व्यंग्य (81-90) : महेश केशरी
Hindi Vyangya (81-90) : Mahesh Keshri
पढ़ाई गई तेल लेने : (व्यंग्य) : महेश केशरी
क्या कर रहें हैं गुरूजी। गुरूजी अस्त व्यस्त से बोले। अभी नेताजी की भैंस खो गई है। उसको ढूँढ़ने जा रहा हूँ । पास में खड़ी होली थी। विधार्थियों की हमजोली थी। विधार्थी रोया गिड़गिड़ाया बोला।
सेशन हो रहा है लेट। क्या करूँ गुरूजी होलिका जलने वाली है। कॉपियों को कर दूँ , होलिका को भेंट। मार्च पार हो गया। किताबों का नहीं आया है कोई सेट। क्या करूँ गुरूजी दिन- दिन पिछड़ता जाता हूँ। इसी कुँठा में तिल -तिल जलकर मर जाता हूँ। गुरूजी ने समझाया मैं तो पढ़ा -लिखा हूँ। फिर भी कहाँ कुछ कर पाया हूँ। देखो अभी घरों की जनगणना में लगा हूँ। फिर भूसा इक्कठा करने में लग जाऊँगा। इस साल पढ़ाने का समय शायद ही मिले। छात्र फिर घिघियाया। सिलेबस जा रहा है लेट। परीक्षा से ना जाने कब होंगी भेंट। कब आएगा रिजल्ट। गुरूजी अपना दुखड़ा रोते हैं। कहते हैं अभी जनगणना पर जाना है। देश के काम आना है। एस. आई .आर. करवाने की मेरी जिम्मेदारी है। आनेवाले मई में मतदान की बारी है। फिर आता है नंबर पोलिया को भगाने का। और देश को दोनों पैरों पर दौड़ाने का। छात्र अपाहिज हो चलेगा। देश का काम नहीं रूकना चाहिए।
फिर बोले गुरूजी यही नहीं हम उपले भी बनाते हैं। फिर भैंस को चारा भी दे आते हैं। आएँ आप ये काम भी करते हैं। गुरूजी बोले भाई यही नहीं जिन साहब के नीचे हूँ। और जिनका खाता हूँ। उनका तो गाना ही पड़ता है। अगर ना करूँ तो तुरंत तबादले का डर है।कहीं लेह- लद्दाख के किसी गाँव में भेज दिया। तो और आफत है। सर्दी से ठिठुरकर मर जाएँ। कहीं बीकानेर या राजस्थान भेज दिया तो रेगिस्तान में कबाब की तरह सिंक जाएँ। बाल -बच्चों वाला आदमी हूँ, भाई सब करना पड़ता है। लेकिन आपका काम तो ये सब करना नहीं है। फिर काहे करते हैं ये सब। गुरूजी बोले भईया मैं ही ऐसा नहीं करता हूँ। पूरा का पूरा तंत्र ही ऐसा करने में लगा है। सब अपने ऊपर वाले की चाट रहें हैं। खुशामद ना करें तो काम कैसे चलेगा। हर छोटा अफसर अपने से बड़े की चाटने में लगा है। कोई गुलदस्ता भेंट करता है। कोई मँहगी शराब। हमारे यहाँ जातिवाद का एक आंतरिक लोकतंत्र है।
जाति -पाति को देखकर वहाँ काम लिया जाता है। छोटी जाति के हो तो गमले में फूल लगाना पड़ता है। जमादार है तो नालियों की सफाई करनी पड़ती है। बड़ा आदमी सफाई तो नहीं कर सकता। लेकिन साग -भाजी बाजार से खरीदकर ला सकता है। हमारे यहाँ प्रोफेसर और कुलपति भी अधिकारी को सुबह -शाम सलाम बजाते हैं। फिर शिक्षा यानी पढ़ाई का क्या होगा। यानी हमारा क्या होगा। बाबू इस व्यवस्था में पढ़ाई के अलावे सब कुछ चल रहा है।बस स्कूल कॉलेज खाना पूर्त्ति के लिए बने हैं। भले ही भविष्य जाए गर्त में और जरूरी कामों को रूकना नहीं चाहिए।
फिर ,हम छात्र क्या करें। अरे करना क्या है। बैठारी के समय यानी खाली समय में हमारे यहाँ खेतों में खेती -बारी करो। पेपर सब सेट रहता है। तुम हमारा काम करो। बदले में हम तुम्हारा काम कर देंगें। फरवरी में पूरे महीने पार्क -घेरो। बाबू शोना खेलो। वेलेंटाइन डे मनाओ। मार्च में हम तुम्हें कॉपियों की जाँच पकड़ा देंगें। मार्च से लेकर मई तक कॉपियों की जाँच करो। लेकिन जाँच ऐसे करो कि हमारी नौकरी पर आँच ना आए। सबको समान दृष्टि से देखो। बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की नीति पर चलो। सब पर समान रूप से दया करो। नंबर बाँटने में कोई कँजूसी मत करो। सबको दबाकर नंबर दो। नंबर देने में कोई कोतही नहीं। पढ़ाई हो ना हो बस रिजल्ट नहीं रूकना चाहिए। ताकि सबको लगे कि कुछ हो ना हो। लेकिन पढ़ाई ठीक- ठाक से हो रही है। भले पढ़ाई गई हो तेल लेने। इसके बाद भी अगर समय बच जाता है। तो मोबाइल पर पबजी खेलो।
करैला कड़वा होता है ,मैडम जी : (व्यंग्य) : महेश केशरी
गुरूजी ने पत्रकारा को टोका की इनकी हैसियत पुतिन का इंटरव्यू लेने लायक नहीं है। इसपर ही वो बिदक गईं हैं। इसलिए पत्रकार महोदया खीज गईं । इसलिए शिक्षकों को दो कौड़ी का बोल रहीं हैं। टीचर हैं, तो फटकारेंगें ही। डाटेंगें और समझाएँगें ही। हो सकता है दो चपेट कान पर धर भी दें। फिर ना चैनल पर कहते फिरना मास्टर ने पीट दिया। देश या देश के लोगों को हाथ से बेहाथ होते देखेंगें तो टोकेंगें ही। तुम टीचरों को दो कौड़ी का गिनती हो। लेकिन तुम ऐसा बोलकर फटीचरों जैसा दिखती हो। सी.बी.एस. सी. वालों की सर जी रोज क्लास लगाते हैं। लगता है तुम भी सी. बी. एस. सी. से पढ़ी हो। इसीलिए अपनी मूर्खता पर अड़ी हो। तुम क्या जानो रात का बासी भात खाना। टूटी झोपड़ी में जीते चले जाना। तुमको तो आता है , ब्रेड -जैम खाना। तुम पढ़ी हो मँहगें स्कूल की बिल्डिंग और ए.सी.कमरों में। दुख -दर्द से हो तुम अनजान। भाई आपकी टिप्पणी शिक्षकों को लेकर है। शिक्षक दो कौड़ी के हैं तो ये बात आप उन शिक्षकों के लिए भी कहतीं होंगीं। जिनसे आपने अपनी एजुकेशन ली थी। जिनसे आपने पत्रकारिता का ककहरा पढ़ा था। आखिर देश में पढ़ा कौन रहा है। सरकारी शिक्षक अगर पढ़ाना भी चाहते हैं तो उन्हें जनगणना में लगा दिया जाता है। पशुओं की गिनती करने को कहा जाता है । अब ले देकर कुछ टीचर बचे हैं। जो बच्चों को यूट्यूब पर पढ़ा रहें हैं। तो आप उनको भी दो कौड़ी का बता रहीं हैं। आपकी परेशानी किस बात को लेकर है। समझ नहीं आता। कहीं आपकी परेशानी इस बात से तो नहीं है कि लोग नीट लीक पर चर्चा कर रहें हैं । तो आप तिलमिला रहीं हैं। कहीं नीट पेपर लीक को दबाने की आपकी मँशा तो नहीं है। इसीलिए बेकार के प्रोपेगंडा चला रहीं हैं। भाई जिसने पेपर दिया है। जिसने मेहनत की है। जिसने मेहनत करवाई है। उसको तो परेशानी है।होगी ही, होनी ही चाहिए। या कहीं आप यूट्यूब पर पढ़ाने वाले सर से घबराकर ऊल-जलूल बकने लगीं हैं। कहीं बीस मिलियन फोलोवर देखकर आपके होश तो नहीं उड़ गए हैं।
कुछ जानना ना कौड़ी किसको बोलते हैं। आप सी. बी. एस. ई. की स्टूडेंट रहीं हैं। इसकी व्याख्या कीजिए। आपने तो बात ही यूटयूब वाले स्टार्स टीचर से ही शुरू की है। यानि आप भी मानती हैं कि ये स्टार्स शिक्षक हैं। भाई शिक्षक सितारा है तो चमकेगा ही। अपनी रौशनी में छात्रों को चमकाएगा ही। माँजेगा और छात्रों को अपने से भी बेहतर बनायेगा ही। पेपर लीक होने पर व्यवस्था से सवाल पूछेगा ही। टीचर है तो ये तो नहीं पूछेग कि आप आम को चूसकर खाते हैं या काटकर खाते हैं। पत्रकारा जी आप भी चॉक लेकर आ जाईए। ब्लैकबोर्ड पर कुछ समझाइए और पढ़ाईए। आपके हाथ के तोते उड़ जाएँगें। कहीं आप बेहोश ना हो जाएँ।आपको तो है ए.सी. कमरों की हनक। बात- बात में आप जाती हैं सनक। जिनको दो कौड़ी का आप बता रहीं हैं। आपके बच्चों को भी ऐसे ही टीचर पढ़ा रहे होंगें। आपकी बात सुनकर अपना सिर खुजा रहे होंगें । सोचो क्या बीतेगी उन पर जब तुम्हारे बयान सुनेंगें।। और तुम्हारी मूर्खता पर सर अपना धुनेंगें। क्या भूल गईं कि गुरूँ र ब्रँह्मा, गुरूँ र विष्णु । काहे से कि आपको बकैती करने से फुर्सत हो तब ना। टीचरों को दो कौड़ी का कहने से पहले आपको ये सनद रहे कि नीम और करैला स्वाद में कड़वे जरूर होते हैं। लेकिन इनका सेवन करते रहना चाहिए। सेहत के लिए बढ़िया होते हैं। सुबह- शाम आप इन स्टार्स टीचरों से आकर क्लास लेना शुरु कर दीजिए। आपकी अक्ल ठिकाने आ जाएगी। आप भी कुछ ढ़ँग का थोड़ा- सीख समझ जाएँगीं। मैडम जी खाली एक्सप्लेनर बनाकर ही वो ऐसी -ऐसी ज्ञानवर्धक बातें बताते हैं, कि उनको घँटों सुनने का मन करता है। सभी बातें तार्किक ढ़ँग से समझाते हैं। आपकी तरह नहीं कि आपके चैनल पर बस वही सांप्रदायिकता की गंध मचाने वाले खबरें दिन रात चलते हैं ।
लगेगी आग तो आएँगें कई घर जद में : (व्यंग्य) : महेश केशरी
चमकाईए ये राजनीति को चमकाने का समय है। मीडिया से लेकर राजनीति के गिद्ध आसमान में चक्कर काटने लगे हैं । सबको माँस को चखना है। गिद्धों की दावत आई है। भाँति -भाँति के गिद्ध आसमान में दिखाई देने लगे हैं। सबको डर है। एक खास समुदाय का आदमी मरा है। डर इंसानियत का नहीं है! एक खास समुदाय के आदमी या इनके सगे- संबंधियों की जब मृत्यु होती है। तो सूखा पड़ता है। नाना प्रकार की बीमारियाँ आती हैं। प्लेग, हैजा, सूखा, बाढ़, तूफान। ऐसे लोगों के मरने से प्राकृतिक आपदाएँ आतीं हैं । ज्यादातर इस डर से कुछ ना कुछ बोल रहें हैं। ये एक तरह से समाज की परीक्षा की घड़ी है। इसलिए सबको कुछ -ना- कुछ बोलना चाहिए। लोग आपदा या दुखों, विकिरों या बीमारियों से डरकर बोल रहें हैं। ये वही लोग हैं। जो पिछले साल कर्नल सोफिया पर नहीं बोले। आपदाओं से बच सकें इसलिए भी इस घटना पर बोल रहें हैं। तब सोचना पड़ता है कि ऐसे लोग भी कम दोषी नहीं हैं। जो सिर्फ किसी दैवीय अनिष्ट से बचने के लिए ही कुछ बोल रहें हैं। उनका जमीर उनको बोलने के लिए नहीं कह रहा है। वे ,अपने बाल -बच्चों और पूरा देश- समाज सुरक्षित रहे इसलिए बोल रहें हैं । देश या समाज में कोई अप्रिय घटना ना हो जाए। इसलिए वो कुछ ना कुछ बोल रहें हैं।
सबके हाथ सेंकने का मौसम है। आप भी हाथ सेंक लीजिए। क्या सांसद और क्या विधायक। सब -के -सब राजनीति चमकाने में लगे हैं। सबको मालूम है। जाँच होनी चाहिए । लेकिन जाँच कौन करेगा। जो आदमी इस व्यवस्था से लड़ रहा था। और लड़ते -लड़ते मर गया। यही लोग हैं। जो हमारी पुरानी व्यवस्था में भ्रष्टाचार करते आ रहें हैं। जिसके खिलाफ ही ये लड़ाई लड़नी है। बिल्ली से अहिंसा पर विचार रखने को कहा जा रहा है। ये सुखद संयोग है कि उनके बीच का कोई उनका अपना ही भ्रष्टाचार का विरोध कर रहा था। जो व्यवस्था से सीधे -सीधे लोहा ले रहा था। जिसका मकसद था। अपने लोगों से अपनों की आजादी। ये विचारों की लडाई थी। खुद- से -खुद की लडाई! शासन झुका। किसी रिटायर्ड जज से ही सही जाँच होनी चाहिए । कारण कि उनका एक बड़ा वोट बैंक है। उनसे नाराज हो जाएगा। लिहाजा लीपा -पोती जरुरी है। कुछ लोग जो इस चुनाव में जीतते- जीतते रह गए हैं। वो भी परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और एक करोड़ रूपये दिए जाने की माँग कर रहें हैं। कुछ समय बाद लोग इस बात को भूल जाएँगें। जो आज दुर्घटना है। वो उनके लोगों के लिए जीवण -यापण का साधन बन जाएगा। फिर साल , छह महीने के बाद कौन किसको याद रखता है।यहाँ भाई-भाई का नहीं है। बाप बेटे का नहीं है। फिर कोई क्या कहे।
लेकिन अभी जो समय है। नेता बनने का मुफीद समय है। राजनीति चमकाने का ये अच्छा दौर है। ये दौर ऐसा भी है कि आपकी फ्लाप राजनीति भी इस समय चमक जाए । आज द्वार पर सब लोग आ रहें हैं।
लेकिन हमारे आसपास इतने विवेकवान इतने सामाजिक और इतने जागरूक लोग हैं । जो आज के बाद या आज से पहले की ऐसी किसी घटना पर इसी तरह की प्रतिक्रिया देते रहें हों । पिछले साल कर्नल सोफिया पर भी उनकी ऐसी ही राय थी। देश में जब -जब मॉब -लींचिंग होती है। तब- तब मीडिया में बैठे तमाम तरह के लोग इतने मुखर होकर आगे आते हैं । तब सोचिए ये कैसे लोग हैं। जो इस घटना का विरोध कर रहें हैं। क्या इनका देशभक्ति को लेकर भी सेलेक्टिव नजरिया नहीं हैं। अगर इनकी ग्रँथियाँ लिजलिजी ना होती तो ये कर्नल सोफिया पर भी अनर्गल बयान देने वालों के मुँह नोंच लेते। लेकिन नहीं ऐसा विचार इनका एक खास वर्ग के लिए है। अगर विपक्ष इस पर कुछ ना बोले तो उसपर जातिवादी होने का आरोप लगा दिया जाता है। लेकिन सत्ता में बैठे लोग तो हमारे अपने लोग थे। ये लोग उस समय भी थे। जब कर्नल सोफिया प्रसंग चल रहा था। तब मीडिया कहाँ थी। सरकार मे रहने वाले या सरकार से बाहर रहने वाले लोगों ने उनका विरोध क्यों नहीं किया । उल्टे सरकार अपने कमचारियों की पीठ ठोकती नजर आती है। और ,अपने आपको सही ठहरा रही है। आज ये शेर ज्यादा प्रासंगिक लग रहा है।
" लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में,यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।"
खबर में से खबर ही गुम थी : (व्यंग्य) : महेश केशरी
बहाना था पैसा दिए बिना ही काजू कतली उडाना। इसलिए बहाना दुकान की प्रिंटेडट पन्नी का बनया। लोग समझते हैं पत्रकार साग हैं। माफ कीजियेगा लेकिन हमारे यहाँ के पत्रकार घाघ हैं। पत्रकार जी नाम वाली पन्नी खाना चाहते थे या काजू कतली ये तो विमर्श का विषय हो सकता है। लेकिन जब काजू कतली का भाव पत्रकार महोदय ने सुना। तो वो किसी गुस्सैल सांड की तरह बिदक गए। और मामले को मीडिया में ले आए। बात प्रिंटेड पन्नी को लेकर ठन ग ई। और सोशल मीडिया पर ग्यारह -सौ - चालीस रूपये किलो की काजू- बर्फी की न्यूज मोबाइल पर चल गई। जनता कंफ्यूज थी। क्योंकि खबर में से खबर ही गुम थी। काजू कतली भी भला कोई खबर है। लोगों ने रोज देखा था टी.वी. पर हत्या, लूट और बलात्कार। आम- आदमी न्यूज में देखता था हर दिन चीत्कार।
लोग सोच रहे थे कि देश में लगता है रामराज्य लौट आया है। जो घी, दूध की नदियों की बह रहीं हैं। और लोग गाँजा , शराब , सिगरेट को छोड़कर काजू- कतली खाने लगे हैं। लगता है सचमुच में प्रजा के अच्छे दिन आने लगे हैं।
शौक बड़ी चीज है। लोग मुँह में रजनीगंधा और कदमों में दुनिया रखने का दावा करते हैं।शौक महँगी चीजों का रखते हैं। लेकिन जेब में है फूटी कौड़ी। किस्सा है पत्रकार महोदय का। वो भी काजू -कतली खाने का शौक रखते हैं। लेकिन पैकेट ढ़ीला करने से बचते हैं।लोगों को सबसे ज्यादा अगर किसी न परेशान किया है। तो वो पत्रकारों ने किया है। खासकर जब से रील्स बनाने का ट्रेंड चला है। जहाँ देखो लोग माईक मुँह में घुसेड़ते नजर आते हैं। कैमरा और माईक डराने और धमकाने के साधन बन गए हैं। तुरंत में वायरल किया जाने का डर है। एक पत्रकार महोदय रेस्टोरेंट में घुसे और काजू -कतली खरीदा। काजू -कतली का भाव ग्यारह- सौ -चालीस रूपये किलो का था। जब लोग आलू-प्याज , दूध, चावल , आटा बहुत मुश्किल से खरीद पा रहें हैं। तब पत्रकार महोदय काजू -कतली खरीद रहें हैं। आज की तारीख में पत्रकार और राजनेता ही काजू -कतली खा रहें हैं। बाकी लोग हवा खा रहें हैं। पत्रकार महोदय को समझना चाहिए कि काजू -कतली, काजू -कतली है। सब्जी- भाजी नहीं है ,जो मोलभाव करने में लगे हैं। साग -सब्जी में मोल -भाव किया जाता है। काजू -कतली में नहीं। क्योंकि जो काजू कतली खा सकता है। वो कोई साधारण आदमी नहीं हो सकता। और जो साधारण आदमी नहीं है। वो मोलभाव भी नहीं करता।
ग्यारह- सौ -चालीस रूपये की काजू कतली पर उनको डिस्काऊँट चाहिए। भाई यहाँ तो लोग दस -दस , बीस -बीस लाख रूपये का सूट पहन रहें हैं। और आप काजू- कतली खरीदने में मोलभाव कर रहें हैं!
तेल खाईए कम और बचाईए ज्यादा : (व्यंग्य) : महेश केशरी
क्रिकेट और राजनीति में टाईमिंग का बहुत महत्व है। कवर , एक्स्ट्रा कवर , लाँग ऑन ,लाँग ऑफ पर जहाँ बैटसमैन बढ़िया शॉर्ट लगाकर मैच खेलता है। नि:संदेह वो टीम जीत जाती है। वहीं कवर, एक्स्ट्रा कवर , गली पर क्षेत्ररक्षण, या कैच लपकर बैटसमैन को पेवेलियन का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। क्रिकेट जहाँ कौशल तकनीक और स्फूर्ति का खेल है। वहीं राजनीति वाकपटुता का। राजनीति के दिग्गज लोग गेंद को जनता के पाले में डालने में माहिर होते हैं। इनके मास्टर स्ट्रोक से भला कोई बच सका है । साधारण भाषा में कहें तो चित भी उनकी और पट भी उनकी। कुछ -कुछ ऐसा ही हाल है। पहले यही नेताजी बेरोजगारी पर बोले की देश में बेरोजगारी कहाँ है। पढ़े -लिखे युवा पकौड़े बेचें। लेकिन तेल तो दो। हर कोई तेल माँग रहा है। और नेताजी अब तेल से परहेज करने को कह रहें हैं। अब तेल तो है नहीं। पकौड़े कोई कैसे बेचे। अब नेताजी अपील करते फिर रहें हैं, कि तेल का कम -से -कम का इस्तेमाल कीजिए। ये रातों- रात नहीं हुआ है। समय और परिस्थितियों ने नेताजी को यू-टर्न लेने को मजबूर कर दिया है। बातों का छोर ढूँढ़ना कोई इनसे सीखे। तेल संकट आने पर ये लोगों से कम-से-कम तेल में खाना बनाने की सलाह दे रहें हैं। भाई सीधे- सीधे क्यों नहीं कहते कि खाना उबालकर खाओ। लेकिन उबालकर खाने के लिए भी गैस या तेल की जरूरत पड़ेगी। और पहले से ज्यादा पड़ेगी। उनको साफ- साफ कहना चाहिए। ज्यादा बढ़िया रहेगा कि कच्चा ही खा जाओ। विटामिन्स, मिनरल्स सीधे पेट में । अतिरेक में कुछ भी कह दीजिए। सब चलता है। देश में आसन्न तेल संकट के चलते अलग -अलग दलीलें दी जा रहीं हैं। जगह -जगह कार्यशालाओं का आयोजन हो रहा है। तेल की खपत कैसे कम हो। और महिलाएँ कम तेल में कैसे खाना बनाएँ। इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण को कम तेल और कम ईंधन के इस्तेमाल से हम कैसे लोगों का स्वास्थ्य और लोगों को प्रदूषण से बचा सकते हैं। पर्यावरण की चिंता वैसे लोगों को हो रही है। जिन्होंने बहुतायत में पेंड काटे हैं। मेट्रो की लाईन बिछाने के लिए जँगलों का सफाया किया है। तेल का कम इस्तेमाल वही लोग करने को कह रहें हैं। जो कभी युवाओं को पकौड़े तलकर बेचने की सलाह दे रहे थे। अब दोनों चीजें साथ -साथ तो नहीं चल सकती। पर्यावरण भी बचाएँ, तेल भी। और बेरोजगारी खत्म करने के लिए पकौड़े भी बेचें।
खाधान्न की आज कमी हो जाए तो लोग भूखों रहने के फायदे गिनाने लगेंगे। चीनी का अगर देश में संकट हो जाए। तो लोग मधुमेह की चर्चा करने लगेंगें। फिर बिना चीनी के चाय कैसे बनाई जाए। इस पर लोग कार्यशालाएँ आयोजित करने लगेंगे। फीकी चाय स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अच्छी होती ये समझाया जाने लगेगा।
स्लोगन देखिए. (1) कम तेल की थाली। स्वस्थ देश और खुशहाली।
(2) कम ईंधन के खपत से बने पौष्टिक आहार। भोजन प्रदर्शिनी में आपको आग में पके हुए शकरंकद, आग में ही भूने हुए आलू। कटे हुए खीरे,गाजर की सलाद, मूली की चटनी , पके हुए बेर , उबले हुए चावल, रात में भिंगोयी हुई दाल। इसके फायदे स्वरूप आपको गिनाया जाएगा। इनके सेवन से बी.पी.और कोलेस्ट्रोल की आजीवण समस्या नहीं रहती है ।
(3) मुर्गा -चावल, मछली- भात, एग -करी, चिकन - बिरयानी, ये सब अब आप स्वप्न में देख सकते हैं। खा नहीं सकते। क्योंकि इनमें ज्यादा तेल और ज्यादा ईंधन लगता है। ये चीजें हमें विकसित देश बनने में बाधा पहुँचा सकती हैं। लिहाजा त्याग करें।
एप्स्टीन फाईल और ड्राई फ्रूटस : (व्यंग्य) : महेश केशरी
सेहत गई तेल लेने। बस पेट भरना चाहिए। हम वजन जीवी जीव हैं। वजन मिलने पर हम आप से आप आगे बढ़ने लगते हैं। हम यदि अपना चेहरा देखें तो हर देशवासी का चेहरा आलू की तरह दिखाई देगा। टूथपेस्ट में भले ही नमक हो। लेकिन शरीर में तो आलू ही है। देश के प्राय: सभी हिस्सों में आलू को दबाकर खाया जाता है। लिहाजा हम लोगों के चेहरे आलू की तरह दिखाई देते हैं। आर्थिक राजधानी मुँबई की रीढ़ ही आलू है। बड़ा पाव यानि बड़ा में पाव। यानी पावरोटी और आलू चोप। फ्राईड क्रिस्पी और टेस्टी। प्राय: हर मराठी की पसंद।
साऊथ में चले जाईए तो ढ़ोसा और इडली है। वहाँ भी आलू की भरमार ही है। हमलोगों के खाने में कहाँ सलाद, कहाँ अँगूर , केले , सेब , नाशपति, संतरे हैं। फल हमारे यहाँ लोग अस्पताल के बेड पर ही खाते आपको मिलेंगें।
मजदूर नगरी चले जाईए तो दाल , भात और आलू का चोखा। बंगाल में चले जाईए तो आलूचोप और मूढ़ी। कहीं आलू की टिक्की चाट। हमारे यहाँ के लोग कामचलाऊ जीवी जीव हैं। काम चलाने से मतलब रखते हैं। बस पेट भरने से मतलब है। कुछ- ना मिला तो चलते -चलते ठेले से दो समोसा ले लिया। विकासशील देश के मितव्ययी नागरिक। जेब प्रधान है , पेट गौण है। लक्ष्मी से इतना प्रेम है कि पेट गौण और जेब प्रधान हो गया है।
उनको खाने में बस वजन से मतलब है। कोई चीज बस क्वान्टिटी में मिलनी चाहिए। सस्ती होनी चाहिए। बस हो गया काम। सेहत गई तेल लेने। काम का दबाव इतना है कि मुंबई लोकल पकड़ते -पकड़ते लोग अखबारों में रैप बड़ा पाव खा रहे होते हैं। बस पेट में कुछ मोटा सा वजनी डाल देना है़। पेट का चाहे जो हो। बस पेट चार -छह घँटे कुछ खाने के लिए ना माँगे। बीच में अगर कुछ खाने को माँग दिया तो डाल दो उसमें दो- चार -कप चाय। या फिर से दो बड़ा पाव। बंगाल में डालते जाओ मूढ़ी में आलू चोप या छोला। इसी आम के सीजन में जापान गया आम वापस लौट आया है। कारण की जापान के खाध- मानकों पर हमारे यहाँ के आम फेल हो गए थे । लिहाजा उनको अपने यहाँ से लौटा दिया गया। हमारे यहाँ सेहत के लिए कोई कोई मानक ही नहीं है। इंजेक्शन लगा कद्दू , कर्बाईट का पकाया हुआ आम। सब चल जाता है। विकसित देशों के इंजेक्शन और दवाईयों का प्रयोग सबसे पहले हमारे यहाँ भेजकर हमारे यहाँ के लोगों पर किया जाता है। दरअसल हम प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले चूहे हैं। जिसपर विकसित देश अपनी दवाईयों और इंजेक्शन का टेस्ट करते हैं।
और देशों में लोगों का लीविंग ऑफ स्टैंडर्ड है। खाने -पीने की च्वाईस है। क्या खाना है। और कितना खाना है। इसके लिए एक प्लानिंग है। यहाँ तो लोग शादी -पार्टी और फ्री के खाने का इंतजार करते हैं। विकसित देशों में लोग पौष्टिक आहार लेते हैं। इसलिए सौ -सवा- सौ साल जीते हैं। हमारे यहाँ साठ -सत्तर साल में ही निपट जाते हैं। हम आखिर खाएँ -तो -खाएँ क्या। लौकी में इंजेक्शन डालकर रातों -रात दोगुना किया जा रहा है। पटल को हरे रंग से रंगा जा रहा है। आम कार्बाईट में पकाया जा रहा है। इसका एक कारण ये भी है कि डिमांड ज्यादा है। और सप्लाई कम है। लिहाजा डिमांड और सप्लाई के चैन को दुरूस्त करना जरूरी है।
हम भारतीयों को ये भी लगता है कि फल खाने से आखिर मिलता क्या है। कुछ नहीं। लोग फल तब खाते या खरीदते हैं। जब या तो बीमार पड़ते हैं। या किसी रिश्तेदार से मिलने के लिए जाते हैं। उस समय भी जेब पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रिश्तेदारों से मिलने के लिए जाते समय सबसे ज्यादा खरीदे जाने वाले फलों में केला नंबर एक पर आता है। बीस या पचास रुपये में एक दर्जन। अगर एक- दो -दर्जन केला पन्नी में डाल दो तो पूरा बैग ही फूल हो जाता है। अँगूर- सेब मँहगें होते हैं। लिहाजा रिश्तेदारों के यहाँ लोग इनको ले जाने से बचते हैं। दूसरा रिश्तेदारों के यहाँ गर्मियों में ले जाया जाने वाला जो फल है। वो आम है। आम लोगों की खास पसंद। आम फलों का राजा है। इसलिए रिश्तेदार भी आम को हाथों -हाथ लेते हैं। फल ना खाने या ना खरीद सकने के पीछे इन एप्सटीन फाईल वालों का भी हाथ है। इनके शासन में आम- आदमी ने कभी इतनी कमाई ही ना कि की वो फल खरीद सके। या फल खा सके। हमारी महिलाओं को कई गुण विरासत में मिले हैं। हमारे यहाँ दूध मेवा ,घी , चाहे जितना मँहगा हो जाए।कोई बात नहीं। लेकिन गाजर का हलवा घर में तभी बनाया जाएगा। जब गाजर दस रुपये किलो हो जाएगा।
फल ना खाने का हम भारतीयों में अगर चलन है। तो उसका भी एक कारण है। लोग अगर दूसरों को सेब, संतरा, बेदाना खाते देख लें तो यही कहते हैं।क्या बात है आजकल सेहत बनाने में लगे हो।
औसत भारतीय तो कभी साल भर में सौ- ग्राम- अँगूर या ढाई -सौ -ग्राम सेब खरीद ले। तो एक तोला सोना खरीदने का सुख पाता है। हम भारतीय सस्ती चीजें दबाकर खाते हैं। उदाहरण के लिए सौ- -रूपये के ढ़ाई- किलो आम। उस पर भी कोई अगर ये पूछ ले कि भाई आज आम लिया है। कैसे किलो लिया। देखियेगा सामने वाला यही कहता मिलेगा कि भाई सौ -रूपये में ढ़ाई या तीन -किलो मिला तो ले लिया। नहीं तो आम कौन खाता है। ड्राई -फ्रूटस तो एप्स्टीन फाईल में जिनके नाम हैं वे लोग ही खाते हैं ।
फल ना खरीदने और ना खाने का एक कारण और भी है, कि हम सब अतीत जीवी जीव हैं। हमें अतीत के प्रति सम्मोहन है। हमारे यहाँ लोग चाहे कितने भी बड़े हो जाएँ। अतीत प्रेम छूटता ही नहीं। हम दस -दस कार खरीद लें। ए. सी. रूम में रहें। लाखों का मोबाइल इस्तेमाल करते हों। लेकिन जब मँहगें फलों की बात आती है। तब नेपथ्य से कोई औरत या कोई बूढ़ा निकलकर सामने आता है। वो तब हमें बताने लगता है कि एक समय में हम लोग बहुत गरीब थे। खाने -खाने को मोहताज थे। बहुत मुश्किल से दो- वक्त की रोटी जुगाड़ कर पाते थे। ये लाईन सुनते ही हम भारतीयों की फलों के प्रति जो थोड़ी- बहुत श्रद्धा बची होती है। वो भी जाती रहती है।
सोना होने का मतलब : (व्यंग्य) : महेश केशरी
नहीं दिखाई देते अब सोने की तरह के लोग। अब तो बच्चों के नाम भी लोग सोना नहीं रखते। आदमी रंग छोड़ता है। लेकिन सोना नहीं। सोने की तरह के जिन लोगों को सोना समझा जाता है। वे और कुछ तो हो सकते हैं। लेकिन सोना नहीं। सोना होने के लिए तपना पड़ता है। सोना होने के लिए राजगद्दी का त्याग करना पड़ता है। वनगामी होना पड़ता है। जहाँ पैरों को काँटे चुभते हैं। जहाँ कंद- मूल , फल- फूल खाकर जीवण -यापण करना पड़ता है। सोना होने के लिए त्याग करना पड़ता है। सोना होने के लिए एक भाई दूसरे भाई के खड़ाऊँ को राजगद्दी पर रखकर वर्षों इंतजार करता है। सोना होने के लिए पुत्र के वियोग में पिता क्षण- क्षण मरते हैं। सोना होने के लिए अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। सोना होना दूसरों से प्रेम करना होता है। दूसरों के लिए चीजों को छोड़ना ही सोना होना है। सोना होने का मतलब गेहूँ की बालियाँ होना है।सोना होने के लिए धरती की मिट्टी होना होता है। सोना होने के लिए प्रसव की वेदना झेलनी पड़ती है। सोना होने के लिए माँ होना पड़ता है। सोना होने के लिए दूसरों का पेट भरना होता है। सोना होने के लिए हरा होना कतई नहीं है। सोना होने के लिए पल- पल गलना है। दूसरों के लिए खुद का मुरझाना है। सोना होने के लिए दुख में पड़कर पीला हो जाना होता है। सोना होने के लिए जलना है किसान की तरह धूप में। सोना होने के लिए गलना पड़ता है। सोना होने के लिए घिसना पड़ता है। आदमी के आगे सोने की भला क्या बिसात है। लेकिन फिर भी सोना- सोना है। आदमी- आदमी है ! सोना के सामने आदमी को लोग कम आँकते हैं। देखा जाए तो आदमी सोना कमा सकता है। लेकिन सोना आदमी नहीं कमा सकता। लेकिन आदमी सोना से ज्यादा गिर गया है। दस पैसे में ईमान बदल लेता है। ऐसे लोग बहुतायत में हैं। जो सोने की तरह दिखाई तो देते हैं। लेकिन सोना नहीं हैं । आदमी को दुख सुना सकते हैं। आदमी के साथ हँस- बोल सकते हैं। सोना बक्से में पड़ा रहता है। तीज - त्योहारों या उत्सवों में आदमी की शोभा बढ़ाता है।
सोना इसलिए भी पहना जाता है कि आदमी का वजन पता चल सके। आदमी का अपना कोई वजन बचा ही नहीं है। इसलिए आदमी सोना पहनकर अपना भाव बढ़वाता है। सोचने की बात है फिर आदमी का वजन कहाँ बचा है। आदमी निहायत हल्का हो चुका है। दोस्ती में बेईमानी। रिश्तों में पाप । छल छद्म के सहारे जीवण की नैया को चलाना। हल्का होना नहीं तो क्या है।
जीवित चीजों का भरोसा नहीं किया जा सकता है। खासकर आदमी का। जो कभी भी बदल सकता है। गिरगिट फीका है रंग बदलने में। आदमी गिरगिट से ज्यादा तेजी से रंग बदलता है। सोने पर लोग आँख मूँदकर भरोसा कर सकते हैं। लेकिन आदमी पर नहीं। सोना गाढ़े वक्त में काम आता है। अपने लोग आजकल गए बीते हो हो गए हैं। रंग दिखाने लग गए हैं। आप अगर असमर्थ हैं तो लोग आँखें फेर लेते हैं। ये आदमी का मिट्टी होना नहीं तो क्या है। वैसे लोग जो कभी हमारे अपने थे। वे हाथ खड़ा कर ले रहें हैं।
कुछ लोग ऐसे होते हैं। जिनका वजन सोने से कतई कम नहीं होता है। बल्कि सोना भी ऐसे लोगों को देखकर शर्माने लगता है। जिनका वजन सोने से ज्यादा बहुत ज्यादा होता है।
ऐसे लोग भी हैं जो सोने से ज्यादा कीमती हैं। जिनपर आँख मूँद कर भरोसा किया जा सकता है। ऐसे लोग खुद सोना हैं।भले ही उनका नाम सोना ना हो। इसीलिए ऐसे लोग दोयम दर्जे के घटिया लोगों को भी सोना समझ लेते हैं। ऐसे लोग सोने से भी खरे होते हैं। ये किसी ताप पर जला लो अपना रंग नहीं छोड़ते। वहीं कुछ लोग मँहगें ब्रांडेड कपड़ों की तरह होते हैं। वैसे तो उनको देखने से पक्के रंग के होने का भरोसा होता है। लेकिन ऐसे लोग ही रंग छोड़ने वाले होते हैं।
खाली बैग के मायने : (व्यंग्य) : महेश केशरी
खाली बैग को देखकर कभी ये ना सोचा कि ये बैग खाली क्यों है। और इसका हम पुरूषों से क्या संबंध है। राह चलते जगह -जगह दुकानों में टँगें बैग, ट्रोली, अटैची पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन इस बार श्रीमती जी मायके चलीं गईं तो खाली बैग पर नजर पड़ी ।
खाली बैग में एक कच्छा था। इस खाली बैग की बाबत मैनें पत्नी जी को फोन किया कि ये खाली बैग और उसमें खाली कच्छा क्यों पड़ा है। चूँकि, मैं हर दामाद की तरह अपने ससुराल का दामादी था। लिहाजा छुट्टियाँ बीतने पर मुझे श्रीमती जी को लाने उनके मायके जाना था। मैनें फोन मिलाया। पूछा ये खाली बैग और इसमें खाली कच्छा क्यों रखा है। फोन पत्नी जी ने उठाया था। कारण बताते हुए उन्होनें बताया की कुछ चीजें प्रतिकात्मक तौर पर समझीं जातीं हैं। इसीलिए इशारे से समझ लो। उनके इशारे को मै समझ ना सका। पूछा लिया देवी जी मैं तो ऐसे ही सीधा -साधा आदमी हूँ। सीधी बातें समझ नहीं पाता। प्रतीकात्मक बातें क्या समझूँगा। तुमने मेरी इतनी भी कद्र ना कि की सालों को एक कच्छा ही लाने को कहतीं। प्रिये बोलीं कच्छों की कोई बात नहीं है। आप कच्छे लेकर आएँ तो आएँ । नहीं तो बिना कच्छों के भी आ सकते हैं। अब ये उनसे तो हो ना सका की सालों से कहकर दो कच्छे ही मँगवा देतीं। मेरे इतना कहने पर श्रीमती जी बोलीं। कच्छों की कौन सी बात है। कच्छे यहीं यहाँ बगल के बाजार में मिल जाते हैं । आ जाओ कच्छे बाजार से मँगवाती हूंँ। अभी तक उन्होनें कच्छों के लिए किसी को भी नहीं दौड़ाया था। अगर नया -नया दामाद होता तो एक क्या चार -चार कच्छे आ जाते। लेकिन मैं पँद्रह साल पुराना दामाद था। एक मित्र को खाली बैग और उसमें खाली कच्छे की बात बताई । मित्र मेरा विश्लेषक था।
विश्लेषक मित्र खाली बैग और उसमें पड़े खाली कच्छे का विश्लेषण करने लगा। खाली बैग का मतलब था। आपको खाली- खाली आना है। और ससुराल से श्रीमती जी के कपड़ों का भारी बैग ले जाना है। इतने समय में हमने इतना ही विकास किया है, कि अपने घर से खाली बैग , और वहाँ से भारी- बैग लेकर आना है। हम शादी के बाद के बाद इतने ही बदले हैं कि दामाद से अब गदहे हैं। हमारा काम बैग और उसमें मौजूद सामना को ढ़ोना है।
खाली बैग और कच्छों का विश्लेषण अगर किया जाए। तो प्रतीकात्मक तौर पर आपके खाली बैग के होने का मतलब अब आप परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियाँ सँभालते -सँभालते खाली बैग की तरह खाली हैं। खाली बैग की तरह ऊपर से फूले हैं।
कहाँ है वो बैग लाइए और मुझे दिखाईए कि उसमें और कुछ तो नहीं है। मैं सामने मेज पर पड़े बैग को उठा लाया। विश्लेषक मित्र को बैग थमाया। विश्लेषक मित्र ने किसी खोजी दस्ते की तरह बैग को बहुत सावधानी से खोला। और कच्छे को निकाला। देखा सचमुच में खाली बैग में बस एक ही कच्छा था। विश्लेषक मित्र ने मेरे कच्छे को आगे -पीछे घूमाकर देखा। कच्छे में एक बड़ा सा छेद था। मैनें कहा ये तो मैनें देखा ही नहीं था।.मैनें संशय से देखते मित्र की आँखों में देखा। मित्र हँसा कि भाई एक तुम्हारे कच्छे में ही छेद नहीं है। दुनिया के अर्थशास्त्र को चलाने वाले बड़े- बड़े अर्थशास्त्रियों के कच्छे में भी छेद है। दुनिया का हर दूसरा - तीसरा आदमी फटे कच्छे पहनकर घूम रहा है। कोई मित्र अगर अपने दूसरे मित्र का कच्छा चेक करे। तो उस मित्र को दूसरे मित्र की फटेहाली का पता चले। खैर, घबराने कि बात नहीं है। कच्छे में तुम्हारे नहीं मेरे भी छेद है।
मायका प्रेम : (व्यंग्य) : महेश केशरी
आदमी जिस पर विश्वास करता है। वही आपके पीठ में छुरी भोंकता है। हम पति इस स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ हैं। जिनको हम पालते हैं। वो अक्सर देखिएगा हमारे नहीं होते। उनका लगाव ससुराल से ज्यादा मायके से होता है। मायके वाले अगर आ जाएँ तो बारह बजे रात में बिरयिनी बनने लगे। और अगर घर के लोग एक कप चाय दस बजे रात को बनाने को कह दें। तो उनको आलस आने लगता है। औखों के आगे अँधेरा छाने लगता है। हाथ - पैर काँपने लगते हैं। उनके सिर मे़ दर्द होने लगता है। मैं अपने ससुराल के लोगों द्वारा पिलाई गई उस बूटी की खोज में लगा हूँ। जिससे शादी के बाद भी उनका लगाव नब्बे- दस के अनुपात में है। वो नब्बे फीसदी मायके के और दस फीसदी ससुराल के फेवर में रहती हैं । मेरी तो बात ही निराली है। अलग तरह की होती हैं वो लड़कियाँ जो पति के साथ जँगलों में रह लेतीं हैं। रूखा- सूखा खाकर जीवण बिता लेती हैं । जँगल की छोड़िए वो तो मेरे साथ कस्बे में भी नहीं रहना चाहतीं। सबसे करीबी रिश्तों में पति - पत्नी का रिश्ता होता है। लेकिन इस रिश्ते में भी आप आँखें बँद करके भरोसा नहीं कर सकते। इसका उदाहरण मेरे पास है। कुछ पैसे श्रीमती जी को शुरूआती दिनों में दिए थे। वो पैसे उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार को दे दिए। पैसों की बाबत पूछने पर पता चला कि वो पैसे मैनें फलानी को दे दिए। मेरा सिर चकराया। मैं घबराया। बोला मुझसे बिना पूछे तुमने वो पैसे उनको क्यों दे दिए। बताऊँ तुम्हारी सास को कि तुम यहाँ से अपने मायके वालों की मदद करती हो। श्रीमती जी घबराईं, गिड़गिड़ाईं। मत बताना मम्मी जी को। लेकिन ऐसा मेरे साथ हुआ था। कुछ मौगा किस्म के पति होते हैं। जो पत्नी की हाँ- में -हाँ मिलाते हैं। माँ-बाप से छुप- छुपाकर ससुराल वालों की मदद करते हैं। लेकिन जब सब कुछ दे देते हैं। और सामने से कुछ नहीं मिलता है। तब भी उनके अक्ल पर पर्दा पड़ा रहता है। और अंत में ससुराल वाले ठेंगा दिखा देते हैं।
पँद्रह साल शादी को हो गए। लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि पत्नी हमारी ना हुईं। उनका झुकाव हमेशा मायके वालों की तरफ रहा है। सोचता हूँ कि किसी कुत्ते को भी दो रोटी दो तो वो तीसरे दिन से खुशामद करने लगता है। लेकिन श्रीमती जी का मिजाज बिगड़ा हुआ है। उनका मन हमारे एरिया में नहीं लगता है। उनको मेट्रोपोलिटियन सिटी पसंद है। हर बात मे मेरे कस्बे में रहने का ताना मारतीं हैं। श्रीमती जी अपने दिए पैसों को जोड़ -जोड़ कर रखतीं हैं। और जब -तब याद दिलाती रहतीं हैं कि मेरे इतने पैसे आपके पास बकाया हैं। लेकिन ससुराल के लोग मुँह खोले ना खोलें। मेरे दिऐ पैसे उनको दे आतीं हैं। पूछने का मन करता है कि जिस तरह से तुम अपने दिए पैसे मुझसे तकादा करके हमेशा याद दिलाती रहती हो । क्या उसी तरह से मायके में दिए पैसों की भी याद दिलाती हो। आखिर पति को दिए पैसों के लिए तगादा। और ससुराल में दिए पैसों के लिए तगादा क्यों नहीं। आखिर ये भेदभाव ससुराल और मायके के लोगों से क्यों। इस तरह की हरकतें देखकर दिल कोई बड़ा फैसला लेने को नहीं करता। सच कहता हूंँ पत्नी के नाम से कुछ खरीदने को नहीं करता। कुछ लोग अजीब होते हैं । अपना दिल निकाल कर भी दे दो। तब भी आपके ना होंगें। ऐसे लोगों में मेरी श्रीमती जी भी हैं। अब किस पर विश्वास किया जाए। जिसको आप अपना सबसे अजीज मानते हैं। वो ही आपके शहर,आपके कस्बे का मजाक उड़ाता है। हम सरे राह अगर कलेजा भी निकल कर रख दें। तब भी श्रीमती जी हमारी ना हों। अगर हम श्रीमती जी के लिए फूलों की जगह अपनी हथेलियाँ भी बिछा दें।.तब भी वो हमारी हथेलियाँ कुचलकर मायके की तरफ कूच कर जाएँ। श्रीमती जी कभी हमारी ना होंगीं। चाहे हम जो भी कर लें। हम वफा पे वफा करते रहे। और वो सीने पर हमारे चाकू मलते रहे। सोचता हूँ हम पतियों की वफादारी में कहाँ कमी रह जाती है । जो श्रीमती जी हमारी नहीं होतीं। उनके एहसान फरामोशी के क्या कहने। जिस थाली में खातीं हैं।उसमें ही छेद करतीं हैं। जिनको अपनी ससुराल से ज्यादा प्रेम अपने मायके से है। ससुराल के लोगों में काँटे लगे हैं। वाह -रे उनका मायका प्रेम। जिन लोगों पर हम सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं। वे लोग ही हमें धोखा देते हैं।
चिंगारी क्यों भड़काती हो : (व्यंग्य) : महेश केशरी
यूँ तो पत्नी जी का मिजाज तीन सौ बीस दिन पचास डिग्री के टेंपरेचर पर रहता है। लेकिन जैसै ही मायके जाने का दिन नजदीक आता जाता है। वो ए . सी. मोड में चली आती हैं। अब उनके मिजाज में दिखने लगती है ,तरावट। बोली में दिखाई देखने लगती है मिलावट। कड़कना, गरजना अब होने लगा है कम। लगता है आ गया है मायके जाने का मौसम। वो पुरानी बातों के लिए माँगतीं हैं माफी। ये अचानक से क्यों बदला-बदला है मौसम। क्यों दिखने लगी है मुझे इस गर्मी में हरियाली। कहीं मुझे हुई तो नहीं है रतौंधी की बीमारी। श्रीमती जी की इसमें कोई चाल है। जो नाक पर बैठने ना दे मक्खी। वो क्यों कर रही है मेरी मुँह झक्खी। वो माँगती हैं ए. टी. एम.कार्ड और स्कूटी की चाभी। ताकि निकाल लाएँ ए.ट.एम. से कैश। और मायके जाकर करें वो मेरे पैसों पर ऐश।अब नहीं दिखती उनके चेहरे पर कोई थकावट। वो करने लगतीं हैं अब अपनी सजावट। मैचिंग के झुमके , मैचिंग की साड़ी। श्रीमती जी जाने वाली हैं,अपने बाडी। अब चिपकी रहती है चेहरे पर हमेशा मुस्कान। नही दिखती चेहरे पर सालों भर रहने वाली थकान।
मैं जानता हूँ उनकी खुशी का राज। चूल्हे- चौके से मिलेगा उनको निजात। बर्तन घिसने से मिलेगी आजादी। कपड़ों पर अब नहीं फेरना पड़ेगा हाथ। बार- बार चाय बनाने से मिलेगी मुक्ति। इसीलिए मायके जाने की लाईं हैं वो युक्ति। झाड़-पोंछकर वो निकालतीं हैं बैग। सहेजतीं हैं साड़ी, बिंदी , ब्लाऊज और सलवार। क्योंकि उनको छुड़ाना है मेरा बुखार। साल भर की जो कमाई थी अब जाएगी लूट। गहनों पर निकली है भारी छूट। वो मलतीं है चेहरे पर ढ़ाई- सौ- ग्राम पाऊडर। लगतीं हैं अपने आँखों में पच्चीस ग्राम काजल। अब वो चालीस की नहीं अट्ठारह की दिखाई देने लगतीं हैं। पार्लर जाकर मैनीक्योर- पैडीक्योर करवातीं हैं। मायके जाने से पहले उनकी नजर मेरे बालों पर अचानक से पड़ जाती है। साल के बस इसी महीने में वो मेरे बालों में रंग देती हैं। बाल जो मेरे झड़ चुके हैं। लेकिन मेरे कुछ बालों में लगातीं हैं खिजाब। जब लगता है बालों में मेरे खिजाब। तो सचमुच में मुझे अक्षय खन्ना होने की फीलिंग आती है। मैं श्रीमती से पूछता हूँ। तुम हर- बार मायके जाने से पहले मेरे बालों में रंग क्यों भर जाती हो। खाम - खाँ सोए हुए अरमानों की राख में चिंगारी क्यों भड़काती हो। श्रीमती जी समझातीं हैं। तुम्हें नहीं , तुम्हारे बालों में मुझे है खिजाब की जरूरत। ताकि तुम ना लगो बदसूरत। जब लेने आओ मुझे वापस। पड़ोसी ना कहने लगे कि ये लड़की का बाप है या किसी जन्म का श्राप है। मन -ही -मन मैं भजने लगता हूँ चालीसा। टलने वाली है बला। सूखे गले को मिलने वाली है तरावट। जाकर लाऊँगा अभी चिल्ड बियर। दोस्तों के साथ होगी दारू की पार्टी। श्रीमती जी के जाते ही चलाऊँगा डी. जे.।
श्रीमती जी लगाती हैं होंठों पर किलो लिपस्टिक। आँखों पर लगातीं हैं रे -बेन का गोगल। फिर ओला कि टैक्सी में होतीं है सवार। कहतीं हैं जल्दी ही लौटती हूँ। इधर- उधर की कुछ सोचना भी मत नहीं तो आते- आते उतार दूँगीं तुम्हारा बुखार।