विनाश में छुपा नव निर्माण (कहानी): मंगला रामचंद्रन
Vinaash Mein Chhupa Nav Nirmaan (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
जब से यश ने पलायन करते कामगारों और मजदूरों को देखा उसे लगा काश, वो भी उनमें शामिल होता। लोगों ने, सरकारों ने, संस्थाओं ने यहां तक कि पुलिस ने भी उन्हें हाथों-हाथ लिया। मात्र पेट की आग ही नहीं बुझाई, पैरों के छालों का भी ख्याल रखा और गर्भवती पत्नियों की डॉक्टरी देखभाल का इंतजाम किया। शुरू- शुरू में टी.वी. में उन्हें देख सुन कर यश का --- दिल पसीज गया था, उनके प्रति दया और ममता का ज्वार उठा था। कम पढ़े–लिखे, महामारी के दुष्परिणाम --- परिणाम का जिन्हें अधिक ज्ञान ही न हो, बेचारे ही मासूम होते हैं। अपने-अपने घर लौट रहे थे और सब वहां आपबीती की कहानियां सुना रहे होंगे। सबकी कहानियों में तकलीफों का बखान मिर्च-मसाले के साथ अधिक होगा इसमें कोई संशय नहीं है। आखिर अपने गांव-घर बार को छोड़कर दूर शहर जाना उनके लिए विदेश जाने के बराबर ही तो है। घर वापसी पर घरवालों ने उनकी अगवानी आरती उतार कर की हो तो कोई आश्चर्य नहीं। कुछ समय बाद रोजी-रोटी के लिए फिर शहर भागना ही पड़ेगा, भले ही कुछ लोगों को, हो सकता है, गांव में ही जीवन यापन का कोई साधन मिल जाये। ये सब सोचते हुए यश को स्वयं की बदतर स्थिति का भान और भी तीव्रता से हुआ।
यश अपने माता-पिता का दुलारा बेटा, बहिन का प्यारा भाई और सही अर्थों मे देश का एक आदर्श नागरिक। एक ऐसा व्यक्तित्व जिससे सबको उम्मीदो को रोशनी की झलक ही मिलती हो, पिछले 8-9 महीनों में तो निराशा और हताशा का बुत बन कर रह गया। पिछली कितनी सारी खुशियां, सपने, उम्मीदें, दूसरों की उससे आशाऍ और उसक खुद के स्वयं से। सब एक कतार में मानों पूरी होने को बेकरार थी। यश भी तो पूरे उत्साह से तैयार था कि सारे सपने एक-एक कर टैकल (tackle) करेगा और पूरी करेगा। यश की स्कूल के समय की गरिमा मैम ने कितने अच्छे से समझाया था कि एक समय में एक लक्ष्य को साधने की कोशिश में अनेकों छोटे- छोटे पड़ाव पर भी अपने आप जय मिलती जायेगी और कुछ नया-नया सीखने को मिलेगा सो अलग। जब 12वीं कक्षा में वो कक्षा के प्रथम तीन विद्यार्थियों से मात्र चंद नंबरों से पिछड़ गया तो गरिमा टीचर ने ही उसे चेताया था कि हड़बड़ी और जल्दबाजी में कितनी ‘सिली मिस्टेक’ कर देता है। यदि ‘फोकस’ रहे तो उसका प्रदर्शन (performance) बहुत बढि़या हो जायेगा।
कॉलेज में आ जाने के बाद सारे दोस्त मिलकर कभी-कभाध अपने स्कूल के टीचर्स से मिलने जाते थे। बाद-बाद में तो सब अपनी पढ़ाई, अपने कार्य में मशगूल हो गये थे। यश जरूर कभी-कभी दोस्तों से कहता था कि ‘यार, गरिमा मैडम से तो कम से कम हम लोगों को मिलना चाहिये।‘ सारे दोस्त मानते थे कि उन्होंने बच्चों को सही दिशा में मोटिवेट किया, सही दिशा निर्देश दिया। छोटी-छोटी बातें जो जीवन यात्रा के लिए आवश्यक और सटीक थे जब तब उने मन मे बीजारोपण की तरह रोप दिया। स्कूल के सारे साथी अलग-अलग कॉलेजों, शहरों में बिखर चुके थे। कुछेक मेडिकल या दूसरे ही संकाय जैसे मीडिया से संबाधित विषय पढ़ते दिल्ली या कहीं ओर शिक्षा लेने लगे थे। पर सब अपनी टीचर को बहुत मानते थे पर यश को यूं ही चिढ़ाया करते थे कि ‘सीता मैया के हुनमान सन’ ।
इंजीनियरींग कॉलेज के चौथे याने अंतिम वर्ष में कम्पनियां नये प्लेसमेंट के लिए आती हैं। यश का पहले इन्टरव्यू में ही प्लेसमेंट हो गया। उसके जैसे और भी छात्र थे जिनका अच्छी कंपनियों में प्लेसमेंट हो गया और सब खुश हो रहे थे कि ‘जॉब हंटिंग’ नहीं करनी पड़ेगी। इधर (Final Exam) फाइनल एक्जाम हुए और कुछ दिनों की छुट्टियों के बाद (Join) ज्वॉईन करना है। जाहिर है कि बच्चों के माता-पिता को इस बात से कितनी राहत हुई होगी। बच्चों की शिक्षा में काफी खर्च होता है और जब तक नौकरी नहीं मिल जाती बच्चे और पालक दोनों की मनोस्थिति किस तरह की रहती है इसका सबको अंदाज़ा है।
यश अपने साथियों की तरह प्रसन्न नहीं लग रहा था। घर पर प्लेसमेंट की बात बताते हुए भी उसे असमन्जस में देख उसके पिता से रहा नहीं गया और उन्होंने पूछा ‘बेटा, क्या बात है? तुम खुश नहीं दिख रहे हो, कोई भी शक-शुबहा अपने मन में मत रखना। जो भी हो मुझे या मां को बता सकते हो।'
बड़ी झिझक के साथ अपनी बात की भूमिका तैयार करने लगा - ‘पापा मुझे इंजीनियरिंग की शिक्षा दिलवाने में आप लोगों ने बहुत खर्च किया और जिस तरह से सारे प्रबंध के लिए प्रयास किया वो सब मैं समझ सकता हूँ। - ‘तो? सभी तो अपने बच्चों के लिए यही करते हैं ये कोई अनोखी बात तो है नहीं। अब तुम सीधे-सीधे अपने मन मे दबा कर रखी हुई बात को सरल शब्दों में बोल दो तो सबके लिए उचित होगा।' – उनके निर्णयात्मक और दो टूक लहजे के बाद यश को सीधे-सीधे अपनी बात पर आना पड़ा।
‘पापा, मैं आगे और शिक्षा लेना चाहता हूँ। एक बार नौकरी में घुस गया तो शायद फिर पढ़ाई की इच्छा खत्म हो जाये। - - - -
’एम.टेक करना चाहते हो? ‘नहीं पापा, मैं यू.एस की किसी यूनिवर्सिटी से एम.बी.ए. का दो वर्षीय कोर्सकरना चाहता हूँ । मात्र इंजिनियर होने से बहुत अधिक ग्रोथ नहीं होगी बिजि़नेस मैनेजमेंट से एकदम फर्क पड़ जायेगा। शुरू से ही अच्छे पैकेज की नौकरी मिल जायेगी।' कुछ हिचक और झिझक के साथ यश ने मन की पूरी बात उगल दी।
कुछ देर वहां सन्नाटा रहा। यश अपने पिता को अच्छे से जानता था। वो सोच समझकर ही कुछ जवाब देगें। मां जरूर चितिंत लगी – ‘बेटा, बाहर वो भी विदेश में पढ़ना सरल थोड़ी है, बहुत बड़ी राशि चाहिये होगी ना?’
‘हां मां, वो तो है, पर यदि एम.बी.ए. कर लूँ तो लाभ भी तो होगा और उसकी एक अलग शान भी होगी। लोन लेकर यदि सब कर लूँ तो नौकरी से आसानी से चुकता होता जायेगा और पता भी नहीं चलेगा।' – यश मां को बताते हुए पिता के चेहरे के हाव-भाव को परखने की कोशिश भी कर रहा था।
‘तुमने सब जानकारी ले ली और सारे पहलूओं की जांच कर ली हो तो फिर विस्तार से मुझे बताओ। यदि संभव हुआ और सब उचित लगेगा तो अवश्य ही तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायेगी।' – पिताजी के विव्दतापूर्ण विश्लेषण और आश्वासन से यश का मन उत्साह से भर गया। इसका असर उसकी पढ़ाई और अंतिम वर्ष के अंकों में भी दिखा। परीक्षा में अच्छे प्रदर्शन से यू.एस.ए. की यूनिवर्सिटी में प्रवेश के लिए भी कुछ आसानी हो गई। पर फिर भी एक बड़ी धनराशि का प्रबंध और वहां रहने आदि की सारी जानकारी लेकर पासपोर्ट, स्टूडेन्ट वीज़ा आदि का प्रबंध कोई सरल तो था नहीं। सारी जानकारियां यश ने ऑनलाईन जुटा ली थी, साथ ही पहले कोई सीनियर स्टूडेन्ट जो वहां गया हो, उनसे भी संपर्क कर जानकारी ली। उसे पिताजी की ये उक्ति एकदम सही लगती थी कि जानकारी अधिक से अधिक लो और सटीक जानकारी लो। कुछ नकारात्मक हो तो वो भी पता होना चाहिए जिससे तुम सतर्क रह सको। यश ने वही किया और अपने पिता से हर बात को साझा करते रहा। पिताजी ने बैंक से (Education Loan) शिक्षा ऋण का प्रबंध करवा दिया। शंकित और डरी हुई मां को उसने आत्मविश्वास और समझदारी से इतना आश्वस्त कर दिया था कि वो यश के परिपक्व व्यवहार पर गर्वित महसूस करने लगी। यश की छोटी बहन तनु सबसे अधिक (Excited) एक्साइटेड थी। उसके सपनों को भी पंख लगने लगे।
‘भैया, आप जाकर आओगे और देखोगे ना तो मेरे लिए भी अच्छा रहेगा।'
‘क्या मतलब ?मैं तो पढ़ने जा रहा हूँ, नौकरी पर थोड़ी जा रहा हूँ कि तेरी फरमाईश पूरी करूँ।
‘भैया आप भी बस; फरमाइश कौन कर रहा है। मैं तो ये कहना चाह रही थी कि अगले वर्ष स्कूल खत्म कर मैं बी.बी.ए. के तीन साल में प्रवेश लेने का सोच रही हूँ ना। ..............
’तो; वो तो तू दसवीं से कहती आ रही है।' – यश अधीरता से बोला ।
’बी.बी.ए. के बाद एम.बी.ए. मैं भी बाहर की यूनिवर्सिटी से कर सकती हूँ। आपका अनुभव हौसला और सहारा मेरे बहुत काम आयेगा। बस ये ही कहना चाह रही थी।' – फिर शरारत से बोली – ‘आप अमेरीका जाने के लिए इतने अधीर हो गए हैं कि तसल्ली से बात भी नहीं सुनते।'
मां भाई-बहन की बातें सुनते हुए बोली – ‘पहले यश को वहां पहुँचकर, नये देश में नये परिवेश में कुछ जमने का समय तो मिल जाये।'
‘अरे मां, सब कुछ हो जायेगा। पूरी तैयारी कर के जा रहा हूँ इसलिए विश्वास है कि जैसा सोचा है वैसा सब हो जायेगा।' – फिर बहन को छेड़ने के अंदाज में – ‘तनु, तुझे क्या अच्छे से नहीं पढ़ेगी या नंबर कम भी आये तो तेरे पास एक उपाय तो है ही।'
सबके चेहरे पर प्रश्न चिन्ह देखकर यश हंसते हुए बोला – ‘नहीं समझी ?तेरे लिए दूल्हा ढूँढ लेगें, बस खाना बनाना अच्छे से सीख ले।'
‘खाना तो मैं ठीक-ठाक बना ही लेती हूँ पर शादी के लिए नहीं बल्कि कहीं अकेले रहना पड़े तो भूखे ना रहना पड़े। देख लेना, आप से अधिक नंबर ही लाऊँगी।' – तनु ने आत्मविश्वास के साथ बोला।
पिताजी बेटी की बात से प्रभावित हो गये और बोल पड़े – ‘तनु, अगर तू परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करती है तो आगे जितनी शिक्षा प्राप्त करना चाहे कर पायेगी। मैं तुम्हारा सदैव साथ दूँगा। पर तभी जब परीक्षा में अच्छे नंबर लायेगी।‘
तनु तो इतनी खुश हो गई मानों मन चाही मुराद मिल गई हो।
इन दिनों ये सारी पिछली बातें यश को रह रह कर याद आ रही थीं। लगभग तीन वर्षों पहले वो यू.एस.ए. गया था, कितना खुश था उत्साह से छल-छलाता हुआ सा। वहां उसका प्रदर्शन भी उत्तम रहा और उसे पूरा विश्वास था कि भारत लौट कर अच्छी नौकरी पाने में काई अड़चन नहीं होगी। पिताजी ने ये भी कह दिया था कि विदेश में कोई अच्छा ‘ऑफर’ आ जाये तो भी ठीक है। आत्मविश्वास से भरा यश सपने बुन रहा था कि बस, जो शिक्षा ऋण बैंक से लिया है वो चुकता करने में कोई कठिनाई नहीं आयेगी। यही नहीं तनु को मन लगा कर अच्छा पढ़ते देख उसने उसकी पूरी तरह मदद करने की ठान ली थी। कौन जानता था मंदी की मार ऐसी पड़ेगी कि महा शक्तिशाली देश अमेरीका में ही नौकरी से निकाले जाने वाले लोगों की संख्या पचास हजार से ऊपर हो गई। फिर नये डिग्री धारकों का अंजाम क्या हो सकता था। यश के लिए एक उम्मीद की किरण यही थी कि भारत में कुछ न कुछ अच्छा हो जायेगा। यश की इस उम्मीद पर भी खड़ी तैयार फसल पर ओले की मार की तरह कोरोना का पाला पड़ गया। महामारी के कारण न भारत आ पा रहा था और अमेरिका में रहना व्यर्थ खर्च का बायस बन रहा था।
यश के मन में कुछ शंका, कुछ भय समाने लगा था पर फिर भी पूरी तरह ना उम्मीद नहीं था। बस किसी तरह एक बार घर पहुँच जाये तो अवश्य ही कुछ न कुछ कर ही लेगा। पर घर लौटना ही तो सबसे बड़ी समस्या हो रही थी। सारे अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने बंद होटल रेस्त्रां और पूरे विश्व में हर जगह तो महामारी के विस्फोट से आशंका और भय का वातावरण बन गया था। भारत ने तो दूरदर्शिता दिखाते हुए शीघ्र ही लॉकडाऊन कर दिया था। मास्क लगाना भी आवश्यक कर दिया था। यू.एस.ए. में कुछ प्रतिशत लोग ऐसे थे जो लॉकडाऊन और मास्क दोनों का विरोध कर रहे थे जिसका खामियाजा भी बहुतों को उठाना पड़ा। यश भारत की और खास कर अपने शहर की खबर पाने के यत्न करते रहता और परिवार की चिन्ताउसे सताते रहती। हालांकि माता-पिता और तनु उसे दिलासा देते रहते कि सब ठीक हो जायेगा, वो लोग अपना ख्याल अच्छे से रख रहें हैं। उन लोगों को यश कि फिक्र अधिक होती थी, एक तो वो अकेला था भले ही यहां कुछ छात्रों के साथ रह रहा था। दूसरा, शिक्षा अच्छी तरह पूर्ण होने पर भी ठीक-ठाक मुकाम न मिलना उसे कहीं न कहीं से निराशा की ओर ले जा रहा था। कौन किसको दिलासा दे हालात ऐसे बन गए थे कि सभी भ्रमित लग रहे थे मानो कोई लंबा दु:स्वप्न चल रहा हो।
आखिरकार यश का तीन महिने बढ़ाये हुए वीज़ा की अवधि भी खत्म हो रही थी और वंदे भारत मिशन की उड़ान से अनेकों उलझनों और परेशानियों से निपटते हुए घर पहुँच ही गया। इच्छा तो बहुत हुई कि सबसे लिपट कर कुछ आंसू बहा कर दिल के भार को हल्का कर ले। वैसे ही एक सप्ताह नियत क्वारेनटाईन होम में मन मार कर बिता चुका था। ऐसी विडंबना कि अपने शहर में अपना घर, अपने लोग बांहे फैलाये आपके लिए बेकरार हो रहे हों और उसी शहर के एक अंजान कमरे में अंजान लोगों के साथ पड़े हो। एक सप्ताह घर के एक कमरे में अलग-थलग रखा गया। दूसरे कमरों से जब उन तीनो के बात करने की आवाजें आती तो यश का भी मन करता कि उनके साथ बैठे बात करें, साथ खाये-पीये। कभी पढ़ते-लिखते, और सबसे अधिक तो सोचते- सोचते ही थक जाता।
वो भी जानता है कि इस महामारी की मार मात्र उसी पर नहीं पड़ी, उसकी तरह के पूरे विश्व में लाखों हैं जिनको किसी न किसी तरह भुगतना पड़ा। किसी को कम किसी को अधिक, पर असर तो सब पर पड़ा। घर पर वो एक सप्ताह अलग-थलग रहना उसे जितना अखर रहा था उससे अधिक तो अब ये समय उससे काटे नहीं कट रहाथा। उसे लगा वो बेकार ही बैठा हुआ, खाता-पीता मां बाप पर बोझ बन रहा है। अनजाने में (Guilty Conscious) गिल्टी कॉन्शस का शिकार होता हुआ हीना भावना से ग्रस्त होता जा रहा था। बहन तो ऑनलाईन स्कूल की पढ़ाई, ऑनलाईन कोचिंग के अलावा मां की घर के कामों में मदद के अलावा पिताजी को गैजेटस् चलाने और सिखाने में व्यस्त रहती। हालांकि कोई उससे ये नहीं पूछ या कह रहा था कि अब आगे क्या करोगे? वो स्वयं ही सोच-सोच कर परेशान हो रहा था कि कोई गलती से भी उसे दोष क्यों नहीं दे रहा ! पिताजी ने क्यों नहीं कहा कि ‘इससे अच्छा तो तुम यहां प्लेसमेंट वाली जॉब ही ज्वाईन कर लेते, सिर पर इतना ऋण का बोझ तो न होता।'
यश को लग रहा था कि ये लोग मुझे कटघरे में खड़ा करें तो मैं चीख कर, रो कर अपने दिल का गुबार तो निकाल दूँ । भले ही उससे जिंदगी में कुछ बदलने वाला न हो, सब कुछ वैसा ही चलता रहे। पर ये लोग तो इतने तटस्थ से रह रहे हैं मानो कुछ हुआ ही ना हो। यश को ये कहां मालूम था कि उन तीनों को इस तरह रहने के लिए कितना प्रयत्न करना पड़ रहा है। तनु तो पहले की तरह उससे मजाक में छेड़ते ही कुछ कहने आती है फिर कुछ सोच कर रह जाती है कि यश को बुरा न लग जाये। अभी वो जिस मनोस्थिति में है जरा सी बात भी चोट पहुँचा सकती है। पर वो चाहती थी कि भैया अपनी खोल से बाहर आये और परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हो जायें। वो छोटी है वरना तो वे यश को समझाने के लिए कितने संवाद मन ही मन बुदबुदाती रहती है। एक दिन मां से बातें करते हुए कुछ ज़ोर से बोली या यश को सुनाने के लिए बोली – ‘कितना समय हो गया, भैया के हाथ का बेक किया हुआ चीज़ केक खाया ही नहीं।'
‘कोई बात नहीं मैं तेरे लिए और कुछ बना दूं।‘ – मां ने लाड़ से पूछा।
‘मैं खुद भी तो अपने लिए कुछ बना सकती हूँ। पर वो भैया के हाथ के बने केक का स्वाद थोड़ी देगा।' – उसकी उदासी भरी आवाज से यश का मानों करंट सा लगा। उसने स्वयं को कोसा कि बस एक बात को लेकर कैकयी की तरह कोप भवन में बैठ गया। जीवन के जो साधारण प्राप्य खुशियां जो वो सबको दे सकता है और खुद भी प्राप्त कर सकता है, उससे भी मरहूम हो गया। खुद को लताड़ा और भरसक सामान्य दिखते हुए कमरे से बाहर निकला और बोल पड़ा – ‘चल तनुड़ी आज हम चीज़ केक बनायेगें, सारी तैयारी करते हैं। एक बार यूट्यूब चैनल पर देख भी लेता हूँ कि कहीं कोई स्टेप या सामग्री छूट न जाये। बहुत दिन हो गये ना।'
उस दिन वो केक अच्छा बना या नहीं बना ये बड़ी बात नहीं थी। बड़ी बात थी यश के व्यवहार में बदलाव से घर के माहौल का कुछ सामान्य सा होना या दिखना। मां फिर भी फूंक-फूंक कर ही कदम रख रही थी कि कच्ची मिट्टी से बने मटके की तरह फूट न जाये। बेटे के हृदय की पीर को वो समझ सकती है और उसकी लाचारी और बेचारगी दोनों दूर होगी तो यश के प्रयत्नों से पर माहौल उन लोगों को बनाना पड़ेगा। ये तो बस मां-बेटी का छोटा सा साझा प्रयत्न था। धीरे-धीरे चारों के बीच संवाद होने लगा तो यश को अपने दोस्त, परिचित परिवार और कई अन्य लोगों की इस दौरान की कहानियां पता चली। कुछ मार्मिक, दुखदाई तो कुछ हौसला बढ़ाने वाली भी थी। अब तक कुछ दफ्तर खुल गये थे और कम संख्या में ही सही पर कुछ लोगों को जाना पड़ता था। डॉक्टर-नर्स और चिकित्सा और स्वास्थ्य से जुड़े हुए लोग कितनी खराब स्थिति से जूझते हुए काम कर रहे हैं, ये सब जानते हुए उसे अपने ऊपर शर्म आई कि वो घर में सुरक्षित बैठ कर भी गम से मरा जा रहा था। कितने घरों में परिवार के सदस्य कोरोना से ग्रस्त होकर काल कवलित हो रहे हैं या शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताडि़त हो रहे हैं। अपने पापा को देखकर अचानक ही उसके मन में ममता सी जाग गई। वो बैंक में मैनेजर थे इसलिए उन्हें रोज ही बैंक जाना ही पड़ता था और मां इस बात से चिन्तित होती थी। भले ही मास्क लगा कर सारे नियमों का पालन करते हो पर तब भी ऐसे हालात में उन्हें जाना पड़ता है और वो जवान, युवा होते हुए भी घर में बैठा रहता है। आखिर उससे रहा नहीं गया और अपने दोस्तों में से कुछ लोगों को फोन कर उनका हाल पूछा। धीरे-धीरे सब ज़ूम पर बात करने लगे और एक-दूसरे को देखने से यश को एक अपनापन सा लगा। सभी के साथ कुछ अच्छा कुछ बुरा हुआ ही था। तभी बातों-बातों में उसे पता चला कि गरिमा मैडम के साथ बहुत बुरा हुआ। उनके पति डॉक्टर थे और कोरोना वार्ड में ही लगातार ड्यूटी होने से घर भी बहुत कम जाते थे। महामारी ने उन्हें अपनी जकड़ में ले लिया और पत्नी से बिना मिले ही उन्होंने अंतिम सांस ले ली। कोरोना से मृत्यु हुई तो प्रोटोकाल के तहत गिनें चुने लोग ही अंतिम संस्कार में सम्मिलित हो पाये।
यश की ग्लानि का कोई ओर-छोर नहीं था। वो स्वयं में इतना आत्मकेन्द्रीत हो गया था, कि इतने दिनों तक परिवार के सदस्यों की न दोस्तों की कोई खबर ली। गरिमा मैडम के लिए तो उसके मन इतना आदर था फिर भी एक बार ये नहीं लगा कि फोन पर बात कर ले। जब भी लॉकडाउन में कुछ ढील होगी सबसे पहले उन्हीं से मिलना होगा। अब यश की उदासी का कारण स्वयं से हट कर समस्त पर ठहर गया। फोन पर दोस्तों से बात कर रहा हो या घर में सदस्यों से मायूसी से भरा लहज़ा ही होता।
‘क्या हो रहा है ये? कितने लोगों की बलि चढ़ेगी? ये महामारी कभी खत्म भी होगी कि नहीं।
तनु कहती – ‘शुरूआत में भले ही समझ नहीं आ रहा था क्या करें, पर अब तो गाईड-लाईन्स भी सामने हैं। पालन करना न करना आपकी समझदारी पर है। महामारी ने ये थोड़ी कहा कि आप घर में व्यायाम नहीं कर सकते या बस बिना कुछ किये हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें।'
‘क्या मतलब?’ – यश को लगा तनु उसी पर तंज कस रही है।
’भैया आपको पता है ना हम चारों अपने-अपने हिसाब से कोई ना कोई व्यायाम हमेशा करते आये हैं। अभी जब इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है तो आपने क्यों छोड़ दिया।
तनु को बीच में रोकते हुए यश बोला – ‘रोका नहीं है यार, हालात् ही ऐसे हो गये थे कि मन ही नहीं किया। पर तुम सही कह रही हो, कल सुबह से मैं बाहर की जो सीढ़ीयां हैं उन्हें तेजी से चढूँगा – उतरूँगा। (cardiovascular) कॉर्डियोवैस्कुलर एक्सरसाईज़ दिल को मजबूत करेगा। यहीं से शुरूआत करते हैं।'
‘वाह भैया, ये हुई ना समझदारी वाली बात! इसी बात पर हो जाये ---
’चल हट, चीज़ केक वाली। मैंने कुछ नूडल्स-पास्ता और सेलेड भी बनाना सीख लिया, बना कर खिलाता हूँ।
मां तो यश में आये इस आशात्मक परिवर्तन से आश्वस्त हुई। कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। तभी तनु के दिमाग में एक विचार कौंधा – ‘भैया, आप बनाकर खिलाईये, टेस्ट करने के बाद हम तय करेगें कि इनके यूटयूब वीडियो बना कर डाले क्या?या आपकी खासियत (Expertise) जिसमें हो उसका वीडियो बनायेगें।'
इनकी बातें ध्यान से सुनते हुए पापा ने पूछा – ‘इसमें सही में कुछ फायदा होगा क्या ? यश अपने विषय के अनुरूप भी कुछ कर सकता है क्या ? याने बिजि़नेस मैनेजमेन्ट में।'– उनकी आशा भरी नज़रों ने उन तीनों को ही प्रभावित किया। वो शांत रहते रहे, यश को कुछ भला-बुरा भी नहीं कहा कि ऋण का बोझ सिर पर लाद दिया।
तनु और यश दोनों ने ही एक साथ कहा – ‘हां पापा’ – फिर यश बोला ‘बैठे रहने से तो अच्छा है मैं ऑनलाईन लेसनस बनाकर अपना यूटयूब चैनल प्रारंभ करूँ । हो सकता है कुछ समय बाद अच्छा रेस्पॉन्स मिलने लगे और फिर मैं कमाऊ पूत बन जाऊँ’– उसने बात हंसते हुए खत्म की।
घर का वातावरण काफी कुछ सहज और सामान्य हो गया था।
’बच्चों, राह में आती असफलताएं ही तो सफलता का मार्ग प्रशस्त करती हैं। असफलता तो मात्र पड़ाव है जहां हम थम कर आगे बढ़ने की युक्ति पर विचार कर सकते हैं। अब यही देखो महामारी की विनाशलीला एक तरफ तो दूसरी तरफ उत्तरजीविता (Survival) के लिये लोग कैसे-कैसे प्रयत्न कर रहे हैं। ये तो सदियों से होता आया है। विनाश में ही तो नवनिर्माण का बीज छुपा है। दोनों आगे-पीछे चलते रहते हैं।