकैती करनी आनी चाहिए। जिस तरह से तुम बकैती करती हो। निःसंदेह तुम देश के सर्वोच्च पद पर जाने के लायक हो। जहाँ सब लोग काम से भागे- भागे फिर रहें हैं । वहीं पत्नी जी का पाँच बजे सुबह उठना और अट्ठारह- अट्ठारह घँटे काम करना चकित करता था। फिर मुझे लगा कि जो लोग अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम करते होंगे। दरअसल वे लोग दूसरी मिट्टी के बने होंगें। उनकी मांशपेशियाँ लोहे की बनी होंगीं। हम लोग तो साधारण हाड- माँस के बने होते हैं। खैर , बात काम पर हो रही है। कोई -कोई तो अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम कर रहा है। ये काम वैसे लोग कर रहें हैं। जिनके ऊपर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन का दबाव नहीं है। हाल में पढ़ा कि जज साहब यानि ज्यूडिशियरी से जुड़े लोग भी केवल पाँच घँटे सोकर काम कर रहें हैं। इनकी इस रफ्तार को देखकर दिल गार्डन -गार्डन हुआ जाता है। जज साहब और कुछ खास लोग अट्ठारह -अट्ठारह घँटे काम रहें हैं। मामलों का निष्पादन कुछ इस तरह से कर रहें हैं कि आदमी जो जीते जी मुकदमा कर रहा है। वो मुकदमे की तारीखों को गिनते- गिनते स्वर्ग सिधार जा रहा है। खैर लोकतंत्र में ऐसी छोटी बातों के लिए जगह नहीं है । बीस -बीस, तीस- तीस साल में फैसले आ रहें हैं। यही गनीमत है। खैर जब इतनी तेजी से और मन लगाकर हमारा ज्यूडिशरी सिस्टम काम कर रहा है तो क्या कहने। खैर एक तरफ लोग फैक्ट्रियों में बारह- बारह घँटे बाल -बच्चों का मुँह देखकर अपना अट्ठारह -अट्ठारह घँटा झोंक दे रहें हैं। ताकि कुछ एक्स्ट्रा कमाई हो जाए। लेकिन बैंक कर्मचारियों को महीने के तीस दिनों में चार सँडे, दो सेकेंड सटरडे, पाँच से दस दिन व्रत -त्योहार के लिए चाहिए। कुल पँद्रह दिनों के काम करने के बाद मोटा -मोटा वेतन मिलता है। तिसपर उनको महीने के बचे दो शनिवार को भी छुट्टी चाहिए। भाई एक बात बताओ। जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठे लोग , ज्यूडिशयरी के लोग अट्ठारह - अट्ठारह घँटे काम करते हैं। जब ऐसे देश के हमारे कर्णाधार नहीं थक रहें है़ं। तो तुम क्यों थक जा रहे हो। क्यों चाहिए तुमको सप्ताह के दो अतिरिक्त छुट्टियाँ । इन सरकारी बाबूओं ने देश का बेड़ा गर्क कर रखा है। आपको देखकर ही मोबाइल कँपनियाँ अब छब्बीस दिन का महीना बना रहीं हैं। फिर मत कहना यार मँहगाई बहुत बढ़ गई है। डेटा मँहगा हो रहा है । खैर , गृहस्थी का रोग अलग है। वहाँ काम को लेकर ही घर में बर्तन पीटा जा रहा है। बड़की एतना कम काम करेगी और छोटकी इतना ज्यादा। नहीं ये नहीं होगा। एक ही घर में अलग -अलग कानून नहीं चलेगा। हटाओ अलग -अलग करो चूल्हा। यही बात बैंक के बाबूओं और सरकारी बाबूओं पर लागू होती है। इन सरकारी बाबूओं की तरह प्राईवेट में दस -बारह हजार कमाने वाले लड़कों की भी आदत खराब होती जा रही है। लड़के एक- दूसरे को ताक रहें हैं। पोंछा कौन मार रहा है। कौन कितने बार झाड़ू लगता है। कौन कितनी बार पेशाब करने जा रहा है। दिलचस्प है। कौन खाना खाने जाता है तो कितने घँटा समय लेता है। कौन खाना खाते समय मोबाइल देख रहा था। कौन खाना खाने जाने में कितना समय लेता है। किसको बार- बार टट्टी लगती है। किसको बार -बार पेशाब आता है। कौन बार- बार चाय पीने जाता है। कौन बार -बार गुटखा खाने के बहाने बाहर निकलता है और देर तक घूमता रहता है। हर कोई मालिक का खासमखास बना रहना चाहता है। कौन सुबह लेट से आता है। कौन सबसे पहले आता है। कौन दुकान में आकर कोना पकड़ लेता है। कौन दुकान में आकर अखबार पढ़ता है। कौन मोबाइल में दिनभर सिर गाड़े रहता है। सब एक- दूसरे की रिपोर्ट करने में माहिर हैं। सब कोई विभीषण बनने की फिराक में है। मन से विभीषण लेकिन कर्म से सब -के -सब रावण। सब एक- दूसरे की निंदा करने में सुख पाते हैं। निंदा के सुख के क्या कहने। लोगों को एक तरफ चुगली करने का और दूसरी तरफ स्वर्ग जाने का अवसर मिले तो मेरा दावा है कि लोग ऑप्सन " अ " माने चुगली को चुनेंगें। पति घर में घुसा नहीं की बीबी ने पति के कान भरना शुरु कर दिए। दिनभर का कसर निकाल दिया। एक बात को चार बार नमक- मिर्च लगाकर सुनाया। ताकि पति जल्दी से घरवालों से अलग हो जाए। दो प्राणी का गिलास -चम्मच , धोने में कितना समय लगता है। अलग बनाएँगें, अलग ही खाएँगें। कौन इस भीषण गर्मी में मरता है। मन हुआ बनाया। बनाया- बनाया ना भी बनाया। होटल से मँगवा लिया। खाली एतना नहीं है। साथ में रहने से दस आदमी का आटा सानना होगा। गर्मी में हालत खराब हो जाती है। फिर उनके कपड़े -लत्ते धोना। दस लोगों के बर्तन माँजना। सुबह से शाम तो इसी में निकल जाता है। आखिर लोग दूसरों के लिए अपनी जवानी क्यों खराब करें । दूसरों के पाले हुए बेटे पर अपना हक जमाने में छह महीने भी नहीं लगते हैं। और यहाँ लोग अट्ठारह- अट्ठारह घँटे काम कर रहें हैं।

पति रिमांड पर है - (व्यंग्य) - महेश केशरी

उस दिन पति ने जब पत्नी का तमतमाया चेहरा देखा तो लगा आज कुछ बुरा होने वाला है। पति ने दुहराया हनुमान चालीसा। आने लगी पति को अपने इष्ट देवों की याद। जब पत्नी ने झाड़ू उठाई। तो पति को याद आने लगे यमराज।

पति का दिल धड़कने लगा। पति सोचने लगा कि लगता है आज घर की जगह उसकी सफाई होने वाली है। लगता है कोई पुरानी फाईल खुलने वाली है। इस बार पत्नी रिमांड पर लेने वाली है। पत्नी जब रिमांड पर लेती है तो सुप्रीम कोर्ट भी जाता है हिल। पता नहीं कौन सा पुराना झगड़ा निकाल ले। लगता है पत्नी को कोई सालों पुरानी बात याद आई है। पति सोचने लगा। याद करने लगा अपने काले कारनामों की। जो कुछ बची- खुची यादशत थी वो जाने लगी थी । पत्नी का तमतमाया चेहरा देखकर पति कोमा में जाने वाला था।

उसने सोचा क्या ठीक रहेगा। लपेट लूँ चादर या ओढ़ लूँ रजाई। मार कुछ कम लगे सोचूँ कोई उपाय।

अंदर पहनी है एक पतली सी बनियान। उस पर डाल रखा है पुराना घिसा हुआ थरमल। उसके ऊपर पहनी है पतली सी टी- शर्ट। उसके ऊपर पहना है एक काला रंग का कोट। सौभाग्य शाली रहा तो नहीं लगेगी कोई चोट। भाग्यशाली हूँ कि पुरानी फाईल खुली है ठंढ़ में। अगर ये रहता गरमी का सीजन। तो हो जाता शरीर का गिंजन।

सबक ना याद करने पर गुरूजी डंडे से पिटते थे। लेकिन‌ सबक सीखाने के लिए पतियों की ठुकाई पत्नियाँ झाड़ू से करतीं हैं। लगता है कोई पुरानी प्रेमिका आज मेरी गैर मौजूदगी में मेरे घर आई थी। उसने कुछ कहा होगा ऊल-जलूल। कहीं कोई पुराना लव लेटर तो नहीं हाथ लग गया है । जो दिखाना चाहती है पत्नी अपनी हाथ की सफाई। आज किसी ना किसी गलती की तो सजा मिलने वाली है।

पति गया कोने मे दुबक। सोचने लगा कौन सा काला चिट्ठा मेरा इस इस कलमुँहीं के हाथ लगा है। जो सहला रही है झाड़ू। लगने वाली है क्लास। पति लगाने लगा बचने के उपाय।

हड़बड़ी में याद करने लगा कि आज कौन सा है दिन । लेकिन जब दिमाग हो शांत। तब ही तो याद आती है कोई बात। सोचा अगर आज सोमवार होगा तो कह दूँगा। हे प्रिये क्यों झाड़ू इस गंजले पर फेरती हो । इस तरह तुम्हारा सोमवारी का व्रत और उपवास बेकार चला जाएगा। अगर मंगल हुआ तो बच सकती है जान। कहूँगा कि हे प्रिये आज है मंगलवार । क्या तुम आज मेरा उतारोगी इस झाड़ू से बुखार। मैंनें तुम्हें पाने के लिए किया था उपवास। बुधवार हुआ तो कह दूँगा। आज बुध है। मेरे लिए ये दिन अशुद्ध है। अगर हुआ गलती से आज गुरूवार। तो कह दूँगा पत्नी से तुम ही हो मेरी गुरू हो। बाकी सब हैं गुरूघंटाल। अगर दिन हुआ शनिवार तो पकड़ा दूँगा मनी। कहूँगा हनी मिलेगा रोज मनी। टालो कल तक झाड़ू का प्रोग्राम। बात बिगड़ी और तो कह दूँगा मत करो घर में क्लेश । नहीं तो खत्म हो जाएगी ऐश। अगर होगा रविवार तो कह दूँगा पत्नी जी से लड़ने का प्रोगाम अगले वीकेंड तक टलता है।

झाड़ू में मिलावट का स्वागत कीजिए - (व्यंग्य) - महेश केशरी

पति ने बहुत दिनों बाद पत्नी से झाड़ू की बाबत पूछा। उस झाड़ू का क्या हुआ जो बाजार से मैं लाया था। वजन में तो वो बहुत भारी था। क्वालिटी बहुत बढ़िया थी। पत्नी हाथ नचाते हुए बोली। क्या खाक भला भारी था। दुकानदार ने तुम्हें ठगा था। झाड़ू में मिलावट थी। मिलावट पर मैं चौंका। कितना बड़ा इनका पेट है। चावल में मिलावट, दाल में मिलावट, यहाँ तक की मसालों में भी मिलावट। मैंनें कहा प्रिये आज तक सुना था मसाले और साग -सब्जी में मिलावट। लेकिन झाड़ू में मिलावट। मेरा दिमाग चकराया। पत्नी ने समझाया कि झाड़ू में जो पीछे का डंडा था। उसमें बालू भरा था । झाड़ू और उसमें भी मिलावट ! बात को मत घूमाओ सीधे -सीधे समझाओ। झाड़ू बहुत मँहगा था। बोलो झाड़ू में मिलावट की बात सही है। बोली डियर झाड़ू के डंडे में बालू भरा था। जिससे झाड़ू लगता था तुम्हारी तरह वजनी । पहले मैं भी चकराई। एक दिन डंडा गया गलती से खुल। देखा उसमें भरी थी बालू और धूल।

आँय यहाँ भी चल रहा है बालू का अवैध व्यापार। खैर जब दाल , चावल और मसालों में हो रही है मिलावट । ये गंभीर मसला है लेकिन इसपर किसी का ध्यान कहाँ फिसला है। झाड़ू में मिलावट कोई बहुत बड़ी समस्या तो नहीं है। पत्नी बोली झाड़ू में मिलावट बड़ी बात है। इससे भ्रष्टाचार को मिलता प्रश्रय है। लोगों की आदत जाती है बिगड़। हल्की चिप्स में हवा का घोटाला है। झाड़ू में बालू की मिलावट है। हल्के को भारी और भारी को हल्का बताना भी एक कला है। चिप्स के पैकेट में लोग भरते हवा हैं। हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और हैं।

पति ने समझाया। पुराने समय में वजन का महत्व था। जो लोग बोलते थे करते थे। लेकिन आज समाज में हल्कापन बढ़ा है। हल्के और छिछोरे लोग बढ़े हैं। लाईट ऑयल .लाईट नमक. लाईट खाना खाकर हल्के लोग पैदा हो रहें हैं । इस तरह अगर झाड़ू में बालू की मिलावट है। अनाज चावल, दाल, गेंहूँ में पत्थरों की मिलावट है। तो कुछ लोग हैं जो आज भी हमारे साथ हैं। उनका विश्वास मिलावट करने से नहीं उठा है।

इस स्थायी मिलावटपन पर हमारी अगाध श्रद्धा है। मिलावट के बहाने ही पुरानी विश्वसनीयता का बचा हुआ इतिहास है कि जिस तरह पुराने समय के लोग हल्के नहीं होते थे। बात के पक्के और सच्चे हुआ करते थे। उस पीढ़ी के लोग अब भी हैंं। जो पत्थर दिल बनकर अनाज में पत्थर मिलाकर लोगों के स्वास्थ्य से उसी विश्वसनीयता के साथ खेल रहें है़ं। जैसे पहले खेलते थे।

खुशी की बात है कि पुराने समय के ऐसे लोग या उनके संस्कार मिलावट के बहाने से सही हमारे बीच हैं। जिसपर आज के समय में जब लोग हल्के और सतही हो गए हैंं। तो इस झाड़ू में मिलावट का स्वागत होना चाहिए।

ना वो इंकार करती है ना वो इजहार करती है - (व्यंग्य) - महेश केशरी

चँदा चोरों की है ऐश। उनकी पांचों ऊँगलियाँ घी में और मुड़ी कढ़ाई में है डूबा। करोड़ों खाकर भी लेते नहीं डकार। चोरों ने जनता का छुड़ा दिया है बुखार। जनता झूल रही है मँहगाई का झूला। चोर उड़ा रहें हैं दिनभर मालपुआ।

ये हमारी आस्था में सीधे सेंधमारी है। चोर को बताना है कि इतनी तेरी औकात कि हाथ साफ करेगा तू दान पेटी पे। जनता पाई- पाई बचाकर तीर्थ करने जाती है। फिर भगवान् को अपना पेट काट-काट कर बचाया पैसे चढ़ाती है। दान का पैसा मँदिर के सार्वजनिक कामों के लिए है। ना कि चोरों को ऐश करने के लिए है।

प्रधान जी से कहना है कि चँदा चोरी पर आप कुछ क्यों नहीं बोलते हैं। अपना मुँह क्यों नहीं हैं खोलते हैं। लगता है आप चँदा चोरों के साथ हैं। नहीं तो कैसे बने थे वे मुख्य अतिथि या ट्रस्टी। ये घटना याद दिलाती है। एक पुराने गाने कि " की ना वो इंकार करती है। ना वो इजहार करती है। मुझे फिर भी यकीन है, कि वो मुझसे प्यार करती है। "। मौन समर्थन दरअसल सहमति ही मानी जाती है।

आप भी कुछ बोलिए। नहींं बोलेंगें तो चँदा चोरों का बढ़ेगा हौसला। एक चोर को देखकर और चोर भी सोचेंगें कि चलो चोरी पर जब कोई कुछ बोलता ही नहीं है तो दबाकर करो चोरी। वैसे तो आस्था की बात है। मँदिर में करोड़ों- अरबों का आता है चँदा। इसके लिए रखिए एकाऊँटेंट। करिए महीने का लेखा-जोखा को सार्वजनिक ।

ये सिर्फ चोरी नहीं बल्कि हमारी धार्मिक आस्था पर हमला है। चोरी अराजकता और गमला है। जो चोरी करता है, वो निकृष्ट और घृणित मानसिकता का है। ऐसे लोगों का भला मँदिर में क्या काम है । इससे हमारी आस्था में लगी है सेंध। करोड़ों श्रद्धालूओं के विश्वास को लगी है, ठेस । इसकी जबाबदेही बनती है। आखिर कैसे हुई इतनी बड़ी चोरी। आप क्यों नहीं कुछ बोलते हैं। चँदा चोरी पर भी कुछ बोलिए। अपना मुँह खोलिए। इसको क्या माना जाए। आपके मुँह में दही क्यों है जमी। बोलिए सही- सही। चोरों की सजा दीजिए। तब आएगा मजा। लिट्टी कि तरह मिर्चाई की धुनी लगाईए। फिर चोरों को उल्टा लटकाईए। जब आँखों से निकलेगा पानी। तब याद आएगी उनको अपनी नानी। चोर का जब खाँसते- खाँसते फेफड़ा जाएगा फूल। चोरी करने की आदत वो जाएँगें भूल।

कुत्ता चाटता है आदमी काटता है - (व्यंग्य) - महेश केशरी

अजीब दौर है। कुत्ता जब चाटता है, तब काटता नहीं है। कटता है तो फिर चाटता नहीं है। चाटने का मतलब कुत्ता चाटकर प्रेम दर्शाता है। अपनी वफादारी दिखाने के लिए दूसरों पर भौंकता है।

आदमी इससे अलग है। जरुरत के समय चाटता है। जरूरत खत्म होते ही काटता है। कुत्ता वफादार होता है।

आदमी पहले चाटता है। बाद में काटता है। आदमी की जात निराली है। आपको पत्ते नहीं खोलने हैं। नहीं तो काटने लगेगा। फिर डाँटने लगेगा। बँद मुठ्ठी लाख की खुल गई तो खाक की। जब लेना होगा आदमी को तो लगता है चाटने। लेकिन जब माँगोगे तो लगता है काटने। देते जाओ उस समय बहुत -बहुत- बढ़िया । माँगने जाओ तो लगता है डाँटने।आदमी कुत्ता ही है। लेकिन कुत्ता आदमी नहीं है। कुत्ता, कुत्ता हो सकता है। लेकिन आदमी से गया गुजरा नहीं हो सकता। आदमी अगर पैसा देख ले तो करने लगता है मुजरा । पैसा मिले तो गधे को भी बाप कहता है । और पैसा ना मिले तो बाप को गधा कहता है।

पैसे के पीछे लोग पागल हैं। संबंध हो रहे घायल हैं।

अमीरी का टेंपरेचर जब बढ़ने लगता है। तो आँखों में फैशन का चर्बी चढ़ने लगता है। लोग मुटियाने लगते हैं। चिकनाई बढ़ने लगती है शरीर की। दिमाग का लोहा तपने लगता है। जिस घर में एक अमीर और दूसरा गरीब होता है। लोग छुपाने लगते हैं कमाई । लोग बोलने लगते हैं झूठ। आपस का विश्वास जाता है टूट। क्लेश हो जाता है शुरू ।ऐसे लोगों के लिए खटोगे तो कोल्हू के बैल हो जाओगे। जिंदगी में हमेशा के लिए फेल हो जाओगे। कल तक जो दोस्त थे उनकी शान। आज वो कहते हैं मान- ना -मान मैं तेरा मेहमान।

कल तक जो दोस्त कलाकार थे। वो आज कंगाल लगने लगे हैं। उनका पैकेट जब से हुआ है गर्म। दोस्तों से आने लगी है शर्म। आज उनको गरीबी से आती है बदबू। नये दोस्तों में बसती है खुशबू।

अपने स्टैंडर्ड के लोग तलाशने लगते हैं। रिश्तेदारों से नजरें चुराने लगे हैं। घर जाओ तो दरवाजे से टकराते हैं। मिलने से कतराते हैं। इशारों में समझाते हैं।

आपको दूर भगाया जा रहा है। इशारों में बताया जा रहा है। गरीब रिश्तेदारों से दूरी बनाते हैं। माँ- बाप भी ऐसे लोगों का ही देते हैं साथ। बड़ों का किया उपकार भूलाते हैं। अपने काम याद दिलाते हैं। कुत्ता उपकार मानता है। अपनी भूमिका निभाता है। आदमी है कुत्ते से बेकार। बात मान लो सरकार। अपना हाथ कभी मत काटना। सब -कुछ लोगों में कभी मत बाँटना। सीधे का मुँह चाटता है ,कुत्ता । समय गया है बदल। मत करो अपनी तरफ से पहल। मत करो किसी पर विश्वास। कोई कुछ पूछे तो कह दो गले में है खराश। नहीं तो भोगना पड़ेगा संत्रास। दुनिया में आए हो अकेले। मत लो बेकार के झमेले। जब माँगना पड़ेगा अपना अधिकार। अपनी नजरों में गिर जाओगे सरकार। तब लोग देंगें तुमको दुत्कार। जमाने में गरीबों का कहाँ है सत्कार।

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