व्यंग्य (61-78) : महेश केशरी

Hindi Vyangya (61-78) : Mahesh Keshri

दीपावाली और मिठाई : (व्यंग्य) : महेश केशरी

दीपावली पर साफ -सफाई की बात होनी चाहिए। लेकिन बात तेल की करते हैं। बिना तेल के दीपावली नहीं मन सकती। दीयों के लिए तेल जरूरी है। बिना तेल के उजाला कैसे हो? लेकिन उजाले से पहले तियन यानी सब्जी के बारे में सोचना है। दीपावली तो आज है। कम बेसी दीया जलाकर भी काम चल सकता है। लेकिन साग- सब्जी के लिए तो तेल चाहिए। सब्जियाँ वैसे भी मँहगीं हैं। सब्जियाँ नहीं खरीद सकते। लेकिन चोखा बनाने के लिए भी तेल चाहिए। कम -बेसी लेकिन चाहिए।

जिसके माथे में जितना तेल है। उसको लोग और तेल देने में लगे हैं। कहा भी गया है। बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख। आज का समय बहुत खराब है। जिनके सिर सूखे हुए हैं। उनके सिर में तेल देने के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। तेल वैसे लोगों के सिर में डाला जा रहा है। जिनका सिर पहले से ही तेल से सना है। खाए हुए लोगों को ही खाने के लिए पूछा जा रहा है। भूखों को कोई नहीं पूछ रहा है। खाने वाला खा- खाकर मरा जा रहा है। लेकिन‌ खिलाने वाला चाहता है कि वो और खाए। खा-खाकर मरे। जिनके घरों में तेल नहीं है। वो तेल के बारे में ही सोच रहें हैं कि कैसे घर में साग-सब्जी बनेगी।

दीपावाली है तो चापलूसों की निकल पड़ी है। जो जितना बड़ा चापलूस है। मालिक उसको उतना ही बड़ा पैकेट दे रहें हैं। जो चापलूस नहीं हैं। उनकी गिनती भी नही हो रही है। वे वेतन तक ही सीमित हैं। ज्यादा से ज्यादा दो -चार लड्डूओं से काम चला रहें हैं।

त्योहारों का सीजन है। तो लोग ले -दे भी रहें हैं। लेने- देने का भी ये अजीब दौर है। मिठाईयों को मुँह देखकर दिया जा रहा है। काम करने वालों का पैकेट छोटा है। खास लोगों का पैकेट अलग है। जिनको छोटा पैकेट मिला है। वो छोटे लोग हैं। पाँच -दस या बारह हजार की नौकरी करने वाले। उनके नौकर, खानसामा, माली, ड्राईवर को तथाकथित बड़े लोग छोटा पैकेट पकड़ा रहें हैं। छोटे पैकेट देकर वो अपना ओछापन भी दिखा रहें हैं। ये वही छोटे लोग हैं। जो आपके लिए चौघड़िया हर दिन चौबीसों घँटे खड़े रहते हैं। महीनों से आपके घर को साफ कर रहें हैं । साग -सब्जी ला रहें हैं । बच्चों को स्कूल ला रहें हैं, ले जा रहें हैं। लेकिन उनके लिए आपके दिल में जगह नहीं है। काहे से कि वे छोटे लोग हैं। आपके यहाँ काम करने वाले पिद्दी, बौने।

जो आपका मुकाबला कम-से-कम इस जन्म में तो नहीं ही कर सकते। नहीं वे छोटे लोग हैं। इसलिए भी कि वो आपकी तरह इसकी टोपी उसको पहनाने का हुनर नहीं जानते। वो आपकी तरह नहीं हैं। वो ऐसे लोग हैं जो अपना सौ फीसदी आपको देते हैं। बावजूद इसके कि वे लोग कामचोर हैं। बकौल आपके अनुसार। उनके अपने घर गँदे हैं। उनके घर में अँधेरा है। लेकिन आपके घर में वो लड़ियाँ लगा रहें हैं। आपके जी में कभी नहीं आया कि चलो त्योहार है। उनको अपने यहाँ का कोई ओल्ड फैशन का ही सही कोई चीज दे दें । जो दुकान में बिक नहीं रहा है। डेड होने वाला है।

उनको भी आपकी तरह से खाने- पहनने का शौक है।वो आपकी बराबरी तो नहीं कर सकते। लेकिन‌ मोटे -महीन में काम चला सकते हैं। लेकिन छोटे लोग से छोटे तो आप लोग हैं। जिनकी गाँठ से पुराने बेकार हो गए चिल्लर ( कपड़े ) नहीं निकलते। वैसे लोगों के लिए जो दिन भर में आपको पाँच बार सलाम बजाते हैं। आपके उठने से पहले आपके लिए कार का दरवाज़ा खोलकर खड़े हो जातें हैं। जो दिन भर में बीसियों बार आपका टेबल साफ करतें हैं। जो दिन भर आपको चाय- कॉफी परोसते हैं। जिनको साल नहीं सालों हो गए आपकी चाकरी करते।

लेकिन आपके दिल में कभी ना आया कि उनको ढ़ँग का एक कपड़ा ही खरीद कर दे दें। सोचना बड़ा मुश्किल है। कौन है छोटा आदमी आप या आपकी सेवा में लगे ये सेवक। जो आपको मालिक -मालिक कहते नहीं अघाते। बड़ा पैकेट आपने उन लोगों के लिए सजाकर रखा है। जो मुँह पर राम बगल में छुरी रखते हैं। जो आपका हित से ज्यादा अहित सोचते हैं। सही मायने में अगर देखा जाए तो आप मित्रों से कम और शत्रुओं से ज्यादा घिरे हुए हैं। समय रहते पहचानिए ऐसे लोगों को जो आपकी चापलूसी करते नहीं थकते।

बलि के सूत्रधार : (व्यंग्य) : महेश केशरी

वो मरकर बच गए हैं इसलिए लोग भी खुश हैं। खुश हैं इसलिए चक्रम जी भी अपने शुभचिंतकों के लिए कुछ करना चाहते हैं। वो ईश्वर का शुक्रिया जान देकर करना चाहते हैं। चाहे जान उनकी हो या बकरे की ! अब उनकी जान बच गई थी ये क्या कम बड़ी बात थी। हम भारतीय का मरनी- जीनी, शादी- विवाह, उत्सव-त्योहार में खाने -पीने में कोई सानी नहीं है। अपनी सारी ऊर्जा हम यहीं खपा देते हैं। तो मरकर बच जाना ये भी तो एक उत्सव है। जब हम जन्मदिन का केक खाते हैं। मृत्यु भोज के दिन की पूड़ी -सब्जी खाते हैं। तो मृत्यु को चकमा देना खेल थोड़ी है।उसका भी उत्सव होना चाहिए। इस उत्सव को मनाने का और भी कारण था। तो आईए जानते हैं कि ये उत्सव किसका है। इसके सूत्रधार कौन हैं। अरे भाई इसके सूत्रधार चक्रम जी हैं। जिनके साथ सड़क दुर्घटना जैसी घटना हुई थी। तो हुआ ये था कि चक्रम जी के शरीर से बहुत रक्तस्राव बहुत हुआ था। लिहाजा उनको लहू की जरूरत थी। जिसकी आपूर्ति तुरंत की जानी चाहिए थी।

इसके लिए उनको बकरे की बलि देनी थी। और ईश्वर को प्रसन्न करना था।

चक्रम जी मरते -मरत बचे हैं। चारों तरफ चक्रम जी के साथ हुई सड़क दुर्घटना की ही चर्चा है। जिसको देखो वही इस बात पर चर्चा कर रहा है कि चक्रम जी को जितना जोर से धक्का लगा था। वो कोई मामूली धक्का नहीं था। ऐसी दुर्घटना अगर किसी और के साथ हुई होती तो वो स्वर्ग सिधार गया होता। लेकिन चक्रम जी जीवित हैं।

यही नहीं कुछ लोग तो दो- कदम और आगे बढ़कर बातें कर रहें हैं। जहाँ सड़क दुर्घटना हुई है। उस जगह को लोग भूतिया सड़क के नाम से भी जानते हैं। जितनी मुँह उतनी बातें। कुछ लोग सड़क को दोष दे रहें हैं। कुछ लोग उस खास या विशेष जगह को दोष दे रहें हैं। जहाँ हर महीने -दो -महीने में कोई ना कोई सड़क दुर्घटना होती है। इसीलिए बहुत से मुँह ये भी कहतें हैं कि फलाने का भूत वहाँ रहता है। और वहाँ उसकी अकाल मौत हुई थी। लिहाजा हर सड़क दुर्घटना उसी खास जगह पर होती है।

कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि वो जो सड़क पर का भूत है उसको बकरे की बलि चाहिए। भले ही भूत के बहाने अपना पेट भरें। बदनाम सड़क और भूत को ही होना है।

चक्रम जी और लोगों के मुताबिक भूत को बलि चाहिए। तभी ये दुर्घटनाएँ रुकेंगीं। कोई मुँह ये नहीं कहता कि लोगों की गलती से ही ये सड़क दुर्घटनाएँ होतीं हैं।

छोड़िए चक्रम जी पर आते हैं। वैसे तो चक्रम जी पीने -पिलाने के शौकीन आदमी हैं लेकिन मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि वो उस दिन भी पिए हुए थे। ऐसा लोगों का कहना है। अब चक्रम जी पिए हुए हों या ना हों। दुर्घटना होनी थी सो हो गई। अब समस्या नहीं समाधान के बारे में सोचना चाहिए। तो समाधान ये है, कि बकरे की बलि होनी चाहिए।

चक्रम जी का शरीर लोहे का बना है। ये उनकी जीवटता ही है कि वो जीवित हैं। ये कोई ऐसी- वैसी बात थोड़ी है। इस तरह से देखा जाए तो ये एक अनोखी घटना हुई थी उस कस्बे में। अब लोग भगवान् का शुक्रिया अदा करना चाहता थे। ये चौथी बार था कि चक्रम जी मौत को छूकर लौट आए थे। मजाक में लोग कह भी रहें थें कि अगर चक्रम जी का भाग्य मजबूत ना होता। तो हम लोग चक्रम जी की तेरहवीं मना रहे होते। लेकिन‌ तेरहवीं अगर मन भी रही होती तो लोगों को पूड़ी -बुँदिया और दही खाने को मिलता। लेकिन इस गाँव के लोग चटोर जीवी जीव हैं। या शायद उनका भाग्य मजबूत है कि वो बलि के बहाने ही मीट भात खा रहें हैं।

अँधेर नगरी चौपट राजा : (व्यंग्य) : महेश केशरी

यूँ तो वो चौकीदार हैं और जीवित हैं। लेकिन ये बी. एल. ओ.साहब की कृपा है कि वो मर गए हैं । उनका नाम मतदाता सूची में नाम नहीं है। कायदे से वो सब काम कर रहे हैं । तय समय पर उठते हैं। खाते हैं -पीते हें। सोते हैं, जगते हैं। और तो और वो रिश्वत भी लेते हैं। वो साबुत थे। सबको दिखाई भी देते थे।

और कमाल की बात ये थी कि वो रिश्वत लेकर भी चौकीदार थे ! सरकारी रजिस्टर में अपनी उपस्थिति रोज दर्ज करवाते थे। इसके बाद भी वो मृत थे।

उन्होंने अपने अधिकारियों से लेकर बड़े बाबू सबसे बात करके देख लिया। लेकिन सबने हाथ खड़े कर लिए। कोई भी इस सरकारी पचड़े में पड़ना नहीं चाहता था।

उनके आस-पास के सब लोग हैरान थे। ये एक नई बात हुई थी कि चौकीदार को ही मतदान करने का अवसर नहीं मिलेगा । जब कि उनकी ड्यूटी मतदान केंद्र पर ही थी। ये पहली बार था कि मुर्दा चुनाव करवा रहा था। स्ट्राँग रुम की सुरक्षा मुर्दा कर रहा था ।

अब से पहले के हर चुनावों को यानी लोकतंत्र के हर महापर्व को वो बहुत ही धूमधाम से मनाते आ रहे थे। मुखिया, वार्ड, पंचायत, यानी हर दूसरे- तीसरे चुनाव में वो हर बार वोट देते आए थे। वोट करके उनको एक अजीब तरह का सुकून मिलता था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ था। और वो वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए थे।

ये क्या कम बड़ी बात थी, कि वो चौकीदार थे। जिन पर देश के चीजों की निगरानी का जिम्मा था। और उनका नाम लिस्ट में नहीं था ! उनका नाम चोरी चला गया था। और ये ऐसी -वैसी चोरी नहीं थी। उनके नाम की चोरी थी। जिसको सरकारी तंत्र में मौजूद लोगों ने चोरी किया था।

लिहाजा वो सरकारी दफ्तर के चक्कर लगा रहें थे। जो सुनता वही चौंकता कि चौकीदार साहब का वोट जब इस देश में सुरक्षित नहीं है तो भला और किसका सुरक्षित हो सकता है।

चौकीदार अपना नाम खोजने में लगे थे। वो कार्यलयों के चक्कर काट रहे थे।इस टेबल से उस टेबल पर। अधिकारी उनको शुबहा की नजर से देखते। पूछते की तुम चौकीदार कैसे हो सकते हो। चौकीदार होने के लिए पहले तुमको देश का नागरिक होना होगा। तुम भगोड़े हो। या तुम रोहिंग्या हो। या तुम पाकिस्तानी हो। या शायद तुम किसी दुश्मन देश के एजेंट हो। तभी तो तुम्हारा नाम मतदाता सूची में नहीं है। तुम क्या सोचते हो तुमको ऐसे ही तुम्हारा नाम मिल जाएगा और तुम इस देश के नागरिक बन जाओगे।

वो हैरान -परेशान थे। पहली बार उनको लगा कि व्यवस्था लचर है ! और उनको ये भी समझ में आया कि हमारे यहाँ लोग हमारी व्यवस्था से इतना ही और ऐसे ही परेशान रहते हैं। जैसे कि अभी वो हैं।

उनके वोटर लिस्ट की फाइल और उनके नाम की खोज में बड़ा वक्त लग रहा था। चौकीदार चीख रहा था। चिल्ला रहा था। लेकिन होना कुछ नहीं था। उसकी तरह के लाखों लोगों का नाम गुम गया था। और वे लोग भी चीख-चिल्ला रहे थें।

वो अपनी बेबसी लोगों को बता रहें थें। इधर चौकीदार को अपने जिंदा होने का प्रणाम- पत्र लेकर आना था, कि वो जीवित था। फाइल आगे बढ़ ही नहीं रही थी। या उनकी फाइल शायद गुम गई थी। ठीक- ठीक पता नहीं। कृपा रूकी हुई थी। फाइल रेंग रही थी। कुव्यवस्था के आगे !

लेकिन चौकीदार भी जिद्दी था। उसने अपना नाम वापस खोजने के लिए अंगद की तरह अपने पैर जमा लिए थे। वो लगातार दफ्तर के चक्कर-पे-चक्कर लगा रहा था। उसने बताया कि मैं चौकीदार हूँ। और आपकी सुरक्षा करता हूँ। लिहाजा मेरी फाइल खोजी जाए। मेरा नाम ढूँढ़ - ढ़ाँढ़ कर किसी तरह इस देश की मतदाता सूची में जोड़ दिया जाए।

हमारी व्यवस्था में अजीब किस्सा था कि चौकीदार के अलावे किसी के बेटे का तो किसी के पति का नाम वोटर लिस्ट में नहीं था। सब व्यवस्था को कोस रहे थे। लेकिन‌ ये नया नहीं था। कमोबेश बहुत से लोगों का नाम वोटर लिस्ट से गायब था। ये यूँ ही नहीं था। ये षड़यंत्र् व्यवस्था की है । जिसको अपनी जेबें भरनी होती है। मार्कशीट पर जानबूझकर कुमार की जगह कुमारी कर दिया जाता है। ताकि सुधार करके कमाई की जा सके।

ये सब ऐसे नहीं होता है। इसके लिए बी. एल. ओ . साहब जिम्मेदार हैं। ये गाँव - गाँव कस्बे- कस्बे जाकर इस बात की जानकारी नहीं लेते कि कौन आदमी जिंदा है। और कौन मर गया है। बी. एल. ओ. साहब बँद ए. सी. कमरों में मतदाताओं के लिस्ट के पुनरीक्षण का काम करते हैं। और जिसको -तिसको मार देते हैं। यही नहीं इनके कारनामे भी बड़े - बड़े हैं। जिंदा लोगों को मार देना और मरे हुए लोगो को जिंदा कर देना इनके बाएँ हाथ का खेल है। ये धरती पर के अघोषित यमराज हैं। वो अगर चलकर हमारे -आपके घरों तक आएँगें तभी तो सही जानकारी मिलेगी।

लेकिन बी. एल. ओ. साहब ऐसा नहीं करेंगें । काहे से कि उनके पैरों मे लगी मेंहदी छूट जाएगी । लिहाजा वो अँधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर काम करतें हैं। बी. एल. ओ. साहब भी क्या करें। काम का प्रेशर है। उनको जिलाधिकारी का प्रेशर है। जिलाधिकारी पर चुनाव आयोग का प्रेशर है।

पिचहत्तर में युवा : (व्यंग्य) : महेश केशरी

वो भी युवा ही हैं। पिचहत्तर की उम्र में उनको कोई बूढ़ा कहे तो कार्यकर्त्ता नाक - भौं सिकोड़ने लगते हैं। पिचहत्तर के होने के बाद भी वो ज्यों- के- त्यों कुर्सी पर बने हुए हैं। और संभावना तो ये भी है कि वो सैकड़ा लगाकर ही कुर्सी से उतरेंगे। खैर, इनके खेमें के लोग पचप्पन वाले के बारे में टीका -टिप्पणी कर रहें हैं। वो कह रहें हैं कि पचप्पन वाले युवा अब बूढ़े हो गए हैं। बकौल उनके पिचहत्तर वाले युवा के तो जैसे नाक से दूध चू रहा है। पिचहत्तर वाले युवा तो बच्चे ही पैदा हुए थे। और बच्चे ही मरेंगें ।

एक शादी शुदा हैं लेकिन‌ घर नहीं जाते । दूसरे पचप्पन वाले ने शादी नहीं कर रखी है? जिन्होंने शादी नहीं कर रखी है। उनको ही सबसे ज्यादा इस बात से परेशानी है कि पचप्पन साल का युवा कुँवारा है। ये पहली बार है कि पिचहत्तर और पचप्पन वाले इन दोनों युवाओं से देश इस समय परेशान है। पिचहत्तर वाले को युवक को ये छूट उनके नेता होने के कारण मिली हुई है ।

पिचहत्तर वाले ने इतने काम किए हैं कि काम के भी कान ये सुन - सुनकर कान पक गए हैं कि उन्होंने कितने काम किए हैं ।

किसी ने भी अपने मुँह- मिंयाँ- मिट्ठू बनकर ऐसी बातें ना कही होंगी। जितना वो कहते हैं। वो अपनी तारीफ में कसीदे खुद पढ़ते हैं। पिचहत्तर के होने से पहले उन्होनें कितने पचप्पन और साठ के बडे़- बड़े सूरमाओं को निपटा दिया था। पिचहत्तर वाले राजनीति के ग्लैन मैकग्राथ हैं। वो ऐसा योरकर डालते हैं। कि पचप्पन - साठ साल का कोई युवा नेता क्लीन बोल्ड़ हो जाता है।

खुद पिचहतर के होते हुए भी भी वो क्रीज पर टिके हुए हैं। वो किसी भी नामी - गिरामी युवा या बूढ़े नेता को अपने आगे टिकने ही नहीं देते।

जैसे ही कोई आगे बढ़ता है। उसको लग्घी मारकर गिरा देते हैं। उनका कद पार्टी में बहुत बड़ा है। अपनी इसी लग्घी मारने की कला के कारण उन्होंने बहुत बड़ी -बड़ी हस्तियों को पैवेलियन का रास्ता दिखा दिया है। लोग कहते हैं कि उनके पेट में दाँत हैं। वो जितना जमीन के नीचे हैं। उतना ही ऊपर हैं ! वो अजेय हैं। कुछ लोग उनको भगवान् विष्णु का अवतार पुरूष भी बताते हैं। उनकी फोटो केवल और केवल नोट पर छपनी बाकी रह गई है।

बाकी सारे कारनामें उन्होंने अपने कार्यकाल में कर दिए हैं।वो अपने दल में तो लोगों को लग्गी मारते ही हैं। इस बार वो विपक्ष के एक पचप्पन साल के युवा को लग्घी मारने में लगे हैं।

युवाओें को लेकर इतनी बात हो रही है। लेकिन जो सचमुच में युवा हैं। उनकी बात कोई नहीं करता। युवाओं की परीक्षाएँ अनियमित चल रहीं हैं। पर्चे लीक हो जा रहें हैं। समय पर रिजल्ट नहीं हो पा रहा है। नियुक्तियाँ रूकी पड़ीं हैं । जो युवा हैं उनको घर बसाना है । शादी करनी है। उनको क्या जो सोने का चम्मच लेकर मुँह में पैदा हुए हैं। युवा जो मँहगाई बेरोजगारी से परेशान हैं। जो कीटनाशक पी ले रहें हैं। जो कर्ज नहीं लौटा पाने के कारण फँदे से झूल जा रहें हैं !

बाबू होने का मतलब : (व्यंग्य) : महेश केशरी

अगर आप सफेद हाथी हैं और आप महामक्खी चूस आदमी हैं। और आपके आसपास नौकरों की कोई लँबी फौज भी नहीं है। लेकिन आपके " अगर खाने के दाँत और " और दिखाने के दाँत ओर हैं। तब आपको भी छोटा मोटा बाबू माना जा सकता है।.

वजन मतलब अर्थ होना। मोटी जेब का होना। जिसकी माली हालत बहुत अच्छी हो। जिसके पास अकूत संपत्ति हो। जिसके घर के आगे -पीछे नौकरों की फौज हो। जिनके घर के आगे दसियों गाड़ियाँ हमेशा खड़ी रहतीं हों। जो लाव - लश्कर ले कर चलता हो। जिसके छींकने भर से सारे शहर को जुकाम हो जाए। जो जगे तो दिन हो। जो थके तो थकान हो जाए लोगों को। जिनके हगने- मूतने की खबर रखे जनता। या शहर के अखबार उनके थूकने की खबर भी छाप दें अखबारों में तो ऐसे लोग बाबू हैं।

अगर आपको आपके आसपास ऐसे लोग दिख जाएँ। तो समझ लीजियेगा वो कोई ना कोई बाबू जरूर है।

बिना अर्थ के आप बाबू नहीं हो सकते। आपको सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो सकती। आपके पास अगर अर्थ है। तभी आप बाबू हो सकते हैं। बिना अंटी में नोट हुए आप बाबू नहीं हो सकते। मैनें बहुत से हिस्ट्रीशीटर, गुँड़े बदमाशों को जो पहले दो कौड़ी के आदमी थे। आज अंटी में रूपयों के कारण बाबू बने फिर रहें हैं। जिनका शहर में एक मुकाम है।

मैं वैसे लोगों को भी जानता हूँ। जो शहर में अवैध तरीके से गर्भपात करतें हैं। जो पेशे से डॉक्टर हैं। वो भी बाबू हैं। वो समाज सेवी हैं ! वो उदघाटनों, मरनी - शादी- ब्याह, में अतिथि हैं। वो शहर के जलसों के मुख्य-अतिथि हैं। वो सभा को संबोधित करतें हैं। ऐसे लोग जिनमें चलनी से ज्यादा छेद हैं। फिर भी बाबू हैं। यहीं नहीं रूकिए अभी। ये प्रगतिवादी हैं। ये समाजवादी हैं, ये गाँधीवादी हैं, ये लोहियावादी हैं, ये दक्षिणपंथी हैं। तमाम तरह कि खूबियाँ इनमें हैं। और कमाल की बात ये है कि चमचे की तरह के कुछ लोग हमारे समाज में हैं। जो इनकी वाहवाही करते हैं । इनकी तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं। वो ऐसे टुच्चे, उठाईगिर लोगों को समाज के सोपान की सीढ़ी बताते हैं ।

वो इन लोगों की तरह ही पूरे देश या समाज को बनने के लिए या प्रेरित होने के लिए कहते हैं। जिनका कि इतिहास रक्तरंजित है।

हमारे समाज के लिए ऐसे लोग एक मिसाल हैं। जिनके उदाहरण देते लोग नहीं थकते।

जिनके हवाला के कारोबार हैं। जो बार चलाते हैं। जो शहर में उल्टे -सीधे काम करके तीन का तेरह करना जानते हैं। वो बाबू हैं। दिलचस्प ये है कि उनकी सेवा में जो लोग लगे हुए हैं। और इन सामाजिक लोगों का ही दिया वो खाते हैं। ऐसे पत्रकार उनकी महफिलों- पार्टियों में जाकर खूब- छककर खाते हैं। तीन- चार लोगों की तिकड़ियाँ -चौकड़ियाँ हैं। जो शहर के सबसे घटिया लोग हैं। लेकिन अखबार चलाने वाले कॉलम लिखने वाले कॉलमनिस्ट इनको बाबू बताते हैं।तो चलिए उनके अनुसार उनको हम बाबू मान लेते हैं।

जिनको पुलिस जब -तब पकड़कर थाने ले जाती थी। वो भी आजकल बाबू बने बैठे हैं। जब से वो बाबू बन गए हैं। पुलिस कोट-कचहरी बड़े सलीके और तमीज से उन उठाईगिरों से पेश आती है। बाबू होते ही चापलूसी बतियाने वाले लोगों की जुबान में एक मिठास और तरावट आप चापलूसों की भाषा में महसूस कर सकते हैं। एक नफासत एक तमीज या एक अदब भी इन चापलूस लोगों में इन बाबूओं के प्रति दिखाई देती है।

बाबू शब्द शहद की तरह मीठा लगता है। पहाड़ की तरह भारी।

बाबूओं का आगाज तो बेहतर देखा ही है। इतिहास भी बेहतरीन देखा है। मरने के बाद भी या इतिहास बन जाने के बाद भी लोगों में चापलूसी करने वालों में नमक के रस्म की अदायगी भी देखी है। चापलूस जिस बाबू का नमक खाता है वो अंत तक उसको बाबू ही कहता है। रिश्वत या नमक की तरावट से उसका गला हमेशा भींगा ही रहता है।

बहुत से ऐसे लोग भी देखे जो ईमानदारी के पुतले थे। जो सचमुच के बाबू थे। जो तीन को तेरह नहीं करते थे। लेकिन वक्त और हालात ने उनको धूल में मिला दिया । या वो धूल में मिला दिए गए।

स्वत: संज्ञान लीजिए : (व्यंग्य) : महेश केशरी

एक बार एक बी. सी. ए., डी.सी.ए. पास लड़के ने मुकदमा दायर कर दिया। जज साहेब ने पूछ लिया मालिक से कि एक लड़का जो बी. सी. ए. या डी.सी. ए. पास है उससे आप कीटनाशक छिड़कवाएँगें अपने खेतों में। आप बी.सी ए., डी.सी. ए . किए हुए लड़के से बर्तन धुलवाएँगें।

तो जज साहब आपने शायद वो कहावत सुनी होगी, कि " पढ़े फारसी बेचे तेल देखो ये किस्मत का खेल "। पढ़े- लिखे लोग ही आजकल बेगारी कर रहें हैं। यहाँ चपरासी की वेकेंसी निकलती है, तो एम. ए., बी. ए. और पी. एच. डी. की क्वालिफिकेशन वाले लोग फॉर्म भर देते हैं। नौकरी के लिए तो जैसे मारामारी चल रही है। फिर बी. सी.ए., डी. सी.ए. किए हुए लोगों की बात कौन पूछता है। पढ़े-लिखे लोग थोक के भाव में बेरोजगार हुए जा रहे हैं। घर में माँ- बाप बच्चों को पढ़ा-लिखाकर कोस रहें हैं।

बाहर युवा रोजगार के लिए मारा जा रहा है। लोग कॉन्टैक्ट या ठेके पर बहाल किए जा रहें हैं। एम. ए., बी.ए., डी. लिट किए हुए। प्रोफेसर, लैक्चरार भी दस- बीस हजार के लिए सुबह-शाम दौड़ रहें हैं। लेकिन अनुबंध वाले अपने दोस्त परिचितों को ही मौका दे रहें हैं। अनुबंध पर शिक्षा मित्र तैयार किए जा रहें हैं। मँहगाई सुरसा कि तरह मुँह बाए खड़ी है। पँद्रह -बीस हजार दस दिन भी नहीं चलते ।

तो बात पढ़ -लिखे लोगों के कद्र की हो रही है। वैसे तो जज साहब पढ़े- लिखे हैं। और पढ़े- लिखे लोगों की बात पढ़े -लिखे लोगों को ही ज्यादा समझ आती है। तो जज साहब से अनुरोध है, कि बीच -बीच में ऐसे- ऐसे मामलों की वीडियो काँफ्रेंसिंग करवाते रहिए। ताकि पढ़े- लिखे लोगों में आत्म-बल बचा रहे। वैसे जज साहेब आपसे दो -पाँच फीट की दूरी पर बैठा पेशकर भी दलाली या नाम पुकारने के एवज में घूस लेता है। ये भी विचित्र और आश्चर्य दिलाने वाला है, कि इस बात का पता भी आपको नहीं चल पाता। खैर कानून के हाथ बहुत लँबे होते हैं। और उम्मीद है उसी लँबे हाथ से आप ये पता भी कर लेंगें ।और कोई गुनहगार तब तक गुनहगार नहीं माना जा सकता है। जब तक कि उसका जुर्म साबित ना हो जाए। खैर, बारहम कभी- कभी आप और आपकी अदालतें स्वत: संज्ञान भी लेते रहें तो बहुत अच्छा रहेगा। ताकि युवाओं की जान बच सके। ये क्या कम बड़ी बात है, कि छात्र जिनके माँ-बाप पेट काट-काटकर बच्चों को पढ़ाने के लिए शहर में पैसे भेजते हैं। वो पढ़ाई करने के बाद अपने हक के लिए भी आँदोलन करें। ये इस व्यवस्था के लिए डूब मरने वाली बात होगी ।

अरे जज साहब कभी आप भी छात्र रहे होंगें । छात्र जीवण के उस संघर्ष पर जरा नजर डालिए। जहाँ छात्र तीन-टाईम की जगह एक टाईम खाकर ही प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे होते हैं। फिर, सरकारी तंत्र में पेपरलीक हो जाता है। पेपर ठीक -ठाक हुआ तो रिजल्ट ही नहीं आता। सत्र नियमित नहीं चल रहा है। उसके बाद यदि परिणाम के लिए छात्र आँदोलन करते हैं, तो सरकार वाटर कैनन और लाठी-चार्ज कर देती है।

पढ़ा लिखा-आदमी इस दौर में होना अपराधी होने से बड़ी बात हो गई है। या पढ़-लिखकर आदमी अपने आपको अपराधी मान रहा है। छात्रों की माँगों पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है। उधर अपराधी तंत्र सत्ता पर काबिज है। जो जेल में भी शराब शबाब और कबाब का आनंद ले रहा है ।और पढ़े-लिखे लोग रिजल्ट का इंतजार कर रहें हैं!

बाबाजी कहिन : (व्यंग्य) : महेश केशरी

एक बाबा जी के विचार सुनने को मिले। सचमुच उनको सुनकर दिल गदगद हो गया। वो आदमी और आदमी में भेद करते हैं। उनके अनुसार पूरे देश में एक समय ऐसा भी आएगा जब सब लोग शाकाहारी हो जाएँगें। कहीं माँस बिकता नजर नहीं आएगा। विचार तो ऐसे -ऐसे हैं उनके कि क्या कहने। दिल बलिहारी हुआ जाता है।

उनके अनुसार शूद्रों को सत्ता नहीं मिलनी चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो देश में अकाल पड़ने लगता है। बीमारियाँ पैदा होने लगतीं हैं। प्राकृतिक बदलाव होने लगता है। बेमौसम की बारिश आँधी-पानी चालू हो जाती है। भूकँप आता है। हैजा- प्लेग और टीबी जैसी बीमारियाँ पैदा होने लगातीं हैं।

मुझे उनकी बात पर हँसी आती है। बराका ओबामा उसी वर्ग में आते हैं। लेकिन उनके रहते देश ने बहुत तरक्की की। ऐसे अनगिनत लोग हुए हैं जो शूद्र होते हुए भी इतिहास रच गए। उनके पैरों के धूल के बराबर भी नहीं हैं, ऐसे स्वयंसिद्ध बाबा।

बकौल बाबा के शूद्रों के कारण ही नालियाँ दुर्गंध देतीं हैं। तमाम तरह के कीड़ों के जन्मदाता भी शूद्र ही हैं। वो शूद्र जो इनके लिए खेती करते हैं। जो इनके कपड़े धोते हैं। वो शूद्र जो इनकी बागवानी करते हैं। वे शूद्र जो इनके जानवर और ढ़ोर -डाँगर चराते हैं। वो शूद्र जो इनके लिए उपले बनाते हैं। वो शूद्र जो खेतों में पानी डालते हैं। वो शूद्र जो रातों को इनके खेतों की रखवाली करतें हैं। इनके लिए फसल उगाते हैं। ऐसे लोग जमीन पर रेंगने वाले कीड़े हैं।

जो बाबा हैं वो खुद ही मोहमाया में फँसे हुए हैं। बकौल बाबा सन् दो हजार सोलह में उन्होनें मुखिया का चुनाव लड़ा था। लेकिन वो मुखिया का चुनाव हार गए थे।

वो बाबा हैं और स्वयंसिद्ध बाबा हैं। और उनसे बड़ा बाबा ना तो इस समय कोई है। और ना ही होगा। ऐसा वो दावा करते हैं। उनके अनुसार वो देश के मुखिया के गुरू हैं।

बाबाजी खुद माया में फँसे हुए हैं। और माया के बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसा तर्क देते हैं। उनके अनुसार सूर्य, चँद्रमा और पृथ्वी भी माया के कारण ही अपनी-अपनी जगह पर टिके हैं। तब गुरूत्वाकर्षण के नियम को वो ताखे पर रख देते हैं। उनके अनुसार भेदभाव का होना बहुत जरूरी है। सभी वर्णों को अपने -अपने काम करते रहना चाहिए। शूद्र केवल और केवल सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैँ। शूद्रों को सत्ता नहीं सौंपनी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था को वो बेकार मानते हैं। संविधान आधारित व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही समाजिक व्यवस्था चलनी चाहिए। उनके विचार बहुत महान् हैँ। और बाबाजी तो और भी महान् हैं।

श्रद्धांजलि देने की होड़ में : (व्यंग्य) : महेश केशरी

लोगों को बहुत जल्दीबाजी है। सब लोग लबर- लबर करने में लगे हैं। न्यूज और व्यूज पाने की। अपडेशन की इतनी जल्दीबाजी है कि लोग अगर अपने आपको मारकर भी व्यूज पा लें तो क्या कहने। कुछ ही दिनों में आप देखेंगे की लोगों का अपने ही फोटो पर हार चढ़ाकर कैप्सन " मरने की यात्रा पर जा रहा हूँ संभव है वहाँ जल्दी ही आपसे मुलाकात हो। " लिख रहें होंगे। खुद तो ससुर मरेंगे ही आपके मरने की भी कामना करेंगें। तब हालत ये होगा कि लोग मरकर भी लाईक कमेंट चेक करेंगे। ताकि वो व्यूज पा सकें। ये व्यूज पाने का चक्कर लोगों को गिरा दे रहा है। गिरने को दरअसल वायरल होना कहा गया है। गिरना ठेठ अँग्रेजी में वायरल होना या ढीठ होना कहलाता है। आप जितना गिरेंगे उतना ही वायरल होंगे।

गिरने की जो पराकाष्ठा है उसके क्या कहने। जिसको देखो वही मोबाइल में आँखें गड़ाए हुए है। सब लोग बेकार की मेहनत और कसरत करते दिखाई दे रहें हैं। कोई बेवजह उछल कूद -कर रहा है। लोग बेवजह के अँग प्रदर्शन में लगे हैं। सब लोग अपनी पोस्ट पर लाईक्स पर कमेंट पाना चाहते हैं। व्यूज ने लोगों का दिमाग खराब कर दिया है। किसी के पोस्ट पर ज्यादा लाईक्स और कमेंट अगर आ गया तो बगल वाला जल- भून जाता है। वो अवसाद और तनाव से घिर जाता है। दुनिया में सबसे बड़ी जो समस्या है। वो समय समय पर लाईक और कमेंट नहीं मिल पाने का है। इससे बड़ी समस्या तो रूस, युक्रेन युद्ध को भी नहीं माना जा सकता।

कहा भी गया है जल्दीबाजी का काम शैतान का होता है। एक दिन एक अभिनेता बीमार पड़े और आई. सी. यू. में पहुँच गए। लोगों में तो जैसे श्रदांजलि देने की होड़ सी ही मच गई। अभिनेता उस समय तक जीवित थे। लेकिन चैनलों को ब्रेकिंग न्यूज चलानी थी। लिहाजा उन्होंने न्यूज चला दी। अभिनेता के फैन गुस्सा हो गए। कुछ समय बाद एंकर महोदया को सोशल साईटस पर ट्रोल किया जाने लगा। माला चढ़ाना फेसबुक पर मँहगा पड़ गया। लोग एंकर महोदया की फोटो पर हार पर हार चढ़ाने लगे। सवाल उठता है मृत्यु की खबर को सबसे पहले पहुँचाकर भला क्या होना है। कोई ना कोई दूसरा भी ये काम कर ही देगा। लोगों को ऐसा लगता है कि अगर कोई वायरल खबर वो चला देंगें तो कोहिनूर हीरा उनको मिल जाएगा।

इधर हर दूसरे-तीसरे की वॉल पर अभिनेता के मृत्यु की खबरें चल रहीं थी। अभिनेता भी लज्जित था कि बताओ भला कैसा समय आ गया है कि जो पब्लिक कभी सिर माथे पर उनको बिठाती थी। आज वही पब्लिक उनके मरने की कामना कर रही है। पब्लिक को नहीं पता कि अभी सनी पाजी और बाबी पाजी जिंदा हैं। सनी पाजी का जब हाथ पड़ता है तो आदमी उठ जाता है।

जल्दीबाजी में एक सज्जन अभिनेता की जगह अपनी पत्नी का फूलों से मढ़ा हुआ फोटो अपनी फोटो पर लगा बैठे। कैप्सन में लिखा " दिवंगत अभिनेता फलाने को भावभीनी श्रद्धांजलि"। ये बात उनकी पत्नी जी को पता चल गयी। तो पत्नी जी नाराज होते हुए बोलीं कि कम-से- कम मेरे मरने तक तो सही से इंतजार कर लते । पहले मेरे मरने की पुष्टि तो कर लेते तब जाकर ये हार मेरी फोटो पर चढ़ाते। पति महोदय को अब अपनी गलती का एहसास हुआ। वो पत्नी से अनुयय करते हुए उसको मनाने में लगे हैं।

प्रभुजी तुम खटमल हम नाली : (व्यंग्य) : महेश केशरी

जो हमारे बीच तीन प्रतिशत हैं। उनका गणित ही कुछ अलग है। तीन प्रतिशत का गणित ऐसा है कि वो लोग अपने को अल्पसंख्यक मानते हैं। जबकि वे अविजित हैं। जबकि वे लोग सर्वशक्तिमान हैं। वो कण -कण में मौजूद हैं। वो रज- रज में हैं। जिन्होंने अकूत संपत्ति जमा कर रखी है। लेकिन उनकी भूख और पाने की है। उनकी भूख कभी खत्म ही नहीं होती। वो जो छुआ- छूते को मानते हैं। जिनके कारण ही अस्पृश्यता की समस्या है। वो जो चौथे पायदान के आदमी को आदमी नहीं मानते। जहाँ अस्पृश्यों को मठ जाने पर मठ धोए जाते हैं। अहीरों की मँत्रणा पर या कहीं पाठ करने पर तीन फीसदी की संख्या वाले लोग अपनी स्त्रियों का मूत्र छिड़ककर मठों की शुद्धि करते हैं ।

वो जो आदमी को आदमी नहीं समझते। वो जिन्होंने मठों पर कब्जा कर रखा है। वो जिनके लिए आरक्षण सदियों से है। जिनको ये अधिकार इन मठों पर केवल और केवल इस कुल या वँश में पैदा होने के कारण ही मिला हुआ है। ऐसे लोग यहाँ सदियों से जमे हुए हैं। जिनकी ग्रँथियाँ हीन हैं। जो आदमी को आदमी नहीं समझते। जिनका काम खटमल की तरह है। जो सामाजिक जोंक हैं। जो सदियों से समाज को चूस रहें हैं। वो जो पानी की जगह खून पीते हैं। वो तीन फीसदी हैं। तब इसका रोना रो रहे हैं। सोचिए वो नब्बे नहीं हैं, पिच्चानवे नहीं हैं। महज तीन फीसदी हैं।

जो मिर्च की तरह हैं। इनके लिए ही वो कहावत प्रचलित है कि देखन में छोटन लागे घाव करे गँभीर।

इनके कारण ही वर्ण हैं। इनके कारण ही जातियाँ हैं। उनके कारण ही समाज में और लोग फिस्टडडी हैं। वो रो रहें हैं कि हम तीन फीसदी हैं और अल्पसंख्यक हैं। अब क्या चाहते हो हर जगह तुम ही तुम रहोगे। दूसरे लोग पाताल लोक में रहेंगे । जज भी वही वकील भी वही। मालिक भी वही मुनीम भी वही। खेत भी उनके हल भी उनके। जमीन भी उनका, कुँआ भी उनका। कुँए के अँदर का पानी भी उनका।

उनका दावा ये भी है कि तीन प्रतिशत होने के कारण उनका शोषण होता है। अब दूसरे तरीके से देखा जाए तो ये जो विक्टिम कार्ड खेल रहें हैं। दर असल वो शोषक रहें हैं। तीन प्रतिशत होने के बाद भी उन्होंने निन्यानवें प्रतिशत संस्थाओं पर कब्जा कर रखा है। हमको आपको कलकत्ता, मुँबई, पहुँच जाएँ तो सिर छुपाने की जगह नहीं मिल सकती। लेकिन जो तीन फीसदीया लोग हैं। वो सार्वभौम हैं। रक्त बीज की तरह बूँद -बूँद से पैदा होने वाले हैं। ईश्वर की तरह धेले- धेले में निवास करने वाले हैं। जो सत्तानवे फीसदी हैं। वो खटमल की तरह हैं या गँधाने वाले नाले की तरह। जो स्लम में रहने वाले हैं। इन तीन फीसदीया लोगों को ये फूटी आँखों नहीं सुहाते।

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी : (व्यंग्य) : महेश केशरी

वादों का क्या है साहब सब वादे करते हैं। बतकही में लोगों ने ये भी कहा था , कि हम लोग हवाई यात्राओं की इतना सस्ता कर देंगें, कि हवाई चप्पल पहनने वाला कोई भी आदमी हवाई जहाज में यात्रा कर सकता है। हवाई यात्रा का मूल्य हवाई चप्पल की तरह सुलभ हुआ है या नहीं ये हवाई यात्रा करने वाले ही बता सकते हैं। लेकिन राँची से नई दिल्ली का किराया सात से सत्तर हजार का जरूर हो गया है। ये वही लोग हैं जिन्होंने कोरोना के समय , त्रादसी, बाढ़ , और भूकँप के समय में लोगों का जमकर शोषण किया। ये वही लोग हैं जो आपदा को अवसर में बदलने का हुनर जानते हैं। ये वही लोग हैं , जो हमारे समाज के मुख्य अतिथि हुआ करते हैं। जिनका समाज चरण वंदन करते नहीं अघाता।

जो हाकिम हैं। जो उच्च पदों पर बैठे हुए हैं। जो सेमिनारों में फीता काटते हैं। जो समाज के सबसे सम्मानित लोग हैं।

जो भीड़ है, वो देश है। ऐसे लोग जो देश का दिया ही खाते हैं। जिन्होंने देश का खाया है। वो देश के लिए कुछ नहीं करते। उनके लिए देश और लोग दुधारू गाय हैं । देश और उसके लोगों को दूहना उनका काम है। और दिलचस्प ये है कि सत्ता को उनको पूर्ण समर्थन और सहयोग प्राप्त है। सत्ता को चँदा चाहिए। चुनाव लड़ने के लिए। और चुनाव लड़ने का पैसा देश को दूहने वाला दे रहें हैं । कुछ इस तर्ज पर कि आप जनता को दूहिए और हम आपको दूहेंगें।

उनका चेहरा काला, क्रूर और विद्रूप है। जो समाज से लेता है। लेकिन समाज को लेकर कुछ नहीं देता है। जो ब्याज लेने में विश्वास रखता है। जो तीन का तेरह करना जानता है। जो दमड़ी -दमड़ी , कौड़ी -कौड़ी जीता है। देश की भलाई के बारे में कभी नहीं सोचता। जो कुछ करता है निहितार्थ करता है। जिसके पास गूढ़ विषय हैं। जो अपने लिए योजनाएँ बनाता है।

और फिर देश पर एहसान भी जताता है, कि हमने खराब समय में लोगों का साथ दिया। ये गिद्ध हैं, जो देश की आवाम को मौकापरस्ती की निगाह से देखता है। जो जनता को नोंच खाना चाहता है। जिसके दो चेहरे हैं। प्रत्यक्ष में मददगार है। पीठ पीछे जनता को लूटने का इरादा रखता है।

जनता हवाई जहाज का टिकट खरीदकर ठंड में ठिठुरने को मजबूर है। सौ रूपये की पेस्ट्री । दो सौ का समोसा। गिद्धों की मनमानी।जिन्होंने हवाई यात्राओं के लिए टिकट खरीदा था। वो जरूर जमीन पर इस ठंड में ठिठुरने को बाध्य हैं। जिनको अपना साथ में लाया हुआ सामान भी नहीं मिल रहा है।

ओढ़ने को नहीं पहनने को नहीं। ये परले दर्जे की अवसरवादी सोच है।

भाई ये तो हवाई यात्रा करने से पहले सोचना चाहिए था। अगर हवाई यात्रा की ना सोची होती और अगर बैलगाड़ी से भी लोग चले होते तो घरेलू उड़ानों से पहले जरूर अब तक घर पहुँच गए होते। सब लोग सुविधा जीवी हो रहें हैं। सबको तुरंत कहीं ना कहीं पहुँचना है। अब बात निकली है अमीरों की तो थोड़ा मध्यम दर्जे के लोगों की बात भी हो जानी चाहिए। बात रेल की हो रही है। लोगों को अब समझ में आया है, कि मध्यम दर्जे के लोगों का दर्द भी तो दर्द ही है। आखिर प्लेन का लेट होना और ट्रेन के लेट होने से आदमी ही लेट होता है। अब तक ट्रेन का लेट होना लेट होना नहीं माना जाता था। अच्छा है लोग अपने अधिकार के प्रति सजग होंगे। प्लेन की तरह ट्रेन का लेट होना एक तरह से ज्यादती मानी जाने लगेगी । फिर यूनिवर्सिटी की बात आएगी। रिजल्ट लेट होने की बात निकलेगी। दबाब बनना ही चाहिए। बात निकली है तो दूर तलक जानी चाहिए।

आखिर लोग पैसे दे रहें हैं। सुविधा क्यों खराब लें। क्यों हमें वो ज्यादती ट्रेन या परीक्षा के रिजल्ट के लेट होने की तरह का नहीं लगना चाहिए। जिस तरह बस, ट्रेन और हवाई जहाज का लेट होना लेट माना जाएगा। ज्यादती मानी जाएगी । अब किसी भी चीज का लेट होना भी और जरूरी मुद्दों की तरह जरूरी और ज्यादती लगने लगेगा । जरूरी भी है।

ये रेल बस की बात नहीं है। शोषण की इंतिहा है। बर्दाश्त करने की इंतिहा है। ये मध्यम वर्ग की पीड़ा है। जो दोनों तरफ से पिस रहा है। गाली भी मध्यम वर्ग ही खा रहा है। गाली भी मध्यम वर्ग ही दे रहा है। काऊँटर पर लेट लतीफी के लिए।

ये मध्यम वर्ग की दास्तान है। जो कराह रहा है। दस- दस, पँद्रह - पद्रँह घँटे काम करके। पूँजीपति पीछे छिपा हुआ है। दूर कहीं नेपथ्य में।

हवाई जहाज के यात्री को यात्रा करवाने वाले लोग भी आदमी ही हैं। उनको भी काम के अनुसार वेतन का अधिकार है। शोषण की चक्की में पिसते मजदूरों ने कह ही दिया है, नहीं अब बस। और रेल- रोको आँदोलन की तरह प्लेन रोको आँदोलन भी होने लगा है। आखिर आदमी- आदमी है। उसको भी आराम चाहिए। आप सैलरी देंगे आठ घँटे का । काम लेंगे बारह -बारह घँटे। आखिर कितना शोषण करेंगें मिडिल क्लास का। मिडिल क्लास ने बिगुल फूँक दिया है। वैसे हवाई चप्पल से दीदी याद आई। दीदी से चप्पल याद आया। चप्पल से सादगी की बात याद आई। सुना है फिर पाँच लाख लोगों ने गीता का पाठ शुरु करना शुरू कर दिया है। और उसी बँगाल में बाबर का भूत एक-बारगी फिर से निकल पड़ा है।

लोगों का हुजूम है, कि गीता पढ़ने में लगा है। दूसरा हुजूम बाबरी- मस्जिद के लिए ईंटें लेकर दौड़ रहा है। लगता है इस आपा-धापी में फिर सिर- फुटौव्वल होगी ही । बुनियादें बातें हवा हवाई चप्पल की तरह हवा में ही हवा - हवाई हो गईं हैं। ये सिर फुटौव्वल खाए -पिए -अघाए लोगों का है। जो वक्त जरूरत जुगाली करते रहते हैं।

बैल ही ठीक हूँ : (व्यंग्य) : महेश केशरी

मैं बहुत सोचता हूँ कि मेरी आय बढ़े। लेकिन महीना मिलता नहीं कि बमुश्किल से चार -पाँच दिनों में ही मेरे पैसे खर्च हो जाते हैं। और मैं छब्बीस दिन बहुत मुश्किल से काट पाता हूँ। मैं बहुत सोचता हूँ, कि आर्थिक तँगी ना रहे। घर में रूपये ही रूपये हों मेरे पास।

पेशे से मैं अधिकारी हूँ। अधिकारी हूँ, इसलिए लोगों का मेरे घर में आना -जाना लगा रहता है। ज्यादतर लोग मेरे घर में बिना बुलाए ही पहुँचते हैं। ये सिलसिलेवार ढँग से चल रहा है। और सालों से चल रहा है। इसमें से ज्यादातर लोग मेरे ससुराल से आते हैं।अब पत्नी को कौन नहीं जानता। वो हमेशा सींग लिए खड़ी रहती है। पत्नी से कोई खराब नहीं करना चाहता।

ज्यादातर जो लोग हैं, वो मुझसे अपेक्षाएँ रखते हैं। उनको लगता है कि मेरे पास बहुत पहुँच है और मैं उनका काम यूँ ही चुटकी बजाते कर दूँगा। भाई मेरे पास कोई जादू कि छड़ी थोड़ी ही है। मैं कोई नेता थोडे ही हूँ।

मैं शहर में रहता हूँ, तो उन लोगों का किसी ना किसी बहाने से मेरे पास आना- जाना लगा ही रहता है। ज्यादातर लोग चाहते हैं , कि मैं उनको कहीं नौकरी पर लगवा दूँ। लेकिन मैं अधिकारी हूँ , भाई। कोई भर्ती करने वाली संस्था नहीं।

ज्यादातर लोग जो होते हैं जो मेरे मामा- मौसा , के दूर के रिश्तेदार होते हैं।

अब मेरे वेतन का पचाह फीसदी इन्हीं अतिथियों के स्वागत में चला जाता है। सच पूछा जाए तो मैं इन अतिथियों से परेशान हो गया हूँ। जो बिन बुलाए ही आ जाते हैं। मैं ज्यादातर बहाने करके उनको टाल देता हूँ। क्या करूँ मेरी आर्थिक हालत बहुत खराब है।

मैं सोचता हू़ँ मेरे पास इतने रूपये हों , कि मैं भी नालियों और पाईप में पैसों को छुपाकर रखूँ। मैं एक तटस्थ आदमी हूँ। कभी ऊपर की कमाई नहीं करता। मेरे बारे में लोगों को पता है कि और लोगों कि तरह मैं नहीं हूँ। मैं व्यहवार से बहुत रूखा हूँ। अपने काम से काम रखता हूँ। खोटे को खोटा और खरे को खरा कहना मेरी आदत है।

लेकिन इसका ख़ामियाजा मुझे हर बार चुकाना पड़ता है। बेटा रॉल्स राईज खरीदने की डिमाँड करता है। लेकिन उसको नाउम्मीदी ही मिलती है। वो मुँह फुलाए रहता है।

पत्नी जी को शॉपिंग करनी है। लिहाजा पैसे चाहिए। उनको एफिल टॉवर देखने जाना है, पेरिस। लिहाजा मैं उनकी उम्मीदों पर भी खरा नहीं उतर पाता। अधिकारी आदमी हूँ। इसलिए धर्म संकट में पड़ा रहता हूँ। वैसे भी मैं बैल आदमी हूँ। हमेशा सींग लिए तैयार रहता हूँ।दोस्त से ज्यादा मेरे लिए दुश्मन हैं। कब किसी विधायक - मंत्रीजी के गुस्से का कोप भाजन मुझे बनना पड़े पता नहीं। लोग तो मुझसे पहले से ही खार खाए बैठे हैं।

हमारे देश की संस्थाओं पर मुझे बहुत भरोसा नहीं है। पुराने गड़े मुर्दे कभी भी उखड़ सकती हैं। या किसी के कहने पर भी उखाड़े जा सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद किसी ने कहीं तीन - पाँच में फँसा दिया तो लेने के देने पड़ जाएँगें।

पत्नी जी बार- बार कहतीं हैं मिस्टर वर्मा ने नया मकान लिया। नयी गाड़ी खरीदी है। उनकी मिसेज ने नई ज्वेलरी ली है। फॉरेन ट्रीप पर भी जा रहें हैं। और एक आप हो कि धेले भर की ऊपर की कमाई करना नहीं आता। आपसे तो बेहतर वर्मा जी ही हैं।

फिर , धर्मसंकट से निकलता हूँ, तो पत्नी दिखाई देती है। उसका भोला चेहरा दिखाई देता है। मासूम बेटे की शक्ल देखता हूँ। मेरा दिमाग फिरने लगता है।

सोचता हूँ कोई चुनाव लड़ ही लूँ। और सरकार बनाऊँ। मैं भी नेता बनूँ जाऊँ।

ऐसा वैसा नेता नहीं बल्कि प्रदेश का चर्चित नेता। मेरे पास भी लाव लश्कर हो। सलाहकारों से घिरा रहूँ। लेकिन होता उल्टा है। मैं अतिथियों से घिरा रहता हूँ।

मेरे पास इतने रूपये हों, कि मैं भी नालियों और पाईप में छुपाकर रखूँ। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरे घर भी ई .डी., सी. बी. आई. की रेड़ हो । मैं भी अखबार की सुर्खियाँ बटोरूँ। लेकिन उसके लिए मोटी चमड़ी का अर्थात् गैंड़े की खाल वाला होना होगा। लेकिन मैं फिर सोचता हूँ, कि मैं बैल ही ठीक हूँ।

वरीय अधिकारी की सफाई : (व्यंग्य) : महेश केशरी

जबसे एस. एच. ओ. साहब और काले कोट यानि वकील साहब का मामला प्रकाश में आया है। तब से थेथरलॉजी यूनिवर्सिटी के थेथर छात्र बचाव में आ गए हैं। ये लोग सोशल मीडिया पर अपनी - अपनी अपनी डी.पी .में एस. एच. ओ. साहब की डी.पी. चेंप दे रहें हैं। इनकी थेथरलॉजी अलग है। ये कह रहें हैं कि एस . एच.ओ. साहब ने जो किया वो सही था। कारण कि कसाब का केस लड़ने वाला भी वकील था। इस कारण हमें हर वकील से नफरत करना चाहिए। लेकिन कसाब को पकड़ा एक पुलिस वाले ने था। लिहाजा इस तर्क के अनुसार हमें हर उस एस. एच. ओ. को बर्दाश्त करना चाहिए। उनकी इज्जत करनी चाहिए। तब सरबजीत के वकील को ये लोग क्यों भूल जाते हैं। निर्भया के वकील को ये लोग क्यों भूल जाते हैं। वाह भई वाह। एक एस. एच. ओ. न्यायपालिका पर हाथ उठाए। किसी महिला पर हाथ उठाए। उसको गाली- गलौज मारपीट करे। ऐसे तो हर एस. एच. ओ. साहब का मन बढ़ जाएगा। वाह रे एस. एच. ओ. साहब के हिमायती। इस हिसाब से रॉबिनहुड भी फरिश्ता हुआ। ये वही थेथर लोग हैं जो बी. लो. ओ. की मौत पर बी. एल. ओ. को कामचोर तक कहते नहीं अघाते। मानवीय सँवेदना सूख गई है, इन थेथर लोगों की। मरना इनके लिए जैसे उत्सव मनाना है।

पहली बार ऐसा हुआ है, कि काले कोट और खाकी में उठा-पटक हुई है। नहीं तो थाना -पुलिस -वकील सब सहोदर भाईयों की तरह हैं। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे। उदाहरण देना हो तो हम नींबू और सिरके का उदाहरण दे सकते हैं। जैसे नींबू का आचार नमक के सिरके में सुरक्षित रह सकता है। वैसे ही एस. एच. ओ. साहब भी अबतक वकीलों के संसर्ग में सुरक्षित थे।

वो धुँए- धूप , अँधड़- पानी, सुनामी में भी नींबू के आचार की हिफाजत किसी फरिश्ते की तरह करते आ रहे थे। लेकिन इस बार नींबू ने सिरके से विरोध कर लिया है। अब नींबू को अगर मछली मान लिया जाए। और वकील साहब को मगरमच्छ तो आपको वो कहावत तो याद ही होगी कि पानी में रहकर मगर से बैर नहीं करना चाहिए।

और एस . एच.ओ . साहब ने वो गलती कर दी है। लिजाजा वो सिरके के बिना नींबू रह गए हैं। जिनपर मक्खियाँ भिनभिना रहीं हैं।

वकील नुमा पानी अब तालाब से सूख गया है। और एस. एच. ओ. साहब बिन पानी के मछली की तरह छटपटा रहें हैं।

पहली बार हम लोगों ने कानून के रखवाले और वकील साहब के बीच का ऐसा मामला प्रकाश में आते हुए देखा है। पहली बार एस . एच. ओ. साहब लाइम- लाईट में आए हैं। इतने लाईम- लाइट में आकर उन्होनें ऐसी सुर्खी बटोरी है। ऐसी सुर्खी बटोरी है कि क्या कहने। वो ऐसे सुर्ख हुए हैं , कि उनका सब-कुछ लाल हुआ पड़ा है। आगे -पीछे सब। सुना है कि अब वो जबाब देते फिर रहें हैं। अभी उनको इतना जबाब देना होगा , कि उनकी सात पुश्तें भी पनाह माँगेंगीं। उन्होंने अपनी छिछालेदारी तो की ही है। पूरे महकमे का नाम भी खराब कर दिया है। अगर मोबाइल ना होता और उसका वीडियो ना बना होता । तो अब तक कहीं किसी कोने में मरे -पड़े होते वकील दंपत्ति।

एस. एच.वो .साहब के काम कम कारनामें ज्यादा हैं। लिहाजा वो नप गए हैं। और नपने के बाद भी लाईम -लाइट में बने हुए हैं।

चुलबुल पाँड़े की शोहरत भी फीकी पड़ गई है। भाई नाम ही तो पूछा था , एस. एच. ओ. साहब बता देते।

आपको नहीं पता वकील साहब बाल का खाल निकाल देतें हैं। वकील से धरती -आसमान सब पनाह माँगते हैं। आपसे वर्दी के बार- में ही तो पूछा था। तो बता देते सीधे -सीधे।

वर्दी धुली हुई है, या गीली है , या वर्दी गँदी है। कुछ भी कह देते। आपको नहीं पता कि बड़े -बड़े लोग इन काले कोट वालों के आगे पानी भरते हैं।

आदमी को काले कोट और सफेद कोट से हमेशा दूर रहना चाहता है । जो इन काले कोट वालों के चक्कर में पड़ा है। उनकी दसियों पुश्तें खत्म हो गईं हैं। उनके घर की जमीन- जायदाद सब बिक गए हैं। लोग रोड़ पर आ गए ऐसे काले कोट से पँगा लेकर।

जबकि वो कमजोर बनकर आए थे। वो निमरा बनकर आए थे। जो रूमाल में रोटियाँ बाँधकर लाते थे। जो वकील और जज साहब को हाथ- जोड़कर प्रणाम करते थे। वो तो किसी गत के ना रहे। जो हाथ जोड़ते थे , पता नहीं कहाँ सिरा गए।

आपका क्या होगा एच. एस. ओ . साहब। आपने तो सीधे- सीधे न्यायपालिका पर ही हमला कर दिया है। वहाँ जज साहब के साथ वकील साहब दिन - भर बैठते हैं। उनका उनके साथ रोटी- बेटी का संबंध होता है। आपने तो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। खैर , आपने बहुत अवैध उगाही भी कर रखी होगी। तब आपके पास नोट की क्या कमी होगी। आप लोगों को जिंदा या मुर्दा मिनटों में कर देते हैं। आप पलक झपकते ही किसी को गायब कर सकते हैं। तब आपके लिए पैसों का इंतजाम और कोर्ट - जज कौन बड़ी चीज है। पैसा देने से सब मिल ही जाता है। और कहा भी गया है , भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जो अड्डा है वो हमारे पुलिसिया थाने हैं। तो आप लोग तो पहले से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, आकंठ भ्रष्टाचार में।

एस. एच. ओ. साहब पर वरीय अधिकारी भी सफाई देते दिखाई दे रहें हैं। सुना है वो एक स्कूल खोलने की तैयारी में हैं। जहाँ एस एच. ओ., हवलदारों , और चौकीदारों को पढाया जाना है। अर्थात् जहाँ ये सिखाया जाएगा कि पुलिस -पब्लिक की कैसे मदद करे। लोगों से शहद लगाकर कैसे बात करे। अरे वरीय अधिकारी महोदय आप अब उनको सिखाएँगें कि पुलिस -पब्लिक का संबंध कैसा होना चाहिए। आपको नहीं पता कि गाँजा , अफीम, चरस सब कुछ इसी शहर में बिकता है। और खुलेआम बिकता है। सब थाना और पुलिस सेट है। उगाही का सबसे बड़ा जो काम होता है। वो आपके थाने में ही होता है। जहाँ आप अभी पदस्थापित हैं। आपको भी आपका हिस्सा समय से पहुँचता ही है। काहे अलर-बलर बोल रहें हैं। आपके बड़े वरीय अधिकारी आपसे नाराज हो जाएँगे। आप अपने ही पेट पर लात काहे मार रहें हैं!

एस. एच. ओ. साहब की लीपापोती : (व्यंग्य) : महेश केशरी

पहले वो सबको ऐरा- गैरा- नत्थू- खैरा समझते थे। सबके ऊपर उनका डँडा चला करता था। वो थे और उनका डँडा था। वैसे तो उनको अपने बाप पर भी भरोसा नहीं था। जितना उनको अपने डँडे पर भरोसा था। वो सदा डँडे से ही बात करते थे। डँडे की जोर पर वो सब कुछ नियंत्रित कर सकते थे। उनका जो डँडा था वो किसी जादूगर की छड़ी की तरह था। जिसके प्रभाव से सब लोग इधर -उधर घूम जाते थे।

डँडा का ऐसा जोर था , कि लोग उनके आगे कुछ ना बोलते थे। डँडा ही न्याय था डँडा ही संविधान था। एक तरह से वो दबँग किस्म के आदमी थे। उनकी दबँगई कुछ ऐसी थी कि सब लोग उनसे पनाह माँगते थे। वो जिसको- तिसको उठाकर हाजत में बँद कर देते थे। उनको लोग यमराज की पदवी से नवाजते थे। सुना है इस बार वो काले कोट से भिड़ गए हैं। और उनपर डँडा चल गया है। अब डँडा तो डँडा है। वो भी व्यवस्था का डँडा। व्यवस्था का डँडा जब चलता है तो अच्छे- अच्छों के दुकान-मकान बिक जाते हैं। ये एस. एच. वो साहब के डँडे का ही कमाल था कि उन्होंने इसी डँडे की जोर आजमाईश पर सैकड़ों -करोड़ों की संपत्ति बना ली थी। लेकिन वो भिड़ गए काले कोट से। उनको नहीं पता है कि जो -जो आदमी व्यवस्था से भिड़ा है। उसकी चढ्ढी तक बिक गई है। एस. एच. ओ. साहब किस खेत की मूली हैं। लेकिन वो मोटी चमड़ी के थे। व्यवस्था को अपनी जेब में रखते थे । कानून ,साहब , जज ,वकील - कोर्ट कचहरी सबको जेब में लेकर चलते थे।

ये उनका अपने ऊपर आत्मविश्वास ही था कि उन्होनें इस बार "आ बैल मुझे मार वाली कहावत को चरितार्थ कर दिखाया था "।

भला हो इस मोबाइल का कि थाने में ही उनका वीडियो बना लिया गया था। और इसी मोबाइल ने उनके अँधेर -मचाने की कला को कैमरे में कैद कर लिया था। आज के जमाने में लोग गोली - बँदूक से डरें ना डरें। लेकिन कैमरे से जरूर डरते हैं। लेकिन एस . एच. ओ. साहब ना डरे। कैमरै पर खूब हाथ -पैर चलाया। और वो रातों -रात लाईम लाइट में आ चुके हैं।

सुना है वरीय अधिकारी उनके किए पर लीपा-पोती करने में लगे हुए हैं। और एस . एच . ओ. साहब को नीति की बातें और पुलिस- पब्लिक -रिलेशन कि बातों को पढ़ाने की बात कर हैं। दरअसल वो एस. एच. ओ. साहब की कारगुजारियों पर लीपा पोती करने में लगे हैं।

हाथ उनके भी काँप रहें हैं : (व्यंग्य) : महेश केशरी

हाथ कब काँपते हैं। जब हम चोरी करते हैं। जब हम कोई अवैध काम करते हैं। तब हमारे हाथ काँपते हैं। काँपते हाथों से लोग चुँबन लेते हैं। माफ कीजियेगा काँपते होंठों से लोग चुँबन लेते हैं। लेकिन अब तो आपकी उम्र भी ना रही चुँबन लेने की। खैर, इस बार ध्वज फहराते हुए भी उनके हाथ काँपे। और मीडिया की विलक्षण चक्षु प्राप्त एक समाचार वाचिका को ये दिखा भी। जिनके दो नहीं चार आँखें हैं। जो आगे -पीछे बराबर देख सकतीं हैं। खैर , उनको पलायन , बेरोजगारी, मँहगाई, भ्रष्टाचार दिखाई नहीं देता है। उनकी जो दिव्य दृष्टि है वो केवल और केवल हाथ का काँपना देख पातीं हैं। अर्थव्यवस्था की साँसें फूल रहीं हैं ये उनको नहीं दिखता।

ये वही हाथ हैं जिन्होंने नौकरियों को खत्म कर दिया। जिन्होंने लघु-उधमियों का उधम बँद कर दिया है। जिन्होनें सौंदर्यीकरण में बाजार तबाह कर दिए। जिनके कारण छोटे दुकानदार रोड़ पर आ गए। आॅनलाईन कारोबार ने व्यापरियों को मजदूर बना दिया है। लोगों को बर्बाद करते समय उनके हाथ नहीं काँपे।

यहाँ तो उनके हाथ काँप रहें हैं। और मीडिया की नजर इस बात पर अटक गई है कि उनके हाथ काँप रहें हैं। गनीमत यह है कि मीडिया ने बताते समय ये नहीं बताया कि उनके ध्वज को ऊपर खींचते समय रोंएँ भी खड़े हो गए । अगर वो बता भी देता तो तो ये मानना पड़ता कि मीडिया के लोगों की आँखों में माइक्रोस्कोप लगा हुआ है।

पिचहत्तर का होने के बाद हाथ- पैर , दाँत -आँख सब काँपने लगते हैं। इससे पहले ही आपने कई लोगों को जो पद- प्रतिष्ठा को पाने वाले थे। जो बरसों से ख्वाब पाले हुए थे कि सत्ता में रहकर नेतृत्व करें। उनको आपने पैवेलियन का रास्ता दिखा दिया।

आज तीस चालीस के युवाओें के बाल उड़ जा रहें हैं। रीवाइटल खाकर दिनचर्या चल रही है। परिवार और लोगों की जरुरतें सुनकर लोगों के सिर के बाल उडते चले जा रहें हैं।

आपके तो खाली हाथ ही काँप रहें हैं। मँहगाई है कि थमने का नाम नहीं ले रही है। लोग समय से पहले बूढ़े होते जा रहें हैं।

इधर इनके हाथ काँप रहें हैं। उधर जी. डी.पी. के पाँव काँप रहे हैं। जी. डी. पी. में सुधार नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपया काँपने लगा है। डॉलर सत्तर से एक सौ चार पर पहुँच गया है।

हाथ उनके भी काँप रहें हैं जिन्होनें बिटिया की शादी के लिए कर्ज ले रखा है। हाथ उनके भी काँप रहें हैं जो लोन लेकर पढ़ाई कर रहें हैं। लेकिन नौकरियाँ या काम नदारद हैं। हाथ उनके भी काँप रहें हैं जिन्होनें कर्ज लेकर फसल लगाई है। और जिनको एम. एस. पी. नहीं मिल रही है। या फसल खराब हो गई है। हाथ उनके भी काँप रहें हैं जिनके पर्चे लीक हो रहें हैं।

राजनीति में युवा : (व्यंग्य) : महेश केशरी

यूँ तो युवा होने की एक तय उम्र है। उससे पहले कोई भी युवा नहीं हो सकता। लेकिन वर्तमान राजनीति ने इस बात को झूठला दिया है। राजनीति में युवा होने की कोई उम्र नहीं है।
फिर भी मतदान करने की जो उम्र जो है , वो अट्ठारह साल है।
यानी जब आप मतदान करने लगे हैं ,तो समझिए कि आप युवा हो चुके हैं। लेकिन यदि आप पुरूष हैं, तो आप शादी के लिए युवा नहीं हैं। शादी के लिए आप तभी युवा होंगें। जब आपकी उम्र इक्कीस की हो जाएगी ।

युवा होना का स्वप्न सबका होता है। किसी को अगर आप अंकल कह दें, तो वो बिदक जाता हे। त्योंरियाँ चढ़ाकर लड़ने पर आमदा हो जाता है, कि नहीं मैं भी युवा हूँ। मुझे अंकल मत कहो। इसका राजनीति में ही रामबाण इलाज है। जो राजनीति करने से चूका। उसका बूढ़ा होना मान लिया जाएगा।

युवा होने की लालसा ही कुछ ऐसी है, कि कोई बूढ़ा नहीं कहलाना चाहता। भले ही वो जवानी का सुख चाहने के लिए व्याग्रा या मैनफोर्स टैबलैट का इस्तेमाल करता हो। या जवानी को पहले की तरह ही दमदार बनाए रखने के लिए नियमित च्यवनप्राश का इस्तेमाल करता हो। या युवा बनने के लिए खिजाब लगाता हो। सबका आधार बस यही है, कि वो युवा दिखें। लेकिन‌ आप इसके बगैर भी युवा दिख सकते हैं। आपको बस राजनीति ज्वाइन कर लेनी है। जैसे ही आप राजनीति ज्वाइन करते हैं। आप तत्काल ही युवा हो जाते हैं। यकीन मानिए मैं सही कह रहा हूँ। लोग पैंतालिस की उम्र में युवा हैं। एक तो पिचहत्तर की उम्र में युवा हैं। एक सत्तावन की उम्र में भी युवा हैं। राजनीति ना हो गई एज को कम करने वाली फिल्टर मशीन हो गई। आज हर ऐरा -गैरा- नत्थू- खैरा युवा बना फिर रहा है। भले ही उसके मुँह दाँत ना हों। पेट में आँत ना हों। सिर पर बाल ना हों। यकीन मानिए वो और कुछ हो ना होगा तो युवा जरूर होगा। बस शर्त ये है कि उसको राजनीति में होना होगा।

राजनीति में लोग कभी बूढ़े नहीं होते। जैसे -जैसे आप राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ने लगते हैं। और आपका कद या रूतबा या पावर बढ़ने लगता है। आप युवा पर युवा होने लगते हैं। जैसे- जैसे आप राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाते हैं। उम्र के सत्तरवें पायदान से उतरने लगते हैं। फिर आप उनहत्तर , अरसठ , सड़सठ , छयाछट , पैंसट, चौंसट , तिरसठ यानी रिवार्स गियर पकड़ लेते हैं।

अगर कोई आदमी अपने राजनीति के शिखर पर चढ़ने में चालीस साल लगा चुका है। और वो देश के किसी प्रमुख पद पर है। तो उसकी उम्र पाइथागोरस सिद्धांत के अनुसार सत्तर माइनस चालीस यानी उसकी वास्तविक राजनीति उम्र तीस साल मानी जाएगी।

इस तरह से देखा जाए तो उसको पैंतालीस पचास साल के किसी झँडुबाम नेता की तुलना में अधिक युवा नेता माना जाएगा। राजनीति की सीढ़ियों का सोपान कुछ इस तरह का है कि ज्यों- ज्यों हम उम्र में बढ़ते हैं। हमारी उम्र पीछे की तरफ सरकने लगती है। इस तरह से जो लोग पचास -पचप्पन के आसपास के लोग हैं। और जिनका शूगर ,बी. पी. हमेशा बढ़ा हुआ रहता है। या वैसे लोग जो निकट भविष्य में मरने वाले हैं । उनको अगर डॉक्टर प्रिसक्रिप्शन पर ये लिखकर दें दे, कि आप राजनीति में एक लँबी पारी खेल सकते हैं।लिहाजा राजनीति नाम पुष्टि कारक रस का सेवन कीजिए आपकी सारी व्याधियाँ राजनीति के मात्र प्रसाद ग्रहण से दूर हो सकतीं हैं। लिहाजा आप राजनीति का झँडा लेकर दौड़ पड़िए। आप देखेंगें, कि उनके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा है।और महीने दिन में ही वो राजनीति का झँड़ा ढ़ोते हुए, दौड़ -भाग करते -करते पूर्णतया स्वस्थ्य होकर ठीक तरह से अपनी दैनंदिनी में लौट आएगा।

राजनीति का प्रसाद ऐसा प्रसाद है, कि आदमी उसको चाटकर आजीवण जवान बना रह सकता है। हमने राजनीति में कई ऐसे बड़े- बड़े नामों सुनें हैं , जो साठ- सत्तर साल की उम्र में भी युवा नेता है।

अत: जिन लोगों को अपने को कभी अंकल नहीं कहलवाना हो। या जो युवतियाँ आजीवण युवा रहनी चाहतीं हैं। वो जल्द से जल्द राजनीति ज्वाईन कर लें।

भ्रष्टाचार में डूबे रहने का सुख : (व्यंग्य) : महेश केशरी

सी . एम. डी. साहब रो रहें हैं। उनका दु:ख अलग किस्म का है। उनका कहना है कि अवैध कोयले के कारोबर से बहुत नुकसान हो रहा है। लेकिन उनका कथन इस बात को झूठला रहा है? कारण की वो अपनी संस्था और उनकी ईकाईयों को हर साल मुनाफे में दिखाते रहें हैं? कारोबार से फायदा ही फायदा हो रहा है।

सी. एम.डी. साहब वर्षवार ये बताते रहें हैं, कि अमुक वर्ष इतने टन उत्पादन हुआ। जो पिछले साल के उत्पादन लक्ष्य से इतना हजार टन ज्यादा है? वो कई बार तय सीमा से अधिक उत्पादन होने के कारण पुरस्कृत भी हुए हैं। सी. एम. डी. साहब इधर चिंतित हैं। उनकी चिंता का कारण ये है, कि हमारे यहाँ अवैध कोयला निकासी और बिक्री होती है।

अब चिराग तले ही अँधेरा है। जुर्म थाने से सटे घर में होता है। और दिलचस्प ये है कि कोतवाल को कुछ पता ही नहीं है, कि चोर कौन है।

भ्रष्टाचार की गँगा में डुबकी लगाने का जो सुख है। वो सुख और कहाँ। लोग ऐसे सुख का बयान भी नहीं कर सकते। गूँगा कैसे बता सकता है, गुड़ का स्वाद। खैर, यहाँ भ्रष्टाचार पर बात करना बेमानी है। कारण की हम सब काजल की कोठरी में पड़े हैं। कोई दूध का टैंकर पलट जाए। लोग अपने- अपने घरों से दूध को बर्तन में भरकर ले जाते हैं।

कौन मरा कौन बचा ये किसको जानना है। लोग जल्दी -जल्दी अपने -अपने बर्तन भरकर ले जाने की फिराक में हैं। सब के सब बेईमान, परम भ्रष्टाचारी। हम उस देश में रहते हैंं ,जहाँ बैंक में पेन को बाँधकर रखते हैं। ट्रेन के गुस्लखाने में मग को जँजीरों से बाँधकर रखना पड़ता है। नुक्कड़ के ठेले -खोमचे -स्टोल सब पोल से सिक्कड़ से बँधे होते हैं। यानि हम सब भ्रष्टाचारी हैं। हम सोचते हैं , कि कोई देश सुधारक या समाज सुधारक रातों -रात आएगा,और जादू की छड़ी से देश की हालत बदल देगा। लेकिन एक अरब चालीस करोड़ लोगों का ये देश है। और हमाम में जब सब नँगें हैं,तो भ्रष्टाचार पर बात करना बेमानी बात होगा। भ्रष्टाचार में डूबे रहने का सुख जो है, वो अन्यत्र कहाँ!

इधर सी. एम. डी. साहब का कोयला बिक नहीं रहा है। लिहाजा वो दुःखी हैं। और सी. एम. डी. साहब की दिली इच्छा है, कि अवैध कोयले की बिक्री पर अँकुश लगे।

लेकिन‌ सी. एम. डी. साहब से गुजारिश है। जब से आॅनलाईन शॉपिंग हुई है। छोटे दुकानदारों की हालत बहुत खराब हुई है। हम दुकानदार पहले पूँजी लगाते हैं। फिर गदहे की तरह दिन- रात खटते हैं। तब भी पेट नहीं भरता है।

दुकानदार पंजाब ,हरियाणा, दिल्ली जाकर खटते -खटते मर जाते हैं? सोचिए आपकी कोई पूँजी खुदाई में लगनी नहीं है। जमीन के नीचे पड़ा माल काटकर बेच देना है। मुनाफा ही मुनाफा। अब नाई कहे कि बाल काटकर कमाई नहीं हुई तो सोचना पडेगा।

तब आप अवैध खनन से परेशान हैं। और आपका माल बिक नहीं रहा है। तो आपसे मेरा मे कहना है, कि जब लोहा- लोहे को ही काटता है। तो आप भी उसी तर्ज पर काम कीजिए। आप भी कंपीट कीजिए। अवैध कोयले से सस्ता आप बेच कर दिखा दीजिए। और अगर फिर भी आप मुनाफा दिखाते हैं। तो आपको आपके उच्च अधिकारी ही नहीं जनता भी पीठ ठोकेगी, कि आपने कंपीट करके सस्ते में माल बेच कर भी मुनाफा कमा कर दिखाया है। आप अकेले दौड़कर फर्स्ट आए भी तो क्या फर्स्ट आए। जनता के साथ यानी फुटकर विक्रेताओं के साथ दौड़कर दिखाईए। तब आएगा ना ऊँट पहाड़ के नीचे।

उनको भी पता चलना चाहिए कि उन्होंने किससे पँगा लिया है। आपको कौन सा खरीदकर लाना है। कोयला को खोदना हे और बेच देना है। आपको हमारा तरह पूँजी थोड़ी लगानी है। जो आपको नफा- नुकसान की सोचनी पड़े।

पिज्जा की संस्कृति और आउटडेटेड शादी : (व्यंग्य) : महेश केशरी

अभी लोग शादी का विरोध कर रहें हैं। तीस -तीस , चालीस -चालीस के लोग लिव-इन में रह रहें हैं। कारण की ये रेडिमेड युग है, ये रेडीमेट लोग हैं। ये लोग पैदा नहीं हुए हैं। डाऊनलोड हुए हैं। जिनको संस्कार की बातें बकवास लगती हैं। जो संयुक्त परिवार नहीं चाहते। जिनको काम कम अय्याशी अधिक करनी है। जो सप्ताह में वीकेंड चाहते हैं। जो लैपटॉप पर घँटों बैठे रहना पसँद करेंगे, लेकिन अपने कपड़े धोना उनको पसँद नहीं है। महीनों बिना नहाए पड़े रहेंगे। इनको सेंकने के लिए धूप चाहिए। फूँकने के लिए सिगरेट चाहिए।

जो पति /पत्नी/ बच्चों की जिम्मेदारी सँभालने से बचना चाहते हैं। जो " हाऊ डिस्कसटिंग मैन " कहते नहीं अघाते। जो हरदम " ओ माई गॉड , ओ माई गॉड " कहते नहीं थकते।

ये वो जेनरेशन है। जिन्होंने हगा नहीं है, पोटी की है। जिन्होंने काँटे - चम्मच से खाना खाया है। जिन्होंने मकई - मडुआ नहीं खाया। जिनको बटर - ब्रेड - और पिज्जा- बर्गर भाता है।

जो दूध नहीं शराब या रेड़ वाईन पीते हैं।जो ट्रीमर से दाढ़ी बनाते हैं।जिनको दौलत विरासत में मिली है। जिन्होंने कभी काम नहीं किया।

जिनकी फरमाईश पर मिनटों में चीजें उनको मिली हैं। जिन्होंने शकरकँद नहीं देखा, जिनको सुथनी के बारे में नहीं पता। जिन्होनें कुरथी की दाल नहीं खाई। जो ये समझ नहीं पाते कि आलू के पेंड़ नहीं होते वो जमीन के भीतर होता है।

उनको तो शादी बेकार लगेगी ही। ये वैसे लोग हैं जो फर्राटेदार अँग्रेजी बोलते हैं। लेकिन काहिल और कामचोर हैं। जिन्होंने कभी संघर्ष नहीं किया। जिन्होंने कभी पानी भरकर चापानल से नहीं लाया। जिन्होंने कभी फर्श नहीं पोंछा। जिन्होनें कभी खाना नहीं बनाया। जिन्होंने कभी भाजी तरकारी नहीं खरीदी। जिनको पता नहीं है, कि मूँगफली पेंड पर नहीं उगती बल्कि जमीन के भीतर उगती है। जिन्होंने हल -बैल नहीं देखा। जिन्होंने खेती की मेहनत नहीं देखी। शादी का विरोध वही लोग कर रहें हैं जिन्होनें कभी मेहनत ही नहीं की। अचानक से उनके सामने मेहनती दुनिया दिखाई पड़ती है। जिसमें सुबह उठकर तरकारी भाजी लाना है। राशन पानी जुटाना है।

अब जब शादी के बाद पति , पत्नी को या पत्नी , पति को काम करने के लिए या कमाने के लिए कहेगा तो काहिल औरत/मर्द को ये शोषण लगेगा ही। वाजिब बात है। जिन्होंने कभी तिनका भी उठाकर इधर -उधर नहीं किया। उनको काम करना पड़े। बर्तन धोना पड़े , कपड़े साफ करना पड़े तो शादी तो शोषण लगेगा ही। भाई आपने लड़ने से पहले तो कोई तैयारी की ही नहीं है। शादी जैसे जँग के मैदान में कूदने से पहले तैयारी तो करनी ही चाहिए थी।

जो नेपिपैड पर पलते रहे। जिन्होंने ब्रेड और जैम खाया है। जिनको उबले अँड़े चाहिए। जिनको रोस्टेड टोस्ट खाना है। जिन्होंने कभी कपड़े हाथ से नहीं धोए। जिन्होंने खाना कभी कोयले या लकड़ी पर नहीं पकाया। जिनको इंडक्शन चाहिए। जिनको गीजर चाहिए। जिन्होंने कभी लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर पानी गर्म करके बाथरूम में नहीं नहाया। उनको टँकी के ऊपर गीजर चाहिए। सोने को ए.सी. रूम चाहिए।

आप कहेंगे लोग कौन हैं ऐसे जो हमारे समाज में इस तरह की सोच रखते हैं , कि शादी आउटडेटेड फैशन की चीज है। कौन लोग इसका विरोध कर रहें है़ं। और इनकी पहचान क्या है। तो ऐसे लोग जो तीस- तीस , चालीस- चालीस साल के हो गए हैं। जो अभी कैरियर पर फोकस कर रहें हैं। वो एक्स्ट्रा लोड नहीं ले सकते हैं। जिनको लगता है कि कौन करे शादी का झमेला जब इधर- उधर से कम चल ही रहा है।

वो आपको लँबे -लँबे बालों में दिख सकते / सकतीं हैं। ये जरा सा धूप में चलते हैं तो इनका चेहरा कुँभलाने लगता है। ये नर्सरी में तैयार किए गए पौधे होते हैं। इसके मुकाबले जो शादी- शुदा लोग हैं। वो तपे हुए लोग हैं। वो थेथर या बेहया की तरह के हैं। इनको किसी तरह के खाद -पानी की जरूरत नहीं होती। ये मेहनती लोग हैं। शादी जैसी व्यवस्था में अटूट विश्वास रखते हैं। इनका आत्मविश्वास ही सबकुछ बयान कर देता है। ऐसे लोग तपे- तपाए होते हैं। सोने की माफिक। जिनको पीटकर , घिसकर और आग में तपाकर आप देख लीजिये। ये ज्यों- के-त्यों रहेंगे। शादीशुदा लोग खराब परिस्थिति रूपी बैल को लाल कपड़ा दिखाने की कुव्वत रखते हैं। जो नर्सरी के पौधों में नहीं होता है।

क्रिसमस की काट और जाति मिलन समारोह : (व्यंग्य) : महेश केशरी

नया साल आने से पहले पहले पुरानी बातें दोहराई जाने लगीं हैं। इन्हीं पुरानी बातों में है जाति मिलन समारोह। सब लोग उछल -उछल कर जाति मिलन समारोह में आचमन करने के लिए कूदने लगे हैं। सब लोग जातियों पर गौरव कर रहें हैं। और जातियों का सम्मेलन नव-वर्ष की पूर्व संघ्या पर शुरू होने ही वाला है। आचमन पर आचमन, चर्चे पर चर्चे।

और ले जाति दे जाति के चर्चे जोरों- शोर पर हैं। बात चँदे को लेकर है रही है, कि इस साल एक हजार रूपये का चँदा लग रहा है। चँदे पर चर्चा से मसला कुछ ज्यादा ही गर्मा गया है। लोग खाने- पीने की चर्चा कर रहें हैं। हर चाल की कु व्यवस्था पर चर्चा चल पड़ी है। बैग वाले भाई साहब पचास किलो आलू खरीदते हैं। और चार सौ किलो का बिल बना देते हैं। स्पंजी रसगुल्ला की जगह कम दाम का रसगुल्ला पिछले साल चला दिया गया था? बैग वाले रोकड़िया भाई साहब पर हर साल गबन का आरोप लगता है। वो हजार हजार का चँदा लेते हैं। और सब पैसे डकार जाते हैं। पिछले साल पुड़ी ठंडी मिली थी। जाति सम्मेलन ना हुआ बाल का खाल खींचने का प्रोग्राम चल रहा है। जब सब लोग हजार- हजार चँदा दे रहा हैं,तो अलग -अलग लोगों को अलग -अलग ढ़ँग से क्यों पूछा जा रहा है। किसी को कुर्सी पर बैठाया जा रहा है, तो किसी को पानी भी नहीं पूछा जा रहा है। चाय बेचने वाले चहवड़ियों और पान बेचने वाले पनवड़ियों की कोई नहीं पूछ रहा है। ये अपनी ही जाति में हजार रूपये देकर जैसे जाति से खारिज किए हुए लोग हैं। जमीन पर बैठने वाले। जैसे देश निकाला हों, अंत्यज।

आज भी देश में एक ही चायवाले की पूछ है। दूसरे चाय वाले और पान वालों की हालत बुरी है।

कोई काहे जाएगा अगर आप बुलाकर नहीं पूछेंगें। ये तो वही बात हो गई, कि जिसके माथे में तेल है। उसको ही लोग तेल दे रहें हैं। पैसे वाले की इज्जत हो रही है। और बिना पैसे वालों की कोई बात नहीं पूछता। और पिछली बार तो खाने के लिए लूट मच गई थी। पनवड़िये, चायवड़िये को पुड़ी तक नसीब नहीं हुई थी। लिहाजा ये तय हुआ है कि इस सम्मेलन में जाना ही नहीं है तो चँदा क्यों देना। खैर जो असली वजह है उसको जानना जरूरी है। असली वजह काट देने की है। हर समस्या का जब समाधान है तो इसका ना होगा। इस बार क्रिसमस को काट देना है। काट -काट कर लोगों को बाँट देना है।भले ही हम एक्सीडेंट में छटपटाते रहे। कोई जाति वाला ही आएगा तभी हमको उठाएगा। चाहे हमारे शरीर में खून घट जाए। खून शरीर में एक्सीडेंट के बाद खत्म हो जाए। हम खून अपनी ही जाति वालों से लेंगे। अभी हाथ -पैर ठीक है तो अभी हम शेखी बघारेंगें ही। लिहाजा जाति- सम्मेलन क्रिसमस पर यानी तुलसी पूजन के दिन ही करेंगें। वाह क्या आइडिया है। मानना पड़ेगा गुरू। भले ही जाति में कोई पूछ ना रहा हो। जाति की टोकरी सिर पर उठाए घूमेंगें।

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