व्यंग्य (91-100) : महेश केशरी
Hindi Vyangya (91-100) : Mahesh Keshri
धर्मनिरपेक्षता का भूत : (व्यंग्य) : महेश केशरी
धर्मनिरपेक्षता वैसे तो हमारे संविधान की आत्मा है। लेकिन आत्मा से कुछ लोगों को परहेज हैं। ये आत्मा जीवित लोगो को ऐसे डरा रही है। जैसे सचमुच का भूत हो। कुछ लोगों को लगता है कि बिना आत्मा यानी बिना धर्मनिरपेक्षता के उनको संविधान चाहिए। बिना आत्मा के शरीर मर जाता है। वो गंध मारने लगता है। बिना आत्मा के दिल ,दिमाग, गुर्दे सब काम करना बंद कर देते हैं। फिर अच्छे-बुरे , और सही गलत का फैसला कौन करेगा। जब शरीर में आत्मा ही ना होगी। संविधान फिर ढढर की तरह रह जाएगा। किसी काम का नहीं।
संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द से कुछ लोग नफरत करते हैं। धर्मनिरपेक्षता जुलाब की तरह है। लोगों को देखते ही पेट मे गुड़गुड़ी सी होने लगती है। लोग पानी पी- पीकर ऐसे लोगों को कोसते हैं। जिन्होंने संविधान लिखा था। ऐसे लोगों के लिए बस उनका होना जरूरी है। ऐसे लोग , दूसरे पंथ , विचार के लोगों को फूटी आँखों से देखना नहीं चाहते। इनके लिए ऐसे लोगों को लेकर मन में एक विकृति है। ऐसे लोगों ने दूसरे लोगों का एक तरह से नया नामकरण किया है। कभी इनको नीलटे ,कभी इनको भीमटे का संबोधन दिया जाता है। इससे जो बच गए हैं। उनको वो अलगाववादी ,भटकाववादी, वामपंथी, टुकड़े -टुकड़े गैंग के नाम से संबोधित करते हैं। इनके अनुसार धर्मनिरपेक्षता शब्द हमारे देश को कमजोर कर रहा है। यहाँ कुछ लोग उग आएँ हैं। जो खरपतवार की तरह हैं। ये जो धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ खड़े लोग हैं। वो ऐसा दूसरे लोगों के बारे में सोचते हैं। कितना अच्छा होता अगर इनके अनुसार संविधान में धर्म निरपेक्षता शब्द ही ना होता।
धर्मनिरपेक्ष लोगों को देखते ही ये लोग उनको काट खाना चाहते हैं। उनको लगता है कि ये उनका हक मार रहें हैं। जिस धर्मनिरपेक्षता की बात तुम करते हो। उसके अंदर वही लोग आते हैं। जिनको मँदिरों में आने पर पाबंदी है। जिनके चरण पड़ने से तुम अपवित्र हो जाते हो। जो फूल में तुम्हें काँटे की तरह लगते हैं।.रास्ते में डिवाइडर की तरह। जो तुम्हें अब झटके देने लगे हैं। जो अब तुम्हारी बराबरी करने लगे है़ं। जो अच्छे होने पर चुने जाने लगे है़ं। वो अब तुम्हारी आँखों में खटकने लगे हैं।
शुरू से ऐसे लोग समाज के हाशिए पर के थे। जो भेदभाव के कारण आगे नहीं बढ़ पाए। जो हमेशा से हिकारत से लोगों के द्वारा देखे गए। जो मजदूर थे, जो किसान थे। बाद में संविधान की ताकत मिलने पर पढ़ -लिख गए। समाज में जगह बना रहें हैं। आगे बढ़ रहें हैं। तब ये लोग उनके नजर में खटक रहें हैं। धर्मनिरपेक्ष लोग घास की तरह हैं। घास की तरह बेवजह उग आए हैं। इसलिए इनको काट देना चाहिए। समूल नाश कर देना चाहिए ऐसे लोगों का। ऐसा लोग सोच रहें हैं । लेकिन घास भी जरुरी है। घास ना होगा तो तुम्हारे मवेशी खाएँगें क्या। कौन उगायेगा तुम्हारे लिए सब्जियाँ। कौन काम करेगा तुम्हारे खेतों में , कौन काटेगा तुम्हारे बाल, कौन निकालेगा तुम्हारे लिए दूध , कौन काटेगा तुम्हारी फसल। कौन साफ करेगा तुम्हारे पखाने। कौन धोएगा तुम्हारे कपड़े, कौन करेगा तुम्हारे देश की सुरक्षा।
पानी से प्रदूषण तक : (व्यंग्य) : महेश केशरी
हमारे यहाँ नेताजी सरीखे लोग छोटी- छोटी बातों पर राजनीति करने का अवसर नहीं जाने देते हैं। लेकिन यहाँ तो बात पानी की थी। लिहाजा विपक्षी पानी पी-पीकर विपक्ष को कोसने लगे। पक्ष के लोगों के आँखों में भी पानी नहीं था। नहीं तो कोई पानी जैसी मामूली चीज के लिए आँदोलन करे तो पानी में डूब मरने की बात है। इस बार तो मुद्दा पानी था। पानी जैसे गँभीर मद्दे पर राजनीति ना हो। तो भी भला कोई बात है।
यहाँ केवल बात पानी की नहीं थी। इसके लिए हमारे यहाँ बहुत उग्र आँदोलन हुआ। तब जाकर पता चला कि पानी इसलिए भी नहीं आ रहा है। क्योंकि वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में बिजली नहीं आ रही है। लिहाजा पानी की आपूर्त्ति ठप है। बिजली बहाल होते ही पानी आने लगेगा। ये तो और विकट बात थी। कोढ़ में खाज की तरह। लोग नेताजी के खिलाफ तख्तियाँ लेकर निकल पड़े सड़कों पर। जब तक पानी और बिजली नहीं। तब तक वोट नहीं। वोट दिया है तो पानी दो। जनता का पसीना निकला जाता था। लोग गर्मी से हलकान- परेशान। पानी ज्यादा हो तो परेशानी। कम हो तो परेशानी। बरसात में जब यही पानी घरों और नालियों में भर जाता है। तब भी लोग परेशान होकर सीवर सिस्टम और सरकार को गालियाँ निकालने लगते हैं।
माना कि उनके यहाँ तीन- तीन नल की टोंटियाँ हैं। और पिछले कार्यकाल में उन्होंने बड़ी- बड़ी टँकी बनवा ली है। लेकिन टोंटी में पानी आने से पहले पाईप में पानी आनी चाहिए। एक उनके यहाँ तीन- तीन टोटियों होने से क्या होता है। जब पाईप में ही पानी ना आ रहा हो। दूसरे पक्ष को भी लाइमलाइट में बने रहना है। आखिर कुछ तो कहने के लिए चाहिए।
बात हमारे यहाँ पानी पर ठनी थी। जब और कुछ ना मिला तो पानी पर ही राजनीति कर ली जाए। राजनीति में जब आप दूसरों की लँगोट खोल रहे होते हैं। तो दूसरे भी आपकी लँगोट खोलने में लग जाते हैं। अगर राजनीति में अपनी छीछालेदारी करवानी है। तो सामने वाले की लँगोट खोलिए। और सामने वाला आपकी लँगोट खोलेगा। इस छीछालेदारी में जनता का भला होता है। जनता को नामालूम किस्सों की जानकारी होती है। इन किस्सों से जनता का मनोरंजन तो होता ही है। आने वाले कल में क्या नया होने वाला है। इसकी उत्सुकता बनी रहती है।
हमारे यहाँ तो कोयले के धुँए को भी टायर का धुँआ बताया जा रहा है। और कोयले के बहाने से टायर रिसोलिंग टारगेट पर है। मतलब कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना। प्रदूषण के बहाने से कुछ झोला छाप नेताओं की एँट्री हमारे यहाँ हो गई है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रदूषण तो एक बहाना है। विपक्ष के झोला छाप नेताओं का पेट भरे। विरोध का कारण ये भी हो सकता है। अकेले- अकेले कैसे खाइएगा। मिल बैठकर खाया जाए। जिस दिन से प्रदूषण पर हो- हल्ला मचाने वालों को उनका हिस्सा यानि बोटी फेंक दिया जाएगा। देखना प्रदूषण तेल लेने चला जाएगा। रेट तय होने दीजिए। सब ठीक हो जाएगा। और यही लोग दुम हिलाते दिखाई देंगें उनके दरवाजे पर।
जब इतने सालों से आयरन युक्त पानी पी- पीकर जनता ना मरी। सैंकड़ों मन छाई फेंफेड़े को सोख गए । तो क्या हो गया इतने से घुँए से। वैसे भी हम लोगों यानी हम भारतीयों की रोग -प्रतिरक्षा प्रणाली इसलिए भी बेहतर है। क्योंकि हम सबसे अधिक गँदगी में रहने के आदि हैं। देखा, इटली ,अमेरीका , फ्रांस, पेरिस के लोगों की कोरोना में मौत। एक्सपेंसिव- एक्सपेंसिव देश छितरा गए। दुनिया के ऐसे देश जो सफाई में अव्वल थे। उनके लोग यमराज के पास चले गए। और हम भारतीय गँदगी में रहने के कारण, प्रदूषण की मार सहने के कारण अपने आपको बूस्ट कर गए।
तब तक टैंकर से काम चलाईए : (व्यंग्य) : महेश केशरी
हमारे यहाँ पानी पर भी राजनीति होती है। वो भी साल के दो- तीन महीने। जब गर्मी प्रचंड पड़ रही होती है। पानी तब बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता है। सोचता हूँ , भ्रष्टाचार के बड़े उदाहरणों में से ये पानी की बड़ी - बड़ी टँकियाँ हैं। ऐसा इसलिए भी है कि इन बड़ी -बड़ी टंकियों में पानी कभी नहीं आया। और ये देश में आज भी केवल शोभा कि वस्तु बनकर रह गयीं हैं। ये हम जनता को मुँह चिढ़ाती हुई यहाँ -वहाँ- जहाँ- तहाँ खड़ी दिखाई देतीं है़ं। मुझे ये भी लगता है कि जितने बड़े- बड़े आकार की ये टँकियाँ हैं। ये पानी की टँकियाँ नहीं ब्लकि भ्रष्टाचार के दानव हैं। अब इससे भद्दा मजाक भला और क्या होगा कि सालों से बनी टँकियों में अबतक किसी कारण से जलापूर्ति नहीं हो सकी है।
सोचता हूँ जब पहले -पहल कोई पानी की समस्या लेकर नेताजी के पास पहुँचा होगा। तो नेताजी की बाँछें खिल गईं होंगीं। और नेताजी जनता के दु:ख से वैसे ही कुछ दु:खी हुए होंगें। जैसे बूढ़ा शेर गड्ढे़ में गिरे किसी आदमी को देखकर दुखी होता होगा । जैसे पानी की समस्या जनता की नहीं ब्लकि खुद नेताजी की रही हो। लिहाजा तब नेताजी ने जनता के आँसू पोंछा होगा। और जनता को निश्चिंत रहने को कहा होगा। शायद नेताजी ने ये भी कहा होगा कि जब तक मैं टँकी नहीं बनवा लूँगा। और उसमें पानी नहीं पहुँचवा दूँगा। तब तक अन्न -जल ग्रहण नहीं करूँगा। और जनता ने भरोसा कर लिया होगा। और नेताजी ने अपना उल्लू इस बीच सीधा किया होगा। शहरी और ग्रामीण जलापूर्ति योजना में तब बड़े -बड़े ठेकों का टेंडर निकाला होगा। और नेताजी ने दबाकर माल कमाया होगा। किसी की मजबूरी किसी के तो काम आई। नेताजी भी अपने आदमी हैं । हर टेंडर में कमीशन मोटा- मोटा खाया होगा। नेताजी हमेशा यही सोचते रहते हैं कि गर्मियों का ये सीजन कभी खत्म ही ना हो। और लोग इसी तरह दौड़- दौड़कर मेरे पास आते रहें। और पानी की आपूर्ति तुरंत चालू हो जाए। इसकी अर्जी लगाते रहें। बदले में नेताजी काम हो जाएगा ऐसा कहकर मुस्कुराते रहें। लेकिन अगले चुनाव में फिर मुद्दा क्या बचेगा। ये सोचकर घबराते रहें। फिर किस मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाएगा। ऐसा सोचकर पछताते रहें।यही सोचकर नेताजी पानी का मुद्दा अटकाते रहे हों। और जनता को भटकाते रहे हों। चुनाव से पहले - पहले पानी आ जाएगा। ऐसा जनता को बतलाते हैं । तब तक पानी टैंकर से भिजवाता हूँ। उससे काम चलाओ !
पाँच रुपये में मछली भात : (व्यंग्य) : महेश केशरी
पाँच का पंच किसके लिए है। जनता सोचती है हमारे लिए है। और नेताजी सोचते हैं कि हमारे लिए है। जनता सोचती है कि पाँच साल के लिए ही तो चुना है। पाँच साल बाद ऐसा पँच लगाऊँगी कि नेताजी कहीं दूर जाकर गिरेंगें। लेकिन नेताजी के पास भी मास्टर स्ट्रोक खेलने का माद्दा है। तू डाल- डाल तो मैं पात- पात। पाँच साल बाद ऐसा पंच लगातें हैं कि जनता चारों खाने चित।
जनता अपना टूटा- फूटा पंचर ठीक कराती हुई नजर आती है। पंचर जनता मुस्कुराते हुए यु-टर्न ले लती है। सरकार गलती माफ हो। हम कल भी आपकी जी- हजूरी करते थे। आगे भी आपकी जी -हजूरी करते रहेंगें। बस दे -दो पाँच किलो अनाज।
पाँच का पंच किसको पड़ता है। जनता समझती ही नहीं है। वो बस इस बात से खुश है कि उसको पाँच किलो अनाज मिलता है। और जब पाँच किलो अनाज के साथ- साथ पाँच रूपये में मछली- भात भी खाने को मिलेगा। तो ऐसा सुनते ही जनता के पैर जमीन पर नहीं पड़ते हैं। जनता गदगद हुए बिना नहीं रहती। उसको लगता है कि उसकी जिंदगी में एक तरह से रामराज्य लौट आया है। कलियुग नहीं है। अभी द्वापद या त्रेता युग है। लोगों को अब और क्या चाहिए। परिवार के खाने के लिए पाँच किलो अनाज। और अपने खुद के खाने के लिए पाँच रूपये में मछली- भात। कलियुग में भगवान् को खोजने की दरकार क्या है। हमारी सरकार हमारे लिए भगवान् से भला कम है क्या। लोग बेकार ही सरकार को कोसते हैं। उधर नेताजी भी खुश। पाँच किलो में पाँच साल की छुट्टी।पाँच साल का टंटा खत्म। अब पाँच साल उगाही करनी है। ठेके -पट्टे सब चेले चपाटियों और भाई - बँदों को मिलने चाहिए।
पाँच रुपये में मछली -भात। महीने में पाँच किलो अनाज। खाते में दो -तीन हजार रूपये। बस जरूरत है आसपास में एक शराब के ठेका खुलवाने की। शराबियों का आशीर्वाद भी मिलता रहेगा।ठेके का काम भी उनके अपने लोगों को मिलना है।इसको कहते हैं। आम -के -आम गुठलियों के दाम।
पाँच रूपये में इस देश के अंदर चाय नहीं मिलती है। लेकिन पाँच रूपये में में मछली -भात लोगों को मिलेगा। इस तरह से देखा जाए तो लोग सुखी हो जाएँगें। और जीने को क्या चाहिए। और अब बिना काम किए भी पाँच रूपये में लोगों को भरपेट मछली- भात खाने को मिलेगा। ये कुछ- कुछ वैसा ही है कि युद्व जीतने के बाद सेनापति को पहले जैसे इनाम में गाँव , तहसील दिए जाते थे। जनता को पाँच रूपये में मछली- भात खाने को मिलेगा। खैर ये जनता को रेवड़ी बाँटना थोड़ी ही कहलायेगा। जनता जो बारह -बारह घँटे हाड़- तोड़ मेहनत करके जी.डी.पी.को धक्का दे रही है। पाँच रूपये में मछली -भात बाँटने से उसकी साँसें फूल जाएँगीं । एक खोरठा में कहावत है । " खट खाए मुर्गा बिलार खाए अंडा"। मतलब मुर्गा सारा काम करे। और अंडा बिल्ला खा जाए। किसी का तेल निकला जाता है। काम करते - करते। जी. डी.पी.को खींचते हुए। और कोई पाँच रूपये में मछली - भात लपेट रहा है। खाते में तीन -तीन पाँच- पाँच हजार पा रहा है। लोग अब भी गर्व कर रहें होंगें। ना करते हों तो नेताजी याद दिलाते हुए नजर आएँगें। हमारी पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता है। इस पर हमको गर्व करना चाहिए।कहता था ना कि पाँच का पंच हमारे नेताजी बेहतर चलाते हैं। और जनता पाँच के पंच पर भी नेताजी की भूरि -भूरि प्रशंसा करते नहीं अघाती।
जिस प्रांत की जनता जितनी होशियार। चारा उतने अनुपात में डाला जाता है। लिहाजा उसको मछली भात मिल रहा है। वैसे जनता है भिखारी जो महज पाँच किलो अनाज पर वोट दे आती है। दूसरे लोगों को मँहगाई भत्ता मिल रहा है। लेकिन ये पाँच किलो अनाज पर टिकी है। हर पाँच साल में नेताजी की संपत्ति कई- कई गुणा बढ़ जाती है। लेकिन नेताजी हर पाँच साल में आते हैं। और पाँच किलो आगे भी ऐसे ही मिलता रहेगा इसी घोषणा पर वो चुनाव जीत जाते हैं।
तत्काल टिकट लेना भूल गईं : (व्यंग्य) : महेश केशरी
चाटुकार लोगों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। कुछ लोग दूसरों की हाँ- में- हाँ मिलने में ही अपने को धन्य समझते हैं। इससे और कुछ हो ना हो। उनके साथ अपना भी महिमंडन हो जाता है। ऐसे लोग प्रभाव का मुकुट अपने सिर पर पहनकर चलते हैं। उनके मुकुट को देखकर साथ के लोग भी अपने को मुकुट पहना समझ लेते हैं। इसको ऐसे समझना चाहिये कि अगर सामने वाले के सिर में तेल पड़ा है। तो लोग ये मानकर चलते हैं कि उनके माथे में भी तेल है। उनकी शान में कसीदे पढ़ना एक तरह से उनकी आदत पड़ चुकी होती है। कभी -कभी ऐसे लोग भी आलोचकों की रडार पर आ जाते हैं। और आलोचकों द्वारा लताड़ दिए जाते हैं। खैर , ये तो प्रभाव के मुकुट से प्रभावित लोगों की बात हो रही है। लेकिन यहाँ गुरू को पकड़ना बहुत जरूरी है। क्योंकि गुरू के प्रभाव में ही चेला आँय -बाँय बकता है। इसीलिए गुरू पर वार करना बेहद जरूरी है।
उनकी जो गुरू थीं उनको फेंकने की आदत थी। एक दिन मिल गईं कहीं। बातचीज का सिलसिला चल निकला था। पूछा गुरूजी टिकट हो गई। गुरूजी बोलीं हमलोग तत्काल टिकट ही लेते हैं। मानों वे कह रहीं हों कि जब - जब वो जो टिकट लेतीं हैं। तब तब वो तत्काल ही टिकट लेतीं हैं। ये बात काँटे मे फँसी मछली की तरह मेरे अंतस में चुभी। मैं तड़पकर रह गया। सालों इस समय का इंतजार किया। तब जाकर ये समय आया है। जब सोना खरीदने की मनाही हुई है। गोल्ड क्राइसिस में दुनिया फँसी है। तब सोने पर बात करने का ये मुफीद समय है।
ये सही समय था। उनपर चोट करने का। मैंनें फोन मिलाया। जानकारी चाही। कुशल क्षेम पूछा। पूछाना था दरअसल सोने के बारे में । इसीलिए फोन किया। पूछा और सुनाओ गुरूजी क्या हाल चाल है। बोलीं ठीक है। उनको बताया कि सोना सवा लाख का दस ग्राम अभी चल रहा है। सोना के बारे में आपका क्या ख्याल है।
आप तो सब चीज तत्काल खरीदतीं हैं। रील्स पर कमेंट पातीं हैं चार। जिस तरह की साड़ी पहनतीं हैं। उसी तरह का कुछ पीला पहनिए। आप जैसे लोगों के लिए मेटल का सेट पहनना अच्छा नहीं लगता है। आप दो- डेढ- सौ- ग्राम का सोने का एक बढ़िया हार बनवा लीजिए। पहले तो उन्होनें कहा आपके मुँह में घी शक्कर। फिर उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ। बोलीं,अभी - अभी तो पचास लाख रूपये का घर बनाया है। सारा पैसा उसी में खर्च हो गया है। मैनें वीणा का तार को और जोर से खींचा। ताकि चोट जबरजस्त पड़े। उन्होनें बात का छोर मोड़ दिया।
इस बार उन्होनें दलील दी। नहीं साड़ी की मैचिंग चीजों में रील्स बनाने में मेटल का हार बढ़िया रहता है। मैंनें कहा मेटल आपके सुकुमार गर्दन की शोभा खराब किए दे रहा है। रील्स की ऐसी -तैसी कर दे रहा है। बोलीं नहीं मेरे पचास हजार ब्यूज आते है़ं। मैनें दुखती रग पर हाथ रखा। कहा कि गुरूजी ब्यूज चाहे कितने हों। कमेंट पाँच - दस ही आते हैं। मैनें सोना के बाबत दुबारा बात की। वे बोलीं मुझे सोने के गहने अच्छे नहीं लगते हैं। उनकी बाबत ये बताना बेहद जरूरी है कि वो हमेशा कपड़ों और आर्टिफिशयल गहनों से लँदी- फंदी रहती हैं। पहनने का जितना शौक उनको है। उससे ज्यादा दिखावे का शौक है। उनका सारा दिन दिखावे में बीतता है। और वो ये कह रहीं हैं कि उनको सोना पहनने का शौक ही नहीं है!
लो ये तो बहुत बड़ी बात हो गई कि अँगूर ना मिलें तो अँगूर खट्टे हैं। मैनें फिर छेड़ा। जो आदमी तत्काल टिकट खरीद सकता है. वो सोना जैसी मामूली चीज भी तत्काल खरीद सकता है। बोलीं नहीं हमलोग इतना बड़ा आदमी नहीं हैं। बस यही तो सुनना था आपके मुँह से। सालों से इस बात को सुनने के लिए मेरे कान तरस गए थे। . उस समय उनके मुँह से ये बातें सुनकर कितनी तसल्ली हुई मैं बता नहीं सकता। जो बात - बात में फेंकता है। वो रिरिया रही थी । वो अचानक से मीडिल क्लास का आदमी हुई जाती थीं । बल्कि उससे भी नीचे गरीब आदमी ! अब ऊँट पहाड़ के नीचे आया था।
फोन पर आवाज की लाचारी सुनी जा सकती थी। काश कि ये बात आमने- सामने हुई होती। तब उनका चेहरा देखने लायक होता। आडियो कॉल पर बात हो रही थी। लिहाजा उनका बेचारगी भरा चेहरा न देख सका। इस बात का अफसोस जीवण भर रहेगा।
मिसेज सूचि का रील्स प्रेम : (व्यंग्य) : महेश केशरी
कुछ लोग सार्वजनिक होते हैं। सबके लिए हरदम उपलब्ध। जैसे भंडरे में मिलने वाले प्रसाद की तरह । हर समय सबके लिए उपलब्ध रहना। लेकिन घर वालों के लिए समय कतई नहीं है। ऐसा रील्स संस्कृति के कारण हो रहा है। साठ -साठ साल की दादियाँ जब रील्स बना रहीं है़ं। लाईक्स ब्यूज पा रहीं हैं। तो मिसेज सूचि किसी से कम हैं क्या। मिसेज सूचि के पास बच्चों को स्कूल छोड़ने का समय नहीं है। बच्चों का टिफिन बनाने का समय उनके पास समय नहीं है। पति बिना नाश्ता किए दफ्तर जा रहा है। सास ससुर को चाय बिस्किट नहीं मिला है। ना मिले कोई बात नहीं। ये सब रोजमर्रा की उनकी आदतों में शामिल है।
बच्चों ने होम वर्क करा या नहीं करा। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको तो बस रील्स बनाने से मतलब है। ब्यूज पाने से मतलब है। लोग मुँह पर और पीठ पीछे उनको चाहे जितना जलील करें। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके पास टाईम नहीं है। खाना बनाने से ज्यादा जरूरी काम रील्स बनाना है। बर्तन , कपड़े धोने से वो रहीं। उनको तो बस रील्स बनाना है। दुनिया जाए भाँड़ में।
उनका सोशल वर्क इतना ज्यादा हो जाता है कि वो परिवार के लिए समय ही नहीं निकाल पातीं हैं। उनका सोशल और प्रोफेशनल काम बस रील्स बनाना रह गया है। घर के लोग तो टोकते हैं तो टका सा जबाब मिलता है। रील्स बनाने से पैसे भी तो मिल रहें हैं। शौक का शौक। कमाई की कमाई। दर असल वो ये कहना चाहतीं हैं। आम के आम और गुठलियों के भी दाम। जरा सा किसी ने उनको झाड़ पर चढ़ाया। और वे चढ़ भी जाती हैं। किसी ने कह दिया कि अरे वाह! आप कितना बढ़िया रील्स बनातीं हैं। तो उनका चेहरा खिल- खिल उठता है। तब वो कहतीं हैं। थैंक्स फोर कंप्लीमेंट। लेकिन देखिए ने मेरी तरक्की देखकर लोग मुझसे जलते है़ं। आस-पड़ोस तो जलते ही हैं। मेरा पति मेरे बच्चे और मेरे सास ससुर सब -के -सब दुश्मन बने हुए हैं। किसी को मै फूटी आँखो नहीं सुहाती। अरे छोड़िए ऐसे लोगों को वे आपसे जलते हैं। जो लोग एक दूसरे से जलते हैं। दूसरों को आगे बढ़ते नहीं देख पाते। वही लोग आपको बुरा कहते हैं। आप तो आप हैं।
उनके सोशल मीडिया पर उनचास हजार फोलोवर हैं। लिहाजा उनका पैर अब जमीन पर नहीं रहता । वो हवा में उड़ रही है। बाहर के हर तरह के लोगों के लाईक्स कमेटस का वो जबाब देती हैं। लेकिन घर -परिवार और रिश्तेदारों को ब्लॉक कर रखा है। ब्लॉक करने मे उनको परम सुख मिलता है। उनको दूसरों के लाईक्स कमेंट में तो श्रद्धा दिखाई देती है। घर के लोग जैसे ही कमेंट करते हैं। परिवार के लोग उनको शनिचर लगते हैं। बाहर के लोग भगवान् की तरह उनको लगते हैं। कायदे से अगर देखा जाए तो उनका दिन सोशल मीडिया पर ही गुजरता है। मैचिंग साड़ी, मैचिंग ब्लाऊज , मैचिंग चूड़ी , मैचिंग हार। उनको हर समय रील्स बनाने की खब्त सवार रहती है। उनका ये प्रोजेक्ट बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। घर परिवार से जरुरी। घरभर में उनके इस रील्स प्रेम से लोग परेशान हैं। वो बार बार फोने चेक करती हैं। जरा सा नोटिफिकेशन की घँटी बजी नहीं कि दौड़ पड़ती है। आटा सने हाथों से नोटिफिकेशन चेक करने। सारा दिन उनका जो काम है वो रील्स बनाना और सोशल मीडिया पर अपलोड करना है। घर के लोग सूचि जी से परेशान हैं। कभी चाय नहीं मिलती लोगों को समय से। पति को दफ्तर जाने में रोज लेट हो जाता है। उनके रील्स प्रेम ने घर का बजट बिगाड़ दिया है। महीने में बीसियों हजार रूपये कपड़े, सैंडल, लिपस्टिक, पाऊडर , क्रीम खरीदने में पैसा बहुत खर्चता है। लेकिन उनको इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनको तो बस रील्स बनाना है। परिवार जाए भाँड़ में। रोज इसी रील्स को बनाने के चक्कर में उनके घर में महाभारत होता है। लेकिन उनको इस महाभारत से भी कोई मतलब नहीं है। वो पति सास - ससुर की बात एक कान से सुनतीं हैं। और दूसरे कान से निकाल देतीं हैं। अपने लोगों को, आस-पड़ोस के लोगों को, बुआ जी को,मामी को, मम्मी को यहाँ तक की अपने पति को भी सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर रखा है।ताकि पति की चिकचिक नहीं सुननी पड़ी।
दामाद की खातिर वायसरॉय से बेहतर होती थी : (व्यंग्य) : महेश केशरी
दामाद जी को अफसोस होता है। शादी के दस सालों के बाद वो दस हाथ नीचे धसक गए हैं। मुहल्ले के कुत्तों की उस मुहल्ले में दामाद से ज्यादा इज्जत होती है। कुत्ते जो उसी मुहल्ले में और उसी गली में रोज पड़े रहते है़ं। फिर भी उस कुत्ते की खातिरदारी साल -छह महीने में एक बार पहुँचने वाले दामाद से अच्छी होती है। कम -से -कम कुत्ते को कुत्ता बोलकर संबोधन तो मिलता है।
कुत्ते को कम- से- कम रोज उस द्वार से एक रोटी तो मिलती है। दामाद की इज्जत साल के शुरूआती समय या कुछ सालों तक तो ठीक- ठाक रहती है। लोग सिर- माथे पर बिठाते हैं। लेकिन जैसे ही दस- पाँच साल निकलता है। दामाद की इज्जत ससुराल में बस दो कौड़ी की रह जाती है। दस -पाँच सालों के बाद आप घर में आएँ हैं या नहीं आएँ हैं। इस बात से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। आपके पास लोग आकर नहीं बैठते हैं। कोई बात भी पूछने वाला नहीं होता है कि सफर से कोई तकलीफ तो ना हुई। आप अकेले - थकले से किसी कमरे या सोफे में धँसे-धँसे बोर होते रहते हैं। कोई हालचाल लेने वाला नहीं होता है। सालों लोग आपको फोन नहीं करते। आपकी कीमत दो रूपये से भी कम की हो जाती है। दामाद के मंसूबों पर पानी फिर जाता है। एक ले देकर जो इज्जत ससुराल में दामाद की होती थी। वो जाती रहती है। पहले सालियाँ आकर बार -बार पूछतीं थीं। जीजा जी चलिए खाना खा लीजिए। जीजा जी चलिए नाश्ता कर लीजिए। बात- बात पर मनुहार। बात- बात पर लाड। कोई वायसरॉय को उतनी इज्जत नहीं मिलती होगी। जितनी इज्जत दामाद को मिलती थी। दामाद जी के लिए पनीर पकौड़े । दामाद जी के लिए कबाब। दामाद जी के लिए मछली चावल। दामाद जी के लिए रसगुल्ले। दामाद जी के लिए चाट।
दो -चार साल गुजरने के बाद अब वो इज्जत नहीं मिलती। पुराने होने के बाद चीजों की वैल्यू गिरने लगती है। तो जैसे साल -दर- साल जूता घिसता जाता है। वैसे ही दामाद की इज्जत घिसती जाती है। दामाद धीरे- धीरे कपूर हुए जाते हैं।
जूतों से याद आया कि ससुराल में जूता चुराई की जो रस्म होती है। और दामाद ने जो जूता चुराई की रस्म में पैसे दिए होते हैं। दस सालों के बाद लगता है कि वो अकारथ ही गए। यदि दामाद को पता होता कि जूता चुराई की रस्म में पैसों के इस तरह से खर्च होना जाया चला जाएगा। तो भूलकर भी दामाद रूपी जीव को जूता चुराई पर ये रकम ना खर्चना था। दस सालों बाद दामाद जी को ससुराल से मिले धोखे की याद आती है।
दस- पँद्रह साल के बाद ससुराल में होता भी क्या है। ससुराल का आकर्षण धीरे -धीरे खत्म होने लगता है। और ससुराल का सुख गठबंधन की सरकार चलाने जैसा रह जाता है। जितनी सुविधा पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने में होती है। उतना ही मजा ससुराल में सालियों को देखकर आता कभी आता था । गठबंधन की सरकार दरअसल काँटों से भरा ताज है। कभी भी सरकार गिर सकती है। ससुराल जाने का सुख सालियों से है। जिस तरह सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय, आबकारी विभाग , शिक्षा विभाग मिलने से दिल को हार्दिक खुशी होती है। वैसी ही खुशी भरी- पूरी सालियों के होने से होती है। जिन सालियों के चलते दामाद बन -सँवरकर, अच्छे कपड़े पहनकर , शौक से ससुराल जाता था। वो सालियाँ धीरे -धीरे वक्त के साथ -साथ विदा हो लेतीं हैं। ये वही सालियाँ होतीं हैं। जो जीजा को सालों अपनी पलकों की छाँव में बिठातीं हैं। जिनके एक हाथ में कभी लस्सी , और दूसरे हाथ में खस्सी हुआ करता था। लेकिन जिस तरह से गिद्ध गायब हो गए हैं। उसी तरह से ससुराल से सालियाँ गायब होने लगीं हैं।
सालियों के इस तरह से गायब होने का मतलब है। सुनामी के बाद की शाँति। आपका स्वागत घर जाते ही शीतल पेय, लस्सी , कोल्ड ड्रिंक, से कभी होता होगा । साले रास्तों में बिछ-बिछ जाते थे। शुरूआती दिनों में काजू- कतली या काजू- बर्फी से दामाद का स्वागत होता था। दामाद वक्त के साथ घिसने लगता हैं। पुराने जूते को देखो और दामाद को देखो तो एक ही बात है।
तेल खाना ही नहीं तो खरीदना क्यों! : (व्यंग्य) : महेश केशरी
बचपन से तेल के बारे में सुनता आया हूँ। तेल को लेकर एक से एक बड़ी छोटी बातें। कभी नहीं लगा कि तेल इतना हमें रूलायेगा। कभी नहीं लगा कि जिंदगी में तेल की इतनी जरूरत पड़ेगी। या ये तेल ही हमारा इस तरह से तेल निकालेगा। तेल की बात आती है तो बहुत सी बातें याद आतीं हैं। फलनवा हमको फलाने दिन से चिलाने काम के लिए तेल लगा रहा है। लेकिन तेल सोंटने वाले या तेल लगाने वाले वैसे लोग अब नहीं रहे। यहाँ तो तेल के लिए हाहाकार मचा हुआ है। जिधर देखो गैस और तेल के चर्चे हैं। कुछ लोगो ने कहा ईरान में युद्ध का संकट है। और वे लोग मर रहें। किसी ने कहा अच्छा हैं मरें।उनकी तादात कम होगी। लेकिन ईरान युद्ध जब ज्यादा लंबा चला तो ऐसा कहने वालों के तेल निकल गए। अब गैस महीने में एक ही बार मिल सकता था। जो इस ईरान युद्ध को सही ठहरा रहे थे। उनका बोरिया बिस्तरा बंध गया। औने- पौने होटल बंद होने लगे। और जो लोग शहरों में रहकर होटल चला रहे थे। ढाबे चला रहे थे। उनका तेल निकल गया। इधर तेल है कि गदहे के सर से सींग की तरह गायब होती जा रही है। तेल की किल्लत के समय में राजधानी से घोषणा हुई है कि तेल की खपत कम दी जाए। राजधानी के इस फरमान में प्रधान जी तीस - तीस गाड़ियों के काफिले में तेज रफ्तार से निकलते दिखाई दे रहें हैं। तेल की जो हालत है। प्रधान जी से पूछना चाहिए कि क्या साग -सब्जी बनाने के लिए तेल का आचमन भर करके छोड़ देना चाहिए। या फिर तेल को डब्बे में देखकर ही तेल में बनी मसालेदार सब्जी के खाने की कल्पना करनी चाहिए। मुझे सब्जी में तेल कम होने से खाना अरुचिकर लगने लगता है। जब तक दो- तीन तरह की साग - भाजी नहीं होती प्लेट में। तब तक खाना खाने की तरह नहीं लगता। लेकिन यहाँ तो आचमन कर लेने की बात कही जा रही है। पकौड़ों पर बात बेमानी है। ये सरासर इस समय अपराध की श्रेणी में आ जाएगा। अगर हमलोग तेल से पकौड़े बनाते हैं। तेल का उपयोग अपने सार्वजनिक जीवण में करते हैं। या अपनी निजी गाड़ी में तेल डलवाते हैं। यही नहीं वो दिन दूर नहीं जब तेल के लिए जेल जाना पड़ सकता है। लोगों को हक है कि अपने काफिले में तेल फूँकें। जनता तो नसीहत और भाषण सुनने के लिए बैठी ही है।
तेल का महत्व इतना ज्यादा होगा कभी सोचा ना था। खाली तेल की इस कमी ने विश्व गुरू की तेल निकाल दी है। दुनिया की तीसरी - चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था औंधे मुँह तेल के बिना गिरी है। बिना तेल के अपने आप को विश्व गुरू कहलाने वाला देश इस तरह से घुटनों के बल आ जाएगा कभी सोचा ना था। किस बात के हम विश्व गुरू जब अदना सा तेल ना जुगाड़ कर सके। विश्व गुरू और इस अदना से तेल के लिए घुटने पर आ गए हों ! ओह बड़ा अफसोस होता है कि बिना तेल के विश्व गुरू की साँसे फूल रहीं हैं। और सार्वजनिक मंच से तेल की खपत कम करने पर जोर दिया जा रहा है। तेल, गैस की संकट ने विश्व गुरू की कलई खोल दी है। अपनी पीठ खुद ठोंकने वालों की हालत देखते बन रही है।
सुना था वो भी कहावत कि लोग तेल वालों को माथे में ही तेल देते हैं। यानी जो समर्थ है। उनकी मदद सब कोई करता है। लेकिन हमारे सिर में तो पहले से तेल थी। हम विश्व गुरू थे। हम एशिया के सबसे बड़े सितारे थे। दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था!
जितना तेल से बचने कि कोशिश करता हूँ। उतना ही तेल याद आता है। तेल और तेल से बने समोसे,आलूचोप, पकौड़े याद आते हैं। आपका अचानक से नादिरशाही हुक्म आता है। तेल का इस्तेमाल कम कीजिए। जनता अब छोले, पकौड़ों के ठेले बँद कर दें। भूँजा फाँककर रहे हमारी जनता। देश में शाम को जब हम घूमते है़ं,तो बाजारों में चाट -गुपचुप पकौड़ों का मेला सा लगा रहता है। लगता है हमलोग पकौड़ा -संस्कृति मना रहें हैं । पकौड़े का उत्सव किसी बड़े त्योहरा से हमारे यहाँ कम है क्या होगा। हमलोगों ने सोना खरीदना बँद कर दिया। अब तो सपने में भी सोना नहीं आता। जब सोना चालीस -पचास हजार का एक तोला आता था। तब से ही हमने सोने की तरफ देखना बँद कर दिया था। सालों हुए हमें सुनार की दुकान पर गए।
आप इस तरह जनता का तेल निकाल देंगें क्या।
जब मिल बैठेंगे आप मैं और चाय : (व्यंग्य) : महेश केशरी
बैठकी के लिए एक गुट होना चाहिए। बिना गुट के बैठकी नहीं हो सकती है। बैठकी में सबसे चिंतित वही लोग होतें हैं। जो परले दर्जे के कामचोर होते हैं। इनकी चिंताओं का फलक बहुत बड़ा होता है। देश दुनिया की चिंता में ऐसे लोग दुबले हुए जाते है़ं। ऐसे लोग जो होते हैं। वो चाय पान की दुकानों पर थेथरई करते दिख जाते हैं। कुछ को अगर काम ना हो तो जेसीबी की खुदाई देखने भी निकल जाते हैं।
अब सड़क की खुदाई कौन देखता है, भाई। ये हम भारतीयों का ही शौक हो सकता है। लेकिन लफाड़िया लाल हल्के किस्म के बेगारी थे । ए. सी. का आनंद वो छोड़ना नहीं चाहते थे। वे लोग ऐसे- वैसे नहीं बैठते थे। बहुत लंबे समय के लिए बैठते थे। बेशर्मी की हद की दस- पाँच मिनट बैठकर नहीं चले जाते। आते तो फैल जाते। ऐसे फैलते जैसे की ससुराल में दामाद फैलकर बैठता हो । और महीनों आकर जमा रहता है। वहाँ उन्होंने सब चीजों की व्यवस्था कर रखी थी। चाय बनाने वाला थर्मस , चाय पीने की चीनी मिट्टी की प्यालियाँ , कॉफी के पैकेट। चीनी, चाय की पत्ती। वे लोग जाम से जाम नहीं टकराते थे। ब्लकि चाय से चाय टकराते थे। मिल , बैठेंगें हम चार। आप, मैं और चाय कप की प्याली।
इन लफाड़ियों के आने -जाने का कोई समय नहीं था । ये कभी भी टपक सकते हैं। रात -दिन - दोपहर कभी भी। वो आपका समय खराब करने के लिए आपके पास आते थे । कभी - कभी तो नौ - दस बजे रात को भी आ जाते है़ं। एक बार दोपहर को आ गए। पड़ोसी दुकानदार खीज गया। खाना खाने के समय में आकर दो घंटे बैठ गए। पड़ोसी दुकानदार मन- ही - मन गालियाँ निकल रहा था।पड़ोसी दुकानदार बिदक गया। बोला क्या किया जाए ऐसे लोगों का। खाने का समय दो घंटे टल गया।
कहा गया है कि आदमी को ज्यादा सीधा नहीं होना चाहिए। नहीं तो आपका मुँह कुत्ता चाटने लगता है। जब आप लोगों को ज्यादा छूट देने लगते हैं तो आपके साथ भी ऐसा ही होता है।
आप किसी के साथ बुरा नहीं बन सकते। ये हम भारतीयों का स्वभाव है कि अगर कोई भी हमारे पास आता है,तो हमें शिष्टाचार वश उसके साथ बैठना पड़ता है । अगर कंपनी ना दी तो लोग क्या सोचेंगा। लोगों को जो सोचना है सोचें । ऐसे लोग ही झेलते हैं। ऐसे लोगों को।और दो- दो घंटे, चार- चार घंटे की बैठकी करवाते हैं। मैं सोचता हूँ की लोगों के पास इतना फोकट का समय कहाँ से आता है । वो अजवार थे। ऐसे लोग अकेले नहीं आते। इनके साथ बेगारी करने वालों का एक टिड्डा दल होता है। बात निकलती है। तो एक बात के सूत्र से सैंकड़ों बातें जुड़ती चली जातीं हैं। छ:- सात घंटे फुर्र से उड जाते हैं। ऐसे लोग जोंक या च्यूंगम की तरह होते है। जो छुड़ाए नहीं छुटते। ऐसी बैठकी का मतलब भला क्या होता है। उल्टी -सीधी बातें। दूसरों की ईर्ष्या- दोष का भजन करना।
कुछ ले देकर काम नहीं चल सकता : (व्यंग्य) : महेश केशरी
आपको समय पर चाय नाश्ता, दफ्तर जाने से पहले टिफिन , धुले हुए कपड़े और तीन समय खाना मिल जाता है। तो आपको खुशफहमी पालने की जरूरत नहीं है, कि आपकी पत्नी आपको प्रेम करती है। जब तक आपकी क्रयशक्ति है। जब तक आप अर्थ की व्यवस्था कर रहें है़ं। आपकी वहाँ पर खाने -पीने की व्यवस्था चल रही है।
पत्नियों और प्रेमिका में अलजब्रा की तरह कुछ कॉमन बातें हैं। आप दोनों का मोबाइल बिल भरते हैं। हर महीने शॉपिंग करवाते हैं । घूमाते -फिराते हैं। तब तक आपके लिए ये संबंध बाबू- शोना वाला है । नहीं तो आपके लिए भी खाली कहीं एक कोना है। जाकर बैठिए शांति से। और अपनी बारी आने का इंतजार कीजिये।
यदि आप नहीं भरेंगें रेस्टोरेंट का बिल तो पत्नी का खाली मिलेगा दिल।
ये भ्रम पालने की भी जरूरत नहीं है कि आपकी खराब शक्ल के बाद भी आपकी पत्नी आपको शाईनी आहूजा, या नील नीतिन मुकेश समझती है। आप कल भी शक्ति कपूर थें। आज भी शक्ति कपूर हैं।
अगर आपकी पत्नी आपका खराब चेहरा देखकर भी आप से बात कर रही है। आपसे हँस बोलकर बातिया रही है तो आप अपने को अभय देवोल समझने की गलती मत कीजिए। आप अम्बरीश पुरी से अनिल कपूर नहीं हो जाएँगें।
पत्नियों की ये मजबूरी है कि वो आपसे बात करतीं हैं। वरना ये बिना मतलब आपको बुखार ना दें। ऐसा मैं आपने अनुभव से कह रहा हूँ। एक मैडम की कहानी सुनिए। खुले पैसों की जब- जब जरुरत पड़ती थी। मेरे पास मुस्कुराती हुई आतीं थी और खुल्ले लेकर चलीं जातीं। कभी फोन में बैलेंस ना हुआ तो मोबाइल से अपने बेटे को फोन लगाने के लिए कहतीं।
एक बार सब्जी मंडी में मिल गईं। लेकिन ऐसे मिलीं। ऐसे रिएक्ट किया। मानों पहचानतीं ही ना हों। ये महिलाएँ किसी काम के समय। दाम कम करवाने के समय। इस तरह से हँस- हँसकर बातें करतीं हैं। जैसे हम इनके पिछले जन्म के आशिक रहें हों। दुनिया में सबकी मदद करो। लेकिन इनकी नहीं। इनको हर आदमी गलत नीयत से ताड़ता हुआ जान पड़ता है ।
इस बार पत्नी जी की बारी थी। पैसे से इनका वही लगाव है। जैसे लोहे और चुंबक का है। पत्नी जी चुंबक की तरह पैसे से चिपकी रहतीं हैं। जो जनवरी से अप्रैल तक आत्मनिर्भर होने का दावा करतीं है। खद्दार होने का दँभ भरतीं हैं। मई में पाकिस्तान की तरह आई. एम. एफ.से मदद माँगती फिरतीं है़ं। जैसा कि वो हर बार कुछ ना कुछ खरीदने को कहतीं हैं। इस बार उन्होंने भतीजे के बेटे के लिए कपड़ा खरीदने को कहा। अब मैं अपने आपको ट्रैफिक सिगनल तोड़ने की जुर्म में अपराधी की तरह से मान रहा था। किसी तरह कुछ ले देकर छूटने की सोच रहा था। लिहाजा पत्नी जी से इसरार किया । कुछ ले देकर काम नहीं चल सकता। और इस तरह मैं फिलहाल पत्नी जी की कैद से मुक्त हुआ।