Vijayi Ke Aansoo (Hindi Nibandh) : Ramdhari Singh Dinkar

विजयी के आँसू : रामधारी सिंह 'दिनकर'

[ महाभारत के अनन्तर महाराज युधिष्ठिर के परिताप की कल्पना ]

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया । लड़ाई के पहले वीरों की श्रेणी में जो भी गिने जाने के योग्य थे , वे प्रायः सब - के - सब युद्ध भूमि में सो गए । जिस भूखंड पर कौरवों और पांडवों की मुठभेड़ हुई थी , वह आज लहू से लथपथ और रुंड - मुंडों से भयानक हो उठा है । भयानकता के बीच केवल भीष्म हैं जो शरशैया पर जाग रहे हैं ।

अठारह अक्षौहिणी सेना की लाशों पर से रथ दौड़ाता हुआ मैं हस्तिनापुर की राजधानी में आ गया हूँ ; किन्तु यह राजधानी वही नहीं है जिसमें दुर्योधन अपने भाइयों और मित्रों के साथ निवास करता था अथवा जहाँ हमने भी आनन्द के कुछ वर्ष बिताए थे । फूल सूख गए , हरियाली जलकर खाक हो गई , शाखाएँ और टहनियाँ खंड - खंड होकर नीचे पड़ी हैं और पत्तों का कहीं पता भी नहीं है । जो शेष है वह वाटिका नहीं , वाटिका का कंकाल है और यही कंकाल , उपवन की यही ठठरी मेरे भाग्य में बदी थी जो विजय के हाथों मुझे पुरस्कार में मिली है ।

जब भीम की गदा की चोट खाकर नर - व्याघ्र दुर्योधन धराशायी हुआ , उसने मूर्च्छित होते - होते ललकारकर मुझसे कहा था , ' युधिष्ठिर ! वीरों को लेकर तो मैं स्वर्ग चला , अब विधवाओं को लेकर तुम राज्य करो । ' दुर्योधन की इस उक्ति की बेधकता उस समय मुझ पर प्रकट नहीं हुई थी । हम सबने सोचा था कि निराशा के अतिरेक से व्याकुल होकर दुर्योधन व्यंग्यबाण का सहारा ले रहा है ; किन्तु आज मुझे स्पष्ट दीख रहा है कि उसने तनिक भी अत्युक्ति नहीं की थी । सचमुच ही भारत के सभी शूरमा विदा हो गए , जो विदा होने से बचकर पीछे रह गया है , वह विधवाओं और निपूती माताओं का देश है । और यही वह देश है जिस पर विजेताओं को राज्य करना है ।

आज हस्तिनापुर की छत पर चढ़कर जब मैंने चारों ओर दृष्टि डाली , तब ऐसा लगा , मानो मैं किसी महाश्मशान में खड़ा हूँ , जिसकी कुरूप शान्ति मन में काँटे चुभोती है और जिसका भीषण सुनसान दूर से भी भयानक लगता है । और इस सुनसान में मरघट की शान्ति के भीतर से एक आवाज उठती है , जो मुझसे पूछना चाहती है कि युधिष्ठिर! क्या तुम इसी शान्ति के लिए लड़ाई लड़ने नहीं गए थे? मेरे अपने ही कर्म व्यंग्य बनकर मुझ पर लोट रहे हैं । मेरी अपनी ही इच्छा और आकांक्षा तीर बनकर मुझे विदीर्ण कर रही है । ऐसा लगता है कि मैंने जो कुछ सोचा , सब गलत था ; जो कुछ किया , सब दुष्कर्म था । शकुनि के साथ जुए की बाजी हारकर भी मन से मैं हारा नहीं था ; किन्तु आज तो इतनी बड़ी लड़ाई जीतकर भी अनुभव होता है कि मैं सब कुछ हार चुका हूँ और पराजय की इस व्यथा का कोई निराकरण भी है , इसकी थोड़ी भी आशा नहीं दीखती ।

हस्तिनापुर में आज ऐसा कोई घर नहीं जिसमें बच्चों की किलकारियों की गूंज हो ; जिसमें युवतियाँ हर्ष और उल्लास के गीत गाती हों और युवक आनन्द के अट्टहास उठा रहे हों । जीवन के महल को अपनी उमंग से गुंजित रखनेवाले नौजवान कुरुक्षेत्र के मैदान में कटकर ढेर हो गए , उनका रक्त हाथियों और घोड़ों के रक्त से एकाकार होकर धरती में समा गया और हम जीवितों में इतनी भी शक्ति नहीं कि हम उनके शवों का विधिवत् संस्कार करें । मृत्यु का बोझ दुस्सह बनकर जीवन की पीठ पर आ पड़ा है और हम उसे ढोने में हाँफ रहे हैं । राजधानी में अगर कोई आवाज सुनाई देती है तो वह चूड़ियों के टूटने की आवाज है , वह बिलख - बिलखकर रोनेवाली निपूती माताओं की आवाज है , वह सिर और छाती पीटकर चीखती हुई बहनों और विधवा पत्नियों की आवाज है ।

और जो हाल राजधानी का है , वही सारे देश का समझना चाहिए । अभी तक जहाँ - जहाँ से समाचार आए हैं , उनसे तो यही ज्ञात होता है कि देश में शायद ही ऐसा कोई घर हो , जिसके दो - एक लाल इस महासंग्राम में बलि नहीं हुए हों । युद्ध के नाग ने प्रत्येक परिवार को डसा है । महानाश की चिंगारी हर एक छप्पर पर पड़ी है । हर एक घर से शोक का धुआँ उठ रहा है । हर एक परिवार किसी - न - किसी वीर की याद में सिसकियाँ ले रहा है । और अनेक वंश हैं जिनकी आखिरी कोंपलें इस लड़ाई में जलकर खत्म हो गई हैं । भारत - वसुन्धरा की मृत्ति अपनी स्वाभाविक हरियाली को छोड़कर लाल हो गई है और इस लाली के पीछे युवकों का शोणित ही नहीं , युवतियों का लुटा हुआ सिन्दूर भी है ।

जहाँ भी जाता हूँ , नारियों को कुररी के समान बिलखते देखता हूँ ; जहाँ भी जाता हूँ , बूढ़ों को बेचैन पाता हूँ । ये वृद्ध , जिनके बुढ़ापे की लकड़ियाँ टूट गई हैं , हृदय को कठोर करके शास्त्र - चिन्तन से मन बहलाना चाहते हैं ; किन्तु हाय री बेबसी ! बल से दबाई गई आह आँसू बनकर आँखों में छा जाती है , और अक्षर उन्हें ठीक से दिखाई नहीं देते । दुधमुंहे बच्चे भी हँसना भूल गए हैं , क्योंकि यद्यपि वे यह नहीं जानते कि देश में क्या घटना घटी है , फिर भी सबको उदास देखकर उन्हें भी हँसने की हिम्मत नहीं होती ।

भारतवर्ष को अपने महारथियों का बड़ा अभिमान था और आज से बीस - बाईस दिन पूर्व तक इस देश में जितने महारथी एक साथ विद्यमान थे, उतने तो इतिहास में और कभी , कदाचित् ही , वर्तमान रहे होंगे । भीष्म , द्रोण और अश्वत्थामा , कर्ण , दुर्योधन और जयद्रथ तथा कृपाचार्य , कृतवर्मा , शल्य और भूरिश्रवा , सात्यकि , उत्तमौजा और युधामन्यु , द्रुपद , विराट , धृष्टद्युम्न और चेकितान तथा घटोत्कच और कुन्तिभोज - इनके जोड़ के अतिरथी अब आगे शायद ही उत्पन्न हों । किन्तु काल ने किसी को भी नहीं छोड़ा । सब युद्ध में उतरे और सब - के - सब उसी में विलीन हो गए । विधि - संयोग से युद्ध ने जिन्हें निगलने से इनकार कर दिया , उनमें पांडव - पक्ष के सात्यकि और श्रीकृष्ण तथा कौरव - पक्ष के कृतवर्मा , कृपाचार्य और अश्वत्थामा - ये पाँच ही वीर शेष हैं ।

जब तक युद्ध चल रहा था , हम संग्राम की मादकता में विभोर थे और हमें यह सोचने का अवकाश ही नहीं था कि हम क्या कर रहे हैं ; किन्तु युद्ध के समाप्त होते ही यह स्पष्ट हो गया है कि हम जिस कर्म में इतने उत्साह से लगे हुए थे , वह असल में अत्यन्त गर्हित कर्म था और उसे धर्म का विशेषण देना धर्म का नितान्त अपमान करना है ।

यह सत्य है कि दोनों पक्षों के वीर इस युद्ध को धर्मयुद्ध मानकर लड़ रहे थे ; किन्तु धर्म पर दोनों में से कोई भी अडिग नहीं रह सका । ‘ लक्ष्य प्राप्त हो चाहे न हो , किन्तु हम कुमार्ग पर पाँव नहीं रखेंगे ' - इस निष्ठा की अवहेलना दोनों ओर से हुई और दोनों पक्षों के सामने साध्य प्रमुख और साधन गौण हो गया । प्यारे अभिमन्यु की हत्या पाप से की गई तो भीष्म , द्रोण , भूरिश्रवा और स्वयं दुर्योधन का वध भी पुण्य से नहीं हुआ । जिस युद्ध में भीष्म , द्रोण और श्रीकृष्ण वर्तमान हों , उस युद्ध में भी धर्म का पालन नहीं हो सके , इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि युद्ध कभी भी धर्म के पथ पर रहकर लड़ा नहीं जा सकता । हिंसा का आदि भी अधर्म है , मध्य भी अधर्म है और अन्त भी अधर्म है । जिसकी आँखों पर लोभ की पट्टी नहीं बँधी है ; जो क्रोध , आवेश अथवा स्वार्थ में आकर अपने कर्तव्य को भूल नहीं गया है , जिसकी आँखें साधना की अनिवार्यता से हटकर साध्य पर ही केन्द्रित नहीं हो गई हैं , वह युद्ध जैसे मलिन कर्म में कभी भी प्रवृत्त नहीं होगा । युद्ध में प्रवृत्त होना ही इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने रागों का दास बन गया है । फिर जो रागों की दासता करता है , वह उनका नियन्त्रण कैसे करेगा ?

व्यास और भीष्म तथा स्वयं श्रीकृष्ण भी मुझे बार - बार समझा रहे हैं कि मेरी यह वेदना व्यर्थ है , मेरा यह अनुताप आधारविहीन है ; क्योंकि युद्ध को निमन्त्रण हमने नहीं दिया , वह बरबस हम पर थोपा गया था । अत्याचार दुर्योधन ने मचा रखा था , हम उसका निराकरण खोजते हुए अपनी इच्छा के विरुद्ध युद्ध में आ गिरे । किन्तु यह मेरी शंकाओं का समाधान नहीं है । जीवन की सार्थकता किसी भी ध्येय की प्राप्ति में नहीं , उसकी ओर निरन्तर सन्मार्ग पर चलते रहने में है । हमारे पाँव कहाँ पहुँच रहे हैं, यह प्रश्न मुख्य नहीं हो सकता; मुख्य बात तो यही है कि हमारे पाँव किस मार्ग पर पड़ रहे हैं । और अगर यह कहिए कि विजय के लिए युद्ध अवश्यम्भावी है , तो विजय को मैं कोई बड़ा ध्येय नहीं मान सकता । जिस ध्येय की प्राप्ति धर्म के मार्ग से नहीं की जा सकती , वह या तो बड़ा ध्येय नहीं है अथवा अगर है तो फिर उसे पाप के मार्ग से पाने का प्रयास व्यर्थ है । संग्राम के कोलाहल में चाहे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा हो , किन्तु आज मैं अपनी आत्मा की इस पुकार को स्पष्ट सुन रहा हूँ कि युधिष्ठिर ! तुम जो चाहते थे वह वस्तु तुम्हें नहीं मिली । द्रौपदी के अपमान का बदला चाहे चुक गया हो , भीम की प्रतिज्ञा चाहे पूरी हो गई हो और हस्तिनापुर का राज्य - सिंहासन भी चाहे तुम्हारी राह देख रहा हो ; किन्तु तुम्हारी जीत से जलनेवाले लोग अब जीवित नहीं हैं , इसलिए तुम्हारी विजय में कोई रस नहीं , वह नीरस और स्वादविहीन है । न वे ही जीवित है जो ईर्ष्या में जलकर तुम्हारे अभिमान को बढ़ावा देते , न वे ही जीवित हैं जिनकी मित्रता के साथ तुम इस जीत का उपभोग कर सकते थे । एक - एक कर तुम्हारे सारे शत्रु विनष्ट हो गए ; किन्तु स्वयं नष्ट होते - होते उन्होंने उस दुनिया को भी भलि - भाँति बर्बाद कर दिया जिस पर तुम राज्य करना चाहते थे । इस जर्जर और विषण्ण विश्व की वेदना उनके लिए नहीं है जो मर चुके हैं , बल्कि उनके लिए है जिन्हें मृत्यु ने उगल दिया है । लड़ाई से पहले तुम दुखी थे ; किन्तु लड़ाई के बाद तुम और दुखी रहोगे । इस प्रकार यह विजय असल में तुम्हारी दोहरी हार है ।

कल जब मैंने नगर में प्रवेश किया , लोगों ने मेरे स्वागत के बाजे बजाए और मेरा जय - जयकार किया ; किन्तु न तो इन बाजों में कोई सजीवता थी और न जयकारों में कोई सात्विक उत्साह । ऐसा लगा , मानो ये स्वर किसी निर्जीव यन्त्र से निकल रहे हों और उन्हें सुनकर मेरा मन फिर से कहने लगा : ' युधिष्ठिर ! तुम्हारा पहला निर्णय ही ठीक था । अभी भी समय है , रथ को मोड़कर तुरन्त वन की ओर भाग चलो ; क्योंकि वन के पशुओं को देखकर तुम्हें ग्लानि नहीं होगी , न वे तुम्हें धर्मराज नाम से पुकारेंगे , न वे तुम्हारा जय - जयकार करेंगे । ' किन्तु अर्जुन और श्रीकृष्ण मेरे दोनों ओर खड़े थे और उनकी भर्त्सनाओं को याद करके मैं निश्चेष्ट रह गया ।

अर्जुन , श्रीकृष्ण और अन्य बहुतेरे लोग तन से जीवित , किन्तु मन से निर्जीव , इस युधिष्ठिर को खींचकर सिंहासन के पास ले आए हैं । किन्तु मुझे अब तक यह नहीं सूझता है कि अपने पश्चात्ताप को कहाँ छिपाऊँ ? और क्या करूँ कि देश के अगणित नर - नारियों के आँसू शीघ्र - से - शीघ्र सूख जाएँ और उनके अधरों की लुप्त मुस्कान एक बार फिर से लौट आए ! केवल भीष्म ही नहीं , मुझे लगता है , भारत की विशाल संस्कृति ही आज शरशैया पर सोई हुई है । कौन है वह उपाय जिससे यह संस्कृति मृत्यु के मुख में पड़ने से बचाई जा सकती है ? मेरी सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि संग्राम तो जैसे-तैसे समाप्त हो गया, किन्तु उससे देशभर में मार-काट की जो मानसिकता फैली है , उसका क्या होगा ? क्या लोग हिंसा के इस खेल को दुहराते जाएँगे अथवा वह विचारकर शान्ति से काम लेंगे कि शत्रुओं का भी मस्तक उतारना बर्बरता और जंगलीपन का काम है !

('रेती के फूल' पुस्तक से)

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