व्यंग्य (41-60) : महेश केशरी
Hindi Vyangya (41-60) : Mahesh Keshri
कलाकार की जाति : (व्यंग्य) : महेश केशरी
एक बार एक समय में एक शख्स ने एक दूसरे शख्स से उसकी जात पूछ ली। पहला शख्स दूसरे शख्स से बोला। भाई मैं कलाकार हूँ। कलाकर और साधु की कोई जात नहीं होती। शख्स विदक गया। बोला जब आज सब बँटे- बँटे से हैं। और एक दूसरे से कटे कटे से हैं। तब कलाकार एक कैसे रह सकता है।
जब कपड़ों के रँग भी धार्मिक हो गए हैं। गाय और बकरों तक के धर्म का बँटवारा हो गया है। जब लोग एक - दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। तब तुम कलाकारों की इतनी हिम्मत कि तुम लोग बँटे हुए नहीं हो।
हाँ भाई, मेरे साथ और हम कलाकारों के साथ कुछ ऐसा ही है। दरअसल हम कलाकार मजदूर जाति से हैं। हमारे हाथ को हर हाल में काम चाहिए होता है। मिट्टी के लोंदे को चाक पर गढ़कर बर्तन बना देते हैं। पत्थर को छैनी- हथौड़ी से तोड़कर मूर्ति बना देते हैं। हाथ का दिया ही खाते हैं। गाय -बकरों को बाँटने की बात हम नहीं सोचते। कपड़ों का रँग हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता। हम तो पेट कि आग को शाँत करने की बात सोचते हैं।
मोटा महीन खाके गुजारा करते हैं। लेकिन हाथ और गले में सरस्वती का वास है। कभी ठुमरी भी गा लते हैं। कभी फाग भी। कभी चैता भी। कभी गजल भी गा लेते हैं। कभी नज्म और कव्वाली भी।
अब माँ सरस्वती गले में विराजती हैं। क्या करूँ। लॉकडाउन में शहर से भगाया गया आदमी हूँ।
शहर में हम लोगों के लिए काम ही नहीं बचा। तो शहर में रहकर क्या करते। बिहार -झारखंड से हैं। इसलिए काम करने महाराष्ट्र चले गए। महाराष्ट्र में नगर- निगम के चुनाव आने वाले हैं। इसलिए वहाँ भी जुतियाए जा रहें हैं। हर जगह जब बाँटने की कवायद चल पड़ी है। तब हम लोग मरते क्या ना करते . अपनी कला के सहारे पेट भरने में लगे हैं । लेकिन भजन कीर्तन में इस टाईम किसी की भी रूचि नहीं है। ये धँधा भी बहुत मँदा चल रहा है। इस जमाने में लोग रील्स बनाने . इंस्टाटग्राम और फेसबुक पर कमर मटाकने में लगे है। तब भजन- कीर्तन कौन करता है। कौन सुनता और भजता है, भगवान् को। प्रभु का नाम सुमिरन करने से लोगों को मोक्ष जरूर मिलता होगा। लेकिन इस बात से किसको फर्क पड़ता है। अब लोग यो- यो हनी सिंह को भजने में लगे हैं।
छोड़ो ये सब बातें। इस तरफ आ जाओ। इधर आओगे तो लोग तुमसे कंविंस होंगे। हम लोग भी एक ही राग गा- गाकर और जनता को बेवकूफ़ बना-बनाकर थक गए हैं। लिहाजा ये नया पेंच कामयाब रहेगा। बोलने को भी तो हमेशा कुछ नया होना चाहिए। लेकिन उससे पहले हमें तुम्हारी जाति लोगों को बतानी होगी। उनको बताना होगा, कि इस कलाकार जो कि फलाँ जाति का था। तुम उनके लिए एक रोलमॉडल होगे।
लेकिन पहले बताओ कौन जात हो? दूसरा शख्स मुस्कुराया। बोला रहने दीजिए। कलाकार और साधु कि कोई जाति नहीं होती। कोई साधु होकर भी रास्ते अलग होने की बात कहकर और सुनकर लोगों को अलग रास्ते पर चलने की हिदायत कर रहा है। जो वर्ण व्यवस्था का कट्टर समर्थक है।
कोई नेमप्लेट लगाने पर जोर दे रहा है। कोई भाषा के नाम पर संमदर में डूबो - डूबो कर मारने की बात कर रहा है।
सब मरने और मारने में ही लगे हैं। कहीं जिंदा रहने की बात नहीं हो रही है। ये समय बहुत गाढ़ा है। इसलिए कम - से -कम कलाकार को किसी पंथ और मजहब से दूर रहने दीजिए। हम दोनों तरफ के लोगों को समझा बुझाकर काम चलाएँगे।
पहला शख्स अच्छा हुआ जो तुमसे मेरी मुलाकात हो गई। अब तुम बहुत भटक चुके। अब तुम लोगों को हमारे लिए लामंबद करो।
गुस्ताखी माफ हुजूर। लेकिन हम कलाकार हैं। नेता नहीं। नेताजी की कलाकारी के आगे हमारी कलाकारी दो पैसे की भी नहीं है। या इसको ऐसे समझना चाहिये, कि नेताजी से बड़ा कलाकार पूरी दुनिया में कोई नहीं है।
लामंबद करने की हमारी औकात कहाँ हुजूर। हम तो छेनी हथौड़ी वाले आदमी हैं। कलाकारी तो नेताजी जी जानते हैं। उनको जो लोगों को धत्ता बताने का अनुभव है। वो हम कहाँ से लाएँ!
आपका पब्लिक डोमेन में रोना : (व्यंग्य) : महेश केशरी
शादी के बाद हर कोई रोता ही है। शादी के बाद मैनें किसी को हँसते हुए नहीं देखा। हर कोई रो ही रहा है। लेकिन इस तरह मीडिया और पब्लिक डोमेन में रोना कहीं से भी ठीक नहीं है। इस तरह से अगर तुम रोओगी। तो तुम्हारे एजी, ओजी भला क्या सोचेंगे। आपके रोने से आपका कुछ तो नहीं गया है। लेकिन आपके पति और उनकी पत्नी का दिल असुरक्षा की भावना से घिर जरूर गया है। इसलिए रोइए जरूर। लेकिन इस तरह पब्लिक डोमेन में तो मत रोइए। आपके रोने के बहुत से मायने हैं। आप कहती हैं। मुलाकात नहीं दर्शन से आप धन्य हो गईं। आपने समझाया कि मिलने और दर्शन होने का फर्क क्या होता है।
आपने इस मिलने और दर्शन करने के गूढ अर्थ का मतलब हमें समझाया उसके लिए हम सब आपके ऋणी रहेंगे। इस तरह से पब्लिक डोमेन में वैसे ही लोग रोते हैं। जो किसी पार्टी पोलिटिक्स से वास्ता रखते हैं। तुम्हारा रोना भी कुछ कुछ वैसा ही लगता है। जैसे ये राजनीति से प्रेरित हो। राजनीति में सबकुछ का एक तय रेट होता है। हँसने का, भीड़ लगाने का, नारे लगाने का। हमारे यहाँ रैली में चलने का एक आदमी का पाँच सौ रूपया मिलता है। उसका रेट फिक्स है। गाड़ी में तेल डलवा दीजिए। और लोगों को पाँच - पाँच सौ रूपये पकड़ा दीजिए। लोग आसमान में अपनी आवाज से सुराख कर देंगें। कुछ इस तरह चिल्लाते हैं। मुर्दाबाद - जिंदाबाद जो और जैसे नारे आपको लगवाने हों। कलेवर और फ्लेवर आपको लिखकर देना भर है।
रैलियों के लिए लोग ताली बजाने, नारे लगाने, बैनर टाँगने, झँडा उठाने सबका रेट तय है।
लेकिन इस वर्तमान की घटना " रोना भी एक कला है " इस विषय पर एक नई किताब लिखने के लिए लेखकों को एक तरह से एक नई सामग्री उपलब्ध करवा दी है। " लोकप्रियता रोकर कैसे हासिल करें " इस किताब पर लेखकों को काम करने की सामग्री उपलब्ध करवा दी है।
लोग करें भी तो क्या करें। चुनाव आता है। तो जो बेरोजगारी के बहुत व्यापक स्तर में थोड़ी बहुत राहत लेकर आता है। चुनावी दिनों में लोगों को राहत मिलती नजर आती है। कहीं मछली भात, कहीं मुर्गा भात की पार्टी चलती है। लेकिन ये सब बड़े चुनावों लोकसभा और विधानसभा में होता है। फिर नेताजी स्वरोजगार करने लगते हैं। और जनता बेगारी और फाँकाकशी करने लगती है।
सबसे ज्यादा बोतल पर चुनाव होता है। उसके बाद हजार -पाँच सौ लोगों के हाथ पर धर दीजिए। और ले लीजिए वोट। इधर पाऊच पकड़ा कर भी लोग वोट ले रहे थे। हमारे यहाँ के एक नेताजी ने धरना ऑन क्रेडिट पर दिलवा दिया था । इस तरह एक नई परिपाटी का चलन हमारे यहाँ की राजनीति में उन दिनों हुआ था। बोले आप लोग हमारी गाड़ियों में भरकर फलाने जगह चलो। धरने के बाद सबको खाना और पैसे दिए जाएँगें। धरने के बाद नेताजी और बिचौलिया दोनों शहर से बाहर शायद दिल्ली प्रवास पर चलें गए ।
एक शराबी का आवेदन पत्र : (व्यंग्य) : महेश केशरी
सेवा में, भगवान् जी
मैं, एक शराबी हूँ। मैं खाना खाए बिना हफ्तों रह सकता हूँ।लेकिन पिए बिना नहीं। धरती पर खाने से ज्यादा सुख पीने का है। पीने के अपने फायदे हैं। खाना खाते समय हमारे दाँतों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती। जबड़े रोटी - भात, साग - सब्जी चबाते हुए दुखने लगते हैं। लिहाजा हम शराबियों को अपने जबड़ों और दाँतो की -बहुत चिंता रहती है।
इसी चिंता और प्रयास के कारण हमारे दाँत हमेशा से चुस्त -दुरूस्त, साफ- सुथरे और चमकीले बने रहते हैं। कारण कि चखना, माँस, मछली, मीट, मुर्गा, अँडा चबाने के लिए मजबूत दाँतों की हमेशा जरूरत पड़ती है। जब कुछ नहीं मिलता। तो चना -भूँजा खाकर ही दारू पीना पड़ता है। लिहाजा इस समय के लिए मजबूत दाँतों की जरूरत पड़ती है।
इस हिसाब से अगर देखा जाए तो हर आदमी को खाने से ज्यादा पीना चाहिए। इससे दाँतों का स्वास्थ्य हमेशा एक सा बना रहता है। कैविटी और पैरिया जैसी दाँतों की गँभीर बीमारियों से हम बचे रहते हैं। इसके अलावे हम ये चाहते हैं, कि वरीयता में ये ध्यान जरूर रखना चाहिए, कि जिस देश में हम शराबियों का जन्म हुआ है । उस देश को कम -से- कम वाईन -फ्री कँट्री जरूर होना चाहिए । और सब तो ठीक है। लेकिन हमारा जन्म बिहार में मत कीजिएगा । काहे से कि जो चचा हैं। वो शराब को बिहार में बैन किए हुए हैं। और हमलोगों को वहाँ शराब बहुत मँहगी मिलती है। पीते समय हमेशा डर बना रहता है, कि कहीं पुलिस पकड़ ना ले। लुक-छिपकर पीना पड़ता है। पीने का असली मजा तो पीकर हँगामा करने में हैं। अगर पैसा खर्चकर पीया है। तो हँगामा करके पैसा वसूल क्यों ना करें। इसका मौका हमें बिहार जैसे राज्यों में जन्म लेकर नहीं मिल पाता। लिहाजा नीतीश चचा और बिहार को केरल के आसपास या श्रीलंका के बगल में शिफ्ट कर दीजियेगा।
नालियों को भगवान् ढँकना नहीं है। भले ही उसमें हम बारंबार गिरें। हम शराबियों को नालियों में पड़े रहने देना। काहे से कि नालियों में ही हमें स्वर्ग का सुख मिलता है। एक तरह का स्विमिंग पुल का काम हमारे लिए ये नालियाँ करतीं हैं। गर्मियों में जब हमें बहुत गर्मी लगती है। तब ये नालियाँ हमें ठंढक पहुँचाती हैं। हर शराब दुकान के आसपास और हमारे घर के बगल में भी ऐसी खुली नालियाँ दे देना भगवान्। जिससे हमें स्विमिंग पुल का आनंद हमें हमारे घर के बगल में ही मिले। वो क्या है ना भगवान् कि जब भठ्ठी बँद हो जाती है। तो ठर्रा घर में लाकर पीना पड़ता है। इस कारण घर वाली बहुत चिकचिक करती है। लिहाजा नाले के बगल में बैठकर पीना पड़ता है। पी लेने के बाद चलने की ताकत कहाँ बचती है। लिहाजा घर के बगल में ही नाली देने का कष्ट करना, भगवान्।
भगवान् जब में जन्म लूँ। तो कैलेंडर को माईनस में चलाना। यानी पर्व त्योहार माइनस करते जाना।
मेरे होने वाले दूसरे जन्म के बाद। सावन, कार्तिक, मँगल, वृहस्पतिवार को कैलेंडर से माइनस कर देना भगवान्। काहे कि माँस -मदिरा खाने के लिए हमारी घरवाली इन दिनों और इन महीनों में मना करती है। हो सके तो मँगल की जगह डबल बुध और डबल शनि, और डबल रविवार डाल देना कैलेंडर में। सावन को और कार्तिक महीने को माइनस कर देना प्रभू। इसके बदले डबल भादो कर देना। डबल आश्विन कर देना, प्रभू। नहीं- नहीं प्रभू। आश्विन में तो पितृपक्ष होता है। इसको भी माइनस कर देना। पितृपक्ष किसलिए मनाऊँ। मेरा बाप पियक्कड़ था। उसने मेरे लिए कोई पैतृक संपत्ति नहीं छोड़ी। जिसको बेचकर मैं लँबे समय तक दारू पी पाता । तो मैं उसको लेकर क्यों शोक मनाऊँ। लिहाजा डबल पूस कर देना, प्रभू । ठंढ में पीने का मजा ही कुछ और होता है। कँबल में लेटकर पीते रहो।
भगवान्, उम्र बढ़ने के साथ दाँत गिरने लगते हैं। इसकी मुझे कोई फिक्र नहीं है। वैसे भी दाँत की जरूरत हम लोगों को नहीं पड़ती है। लेकिन एक अनुरोध है। दाँत की जगह दो- चार लीवर दे देना । काहे से कि हमलोगों की आयु इसलिए भी कम हो जाती है, कि हमारे पास लीवर एक ही होता है। और हम जल्दी से आपके पास बुला लिए जाते हैं। लिहाजा, हमारे दाँत भले ही दो चार कम डालना। हम मैनेज कर लेंगें। लेकिन लीवर अच्छी क़्वालिटी का डालना। ताकि हम शराब का आनंद लँबे समय तक ले सकें। चार लीवर डाल दोगे, तो बहुत बढ़िया रहेगा, प्रभू । और दर्जन भर किडनी भी डाल देना भगवन् । इस तरह हमलोग कुछ दिन और इस पृथ्वी पर जीवित रहकर सोमरस का आनंद ले सकेंगें। नाले में बेसुध होकर जब लोग गिर जाते हैं। तब आपके भैरोनाथ हम शराबियों के साथ बड़ा अन्याय करते हैं, प्रभू। इन भैरवनाथों का ये मजाक हमें बहुत खलता है, प्रभू। भैरोनाथ महराज टाँग उठाकर हम शराबियों के चेहरे या मँह पर पेशाब कर देते हैं। इस विषय को भी आपको देखना चाहिए, प्रभू । इस बात को भी आप तत्काल संज्ञान लेने का कष्ट करें, प्रभू। इससे हम शराबी बहुत परेशान रहते हैं, प्रभू । उम्मीद है, आप हमारे आवेदन का निष्पादन जल्द-से -जल्द करने की कृपा करेंगें, प्रभू। आपका दास।
नाम -पृथ्वी लोक का एक शराबी।
मोबाइल नंबर - अभी मौजूद नहीं है। निरंतर पेट में शराब की आपूर्ति बाधित ना हो इसके लिए बेच दिया।
स्थायी पता - घर के बगल की कोई नाली या ठर्रा दुकान।
छैला बाबू और राखी : (व्यंग्य) : महेश केशरी
छैला बाबू वैसे तो बम, बँदूक से भी नहीं डरते थे। लेकिन जब जब राखी का त्योहार आता, तो छैला बाबू अंडर- ग्राऊँड हो जाते थे। और हफ्तों स्कूल नहीं आते थे। राखी के डर से।
वैसे तो राखी खास मौके का त्योहार है। लेकिन बेमतलब की राखी हमारे स्कूल में बिना सीजन के भी मनाई जाती थी। काहे की छैला बाबू आशिक मिजाज के थे। राखी आयी है। तो मुझे छैला बाबू की याद हो आई है। छैला बाबू, राखी , और जन्माष्टमी में बहुत ही गहरा संबंध है। उस जमाने में रिश्तों का डर था। उसकी अहमियत थी। लोग इस रिश्ते की परवाह करते थे। आज की तरह नहीं कि बाप - बेटी का रेप कर रहा है! बेमतलब बाँधने और बँधने का हुनर हमारे मास्टर साब बखूबी जानते थे। और इसी भाई के रिश्ते में बँध जाने का या मास्टर साहब द्वारा जबरजस्ती बाँध देने का हुनर था।
इस तरह हमारे हाईस्कूल में ना जाने कितने ज्ञात - अज्ञात प्रेम- कहानियों ने इस कमबख्त राखी के कारण दम तोड़ दिया था। छैला बाबू हमारे स्कूल के कृष्ण कन्हैया थे। ऐसे कृष्ण- कन्हैया प्राय: हर विधालय में आपको मिल जाएँगे।
राखी और जन्माष्टमी में यूँ तो दस दिन का अंतर है। लेकिन उन दिनों को याद करते हुए, छैला बाबू सरीखे लोग अनायास ही याद आ जाते हैं।
छैला बाबू हमारे विधालय के छैल- छबीले नौजवान हुआ करते थे। उनका चेहरा भी श्याम-वर्ण था। वो भी मुरली वाले की तरह माऊथ-आगर्न बहुत बेहतरीन तरीके से बजाते थे। उनकी माऊथ आर्गन बजाने की कला से हम दोस्त उनके आगे नत-मस्तक हो जाते थे। इस तरह से पूरा क्लास ही उनका मुरीद था। माऊथ आर्गन बजाने की कला के आगे।
लेकिन ये बहुत ही अचरज की बात है कि इतने कला- संपन्न होने के बाद भी छैला बाबू को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था, कि कौन लड़की उनको भाव दे रही है। या कौन नहीं। इस बात से उनको कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता था। वो स्व-घोषित बाबाओं की तरह के बाबा। और स्व-घोषित महाराज की तरह के महाराजा थे। उनको किसी बात से कोई विशेष फर्क नहीं पडता था। तू नहीं कोई और सही। कोई और नहीं कोई और सही। जमाने में सनम एक तू ही तो नहीं। तेरे जैसे लाख पड़े हैं।
छैला जी को लड़कियाँ बहुत पसँद थी। ऐसे छैला लोग आपको प्राय: हर विधालय में देखने को मिल जाएँगे। तो हर दूसरे -तीसरे विधालय में जो आपको लीक से हटकर लड़के दिख जाएँ। समझ लो वो छैला बाबू के अपग्रेडेड वर्जन ही हैं। ऐसे लोगों के बाल बहुत लँबे होते हैं। आँखों पर सस्ता गोगल। नुक्कट बाजार से खरीदा हुआ, सस्ता टी -शर्ट । जिसके कॉलर कॉलर खड़े होते थे।
आस्तीन ऊपर तक। ऐसे छैला किस्म के लोग आपको प्राय: हर विधालय की गेट पर लड़कियों को ताड़ते- ताकते मिल जाएँगे। जो आदमियों की झुँड में अलग तरह से पहचान लिए जाते हैं । अगर, भीड़-भाड़ में ऐसे लोग दिख जाएँ। तो समझ लो ऐसे लोग ही छैला बाबू हैं। ऐसे छैला बाबू किसी साधारण बात को भी बहुत बढ़ा -चढ़ाकर बोलते नजर आते हैं। उनकी हर चीज इंपोर्टेड होती थी। उनकी बाइक का रँग चटख रँग का होता था। उनका क्रेडिट हर जगह चलता है। ऐसे लोग जीवण में तो कुछ नहीं कर पाते। लेकिन जब तक स्कूल और कॉलेजों में रहते हैं। आपका मनोरंजन आसानी से करते हुए मिल जाएँगे। ऐसे लोगों के पास उनके खास खबरी भी होते हैं। जो अलानियों- फलानियों के घर का पता। उनके कितने भाई हैं। लड़की का कोई ब्यॉय-फ्रेंड तो नहीं है। अगर ऐसी बातें छैला बाबू को गलती से भी अपने चेलों - चपाटों के माध्यम से पता चलती, कि चिलानी के इतने भाई हैं। या इतने ब्याय-फ्रेंड हैं। तब छैला बाबू मन ही मन मुस्कुराते।
चलो अच्छा है। मुहब्बत में जँग ना हो। तो वो भला कैसी मुहब्बत । मुहब्बत में मरने -मारने का मजा ही कुछ और होता है। छैला बाबू इस उतावलेपन में जँग को भी मुहब्बत समझ कर लड़ने के लिए तैयार हो जाते ।आज भी हमारे आसपास ऐसे बहुत से छैला बाबू आज भी मौजूद हैं।
आपके आँसू घड़ियाली आँसू हैं : (व्यंग्य) : महेश केशरी
ऑनर किलिंग पर वैसे लोग भी विधवा विलाप कर रहें हैं। जिनको अराजक सत्ता में विश्वास है। जो इसके पैरोकार रहे हैं। जिनकी लगाम खापों के पास है। लेकिन तुम्हारा ये रोना अब गजब ढा रहा है। तुम्हारे आँसू घड़ियाली दिखाई दे रहें हैं। तुम्हें तो भाई खुश होना चाहिए, कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ। अलाने कि इतनी औकात की उच्च कुल की लड़की से शादी कर ले। उच्च कुल को ये हक उनके कुल ने दे रखा, कि दूसरे निम्न कुल के लोगों की माओं, बहनों, बेटियों के साथ बलात्कार करते रहें । लेकिन उच्च कुल के लोग ये बर्दाश्त नहीं कर सकते, कि उनकी बहन बेटियों के साथ कोई दूसरा निम्न जाति का आदमी या औरत विवाह करे।
कल तक जो जाति -पाति की जमकर दुहाई दे रही थीं। जो हिंदू -मुस्लिम, सीख, ईसाई को अलग अलग फ्रेम से देख रहीं थीं। आज उनके वॉल पर ऑनर किलिंग को लेकर जज्बाती पोस्ट देखा। तो मन मे सोचा, कि ये कैसे लोग हैं। जो एक साथ शिकार भी हैं। और शिकारी भी। भाई, जब आप जात-पात, ऊँच-नीच , का इतना समर्थन करतीं हैं। तब आपका रोना भी मुझे संदिग्ध लगता है। ये तो वही बात हो गई कि आप आग और पानी को एक कह रहीं हैं। आप दिन और रात को एक कह रहीं हैं। आप जब जाति-पाति को बहुत गहराई से मानती हैं। तब आपको इस तरह के ऑनर किलिंग को लेकर जज्बाती होने का कोई हक नहीं है। आप आदिम व्यवस्था में विश्वास करने वाले लोग हैं। आपकी मानसिकता पूर्णत: जँगली है। तभी तो व्यक्तिगत पँचायतों को आप जैसे लोग तवज्जो देती हैं। आपकी सोच तालिबानी है। लेकिन आप व्यहवार से लोकतांत्रिक, और उदारवादी दिखना चाहतीं हैं। समाज में ऐसे भी लोग हैं। जिन्होंने व्यापार, किया। लेकिन व्यापार से ज्यादा घोटाले किए। देश के पैसे को लेकर विदेश भाग गए। जिन्होंने फर्जी बैंक गारंटी डालकर . अधिकारियों, मैनेजर, जोनल मैनैजर, निदेशक तक को खरीदकर फर्जी लोन करवाए। वे ऐसे लोग थे। जो अपने आपको सर्वश्रेष्ठ मानते थे। जो जाति-पाति के प्रबल समर्थक थे। जिन्होंने सैंकड़ों यज्ञ करवाए। जो नेम-धरम से व्रत-उपवास रखते थे। लेकिन, इस कुँठा में जीते रहे, कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। हम लोगों से बढिया जीवण कोई नहीं जीता। हमारे अलावे धरती पर जो और लोग रहते हैं। सब के सब विवेकहीन और निर्बुद्धि लोग हैं। ऐसे लोगों ने ही जातियाँ बनाई। एक को श्रेष्ठ समझा। दूसरे को हेय। जिसका कि आप आज तक समर्थन करती आ रहीं हैं।
ऐसे लोगों को क्या कहना। जिनके पास दिल नाम की चीज नहीं है। जो अपने बच्चे-बच्चियों का कत्लेआम सिर्फ इसलिए कर देते हैं, कि उनको अपनी इज्जत प्यारी है। जो घर में नहीं चार-दीवारों के बीच में रहते हैं। होते घरों में हैं। लेकिन, सुनते खापों की हैं। जो व्यहवार विचार में अलग अलग हैं। मैं किसी एक समाज और देश कि बात क्यों करूँ। इस तरह के लोग प्राय: हर जगह, हर समाज में और देश- देशान्तर में रहते हैं। चौहद्दी और सीमाओं से परे होते हैं, ऐसे लोग। जो केवल नफरत फैलाना जानते हैं। जिनके दिल में हमेशा नफरत ही पलती है। ऐसे ही लोग हैं। जो काले और गोरे लोगों से नफरत करते हैं। जो लोगों को जातियों और वर्णों में बाँट कर देखते हैं। जो एक तरह का वमन समाज में करते रहते हैं !
पेट दर्द की समस्या : (व्यंग्य) : महेश केशरी
जब से सीमा और सचिन का प्रसंग सोशल मीडिया में आया है। लोगों का पेट दर्द कर रहा है। दिलचस्पी तब और बढ़ जाती है। जब सीमा पाकिस्तान से आती है। अधिकाँश लोग तो ये भी कहते थे, कि देख लेना सीमा पाकिस्तान की जासूस है। और वो भारत में पाकिस्तान के लिए जासूसी करने आई है। कुछ लोग सीमा के घर वापसी पर खुश हैं, कि चलो वो अपने धर्म में लौट आई । उसी धर्म में जहाँ ढोल, शूद्र और नारी को ताड़ना का अधिकारी बताया गया है।
कुछ लोग तो पाकिस्तान की समस्त खातूनों की शादी अपने यहाँ हो जाए। इसको लेकर ही खुश हुए जा रहें हैं।
उपरोक्त प्रकरण पुराना है। नया प्रकरण सीमा और सचिन के यहाँ जन्मी उनकी बच्ची को लेकर है। लोग अब उस बच्ची और उसके यहाँ आए सीमा के भाई जिसको लोग सीमा का तीसरा पति भी बता रहे हैं, को लेकर लोगों के पेट में दर्द हो रहा है।
लोग अपना चेहरा नहीं देखते। लेकिन किसका चेहरा किससे मिलता है। इसको लेकर अपनी खोज-बीन जारी रखते हैं। जनाब हमाम में सब नँगें हैं। फेसबुक पर एक नया चेहरा दिख रहा है। कुछ लोग उसको वकील साहब कह रहें हैं। कुछ लोग सीमा का भाई कह रहें हैं। जो पाकिस्तान से अपनी बहन सीमा से मिलने भारत आया है। कुछ लोग उसको सीमा का तीसरा पति बता रहें हैं।
संभावना और कयास पर कयास लगाए जाने का जो सिलसिला है। वो थम ही नहीं रहा है। कौन हैं वो वकील साहब, जो सीमा के घर आएँ हैं। इस बात को जानने में लोगों की बहुत दिलचस्पी है। लोग अपना सब काम-धाम छोड़कर इस बात का पता लगाने में लगे हैं। कि वो वकील साहब कौन हैं। वकीलों के पास इतना समय कहाँ, कि वो अपनी बहन से मिलने आए। लेकिन लोगों के पास हर दूसरी - तीसरी बात को लेकर फेसबुक पर जुगाली करने का पर्याप्त समय है।
लोग अपना चेहरा नहीं देखते, कि उनकी शक्ल किससे मिलती जुलती है। उनके पिता कौन हैं। लेकिन सीमा के बच्ची का चेहरा बिना देखे ही ये अनुमान लगा ले रहें हैं, कि आने वाला आगंतुक वकील सीमा का भाई नहीं बल्कि तीसरा पति है। भाई, कोई किसी का तीसरा या चौथा या पाँचवा पति है। इससे आपका हाजमा खराब क्यों हुआ जाता है।
कुछ लोगों का पेट इसलिए भी दर्द कर रहा है। कि सीमा ने दूसरे धर्म के लड़के से शादी क्यों कर ली। वो चाहती तो हम उसकी ऐसी- वैसी- हर तरह की मुराद पूरी कर देते। इसका दु:ख लोगों में इतना है, कि क्या कहना। लोग बुक्का फाड़कर रो रहें हैं।
इस तरफ के लोगों को इस बात कि भी तकलीफ है, कि एक ही सीमा क्यों आई। और लोगों को भी आना चाहिए। भाई आप लोगों को अपने देश की आबादी नहीं दिखाई देती। अब क्या चार गुणा आबादी बढ़ाने का आप लोगों को इरादा है , क्या। पहले ही हमलोग अपनी मर्दानगी का झँडा देश और दुनिया में गाड चुके हैं।
कुछ का पेट इसलिए भी दर्द कर रहा है, कि सीमा और सचिन केवल चाय और चावल ही बनाना जानते हैं। इसलिए उनके घर खाना बाहर से यानी रेस्टोरेंट से आता है। अरे भाई उसका पति कमाता होगा। तभी तो सीमा और उसके बच्चे बाहर रेस्टोरेंट से खाना ऑर्डर करते हैं। तुम भी काम करो। कोई ऐसा काम जिससे तुम्हें भी शोहरत मिले। तुम्हारा भी नाम हो। अब लोग सोशल मीडिया पर हैं। तो तरह तरह से कमाने का जुगाड़ कर रहें हैं।
कुछ तो कारनामें भी कर रहें हैं। कोई नाम करके कमाई कर रहा है। कोई "बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम ना होगा " कि तर्ज पर कर रहें हैं। आप भी कीजिये कारनामे।
बड़ा पेट तो यूँ ही बदनाम है : (व्यंग्य) : महेश केशरी
तमाम लड़ाईयाँ एक तरफ और पेट की लड़ाई एक तरफ। इस पेट और मुँह ने देश की जी. डी.पी. को जो बैक पुशअप दिया है। उसके लिए इस मुँह को सम्मानित किया जाना चाहिए। इसी मुँह के कारण रेहड़ी पटरी के दुकान आबाद हैं। यही पेट करोड़ों -अरबों का समोसा, बर्गर और पिज्जा भकोस जाता है। जब से सोशल साईटस और फेसबुक यू-टयूब का समय आया है। लोग मुँह फाड़े दिन- रात इन ब्लॉगरों को देख रहें हैं। इसमें कचौड़ी और समोसे के ब्लॉग भी हैं। कलकत्ते का कोई कचौड़ी वाला है । जो ग्राहकों को अपने श्रीमुख से गालियाँ प्रदान करता है। फिर भी लाईन लगी हुई है। लोग पैसे देकर कचौड़ी और गाली दोनों खा रहें हैं। कौन कहता है, कि पति के दिल तक पहुँचने का रास्ता पेट से होकर जाता है। ये सरासर गलत है। पति के दिल तक पहुँचने का रास्ता स्वाद से होकर जाता है। अगर आपने खाना स्वादिष्ट बनाया है। तो पति ऋत्विक रौशन की तरह मुस्कुरायेगा। और खराब बना है, तो अंबरीश पुरी की तरह गरियाएगा।
कहावतों की बात याद आती है। तो पेट वाली उस कहावत की भी याद आती है, कि ये पेट जो ना होता तो भेंट कहाँ से होता। पेट को लेकर तमाम तरह की लोकोक्तियाँ और मुहावरे भरे आ इतिहास में भरे पड़े हैं। सबसे पड़ा पेट अभी अमरिका का हुआ जा रहा है। उसको किसी से और कैसे भी किसी तरह की भेंट और मुलाकात में रूचि नहीं है। उसकी रूचि उसका पेट है। उसका पेट दुनिया का सबसे बड़ा पेट है। ब्राजील पर चालीस, कनाड़ा पर पचास, हमारे देश भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगाने पर भी उसका पेट भरता नहीं दिख रहा है। लेकिन पेट के साथ एक विसंगति है, कि वो कभी भरता ही नहीं है।
अमेरीका का पेट जहाँ पहले नंबर पर है। वहीं भारतीय अस्पतालों का पेट तो उनसे भी बड़ा है। दवाईयों- जाँचों के नाम पर ऐसी धाँधली मची है, कि पूछो ही मत। क्या, प्राईवेट और क्या सरकारी। सब लूटने में लगे हैं। एक ही दवाई कई - कई मरीजों को बार - बार बेची जाती है। एक पन्नी दवाई अनंत यात्रा पर निकली है। जिसकी यात्रा कभी पूरी नहीं होती । दो -सौ मीटर पर जो दवाईयों की दुकानें हैं । पन्नी अस्पताल से दुकान तक की यात्रा बार-बार करती है। जाँच पर जाँच लिखी जाती है। ताकि डॉक्टर साहब के घर का ऊपरी खर्चा, पेट्रोल, स्टाफ मैनेज किया जा सके।
फिर इंश्योरेन्स सेक्टर का भी पेट है। आप कब बीमार पड़ जाएँगे। इसलिए पाँच सौ निन्यानवे का ढिमकाना प्लान लीजिए। मूर्ख मत बनिए। पहले अपने इंश्योरेंस को ऑलिशी बाजार पर कंप्येर कीजिए। मात्र तीन सौ निन्यानवे का मासिक प्लान लेकर पाँच से दस लाख का क्लेम कवर कीजिए । सब लोगों का पेट है, भाई।
फिर, शिक्षा जगत का भी पेट है, भाई। इनका पेट कुछ और ज्यादा बड़ा है। हर साल इनको री-एडमिशन चाहिए। हर साल किताबों को भी बदल देना है। ताकि इनका भी पेट भरता रहे।पेट में अतिरिक्त चर्बी जमा करने के लिए ये लोग आजकल टाई-बेल्ट, जूता चप्पल और मोजे भी बेच रहें हैं। साल में फैंसी ड्रेस कंपटीशन भी हो रहा है। कपड़े स्कूल से या तय किए हुए दुकान से ही लेने हैं।
मन की बात बहुत कर ली।आईए आज पेट की बात करते हैं। दुनिया में पेट तरह -तरह के होते हैं। कुछ लोगों का पेट, पेट में इतना भीतर तक धँसा होता है, कि आप उनका पेट सपाट पाएँगें। लेकिन खाते दरअसल वही सबसे ज्यादा हैं।
बड़े और मोटे पेट वाले तो बेचारे यूँ ही बदनाम हैं। कुछ लोगों का पेट दिखता चींटी के बराबर। लेकिन खाते हाथी के बराबर हैं। ऐसे ज्यादा खाने वाले लोग हाथी की तरह हगते नहीं हैं। बल्कि उनका पाचन तंत्र बड़ा ही मजबूत होता है। उनकी शारीरीक बनावट कुछ इस तरह की होती है, कि आप उनपर इस तरह का कोई इल्जाम नहीं लगा सकते। तो बात मन की बात से शुरु हुई थी। और पेट की बात पर आकर टिक गई है।
हमारा पेट इधर सपाट हुआ जाता है। कमाते एक रूपया हैं। लेकिन बचता दस पैसा भी नहीं है। कारण की पेट जैसे गड्ढे़ को भरने में ही सब कुछ खत्म हो जा रहा है।
सचिव जी का पावर : (व्यंग्य) : महेश केशरी
अभी - अभी कुछ साल भर पहले पंचायत सीजन आया है । हर तरफ सचिव जी और प्रधान जी के ही चर्चे हैं। वाह क्या कमाल की जोड़ी है। सचिव जी और प्रधान जी की।
किसी ने सोचा भी नही था, कि इतनी जल्दी हमें रीयल लाईफ में भी दुसरी पंचायत देखने को मिल जाएगी।
लेकिन, इस पंचायत ने पहले वाले पंचायत को पीछे छोड़ दिया है। बच्चे भी भाई जी का मीम बनाकर भाई जी को ट्रोल कर रहें है। ऐसा पहली बार हो रहा है, कि रील लाईफ से ज्यादा मजा इस रीयल लाईफ की पंचायत को देखकर आ रहा है। पंचायत सचिव और भाई जी के चर्चे सरेआम हो रहें हैं। पंचायत सचिव जी के एक बाइट पाने के लिए मीडिया मरी जा रही है। हर छोटे बड़े चैनल पर भाई जी सफाई देते नजर आ रहें हैं।
भाई, जी को शोहरत की अभी बहुत दरकार पड़ गई है। पहचाने जाने के लिए भाई जी मरे जा रहें हैं। वो चाहते हैं, कि उनको उनके एरिया का हर -छोटा बड़ा मुलाजिम पहचाने। कुत्ता, बिल्ली, कौआ, कबूतर, हर कोई उनको पहचाने। नहीं तो इन लोगों की मरम्मत भाई जी जूते से करने को तैयार हैं । उनको ऐसा लगता है, कि उनका नाम ही काफी होना चाहिए। रजनीगँधा तो बेकार में मशहूर है। कदमों में दुनिया तो भाई जी रखना चाहते हैं।
लोगों को बस "भाई " शब्द बताओ। और वो " भाई " शब्द सुनते ही हरकत में आ जाएँ। " भाई " शब्द को आसानी से पहचान लें । इतना तो कम-से-कम अधिकारियों -कर्मचारियों में खौफ होना ही चाहिए। लेकिन भाई जी आप ये भी तो समझिए, कि हमारे यहाँ के राजा से ज्यादा काहिल हमारे यहाँ की अफसरशाही है। फिर, आप भी उसी व्यवस्था के अँग बहुत लँबे समय तक रहें हैं। आपको पता होना चाहिए, कि लोकशाही पर अफसर शुरू से हावी है। आप भी उसी जँग लगी व्यवस्था के अँग हैं।
इसलिए इस बात पर चौंकिए मत और मजाक को मजाक में जाने दीजिये।
लेकिन, भाई जी मानते ही नहीं हैं। अब मजाक बात है, कि लोग भाई जी को नहीं जानते। आपको कुछ जनना आता हो या नहीं आता हो। लेकिन भाई जी का नाम सुनते ही आपको समझ में आ जाना चाहिए, कि बात भाई जी की ही हो रही है।
भाई जी जूता- चप्पल क्यों खोल ले रहें हैं। जब सचिव जी को कद्दू टमाटर देकर काम चलाया जा सकता है। इस प्रकरण से ये बात तो जरूर सामने आयी है, कि पंचायत सचिव का जो पावर है। वो किसी भी विधायक को चारों खाने पटखनी देने के लिए काफी है। नौकरशाही, लोकशाही पर भारी है। कारण की दोनों को खाने की आदत है। पंचायत सचिव जब बटोर कर रखता है। तभी तो भाई जी सरीखे लोग प्रचार कर पाते हैं। और चुनाव लड़ पाते हैं। तो भाई जी प्रखंड से जो पंचायत सेवक और मुखिया आपको आपका हिस्सा समय से पहुँचा देते हैं। तो ऐसे समय में पंचायत सचिव से उलझिए मत। उनको मान दीजिये। फ्रेंडली बनिए।
इको फ्रेंडली बनिए। होली में लगाने वाले रँग की तरह। अभी तो दशहरा -दीपावली नजदीक है। इको फ्रेंडली पटाखे की तरह बर्ताव कीजिए। मिल -मिलाकर चलिए। अभी चुनाव का समय है। गाढ़ा समय है। आपसे बेहतर भला कौन जानता है, कि वक्त पर गदहे को भी बाप बोलना पड़ता है। अभी बाढ़ का समय है। सड़क पर गाड़ी नहीं चल सकती। लिहाजा वक्त का तकाजा समझिए। गाड़ी को नाव पर लादकर मझधार को पार कीजिए !
जब रील वाले पंचायत में लौकी देकर सचिव जी को पटाया जा सकता है। तो काहे जूता निकाल रहें हैं।
कबाड़ी वाला दोस्त और मेरी डिग्री : (व्यंग्य) : महेश केशरी
मैं एक ऊँचे प्रतिष्ठान में जब काम के सिलसिले में गया तो मुझे डिग्री दिखाने को कहा गया। मैं बाकायदा सब डिग्रियों को बहुत ही एहतियात से लेमिनेशन करके लेकर गया था। जिससे की मेरी डिग्री सही सलामत रहे। और मैं जहाँ चाहूँ बस अपनी डिग्री का उपयोग करके काम पा लूँ।
लेकिन मुझे गुस्सा आ गया। इंटरव्यू लेने वाले पर।
मैनें कहा कि भाई अब तो डिग्री नहीं दिखाना है। ऐसा नियम तो अभी हाल फिलहाल से देखने सुनने को मिल रहा है। इस तरह की बात आजकल कोर्ट भी कह रहा है। बिना डिग्री दिखाए भी काम चल सकता है। तो तुम मुझे डिग्री दिखाने को क्यों कह रहे हो।
इंटरव्यू पैनल का आदमी बोला। ऐसा सिर्फ-और-सिर्फ खास लोगों के लिए होता है। और तुम आम लोगों में से हो। आम लोगों को सिर्फ डिग्री ही नहीं दिखानी पड़ती, बल्कि चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ता है। तुम जब खास हो जाओगे। तब तुम्हें भी डिग्री दिखाने की जरूरत नहीं रहेगी। तभी पैनलिस्ट को कहीं से क़ोई फोन आ गया। और उसने इंटरव्यू के समापन की घोषणा कर दी। मैनें पूछा कि इंटरव्यू तो हुआ ही नहीं, और आपने इंटरव्यू क्यों समाप्त कर दी। पैनलिस्ट ने कहा कि ऐसा नए नियम के तहत ही किया गया है। जैसा कि आप बता रहे थे, कि अब डिग्री देखने -दिखाने का दौर नहीं है। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद। इसको अमल में आज से और अभी से लाना तय हुआ है। योग्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र ईमेल से भेज दी जाएगी।
वो दिन था। और आज का दान है। मैं मेल के इंतजार में हूँ। लेकिन उनका मेल आजतक नहीं आया।
विधार्थी जीवण से ही हमलोगों को बहुत मेहनत करना है। इस बात का जोर परिवार के बड़े बुजुर्गों से मिला था, कि बाबू अगर लाइफ में कुछ करना है। तो थोड़ा पढ़-लिख लो। और डिग्रियों को जमा कर लो। तब तुम जमाने को ठोकर पर रखोगे। नहीं तो जमाना तुमको ठोकर मारेगा।
सचमुच ऐसा था भी। हम लोग स्नातक, परास्नातक तक हो गए। जैसे -जैसे डिग्रियों की संख्या बढ़ने लगी। वैसे-वैसे हम लोगों में आत्मविश्वास भी बढ़ने लगा। लगा अब तो हमारे आगे कोई है, ही नहीं।
सारे जमाने को हम लोग अपने जूते की नोक पर रखते थे। कुछ समय बाद हालत कुछ इस तरह के हो गए कि ज्यादा पढ़-लिख जाने के कारण हमारे पाँव जमीन पर ही ना पड़ते थे। अब आसपास के लोगों से हम लोगों ने बोलना-चालना भी छोड़ दिया था। अब एक अलग तरह के गुमान में हम लोग जीने लगे थे। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद पता लगा की काम केवल डिग्रियों से चलने वाला नहीं है। आपको अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ भी बनना होगा। लिहाजा हम लोग इतनी डिग्रियाँ लेकर भी बेकार थे। अब नए सिरे से काम शुरू करना था। एक दिन मजाक में हमारे बगल के एक दुकानदार ने कहा। इतनी डिग्री लेकर भी क्या करोगे। खाली समय में आकर हमारे दुकान पर टाइम दिया करो। कुछ हाथ खर्चे को भी मिल जाएगा। मैनें उनको जबाब दिया। भाई मैं पढ़ा-लिखा आदमी हूँ। मुझे नौकरी करनी है। दुकानदार ने सुझाया। भाई तुम पढ़े -लिखे हो, तो हमलोग भी कोई अनपढ़ -गँवार थोड़ी हैं। जो किताब बेच रहें हैं। ये जो फॉर्म बेचने वाले हैं। जो एग्जाम करवाने वाली संस्थाएँ हैं।
इनमें भी सब पढ़े-लिखे लोग ही हैं। ये जो कैंटीन चलाने वाला है। वो भी बी. टेक . है। फिर भी कैंटीन वाला समोसे और कचौरी तल रहा है। कचौरी- समोसे तलकर वो महीने का लाख -डेढ़ लाख कमा ही ले रहा है। तुम पढ़़ -किसलिए रहे हो। कमाने के लिए। पढ़कर कमाओ या कमाकर पढ़ो। एक ही बात है यहाँ।
एक दिन पाँचवीं पास मेरा कबाड़ी चुनने वाला दोस्त मुझे मिल गया। उसने पूछा आजकल क्या कर रहे हो। मैनें कहा कुछ नहीं पढ़ रहा हूँ। वो कबाड़ी वाला दोस्त मुझ पर हँस पड़ा। बोला तुम अभी तक पढ़ रहे हो। आश्चर्य होता है मुझे। तुम्हारे बाल तो अब पकने लगे हैं। मैं देखो दो बच्चों का बाप बन चुका हूँ। मेरे दोनों मुस्टँडे और हट्ठे-कट्ठे बच्चे गल्ले पर बैठते हैं।
इधर मुझे देखो मैं कितना चुस्त, तँदरूस्त हूँ। खालिश कबाड़ का काम है।
सब कुछ खरीदता हूँ। किताबें, कागज-पेंसिल, काटून -प्लास्टिक सब। कागज -पेंसिल पर उसने जोर दिया। किताबों पर भी। जैसे कहना चाहते हो। क्यों समय बर्बाद कर रहे हो। प्रतियोगिता वाली किताबें मेरी दुकान पर बेच दो। और आकर मुझसे कबाड़ बेचने की क्लास ले लो।
अब क्या कहता कबाड़ी दोस्त की बातों का उस समय या उसके बाद भी मैं कोई जबाब नहीं दे सका। शायद वो कबाड़ी दोस्त सही ही कह रहा था, कि आधा उम्र तक आदमी अगर पढ़ता भी रह जाए। तो शादी कब करेगा। बच्चे कब करेगा। और फिर उनकी शादी कब करेगा। खैर, बच्चों की शादी बाद में। पहले अपनी शादी तो हो जाए। लेकिन शादी करने से कुछ नहीं होता है। शादी करने के बाद पत्नी को खिलाना -पिलाना भी पड़ता है। घर -किराए और साग- भाजी भी खरीदने की नौबत आ जाती है।
इस तरह जैसे हर बेरोजगार सोचता है। मैनें भी सोच लिया।पहले नौकरी जुगाड़ करूँगा। तब जाकर शादी करूँगा। लेकिन नौकरी मिलने का वो शुभ दिन ना कभी आना था। ना कभी आया।
इस बीच एक दिन मेरी क्रश मुझसे मार्केट में टकरा गई। हाल -चाल लिया। फिर बच्चे को सिखाया । बेटे मामा को प्रणाम करो। इस तरह उस बच्चे का पापा बनने की जो मेरी ख्वाहिश थी। वो नौकरी ना मिल पाने के कारण मामा बनकर पूरी हुई। मैं बच्चे के मामा कहने से पहले ही नौ -दो - ग्यारह हो गया।
सबसे ज्यादा मजे हमारे रिश्तेदार लेते थे। कहते लो लल्ला का अब तक कहीं कुछ नहीं हुआ। इनसे छोटा है हमारा सोनू। मल्टी नेशनल कंपनी में हेड है। कई - कई डिवीजन उसके हाथ में है। दिल्ली में फ्लैट ले लिया है। गाड़ी खरीद ली है। लल्ला अब क्या सारी उम्र पढ़ते ही रहेंगे। छुड़वा क्यों नहीं देते पढ़ाई। कोई प्राईवेट कंपनी में ही काम पकड़ने को कह दो।
उसके बाद का दौर और अलग था। कभी माँ, अपनी बहन के लड़कों की बाबत घर में बात छेड़ देतीं। कभी पिताजी बुआ के लड़के के होनहारी की बात कहते ना थकते थे। परोक्ष रूप से वे लोग मुझे ही कोस रहे थे। कुल मिलाकर इतनी सारी डिग्रियों के बावजूद भी मैं नाकार और बेरोजगार था। कभी जो घर का लाडला था। आज वो सबके आँखों कि किरकिरी बन गया था।
हमारा हाथ ना मिलाना गजब ढा गया : (व्यंग्य) : महेश केशरी
कहते हैं कि सीरत अच्छी हो तभी कामयाबी भी मिलती है। लेकिन आपकी सीरत और सूरत दोनों खराब है तो आपको कामयाबी कहाँ से मिलेगी।
उनको परेशानी थोड़ी दूसरी तरह की है। उनको इस बात की परेशानी है कि वो हाथ ना मिला पाए। उनको इस बात से परेशानी नही है कि वो क्रिकेट का मैच हार गए। ऑडियंस में उनकी कितनी भद्द पिटी है। उसकी चिंता उनको नहीं है। लेकिन वो दूसरी चीजों को लेकर परेशान हैं कि सामने वाले ने उनसे हाथ क्यों नहीं मिलाया।
कहते हैं ना कि खिसियानी बिल्ली खँभा नोचे। आप मैच रेफरी को बदलने की बात कर रहें हैं। आई. सी. सी. से शिकायत करने की बात कर रहें हैं। कुछ नहीं होने वाला है। आप पहले भी हारे थे। आप को उन्नसी सौ इकहत्तर में हमने हराया था। फिर करगिल में हराया। हारना ही आपकी नियति है। इसको मान लीजिए।
भाई हाथ हमारा है। हम मैच से पहले या बाद में हाथ मिलाए या ना मिलाएँ। हमारा हाथ है हमारी मर्जी। मिलाए -मिलाए ना मिलाए। कोई क्रिकेट में ये जरूरी नियम थोड़ी है कि हम हाथ ना मिलाएँ तो जुर्माना लगेगा। अगर जुर्माना लगेगा तो हम दे भी देंगे। हमारी इतनी औकात है। आपके यहाँ तो चने खाने को पैसे नहीं हैं। और सुनिए आप खुशफहमी में मत रहिए।
आपको क्या लगता है कि हम लोग एशिया कप में क्रिकेट खेलने गए हैं।आप गलतफहमी में जी रहें हैं साहब हम आपको पटखनी देने गए थे। और ज्यादा हाथ मिलाने की बात हमसे मत करो। हमारे यहाँ एक फिल्म है। जिसका नाम शोले है। उसमें एक गब्बरसिंह है। जो डकैत है। वो सालों से हाथ माँग रहा है। ठाकुर के दो ही हाथ थे। जिसको गब्बरसिंह ने सन् उन्नीस सौ पचहत्तर में शोले की रीलीज पर ही माँग लिया था। इधर वो हर साल टी. वी. पर होली के समय जब हमलोग शोले फिल्म देखने लगते हैं। तो वो बार -बार हमलोगों से हाथ की डिमाँड करता है कि ये हाथ हमको दे दे ठाकुर। ये हाथ हमको दे दे ठाकुर। अब ठाकुर के पास दो ही हाथ थे। जो उसने दे दिए हैं। अब नया हाथ हमलोग कहाँ से लाएँ।
तुम्हारे हाथ मिलाने का इस तरह से बुरा नहीं मानना चाहिए। क्योंकि अगर हमने हाथ मिलाया और गब्बर को पता चल गया। तो वो हमलोगों को छोड़कर तुम लोगों से हाथ माँगने लगेगा।
अब तुम किसका किसका-किसका हाथ बर्दाश्त कर पाओगे। धर्मेंद्र के हाथ के बारे में तुम लोगों ने सुना है कि नहीं।
अगर सुना होगा तो ये भी सुना होगा कि अगर उनका हाथ पड़ जाए। तो आदमी उठता नहीं है उठ जाता है और अगर उनके बेटे सन्नी देओल का हाथ पड़ गया तो समझते हो ना क्या होगा। गदर तो याद ही होगा। कैसे चापाकल उखाड़ कर तुमलोगों की मरम्मत की थी। इसलिए धोने के लिए रोज सुबह हाथ की जरूरत पड़ती है। बल्ला सँभालो और लग जाओ अभ्यास में। अभी और मुकाबले बाकी हैं। तब तक दूध बादाम खा कर तैयार रहो। इधर हमारी सेना और क्रिकेट की टीम तुम्हारी मरम्मत की तैयारी में लगे हैं !
नाम ना हुआ तो बदनाम ही सही : (व्यंग्य) : महेश केशरी
नाम नहीं हुआ तो क्या हुआ। बदनाम होकर भी नाम कमाया जा सकता है। इस काम में पुरूष तो पुरूष महिलाएँ भी कहाँ पीछे रहने लगी हैं। नाम कमाना हो तो किसी फायर ब्राँड नेता को पकड़ लीजिए। और करिए उसका विरोध। विरोध करके भी आप लाइम -लाइट में आ सकते हैं।
खैर, कुछ लोग स्टेमिना की बात कर रहें हैं। कह रहें हैं कि उनका स्टेमिना बहुत मजबूत है। भाई आपका स्टेमिना अगर मजबूत है। तो क्या आप उसकी आजमाइश औरतों पर करेंगें। उनकी बात सुनकर जवान लोग भी मायूस हो गए हैं।वो सोच रहें हैं कि कैसे वो अपनी पत्नी को संतुष्ट करें। कैसे वो रति क्रिया में घँटो बिताएँ। जिससे वो अपनी पत्नी /प्रेमिका को संतुष्ट कर पाएँ। जब वह दस -पाँच मिनट में निपट जाते हैं। वो इसका तत्काल और स्थायी समाधान चाहते हैं। वयाग्रा के सी. ई . ओ.भी अपनी दवाओं को और बेहतर कैसे बनाएँ। इसको लेकर वो ऐसे महापुरूषों से परामर्श लेने के लिए उनको ढूँढ रहें हैं। ऐसे लोग खाए पिए अघाए लोग हैं। जिनकी ग्रँथियाँ हीन हैं। जिनको दूसरों की माँ-बहन, माँ-बहन नहीं लगती। दुनिया के ऐसे लोगों के लिए मँहगाई, बेरोजगारी, बेकारी से भी बड़ी समस्या सेक्स है। सेक्स से ऊपर उनको कुछ दिखता ही नहीं।
लड़कियों को ऐसे भी भाव नहीं देना चाहिए। नहीं तो वो लड़कों की ऐसी की तैसी कर देतीं हैं। एक नेताजी नुमा नेताजी को एक मोहतरमा ने उनकं बेहतरीन तरीके से संबोधित करके उनके संबोधन में ऐसे चार चाँद लगाए। उनको बँदरमुँहा से लेकर पैर की धूल के बराबर भी नहीं होने की बात जैसे शब्दों से अलँकृत कर दिया। हद तो तब हो गई जब उन्होंने नेताजी को यह कहकर संबोधित कर दिया कि तुम्हारे मुँह के ऊपर कुत्ता भी पेशाब नहीं करेगा। और आखिर में उनको भिखमँगे की पदवी से भी नवाजा ।
खैर, जब से हमारे यहाँ ये एस. टी . सूची में शामिल होने को लेकर आँदोलन चल रहा है। दोनों तरफ के लोग ताल ठोंकने लगे हैं। कोई भी कम नहीं है।
कोई माँ का दूध बनाम सूअर के दूध की तुलना कर रहा है। कोई पचहत्तर साल कुँभकर्णी निंद्रा में सामने वाले को सोए रहने की बात कर रहा है। लोग एस. टी. में शामिल होना चाहते हैं । सबको सुविधाएँ और लाभ चाहिए। दूसरा वर्ग इसलिए विरोध कर रहा है, कि उनके हिस्से की मलाई कोई दूसरा ना खा जाए।
हालत ये है कि कल तक जो भाई -भाई थे।आज वो पट्टीदार हो गए हैं। जिन्होनें अलग राज्य के गठन में उतना ही साथ दिया था। जितना अन्य लोगों ने। वो आज बाभन से ज्यादा ख़तरनाक लगने लगे हैं। वो दीमक हो गए हैं । वो आपका हक व हुकूक खाने लगे हैं।
कोई ये कह रहा है, कि आदिवासी पैदा होते हैं । बनाए नहीं जाते।
कुछ लोग जनसंख्या वृद्धि के पक्षधर हैं। कह रहें हैं तीन -तीन बच्चे पैदा कीजिए। जिससे आपकी लड़ाई लड़ने वाले लोग जीवित रहें।
संत होकर दस- दस बच्चे पैदा करने की सलाह दी जा रही है। कुछ लोग महिलाओं को सम्मानित करते हुए डेढ़ सौ रूपये में काले कोठे पर बैठ जाने की सलाह दे रहें हैं। कुछ सभ्य महिलाएँ ताल ठोंककर पूछ रहीं हैं। माँ का दूध पीती हो या केले का जूस !
कुछ लोगों के अनुसार यदि आप एस. टी. के दावेदार हैं। तो वो ये जानना चाहते हैं कि आपलोग चूहा और साँप खाते हैं या नहीं। ऐसे लोग ही आदिवासी होते हैं। जो चूहे और साँप खाते हैं।
कुछ लोगों के अनुसार जो मूर्तिपूजक हैं, जनेऊधारी हैं। जिनके गाँव में मँदिर हैं । और वे लोग जो हिंदू हैं। वे जो प्रकृति की पूजा नहीं करते। वो जो जनेऊ पहनते हैं। वे जो धार्मिक अनुष्ठान पुरोहितों से करवाते हैं।
वो जो लव के वंशज हैं। या शायद शिवाजी के वंशज। उनका विरोध इसलिए भी है कि वो जँगलों में नहीं रहे। वो औधोगिककरण वाले हिस्सों में रहे । और ऐसे लोग अँग्रेजों से लाभ लेते रहे। और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से हमसे आगे हैं। लिहाजा उनको एस.टी. में शामिल नहीं करना चाहिए।
अधिकारी जी मस्त हैं, नेताजी पस्त हैं! : (व्यंग्य) : महेश केशरी
मैं एक लड़की से प्रेम करता था। और उससे आई . लव . यू. सुनना चाहता था। लेकिन लड़की ने ऐसा ना कभी कुछ कहा ना ही मैंने सुन । लेकिन मेरी ये हमेशा से उत्कंठा रही कि वो मुझे कभी तो आई. लव. यू. बोल दे। लेकिन ना उसके मुँह से ये तीन शब्द कभी ना फूटे। ऐसे ही हमारे यहाँ एक नेताजी हैं। जो अधिकारियों से केवल और केवल इस बात से परेशान हैं कि अधिकारी जी उनकी नहीं सुनते। वो भी कुछ बोलें।
अब अगर अच्छा नहीं तो कुछ खराब ही बोल दें। जिससे नेताजी को भी कुछ बोलने का मौका मिले। और क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया हो। और अभी चुनावी सीजन है तो नेताजी को टी. आर .पी. मिले .। लोगों में इसी बहाने से नेताजी की चर्चा हो। लेकिन नहीं नेताजी को अधिकारी जी ने आई. लव. यू. नहीं बोला। और ना ही कोई ऐसी बात जिससे नेताजी लाइम-लाईट में आ जाएँ।
भाई अधिकारी जी पढ़े-लिखे आदमी हैं। वो पंसारी की दुकान के बनिए हैं। उनको पता है कब क्या बोलना है और कितना बोलना है। कहाँ बोलना है। और कहाँ नहीं बोलना है। कहाँ बोलने से बात बनेगी। और कहाँ बोलने से बात बिगड़ सकती है। अधिकारी जी तोता हैं। वो सत्तासीन लोगों और राजनीति के उठा-पटक के हिसाब से ही बोलते हैं। वो राजनीति के बूढ़े तोता हैं। जो सत्ता की रटी-रटायी बात ही बोलते हैं।
और जब आप अभी सत्ता में है ही नहीं तो आपकी क्यों सुनें। और मान लीजिये आप सत्ता में आ भी जाते हैं।तो अधिकारी जी आपकी सुनेंगे ही इसकी क्या गारंटी है।
नेता प्रतिपक्ष भी परेशान है। कहते हैं कि अधिकारी जी कुछ सुनते ही नहीं। अव्वल तो फोन ही नहीं उठाते। और उठाते भी हैं, तो कहते हैं, बोलिए, कहिए। अरे भाई वो अधिकारी हैं। उनके आँखों पर हमेशा से नौकरशाही की चश्मा चढ़ा हुआ रहता है। इसलिए ज्यादा बोलकर अपनी ऊर्जा नहीं खत्म करना चाहते। पता नहीं आपको ऐसा क्यों लगता है कि वो आपकी नहीं सुनते।
आपकी सरकार भी वहाँ बीस साल रही थी। आप सरकार में रहते हुए कब जनता की सुनते थे। तो अधिकारी जी के ना सुनने का दोष दे रहें हैं।
ये गुण आपसे ही विरासत में मिला है, इन लोगों को । जब आप नहीं सुनते थे। तो आपके अधिकारी भला आपकी क्यों सुनने लगे। यहाँ पैदा किए हुए बाप की बेटा नहीं सुन रहा है। पत्नी- पति की नहीं सुन रही है। जब इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई किसी कि नहीं सुन रहा है। तब आप लोग भी ये उम्मीद ना करें कि लोग आपकी सुनेंगे ! अफसरशाही और सत्ता में पुरानी रार है भाई साहब !
अगर लोगों के भविष्य की तरफ देखें।और इस बात "ना मानने "वाले दु:ख की तरफ देखें। तो मुझे लगता है कि नेताजी को ये बात सार्वजनिक तौर पर तो खुलेआम और खुले मँच से नहीं ही कहनी चाहिए थी । कारण कि लोगों का जो थोड़ा बहुत विश्वास इस सत्ता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में है वो भी चला गया है। अब नेताजी के इकबाल में फर्क पड़ेगा। अब भला ये क्या बात हुई कि अफसर मुखिया की नहीं सुनता। फिर क्या होगा जनता दरबार का ?
पैसे से सब कुछ थोड़ी ना होता है। रौब- दाब भी तो कोई चीज है। पैसा हो और रौब- दाब ना हो। तो ऐसा पैसा किस काम का। प्रभाव भी तो कोई चीज है। आखिर कैसे पता चलेगा कि नेताजी आम नहीं खास हैं। आपकी बात में वजन होना चाहिए । फिर तो आम -आदमी और नेताजी में भला फर्क कैसा। फिर तो नेताजी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। आदमी और कुत्ता बराबर!
तो बात अधिकारी जी की हो रही है। तो वो अधिकारी जी हैं। इधर वार्ड पार्षद जी रो रहीं हैं। जब अधिकारी जी विधायक, साँसद, मुख्यमँत्री जी की नहीं सुन रहें हैं। तो भला आपकी क्या सुनेंगें।
वार्ड पार्षद अपना वजन नाप रही हैं। वजन माने वैल्यू।
अपने मूल्यों को तलाश रहीं हैं? जिन मूल्यों या वैल्यूज के बारे में वो कह रहीं हैं। उसको अधिकारी जी धत्ता बताते हैं।
अधिकारी जी की महिमा अपरंपार है। वो सर्वगुण संपन्न हैं।
जो सम्मान वो इस कलियुग में अधिकारी जी से चाह रहीं हैं। वो सम्मान इस लेने- देने के युग में संभव नहीं है। सब लोग खाने वाले हैं। लोगों को इस मँहगाई में जब खाने को नहीं मिल रहा है। तो अधिकारी जी बहाने बना- बना कर खा रहें हैं । दोष फाईलों पर मढ़ दे रहें हैं। अब फाइल हैं। आदमी तो नहीं जो गवाही देंगें।
वार्ड पार्षद महोदया को लग रहा है कि उनका फरमान साऊदी जैसे देश में दिया गया फरमान है। जहाँ हाथ के बदले हाथ। और आँख के बदले आँख का प्रावधान है। ये अपना देश है, बहन। यहाँ हर कोई खा रहा है। और दबाकर खा रहा है। अब आपने आदेश दे दिया कि मीट -मछली की दुकानें नहीं खुलेंगीं मतलब नहीं खुलेंगीं । लेकिन दुकानें खुल रहीं हैं ।
गया आपका आदेश तेल लेने । सब चोर- चोर मौसेरे भाई हैं। जो अधिकारी है। वो जनता का खास ख्याल रखता है। समय - समय पर दुकानदार अधिकारी जी का हाथ गर्म करता रहता है। लिहाजा माँस-मछली की दुकानें आपके आदेश के बाद भी खुली रहतीं हैं । दुकानदार भाई घर जाते हुए अधिकारी जी के लिए किलो- दो -किलो माँस -मछली पन्नी में बाँध देता है। अब किसको कुत्ते ने काट रखा है कि दुधारू गाय पर लाठियाँ बरसाए। वो दिखावे के लिए ही आपसे कहता है। " अच्छा मीट की दुकानें फिर खुल गईं। अभी फिर से बँद करवाता हूँ। " अधिकारी जी आपको और जनता को देखने -दिखाने के लिए एक -दो दिन के लिए दुकानें बँद भी करवा देते हैं।इस तर्जपर कि सैंया भए कोतवाल, तो अब डर काहे का।
आपके एजेंडे से उनको कोई मतलब नहीं है। अधिकारी जी और दुकानदार दोनों के पेट हैं । दोनों बाल -बच्चों वाले और खाने पीने वाले लोग हैं । अब अधिकारी जी के बच्चों और पत्नी जी को भी मीट -मछली चाहिए। चिकनी चीजें किसको अच्छी नहीं लगती। वैसे भी मुझे अधिकारी जी जैसे लोग ज्यादा लोकतांत्रिक लगते हैं। सबके सुख दुख का ख्याल रखते हैं। अभी दुर्गापूजा समाप्त हुआ है और सबकी जीभ लपलपाई हूई है। लिहाजा सबको मीट -मछली खाना है। लिहाजा अधिकारी जी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हुए शासन - व्यवस्था से बहुत कुछ सीख चुके हैं। वो आपके नक्शे कदम पर ही चल रहें हैं। वो भी फाईलों के इधर- उधर हो जाने की बात कह कर आपको टाल रहें हैं। । जैसे आपलोग जनता को फाईलों का हवाला देकर टालते हैं। अब फाइल हैं कि सरकती ही नहीं! जब तक अधिकारी जी के टेबल पर कुछ धरा ना जाए।
हम तो डूबे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगें! : (व्यंग्य) : महेश केशरी
तो बात रनियापुर में बिजली की कटौती को लेकर हो रही थी। रनियापुर में सप्ताह भर से बिजली नहीं है। लिहाजा रनियापुर के लोगों को धनियापुर के लोगों का सुख देखा नहीं जा रहा था। रनियापुर वाले अँधेरे में मरें। और धनियापुर वाले रौशनी में रहें। पँखा-कूलर, ए. सी. चलाएँ! लिहाजा रनियापुर वालों के कहने पर धनियापुर की बिजली काट दी गई।
अब रनियापुर वालों की खुशी का ठिकाना ना रहा। तुम भी पसीने में सनम हम भी पसीने में।
उसी समय की बात है। हमारे यहाँ एक टुच्चे किस्म के नेता जी थे। नाम था उनका टुच्चे लाल जी। बिजली समस्या से परेशान नेताजी बमक गए। कारण की रनियापुर में बिजली नहीं है। वो भी सप्ताह भर से। लिहाजा धनियापुर में बिजली कैसे हो सकती है। प्रभाव जमाने के लिए उन्होंने धनियापुर की बिजली भी कटवा दी। इसको कहते हैं, नेतागिरी। इसको कहते हैं पहुँच। इसको कहते हैं, ताकत। यही असली नेताजी की पहचान है। पानी में रहकर मगर से बैर। जिस तरह से एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जिस तरह से जँगल का राजा शेर ही हो सकता है । उसी प्रकार रनियापुर में एक ही नेताजी हो सकतें हैं। हमारे टुच्चे लाल जी। लिहाजा नेताजी को अपनी राजनीति चमकाने का ये बड़ा ही ही सुयोग्य अवसर मिला था । और वो अपनी राजनीति को चमका-चमका कर पैना करने लगे।
प्रांत में स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। ये जो छुटभैया नेताजी हैं। प्रांत में इनकी ही सरकार है। तो ये जो नेताजी हैं। इनकी अपनी परेशानी है। नेताजी होने के बावजूद बिजली विभाग के अधिकारी नेताजी की नहीं सुन रहें हैं। तब सोचिए भला प्रजा का क्या हाल होता होगा। जहाँ प्रांत में नेताजी जी और बिजली विभाग मस्त हैं। वहीं जनता पस्त है। जनता अँधेरे से लड़ रही है। और राज्य के अधिकारी कर्मचारी नीरो की तरह वँशी बजा रहे हैं। तो बात नेताजी के स्वभाव की हो रही है। वैसे तो नेताजी छुटभैया किस्म के नेताजी हैं। लेकिन उन्हें हम लोग प्यार से टुच्चेलाल जी भी कहते हैं।
तमाम तरह की कमियों के बावजूद भी नेताजी, नेताजी हैं। उनकी सरकार है। लेकिन प्रांत के कस्बे में अँधेरा है। और टुच्चे लाल अपनी पीठ ठोंकने में लगे हैं। नियम से अगर देखा जाए तो टुच्चे लाल जी को डूब कर मर जाना चाहिए। खासकर तब जब उनकी ही सरकार है। और उनके ही बिजली विभाग में भ्रष्टाचार है। कोई ऐरा- गैरा नत्थू -खैरा सरकार के प्रतिनिधि की बात नहीं सुन रहा है।
टुच्चे लाल जी को अपनी नेतागिरी चमकानी है। कल को कोई वार्ड -मुखिया का कहीं चुनाव हो। तो सबसे पहले उनको ही उस क्षेत्र से टिकट मिलेगा। ऐसा नेताजी को पूर्ण विश्वास है। अब नेताजी हैं टुच्चे लाल तो उनको अपना गली -मुहल्ला, गाँव सब देखना है। पहले वो गाँव -गली मुहल्ले के हैं। फिर वो इस राज्य के हैं। पहले वो अपने कुनबे को देखेंगे। फिर सरकार को देखेंगे। तमाम कमियों के बावजूद वो अपनी और बिजली महकमे की पीठ थपथपाते हैं। अब वो साफ-साफ कह भी तो नहीं सकते कि बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उनकी नहीं सुनते। सरकार और कर्मचारियों में रार है!
रावण की भूमिका : (व्यंग्य) : महेश केशरी
हमारे यहाँ रावण जलाने की परंपरा है। हर साल आश्विन मास में रावण दहन बहुत ही जोर-शोर से होता है। और लोग मजे ले लेकर रावण दहन देखने जाते हैं। पत्नियाँ अपने पतियों को खासकर अपने साथ रावण दहन को दिखाने के लिए लेकर जातीं हैं। ये एक तरह से प्रतीकात्मक तौर ये बताने का प्रयत्न है कि यदि तुम ना सुधरे तो तुम्हारा हश्र भी इसके जैसा ही होगा।
कल चावल खाते हुए चावल में कँकर मिले। मुँह से कँकर निकालकर बाहर फेंका तब याद आया कि क्या वैसे लोग ही रावण हैं। जो दूसरी की पत्नी का हरण करके ले जाते हैं। या जो चारित्रिक रूप से गिरे हुए हैं। जो लोग मिलावटखोरी करते हैं वो रावण नहीं हैं। जो दूसरों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हैं। वो रावण नहीं हैं।
वैसे लोग जो दूध में पानी मिलाते हैं। वैसे लोग जो बासी तरकारी बेचते हैं। या तौल में लोगों को कम माल देते हैं। या दवाईयों की डुप्लीकेसी करते हैं।
इस तरह से अगर देखा जाए तो हमारे आसपास रावणों की एक पूरी फौज खड़ी है। जो भाँति -भाँति से हमारा शोषण कर रहें है।
इस बार का दशहरा कुछ दूसरे तरह का है। लोग बाहर निकले तो थे रावण जलाने के लिये । लेकिन रावण गीला हो गया था।
वैसे लोगों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। बाहर रावण बरसात के कारण गीला पड़ा हुआ है। और आदमी तँगी से अँदर से पीला पड़ा हुआ है। त्योहार हैं कि भूतों की तरह पीछा ही नहीं छोड़ते। दशहरे के बाद दीपावली है। उसके बाद छठ है। दशहरे के कपड़े - लत्ते बच्चों के कहीं खरीदाए हैं, कहीं नहीं। जुलाई -अगस्त -सितंबर बरसाती मौसम रहता है। कभी हफ्तों-हफ्तों दुकानों में बोहनी नहीं होती है। बरसात और ऑनलाईन के कारोबार ने दुकानदारों की पहले ही कमर तोड़ दी है। नँगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या। ऐसी हालत कुछ जेब की है। नौकरीपेशा आदमी की हालत साँप - छूछूँदर वाली है, तनख्वाह मुश्किल से दस दिन चलता है। घर बाहर चारों तरफ देखना है।
लोगों का चेहरा मँहगाई के कारण पीला पड़ा हुआ है। त्योहारों की खुशी लोगों के चेहरे से गायब है। दशहरा बीता नहीं कि दीपावली में रँग - चुना पुताई करवाना होगा। फिर पटाखों और मिठाईयों की व्यवस्था।लगले छठ पूजा है।
कहीं रावण लोगों के ऊपर ही गिर गया। एक जगह तो पूरा का पूरा पँडाल ही लोगों के ऊपर जा गिरा। लोग मरते- मरते बचे।
टेंट मंडली और बिचौलियों में सौदेबाजी हो गई थी। लोगों ने पुल, सड़क निर्माण की तरह पँडाल निर्माण में भी पैसा खाया था। लिहाजा पुल की तरह रावण भी गिर गया। अब रावण सोच में पड़ गया लोग मुझे क्यों जला रहें हैं। कायदे से मैं उतना भी बुरा नहीं जितना कि लोग मुझे समझते हैं। मैनें और जितने भी उल्टे-सीधे काम किए हों। लेकिन पुल -पुलिया घोटाले की तरह पुतला या पँडाल घोटाला नहीं किया।
इस लोक- परंपरा और त्योहार को मनाते हुए प्रतीकात्मक तौर पर लोग रावण को जलाते थे तो रावण बुरा नहीं मानता था। और हँसते -हँसते जल जाता था। लेकिन इस कलियुग में रावण के पुतले निर्माण में भी कमीशनखोरी और बँदरबाट हुई थी। इसको लेकर रावण बहुत दु:खी था। कायदे से ऐसे लोगों को जलाना चाहिए था। जो ऐसे- ऐसे घोटाले करते हैं।
इसी बँदर बाँट में एक जगह रावण का पुतला आधा जला और आधा जलना बाकी रह गया।
रावण हर साल जल्दी से जलकर निपट जाना चाहता था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो सका। और रावण की बहुत बेइज्जती हुई। इसलिए भी रावण बहुत दु:खी था।
तो बात इस दशहरे की हो रही थी। हर शहर में दशहरे का रँग अलग -अलग था। कहीं लोग बाढ़ के कारण से दशहरा मनाते -मनाते रह गए। तो कहीं लोग इसी दशहरे में बाढ़ में डूब कर मर गए। खैर इस बार रावण दहण में रावण की तुलना आतंकवादियों से हुई।
यानि जो राक्षसी प्रवृत्ति का आदमी है वो रावण हुआ। या आतंकी हुआ। लेकिन रावण की आतंकवादियों से तुलना करते समय लोग भूल जाते हैं कि रावण शिव का अन्नय उपासक था। रावण ब्राह्मण था। रावण और सबकुछ तो हो सकता था। लेकिन आतंकवादी नहीं हो सकता था। अब जो उनको कहना था वो कह चुके। जो ऐसा कह रहें हैं। वो चिट देखकर बोलने वाले लोग हैं। चिट में जो लिखा था। वही उनको बोलना था। कहने की जरूरत नहीं है कि रिंग मास्टर कोई और है। आतंकवाद शब्द अभी ट्रेंड में है। लिहाजा आतंकवाद पर ही बोलना है। और बार - बार बोलना है। सबकुछ स्क्रिप्टेड है। रिंग मास्टर जैसे जैसे चाबुक चलाता है। वैसे -वैसे शेर गुलाटी मारता है।
तीस लाख की रॉयलटी और लेखक : (व्यंग्य) : महेश केशरी
तीस लाख की रॉयल्टी मिलने पर सब चौक-चौंक पड़ रहें हैं। चौंकना लाजिमी भी है। अगर इसको इस तरह से देखा जाए तो हमारे समय के सबसे सफल कथाकार और हिदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार कथा सम्राठ के जूते भी फटे हुए हैं। जब साहित्य में इतना पैसा है। खासकर हिंदी साहित्य में तब सवाल उठता है साहित्यकार, कथाकार, कथाकार सम्राठ के जूते आखिर फटे हुए क्यों हैं। दरअसल साहित्य लिखने वालों की हालत शुरू से ही ऐसी ही रही है। लिखने वाला हर हाल में फटेहाल रहा है।
बाद में हमारे यहाँ के चर्चित रचनाकार जिनको फाँकाकशी भी झेलनी पड़ी। उनसे मिलने आने वाले लेखक उनके तकिए के नीचे रूपये छोड़ के चले जाते थे। बाद के हिंदी लेखकों का कई संस्मरण भी पढ़ा। जिसमें लेखकों ने अपनी आर्थिक तँगी का रोना रोया था। इन लेखकों के बाद के लेखक भी कभी अपनी लेखनी की कमाई से अपना एक व्यक्तिगत घर नहीं खरीद सके। घर खरीदना कुछ ज्यादा हो गया। ये बड़बोलापन होगा लेखकों के लिए। सच्चाई तो ये है कि हम लेखन करके दो जून की रोटी भी नहीं कमा सकते। अगर भूखों मरना है तो लेखन कैरियर के तौर पर चुन लो। आपकी लुगाई भाग जाएगी। रॉयल्टी के पैसों से आप बहुत ज्यादा तो पीने के लिए सुट्टा खरीदे सकते हैं।बहुत खुश हुए तो अपने आपको बुद्धिजीवी साबित करने के लिए देशी शराब खरीद सकते हैं। फुटपाथ पर से कोई नेकर या टी -शर्ट खरीद सकते हैं। या कोई च्यूँगम खरीद सकते हैं। और बहुत बडे़ लेखक हैं। तो चार दोस्तों को चाय पिला सकते हैं। और जब आजकल तमाम बड़ी पत्रिकाओं ने मानदेय का भुगतान करना बँद कर दिया है। तो अब तो लेखकों पर और भी आफत आन पड़ी है।
लेखन से बस इतना ही हो सकता है। कोई भी लेखक रॉयल्टी के पैसों से महीने भर सब्जी नहीं खरीद सकता।
फिल्मों की चकाचौंध भरी दुनिया अलग है। जिसमें हजार - पाँच सौ करोड़ क्लब में फिल्में आसानी से शामिल हो जातीं हैं। वो भी सिर्फ आंकड़ों का जादू है।
आजकल जब बेराजगारी इतनी बढ़ी हुई है। और सब लोग पैसे कमाने की सोच रहें हैं। लेकिन पैसा है कि पकड़ से छूट- छूट जाता है। सबसे ज्यादा अखबारों के कॉलमनिस्ट परेशान हैं जो रात- दिन लिख -लिखकर कागज काले कर रहें हैं। जिनको महीने में दस -बीस हजार से ज्यादा की आमदनी नहीं हो रही है। पत्नी और बच्चों की छोटी -मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए झखना पड़ता है। उन लोगों को उनकी पत्नियों की सलाह है कि कुछ भी अलमारी, हवा, पानी, आसमान टाइप कुछ भी लिख डालो। और पच्चीस -तीस- चालीस लाख का इंतजाम कर लो। ताकि हमारा फ्यूचर सेट हो सके। ऐसे लेखक -पत्रकार कॉलमनिस्टउस अचूक नुस्खे की खोज में लगे हुए हैं। जिससे तीस चालीस लाख कमाया जा सके। और वो इस विश्वास और सोच के साथ जी रहें हैं कि इसी तरह से रोज -रोज लगातार कागज काले करते हुए उन्हें भी कोई रॉयल्टी एक दिन जरूर मिल जाएगी।
पहली पंक्ति में बैठने का सुख : (व्यंग्य) : महेश केशरी
यदि आप पहली पंक्ति में बैठे हैं तो आप विशेष हैं। आप माननीय हैं। ये वही माननीय होते हैं। जो स्कूल कॉलेज लाइफ में बैंक बेंचर हुआ करते थे। जिनका काम केवल और केवल गप्पे मारना था। जिनको पढ़ाई -लिखाई बिल्कुल समझ में नहीं आती थी। जो पढ़ाई- लिखाई को बोझ से ज्यादा कुछ ना समझते थे। जिनको दिशा-फरागत या स्कूल जाना एक सा लगता था। जब समय निकल गया तो ये माननीय बन गए। कहते हैं हर गदहे का दिन आता है। इन गदहों के दिन भी लदे। जो कल तक बैंक बेंचर थे। माननीय बनते ही उनका कद कुछ ऐसा बढ़ा ऐसा बढ़ा कि लोग उनको समारोहों में पहली पंक्ति में बिठाने लगे। और यहीं से इन माननीयों को प्रथम पंक्ति में बैठने का जो चस्का लगा। वो चलन में आ गया। और आजतक चलता ही आ रहा है। पढ़े -लिखे लोग अब इनके पीछे हो लिए। अब गदहों की अगुआई में पूरा समाज चल रहा था। उठने- बैठने का शऊर लोग अब इन माननीयों से सीखने लगे।
ये वो दौर है जब सभ्य समाज को जीने की कला माने आर्ट ऑफ लिविंग इन माननीयों से सीखना है। दिलचस्प ये है जो ताउम्र स्कूल गए लेकिन निरक्षर ही रहे। या आधा टाईम पढ़ा और आधा टाइम खेतों में भाग गए। दिलचस्प ये है कि पढ़ा -लिखा आदमी भी उनको अपना आदर्श मान रहा है । और आम आदमी अपने को यही मानकर चल रहा है कि हो ना हो उसके सोचने में ही कहीं भूल हुई है। क्योंकि जो इन माननीयों की दशा-दिशा है। जितनी सुख-समृद्धि इनके पास है। उतना तो पढ़ा-लिखा समाज अपना सबकुछ खर्च करके भी हासिल नहीं कर सकता। यानी आम आदमी को ये मानने में कहीं से भी गुरेज नहीं है कि गलती कहीं उनसे ही हूई है। वैसे आम आदमी यही सोचता है कि क्या इन माननीयों की दिनचर्या है। आराम ही आराम। कहीं बर्थ डे पर चले जाना है, कहीं शादी में, कहीं क्रिकेट मैच के उदघाट्न समारोह में चले जाना है। और हर जगह गाल बजाना है। हर जगह बत्तीसी दिखानी है। आम आदमी दस से चार दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है। फिर भी परेशान है।
जो बैंक बेंचर कभी मास्टरों से बचते- बचाते भागते थे। वही माननीय बनकर उनको हाँकने लगे हैं। बैंक कर्मियों को हड़काने में लगे हैं। अब माननीय हैं तो कोई क्या कह सकता है।
इधर हम लोग भी समय से बड़े हो गए हैं। हम लोग माने हम साधारण लोग जो दाल, भात, साग सत्तू, रोटी, चावल के लिए झखते रहते हैं । समय के साथ हमारे पेट निकल गए हैं। कुछ के बाल खिचड़ी हो गए हैं। अधिकतर लोग दवाईयों पर जिंदगी काट रहे हैं। कभी बी.पी. बढ़ जाता है, कभी शूगर। हमलोग इन बीमारियों और दैनंदिनी जरूरतों के लिए मरे खपे जा रहें हैं। इतिहास गवाह है कि हम जैसे लोगों के लिए काम, काम और काम ही सबकुछ है। काम के अलावे हमने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं। पत्नी पहले लरजती थीं। बाद में इस काम को लेकर बरजने लगी। आजकल का हाल ये है कि इसी काम के चलते अब वो अक्सर हम पर गरजतीं हैं। समय के साथ ही समय ने ये भी सिखाया है कि पत्नी से ज्यादा मुँह मत लगाओ। नहीं तो उनसे बुरा कोई नहीं होगा। बचपन में छोटी- छोटी बातों को लेकर छीना- झपटी थी। ये मेरा तो ये मेरा। अब ऐसा नहीं है। ये तेरा और वो वो भी तेरा। तो इस तरह से देखा जाए तो हम समझदार हो गए हैं । फिर भी लोगों को लगता है कि हम कुछ करते ही नहीं।
लिहाजा हम खलिहर इधर बहुत समय से नहीं बैठे। खलिहार क्या हम तो इधर एक दो दशक से बैठे ही नहीं। तो बात बैठने की हो रही है। खलिहर या तो बाबू बैठते हैं या नेताजी। नेताजी माने खास आदमी। खास आदमी आपको हर जगह पहली पंक्ति में बैठा मिलेगा। यदि आप पहली पंक्ति में नहीं बैठे हैं। तो आपको खास नहीं माना जा सकता। खास वही होगा जो पहली पंक्ति में बैठा मिले। नेताओं और बाबूओं में पहली पंक्ति में बैठने की होड़ सी रहती है। आयोजक हमेशा इस बात को ध्यान में रखते हैं, कि जो खास हैं। उनको पहली पंक्ति में ही बिठाया जाए। जिससे आयोजन की गरिमा बची रहे। यदि मुख्य अतिथि या माननीयों को पहली पंक्ति में बैठने का अवसर ना मिले तो वे लोग घोड़े की तरह बिदक जाते हैं। आयोजन के खत्म होने के बाद ये शिकायत आयोजक से करते हैं कि उनको पहली पंक्ति में क्यों नहीं बिठाया गया। बहरहाल लोग अनुभव से इस तरह की धृष्टता करने से बचते हैं।
पहली पंक्ति में यदि उनको बिठाया जाए तो वो छोटे बच्चों की तरह हुलसे से दिखाई देते हैं। फोटो शूट में भी ये प्रथम पंक्ति में दिखाई देना चाहते हैं। ताकि इनका दाँत चियारता हुआ छायाचित्र अखबारों की शोभा बढ़ाए।
तो यदि आप भी प्रथम पंक्ति में बैठना चाहते हैं तो पहले इन माननीयों के कृपा पात्र बनिए !
दो कौड़ी के लोग : (व्यंग्य) : महेश केशरी
पहले के लोगों में फोटो फोबिया नहीं थी। नानी -दादी ने स्टूडियो का मुँह तक नहीं देखा था। लेकिन इधर इंस्टाग्राम और फेसबुक के दौर में दादी - नानियों की उम्र की महिलाएँ रील्स पर रील्स चेंपें जा रहीं हैं। झूलती काया , अर्धनग्न शरीर , कामुकता टपकातीं। आँखों के नीचे कोलेस्ट्रोल के प्रभाव में झूलती चमड़ी। भजन -कीर्तन करने की उम्र में कूल्हे मटका रहीं हैं। ऐसी नानियाँ -दादियाँ पोल डाँस करते नहीं थक रहीं हैं।
हमारे जमाने की दादी -नानियाँ सिर पर से पल्लू तक हटने नहीं देतीं थीं। और उस समय ब्लैक -एंड -व्हाईट फोटो का जमाना था। तब जब दो- चार पैसे में फोटू खींचे जाते थे। तब भी उन लोगों ने स्टूडियो का मुँह तक नहीं देखा था। उनको फोटो खिंचवाने जाना है। ऐसा कह दो तो उनको जैसे डर लगने लगता था। मानो उनसे कोई कह रहा हो कि युद्व लड़ने जाना है। आजकल की नानियाँ -दादियाँ बिकनी पर रील्स बनाते नजर आ रहीं हैं। जिनके बच्चे ऐसे रील्स देखते झेंपते हैं।
लोगों में फोटो - फोबिया नाम की बीमारी हो गई है। और लोग दो कौड़ी का आदमी बनने की राह पकड़ चुके हैं।
ये बीमारी इंस्टा-फेसबुक , सोशल मीडिया और जनसंचार क्राँति आने के कारण और बढ़ गई है। हर कोई कुछ कर रहा हो या नहीं लेकिन रील्स जरूर बना रहा है। और वो कैप्सन खुद लिख रहा है। या दोस्तों से कैप्सन लिखवा रहा है।
इसके बाद जो लोग बच गए हैं। वो अपनी वॉल पर की मिनट -मिनट की जानकारी फेसबुकिया मित्रों से साझा कर रहें हैं। छोटी-छोटी बातों मसलन भिंड़ी का बाजार भाव से लेकर ट्रँप- भारत के संबंध जी. एस. टी. के फायदे और नुकसान की बात। जहाँ हर फेसबुकिया एकाऊँट संवाददाता बना हुआ है। इसके बाद जो लोग बच गए हैं। वे फोटो डाल रहें हैं। वेज से ज्यादा नॉनवेज फोटुओं की भरमार है। और लोग चटखारे ले लेकर देख रहें हैं। और जो लोग जीवण में कुछ नहीं कर पाते हैं। वे लोग फोटो खिंचवातें हैं । पिछलग्गू बन जाते हैं। पिछलग्गू बनकर ही धन कमाया जा सकता है। ऐसे पिछलग्गू लोग दो कौड़ी के होते हैं। और फोटो खिंचवाने में बावन वीर होते हैं।
आप भी अगर जिंदगी में दो कौड़ी का आदमी बनना चाहते हैं। तरक्की करना चाहते हैं।तो महानुभावों नेता - अभिनेताओं और सेलिब्रिटी के साथ फोटो खिंचवाईए। और दबाकर शेयर कीजिये। अभी जो दिखता है , वही बिकता है का दौर है। इसलिए पिछलग्गू बनिए। ऐसे दो कौड़ी के लोगों को लगता है कि वो किसी सेलिब्रिटी या नेता या अभिनेता के साथ फोटो खिंचवाकर रातों- रात मशहूर हो जाएँगे। आखिर फोटो का भी तो प्रभाव होता ही है। दूसरों के साथ फोटो खिंचवाकर हम भी प्रभावशाली बनने या कम- से- कम दिखने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।
भले ही ऐसे लोग जीवण भर लुँगड़ई करते रहे हों । लेकिन दिखना मेहनती और काबिल चाहते हैं। जो सफेदपोश हैं। जो जरायम पेशा हैं। जिनका कि एक स्टेटस हैं। भले ही वो दो कौड़ी के आदमी हों। उनको फोटो खिंचवाकर ऐसा जरूर लगता है कि इनके प्रभाव से हमारा प्रभाव बढ़ेगा ही बढेगा ।
लोग नेताजी नुमा लोग फिल्मी सितारों के आजू -बाजू में ऐसे खड़े होकर फोटो खिंचवाते है़ं। मानों उनके साथ उनका रोज का उठना बैठना हो । जैसे वे उनके रिश्तेदार हों ! ऐसे दो कौड़ी के लोग अपनी प्रतिष्ठा में चार - चाँद लगाने के लिए इन फोटुओं को दबाकर शेयर करते हैं। अभी फोटो खिंचवाने का दौर है। तो आप भी फोटो खिंचवाईए और उसको अपने फेसबुक पर शेयर कीजिये । क्या पता आप भी कल को दो कौड़ी के ऐसे लोगों में शुमार हो जाएँ। जब हर कोई दो कौड़ी का आदमी बनने कि फिराक में है। तो आपको -हमको दो कौड़ी का आदमी बन जाना चाहिए। इसकी बदौलत ही सही लोगों को ये बताईए या दिखाईए कि आप भी दो कौड़ी के आदमी हैं। और आपकी भी पहुँच बहुत ऊपर तक है । बताईए कि आप भी पैरवी करने वाले लोगों में से हैं। नेता -अभिनेता के साथ जो लोग फोटो खिंचवाते हैं। वो अपने बिगड़े काम बनवाने के लिए ही ऐसा करते हैं। बिगड़े काम से मतलब है काम का ना मिलना। और जब वे लोग खलिहर होते हैं। तो टेंडर , ठेका या कोटा कैसे मिले इसका सबसे अच्छा तरीका है किसी सेलिब्रिटी नेता - या अभिनेता के साथ फोटो शूट करवाना। ऐसे दो कौड़ी के लोग जब जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते तो ऐसे महानुभावों के साथ फोटो खिंचवाने का काम करते हैं।
सोनपापड़ी बेकार झाड़ू से प्यार : (व्यंग्य) : महेश केशरी
जड़ -बुद्धि होना इसी को कहते हैं। भेंड़ चाल जब सब चल रहें हैं। तो हमें भी चलना है। सब लक्ष्मी को पकड़ने की फिराक में हैं । लेकिन लक्ष्मी जड़ -बुद्धि वालों के यहाँ नहीं आती। तेज -तर्रार लोगों के पास आती है। अब इसको जड़- बुद्धि ना कहें तो क्या कहें, कि लक्ष्मी को संग्रह करने से लक्ष्मी जी बढ़ती हैं। ना कि खर्चने से। लक्ष्मी को खर्चने से लक्ष्मी जी नहीं बढ़ती। लेकिन समझने को लोग तैयार नहीं हैं।लगे हैं धन उगाहने में।सही गलत तीन- पाँच जैसे भी हो। बस धन जमा करते जाना है।
बनिया सुबह से हलकान हुआ जाता है। बनिए के अँधे- काने -लँगड़े -बहरे सब -के -सब झाड़ू बिक गए हैं।बनिए ने बेच दिया है अपना पुराना टूटा -फूटा स्टॉक। बन गया आसामी। कमा लिए रूपये। कारण की बनिया होशियार है।
हम पैनिक हुए जा रहें हैं। पत्नी जी ने बाजार जाते समय सबसे पहली और आखिरी शर्त यह रखी है, कि कुछ खरीदो या मत खरीदो। लेकिन बाजार जाना जो झाड़ू जरूर खरीदना । नहीं तो घर में घुसने नहीं दूँगी। लिहाजा सब लोग लक्ष्मी पूजन पर फल- फूल , मिठाई -दीए बाद में पहले झाड़ू खरीदने की जुगाड़ में लगे हुए हैं।अब लक्ष्मी जी बुरा नहीं मानेंगीं, कि उनको वरीयता सूची में सबसे नीचे रखा जा रहा है।
ये वही आमजन है। जो केजरीवाल और झाड़ू का ना हुआ । जिसने झाड़ू फेरकर केजरीवाल को भगा दिया।
जिसको सफाई से सख्त नफरत है। ये वही जनता है। जो केले खाकर छिलके रोड़ पर फेंकती है। जो गुटखे का पीक सड़क पर इधर- उधर थूकते हुए इठलाती है। ये वही जनता है। जो बादाम का छिलका सफर में ( रेल , बस यात्राओं) के दौरान पन्नी में जमा करती है। लेकिन फेंकती रोड़ पर है। अब इसका क्या फायदा हुआ, कि आपने छिलके बहुत इत्मीनान से पन्नी में जमा किए। और बिना सोचे- समझे रोड़ पर दे मारा। वाह- री झाड़ू खरीदने वाली जनता!
इसलिए तो तुम्हारी बुद्धि जाती रहती है। घर से निकले सौदा सुलफ लाने। गली में चल रहा था , जुआ। सौदे के पैसे से बैठ गए जुआ खेलने। और हुआ वही जो होना था। चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनकर आए। जूठा भी खाया और जात से भी गए। कैसे टिकेगी लक्ष्मी तुम्हारे पास?
सब भेंड़ चाल चलने में लगे हैं। एक जिस रास्ते पर चल रहा है। हम भी उसी रास्ते पर चलें। सब झाड़ू खरीद रहें हैं। तो हम क्यों ना खरीदें? दीपावली पर जब सब कार ले रहें हैं। तो हम क्यों ना लें। तब सोशल स्टेटस देखा जाने लगता है। महीने का पचास हजार कमाने वाला हमारा पड़ोसी कार खरीद रहा है। हम उससे कम हैं, क्या ? हम भी कार लेंगें । उसने फॉर्चयूनर खरीदी है। हम भी फॉर्चयूनर ही लेंगें।
माथा पीट लेने का मन करता है। ऐसे लोगों को देखकर। उसकी पत्नी ने खरीदा है, दो- तोले के सोने का हार। मैं भी लूँगी इसी दीपावली में। और उतने ही वजन का और वैसा ही मॉडल ।
इधर लोग देखा - देखी झाड़ू का समर्थन और सोनपापड़ी का विरोध कर रहें हैं। लोग हाथों- हाथ झाड़ू ले रहें हैं। और सोनपापड़ी भी। सब- एक दूसरे को सोनपापड़ी भेंट देना चाहते हैं। लेकिन सोनपापड़ी लेना कोई नहीं चाहता । अब सबको लग रहा है कि लोग उनको काजू-बरफी खरीद कर दें। और बदले में सोनपापड़ी लें!
सोनपापड़ी है कि शादी में दिए जाने वाले शर्ट- पैंट के कपड़े की तरह इधर -से -उधर घूम रही है। हर लेने वाला किसी दूसरे को थमा रहा है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हो रह है? आज से बीस- पच्चीस साल पहले इसी सोनपापड़ी को खरीदने के लिए लोगों को भीड़ लगी रहती थी। लेकिन सोनपापड़ी है कि रूपये कि तरह गिरता जा रहा है। और डायरीमिल्क को खरीदने और लेन- देन का छद्म दौर चल पड़ा है। बिना सिर पैर का विरोध है। ऐसे लोग हमारे देश के मुखिया जी की बातों से सीख नहीं लेते,कि स्वदेशी अपनाओ और विदेशी का त्याग करो। कैसे आएगी लक्ष्मी जब हम सोनपापड़ी की जगह डायरीमिल्क खरीदेंगे?
दीपावाली वैसे लोग भी मना रहें हैं। जिन्होंने शुभ -लाभ को तो पढ़ा । लेकिन लाभ को उल्टा करके भला शब्द ना पढ़ सके। ना कभी किसी का भला कर सकें। वैसे लोग भी दीपावली पर्व मना रहें हैं। जो अपने माँ-बाप को वृद्धाश्रम भेज चुके हैं। तमाम बुराईयों के बावजूद वैसे लोग जो सूद -ब्याज का धँधा करते हैं। तीन की जगह तेरह ले रहें हैं। लोगों का खून चूस रहें हैं। वैसे लोग जो दूसरों को धोखा दे रहें हैं। मिलावट खोरी , जमाखोरी कर रहें हैं। वे भी सोच रहें हैं, कि लक्ष्मी जी की कृपा उनपर बरसे। तो भाईयों, यकीन मानिये आपके साथ ऐसा होने वाला नहीं है !
कर्ज लेकर परेशान हूँ : (व्यंग्य) : महेश केशरी
किसका दु:ख बड़ा है। लेने वाले का या देने वाले का। देने वाला ज्यादा दु:खी है। कारण कि देने वाले ने देते समय ये नहीं सोचा होगा कि देने के बाद माँगना भी पड़ेगा। वो भिखारी बन जाएगा। लेने वाले से पैसे वापस लेने के लिए सौ तरह के बहाने उसको सोचने पडेंगें ।
लेने वाले के तो बल्ले-बल्ले हैं। वो मूँछों पर ताव देकर चलता है । वो लेते समय " भर दे झोली मेरी या मुहम्मद लौट कर ना जाऊँगा खाली " कि तर्ज पर माँगता है। एक रईसी या नबाबी लेने वाले के स्वभाव में दिखाई देने लगती है। लेने वाला अकड़ में रहता है। हमेशा गर्दन ऊँचा करके चलता है। देने वाला हमेशा गर्दन झुकाकर माँगता है। देने वाले के पास बहानों की कोई कमी नहीं हैं । उसके पास रेडीमेड जबाब तैयार हैं । कभी वो बाहर किसी काम से गया होता है। लौटने पर चुकाने की बात कहता है। कभी उसको ई. एम. आई. भरनी होती है। कभी फ्लैट का किराया चुकाना होता है।
कभी गाड़ी की किस्तें आपका भरनी होती है। कभी हाथ तँग होने का बहाना मिलता है। कभी माँ बीमार हो जाती है। ये सब बीमारियाँ -परेशानियाँ कर्ज लेने से पहले नहीं होती है। सारी-की- सारी मुसीबतों और परेशानियों की फेहरिस्त कर्ज लेने के बाद ही शुरू हो जाती है। सही मायने में अगर देखा जाए तो लोग कर्ज देकर नहीं कर्ज लेकर परेशान रहते हैं। कर्ज देने वाला कर्ज लेने वाले से पूछता है।
" तू कहाँ...... मैं यहाँ , तू कहाँ" । उधर नेपथ्य से आवाज आती है। " तू कहाँ..... मैं यहाँ...। " और इस तरह कर्ज देने वाले और कर्ज लेने वाले में छुपम- छुपाई का खेल चलता रहता है। कर्ज लेने वाला गाता है। " ये गलियाँ ये चौबारा। यहाँ आना ना दोबारा, कि हम तो हुए परदेशी कि तेरा यहाँ कुछ नहीं। "
ऐसे ही एक महानुभाव से मेरी एक दिन मुलाकात हो गई। जो कर्ज लेकर परेशान थे। कर्ज देने वाला अपने कर्ज की रकम वापस माँग रहा था। तो इस तरह से उन्होंने अपनी आपबीती या परेशानी बताई। दरअसल वो मृदुभाषी और सौम्य थे। उनके चेहरे पर हमेशा बेचारगी छाई रहती थी। इसी बेचारगी और शहद -मक्खन लगाने की आदत के कारण लोग उनको उधार दे देते थे। उन्होंनेे अपनी जरूरत के हिसाब से अपने जान -पहचान पड़ोसियों और इष्ट -मित्रों से कर्ज लेने में कोई कसर नहीं छोड़ा था। लेकिन उनकी परेशानी वही थी। जो प्राय: हर कर्ज लेने वाले की होती है। वो कर्ज लेकर परेशान थे। ये इतिहास में बहुत अनोखी बात हो गई थी कि वो कर्ज लेकर परेशान थे। और सबसे बड़ी बात की उन्होनें इसकी स्वीकृति सार्वजनिक तौर पर की थी। वो कर्ज लेकर छाती ठोंककर और दावे के साथ ये कह रहे थे कि उन्होंने कर्ज ले रखा है। कर्ज किसने नहीं ले रखा है। छोटे -से -छोटा आदमी और बड़े- से -बड़ा आदमी। हर आदमी ने कम बेसी कर्ज ले ही रखा है। अब वो माल्या या मोदी की तरह तो नहीं हैं। जो कर्ज लेकर चंपत हो गए हों। वो सामने हैं। देश से भागे नहीं हैं। इतना ही कम है क्या भला। लेकिन उनका दु:ख हर कर्ज लेने वाले की तरह का है। वो सार्वजनिक तौर पर कहते हैं कि जिनसे वो कर्ज ले चुके हैं। वो बार-बार अपने दिए पैसे माँगकर उनको परेशान कर रहा है। जैसा कि हर कर्जदार कहता है। वो भी कह रहें हैं कि वो अपने देनदारों का कर्जा चुका देंगें। और जब हर कर्ज लेने वाला ऐसे ही झूठ बोल रहा है। तो उनकी बात पर भी हमें यकीन कर लेना चाहिए कि वो लिया हुआ कर्ज लौटा देंगें। उनके इस कथन पर देनदारों को विश्वास करने के अलावा और कोई उपाय भी तो नहीं है !
तो आप महिला हैं : (व्यंग्य) : महेश केशरी
घरों में आपका -एकक्षत्र शासन रहता है। किस दिन माँस मछली खाना है। किस दिन नहीं। ये तय है। ये अनित्य है !
इसमें तिल मात्र भी परिवर्तन संभव नहीं है। किस दिन लहसन --प्याज नहीं खाना है ये आप तय करतीं हैं।
आपकी एक सत्ता है। आप सार्वभौम हैं।
जिसमें आप खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं हैं ! आपका जो विधान है। उसको सबको मानना है। किस दिन एकादशी है। किस दिन पूर्णिमा है। फलाना दिन होने से आज चावल नहीं खा सकते या घर में नहीं बनेगा । आज फलाना वार है अँडा या मच्छी नहीं बनेगी।
रात दस बजे के बाद घर में आप कुछ नहीं बना सकतीं। आप थकी -थकी सी रहतीं हैं।
लफ्फाजी के जितने काम हैं। वो सब आपके जिम्में हैं। आप नियंता हैं। आप ही विधाता हैं। घर भी इस पृथ्वी पर पृथ्वी के अँदर छोटा ग्रह है। जहाँ हमारी महत्वकाँक्षाओं को सिर उठाने की ताकत नहीं है। आपको बड़े -से -बड़े खाने -पीने के आँदोलन को कुचलने का हुनर आता है।
आपसे अब और काम नहीं हो सकता है। चुगली करते समय आप उछल -उछलकर, मचल- मचल कर लोगों से चुगली करते नहीं थकतीं।
लेकिन जैसे ही हम लोगों को रात में पकौड़े खाने का मन करे। तो आपका पारा हाई हो जाता है। हमारे बगल में एक सज्जन हैं। जिन्होंने गलती से रात को मुर्गा खा लिया था। तो नियंता के आदेश पर उसको आधी रात को कड़कड़ाती हुई ठंड में नहाना पड़ गया था।
आपकी पसँद के क्या कहने। मजाल है जो आपको कोई चीज एक बार में पसँद आ जाए। संतोष् परम् सुखम् संतोष में सुख की प्राप्ति होती है। लेकिन असंतोषी होना आपका परम गुण है। कोई चीज पसँद भी आ जाए तो असंतुष्टि का भाव आपके चेहरे से साफ परीलक्षित होता है। कोई नौसिखुआ भी ये भाव साफ आपके चेहरे पर देख सकता है।
कुछ तो कमी है। ये हमेशा आपको लगता है। फिर चाँद में भी दाग है। ये बात सबसे पहले पहल किसने सोची होगी। जाहिर सी बात है, आपने। ये आपलोगों के अलावे और कौन सोच सकता है। आपके दिमाग में ये बात भला क्योंकर नहीं आती कि चाँद में भी दाग है। लेकिन चाँद शीतल भी तो है।
चाँद बच्चों का मामा भी तो है। या ये बात आपके भेजे में क्यों नहीं धँसती कि हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता। किसी को जमीं तो किसी को आस्माँ नहीं मिलता।
आप सामान रखकर भूल जातीं हैं। आपका रखा सामान भगवान् भी नहीं मिल सकता ।
आपको हम मर्दों को बार - बार बाजार दौड़ाने में मजा आता है । आप चीजों को बार- बार दुकानदार से कहकर बदलवातीं हैं। आपसे लोग पके- पके रहते है़ं। सब लोग थके -थके से रहते हैं। आपसे बहस में कोई जीत नहीं सकता। चुगली में आपको हरा नहीं सकता।
आपके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं होते। लेकिन पूरी अलमारी कपड़ों से भरी होती है। लेकिन आपके पास पहनने के लिए कुछ नहीं होता। पहनने के लिए कुछ नहीं होता। फिर भी आप अलमारी खोलकर ये नहीं तय कर पातीं कि आपको पहनना क्या है। मान लो वो तय भी कर लें। तो तैयार होने में आपको घँटों घँटों लगता है। तैयार होकर भी आपको लगता है कि अभी कुछ बाकी है।
आत्मविश्वास की आपमें कमी पाई जाती है। तैयार होकर आप बार -बार खुद को शीशे में निहारतीं हैं। और पति से पूछती हैं कैसी लग रहीं हूँ। पति तारीफ करता है, तब भी आपको यकीन नहीं होता। आप बस मुस्कुरातीं हैं। आपकी परेशानी कुछ दूसरे तरह की है। आप पार्टी में तो जातीं हैं। लेकिन दूसरों को निहारतीं हैं।
आपको हमेशा दूसरों की चीजों में रुचि होती है। आपका पेट बहुत बड़ा होता है। लेकिन छोटी -छोटी बातें आपके पेट में नहीं पचतीं । सुनी -सुनाई बातों पर बहुत कान देतीं हैं। आपको किसी बात को तेल- मसाला डालकर दूसरों को परोसने में बहुत मजा आता है।ये हुनर आप जैसे निन्यानवे प्रतिशत लोगों में पाया जाता है। ईर्ष्या -दोष से आपका बहनापा है। जलने के लिए आपको आग की जरूरत नहीं होती।
आप बात- बात पर मुँह फुला लेती हैं। मुँह फुलाने की कला में आप पारंगत हैं।
आपका हर काम मतलब से होता है। बिना जरूरत के आप किसी को नहीं देखतीं । लिफ्ट लेनी है तो मुसकुरातीं हैं।
कोई प्यार भरी नजरों से ताके तो गरियाती हैं। लोग कहते हैं कि ईश्वर अंतर्यामी हैं। ईश्वर को बाद में अंतर्यामी मानना चाहिए। क्योंकि भगवान् भी आपकी लीली नहीं समझ सकता। खैर हम तो इंसान हैं। वक्त जरूरत के हिसाब से लोगों का हिसाब करना आपको बखूबी आता है। आपकी सबकी नहीं हैं ये तो तय है। लेकिन जिसकी भी हैं उसकी नाक में दम कर रखा है।
आप बम की तरह हैं। आपका गुस्सा कभी भी कहीं भी फूट सकता है। इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता है। समंदर की थाह है आपकी नहीं। आपके बार में कोई भी अनुमान नहीं कर सकता। आपको विषय के तौर पर कोई यूनिवर्सिटी नहीं पढ़ा सकती। बड़े- बड़े ज्ञानी भी आपकी थाह नहीं ले सके। तो हम मूरख पुरूषों की भला क्या औकात है?
आपके कारण ही महाकाव्य लिखे गए। बस आपकी एक और एक झलक ने हमें डूबोया है। वरना हम भी थे आदमी काम के। आपके इशारे से लड़के आहें भरते हैं। आपके कारण ही ऊर्दू शायरी और मुहब्बत की गजल, नज्में जिंदा हैं। बखान आपके कारण ही घरों में दीवारें खींचीं है। आपके कारण ही म्यानों से तलवारें निकलीं हैं। आपकी खातिर ही वनवास हुआ है। आपके चलते ही रावण और राम अमर हो गए। आपके कारण ही महाभारत हुआ है।