उठो सहेली उट्ठो (कहानी) : अनवर सुहैल

Utho Saheli Uttho (Story in Hindi) : Anwar Suhail

अंधेरे कमरे में बैठी मम्मी रो रही थीं…
बचपन के एक खेल की याद हो आई।
लड़कियां एक दूसरे का हाथ पकड़ कर एक गोल-घेरा बनातीं। घेरे के बीच में एक लड़की बैठ कर रोने का अभिनय करती। गोल घेरे वाली लड़कियां घूम-घूम कर समवेत-स्वर में गीत गातीं-
‘‘एक लड़की बाग में
बैठे-बैठे रो रही थी
उसकी सखी कोई नहीं’’
फिर चक्कर लगाना बंद कर, रो रही लड़की को इंगित कर गातीं-
‘‘उठो सहेली उट्ठो
अपने आंसू पोंछो
चार गोला घूमो
नई सहेली ढूंढो।’’
आज मम्मी का कोई आंसू पोंछने वाला नहीं। जिस पंछी पर आस थी वह तो कब का उड़ गया। आशा का अंतिम स्रोत जो चूज़ा था, उसके भी अब पंख उग आए हैं…वह नई उड़ाने चाहता है…नए साथी चाहता है…पुराने लोग तो भूल जाने के लिए होते हैं।
मम्मी की आस, मम्मी का जीवन-रस संजू ही तो है।
वही संजू कितनी आसानी से आज इन्हें पंखहीन बना गया—
‘‘आपने हम पर कोई एहसान नहीं किया मम्मी!’’
संजू का चेहरा गुस्से से लाल हुआ जा रहा था और नथुने फूल-पचक रहे थे।
संजू के पापा क्रोध में बिल्कुल यही रूप बनाते थे।
‘‘ऐसा तो सभी मां-बाप अपने बच्चों के लिए करते हैं।’’
यही सब ऊल-जलूल बक रहा था संजू!
मम्मी संजू के इस व्यवहार से बहुत दुखी हैं।
उन्होनें सोचा भी न था कि उनका लाड़ला दुलारा संजू जीवन में कभी ऐसे कुबोल भी बोलेगा। आस की इतनी कच्ची डोर से अब तक वे अपनी पतंग उड़ा रही थीं, उन्हें मालूम न था!
संजू के शब्द उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे-
‘‘आपने हम पर कोई एहसान नहीं किया मम्मी…!’’
इतने कड़वे बोल की शिक्षा तो उन्होंने नहीं दी थी कभी! ये उल्टी विद्या कहां से सीखी संजू ने?
मम्मी का ध्यान बहू प्रीति की तरफ गया। बीती रात बहू के कमरे से तेज़ आवाज़ में कहीं बात हो आई…।
बहू प्रीति चीख़-चीख़ कर कह रही थी–‘‘ आखि़र मेरा भी तो जीवन है। मेरे भी तो कुछ अरमान हैं संजू! अगर यही चलता रहा तो मैं अपनी ‘पर्सनल आइडेंटिटी’ खो बैठूंगी।’’
एक गहरा सांस और फिर–‘‘ तुम समझते क्यों नहीं संजू…मैं मिसेज संजय गुप्ता या कि गुप्ता जी की बहू या कि गोलू की मम्मी के रूप में मरना नहीं चाहती हूं! मेरे पापा ने बड़े चाव से मुझे पढ़ाया। एम काम, बीएड करवाया। मैं जाॅब पर थी और तुम्हारे घर से रिश्ता आया। अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मैं यहां आई। गोलू पेट में आ गया तो मैं चुप रही। अब तो गोलू समझदार हो गया। मम्मी गोलू से हिल-मिल गई हैं। अब तो मुझे जाॅब पर जाना ही है। इस चारदीवारी में मेरा दम घुटता है संजू…!’’
बहू रोने लगी।
संजू गिड़गिड़ा रहा था–‘‘ धीरे बोलो प्रीति, प्लीज़ कूल डाउन! तुम बात समझने की कोशिश करो!’’
‘‘क्या बात समझने का मैंने ठेका ले रखा है? अब तक तो जो भी किया तुम्हारी और मम्मी की इच्छा के अनुसार काम किया संजू ! अब मैं एक न सुनूंगी। मेरा ‘सेलेक्शन’ हो चुका हैं। कितना ‘टफ-कम्पटीशन’ था वहां…अब मैं तुम्हारी दकियानूसी दलीलें और न झेल पाऊंगी.. घर…बच्चे…मम्मी…पति …हुह!’’
संजू की आवाज़ सुनाई न दी। प्रीति का बड़बड़ाना चलता रहा था। प्रीति का ‘टीचरशिप’ का आमंत्रण मिला है। उसने ‘एप्लाई’ जो किया था।
मम्मी ने सही समझा…ये सब प्रीति का किया धरा है, वरना उनका बेटा तो…संजू ऐसा नहीं था।
लेकिन संजू इतना दुर्बल क्यों पड़ता जा रहा है? बहू से लड़ न पाया तो मुझ बूढ़ी पर धौंस जमाने लगा!
–‘‘आपने हम पर कोई एहसान नहीं किया मम्मी!’’
यदि आज संजू के पापा जीवित रहते तो ये जून भुगतनी न पड़ती। संजू के शब्दों की मार से वह घायल हो गई थीं।
मम्मी क्या स्वार्थ के लिए प्रीति की राह में रोड़े अटका रही हैं? वे तो संजू के परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रात-रात भर जागकर भगवान से प्रार्थना किया करती हैं। गोलू के रूप में भगवान का जो प्रसाद मिला है, उसकी उचित देखभाल, पालन-पोषण हो, यही तो वह चाहती हैं।प्रीति यदि नौकरी करने जाएगी तो गोलू का ख्याल कौन रखेगा? मम्मी का क्या है? कितने दिन जिएंगी कुछ ठिकाना नहीं। ‘ब्लड-प्रेशर’ बढ़ा रहता है।एक बार ‘अटैक’ आ चुका है।अब वैसे भी ज्यादा तनाव वह बर्दाश्त नहीं कर पातीं हैं।
मम्मी ने कभी न चाहा कि बहू सर पर आंचल डाले, सास के पांव दबाती रहे और मौका पाकर पड़ोसनों को सास के अत्याचार के किस्से सुनाए। मम्मी तो उसी दिन मर गई थीं जिस दिन संजू के पापा का निधन हुआ था। अब जीवित हैं वह तो सिर्फ संजू के रूप में जो पौधा इस बाग में लगा था, उसकी हिफ़ाज़त के लिए जीवित हैं। वरना उनका क्या, पति के बिना स्त्री, ज्यों डार से टूटा पत्ता !
संजू के सामने मम्मी रो रही थीं–‘‘वाह संजू! हद हो गई! इससे तो अच्छा तो तू मुझे थप्पड़ मार लेता…मेरी लिस्वार्थ ममता, मेरा प्यार, मेरे जीवन का उद्देश्य, सब व्यर्थ हो गया…मैं क्या करूं बेटा! जनम की दुखियारी हूं! नसीबों वाली होती तो यूं रांड-विधवा बन जिन्दा रहने का अभिशाप न झेलना पड़ता। तेरे आसरे पर ही मैनें मौत को दुत्कारा…आत तू ही मेरी को एहसानका नाम दे रहा है…’’
मम्मी के हाथ माफ़ी मांगने की मुद्रा में जुड़ गए–‘‘अब आगे से कुछ न कहूंगी…मेरा तुझ पर कोई अधिकार नहीं…जैसा जी में आए जियो तुम लोग…मुझे अब मुर्दा ही समझो!’’
संजू और प्रीति पर इस रूदन का कोई प्रभाव न पड़ा।
मम्मी सीधी अपने कमरे में आ गई थीं।
मम्मी का कमरा। संजू के पापा के संग इस कमरे में जब वह पहली बार आई थीं तो कितनी खुश थीं। सरकारी क्वार्टरों में नपी-तुली जगह और असुविधाजनक व्यवस्था होती है। अपना मकान संजू के पापा ने खुद की देखरेख में बनवाया था। एक अच्छे ‘आर्कीटेक्ट’ भी वह थे!
पूरब की तरफ़ खुलने वाली बड़ी सी खिड़की उन्हें विशेष रूप से पसंद थी। इस खिड़की के पर्दे हटाओ तो सुबह के सूर्य की पहली किरणें पीपल के पत्तों से छनकर सीधे लम्बे-चैड़े पलंग पर आ गिरतीं।
हवा चलती तो पीपल की सूखी पत्तियां ज़मीन पर टूट कर गिरतीं तो एक अलौकिक नाद होता…लगता जैसे कोई पाकीज़ा रूह पत्तों पर चहलकदमी कर रही हो।
शाम को सूरज की रूपहली आभा जब पहाड़ी की चोटी पर बने मंदिर पर पड़तीं तो खिड़की एक बड़ा सा ‘लैण्ड-स्केप’ बन जाती।
पापा की स्मृति ने मम्मी के दुख में वृद्धि कर दी।
मम्मी आज बहुत वर्षों के बाद खुद को इतना अकेला महसूस कर रही थीं। जैसे बियाबान में अकेला दरख़्त…जैसे महानगरों में अकेला इंसान!
बचपन की सहेलियां फिर पास आ गईं।
म्ममी अकेली बैठी रो रही हैं।
स्हेलियां घेरा बांधे घूम-घूम कर गा रही हैं–
‘‘उट्ठो सहेली उट्ठो
अपने आंसू पोंछो…’’
आज उनका कोई ‘आंसू पुंछवइया’ नहीं। संजू से उम्मीद थी तो वह बीवी के आंचल में जा छिपा है।
कब से वह इस कमरे में अकेली बैठी रो रही हैं। किसी को ज़रा भी फि़क्र नहीं उनकी! कहे चिंता करे कोई…जिसे अपना रक्त पिला कर पाला-पोसा वही उस दूध के क़र्ज़ को एहसान कहता है।
किसी कही आवाज़ भी सुनाई नहीं देती। आज तो शाम की चाय भी किसी ने न पूछी। नहीं तो गोलू उनके साथ ‘स्नेक्स’ खाता और एक दो घूंट चाय ज़रूर पी लेता था।
गोलू, दिन-रात ‘दादी’ के आगे-पीछे डोलने वाल गोलू भी आज नज़र नहीं आता…न किसी की आवाज़ ही सुनाई पड़ती।
प्रत्येक शाम, सभी ‘ड्राइंग-रूम’ में इकट्ठे होकर चाय-नाश्ता करते हैं। तो क्या ‘ड्राइंग-रूम’ आज सूना होगा?
मम्मी सोचती जातीं और आंसू गिरते जाते।
गोलू सुबह उठकर सीधे मम्मी क कमरे में आकर ‘दादी मां’ की माला जपने लगता है। मम्मी उसे अपने सरथ बाहर टहलाने ले जाती हैं। गोलू ‘दादी मां’ की ऊंगली छुड़ाकर, बड़े आदमियों की तरह हाथ झटकारते सीना फुलाए चलता तो मम्मी को संजू के पापा की याद हो आती।
संजू के पाप बेटे को अत्यधिक दुलान करते थे।
जब संजू पेट में था, पापा कहते–‘‘लड़का हुआ तो हम ऑपरेशन करवा लेंगे…यदि बेटी हुई तो एक बार और तुम्हें ये कष्ट उठाना पड़ेगा।’’
संजू के पापा वचन के पक्के निकले। संजू के जन्म क बाद ही अवसर पाकर उन्होने नसबंदी करवा
ली।
मम्मी तो कुंवारेपन में भी बच्चों से घृणा करती थीं। बच्चेवालियां गू-मूत उठातीं, पोतड़े सुखातीं, या लापरवाही में ब्लाउज़ खोले बच्चों के मुंह पर स्तन ठूंसे रहतीं तो उन्हें देख मममी को उबकाईसी आती।
भाभियां मज़ाक करतीं तो वह उन्हें जवाब देतीं–‘‘कहीं अनाथाश्रम से बड़ा सा बच्चा गोद ले लूंगी।’’
भाभियां खूब हंसा करतीं—‘‘अरी बन्नो, बियाह तो हो जाने दो पहले…फिर बताना!’’
वाक़ई विवाह के बाद तो उनका जीवन ही बदल गया।
बबुल का घर भुला गया और पति का संग ही नया जन्म सा लगने लगा। पति का ऊंचा ओहदा, बंगला-गाड़ी, ऐश्वर्य के तमाम संसाधन…सुख के भरपूर दिन और तृप्ति की अंतहीन रातें…
संजू के पापा कहा करते –‘‘डोन्ट वरी डार्लिंग…एक ही तो बेटा है…दोनों हाथों लुटाएगा फिर भी बचा रह जाएगा इतना कि अगली पीढि़यां जी जाएं।’’
म्म्मी उनके मुंह पर हथेली दख देतीं–‘‘अपसगुन न बोलो जी! अपना सुजू खुद्दार बनेगा…बाप की दौलत पर निर्भर नहीं रहेगा।’’
पपा बोलते–‘‘वह तो एक मिसाल थी…संजू मेरा बेटा है, अपनी राहें खुद बनाएगा…इतना आगे जाएगा कि लोग जल उठेंगे। बेटा-बहू को हम स्वतंत्र छोड़ देंगे…जियो अपनी तरह से, ये संसार जवां मर्दों का है, यही कहूंगा।’’
स्वतंत्र विचारों के थे संजू के पापा…मम्मी भी क्या कम पढ़ी-लिखी थीं। पापा के एक दोस्त डीएवी स्कूल में प्राचार्य थे।कितना दबाव डाला प्राचार्य मम्मी पर कि वे स्कूल में ‘सर्विस-ज्वाइन’ कर लें। संजू के पापा भी प्रोत्साहित करते कि ‘‘कर लो न सर्विस’!संजू को किसी बोर्डिंग में डाल देते हैं।’
मम्मी ने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई…क्या अपना संजू अनाथ है जो दूसरों की कृपा पर पलेगा! मम्मी के जीवन का एकमात्र उद्देश्य था कि संजू का उत्कृष्ट लालन-पालन!
संजू के पापा के कई दोस्तों की पत्नियां ‘जाॅब’ करती थीं। वे खूब ठसके से जीतीं। किंतु मम्मी को कभी भी उनका ‘ग्लेमर’ दिग्भ्रमित नहीं कर पाता।
व्ह पति-बच्चे में मगन रहा करतीं।
पति आफिस से लौटते तो मम्मी उनका स्वागत मुस्कुराहट के साथ करतीं। शाम की चाय उन्हीं के सज्ञथ पीतीं। बाज़ार से खरीद कर या कि फ्रि़ज़’ आदि में रखे नाश्ता-बिस्किट वगैरह उन्हें पसन्द न था। वे हर शाम कुछ न कुछ मौसम के अनुसार नाश्ता स्वयं तैयार किया करतीं।
मम्मी की इस आदत की संजू के पापा कितनी बड़ाई किया करते थे।
अक्सर ही वह चाय नाश्ता के दौरान एक किस्सा सुनाया करते–
‘‘अच्छा किया जो तुमने ‘सर्विस ज्वाइन’ न की। वो जो अपना ‘कनवा लाला’ है न , अरे वही के सक्सेना! हमेशा परेशान रहता है। उसकी बीवी नौकरी करती है। लाला-ललाइन दिन भर काम पर चले जाते हैं। घर और बच्चों की जि़म्मेदारी बूढ़ी मां पर रहती है। बिचारी का ये जनम तो अकारथ गया। पहले अपनी संतानों को पालने में व्यस्त रहीं , अब संतान की संतानों की देख-रेख कर रहीं हैं। पैसे और ‘इस्टेटस’ की भूख जो न कराए…’’
‘‘शाम थककर दोनों जब घर आते हैं तो समस्या हो जाती है कि कौन किसे चाय पूछे। कौन किसे चाय बनाकर पिलाए। मां से कह नहीं सकते सो अक्सर बिना चाय के रह जाते हैं दोनों…’’
कितना हंसा करते थे संजू के पापा!

ये संजू समझने की कोशिश क्यों नहीं करता…प्रीति को वह समझा क्यों नहीं पाता कि स्त्री का धन पति और बच्चे हैं, पैसा, पद, प्रतिष्ठा या दिखावा नहीं।

दोनों जाने क्यों समझना ही नहीं चाहते कि प्रीति ‘जाॅब’ पर जाएबी तो नन्हे गोलू पर क्या बीतेगी? अभी भी वह ‘मम्मी-मम्मी’ कीक जि़द कर बैठता है तो न संजू से मानता है और न स्वयं स्वयं उनसे…प्रीति ही उसे चुप कराती हैं।
संजू के पापा संजू को चपत लगा दें तो पापा गुस्सा हो जाते थे।
अंतिम समय में इसी तरह कमरे में लेटे हुए थे। शाम का धुंघलका छाया हुआ था। उन्हें तीसरा अटैक आया था। मम्मी घबराई हुई डाॅक्टर को फोन करके पापा के पास आ बैठीं थीं।
पापा ने वचन लिया था–‘‘संजू का पूरा ख्याल रखना । उसकी जि़दें पूरी करना। संजू के रूप
में मैं इस संसार में जि़ंदा रहूंगा।’’
संजू के पापा की अंतिम इच्छा का विचार आते ही मम्मी के शरीर और मन में हरकत हुई…लगा कि निर्णय उन्हें ही लेना है। वे अब संजू की मम्मी भी हैं और पापा भी ।
अंधेरे कमरे में सहेलियों का समूह गान गूंज उठा–
‘‘उठो सहेली उट्ठो
अपने आंसू पोंछो।’’
मम्मी आंसू पोंछकर सीधी खड़ी हो गईं। कमरे को रौशन किया। बाथरूम में जाकर चेहरा धोया। बाल ठीक किए। फिर सीधे ड्राइंग रूम जा पहुंची।
देखा, संजू और प्रीति बिना लाइट जलाए गुमसुम से बैठे हैं। गोलू फर्श पर लेटा ‘कम्प्यूटर गेम’ खेल रहा है।
मम्मी ने कमरे का ‘सिवच-ऑन’ किया।
संजू फिर भी उदास व नाराज़ बैठा रहा।
मम्मी ने दोनों को लक्ष्य कर कहा–‘‘मैं गोलू का सम्भाल लूंगी। प्रीति का ‘सर्विस-ज्वाइन’ करने दो बेटा…इसी बहाने उसका मन बहल जाएगा।’’
संजू और प्रीति ने मम्मी को अचरज से देखा।
मम्मी ने नई सहेली खोज ली थी। ‘गोलू’ अब से उनका ‘बाल-सखा’ हुआ…

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